विजयदान देथा की कहानियों में चित्रित किसान जीवन/प्रियंका चाहर

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)
किसान विशेषांक


        विजयदान देथा की कहानियों में चित्रित किसान जीवन/प्रियंका चाहर                                        
विजयदान देथा जिन्हें लोग प्यार से बिज्जीकहते हैं। उनका जन्म 1 सितंबर, 1926 में बोरुंदा गाँव जिला जोधपुर (राज.) में हुआ था। जसवंत कॉलेज जोधपुर से पढ़ाई की व हिंदी साहित्य में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। देथा जी छात्र जीवन से ही लिखते रहे।  उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमज़ोर थी; उनके पिता सहित तीन भाई आपसी खेतों की लड़ाई के चलते मारे गए थे। बिज्जी आजीवन गाँव बोरुंदामें ही रहे। उन्हें काफी अवसर आये शहर जाने के लिए लेकिन वे नहीं गए; गाँव में रहकर ही लेखन कार्य करते रहे। उनकी अधिकतर रचनाएँ लोककथाओं पर आधारित थी। उन्होंने गाँव-गाँव, ढाणी-ढाणी जाकर बड़े-बूढों से कहानियाँ सुना करते थे। उन कहानियों में किसानों की समस्याएँ भी आती है जो किसानों का दर्द बयां करती है। उन कहानियों को उन्होंने अपनी भाषा व शिल्प के तेवर के साथ मौलिकता प्रदान की और लोककथाओं को आधुनिकता के संदर्भ में पुनःसजीव किया। सुनार पूराने गहनों को गढ़ता है उनमें नये मोती जड़ता है जिससे गहनों में नवीनता का समावेश हो जाता है और उन पर चमक बिखर जाती है। उसी प्रकार देथा ने पुरानी लोककथाओं को अपनी आवाज़ दी जिसकी चमक उनके जाने के बाद भी काले मोतियों के रूप में बिखरी है। लोककथाएँ सिर्फ लिखा भर नहीं बल्कि उनका पुनर्लेखन किया है। इसलिए भी उनकी अहमियत ज्यादा है, क्योंकि सदियों से चली आ रही लोक अनुभूतियों, लोक परंपराओं की मौखिक संस्कृति को लिखित रूप दिया। उन्होंने साबित किया है कि ये लोककथाएँ सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है जैसा उन्हें माना जाता है बल्कि इन्हें आधुनिक भावबोध के साथ वर्तमान समय पूरी धमक के साथ मौजूद होती है।”1

भारत का अधिकांश आय स्त्रोत कृषि है और कृषि का अभिन्न अंग है किसान। किसान एक ऐसा मजदूर है जो मेहनत कर के भी दुःखी है। आज भारत में सबसे दयनीय हालत किसान की है। देश की आजादी के बाद से हर स्थिति में सुधार आया लेकिन किसान के स्तर में कोई सुधार नहीं। इनकी स्थिति समयानुरूप दयनीय होती जा रही है।  हाथा कमाया कांमडाकहानी में इनाम के लालच में अपनी जीविका को भी खो देने का वर्णन है। किसान के खेत में बड़ा सा प्याज निकलता है और वो राजा को भेंट देकर इनाम पाने का लालची हो जाता है लेकिन राजा उसके पूरे गाँव पर कब्ज़ा कर लेता है। जमींदारी प्रथा के चलते किसानों के प्याज की उपज राजा के रसोई में काम आने के लिए जाने लगी और किसान की आजीविका संकट में पड़ जाती है। राजा से वह प्याज का मूल्य नहीं ले सकता और प्याज की फसल को कहीं ओर बेच भी नहीं सकता। अच्छी फसल होने के बावजूद भी किसान को आर्थिक मार झेलनी पड़ती है। राजाजी सवा मरियौ कांदौ (प्याज) देखनै घना ई राजी व्हिया (खुश हुए) राजा री रीझ खोजीजी रै घणी मूंधी पड़ी। उण दिन सूं ईं  पालड़ी गाँव खालसै व्हैगौ। पालड़ी में अैड़ा कांदा निपजै ! वै राज रसोड़ा वास्ते ई मुफीद है। छतै राजा अैड़ा कांदा निपजै ! नै कुण भोग साकै ! दूजौ गाँव मिलियां बिना ई पालड़ी कांदा रै कारण खोजीजी हाथां करनै गमाई। क्यूं वौ सवा मरिया कांदौ निजर करतो अर क्यूं पालड़ी खालसै व्हैती।”2
                       
आशा अमरधनकहानी में बारिश न होने की वजह से अकाल पड़ जाता है। अकाल के कारण किसान की आर्थिक हालत दिन-ब-दिन बत्तर होती जाती है। ऋण लेकर कुआँ खुदवाया फिर भी उसमें पानी नहीं आया। एक तो किसान को आर्थिक समस्या ऊपर से निर्मम स्वार्थ में लिप्त पत्नी जिसे दो सौतेले बच्चे फूटीं आँख नहीं सुहाते। अकाल में अनाज न होने के कारण सौतेले बच्चों को मारने की कोशिश करती है लेकिन सालभर भूखे रहने के बावजूद भी बच्चे जीवित रहते है। बच्चों को जीवित देख पत्नी जोर से बच्चों को थप्पड़ मारती है और बच्चों की मृत्यु हो जाती है। झुनझुनों के बदले उनके गालों पर दो-दो तमाचे इनायत हुए। रोष के मारे वह दांत पिसते बोली दुष्ट, हरामजादों, तुम अभी तक जीवित हो ? मरे नहीं ? तुम शैतानों से तो मौत भी बिदकती है। माँ का इतना कहना हुआ कि दोनों बच्चे चकरघिन्नी खाकर अदेर नीचे लुढ़क पड़े। माँ का विकराल रूप देखकर मौत ने उन्हें तुरंत गले लगा लिया। बाप ने पागल की नाई खूब झिंझोड़ा, तब भी उनकी आँखे नहीं खुलीं। मानो विश्व-जगत् के समुचे आलोक को वे अपने भीतर लील रही हो।”3

दिवाले की बपौतीकहानी में किसान के जीवन की विडंबना को उजागर किया है। किसान को भरपूर मेहनत के बाद भी दिवाले की बपौती ही हाथ लगती है। साहूकार अपनी स्वार्थी प्रवृत्ति के चलते दिन-प्रतिदिन अमीर बनता जा रहा है। बनिये का वंश चले तो वह चाँद, सूरज, बादल, पानी सब खरीद ले वह तो कुदरत का भी सौदा कर ले। किसान जी तोड़ मेहनत करता है। हरी-भरी फसल को लहलहाता देख उसका दिल खुश हो जाता है परंतु मेहनत के बावजूद उसके हाथ में दिवाले के सिवा कुछ हासिल नहीं कर पाता। बनिये की हवेली का ठीया छोड़कर दिवाले ने किसान के कुएँ की ठौर पकड़ी सो आज दिन तक वहीं अंगद के पाँव की तरह गड़ा हुआ है। अबुज किसान समझता है कि कुएँ से पानी सींचकर वह खेती से खुशहाल होगा। पर उसके तो फकत दिवाला हाथ लगता है ! कमाई सीधी बनिये की हवेली पहुँच जाती है। पानी की आभाव उसे कमाई का भरम होता है। पानी सींचते-सींचते उसका हाड़-हाड़ टीसने लगता है। वह ज्यूँ-ज्यूँ पानी सींचता है त्यूं-त्यूं दिवाला धोरों में बहता हुआ क्यारी-क्यारी में रलमिल जाता है। खेत में हरियाली देखकर किसान का हिया बाग-बाग हो जाता है। पर उसके खाते में शेष रहता है दिवाला ! और हाट पर बैठे बनिये की बही कुएँ की तमाम पैदावार डकार जाती है !”4 उनकी कहानियों में किसान के परिश्रम के महत्व को प्रमुखता दी गई है। व्यक्ति को अपनी आजीविका चलाने हेतु मेहनत करनी पड़ती है। मेहनत ही मनुष्य को जीवन में सफल बनाती है।

नगीनों की खेतीकहानी में मेहनत के महत्व को उजागर किया गया है। इस कहानी में किसान व राजा दोनों ही परिश्रमी हैं। किसान अपनी मेहनत से खेती करता है उसी में उसे परम संतोष की प्राप्ति होती है। राजा ने किसान के खेत में जहाँ-जहाँ अपने परिश्रम के मोतियों से हल जोता वहाँ-वहाँ सिट्टों में मोती चमकने लगे। यह राजा के परिश्रम का फल है। जिस तरह मोती अमूल्य है उसी तरह राजा की मेहनत भी अमूल्य है। जरूरत मुताबिक समय-समय पर बादलों की मेहर होती रही तो उस किसान के खेत में मनचीति बाजरी पकी। असामान्य रूप से लम्बे सिट्टे। दमकते दाने, मानो मीनाकारी जड़ी हो। किन्तु बेहद अचरज की बात कि मरियल बैल के साथ जुतकर राजा ने जिन ऊमरोंमें हल खींचा वहाँ बेश कीमती हीरे और जहाँ-जहाँ राजा-रानी ने मिलकर जुताई की वहाँ आभायुक्त अमूल्य मोती चमकने लगे।”5

किसान के जीवन में मेहनत के महत्व को उजागर किया है। किसान के लिए मेहनत का मोल महत्वपूर्ण है हीरे-मोती से उसे क्या सरोकार ? उसके लिए तो बाजरी से बड़ा हीरे-जवाहरात भी नहीं है। उसको मेहनत का फल ही सुख देता है हरे-भरे खेत, लहलाती फसलें ही उसके जीवन की पूँजी है फिर उसे कोई लालच कैसे ललचा सकता है। किसान जो अन्न उपजाता है उसी से संपूर्ण देश का पेट भरता है। भूख़ लगने पर हम हीरे-मोती नहीं खा सकतें जाने यह बात उस पूँजीपति वर्ग को क्यों नहीं समझ में आती कि अन्न की जगह अन्न ही चाहिये। मैं कोई भिखरी नहीं, अपने पसीने से अन्न निपजानेवाला प्रजापति हूँ। उसने चिड़ते हुए जवाब दिया, ‘अपनी मेहनत के अलावा एक दाना भी मेरे लिए हराम है। किसी होशियार मुनीम को मेरे साथ भेज दीजिये। हिसाब करके मुझे बाजरी दे दे । वही मेरी पावना है। मेरे दिमाग में तो मेहनत के अलावा दूसरी बात जमती ही नहीं, चाहे फल मिले न मिले। हाथ-पाँव चलाये बिना मेरा शरीर टूटने लगता है।”6

मायाजालकहानी में राजपूत सेठ से लिए कर्ज को मेहनत से तालाब खोदकर चुकाता है तब राजपूत किसान उस ऋण से स्वयं को उऋण समझता है। गरीब राजपूत का उपाय दिन-ब-दिन कारगार होने लगा। सौ ओड़ों के साथ दोनों पति-पत्नी अथक मेहनत करने लगे कि कुछ ही दिनों में भीम-तालाब खुद कर तैयार हो गया। उस सुनी रिन्दरोही में कहीं भी छोटी तलैया नहीं थी।”7 किसान के लिए गरीबी जीवन का अभिशाप बनी हुई है। गरीबी के कारण वह अपनी आम जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता है। ना सर पे छत है, ना पिने का पानी, ना पेट को रोटी नसीब होती है। उसके जीवन में हर तरफ अभाव ही अभाव नजर आते है। उसका जीवन कष्टों में गुजरता है और लाचारी व बेबसी में दिन कटते हैं। उनका जीवन सुविधाओं के अभाव में व्यतीत होता है।

 ‘मायाजालकहानी में किसान के गरीबी में जी रहे जीवन का वर्णन बहुत ही सहज तरीके से प्रस्तुत किया है। किसान की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है जिसके कारण वह हल व बीज तक नहीं खरीद सकता तो कैसे वह खेती करेगा ? कैसे उसकी हालात में सुधार होगा। इसमें क्या संदेह...! वह कुछ आगे भी खुशी प्रकट करने जा रहा था कि अकस्मात् उसका मुँह उतर गया। गर्म नि:श्वास छोड़ते बोला, ‘केवल पानी बरसने से क्या होगा ? कहाँ हल-हिंयोड़ी, कहाँ गाड़ी, कहाँ बैल और कहाँ बीज ?”8 वर्तमान समय में किसान की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के फलस्वरूप किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उनकी कहानी में हमें आधुनिक बोध नजर आता है। गरीबी के हालात से व्यक्ति उभर नहीं पाता तो उसका कारण आर्थिक शोषण है। पूँजिपति लोग गरीब किसानों का शोषण करके ही अमीर बने हैं। जमींदार, साहूकार किसानों का खून चूसते हैं। किसानों की आर्थिक शोषण की समस्या बिज्जी की कहानियों में प्रमुख रूप से उभरकर सामने आयी है जो गाँवों में बनिया जाति किसानों का आर्थिक शोषण करती हैं और किसान के जीवन की विडम्बना को उजाकर करती है।

देथा जी स्वयं जमीन से जुड़े हुए लेखक है। इसीलिए वे गाँव के किसानों की समस्यों से अच्छी तरह रूबरू है। किसानों की समस्याओं को उन्होंने देखा-परखा व अनुभव किया और कहानियों में उनको विस्तार से प्रस्तुत किया। राजस्थान में अधिकतर खेती बारिस पर निर्भर है; किसी वर्ष बारिस अच्छी हुई तो पैदावार अच्छी होगी अगर बारिश कम हुई तो पैदावार कम होगी। सुखा पड़ने से अकाल की बड़ी समस्या कितने ही किसानों के सामने आती है। बीज, खाद व बुवाई का पैसा भी किसानों को नहीं मिल पाता और जानवरों के लिए चारे की समस्या, पानी की समस्या, आर्थिक परिस्थिति की समस्या आ जाती है। अगर सिंचाई से फसल उगाई भी जाती है तो सबसे पहले ऋण की समस्या आ जाती है। कुआँ खुदवाने में, सिंचाई से संबंधित साधन खरीदने में और महँगे खाद व बीज के लिए ऋण लेना पड़ता है। प्राकृतिक आपदा जैसे ओले की मार, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, या बारिश का समय पर ना होना आदि कारणों से किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है। किसानों का उसका पूरा मुआवजा भी नहीं मिल पाता और जब फसलें बाजार में आती है तब अनाज का उन्हें उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

उनकी कहानियों में कई ऐसी कहानियाँ हैं जो किसानों के दर्द को बयां करती है। वर्तमान समय में कितने ही किसान बैंक के कर्ज के चलते आत्महत्या कर लेते हैं। फसल ख़राब होने की वजह से किसान ग़रीबी की मार झेलते हुए निम्नस्तर का जीवन व्यतीत करता है। संतुलित आहार न मिलने पर घर में बच्चे, बड़े, बूढ़े कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। बीमारियाँ भी उन्हें जल्द घेर लेती है और पैसों की तंगी की वजह से अस्पताल में इलाज भी नहीं करा सकते। कई बार आर्थिक तंगी के कारण किसानों को अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़ती है और वे उसे छुड़ा नहीं पाते। किसान किसानी छोड़कर मजदूर बनने के लिए मजबूर हो जाता है। अकाल की समस्या प्रमुख रूप से उभरकर सामने आयी है। आर्थिक रूप से कमजोर हालात भी अपराधों को बढ़ावा देते हैं।

संदर्भ
1)            विजयदान देथा, ‘मेरौ दरद न जानै कोय’(2015), जनवाणी प्रकाशन दिल्ली, पृ.50
2)            विजयदान देथा, ‘बातां री फुलवाड़ी’ (भाग-1),रूपायन संस्थान, बोरुंदा,
 पृ. 101
3)            विजयदान देथा, ‘उजाले के मुसाहिब’, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृ. 44
4)            वही, पृ. 82, 83
5)            विजयदान देथा, ‘सपनप्रिया’, (चौ. सं. 2006), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृ. 247
6)            वही, पृ. 248
7)            वही, पृ. 203
8)            वही, पृ. 195

प्रियंका चाहर
शोधार्थी- हिंदी विभाग,हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद,ई-मेल priyankacur@gmail.com 

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