समीक्षा: उत्तर औद्योगिक समय में ‘मोहन दास’ /डॉ प्रकाश कृष्णा कोपर्डे

                         उत्तर औद्योगिक समय में ‘मोहन दास’


                                                               
‘‘.... तो... मोहनदास एक असलियत है। इसकी पुष्टि आप चाहे तो हमारे गांव ही नहीं, इस देश के किसी भी गांव के किसी भी वाशिंदे से पूछकर कर सकते हैं।’’1  लेखकीय मतंव्य स्पष्ट करता है कि मोहनदास गांधीनहीं बल्कि वह आजाद भारत का सामान्य जन है, जिसके के लिए गांधी लडे़ थे। लेकिनव र्तमान में मोहनदास के साथ जों हो रहा है, उसकी अपेक्षा उन्होनें शायद नहीं की होगी। इसीलिए लेखक बताते है कि, ‘‘अंतर बस इतना है कि वह एैसा मोहनदास दिखाई पडता है। जिसे पोरबंदी काठियावाड राजकोट विलायत दक्षिण अफ्रीका या बजाज-बिडला भवन में नहीं, छतीसगढ और विंध्यप्रदेश के जंगल-पतेरा, खोई-खोह, खेत बगार में धूप-भूख रोग-पसीना और अन्याय-अपमान की आंच में पाला-पोसा जाता है। .... बाकी एकदम वहीं है।’’2 यह उद्धरण स्पष्ट करता हैं कि मोहनदास किसी जाति का प्रतिनिधि कतई नहीं है, बल्कि वह पूरें भारत के उपेक्षित समाज का रुप, रंग, आकार सब कुछ है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता ताकत, राजनीति और पैसे के माध्यम से कमायी जा रही है और यहीं पैसा बाजार में लगाया जा रहा है। अर्थशास्त्रीय शब्दों में  कहे तो उद्यमों को खड़ा किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर गरीब वर्ग उन सबसे अछूता रहकर जैसे-तैसे अपनी गुजर बसर में व्यस्त है, मोहनदास ऐसा ही एक बी. ए. पास नौजवान है। जाति कबीरपंथी विश्वकर्मा बसंहर पलियागांव पुरबनरा जिला अनूपपुर, राज्य मध्यप्रदेश का निवासी मोहनदास एम. जी. कॉलेज से फर्स्ट क्लास पास है और इसके पास होने पर कोचिंग क्लासेस वालों ने उसकी फ़ोटो छापकर लोकप्रियता जुटाने के करतब किए थे। वर्तमान कोचिंग क्लासेस की उससे बड़ी सच्चाई क्या हो सकती है कि जो कभी उनकी कक्षाओं की सीढ़ी तक नहीं चढ़ा, विज्ञापनों में उनका हिरो है। विज्ञापनी मनोवृत्ति तथा अर्थतंत्री अवसरवादिता का भंड़ाफोड़ उदय प्रकाश करते हैं। जैसे मोहनदास के साथ हुआ, उनके लिए मोहनदास मात्र बाज़ार का विज्ञापन था और आज भी है। उत्तर औद्योगिक समाज में बुद्धि ने विज्ञापन का मुखौटा पहना है। यह बाज़ार युग का सत्य है, जिसमें हर हालत को अपने स्वार्थों के मुताबिक परोसा जा रहा है।  

सरकारी नौकरी की राह, बढ़ती उम्र के साथ खत्म हो गई। अब उपाय मात्र गैर सरकारी क्षेत्र ही बचा था। पत्र अनेक आतें, लेकिन नियुक्ति किसी ओर की ही मिलने के समाचार सुनने में आते, सारा भाई-भतिजावाद गैर सरकारी क्षेत्र में मुकम्मल काम कर रहा है। मोहनदास के बेरोजगारी के दिनों में गांववालों का ताने कसना, आम बनता गया। तभी ओरियंट कोल मांइन में उसने लिखित और शारीरिक परीक्षा दे दी। पहले बीस उम्मीदवारों में पहले नंबर पर मोहनदास का नाम पुकारा गया। जैसे अब तक की सारी अनिश्चिताओं का अंत हुआहो। लेकिन बावजूद इसके अनेक चक्कर काटने पर भी काम न बना। मोहन दास समझ गया, ‘सब उपरवालों का खेल हैआजीविका का साधन मात्र कठिनानदी बची थी। पलिया बनाकर खीरा, ककडी, तरबूज, खरबूज उगाकर वह गुजारा करने लगा। लेकिन कठिना की धार भी यह सब कठिन बना देती, जब वह उफ़ान पर होती। वर्तमान भारत का उच्च शिक्षित युवा बेरोजगार भारत का प्रतीक बन मोहनदास को उपस्थित करता है। नहीं, नहीं हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्न उपस्थित करता है। 

टि. बी. से खासता बाप काबादास और आंखों की रोशनी के लिए तडपती मां पुतलीबाई, पत्नी कस्तुरी का खटता जीवन इन सभी में मोहन दास की बेरोजगारी पर कोई उपाय नहीं मिल रहा था। मुफ्त आरोग्य सेवा शिविर में इलाज करने पर मां की आंखें चली जाती है। लो, अपनी आरोग्य सेवाएं किस हद तक अपाहिज हो गयी है, इसका बढ़िया और विकृत उदाहरण और क्या हो सकता है? वहीं डॉ. वाकणकर के कारण टि. बी. का मिला खुराक भी थम जाता है क्योंकि असमय राजनेताओं के तिकड़म से  वाकणकर का तबादला हो जाता है। अर्थ के सत्ता में आने से व्यवस्था में बुरे लोग बेतहाषा बढ़ रहे हैं, फिर अच्छे इमानदार लोगों को आदिवासी क्षेत्र में तबादले की धमकियां उसी का परिणाम है, डॉ. वाकणकर के साथ यहीं हो रहा है। श्रेष्ठ भारत के सपने का तबादला अच्छे लोगों के साथ होता आ रहा है।

 सभी ओर से संकट ग्रस्त परिवार को संभालने की जुग्गत में मोहन दास असमय ही बुढ़ा दिखने लगता है-‘‘फटी हुई बेरंग हो चुकी, जगह जगह पैबंद लगी पैंट, तार तार हो चुकी मैली, चोखानेदार बुशर्ट। गंजे होते सिर पर सूखे बिखरे खिचडी अधपके बाल। झुर्रियों और बेतरतीब आडी-तिरछी लकीरों से भरा तांबई मुरझाया चेहरा। गड्ढों में  धसी, धीरे धीरे बुझती आंखे जैसे अपने आप को देखती हुई हताश कमजोर आंखे। नीचे पैरों के अंगूठों में किसी तरह फंसाई गई रबर की बहुत पुरानी, सस्ती-सी चप्पल’’3 उन खस्ता हालातों में भी वह ओरियंट कोल माइंन के आफिस के चक्कर लगा रहा था। भारत में गरीब की जिंदगी का दूसरा नाम उम्मीद होता है, फिर भी बात नहीं बनी। सबसे अधिक युवाओं के देश भारत में युवा शिक्षित मोहन दास की ऐसी दूर्दशा से व्हिजन व्टेन्टी व्टेन्डीएक सपना ही रह जाने की संभावना अधिक दिख रही है।

 गांव में  समाजसेवी युवक और युवती आए थें। उन्होने अनेक आवेदन पत्रों पर जगह-जगह दस्तख़त लेकर पारिवारिक स्थिति में सुधार के प्रयासों का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में पता चला कि लडका और लडकी ने शादी की और वे मजे से अपनी जिंदगी बीता रहे हैं। यह आज के युवा समाज सेविओं की वास्तविकता और एन.जी.ओ का अल्पजीवी सत्य। समाजसेवा के ठेके अब अमीरों के बच्चों और उनकी पत्नियों का शौक होते जा रहे हैं। अपमानित जीवन जीता मोहनदास युगीन सत्य को समझ गया था। इसीलिए वह कहता है-‘‘वे कूकुर को बैल, सुअर को शेर, खाइ्र्र को पहाड, चोर को साहु- किसी को भी कुछ बना सकते हैं।’’4 वे सत्ता के संचालक जिन्होनें अर्थतंत्र के साथ हाथ मिलाकर खूद को मजबूत किया है। इसीलिए सामान्य व्यक्ति ने माना है कि सत्ता और ताकत सामान्य जन के लिए सीधा रास्ता नहीं है। लोकतांत्रिक भारत में यह विचार पनपना यह सिद्ध करता है कि पूंजीवाद को मिलता प्रश्रय भारत की छबि को किस हद तक धूमिल कर रहा है। उदय प्रकाश मानते है कि मोहन दासमात्र कथा विन्यास नहीं बल्कि एक असल जिंदगी का ब्यौराहै।

 कोलियरी में मोहन दास का नाम धारण करके बछिया टोला का बिसनाथ ज्यूनियर डेपो सुपरवाइजर  की नौकरी कर रहा है। वह गुस्सा होता है। कोलियरी के अफ़सर उसकी एक न चलने देते। दो नंबर के धंधे में सांठ-गांठ गहरी और पक्की होती है। नतीजन उसे कोलियरी में पिटा जाता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकाश अफ्रिका में गांधी को स्टेट कोचवान ने पिटा था, लेकिन फिर भी दोनों के पिटे जाने में अंतर यहीं है कि मोहनदास आजाद और अपने देश में पिटा जा रहा है, जिसकी व्यवस्था विश्व की श्रेष्ठ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक है, ऐसा माना जाता है। जब जगतगुरु के मठों में व्यभिचार चरम पर, और व्हाईट हाऊस की काली करतुतें सत्ता की निरंकुशता को बयान कर रही थी तब एक साधारण व्यक्ति के साथ यह सब होना एक सामान्य वारदात ही है, क्योंकि मूल्यों के टूटने पर अवमूल्य का राक्षस रक्तबीज बन जाता है, फिर मनुष्यता किस दुहाई पर टिके।  कृष्णदत्त पालीवाल लिखते है, ‘‘नया बाजारवाद बुद्धि और अर्थ के मेल से निर्मित नया ब्राम्हणवाद नहीं है तो क्या है?’’5 एैसी दशा में दिल्ली से 1050 कि. मी. दूर मोहनदास पिटा जा रहा था। प्रतीकात्मक रुप से पिटने की घटना नैाकरशाह और जगतगुरु, व्हाईट हाऊस को एक रेखा में बिठा देती है। सर्वहारा का दुःख सीमाओं से परे है। पूंजीतंत्र का सर्वव्यापीकरण और क्या हो सकता है। पीड़ा मोहन दास की नहीं मोहनदास जैसों की है, ज्यों देष विदेश सभी जगह फैला है। जिन्हे धर्म, सत्ता और तंत्र के पैरवीकार रज़ाकार कुचल रहे हैं।

यह घटना तभी हो रही है जब अमरिका और यूरोप राष्ट्र अपने पक्ष में न आनेवालों को फासिस्ट, साम्प्रदायिक, आंतकवादी करार देकर, तैल, गैस, बाज़ार के लिए अन्य देशों पर सैन्य कार्यवाही कर रहे थे। ठीक उसी प्रकार ताकत और सत्ता मिलकर मोहन दास से उसकी पहचान और योग्यता को एक सुर में नकार के साथ चूरा भी रहे हैं। यह समकालीन प्रसंग जों वर्तमान परिप्रक्ष्य में रखें है, वे कथन में व्यवधान न होकर प्रांसगिकता एवं घटनाओं की असलियत को प्रमाणित करते हैं। वही रचना प्रक्रिया, रचना-कर्म की उद्देश्यता भी झलक उठती है। मोहनदास बार-बार कोलियरी के चक्कर लगाता है, लेकिन उसके हाथ कुछ भी नहीं लगता। मुक्कमल सत्ताधिषों द्वारा प्रताडित मोहनदास लोकतांत्रिक व्यवस्था की असफलता को यों बयान करता है-‘‘लेकिन कैसी विडंबना थी कि मोहन दास को बिसनाथ के फ्लैट का पता पूछने के लिए अपना ही नाम लेना पड रहा था।’’6 नगर का नाम लेनिन नगर है। मोहन दास जैसा ही एक फटीचर व्यक्ति जिनका नाम सुर्यकांत त्रिपाठी है। वह मोहन दास को गढाकोला निवासी सुर्यकांत त्रिपाठी के घर का पता पूछ रहे हैं। अर्थात मोहनदास इस पूंजीवादी उदारीवादी लोकतंत्र का पहला शिकार नहीं बल्कि इसके पहले त्रिपाठी का नंबर लग चूका है। मोहनदास असंमजस में  उलझा है। सुर्यकांत त्रिपाठी जिनकी साहित्यिक साधना पराकाष्ठा की रही, जिंदगी भर एक घर कमा नहीं सके। यह दृश्य प्रतीकात्मक रुप से स्पष्ट करता है कि प्रतिभा संपन्न व्यक्ति भारत में ठीक इसी प्रकार अपने मूल अस्तित्व की खोज में निकला है। शायद उदय प्रकाशजी भी इस बहाने खूद को खोजने में लगे हैं।

विश्व में बीसवीं सदी के आंरभ में आजादी के लिए हुई क्रांतियां और उससे निर्मित स्वतंत्रता को  इक्कीसवीं सदी में राजनेता तथा अर्थ-आकाओं ने उन आंदोलनों की प्रांसगिकता की हवा निकाल दी। प्रजा के दमन के लिए एक सर्वदलीय सहमति बनती जा रही है। परिणाम: दमन, शोषण, उत्पीडन और बहिष्कार का जीवन जों उत्तर औद्योगिक लोकतंत्र की उपज है और वर्तमान यथार्थ भी है। मोहन दास उसी चक्र में फसा था। पैसा, ताकत और सत्ता के तालमेल ने ऐसा घालमेल बिठाया है कि मोहन दास असमय बुढ़ा हो गया था-‘‘उसकी भवों और हाथ-छाती के रोये सफ़ेद होत जाते तीस-पैंतीस की उम्र में वह पचास-पचपन का दिखता था।’’7  युवा बुढ़ा भारत ऐसा ही कहना चाहते हैं, उदय प्रकाश। बेरोजगार दलित भारत बुढ़िया गया है। उन्ही दिनों मोहन दास के घर देवदास और शारदा दो जीव जन्म लेते हैं।

जों व्यक्ति मोहनदास को मदद करना चाहते थे उनके हालत भी खस्ता है। यहां उल्लेख करना जरूरी है। बलबहरा का बिसेसर जिसने ग्रामीण बैंक से कर्जा लेकर सोयाबीन की खेती की थी, दो महिने पहले अपनी खेती की निलामी से बचने के लिए बिजली के खंभे पर चढकर नंगी तार से चिपक कर मर गया। उदय प्रकाश किसान दुर्दषा एंव आत्महत्या के प्रश्न  को भी छू जाते है|एक ओर मोहनदास के घर खाने के लाले हैं , वहीं दूसरी और कस्तुरी बल्द अमिता ;नकली पत्नी) शौक समझ सोशल सर्विस का ढोंग रच रही है। रचनाकार छोटी छोटी घटनाओं के माध्यम से ढकोसलों को प्रस्तुत करते हैं।

साढू गोपालदास की मदद से कोलियरी के अफसर एन. के. सिंह से मोहन दास मिलकर, किस प्रकार बिसनाथ मोहन दास बना है आदि ब्यौरे के साथ अब तक हुई हर घटना को बयान करते हैं  । इंक्वायरी अफसर श्रीवास्तव बिसनाथ बल्द मोहनदास के घर पूछताछ के लिए आते हैं। अमिता जिसने लो कट ब्लाउज पहना है और श्रीवास्तव की नजर उसकी नाभी में  अटकी है। काबादास बल्द नागेन्द्रनाथ हाथ में तुलसी माला फेरते हुए अपने आप को काबा होने को प्रमाणित कर रहे हैं  । खान पान और अमिता की नाभी इतना कमाल कर जाती है कि बिसनाथ ही मोहन दास करार दिया जाता है। धर्म की मालाएं आजकल अधर्मियों को बहुत सुहा रही है। वर्तमान धार्मिक अनैतिकता और इंक्वायरी अफसर इंक्वायरी कम और कस्तुरी बल्द अमिता की ओर अधिक आकर्षित है। स्त्री का देह एक करंसी की तरह प्रयुक्त होता दिखाया है यहां पर, यह है जाँच पड़ताल व्यवस्था का ढोंग। इसीलिए यह प्रश्न मोहनदास को घेर रहा है,‘‘क्या लेनिन नगर मं  कोई असली आदमी, अपने नाम, बल्दियत, पते ठिकाने का बचा भी है’’8 प्रश्न या संशय की यह तर्ज व्यवस्था और प्रकारांतर से लोकतंत्र और लोकतंत्र के माध्यम से राजनीतिकों द्वारा निर्मित व्यवस्था के प्रति संशय की अभिव्यक्ति है। वहीं उत्तर औद्योगिक समाज में सेंध करता पूंजीवाद आखिर कौन सी शक्ल ले रहा है, उसे भी बयान कर संभावित खतरें को भी प्रस्तुत करता है।

पंजाब सेवा संघ द्वारा हजारो अफसरों को करोड़ों की घुस लेकर लगवाने, पुलिस अफ़सर और मंत्रियों के अवैध संबंध, सरकारी कमेटियां और उनकी जांच पड़ताल और दिल्ली में एक दर्जी का परिवार सहित आत्महत्या में असफल होने पर 302 के तहत जेल में बंद होना आदि घटनाएं कोलियरी के अफसर श्रीवास्तव की जांच के सामने रखकर रचनाकार हमारी व्यवस्था टूटन के चीरहरण को रचते हैं। वहीं सार्वजनिक क्षेत्र में विस्तार लेते भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र पर लगाए प्रश्न को चिह्नित करते है। ठर्रें में धूत मोहन दास गाते हुए कहता है, ‘‘काया माया दोऊ नाच नचाबैं, माया की सगरी नगरिया’’9 घटित घटनाओं के साथ कथात्मक विन्यास मोहन दास के प्रति पाठक को चेतस कर देता है। मुहए का ठर्रा जिस प्रकार मोहन दास के दिमाग को घेर रहा है। जिसमें वह अपने पिता का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाता। उसी प्रकार व्यवस्था की विद्रुपता का नशा आम आदमी पर यों चढ़ा है कि वह मोहनदास की तरह पगला रहा है। वह अपनी सुधी खो बैठा है। बसंहर पलिया जाति में एकमात्र बी. ए. पास उम्मीदवार उसी के नाम पर कोई जिंदगी के सारे ऐशोआराम भोग रहा है। वहीं मोहनदास के जीवन का भोग कभी भी खत्म न होने वाला है। मोहन दास की उस दशा पर उदय प्रकाष खुद कहते हैं, ‘‘मोहनदास किसी बडे़ सभ्यतामूलक आपदा में फंसे संकटग्रस्त मनुष्य की कहानी है। जिस पर एक साथ पूंजी, तकनीक, संस्कृति और राजनीति का वर्चस्वशाली सत्ता का आक्रमण हुआ है।’’10 मोहनदास के कठिन जीवन के वास्तव में, भारत और विश्व आंकडों के माध्यम से विकास दरों को निश्चित कर रहा था। उस समय निम्न घटनाएं हो रही थी- वितमंत्री आर्थिक विकास दर के आधार पर भारत को अमरिका बनाने की घोषणा, बामियान के पहाड़ में बुद्ध मुर्ति गिरायी जा रही थी, दिल्ली में मेट्रों रेल योजना, तीन हजार बांध परियोजनाओं हेतु दलित एवं आदिवासियों की भूमि छिनी जा रही थी, फिर भी बीस करोड़ लोगों के पास पीने के लिए पानी नहीं था। वामपंथी दल अपना चेहरा बदल रहे थें। तेलगी घोटाला, राजस्थान ;गंगानगर और टोंक) में किसानों पर गोलिया चलायी गयी। पोखरण अणुस्फोट आदि घटनाएं मोहन दास के पगलाने, काबादास के मरने, बलबहर के किसान की आत्महत्या की घटनाओं के साथ जोड़कर प्रसंगों को संवेदनशील बनाया। सरकारी योजनाओं में बसा शायनिंग इडियामोहन दास के सच को कैसे दबा सकता है? प्रगति के विद्रुप रूप मनुष्यता को कमजोर कर, धनिकों को धनवान बनाने जाल बिछा रही है।

मोहन दास प्रतीक है बेरोजगार दलित भारत का। अतः वह स्टार कम्प्युटर पर रोजगार में जुटता है। वहां हर्षवर्धन उसके काम से प्रसन्न होता है। उसी बीच मोहन दास अपना ब्यौरा देता है। हर्षवर्धन वकील है। वह उसका केस लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। समाचार पत्रों में सुर्खिया बनी है असली मोहन दास कौन है?’ लेकिन इलैक्ट्रानिक मीडिया मोहन दास से संदर्भित बाईट को टालत है क्योंकि उनके मतानुसार यह मुद्दा ना राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रिय है। मीडिया नीति एवं खोखलेंपन को भी प्रस्तुत करने में  रचनाकार यहां चुके नहीं है। मोहन दास के माध्यम से रचनाकर बेरोजगारी के कारणों के बारे में लिखते हैं  ,‘‘नौकरियां इसलिए नहीं मिलती थीं क्योंकि उसके पास कोई सिफारिश, संपर्क, तिकड़म और घूस के लिए रुपये नहीं थे। वह किसी गिरोह या माफिया सदस्य नहीं था, क्योंकि वह उस जाति और वर्ग का नहीं था, जिन जातियों-वर्गों के पास ताकत थी।’’11 अवैध, गैर कानूनी, गलत, भ्रष्ट सब भारत का अभिन्न अंग बनता जा रहा है। इसीलिए साहित्यकार का मन हमेशा उन बातों के कारण घबरा रहा है कि, ‘‘एक के बाद दूसरी सरकारों की वह आर्थिक नीति, जो देश के गांवों और पिछड़े इलाकों को कंगाल बनाकर वहां असंख्य इथियोपिया, रंवाडा और घाना पैदा कर रही थीं।’’12 यह रचनाकार की रचनात्मक चिंता है।  भारत भूख के कारण हाथ में हथियार उठाकर अशांति से त्रस्त हो, यह हमारे लिए घातक है। विश्व में भारत और भारत में एक दुनिया न बसे, यह चाह रखना एक सृजक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

कोर्ट में मामला चला। जज ने कलेक्टर को जांच के आदेश दे दिए। लेकिन सरकारी व्यवस्था जिसको अग्रेजों को देख हमने स्वीकारा है, कैसे मोहनदास को न्याय दिलाने में सक्षम हो सकती है क्योंकि- ‘‘अतः पटवारी ही कलेक्टर की आंख नाक कान बन जाता है।’’13 व्यवस्था को चलानेवाले तथाकथित लोग सभी को मैनेजकरके मोहन दास बल्द बिसनाथ को असली मोहन दास ठहराती है। व्यवस्था के कान आँख, नाक, खराब हो गए है। जिसको प्रमाण मान कोर्ट बिसनाथ बल्द मोहनदास की विजयी घोषित करती है। विजय पूंजीतंत्र की हुई और पराजित लोकतंत्र हुआ। मोहनदास का कोर्ट मामला उस समय की घटना है जब दिखाउपन अपने चरम पर था। मंडल आयोग की सिफारशों को लागू  करनवाले वी. पी. सिंह दिल्ली से बेदखल और कैंसर ग्रस्त थे। प्रताडितों का पक्षधर हाशिए का मेहमान बना था। एक और घटना जब तिवारी चोरी छिपे कस्तुरी को हवस की नजरों से घुर रहा था और कस्तुरी हंसियां लेकर उसके पीछे लगी थी। तभी कम्युनिस्ट पोलित ब्युरों की प्रमुख एक महिला, एक महिला द्वारा प्रधानमंत्री पद का त्याग, बगदाद के जेल में अमरिकन महिला पुलिस अधिकारी ने इराकी कैदियों को मारकर उनका पिरॅमिड बनाया था। इम्फाल की मनोरमा के उत्पीडन के विरोध में औरतों ने नंगा प्रदर्शन किया था। इन घटनाओं का उल्लेख लेखकिय अध्ययन एवं रचनागत प्रयोजनता को गोचर कराता है। कस्तुरी का हंसिया ले तिवारी के पीछे लगना, देश में चेतनामय बनती देहाती दलित महिला की जागृति का परिचायक था। वहीं झूठा मोहन दास सच साबित होना, मंडल आयोग की सिफारिसों पर तथाकथितों द्वारा मोर्चा बंदी करना एक ही तो है।

हार के बाद हर्षवर्धन और मोहन दास टूट जाते हैं, फिर भी हर्षवर्धन  हिंमत से जज गजानन माधव मुक्तिबोध के पास चले जाते हैं। मुक्तिबोध अपने अधिकार में आनेवाली सीक्रेट जुडीशियल इंक्वायरीकराकर न्याय देने का आश्वासन देते हैं। वे उस प्रसंग में व्यवस्था के बारे में कहते है- ‘‘दि होल सिस्टम हैंज टोटली कोलैप्सड्......!जस्ट लाइक ट्विन टाॅवर इन न्युयार्क....... नाइन एलेवन......!’’14  व्यवस्था चरमरा रही है। उसका लाभ धनी लोग उठा रहे हैं। प्रशासन को हाथों बांध ताकत और सत्तावालें मन चाहा काम निकाल रहे हैं। अभिताभ राय लिखते है-‘‘बिसनाथ जैसे लोगों के पास विजय तिवारी जैसा पुलिसिया मित्र है, उत्कृष्ठ वकिल है, भ्रष्ट अफसरशाही है, जिसमें  उपर से लेकर पंचायत स्तर तक के छोटे लोग शामिल है’’15 लेकिन गुप्त स्वतंत्र न्यायिक जांच सारे पोल खोल देती है और बिसनाथ अमिता नगेंद्रनाथ को धोकाधड़ी में जेल हो जाती है। इधर राजनीतिक तिकड़म काम कर जाता है। मुक्तिबोध का तबादला पिछड़े एवं आदिम इलाके में कराया जाता है। जिससे मोहन दास की एकमात्र आशा की डोर टूट जाती है। आजादी की दूसरी लडाई मुक्तिबोध को बीच में छोड़नी पडती है। वहीं मोहन दास पुनः चक्र में फंस जाता है। जैसे हमारा अपना देश। मुक्तिबोध का तबादला हमारी व्यवस्थागत बिखरने को दर्ज करने के लिए काफी है।

बिसनाथ गुंडापन और अमिता चिट फंड के कामों में लगी है। बिसनाथ आज भी मोहन दास नाम धारण किए चल रहा है। मारपीट वह करता और पुलिस मोहन दास को गिरफ्तार करने पुरबनरा चली जाती। आये दिन की मारपीट से मोहनदास की जीने की इच्छा खत्म हो रही है। बिसनाथ जिला जनपद के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहा है और चुने जाने की संभावनाएं भी है। मोहन दास टूट रहा है। वह समझ नहीं पा रहा है कि दूसरों की पहचान, अधिकार योग्यता और क्षमताको कैसे चुराया जा सकता है। लंगडाता मोहनदास जब उदय जी से मिलता है, तब वह कहता है ‘‘मैं आप लोगों के हाथ जोडता हूं। मुझे किसी तरह बचा लीजिए। मैं किसी भी अदालत में चलकर हलफ़नामा देने के लिए तैयार हूं कि मैं मोहन दास नहीं हूं। मेरे बाप का नाम काबा दास नहीं है। और वह मरा नहीं है, अभी जिंदी है।’’16 यह आप बीती संकट ग्रस्त मनुष्य की खो रही पहचान की अभिव्यक्ति है। जिसमें मात्र मोहन दास नहीं हर सामान्य जन है, जों नव्य साम्राज्यवादी बाज़ारवाद में फंसकर जीवन के सारे आधार, हक और अस्तित्व को खो रहा है। इतना ही नहीं उनका कोई भी पगचिह्न इतिहास में दिखायी नहीं देता। पूंजी तथा सत्ता के दबाव में अर्थहीन वर्ग का इतिहास, पहचान और भविष्य धुंधला तथा मिटता दिख रहा है। बल्कि प्राचीन काल से यहीं होता आ रहा है। इसका कारण है-‘‘क्योंकि इतिहासकार का पेशा ही है अपने समय की सत्ता के दामन के दाग धब्बों को छिपाना’’17 इस वस्तु सत्य को बताकर उदय प्रकाश इतिहास, व्यवस्था दोनों के पूनर्मल्याकंन की हामी भरते नजर आ रहे हैं। मात्र दलितों के अन्याय की अभिव्यक्ति न होकर पूंजी, सत्ता, ताकत ने जिन -जिनको परोसा है, उनके लिए एक नई व्यवस्था की आवश्यकता की वकालत या गुहार है मोहन दास। जिसमें कलाकार या सृजक की भूमिका को रचनाकार महत्वपूर्ण मानते हैं। हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकारों का नामोंल्लेख यहीं प्रयोजन है। मुक्तिबोध को जज बनाने के कारणों पर प्रकाश डालते हुए लेखक कहते हैं-‘‘इज़रायल के प्रख्यात लेखक डेविड ग्राासमेन; जो इजरायल में रहने के बावजूद वहा की सत्ता की युद्धनीतियों और हिंसा के विरोधी है और इसके नतीजे में अपने जीवन को जोखिम में डाला है ने अपने उपन्यास सी अंडर लवमें न्यायाधिकारी पौलैंड की पोलिश भाषा के महान रचनाकार ब्रोनो शुल्त्ज को बनाया है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे मैनें मोहन दास में न्यायाधीश मुक्तिबोध को बनाया है।’’18 इस प्रकार एस. एस. पी. शमशेर बहादूर सिंह, प्रोसिक्युटर हरीशंकर परसाई, सुर्यकांत त्रिपाठी आदि नाम प्रांसगिकता के साथ-साथ गति बनाए रखने में महत्वपूर्ण है। साथ इन रचनाकारों के सामाजिक दायित्व को नवाजा भी गया है। अनघड़ स्थितियों से किया संघर्ष ही जिनकी पहचान रही, वहीं सृजक रचना में अपनी आवाजाही करते हैं।

मन में एक प्रश्न उठता जरुर है कि मोहनदास विद्रोही क्यों नहीं होता। वह हार क्यों मान रहा है। मोहनदास की जीत दिखायी जाती तो इन अनगिनत हार रहे मोहन दास का क्या किया जाए। और दूसरा तथ्य यह है कि वह मुक्तिबोध पर आस्था रखता था, जिनकी मान्यता थी कि न्याय की आकांक्षा कालातीत हैअतः मोहन दास किसी मुक्तिबोध के आने के इंतजार में है।

मोहनदास के साथ ऐसा क्यों हो रहा है। ‘‘क्या मोहनदास गरीब और नीची जाति का था इसलिए? या इसलिए कि वह बेरोजगार था और अपनी मेहनत से चुपचाप अपने परिवार की आजीविका चला रहा था। या फिर इसलिए कि इन लोगों ने उसे ठगा था, उसका हक मार लिया था’’19 क्या व्यवस्था मोहन दास को गुंगा करना चाहती है ,बतौर भाषण की आजादी होने पर भी। सरकार में बैठे तिकड़मबाजों ने पैसे और सत्ता के माध्यम से खेला खेल इसी प्रकार मोहनदास को नकारेगा, फिर मोहन दास को कितनी बार अपने ही बारे में मन में संशय पैदा करके कहना पडेगा-‘‘ ए! बीरन, ए परमोदी...... मै को आहों। सही सही बता! मोर ल चूतिया न बना। तोंहर ल मलइहा ल किरिया!’’20 प्रजातंत्र या संविधान की दुहाई देना मात्र उस प्रश्न  का उत्तर नहीं है। मोहभंग से आगे चलकर व्यवस्था एंव सत्ता संचालकों की स्वार्थों को मोहनदास हदों को पार करके सौ प्रतिशत सच्चाई उकेरने का प्रयास करता है।

इतना ही नहीं स्वंय लेखक उन सचाइयों से गुजरे हैं । मोहन दास पर फिल्म बनी थी जो आसियान फिल्म महोत्सव में दिखायी गयी, लेकिन यह घटना खुद मोहन दास के लेखक उदय प्रकाश जी को मालुम नहीं थी। वे अपनी पोस्ट में लिखते हैं- ‘‘पता चला जनसत्तामें कुंवर नारायण जी ने भी लिखा कि जब ओसियान में मोहन दासदिखाई जा रही थी तो उदय प्रकाश कहां थे? कहीं उनके साथ फिल्म बनाने वालों ने वही तो नहीं किया। जो इस फिल्म मोहन दासके साथ किया गया।’’21 स्पष्ट है लेखक ने जो जिया और देखा वहीं प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया। हम इन्हे नकार भी नहीं सकते या इसे एक फैंटसी अथवा मात्र कथात्मक विन्यास कह टाल नहीं सकते। 

डॉ. प्रकाश कृष्णा कोपार्डे
हिंदी विभागप्रमुख,
वैद्यनाथ कॉलेज परली वै. ;महाराष्ट्र
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अतः मोहन दास में आए डॉ. वाकणकर, मुक्तिबोध के तबादले, गांव की सारी योजनाएं आने पर पहले नेताओं में बांटी जाना, कोलियरी में पिटा जाना, प्रमाणपत्रों एवं कागजादों में जालसाजी करना, नेत्र चिकित्सा में पुतली की आंखे जाना, टि. बी. की गोलिया काबादास को न मिलना, जांच में श्रीवास्तव का जांच छोड़ मन अमिता की नाभी और खाने पीने में मस्त रहना, बिसनाथ का कलेक्टर से पटवारी तक मोहनदास मैं ही हूंके लिए घूस देना, आदि प्रमुख घटनाओं के साथ राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय समकालीन संदर्भ मोहनदास को कालजयी बनाने की ओर ले जा रहे हैं। अस्तित्व की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति जब सृजन में समकालिनता को दर्शाती है, तब सत्य जल्द जगह पकड़ता है, यहीं मोहन दास में है। जिसके कारण दलित मोहन दास प्रतीकात्मक रुप से दलित भारत का प्रस्तुतीकरण बन जाता है, जों अमरीका और योरोपीय राष्ट्रों द्वारा शोषित है। इस का कारण हमारी व्यवस्था है। गुलाम भारत में अंग्रेजी शासन से मिली नौकरशाही के लोह ढांचे नेने भारत के विकास में रोड़े डाले हैं। इसका मात्र एक उदाहरण दिया जा सकता है कि बंसहर पलिया जाति का उल्लेख मंडल आयोग लागू होने पर भी सरकारी गजेट में नहीं है। अतः परिवर्तन करना है तों ताकत, पैसा और सत्ता के केंद्र को तोड़ना होगा। यह तथ्य मोहन दासप्रस्तुत करता है।      
 
संदर्भ 
1              समीक्षा अप्रैल जून 2011 क्रं 12
2              समीक्षा अप्रैल जून 2011 क्रं 12
3              मोहनदास पृष्ठ क्रं 35
4              वहीं पृष्ठ क्रं 31
5              उत्तर आधुनिकतावाद और दलित साहित्य -कृष्णदत्त पालीवाल पृष्ठ क्रं 168
6              मोहनदास पृष्ठ क्रं38
7              वहीं पृष्ठ क्रं33
8              वहीं पृष्ठ क्रं 53
9              वहीं पृष्ठ क्रं 54
10           समीक्षा पृष्ठ क्रं 12
11           मोहनदास पृष्ठ क्रं 62
12           वहीं पृष्ठ क्रं 65
13           वहीं पृष्ठ कं्र.70
14           वहीं पृष्ठ क्रं 76
15           समीक्षा अप्रैल जून 2011 समीक्षा की कलम से - अभिताभ राय पृष्ठ 14
16           16मोहनदास पृष्ठ क्रं 85
17           17वहीं पृष्ठ क्रं 82
18           समीक्षा अप्रैल जून 2011 उदय प्रकाश से दिनेश कुमार की बातचीत -पृष्ठ क्रं 12
19           मोहनदास पृष्ठ क्रं 41
20           वहीं पृष्ठ क्रं 56


अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)         वर्ष-4,अंक-26 (अक्टूबर 2017-मार्च,2018)          चित्रांकन: दिलीप डामोर 

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