शोध आलेख : समकालीन कविता और हिंदी मीडिया / डॉ. शिराजोद्दीन

समकालीन कविता और हिंदी मीडिया

- डॉ. शिराजोद्दीन


शोध सार : लोकतंत्र में मीडिया की मुख्य भूमिका रही है। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा भी माना जाता है। इस चौथे खंभे का मुख्य कर्त्तव्य है विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका पर पैनी निगाह रखना। मीडिया का एक और मुख्य कर्त्तव्य यह भी है कि जनता की आवाज़ सत्ता तक पहुंचाने के साथ-साथ सरकार की निष्पक्षता से आलोचना करना तथा उनकी कमियों को दिखाना । दरअसल मीडिया हमेशा विपक्ष की भूमिका निभाता है। लेकिन इस बात को कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सत्ता चाहे जिसकी भी रही हो, उसने हमेशा मीडिया पर वर्चस्व कायम करने का प्रयास किया है। समकालीन समय में भी हिंदी मीडिया अपने सिद्धांतों से समझौता कर चुका है। दरअसल मीडिया पर पूंजीवादी व्यवस्था, कॉर्पोरेट तथा सत्ता का दबाव है। इसलिए अब यह जनता की आवाज़ नहीं बल्कि सत्ता की आवाज़ बना बैठा है। वर्तमान समय में मीडिया चैनल्स के डिबेट से मुख्य और महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे- गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई, डूबती हुई आर्थिक व्यवस्था, दलितों, किसानों, मजदूरों, आदिवासियों की समस्या, स्त्रियों की सुरक्षा, अल्पसंख्यकों के मुद्दे, थर्ड जेंडर के सवाल, कश्मीर के हालात, पूर्वोत्तर राज्यों की समस्याएं आदि गंभीर चर्चाएं गायब हैं। इसी कड़ी में मीडिया के चरित्र चित्रण और विविध रूपों का जिक्र समकालीन हिंदी कविताओं में किया गया है।

 

बीज शब्द : समकालीन समय, हिंदी मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया की भूमिका, विज्ञापन, समकालीन कविता, ‘ऑपरेशन 136’ आदि।

 

शोध प्रविधि : शोध की विश्लेषणात्मक पद्धति के साथ-साथ आलोचनात्मक, सामाजिक पद्धतियों आदि का भी उपयोग किया गया है

 

मूल आलेख : जब भी मीडिया का नाम ज़ेहन में आता है तो इसका अर्थ सही सूचनाओं को प्रसारित करने से लिया जाता है। यह एक ऐसा माध्यम है, जिसका उद्देश्य समाज को तथ्यों के आधार पर समग्र विषयों, घटनाओं तथा मुद्दों की जानकारी देना है। लोकतंत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा भी माना जाता है। इस चौथे खंभे का मुख्य कर्त्तव्य है विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका परपैनी निगाह रखना। मीडिया का एक और मुख्य कर्त्तव्य यह भी है कि जनता की आवाज़ सत्ता तक पहुंचाने के साथ-साथ सरकार की निष्पक्षता से आलोचना करना तथा उसकी कमियों को दिखाना। सरकार की खूबियों को दिखाने के लिए उसका अपना सूचना मंत्रालय होता है। यह मीडिया की जिम्मेदारी नहीं होती। लोकतंत्र में मीडिया हमेशा विपक्ष की भूमिका निभाता है। लेकिन इस बात को कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सत्ता चाहे जिसकी भी रही हो, उसने हमेशा मीडिया पर वर्चस्व कायम करने का प्रयास किया है। समकालीन समय में भी हिंदी मीडिया अपने सिद्धांतों से समझौता कर चुका है। दरअसल मीडिया पर पूंजीवादी व्यवस्था, कॉर्पोरेट तथा सत्ता का दबाव है। इसीलिए आज का मीडिया सत्ता के चौखट पर चरमरा रहा है। इस पर पूरी तरह से राजनीति तथा सत्ताधारियों का नियंत्रण बना हुआ है। इसलिए अब यह जनता की आवाज़ नहीं बल्कि सत्ता की आवाज़ बना बैठा है। वर्तमान समय में मीडिया चैनल्स के डिबेट से मुख्य और महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे- गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई, डूबती हुई आर्थिक व्यवस्था, दलितों, किसानों, मजदूरों, आदिवासियों की समस्या, स्त्रियों की सुरक्षा, अल्पसंख्यकों के मुद्दे, थर्ड जेंडर के सवाल, कश्मीर के हालात, पूर्वोत्तर राज्यों की समस्याएं आदि गंभीर चर्चाएं गायब हैं। इन तमाम चर्चाओं के बदले सरकार का महिमा मंडन, चुनाव रैलियों और भाषणों का कवरेज किया जाने लगा है। वर्तमान समय का मीडिया सत्ता की कठपुतली बन चुका है। इसीलिए उनकी राजनीतिक गतिविधियों के लिए हिन्दू-मुस्लिम डिबेट तथा साम्प्रदायिक स्थिति बनाए रखने के लिए समर्पित है। केंद्र या राज्य में सरकार चाहे जिसकी भी हो, लेकिन मीडिया को ‘मैनेज’ किये जाने की बात को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। जो व्यक्ति निष्पक्षता से अपनी पत्रकारिता करते हैं या सरकार की आलोचना करते हैं, उन पर दबाव बनाया जाना या फिर चैनल्स से निकाल दिया जाना आम बात बन चुकी है। इस मामले में कई सारे उदाहरण मौजूद हैं। यहाँ तक की पत्रकारों की हत्या भी की गई है। ऐसी गतिविधियों से लोकतंत्र कमज़ोर होने की दिशा में बढ़ रहा है। एनडीटीवी हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार अपनी पुस्तक ‘बोलना ही है’ में लिखते हैं- “न्यूज़ चैनलों ने भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करने में जो मेहनत की है, उसी का नतीजा है कि अब भारत के लोग उन चैनलों को बगैर किसी सवाल के देखते हैं जिनके यहाँ सरकार से सवाल नहीं होता।”[1]

 

आज का मीडिया कितना आज़ाद है? ये सवाल महत्वपूर्ण और चिंताजनक है। इस सन्दर्भ में क्रांतिकारी शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के विचार आज भी प्रासंगिक लगते हैं। उन्होंने कहा था- “पत्रकारिता का व्यवसाय जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज बहुत ही गन्दा हो गया है। ये लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्परसिर-फुटौव्वल करवाते हैं।”[2] लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका को यदि देखा जाए तो उसे समाज में जनता के बीच साम्प्रदायिक व संकीर्ण भावनाओं को मिटा कर समन्वय के भाव को जगाना और एक बेहतर माहौल पैदा करना होता है। लेकिन आज पत्रकारिता या पत्रकार इन चीज़ों में विफल नज़र आ रहे हैं। ‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ आलेख में भगतसिंह लिखते हैं- “अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था; लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारत वर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं।”[3]

 

वर्तमान समय में अधिकतर मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका लाचार स्थिति में है। जो कुछ भी थोड़ी-बहुत सूचनाएं बची हैं, वे मुख्यधारा के मीडिया में नहीं बल्कि वैकल्पिक (अल्टरनेटिव) मीडिया में हैं। एक तरफ सत्ता का दबाव और दूसरी तरफ टी.आर.पी. की होड़ में मुख्यधारा का मीडिया जूझ रहा है। दरअसल पूँजी कमाना ही इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का मुख्य उद्देश्य बन गया है। वर्ष 2009 लोकसभा चुनाव और वर्ष 2010 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद पेडन्यूज़की चर्चा सामने आई थी, जिसमें स्थानीय पत्रकार से लेकर मुख्यधारा के कई मीडिया चैनल्स भारी रकम लेकर अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों की प्रचार-सामग्री को समाचार के रूप में प्रकाशित किया करते थे। हालांकि इस बात का पता चलने पर प्रेस काउंसिल, एडिटर्सगिल्ड और पत्रकार यूनियनों ने काफी निंदा भी की थी।

 

वर्तमान समय में मीडिया के चेहरे पर से नकाब हटाने का काम ‘कोबरा पोस्ट’ का ‘ऑपरेशन 136’ ने किया है। इस स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से मीडिया जगत के उस स्याह पक्ष का पर्दा फाश हुआ  है, जहां कहा जाता है कि पैसों के लिए देश का मीडिया अपनी आवाज और कलम का भी सौदाकर सकता है। इस ऑपरेशन में देश के कई नामचीन मीडिया संस्थान सत्ताधारी दल के लिए चुनावी हवा तैयार करने के लिए राजी होते नजर आए हैं। “कोबरापोस्टने ऑपरेशन 136’ का पहला भाग जारी किया है जिसमें कुल 16  मीडिया संस्थानों के नाम सामने आए हैं। जिन में अमर उजाला, पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, इंडिया टीवी, सब नेटवर्क, डीएनए (डेली न्यूज एंड एनालिसिस) और यूएनआई जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इनके अलावा स्कूपव्हूप, रेडिफ डॉटकॉम, 9 एक्सटशन, समाचार प्लस, एचएनएन, लाइव24×7, स्वतंत्र भारत, इंडियावॉच, हिंदी डेली, साधना प्राइम न्यूज को भी सौदेबाजी में लिप्त पाया गया है।  इन सभी मीडिया संस्थानों से जुड़े बड़े पदों पर काबिज लोगों की बातचीत के अंश खुफिया ऑपरेशन में दिखाए गए हैं।”[4] ‘पेड़ न्यूज़’ की कड़ी में ‘फेक न्यूज़’ भी साथ-साथ काम करता है। सूचनाओं को तोड़-मरोड़ कर समाज में झूठ फैलाया जा रहा है। दुनिया भर की फेक न्यूज़ लोकतंत्र का गला घोटने और सत्ता में बैठे तानाशाहों की मौज का माध्यम बन रही है। वर्तमान समय में गाँव देहात से लेकर राजधानी दिल्ली तक फेक न्यूज़ फैलाने के लिए आईटी सेल तथा पूरा तंत्र विकसित हो चुका है। फेक न्यूज़ के सन्दर्भ में रवीश कुमार का मानना है कि- “फेक न्यूज़ एक टूल है, जिसकी मदद से जनता को उसके वास्तविक मुद्दे से अलग कर दिया जाता है। उसे एक दूसरी रियलिटी में ले जाया जाता है, जहां वह अपनी चिंता छोड़कर गलत सूचनाओं से तैयार किसी राष्ट्रीय स्तर की चिंता के सामने बौना खड़ा, चुपचाप आत्मसमर्पण कर देता है।”[5] फेक न्यूज़ का एक उदाहरण 2016 में नोट बंदी के दौरान मुख्यधारा के मीडिया ‘ज़ी न्यूज़’ के सम्पादक सुधीर चौधरी ने अपने ‘डीएनए’शो में नए 2000 रुपए के हर एक नोट पर NGC यानी नैनो GPS चिप लगा होगा, जिसे सैटेलाइट के ज़रिये ट्रैक किया जा सकता है, जैसी अफवाह फैलाई थी। इस अफवाह के मामले में बीबीसी हिंदी लिखता है-“आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि ऐसी को ईटेक्नोलॉजी नहीं है।”[6] आज ‘आल्ट न्यूज़ वेबसाइट’ तमाम तरह के फेक न्यूज़ की जांच पड़ताल कर सही तथ्यों की जानकारी देने का सराहनीय कार्य कर रही है।

 

वर्तमान समय में प्रेस की आज़ादी पर ख़तरा मंडरा रहा है। रिपोर्टर्स विद आउट बॉर्डर्स 2018 की रिपोर्ट के अनुसार प्रेस की आजादी के मामले में 180 देशों में भारत 140 वें स्थान पर पहुँच गया है। इससे पता चलता है कि सत्ता में बैठे लोग किस तरह से मीडिया की आज़ादी को ख़त्म कर रहे हैं। इस सन्दर्भ में न्यूज़ लौंड्री.कॉम की रिपोर्ट प्रासंगिक है। “भारत में साल 2018 में कम से कम छह पत्रकारों की हत्या कर दी गयी।  पत्रकारों पर सोशल मीडिया के जरिये हमले हो रहे हैं।  देश में हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर चल रहे एजेंडे की आलोचना करने वाले पत्रकारों को भारत विरोधीकहा जा रहा है और उन पर कई तरह से हमले होते रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़, जैसे-जैसे भारत में साल 2019 के आम चुनावों की तारीख़ क़रीब आती गयी है, पत्रकारों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों के हमले बढ़ते गये हैं।  अगर सरकार की आलोचना कोई महिला पत्रकार कर रही हो, तो स्थिति और भी ज़्यादा ख़राब हो जाती है।”[7] मीडिया पर संकट हर दौर में रहा है। लेकिन अंतर केवल इतना है कि कभी इसकी स्थिति अच्छी रही तो कभी बुरी भी रही है। प्रोनॉय रॉय लिखते है- “पहले 25 साल की अवधि में, भारत का प्रिंट मीडिया स्वतंत्र था। इनमे से कुछ तो बेहद मुखर थे और हमेशा सरकार को सावधान की स्थिति में रखते थे।”[8] आज भारत के हर नागरिक तथा पत्रकार की जिम्मेदारी है कि मीडिया को बचाए रखे। भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार देता है। इसीलिए चुनौतियों का सामना करते हुए सत्ता से सवाल करने के साथ-साथ जनता की आवाज़ बनना होगा। आज सोशल मीडिया द्वारा फैलाई जाने वाली सूचनाओं से सतर्क रहने की आवश्यता है। कुछेक पत्रकार निष्पक्षता से लगातार पत्रकारिता कर रहे हैं। उन्हें आईटी सेल तथा सरकार की ओर से ट्रोल किया जाने लगा है। यही वर्तमान समय में मीडिया का यथार्थ है।

 

समकालीन हिंदी कविताओं में मीडिया के विविध रूपों का चित्रण किया गया है। लोकतंत्र में पत्रकारिता तथा पत्रकार की क्या भूमिका है? इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया समाज में सूचना एवं तथ्य परक जानकारी देने में कहाँ तक सक्षम हैं? क्या मीडिया जनता के मुद्दे उठाने में तथा सरकार से सवाल करने में अपनी भूमिका निभाता है? इन तमाम बिन्दुओं पर समकालीन कवि बेबाकी से अपने विचार रखता है। ये कविताएँ वर्तमान भारतीय परिवेश में मीडिया की जीती-जागती तस्वीर को बयाँ करने में प्रासंगिक हैं। समकालीन कवि अरुण कमल की ‘खबर’ कविता वर्तमान समय में पत्रकारिता की दयनीय स्थिति का चित्रण करती है। दयनीय स्थिति इसलिए है कि पत्रकारिता नेअपने मूल्य तथा सिद्धांतों से समझौता किया है। इसलिए अखबार की सुर्खियाँ तथा पन्ने दर पन्नों से खबरे गायब हैं। वर्तमान समय की विडम्बना यह है कि आज की पत्रकारिता केवल पूंजीवादी, बुर्जुआ समाज, राजनेता, सेलेब्रेटी आदि के कवरेज में पूरा समय बिताती है और आम जनता के जीवन से जुड़ी समस्याओं,घटनाओं तथा गतिविधियों से अनभिज्ञ रहती है। अक्सर देखा गया है कि मीडिया का कैमरा और कवरेज से गरीब, किसान, दलित, मजदूर, स्त्री, अल्पसंख्यक, थर्ड जेंडर आदि की समस्याएं गायब रहती हैं। इसीलिए कविता के पहले भाग में कवि कहता है-

“अखबारों में खबर थी: कैलिफ़ोर्निया की एक कुतिया ने तेरह बच्चे एक साथ जने।

अखबारों में खबर थी: युवराज ने कंगालों में कम्बल बांटे।

अखबारों में खबर थी: विश्वसुन्दरी का वजन 39 किलो है।

अखबारों में खबर थी: प्याज बड़ा गुणकारी होता है।

अखबारों में खबर थी: राजनेता ने दाढ़ी मुड़ायी।

एक खबर जो कहीं नहीं थीं : किश्ता गौड को फांसी हो गयी

एक खबर जो खबर नहीं थीं : भूमैया को फांसी हो गयी।”[9]

 

मीडिया के इतिहास पर नज़र डालें तो इस बात से रूबरू होते हैं कि भारत की आज़ादी एवं समाज को जागरूक करने में समाचार पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिनमें भगतसिंह का ‘प्रताप’, महात्मा गांधी का ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’, डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर का ‘मूकनायक’ आदि के साथ-साथ अनेक समाचार पत्र थे जिन्होंने समाज को नयी दिशा देने में अपना योगदान निभाया। समाचार पत्रों का उद्देश्य ही यही था कि सूचनाओं के माध्यम से आम जनता के जीवन में बदलाव लाना तथा सत्ता की जन-विरोधी नीतियों से अवगत कराना। अखबार समाज को बदलने तथा लोकतंत्र के मूल्यों को बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाता है और निभाना ही चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में बाजारवाद तथा कॉर्पोरेट जगत के विज्ञापनों से आज के अखबार भरे पड़े हैं, जिनमें जनता को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह के विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। इन तमाम चीजों से न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बचा है न प्रिंट मीडिया। बहुत ही कम ऐसी पत्रिकाएँ बची होंगी जिनमें सच्ची खबरें तथा सूचनाएं होंगी। एक इंटरव्यू में गौरी लंकेश ने अपनी ‘लंकेश पत्रिके’ के सन्दर्भ में कहा था- “यह हमेशा ही धर्म निरपेक्षता, दलितों, महिलाओं और समाज के उपेक्षित वर्ग के साथ खड़ी रही है। पत्रिकेउन लोगों की आवाज़ बन गई थी जिनके लिए मुख्य धारा की मीडिया में कोई जगह नहीं थी।”[10] पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को समकालीन कवि ज्ञानेन्द्रपति ने बखूबी चित्रित करने का प्रयास किया है। ‘मधुशालीन’ कविता की पंक्तियाँ इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं कि अखबार के पन्नों में मसाला चाहिए। जिसकामुख्य उद्देश्य युवा वर्ग को आकर्षित करने के साथ-साथ पैसा कमाना है। कवि कहता है-

“भले ही वे

घटनाओं में समाचार

और समाचार में स्कूप

सूंघ लेनेवाले पत्रकार हों

जो सच पूछो तो बस इतना ही जानते हैं

कि पक रहे मांस को

और छप रहे अखबार को

चाहिए गरम मसाला।”[11]

 

समकालीन कवि मंगलेश डबराल ने समाज के हर विषय को अपनी कविता का केंद्र बनाया तथा समाज के ज्वलंत मुद्दों से आम जनता को अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी सिलसिले में इनकी कविता ‘त्वचा’ बाजारवादी मीडिया में चलने वाले विज्ञापन की भरमार को प्रस्तुत करती है। आज बाजार में कई तरह के उत्पाद उपलब्ध हैं। जिनका प्रचार एवं प्रसार अधिकतर स्त्री के द्वारा विज्ञापन के माध्यम से दिखाया जा रहा है। दरअसल मीडिया और पूँजीवाद का गहरा सम्बन्ध होने के कारण एक दूसरे को लाभ पहुंचाना ही इनका मुख्य उद्देश्य बना हुआ है। इसीलिए दिन रात न्यूज़ चैनल्स और टीवी द्वारा विज्ञापन दिखाए जाते है। इसी बात को कविता की इन पंक्तियों में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं-

“त्वचा ही इन दिनों चारों ओर दिखती है

त्वचामय बदन त्वचामय सामान

त्वचा का बना हुआ कुल जहान

टीवी रात-दिन दिखलाता है जिसके चलते-फिरते दृश्य

त्वचा पर न्योछावर सब कुछ

कई तरह से लेप उबटन झाग तौलिए आसमान से गिरते हुए

कमनीय त्वचाओं का आदान-प्रदान करते दिखते हैं स्त्री-पुरुष”[12]

 

भारत का संविधान आर्टिकल 19 (1) अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार देता है। यह आज़ादी मीडिया के सन्दर्भ में भी है। मीडिया स्वतंत्र रूप से प्रतिबद्ध होना चाहिए। मीडिया की स्वतंत्रता से सरकार का मूल्यांकन किया जा सकता है।इस सन्दर्भ में वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं- “किसी भी सरकार का मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि उसके दौर में आज़ाद मीडिया था या गोदी मीडिया।”[13] आज बहुत कम ऐसे मीडिया हाउसेज और पत्रकार हैं जो सत्ता से सवाल करते हैं और सामाजिक मुद्दों को उठाते हैं। हर रोज समाज में हो रही हत्याएं, अत्याचार, शोषण, हिंसा आदि से अखबार के पन्ने भरे पड़े हैं। समाज में इस तरह की घटनाओं के पीछे अधिकतर सत्ताधारियों का हाथ होता है। दरअसल यह लोग अपनी राजनीति के लिए समाज में असंतुलन, तनाव तथा साम्प्रदायिक माहौल की स्थिति बनाए रखते हैं। जब कभी ऐसी घटनाओं के बारे में सांसद या विधायक से सवाल पूछा जाता है तो कन्नी काट लेते हैं। समकालीन कवि मंगलेश डबराल राजनीतिक व्यवस्था के चलते समाज में घटित घटनाओं से चिंतित है। जब वह अखबार के पन्ने पलटते हैं तो राजनीति का डरावना चेहरा सामने आता है। समाज की स्थिति को देख कर कवि कीचिंता ‘सोने से पहले’ कविता में अभिव्यक्त हुई है-

“सोने से पहले मैं समेटता हूँ सुबह के अखबार

परे खिसका देता हूँ दिन भर की सुर्खियाँ

मैं याद नहीं रखना चाहता अत्याचार की तारीखों को और हत्यारे दिनों को

मैं नहीं जानना चाहता कितना रक्त बहाकर बनाए जा रहे हैं राष्ट्र

मैं औंधी कर देता हूँ तमाम तस्वीरें

जिसमें एक पुल ढह रहा है सिसकियाँ उठ रही हैं

एक चेहरा जान बख्श देने को भीख मांग रहा है

एक आदमी कुर्सी पर बैठा अट्टहास कर रहा है।”[14]

 

समकालीन कवि लीलाधर जगूड़ी भी वर्तमान समय में मीडिया के चरित्र को उजागर करने में पीछे नहीं है। आज का मीडिया नैरेटिव और प्रोपगंडा के तहत काम करता है। यह चिंताजनक है। पहले रिपोर्टर जनता के बीच जा कर स्टोरी करता था, लेकिन आज स्टूडियो से ही सब कुछ चल रहा है। इसीलिए लोकल एवं राष्ट्रीय मीडिया में भी आम आदमी के जीवन से जुड़े सवाल गायब हैं। कवि ‘ख़बरे’ कविता में रोज आने वाली ख़बरों का विश्लेषण करता है। जिसमें आम जनता अच्छे दिनों की उम्मीद करते-करते खराब जीवन बिताने के लिए विवश है। दरअसल समाज में ऐसी स्थिति के लिए अधिकांशतः सरकार की विफल योजनाएं तथा नीतियाँ जिम्मेदार होती हैं। ऐसी स्थिति में सरकार अपनी विफलता को छिपाने के लिए मीडिया का सहारा लेकर अपनी योजनाओं तथा नीतियों का बखान करने का प्रयास करती है। कवि ऐसी व्यवस्था से चिंतित होते हुए कहते है-

“रोज़ ख़बरें आती हैं

लांछित और लज्जित होने की ख़बरे

उनकी कोइ ख़बर नहीं आती

जिनमें लज्जा की भनक हो

जो अच्छे दिनों की कामना में

ख़राब जीवन जिए चले जाते हैं

जो उस जीवन से बाहर चला आता है

उसकी ख़बर आती है।”[15]

 

निष्कर्ष : समकालीन हिंदी कविताएँ मीडिया के विभिन्न पक्षों पर चर्चा करते हुए वर्तमान समय में मीडिया की आज़ादी, चुनौतियों तथा आम आदमी के जीवन से जुड़े सवालों पर चर्चा करती है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि आज का मीडिया अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है। लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को खोखला करने तथा पत्रकारों पर दबाव बनाने में सरकार की लगातार कोशिशे अतीत से लेकर आज भी जारी हैं। समकालीन हिंदी कविताएँ इन तमाम विषयों पर समग्र रूप से चर्चा करने की चेष्टा करती है।

 

सन्दर्भ :


[1]रवीश कुमार, बोलना ही है, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2019,पृ.12

[2]सं. सत्यम, भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़, राहुल फाउंडेशन, लखनऊ, दूसरा संस्करण 2008,पृ.258

[3]वही

[5]रवीश कुमार, बोलना ही है, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2019,पृ. 60-61

[8]प्रोनॉय रॉय, भारतीय जनादेश चुनाओं का विश्लेषण, पेंगुइन बुक्स, हरियाणा, प्रथम संस्करण 2019,पृ.10

[9]अरुण कमल, अपनी केवल धार, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006,पृ.15

[10]सं.चंदन गौड़ा, गौरी लंकेश मेरी नज़र से, जगरनॉट बुक्स, नई दिल्ली, प्रथम प्रकाशन 2018,पृ.57

[11]ज्ञानेंद्रपति, संशयात्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2004,पृ.43

[12]मंगलेश डबराल, प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,पृ.147

[13]रवीश कुमार, बोलना ही है, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2019,पृ.65

[14]मंगलेश डबराल, कवि ने कहा था, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2010,पृ.144

[15]लीलाधर जगूड़ी, अनुभव के आकाश में चाँद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरी आवृत्ति 2003,पृ.23

 

डॉ. शिराजोद्दीन, सहायक प्राध्‍यापक,

 हिन्‍दी विभाग, कर्नाटक कला, विज्ञान एवं वाणिज्‍य महाविद्यालय, बीदर कर्नाटक

raajship@gmail.com, 8880293329


 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) मीडिया-विशेषांक, अंक-40, मार्च  2022 UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक-द्वय : डॉ. नीलम राठी एवं डॉ. राज कुमार व्यास, चित्रांकन : सुमन जोशी ( बाँसवाड़ा )

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