शोध आलेख : डॉ. भीमराव अम्बेडकर का शिक्षा दर्शन / हेमाराम तिरदिया एवं प्रो. कान्ता कटारिया

शोध आलेख : डॉ. भीमराव अम्बेडकर का शिक्षा दर्शन

हेमाराम तिरदिया एवं प्रो. कान्ता कटारिया


शोध सारव्यक्तियों को श्रेष्ठ एवं चरित्रवान बनाने के लिए शिक्षा की बहुत आवश्यकता होती है। शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए आधुनिक भारत के शिक्षाविदों में ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, महात्मा गाँधी, रविन्द्र नाथ टैगोर एवं स्वामी विवेकानंद आदि विख्यात हैं। प्रस्तुत शोध में डॉ. अम्बेडकर के शिक्षा दर्शन को समग्रता से समझने के लिए वर्णनात्मक, विवेचनात्मक एवं विश्लेष्णात्मक अध्ययन प्रविधि का प्रयोग किया गया है। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषणों, लेखों एवं पुस्तकों में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा तथा उसके उद्देश्योंकी व्यापक चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा व्यक्ति का बौद्धिक एवं चारित्रिक विकास कर उसके व्यक्तित्व निर्माण में अमूल्य योगदान देती है। उनका शिक्षा दर्शन मानवता पर आधारित है जिसमे मानवीय गरिमा एवं स्वाभिमान का स्थान सर्वोपरि है। उनके अनुसार मानव कल्याण एवं सामाजिक अस्तित्त्व के लिए शिक्षा की आवश्यकता हर काल में रहती है।शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हुए अम्बेडकर कहते कि शिक्षा वह है जो व्यक्ति को निडर बनाए, एकता का पाठ पढाए, लोगों को अधिकारों के प्रति सचेत कर संघर्ष की सीख दे एवं स्वतंत्रता के लिए लड़ना सिखाए। उनके अनुसार सभी को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य है. शिक्षा, शिक्षण संस्थान, शिक्षार्थी, शिक्षक एवं शिक्षण पद्धतियाँ डॉ. अम्बेडकर के शैक्षिक दर्शन के महत्त्वपूर्ण घटक हैं। निर्धन और वंचित समाज को प्रगति करने के लिएशिक्षित बनो, संगठित रहो एवं संघर्ष करोका मूलमंत्र देने वाले डॉ. अम्बेडकर का शिक्षा दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवन काल में था.

बीज शब्द : भीमराव अम्बेडकर, शिक्षा दर्शन, मानवता, स्वतंत्रता, समानता, अस्पृश्य, विकास

प्रस्तावना -

यूनानी दार्शनिक प्लेटो के अनुसारराज्य का निर्माण वृक्षों एवं चट्टानों से नहीं होता बल्कि उन व्यक्तियों के चरित्र से होता है जो उसमें निवास करते हैं। व्यक्तियों को श्रेष्ठ एवं चरित्रवान बनाने के लिए शिक्षा की बहुत आवश्यकता होती है क्योंकि शिक्षा ही राष्ट्र की भावी पीढ़ी को राष्ट्रीय जीवन मूल्यों एवं राष्ट्रीय संस्कृति के अनुरूप संस्कारित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य करती है।शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए आधुनिक भारत के शिक्षाविदों में ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, महात्मा गाँधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर एवं स्वामी विवेकानंद आदि विख्यात हैं।1 (मीना,2017) यद्यपि डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने संघर्ष एवं कार्यों से आधुनिक भारत के इतिहास को गहनता से प्रभावित किया है तथापि उनके योगदान का ज्ञान की विविध शाखाओं में समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया है, विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषणों, लेखों एवं पुस्तकों में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा तथा उसके उद्देश्यों की व्यापक चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा व्यक्ति का बौद्धिक एवं चारित्रिक विकास कर उसके व्यक्तित्व निर्माण में अमूल्य योगदान देती है। उनके अनुसार वर्ग विभाजित समाज में सामाजिक समानता एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना शिक्षा के द्वारा ही संभव है। प्रस्तुत आलेख में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के शिक्षा दर्शन तथा उसकी व्यावहारिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सार्थकता का सामयिक सन्दर्भ में विश्लेषणात्मक अध्ययन का प्रयास किया गया है।

शोध के उद्देश्य -

  1. शिक्षा के प्रति अवधारणात्मक समझ विकसित करना।
  2. इक्कीसवीं सदी में विकसित हो रही नवीन पीढ़ी को डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन संघर्ष एवं कार्यों से परिचित करवाना।
  3. डॉ. अम्बेडकर के चिंतन में विद्यमान शिक्षा सम्बन्धी विचारों को उजागर करना।
  4. डॉ. अम्बेडकर द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये गए संघर्ष एवं कार्यों से वर्तमान पीढ़ी को रूबरू करवाना।
  5. डॉ. अम्बेडकर के शिक्षा दर्शन के उद्देश्य एवं स्वरुप को समझते हुए उसकी प्रासंगिकता का अध्ययन करना।

अत: प्रस्तुत शोध का उद्देश्य डॉ. अम्बेडकर के शिक्षा दर्शन पर समग्र रूप से प्रकाश डालना है ताकि भावी पीढ़ियां बाबासाहेब के चिंतन के इस अनछुए पहलू से परिचित हो सके और अपने जीवन में मानवतावादी मूल्यों को उतर सके.

विषयवस्तु विश्लेषण -

शिक्षा एक व्यापक संकल्पना है जिस पर अनेक विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किये हैं। शिक्षा के अंग्रेजी पर्याय एजुकेशन (Education) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द एडुकेटम (Educatom) से हुई है जिसका अर्थ है शिक्षित करना। अपने संकुचित अर्थ में शिक्षा का अभिप्राय हमारी शक्तियों के विकास और उन्नति के लिए चेतनापूर्वक किये गए किसी भी प्रयास से हो सकता है। व्यापक अर्थों में शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है और जीवन के प्राय: प्रत्येक अनुभव से उसके भंडार में वृद्धि होती है। भारतीय सन्दर्भ में शिक्षा का तात्पर्यसा विद्या या विमुक्तयेसे है अर्थात् विद्या ऐसी हो जो मुक्ति के द्वार खोल दे।2 (सिंह, 14 अप्रैल 2020) तथागत बुद्ध के अनुसार शिक्षा व्यक्ति के समन्वित विकास की प्रक्रिया है। वहीँ स्वामी विवेकानंद के अनुसार, मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। महात्मा गाँधी ने कहा किशिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा के उच्चतम विकास से है। शिक्षा व्यक्ति के आंतरिक एवं बाह्य गुणों का विकास कर उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करने वाले विचारकों में ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम अग्रणी है। महात्मा फुले ने हंटर कमीशन को भेजे ज्ञापन में शिक्षा के जिन लोकतान्त्रिक मूल्यों की तरफ ध्यान आकृष्ट किया था, डॉ. अम्बेडकर इसी विरासत को आगे बढ़ाने वाले उल्लेखनीय विचारक हैं।3 (सहाय) अपने लेखन से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा विषयक विचार स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किये जो उनके भाषणों, लेखों, संपादकीयों एवं पुस्तकों में परिलक्षित होते हैं।

शिक्षा को मानव मुक्ति का आधार मानने वाले डॉ. भीमराव अम्बेडकर का शिक्षा दर्शन तथागत बुद्ध, संत कबीर, ज्योतिबा फुले, बुकर टी. वाशिंगटन एवं जॉन डीवी से प्रभावित है। बुद्ध से उन्होंने समानता एवं कबीर से मानव मूल्यों की शिक्षा प्राप्त की। ज्योतिबा फुले के विचारों से प्रभावित होकर डॉ. अम्बेडकर ने शिक्षा को सामाजिक क्रांति का वाहक माना। बुकर टी. वाशिंगटन ने नीग्रो लोगों की शिक्षा और आर्थिक उन्नति पर अधिक जोर दिया।4 (कीर, 2019) डॉ. अम्बेडकर के मस्तिष्क पर उनके विश्वविद्यालयी शिक्षक एवं शिक्षाशास्त्री जॉन डीवी का गहन प्रभाव था, जिन्होंने शिक्षा को जीवन की एक आवश्यकता एवं सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखा। डीवी के अनुसार शिक्षा का मूल कर्तव्य प्रत्येक व्यक्ति को उसके सहज विकास के लिए तैयार कर उसे सामाजिक रूप से सक्षम बनाना है।5 (कौशिक, 14 जुलाई 2020) डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं स्वीकार किया किमेरे वे सभी विचार जिनका सम्बन्ध सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से है, उनके वैचारिक निर्माण में जॉन डीवी की केन्द्रीय भूमिका है।6 (थोराट, 2007) व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों एवं तत्कालीन अनेक घटनाओं ने भी उनकी शिक्षा विषयक समझ को प्रभावित किया।

बीसवीं शताब्दी के महानतम विचारकों में से एक डॉ. भीमराव अम्बेडकर के शैक्षिक विचारों का फलक अत्यंत विस्तृत है, जिसमें केवल अस्पृश्य वर्ग की शिक्षा के सरोकार हैं बल्कि स्त्री एवं अल्पसंख्यकों की शिक्षा तथा उनकी गहन शैक्षिक दृष्टि भी समाहित है। धर्म एवं राजनीति को भी डॉ. अम्बेडकर ने अपने शिक्षा दर्शन में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। जहाँ अधिकांश भारतीय शिक्षाविदों ने अपने विचारों को प्राथमिक शिक्षा तक ही सीमित रखा वहीँ डॉ. अम्बेडकर ने उच्च शिक्षा के बारे में भी स्पष्ट विचार रखे। शिक्षा, शिक्षण संस्थान, शिक्षार्थी, शिक्षक एवं शिक्षण पद्धतियाँ डॉ. अम्बेडकर के शैक्षिक दर्शन के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।

विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त डॉ. अम्बेडकर स्वयं एक शिक्षक थे।उनके अनुसार शिक्षा से ज्ञान का द्वार खुलता है एवं व्यक्ति के विचारों का विस्तार होता है। शिक्षा केवल जीवन निर्वाह का साधन नहीं अपितु सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम है।जिस प्रकार पेट भरने के लिए मनुष्य को अन्न की आवश्यकता होती है उसी प्रकार ज्ञानार्जन के लिए शिक्षा आवश्यक है। मानवीय व्यक्तित्व और चेतना के निर्माण में शिक्षा की निर्विवाद भूमिका को स्वीकार करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा,शिक्षा वह है जो व्यक्ति को निडर बनाए, एकता का पाठ पढाए, लोगों को अधिकारों के प्रति सचेत कर संघर्ष की सीख दे एवं स्वतंत्रता के लिए लड़ना सिखाए।7 (मीना, 14 अप्रैल 2020) स्वयं असंख्य कष्ट उठाकर शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉ. अम्बेडकर ने शिक्षा की तुलना शेरनी के दूध से की है, जिसे पीकर व्यक्ति दहाड़ने लगता है।

तथागत बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित डॉ. अम्बेडकर शिक्षा को मानव कल्याण का साधन मानते हुए इसके कुछ उद्देश्य निर्धारित करते हैं।8 (श्रीवास्तव,11 अगस्त 2018) उनके अनुसार शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य मानव व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन कर उसका चारित्रिक विकास करना है। चरित्रहीन एवं विनयरहित मनुष्य शिक्षित होते हुए भी पशु से भी भयावह है।9 (नैमिषराय & अकेला) मानसिक एवं बौद्धिक विकास को शिक्षा का दूसरा उद्देश्य स्वीकार करते हुए अम्बेडकर कहते हैं कि शिक्षा से मनुष्य में विवेकशक्ति उत्पन्न हो जाती है जिससे उसमें अच्छे-बुरे का ज्ञान एवं निर्णय लेने की क्षमता जाती है।10(नैमिषराय & अकेला) डॉ. अम्बेडकर ने आहार-विहार के प्रति सतर्कता को शिक्षा का उद्देश्य माना है क्योंकि शरीर के संतुलित विकास से ही व्यक्ति में सर्जनात्मक सोच विकसित हो सकती है। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य मानव मस्तिष्क का विस्तार कर उसे संकीर्णताओं से मुक्त करना होना चाहिए। उनके अनुसार शिक्षा को व्यक्ति में राष्ट्र प्रेम की भावना जागृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना चाहिए।

मुंबई विधानपरिषद में 12 मार्च 1927 को डॉ. अम्बेडकर ने भारत में शिक्षा की स्थिति पर चिंता प्रकट करते हुए कहा कि हमारे देश में शिक्षा के मामले में कुछ विशेष प्रगति नहीं हुई है। प्राथमिक शिक्षा पर सरकार द्वारा किया जाने वाला व्यय अपर्याप्त है, इसमें कम से कम इतनी वृद्धि अवश्य होनी चाहिए, जितना मद सरकार उत्पाद शुल्क के रूप में प्राप्त करती है। वे प्रथम अर्थशास्त्री थे जिन्होंने बजट का आनुपातिक अध्ययन कर उसे शैक्षिक सन्दर्भों में किये जाने वाले व्ययों से जोड़ा। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बच्चा जो प्राथमिक शाला में प्रवेश करता है, वह एक ऐसी अवस्था में बाहर आए जब वह साक्षर हो चुका हो और अपने भावी जीवन में निरंतर साक्षर होता रहे।11 (जाधव 2017) किन्तु यदि आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि प्राथमिक विद्यालय में प्रवेशित प्रत्येक एक सौ बच्चों में मात्र अठारह बच्चे ही कक्षा चार तक पहुँचते हैं। उनके अनुसार बच्चों को विद्यालय पहुंचा देना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें बुनियादी शिक्षा प्राप्त करने तक विद्यालय से जोड़े रखना भी आवश्यक है। वे प्राथमिक शिक्षा में ड्रॉपआउट विद्यार्थियों की समस्या का अध्ययन करने वाले प्रथम अर्थशास्त्री थे। शिक्षा के व्यवसायीकरण का मुद्दा उठाते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि शिक्षा एक ऐसी चीज है जोकि सबको मिलनी चाहिए। शिक्षा विभाग ऐसा नहीं है जो इस आधार पर चलाया जाए की जितना वह खर्च करता है,उतना विद्यार्थियों से वसूल किया जाए। शिक्षा को सभी संभव उपायों से व्यापक रूप से सस्ता बनाया जाना चाहिए।12(मून,2020) समाज में विभिन्न वर्गों में शिक्षा के तुलनात्मक विकास में व्याप्त असमानता से चिंतित डॉ. अम्बेडकर ने सामाजिक एव आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार की मांग की। अस्पृश्य वर्ग के बच्चों को छात्रवृति देने की पद्धति की आलोचना करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने सुझाव दिया कि सरकार इस धन का उपयोग छात्रावासों की अभिवृद्धि के लिए करे।13(मून, 2020) विश्वविद्यालयी शिक्षा के सन्दर्भ में विचार व्यक्त करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि कोई भी विश्वविद्यालय अनुसन्धान को प्रोत्साहन देने में या उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन देने में सफल नहीं हो सकता, यदि वह परीक्षा प्रणाली को ही सब कुछ या अंतिम लक्ष्य मान कर चले।14(जाधव,2017) उनके अनुसार प्रवेश, शिक्षण, परीक्षा एवं नियुक्तियों के मामले में विश्वविद्यालय स्वायत्त होने चाहिए।

महान अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, संविधान निर्माता एवं शिक्षाविद डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने शिक्षा दर्शन में सबके लिए शिक्षा की वकालत करते हुए कहा कि शिक्षा के द्वारा ही मानवीय मूल्यों की परिकल्पना संभव है। विद्यालय को समाज का लघु रूप मानते हुए डॉ. अम्बेडकर सामूहिक शिक्षा पद्धति का आग्रह करते हैं जिससे समाज में प्रचलित अनेक कुप्रथाओं एवं अवधारणाओं को समाप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार विद्यालय सामाजिक परिवर्तन एवं पुनर्निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है। विद्यालय का वातावरण एवं योग्य शिक्षक ही उत्तम छात्र का निर्माण कर सकते हैं। उत्तम छात्र से उनका तात्पर्य स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व जैसे मानवीय मूल्यों को मानने तथा तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त बालक से है। उनके अनुसार राष्ट्र का भविष्य विद्यार्थियों पर ही निर्भर करता है। अपने शिक्षा दर्शन में अम्बेडकर शिक्षक को राष्ट्र निर्माता के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार शिक्षक व्यक्तिवादी विचार से युक्त होकर व्यापक दृष्टिकोण का स्वामी, विषय का ज्ञाता, पूर्वाग्रहों से मुक्त, आत्मविश्वासी, नैतिक गुणों से संपन्न एवं सामाजिक रुढियों को तोड़कर समाज को सम्यक दिशा प्रदान करने वाला यथार्थवादी होना चाहिए। प्रचलित शिक्षण पद्धतियों एवं पाठ्यक्रम को दोषपूर्ण मानते हुए अम्बेडकर ऐसी पद्धतियों एवं पाठ्यक्रम का विकास चाहते थे जो समयानुकूल, मानवीय मूल्यों के अनुरूप, स्वतंत्र चिंतन में सहायक एवं समतावादी दृष्टिकोण से युक्त हो। उनके अनुसार गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, साहित्य एवं नीतिशास्त्र को मुख्यतः पाठ्यक्रम में सम्मिलित होना चाहिए साथ ही व्यायाम, खेलकूद एवं स्वरोजगार को भी इसमें पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। लोकतान्त्रिक पाठ्यक्रम की वकालत करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा पर बल दिया और कहा कि शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए।

भारतीय समाज में साधारण-जन के लिए शिक्षा सुलभ कराने वाले महात्मा फुले की विरासत के स्वाभाविक उत्तराधिकारी डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारत की सैंकड़ो वर्षों की पराधीनता का मूल कारण अशिक्षा को मानते हैं। उनके अनुसार प्राचीन भारत में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के अंतर्गत केवल एक ही वर्ग शिक्षा प्राप्त कर सकता था और शेष जनता इससे वंचित रखी गई।15(धर्मवीर, 2009) वर्षों से समाज में पददलित, पीड़ित एवं सामाजिक दासता से जकड़े मृतप्राय समाज को शिक्षा के माध्यम से पुन: खड़ा किया जा सकता है। उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना से ही इस क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ कर दिया। बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने शिक्षा को प्राथमिकता बनाया और पिछड़े वर्गों के बीच शिक्षा एवं संस्कृति के विस्तार हेतु महाविद्यालय, छात्रावास, पुस्तकालय एवं अध्ययन केंद्र खोले तथा विद्यार्थियों की पहल परसरस्वती वेलासनामक एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अम्बेडकर के अनुसार अस्पृश्य वर्ग के माथे पर लगा अज्ञानता का टीका मिटाने और समाज में उनके प्रति व्याप्त दुर्भावना से निकलने का एकमात्र मार्ग शिक्षा ही था। उन्होंने 1928 मेंबहिष्कृत हितकारिणी सभाकी ओर से शिक्षा आयोग को स्मरण-पत्र प्रस्तुत कर राज्य द्वारा अस्पृश्यों को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने की मांग की। उनके अनुसार दलित, अस्पृश्य और पिछड़ी जातियों के प्रतिभा संपन्न और बुद्धिमान युवकों को उच्च शिक्षा के लिए सरकारी कोष की व्यवस्था हो।16(रणसुभे,1992) डॉ. अम्बेडकर अस्पृश्य वर्ग के लिए विज्ञान एवं तकनीक की शिक्षा के पक्षधर थे क्योंकि इसका रोजगार से गहरा सम्बन्ध है। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अस्पृश्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की मांग की। डॉ. अम्बेडकर भारतीय इतिहास के उन गिने-चुने व्यक्तियों में अग्रणी हैं जिन्होंने अस्पृश्य वर्ग की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने समाज में पिछड़े वर्गों के बीच शिक्षा फ़ैलाने के लिए 1945 मेंपीपल्स एजुकेशन सोसायटीकी स्थापना की, जिसके अंतर्गत अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई जिनमे सिद्धार्थ कॉलेज एवं मिलिंद कॉलेज प्रमुख है। डॉ. अम्बेडकर इस तथ्य से भली-भांति परिचित थे कि जागती हुई चींटी की ताकत सोये हुए हाथी से अधिक होती है, इसलिए उन्होंने अस्पृश्य समाज को शिक्षा के माध्यम से जगाने का भागीरथी प्रयास किया।

तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के अनुसार अस्पृश्य वर्ग में जन्में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने असंख्य कष्ट उठाते हुए शिक्षा क्षेत्र की उच्चतम उपाधियाँ प्राप्त की। उनके अनुसार शिक्षा मनुष्य को मनुष्यत्व प्रदान करती है और शिक्षा की ही नींव पर सभ्यता संस्कृति का भवन निर्मित होता है। उन्होंने केवल अस्पृश्य वर्ग की शिक्षा पर बल दिया अपितु प्रत्येक वर्ग के सभी स्त्री-पुरुषों को समान रूप से शिक्षा मिले, इस पर उनके विचार स्पष्ट थे। डॉ. अम्बेडकर पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की शिक्षा पर अधिक बल देते थे। उनके अनुसार एक पुरुष के शिक्षित होने का अर्थ अकेले शिक्षित होना है जबकि एक स्त्री के शिक्षित होने का अर्थ एक परिवार का शिक्षित होना है। 4 अगस्त, 1913 को लिखे अपने पत्र में अम्बेडकर कहते हैं कि यदि हम लोग अपने लड़कों की शिक्षा के साथ लड़कियों की शिक्षा के लिए भी प्रयास करें, तो हमारे समाज की तीव्र गति से उन्नति होगी।17(कीर, 2019) महाड़ सत्याग्रह के दौरान अस्पृश्य महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अपनी लड़कियों को शिक्षा दिलाओ। ज्ञान और विद्या दोनों बातें महिलाओं के लिए भी आवश्यक है।18(कीर, 2019) मनुस्मृति द्वारा शिक्षा एवं सम्पति से वंचित महिलाओं के लिए अम्बेडकर ने समाज में समान अधिकारों की वकालत की एवं उनकी शिक्षा के लिए प्रयास किये।

डॉ. अम्बेडकर का शिक्षा दर्शन मानवता पर आधारित है जिसमे मानवीय गरिमा एवं स्वाभिमान का स्थान सर्वोपरि है। धर्म उनके शिक्षा दर्शन का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। वे मार्क्स तथा अन्य मार्क्सवादी विचारकों की इस बात से सहमत नहीं थे कि धर्म का मानव जीवन में कोई महत्त्व नहीं है। उनके अनुसार धर्म प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है, यह मनुष्य में आशा का संचार कर उसे कर्म के लिए प्रेरित करता है। मनुष्य केवल रोटी पर ही जीवित नहीं रह सकता, उसके मस्तिष्क को विचारों की खुराक चाहिए जो शिक्षा द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के मस्तिष्क में केवल तथ्य और सिद्धांतों को भरना नहीं बल्कि उसमें मानवीय मूल्यों का समावेश होना चाहिए।

निर्धन और वंचित समाज को प्रगति करने के लिएशिक्षित बनो, संगठित रहो एवं संघर्ष करोका मूलमंत्र देने वाले डॉ. अम्बेडकर का शिक्षा दर्शन देश, काल एवं परिस्तिथियों के प्रभाव से परे है।19(अग्निहोत्री, 3 अप्रैल 2015) ये केवल तत्कालीन परिस्तिथियों में प्रासंगिक थे अपितु आज भी उतने ही समीचीन है। उनके अनुसार शिक्षा से मनुष्य में विवेक एवं मानवीय मूल्यों का विकास होता है। राष्ट्र के विकास एवं आधुनिकीकरण में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके अनुसार शिक्षा नये विचारों की उत्पत्ति एवं मानवता को प्रबुद्ध करने का साधन होना चाहिए। उनका शिक्षा दर्शन आज भी शिक्षा प्रणाली का आदर्श है। यह उन्हीं के विचारों का प्रभाव है कि आज संविधान में अनुच्छेद 21A जोड़करनि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षाका प्रावधान किया गया है जो उनके शिक्षा दर्शन की प्रासंगिकता को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रमाणित करता है। उनके प्रयासों के कारण ही आज महिलाएं शिक्षा प्राप्त कर ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के नए आयाम छू रही हैं। आज जब शिक्षा के निजीकरण एवं व्यवसायीकरण के कारण गरीब लोगों के लिए अच्छी शिक्षा प्राप्त करना दुर्लभ हो रहा है तो डॉ. अम्बेडकर के शिक्षा दर्शन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

निष्कर्ष :

प्रख्यात विचारक के.एस. चालम ने अपने उल्लेखनीय शोधदलित इमैनिसिपेसन थ्रू एजुकेशनमें डॉ. अम्बेडकर को एक ऐसे विचारक के रूप में याद किया है जिन्होंने अपना आधा जीवन शिक्षा की दुनिया में बिताया, जिसे तीन रूपों- शिक्षार्थी, शिक्षक और शैक्षिक संस्थाओं के निर्माता के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।20(थोराट,2007) स्वयं कोआजन्म विद्यार्थीमानने वाले अम्बेडकर शिक्षा को राष्ट्र तथा समाज के उत्थान का साधन तो मानते ही थे साथ ही प्रत्येक वर्ग के लिए स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुत्व के विकास का एक प्रभावी मार्ग भी मानते थे। उनके अनुसार मानव कल्याण एवं सामाजिक अस्तित्त्व के लिए शिक्षा की आवश्यकता हर काल में रहती है। यहाँ प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री प्रो. मैकेंजी को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा किशिक्षा मानवीय प्रगति की निर्देशिका है21(मून) निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है डॉ. अम्बेडकर का शिक्षा दर्शन आज भी उतना महत्त्वपूर्ण है जितना तत्कालीन परिस्तिथियों के सम्बन्ध में था।

सदर्भ :

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  21. मून कपिल गौतमराव: डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में शिक्षा का महत्त्व www.vishwahindijan.blogpost.com

 

हेमाराम तिरदिया

सहायक आचार्य ,एस.पी.एम. राजकीय महाविद्यालय ,भोपालगढ़, जोधपुर (राजस्थान)

hemaramtirdiya@gmail.com, 8104235129

प्रोकान्ता कटारिया

प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षराजनीति विज्ञान विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-39, जनवरी-मार्च  2022

UGC Care Listed Issue चित्रांकन : संत कुमार (श्री गंगानगर )

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