शोध आलेख : सोशल मीडियाः लोक और सत्ता की वर्चुअल निर्मिति / डॉ.तरुण

सोशल मीडियाः लोक और सत्ता की वर्चुअल निर्मिति

- डॉ.तरुण


शोध सार : प्रस्तुत शोधपत्र में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोक और सत्ता की निर्मिति कैसे होती है, का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। जिस लोकसत्ता के उद्देश्य के लिए मीडिया का विकास किया गया था वह कैसे सत्तालोक के अधीन हो गया इसका क्रमिक विवरण देने का प्रयास किया गया है। इस लेख में इंटरनेट के विकास से लेकर एंड्रॉयड के आने के बाद संस्थागत मीडिया और सोशल मीडिया के विकास के साथ उसके चलन और तरीकों में जो परिवर्तन आया इसका ब्यौरा ही नहीं दिया गया अपितु इस परिवर्तन में जनभागीदारी और सत्ता के उद्देश्यों के निहितार्थों को बताने का प्रयास भी किया गया है। साथ ही ध्रुवीकरण और संप्रेषण के संदर्भ में सोशल मीडिया सरकार और जनता के लिए कैसे एक सॉफ्टचॉइस बन गया है इसका विश्‍लेषण करने का प्रयास भी किया गया।

 

बीज शब्द : सोशल मीडिया, इंटरनेट, एंड्रॉयड, लोक, सत्ता, निजीकरण, ऑनलाइन, सरकार, जनपक्षधर, मुख्यधारा, न्यू मीडिया, आमजन, गूगल,डाटा, इलैक्ट्रॉनिक, ब्लॉग, उन्माद, विश्‍वविद्यालय, आंदोलन, अभियान, हैशटैग।

 

मूल आलेख : आज से लगभग बीस पच्‍चीस साल पहले हमारे पास अपने प्रकाशन के बहुत सीमित साधन उपलब्ध थे। संचार क्रांति अभी मोबाइल इंटरनेट के रूप में लोक तक नहीं पहुँची थी। लोक जो इसकी बुनियाद और विकास में मौजूद था। उससे पहले एक आमजन के अभिव्यक्ति के साधन के मंच बहुत सीमित थे। वह कुछ लिखता और उसके प्रकाशन के लिए पत्रिकाओं और समाचार पत्रों पर निर्भर हो जाता। एक आमजन लोकविमर्श का हिस्सा बना इसका पहला चरण था इंटरनेट का लोक तक पहुँचना। यह लोक जो सत्ता का आधार है यह लोक जो अभिव्यक्ति की आज़ादी का भान सिर्फ संविधान तक कर पा रहा था। इंटरनेट की पहुँच  के बाद जैसे अभिव्यक्ति की आज़ादी उसके हाथों की उंगलियों में समा गयी। सोशल मीडिया की यह लोकयात्रा बड़ी दिलचस्प है। इस यात्रा के कई पड़ाव हैं। आज जो सोशल मीडिया हमें अपनी गिरफ्त में लिए है वह यह भ्रम पैदा करने में सक्षम हुआ है कि हमने सोशल मीडिया को अपनी गिरफ्त में लिया हुआ है।

 

भारत में इंटरनेटः लोक से दूर

ध्यातव्य हो कि भारत में इंटरनेट सेवा की बहाली आरंभ में शैक्षिक और शोध के उद्देश्य को ध्यान में रखकर 1986 में उपलब्ध हुई।115 अगस्त 1995 को विदेश संचार निगम लिमिटेड द्वारा इंटरनेट सेवाओं को शुरू किया गया। उसके बाद नवंबर 1998 में सरकार ने निजी ऑपरेटरों के लिए भी इंटरनेट सेवाओं को उपलब्ध कराने के द्वार खोल दिए।2 निश्‍चित ही निजी ऑपरेटरों के लिए भारत की इंटरनेट रहित जनता एक बड़ा बाज़ार थी। आगे जाकर यही वो फैसला भी रहा जिसने सरकारी कंपनियों का भट्टा बैठा दिया। एम.टी.एन.एल और वी.एस.एन.एल जैसी दिग्गज कंपनियाँ निजी ऑपरेटरों के आगे नतमस्तक होती चली गयीं। कहना चाहिए कि इस क्षेत्र का निजीकरण सरकार की मंशा के तहत किया गया। एक समय ऐसा आया जब टेलीकॉम मंत्रालय में बड़े घोटाले हुए, स्पैक्ट्रम के इन घोटालों ने तो सरकारें तक गिरा दीं। पर ये बहुत बाद की बात है।

बहरहाल 1998 में निजी क्षेत्र ने एंट्री तो ले ली लेकिन अब भी भारत का एक बड़ा वर्ग इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर पर रहा था और जो लोग इसका प्रयोग करते भी थे,उनके लिए यह बहुत महंगा था। शुरू में मोबाइल के लिए 9.6केबीपीएस की स्पीड पाने के लिए आपको 5000 रुपये और इसी स्पीड को नॉनकमर्शियल प्लान के लिए इसी स्पीड के 25000 रुपये तक का प्लान था। ये मात्र डायल अप कनेक्शन के रेट थे अगर लीज़ लाइन चाहिए होती तो इसके लिए कमर्शियल कैटेगरी में 6 लाख सालाना तक के प्लान थे।3 इससे पता चलता है कि अपनी आरंभिक अवस्था में इंटरनेट आमजन से काफी दूर रहा और इसका इस्तेमाल परीक्षा परिणाम या कोई आवेदन फॉर्म या ईमेल चैक करने तक रहा।

 

इंटरनेट जगतः लोक का आगमन

समय का पहिया घूमा, समय बदला, इंटरनेट के प्लान सस्ते हुए आमजन की पहुंच इंटरनेट तक बढ़ी। सबसे पहले कोलकाता में इंटरनेट का आम इस्तेमाल किया गया। इसके बाद संचार के इस साधन तक आमजन की पहुँच बननी शुरू हुई। अब डेस्कटॉप और लैपटॉप के जरिये इंटरनेट का इस्तेमाल होने लगा। सोशल मीडिया साइट्स भी विकसित होने लगीं। युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सोशल नेटवर्किंग और चैटिंग बॉक्स चलन में आने लगे। ऑरकुट के आगमन के साथ ही युवा इसकी ओर आकर्षित हुए, साथ ही ब्लॉग लेखन शुरू हुआ। नयी रचनात्मकताको जगह मिलने लगी। लोक की असमंजसता को एक ठिकाना मिल गया। जिस ज्योति को सन 1995 में जगाया गया वो रौशनी का रूप ले रही थी । इंटरनेट की आमजन तक पकड़ ने तहलका मचा दिया। गूगल, विकिपीडिया के प्रयोग के साथ साथ यू ट्यूब का प्रयोग बढ़ने लगा, ब्लॉग लेखन ने लिखने पढ़ने वालों के लिए नए द्वार खोल दिए। विचारकों का मानना है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का नया पैराडाइम है ऑनलाइन लेखन। यह रीयल टाइम लेखन है और इसमें सत्य स्रोत और संवाददाता की जंग बड़े ही जटिल रूपों में चलती है। यह पत्रकारिता का ऐसा पैराडाइम है जिसमें जितनी जल्दी लिखना संभव है, उससे भी कम समय में संचार संभव है।4

 

ब्लॉगिंग के बहाने एक रीयल टाइम पत्रकारिता सामने आने लगी, ब्लॉगर अपने दिल की बात लिखने लगे क्योंकि उन पर कोई सांस्थानिक अंकुश नहीं था। इसके अपने खतरे और महत्त्व भी था सांस्थानिक ढाँचा पत्रकारिता को इससे दिक्‍कत भी हुई आज जो न्यू मीडिया हमें सोशल मीडिया के रूप में विकसित होता दिख रहा है, उसकी शुरुआत ब्लॉग लेखन से ही हुई एक मायने में ब्लॉग लेखन इस न्यू मीडिया की दस्तक थी। ऐसे समय में ब्लॉगर की आज़ादी का सवाल महत्त्वपूर्ण होने लगा। क्योंकि ब्लॉगर का कोई सांस्थानिक ढाँचा नहीं था। जबकि प्रेम और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पास सांस्थानिक ढाँचा था जिसके कारण वे अनेक बार संचार के नाम पर सौदेबाजी करने, ब्लैकमेल करने या दबाव डालने में भी सफल हो जाते।5अक्सर देखा गया है कि लोक जब जब अपना अधिकार बढ़ाता है सत्ता के कर्तव्यों, दायित्वों की ओर सचेत होता है जागरूक बनता है, सत्ता डगमगाती है। अभी सोशल मीडिया सिर्फ अपनी दस्तक दे रहा था उसका विस्तार नहीं हुआ था, अभी सिर्फ पढ़ा लिखा वर्ग या कम्प्यूटर चला सकने वाला वर्ग ही इसका इस्तेमाल कर पा रहा था। अभी एन्ड्रॉयड फोन चलन में नहीं आया था। ऑरकुट आकर जा चुका था और उसकी जगह फेसबुक ने ले ली थी। गूगल ने अपने खोज बिंदुओं में विस्तार करना शुरू कर दिया था। यहाँ से सोशल मीडिया में एक नये तरह की लोकवादिता और सत्ताचरित्र के दर्शन होते हैं।

 

एंड्रॉयड मोबाइल और सोशल मीडियाः चिंगारी बनी ज्वाला

यह वो बिंदु है जहाँ से लोक और सत्ता जो अब तक साथ साथ चल रहे थे एक दूसरे के आमने सामने आ जाते हैं। तकनीक के संबंध में समाज को बदलने या उसमें बदलाव लाने की ताकत एंड्रायड मोबाइल के आने के बाद ही दिखती है। इसके अच्छे और बुरे दोनों पक्ष हैं। आइये एक नज़र भारत में एंड्रायड फोन की शुरुआत पर डालें। जिसका गहरा संबंध है सोशल मीडिया की जनक्रांति और सत्ता के हस्तक्षेप से। इसके बिना लोक और सत्ता की निर्मिति को समझना बहुत मुश्किल होगा।

 

एंड्रॉयड फोन एक ओपन हैंड एलायंस के रूप में जाना जाता है। नवंबर 2007 में इसका अनावरण किया गया और पहला वाणिज्यिक एंड्रायड डिवाइस एच.टी.सी ड्रीम 2008 में लॉच किया गया। इसके आगमन के बाद से लगातार इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण की 27 अगस्त 2021 की रिपोर्ट के अनुसार6देश में करीब 82.53 करोड़ लोग इंटरनेट प्रयोग कर रहे हैं यह आँकड़ा 31मार्च 2021 तक लिया गया है। इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या वृद्धि को इससे समझा जा सकता है कि सिर्फ चार सालों में यह आँकड़ा दोगुना हो चुका है। यही हाल फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स का भी है इनके उपयोगकर्ताओं की संख्या भी भारत में लगातार बढ़ रही है। फेसबुक का प्रयोग करने वालों की संख्या गत नवंबर 2020 तक 31 करोड़ से अधिक हो गयी। ध्यान देने वाली बात ये है कि दुनिया में फेसबुक प्रयोग करने वालों में भारत पहले पायदान पर है।7 सोशल मीडिया का आगमन यूँ तो बहुत पहले हो गया लेकिन एंड्रायड फोन ने इसे लोगों से जोड़ दिया जो हाथ कम्प्यूटर का कीबोर्ड चलाने से काँपते थे, जिन्हें मेल भेजना, फाइल अटैच करना नहीं आता था आज वो यू ट्यूब पर विडियो अपलोड कर रहे हैं। अपने चैनल बना अपनी रोजमर्रा की गतिविधियाँ, अपनी पसंद, अपनी रुचियों को अपलोड कर रहे हैं। इसकी भूमिका जनता में अपनी पैठ बनाने में तो है ही साथ ही इस नये माध्यम के मिलने के बाद आमजन विरोध, असहमति और आक्रोश भी दर्ज करने लगे। लोक का यह आक्रोश इसलिए भी उभरा क्योंकि मुख्यधारा का मीडिया उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। समानांतर और नए मीडिया के रूप में सोशल मीडिया ने जनभागीदारी से इसके लोकपक्ष को मजबूती दी साथ ही छोटे से छोटे क्षेत्र की खबरों से भी जोड़ा। सोशल मीडिया में इस नए माध्यम के मिल जाने से जैसे आमजन को एक हथियार मिल गया। सोने पे सुहागा इंटरनेट डाटा की उपलब्धता और उनके किफायती होने ने कर दी। सोशल मीडिया ने कई जरूरी मुद्दों को ही नहीं उठाया बल्कि आमजन की आवाज़ को भी बुलंद किया। निर्भया कांड, अन्‍ना आंदोलन, मीटू अभियान न जाने ऐसे कितने मुद्दे हैं जिसे सोशल मीडिया से आधार मिला। पहले जिसे मुख्यधारा को दिखाने की निर्भरता थी वो मुद्दे अब स्वतः उद्घाटित होने लगे। अब मुख्यधारा का मीडिया सोशल मीडिया से अपनी खबरें चुनता दिखता है। अब खबर पहले सोशल प्लेटफार्म पर आती है उसके बाद मुख्यधारा का मीडिया उसे उठाता है। अब लोक की निर्भरता मुख्यधारा मीडिया से सरककर सोशल मीडिया या न्यू मीडिया की ओर आ गयी है। आज गाँव कस्बे, अमीर-गरीब, कोई भी इससे अछूता नहीं है। आपको अपनी प्रतिभा दिखानी हो तब भी।

 

हाशिये के लोक की मुख्यधारा में प्रस्तुति

लोकतंत्र अगर वाकई जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन है और उसके केंद्र यदि यही लोक और जन हैं तो इसके हाथ मजबूत करने में सोशल मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। सोशल मीडिया के विभिन्‍न प्लेटफॉर्म से इसके उन मुद्दों को केंद्र में लाया गया जो मुख्यधारा के मीडिया द्वारा हाशिये पर डाल दिए गए थे। जब हम कहते हैं कि लोकतंत्र की वास्तविक अर्थवत्ता हाशिये के व्यक्ति तक अवसरों और संसाधनों की पहुँच में अंतर्निहित है8 तब इसमें उस अंतिम जन की भागीदारी का होना अनिवार्य हो जाता है जिसके बारे में गाँधी जी ने अपना जंतर दिया था सोशल मीडिया ने इस हाशिये के लोक को पुनर्जीवित किया और इसकी आवाज़ बनकर उभरा। इसमें हर वर्ग के हाशिए के लोग शामिल हैं। जिसकी रिपोर्ट थाने में दर्ज नहीं हुई वो भी, जिसका घर और बाहर शोषण होता रहा वो भी, फीस वृद्धि से पीड़ित छात्र भी, भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता भी, बेरोजगारी से त्रस्त पीड़ित जन भी। मीडिया, फिल्म इंडस्ट्री, शैक्षणिक संस्थान हर वर्ग के लोगों को सोशाल मीडिया ने मंच प्रदान किया जिसे सोशल मीडिया के आने से पहले की एक मंच नहीं मिल पाता थी सोशल मीडिया ने सही मायने में उसको मंच ही नहीं दिया बल्कि उस जनता का पक्ष भी रखा और संस्थाओं और सरकार के समक्ष चुनौती बनकर खड़ा हो गया। इसने देश की विविधता में भी एकता को बनाए रखा। देश के कोने-कोने से उठने वाली आवाज़ों को ज़मीन प्रदान की। 16 दिसंबर 2012 के सामूहिक बलात्कार की शिकार निर्भया की खबर को सोशल मीडिया ने आंदोलन में बदल दिया। सरकार को मजबूर होना पड़ा और सख्त से सख्त कानूनों को बनाया गया। आरोपियों के केस की जल्द सुनवाई हो सकी। निर्भया कोष बनाया गया। इसी तरह पंजाब की दलित बाल गायिका गिन्‍नी माही का विडियो भी खूब वायरल हुआ।9कितनी ही कविता, गीत, नृत्य घटनाएँ यहाँ वायरल हुईं, कितने आमजन यहीं से विशेषजन(सेलेब्रिटी) बन गए। सोशल मीडिया ने जनपक्षधर सरकार बनाने में योगदान दिया साथ ही जो सरकारें जनविरोधी नीतियों के साथ काम करती हैं उन सरकारों को हटाने में भी सोशल मीडिया की अग्रणी भूमिका रही है।

 

आज़ादी के बाद से ही जल, जंगल और ज़मीन को लेकर कितने सारे आंदोलन होते रहे लेकिन मुख्यधारा की मीडिया ने चयनधर्मिता दिखाते हुए इन खबरों को हाशिये की खबर समझ हुए नकार दिया। सोशल मीडिया को इसलिए भी हाशिये का हथियार कहना चाहिए कि यह अपने हक की आवाज़ के लिए और शोषण की खिलाफ़त के लिए मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर नहीं रहा इसने मुख्यधारा के मीडिया के सांस्थानिक ढाँचे को तहस नहस कर दिया। ये हाशिये के लोग आखिर हैं कौन, और आज़ादी के इतने सालों बाद भी ये हाशिये का जीवन जीने के लिए क्यों अभिशप्त हैं? सोशल मीडिया इस सवाल का जवाब बनकर आया। आज़ादी के बाद भी हमारे समाज में विषमता व्याप्त रही। जाति, धर्म भाषा लिंग के आधार हम बँटते रहे। विषमता की अधिकता ने जनता की अपेक्षा की। यह जन गाँधी का वो अंतिमजन है जिसका ज़िक्र हमने ऊपर किया। हाशिये की आवाज़ों को दबाना सत्ता और संस्थाओं का मूल चरित्र होता है। हाशिये की आवाज़ों को दबाने के लिए ही सत्ता बहुसंख्यक जनता की नीतिगत उपेक्षा करनी है और यह उपेक्षा सूचनातंत्र को प्रायोजित किए बिना संभव नहीं। इसलिए सूचना के पूरे तंत्र पर कुछ लोग(सत्ता और संस्था) अपना कब्ज़ा जमाकर बैठ जाते हैं। भारतीय समाज की संरचना को समझे बिना सोशल मीडिया के चरित्र को नहीं समझा जा सकता। भारतीय सामाजिक संरचना में वर्ग, लिंग, जाति, धर्म, भाषा आदि की जो विषमता मौजूद है उसमें ताकत और वर्चस्व ही मुख्यधारा में रहा। सोशल मीडिया ने समाज की इस संरचना में जो सबसे बड़ा बदलाव किया वो इस वर्चस्व के केंद्रीकरण के ध्वस्तीकरण में निहित है। सोशल मीडिया के होने से हाशिये का लोक मुख्यधारा में सक्रिय हस्तक्षेप करने लगा। जिसमें पहले सत्तासीन या वर्चस्वशाली शक्तियाँ ही हस्तक्षेप कर सकती थी वहाँ हाशिये के समाज को एक विकल्प दिया। सोशल मीडिया ने सत्ता प्रतिष्ठानों के समक्ष विपक्ष की भूमिका निभाई।

 

एंड्रायड फोन के आने के बाद मध्यवर्ग और हाशिये का समाज ने सत्ता प्रतिष्‍ठानों से इतर अपनी आवाज़ों को उठाने लगे। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़े गए अन्‍ना आंदोलन से सोशल मीडिया की ताकत को समझा जा सकता है। तरह-तरह के हैशटैग चलाकर इन आवाज़ों को बुलंद किया गया मैं भी अन्ना, जस्टिस फोर निर्भया वायरल हो सत्तातंत्र पर दबाव डालने लगे इस तरह सोशल मीडिया ने एक दबाव समूह का निर्माण भी किया। सोचिये अगर सोशल मीडिया न होता तो कितनी ही आवाज़ें दम तोड़ चुकी होतीं। चाहे मध्यप्रदेश का जलसत्याग्रह हो, अन्‍ना आंदोलन हो या निर्भया आंदोलन, विश्‍वविद्यालय में फीस वृद्धि, जेएनयू, रोहित वेमूला, यूजीसी ऑक्यूपाई, पिंजरा तोड़ या मीटू आंदोलन, इन सब घटनाओं-दुर्घटनाओं के खिलाफ़ अगर आंदोलन खड़ा हो सका तो इसमें सोशल मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मीटू अभियान के जरिए सोशल मीडिया ने उन स्त्रियों को वाणी दी जो अब तक यौन उत्पीड़न की पीड़ा को मानसिक स्तर पर झेलती आ रही थीं। देखा-देखी बहुत सी महिलाएँ अपने अनुभव और पीड़ा को साझा करने लगीं। इससे उन सफेद कॉलर लोगों के नकाब उतरने लगे और इनमें हर वर्ग की महिलाएँ थीं पढ़ी-लिखी, संभ्रांत परिवारों की महिलाओं की संख्या इसमें अधिक थी। सोशल मीडिया ने एक स्तर पर हाशिये के लोगों की आवाज़ को बुलंद किया वहीं दूसरी ओर सत्ता को चेताया कि अब उसे लोगों के हित के लिए काम करना होगा। सोशल मीडियाने हर व्यक्ति के भीतर की पत्रकारिता को जगा दिया। एक फोन से वह घटनाओं को कैद करने लगा कितनी ऐसी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, जिनके बाद सरकारी तंत्र को काम करने के तरीको में बदलाव करना पड़ा।

 

सोशल मीडिया और जनसरोकार

सोशल मीडिया ने एक ओर जहाँ हाशिये की आवाज़ों को वाणी दी और सामाजिक न्याय के लिए जमीन तैयार की वहीं जनसरोकार और जनपक्षधर नीतियों को भी मंच प्रदान किया। देश के विभिन्‍न विश्‍वविद्यालयों में उठने वाले आंदोलनों को सोशल मीडिया ने एक मंच पर ला खड़ा किया एक विश्वविद्यालय के छात्र के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के साथ पूरे विश्वविद्यालय के छात्र जुड़ने लगे। जामिया-जेएनयू की तोड़फोड़ और पुलिस कार्यवाही की घटनाएँ हों, दिल्ली विश्वविद्यालय में एडहॉक टीचर्स का आंदोलन, फैलोशिप बंद होने पर यूजीसी ऑक्यूपाई का आंदोलन तमाम जनसरोकारी मुद्दों पर सोशल मीडिया ने छात्र शिक्षकों को न केवल मंच प्रदान किया अपितु उन्हेंवो हथियार भी दिया जिसके तहत सत्ता या विश्वविद्यालय के अधिकारियों को घुटने टेकने पड़े। एडहॉक टीचर्स के आंदोलन को भी हैशटैग वी एडहॉक वॉन्ट अपोइन्टमेंट से वायरल किया। रोहित वैमूला की आत्महत्या को सोशल मीडिया ने सांस्थानिक हत्या का नाम दिया। ये वो मुद्दे थे जिसे मुख्यधारा का मीडिया या तो दिखा नहीं रखा था या सत्ताके पक्ष में इन मुद्दों की नकारात्मक छवि गढ़ रहा था। मुख्यधारा की उपेक्षा से इन खबरों को हाशिये पर डालने का काम किया गया सोशल मीडिया ने हाशिये की इन खबरों को मुख्यधारा की खबर बना दिया। सोशल मीडिया न होता तो सतातंत्र के लिए उठने वाली यह जनाक्रोश की ऊर्जा दबा दी जाती और जाने कितने रोहित वैमूला ऐसे सामाजिक सांस्थानिक शोषण के शिकार होते रहते।10 इसी तरह बी.एच.यू की उत्पीड़न झेलती लड़कियों की खबर जो देखते ही देखते वायरल हो गयी और सारे देश के छात्र उनके समर्थन में आ गये और वी.सी को हटना पड़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय के वी.सी को भी हटना पड़ा। जिसका कारण शिक्षकों और छात्रों के लगातार होते आंदोलनों की सोशल मीडिया पर प्रसारण में निहित है।


सोशल मीडिया ने इस दंभ पर भी प्रहार किया कि सत्ता तक बात केवल बड़े शहर या महानगरों के लोग ही  पहुँचा सकते हैं। सोशल मीडिया ने दूरदराज के लोगों के अंदर ये विश्‍वास भरा कि उनके काम और आवाज़ भी मुख्यधारा का हिस्सा बन सकती है। हाल ही का किसान आंदोलनया शाहीनबाग का मामला हो या और भी कई मुद्दे, जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया एक प्रोपेगैंडा की तरह चला रहा था सोशल मीडिया ने न केवल वास्तविकता और जमीनी पत्रकारिता कि बल्कि एक ही खबर के कई पक्ष उभारे। उसने हर पक्ष की बात सुनी और उसे बोलने का मौका दिया। मुख्यधारा का मीडिया जहाँ सिर्फ बोलता है सोशल मीडिया सभी को बोलने का मौका देता है। जाहिर है लोक इस सोशल मीडिया के द्वारा बोलता है। चुनावी कवरेज हो या कोई आंदोलन आज बड़े पत्रकारों से ज्यादा लोग छोटे या क्षेत्रीय पत्रकारों को देखना पसंद करते हैं इसका एक कारण यह भी है कि जहाँ मुख्यधारा का मीडिया अपनी ओबी वैन से बाहर नहीं निकलता, सोशल मीडिया गली-कूचे, रहड़ी पटरी वालों, गटर के पानी से भरी गलियों मे अपना छोटा सा कैमरा लेकर उतर जाता है। यह ताकत पत्रकारिता और मीडिया को और मजबूती देती है।

 

सोशल मीडियाः सत्तातंत्र का साधन

एक अर्थ में सोशल मीडिया जनसरोकारों, जनपक्षधरता का नाम है, हाशिये के लोगों की आवाज़ है, लोकल को ग्लोबल बनाने का नाम हैं। वहीं दूसरी ओर यह एक अप्रामाणिक और ट्रोलिंग का औजार भी है। एक अर्थ में यह दोधारी तलवार है जिससे कभी कभी स्वयं की गर्दन भी कट सकती है। दुष्प्रचार, चुनावी परिणामों को प्रभावित करने, अफवाह दंगे फैलाने आदि का बहुत तेजी से प्रसार करने में यही सोशल मीडिया सक्षम है। इसकी खूबी ही इसकी सबसे बड़ी सीमा है। इस पर किसी तरह का कोई सैंसर नहीं है, कोई लगाम या फिल्टर यहाँ काम नहीं करता। उस पर सबसे ज्यादा दुखदायी ये है कि देश में अनपढ़ और अविवेकी लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। जो धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर बँटे हुए हैं। सोशल मीडिया ऐसे लोगों के हाथ में यूँ है जैसे किसी बंदर को बंदूक थमा दी गयी हो। जैसे लोगों ने इसे अपने पक्ष में इस्तेमाल किया सत्तातंत्र भी इससे अपना उल्लू सीधा करता है। जिसका कारण ये अनपढ़, अविवेकी और धार्मिक व जातिगत उन्माद से ग्रस्त भीड़ है। यही भीड़ सत्ता के ट्रॉल में कब परिवर्तित हो जाती है, उसे स्वयं पता नहीं चलता।वस्तुतः जिस देश में अशिक्षा, बेरोजगारी, धार्मिक जातिगत विभेद जैसी चुनौतियाँ व्याप्त हों, वहीं सोशल मीडिया आपके भीतर के खोखलेपन को बड़ी गहराई से उजागर करता है, जिसे सत्ता चतुराई से अपने पक्ष में उपयोग कर डालती है। शिक्षा रोजगार को बर्बाद करते हुए नौजवानों की एक अविवेकी भीड़ का सृजन, और तमाम जरूरी मुद्दों से अपना पिंड छुड़ाते हुए इनसे अपना हाथ खींचना आज सत्ता का सबसे बड़ा ध्येय है, जिसके माध्यम से सत्तातंत्र छद्म विमर्श रचने में भी सफल होता दिख रहा है।11


इसलिए सोशल मीडिया अपनी तमाम खूबियों के बावजूद जब सत्तातंत्र का साधन बन जाता है तब देश बँटने लगता है। विविधता को एकता में बाँधने का जो सूत्र हमें संविधान से मिला सत्तातंत्र का साधन बनने के बाद वह बँटता है। सत्ता अपने लाभ के लिए ट्रॉलर्स की पूरी इंडस्ट्री तैयार करती है। ट्रॉलर्स को ट्वीट और पोस्ट करने के पैसे दिए जाते हैं। सत्ता सोशल मीडिया के अर्थशास्त्र को इतनी बारीकी से समझता है और इसे अपने ध्येय के लिए पूरा करता है। राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक पूरा उद्योग तैयार होता है, जो फेक कंटेंट, फेक न्यूज़ को ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करता है। इस फेक कंटेंट और फेक न्यूज़ की बाढ़ से जो लोक इस सोशल मीडिया को अपनी रक्षा का हथियार समझ रहा था वह स्वयं पर ही हमला करने लगता है। यह काम सत्ता इतने प्रायोजित तरीके से करती है कि जब तक समझ में आता है झूठ अपना काम कर चुका होता है। झूठ की बार-बार की आवृत्ति झूठ को अविवेकी भीड़ के सामने सच साबित कर देती है और उसके बाद यह भीड़ इसी झूठ को सच मान इसका प्रचार प्रसार करती है। यह झूठ इतना ताकतवर होता है कि सच इसके आगे बौना हो जाता है। यह गाँव, कस्बों और शहरों का माहौल खराब कर देती है। चुनावी समीकरणों को बदल देती है। लोक के लिए जो सोशल मीडिया सत्ता के सामने काउंटर नैरेटिव खड़ा करता है वही सत्ता की कठपुतली बन अपने नैरेटिव गढ़ने लगता है।  जिस सोशल मीडिया को लोग राजा मान बैठे थे वह जब सत्तातंत्र की कठपुतली बन जाता है तब आप किसी सत्ता के अधीन नहीं बल्कि तकनीक के अधीन होते हो। फैंटेसी में इंसानों के मशीनों का गुलाम बनने की जो परिकल्पनाएँ निर्मित होती हैं वो सही जान पड़ती है क्योंकि कहीं न कहीं हम तकनीक के गुलाम हुए जा रहे हैं। हमे गलतफहमी है कि हम सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं सच तो यह है कि सोशल मीडिया के द्वारा सत्ता अपना गणित सीधा कर रही है और हमारा इस्तेमाल हो रहा है। लोक को अविवेकी भीड़ में बदला जा रहा है। पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस लोकतंत्र के द्वारा हम शक्ति प्राप्त करते हैं वही लोकतंत्र जब भीड़तंत्र में बदल जाता है तो सबसे पहले सत्ता के भीतर बैठ लोगों के लिए समस्या बन जाता है। सोशल मीडिया को इसीलिये हम दोधारी तलवार कह रहे हैं चूँकि एक धार में यह लोकतंत्र को मजबूत करता है तो दूसरी धार से ये लोकतंत्र को कुंद कर देता है और लोक को भीड़ में रूपांतरित कर भीड़तंत्र में बदल देता है। ये इसका इतना बड़ा दोष है कि इसका खामियाज़ा सारे राष्ट्र को भुगतना पड़ता है। जिस जनाक्रोश को लोक एकसूत्र में पिरोता है उसी को विघटित कर सत्ता विभेद पैदा करती है। वॉल्टर लिपमैन ने अपनी प्रसिद्ध किताब में सच, खबर और निष्कर्ष में असमानता देखते हुए कहा है किलोग यथार्थ संसार की घटनाओं या समाचारों पर नहीं, बल्कि उस मिथ्या बिंब या तस्वीर के आधार पर अपने निष्कर्ष तैयार कर प्रतिक्रिया देते हैं जो हमारे दिमाग में बनायी गयी है।12


लिपमैन के इस कथन में झूठ, प्रोपागैंडा और फेक न्यूज़ की उस प्रतिध्वनि को आसानी से सुना जा सकता है जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया।सत्तातंत्र के हाथों में जाने के बाद यह सोशल मीडिया सत्ता के लिए काम करने लगता है। एक नये रूप में सोशल मीडिया सत्ता के संप्रेषण के रूप में काम करता है। जिस तरह लोक अपनी बात केंद्र तक पहुँचाता है यह सत्ता द्वारा बोले गए झूठ को हाशिये तक। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दल जनता से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग करते हैं। सत्ता सोशल मीडिया के द्वारा नये विमर्श ही नहीं रचती अपितु विभिन्न हैशटैग जैसे पाँच साल केजरीवाल, अबकी बार मोदी सरकार आदि के द्वारा अपने लिए माहौल तैयार करती है। 2010 से पहले जो सत्तातंत्र प्रचार के लिए पारंपरिक मीडिया पर ही निर्भर था वह अब सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी, मुख्यमंत्री केजरीवाल आदि सभी नेता सोशल मीडिया द्वारा अपने जनाधार तैयार करते हैं।

 

सत्ता लोक के लिए होनी चाहिए पर वह लोकविमुख होने का काम करती है और लोकोन्मुख होने का दिखावा। लोकसत्ता जितनी लोकतंत्र के लिए जरूरी है उतना ही सत्तालोक तानाशाही के लिए। जब भी सत्ता लोक को अपने अधीन रखकर शासन करना चाहेगी तानाशाही की संभावनाएं बलवती होगी। सत्ता इस काम के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग करती है। यह सोशल मीडिया सत्ता की थीसिस है जिसकी एंटी थीसिस लोक तैयार करता है। लोक इसी सोशल मीडिया के द्वारा सत्ता के भीतर ये दंभ कभी नहीं आने देगा कि सत्ता अनश्‍वर है। सत्ता की एक्पायरी होती है लोक जीवंत होता है। लोक के बिना सत्ता की कल्पना नहीं हो सकती। इस तरह लोक और सत्ता की निर्मिति को सोशल मीडिया प्रबंधित करने की कोशिश करता है। पर होना यह चाहिए कि सत्ता लोकोन्मुख हो, लोकहित के लिए सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म का प्रयोग करे। और जनता को चाहिए कि वह  सोशल मीडिया जैसे महत्त्वपूर्ण और प्रभावी माध्यम को अपने और राष्ट्रविकास के काम में लगाए।

 

संदर्भ :

 

  1. https://en.wikipedia.org/wiki/Internet_in_India देखा गया 22.01.2022, 11.09 बजे पूर्वाह्न
  2. https://dot.gov.in/hi/data-servicesसंचार मंत्रालय (दूरसंचार विभाग), भारत सरकार की वैबसाइट से साभार, देखा गया 22.01.2022, 11.15 बजे पूर्वाह्न
  3. https://hindi.webdunia.com/it-news/internet-history-in-india-vsnl-plan-vsnl-internet-plan-117081600064_1.html देखा गया 22.01.2022, 11.45बजे पूर्वाह्न
  4. मीडिया समग्र-10 चतुर्वेदी, जगदीश्वर, स्वराज प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2013, पृष्ठ 27
  5. मीडिया समग्र-10 चतुर्वेदी, जगदीश्वर, स्वराज प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2013, पृष्ठ 27
  6. https://www.trai.gov.in/hi देखा गया 22जनवरी 2022, 02 बजे अपराह्न
  7. https://findly.in/facebook-users-in-india/ देखा गया 22 जनवरी 2022, 2.12 बजे अपहराह्न
  8. हंस मीडिया विशेषांक (सं.) कुमार, विनीत; रविकांत सितंबर 2018 पृष्ठ 110
  9. सोशल मीडिया का साहित्य में बदलता स्वरूप (सं.) सिंह, आरती ठाकुर, विभा; संस्करण 2018 स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 112
  10. देखें जनतंत्र के नए मंच यादव, लक्ष्मण हंस सिंतंबर 2018 सं.) कुमार, विनीत रविकांत पृष्ठ 112
  11. देखें लक्ष्मण यादव का लेख जनतंत्र के नए मंच हंस (सं.) कुमार, विनीत: रविकांत पृष्ठ 113 सितंबर 2018 अक्षर प्रकाशन, दिल्ली
  12. Public Opinion;  Lippmann, Walter;  Dover Publishing, Mineola, New York 2004 page no. 194

 

डॉ. तरुण, सहायक प्रोफेसर (हिंदी)

शिवाजी कॉलेज (दि.वि)

dr.tarundu@gmail.com, 9013458181 , 8700318608



 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) मीडिया-विशेषांक, अंक-40, मार्च  2022 UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक-द्वय : डॉ. नीलम राठी एवं डॉ. राज कुमार व्यास, चित्रांकन : सुमन जोशी ( बाँसवाड़ा )

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