संस्मरण : मीडिया की मंडी और अध्यापक की घंटी - डॉ. मोहम्मद हुसैन डायर

ीडिया की मंडी और अध्यापक की घंटी

 - डॉ. मोहम्मद हुसैन डायर

 

बेखबरी बहुत बुरी हुआ करती है। इस कथन को ध्यान में रखकर हाल के कुछ वर्षों में दुनिया भर के विद्यालयों में विद्यार्थियों को संचार के साधनों के बारे में विशेष रुप से फोकस किया जा रहा है। देश और दुनिया की जानकारियां भावी पीढ़ी से दूर न रह सके, इस हेतु भी व्यवस्थागत प्रयास मीडिया को लेकर हो रहे हैं। पर क्या मीडिया के संसाधन सभी के पास समय पर पहुंच पाए हैं? क्या सभी को उपलब्ध हो पाए हैं? समाज की क्या धारणा है?कोरोना काल ने कैसे इस विषय को प्रभावित किया है? क्या भावी पीढ़ी को इसकी समुचित शिक्षा दी जा रही है?इसके अलावा परंपरागत सूचना भेजने के साधन, प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,वेबपोर्टल और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों से भरी मीडिया की मंडी के भीतर क्या सूचना जन सरोकारों को ध्यान में रखकर परोसी जा रही है? या फिर इस मंडी में जो ऊंचे दाम की बोली लगाता है उसी आधार पर खबर तय कर आमजन तक भेजी जा रही है?ऐसे प्रश्नों की फेहरिस्त लंबे समय से परेशान कर रही थीं।

 

ऑनलाइन जॉइनिंग करवाते वक्त स्कूलइंचार्जबाबूलाल जी बार-बार डोंगल को इधर-उधर कर रहे थे। कभी बाहर जातेतोंकभी भीतर।डोंगल को कचोरी की तरह रख करकी बार हाथ को इधर-उधर करते। पूछने पर बताया, “यहां कोई सा भी नेटवर्क ढंग से नहीं आता है।जियो ही थोड़ा बहुत सही चलता है। वह भी आज न जाने क्यों परेशान कर रहा है।” उत्तर के बाद फिर से शुरू हुआडोंगल के साथ दंगल। काफी मशक्कत के बाद ऑनलाइनजॉइनिंग हो पाई।जॉइनिंग  की खुशी को जब कॉल लगाकर दूसरे दोस्तों से शेयर करना चाहा तोमोबाइल के नेटवर्क गायब। “गुरु! मनोहरगढ़ में आइडिया की सिम में नेटवर्क तो टावर पर चढ़ने के बाद ही आएंगे।”बाबूलाल जी ने फिरका कसा। ज़िला हेडक्वाटर से मात्र पांच किलोमीटर पर ये हाल।पर यह तो पहला दिन है।

 

अगले दिन प्रार्थना के पहले अखबार तलाशा तो उसका कहीं दूर-दूर तक पता नहीं। पूछने पर मालूम हुआ कि विद्यालय में अखबार नहीं आता है। कुछ समय पहले आता था, पर जब कुछ ‘असली मास्टर साहब’ कक्षा में जाने की बजाय अखबार पढ़कर वक्त काटने लगे तो बंद करवाना पड़ा।तो फिर बच्चे क्या पढ़ते हैं?”मेरे इस बचकाना प्रश्न पर साथियों ने बहुत उदासी से जवाब दिया, “बच्चे कोर्स की किताबें पढ़ ले वही बहुत है। देश और दुनिया की खबर इनके किस काम की। इनको तो सिर्फ सोयाबीन की रोपाई और उसकी कटाई की मजदूरीके भाव से मतलब है जो नीमच नाके (मजदूर चौराहा) पर खड़े होकर पता चल जाता है। जो इनसे संतुष्ट नहीं होते हैं, वेजोधपुर फोन लगाकर वहां मजदूरी का भाव मालूम कर लेते हैं।डायर साहब! यह यहाँ का कड़वा सच है।”दिल बैठ गया।

 

कुछ दिनों के बाद जब विद्यार्थी के मुंह लग गया तो विषय संदर्भितफिल्मों के बारे में चर्चा की। वे मेरा चेहरा देखने लगे। मैंने पूछा क्या तुम टीवी नहीं देखते हो? पूरी कक्षा में दो-चार हाथ को छोड़कर किसी के यहां टीवी नहीं थी। स्मार्ट फोन सिर्फ8-10घर को छोड़कर किसी के पास नहीं मिलेगा। लड़कियों के पास होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।जनसंचार के माध्यम वाली किताब बिना अखबार, पत्रिका, टीवी और इंटरनेट के कैसे पढाऊ? यह प्रश्न संस्था प्रधान के सामने रखा। उनका जवाब था,“किताब से पढ़ाइए। यह परंपरागत तरीका है। यहां के लोगों को भी ऐसे साधनों के बारे में कोई विशेष परिचय नहीं है।”

 

क्या करूं? व्याख्याता के पद के लिए कंपटीशन हेतु जो मास कम्युनिकेशन पढ़ा,उसे भूल जाऊं या फिर विकल्प तलाश करू? इस उलझन में उलझा दूसरे रास्ते की ओर बढ़ चला। साथी बाबूलाल जी और दिनेश जी के सामने अखबार शुरू करवाने की बात रखी तो उन्होंने स्वीकार कर ली‌। अब अखबार का पाठ सुबह की प्रार्थना सभा में होने लगा। कुछ विद्यार्थियों के पल्ले पड़ रहा था। कई विद्यार्थी मंच पर विचार रखने की झिझक भी दूर करना सीखने लगे। कक्षा के भीतर मास कम्युनिकेशन से जुड़े हुए विषयों को पढ़ाने के लिए लैपटॉप का सहारा लिया। आपको बता दूं कि मनोहरगढ़प्रयोगशाला में आईसीटीलेब फरवरी,2019 में आई थी। इसलिए शुरुआती दौर में लैपटॉप के माध्यम से ही विभिन्न प्रकार की वेबसाइट,न्यूज़ चैनल, टीवी न्यूजडिबेट और पत्रकारिता से जुड़ी शब्दावली से उनका परिचय करवाने का प्रयास किया। यह क्लास कुछ ज्यादा रोचक होने लगी। कारण वही है, यानी जहां घरों में टीवी, अखबार और मोबाइल को लेकर कोई जागरूकता नहीं है, ऐसे में लैपटॉप पर दिखाए जाने वाली सामग्री उनके लिए बिल्कुल नई थी। ‘अध्यापकी के संस्मरण’ भाग-एक में यह बताया जा चुका है कि साथी सत्यपाल जी बता रहे थे कि कई विद्यार्थियों ने अपनी जिंदगी में पहली फिल्मइसी लेपटॉप पर देखीहोगी।

 

शुरू-शुरू में सप्ताह के दो दिन लैपटॉप के माध्यम से कोई प्रोग्राम देखने और उसे समझने के लिए तय हो गए। कक्षा 11 के शागिर्द गोविंद, दिलीप और जगदीश (लाला) पढ़ने में तो कुछ खास नहीं थे, पर इस कार्य में मजबूत सहयोगी बने। फरवरी में जब आईसीटीलेब आई तो प्रधानाचार्य जी ने मुझे इसका प्रभारी बनाया। यह मेरे लिए खुशी की बात थी।पर यह खुशी क्षणिक थी।आईसीटीलैब का प्रभार संभालते वक्त एक कार्मिक साथी ने कहा,“डायर साहब! अब आपके गले में घंटी बंध गई है। इन्हें अलमारी में बंद रखने में ही आपकी भलाई है। वरना चोर उड़ा ले जाएंगे।”कल परसों का ये मास्टर सचमुच में डर गया।स्कूल के इतिहास में कंप्यूटर चोरी की घटनाएं भी हुई है। पांच कमरों के विद्यालय में जगह की भी कमी थी। भला ऐसी स्थिति में आईसीटीलैब जैसे ‘नए चोंचले’  के लिए जगह कहाँ?तो साथ यह रहा किमैं अलमारी में बंद आईसीटीलैब का प्रभारी जुलाई,2019तक बना रहा।

 

मनोहर गढ़ प्रयोगशाला का स्टाफ पैसेके मामले में काफी उदार था। अक्सर हर कार्य में दिल खोल कर अपनी जेब स्वेच्छा से जेबढीलीकरता और आनंद लेता।सुरक्षा के लिए स्टाप साथियों ने अपनी जेब से 52 हजार रुपये एकत्र कर कैमरेंलगवाए। सभी साथियों ने मजदूर की तरह काम कर स्कूल का सामान जमाया।धूमधाम से कंप्यूटर लगाए गए।पर यहां पर भी कमरों की समस्या आ खड़ी हुई। 684 विद्यार्थियों के लिएनौं कमरे हाथ में आए। एक में पुस्तकालय +कबाड़ + स्टाफ रूम, दूसरे में आईसीटीलैब + कार्यालय+प्रिंसिपल रूम। पीछे बचें सात। जुलाई से सितंबर तक कंप्यूटर को अलमारी से केवल4-5दिन बाहर निकालनें की नौबत आई।भारी बारिश के चलते खिड़कियों से पानीके झरने चल रहे थे। पानी बिजली के पलगसे होकर बह रहा था।कोई दुर्घटना न हो जाए, इस डर से कंप्यूटर को ऑन करना उचित नहीं समझा। बच्चों को आईसीटीलेब के नाम पर अलमारियों के दर्शन कर आते रहे

 

इस बीच कक्षा 11 के भीतर एक दीवार को विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति के लिए चुना और नाम दिया, ‘लोकतांत्रिक दीवार’। प्लास्टिक के पुराने बैनर को उल्टा लगाकर इसे बनाया गया। इस दीवार पर बच्चे हर तरह की रचनाएं लगा सकते थे। थोड़े ही समय में यह दीवार चित्रों, संस्मरण,कहानियों, कविताओं और प्रेरक प्रसंगों से भर गई। वैश्विक और क्षेत्रीय घटनाक्रम से परिचय करवाने के लिए कक्षा के भीतर ही एक पुस्तकालय कम वाचनालय रूपी राही मासूम रजा लाइब्रेरी बनाई। यह लाइब्रेरी असल में कबाड़ में पड़े एक बहुत पुराने बक्से पर रंग करके बनाई गई।क़िताबें औरपत्र-पत्रिकाएंके लिएडायर साहब का घर तैयारथाही।विद्यार्थी खाली समय में इस पुस्तकालय में पड़ी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने में बिताते। यह सभी कार्य केवल स्कूल समय तक ही हो पाता। जब कभी भी किसी समसामयिक विषय पर जानकारी देनी होती तो उसके लिए हमारा,‘लैपटॉपजिंदाबाद।’

 

असली मास्टर साहबके प्रश्नथा, ‘बच्चों को अखबार पढ़ने की क्या आवश्यकता है?’इस प्रश्न का उत्तर ढूंढते हुएविचार उभरा की क्यों न रोजगार समाचार हेतु कोई कार्य किया जाए। बच्चों से सलाह मशवरा करके और भीलवाड़ा में रह रहे मित्र नरेंद्र स्वर्णकार के सहयोग से बारहवीं कक्षा के भीतर रोजगार समाचार दीवार बना दी। इस पर अलग-अलग नौकरियों के इश्तिहारचस्पा कर दिए। समय के साथ-साथ यह अपडेट होता रहे, बच्चों कोइसकी जिम्मेदारी दे दी। यह कार्य कुछ समय तक चला और बाद में बंद हो गया क्योंकि वही आदिम संगीत बच्चों के चारों ओर बजने लगा, ‘पहलेकोर्सकी किताबें पढ़ लो।‘

 

वर्षा ऋतु के बाद जब कंप्यूटर शुरू किए गए तो समस्या आ खड़ी हुई कि14 कंप्यूटर पर लगभग 70- 80 विद्यार्थियों से भरी 6-7 कक्षाओं को कैसे पढ़ाया जाए?सबसे बड़ा प्रश्न था कि पढ़ाएगा कौन?यह किसी से छुपा नहीं है कि विद्यालयों के भीतर जो कोर विषय है, उनके शिक्षक भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। जो शिक्षक उपलब्ध है,उनमें से अधिकतर नई तकनीक के प्रति लगाव रखने वाले कम है और जो नई तकनीक से लगाव रखते हैं, उनके पास अलग-अलग तरह के प्रभार है।सैकड़ों तरह की डाकें भी हर महीने अलग से भेजनी पड़ती हैं। अब ऐसे में दो लाख़ साठ हज़ार रुपयेकी इस आईसीटीलैब को बच्चों तक कैसे पहुंचाया जाए? यह एक गंभीर चुनौती थी और मुझे यह कहते हुए किसी तरह की हिचक नहीं हो रही है कि कंप्यूटर जरूर टेबल पर आ गए, पर उनको नियमित रूप से कम ही चलाया गया। यह कंप्यूटर वैसे के वैसे ही धूल खाते रहे। शायद आज भी खा रहे होंगे। पूरे राजस्थान में ऐसे कई विद्यालय होंगे जहां लाखों रुपए केकंप्यूटर विषय अध्यापक, नेटवर्क और कमरों की कमी के चलते धूल खा रहे होंगे। करोड़ों-अरबों के बजट का सही से उपयोग नहीं हो पाया। अब राज्य सरकार ने उनके लिए कंप्यूटर शिक्षक की भर्ती निकाली है। उम्मीद है कि वे कंप्यूटर अब काम में आएंगे। पर यह भी भविष्य के गर्भ में छुपाहै। यह भी डर है कि प्रशिक्षित शिक्षक को कहीं दूसरे काम में तो नहीं लगा दिया जाएगा? तब ऐसी स्थिति में कंप्यूटर फिर से अकेले तो नहीं हो जाएंगे? संसाधनों और विशेषकर मानव संसाधन के लिए जूझते शिक्षा विभाग की लाचारी सभी के सामने है। फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है।

 

कोरोना काल शिक्षा में नए विकल्पों को लाने का काल भी माना जाता है। बड़े जोर शोर से स्माइल प्रोग्राम शुरू किए गए और पढ़ने-पढ़ाने के लिए ऑनलाइन शिक्षा का प्रभाव बढा। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का कार्य भी सरकार द्वारा किया गया। यहां हमें ध्यान देना चाहिए कि ऑनलाइन शिक्षा के लिए उपलब्ध सामग्री केवल शिक्षा तक सीमित न होकर जन संचार के साधनों के रूप में भी प्रयुक्त होती है। ऐसे में क्या विद्यार्थी उनका समुचित उपयोग कर पा रहे हैं? वह उनमें दक्ष है?  सभी के पास समान रूप से यह साधन पहुंच पा रहे हैं? इन प्रश्नों पर हमें विचार करने की आवश्यकता है।

 

पहली तालाबंदी के समयस्वेच्छा से मित्रों के सहयोग द्वारा प्राप्त धनराशि के राशन को पैदल चलते मजदूरों और वंचित लोगों तक पहुंचाने जब गांव, ढाणी और फलो की तरफ़ गया तो वहां की भयावह तस्वीर सामने आई। ऐसे कई घर देखने को मिले जो केवल ढाक के पत्तों से बने हुए हैं जिसे ‘टापरा’ कहा जाता है। उन टापरों के नीचे रहने वाले परिवार आज भी 18 वीं सदी के लोगों की तरह जीवन यापन कर रहे हैं।उनके पास क्या मोबाइल उपलब्ध है? यह प्रश्न करना एक मजाक जैसा है। खाने के लिए जिनके पास दो वक्त की रोटी तक नहीं और जहां इंटरनेट की कवरेज बहुत मुश्किल से आती है, वहां पर मोबाइल जैसे साधन की कल्पना करना बेमानी है। ऐसे कई अभिभावक देखने को मिले जो अपने पास सस्ता सा कीपैड वाला मोबाइल भी नहीं रख पा रहे थे। स्माइल प्रोग्राम के समय बच्चों के घर-घर जाकर ऑनलाइन पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए गया तो ऐसे हालत देंखकरइस योजना पर रोऊं या हंसू? इस उलझन में पड़ गया।शहरों में भी नए-पुराने बेरोज़गार, ग़रीब और झोंपड पट्टी में रहने वालों की दशा ऐसी ही थीं। जहाँ स्माइल प्रोग्राम और देश की ग़रीब जनता दोनों एक दूसरे को‘स्माइल’ मारकर चिढ़ा रहेंथें, वहींडिजिटल इंडिया भारत' पर अट्टाहास कर रहा था।

 

कुछ विद्यार्थी ऐसे भी मिल गए जिनके पासस्मार्टफोन थे। यह वह पीढ़ी है जिन्होंने पहले कभी अखबार, टीवी या फिर रेडियो के बारे में सुना जरूर होगा, लेकिन उपयोग में कभी नहीं लिया। सीधे हाथों में नेटकनेक्टिविटी वाला मोबाइल आ जाना ठीक उसी तरह से हैं जैसे नर्सरी के बच्चे को सीधे प्रोफेसर बना देना। हमें यह समझना होगा कि जिन विद्यार्थियों के हाथ में स्मार्टफोन आया है, वह उसे चलाने का तरीका नहीं जानते हैं। चलाने का मतलब यहां सिर्फ सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर लेना या बातचीत कर लेना भर नहीं है, बल्कि स्मार्टफोन पर उपलब्ध होने वाली सामग्री को अपनी समझ के अनुसार चयनित करके समय के अनुकूल देखना और अपनी पूरी समझ के साथ किसी दूसरे को शेयर करना होता है। कोई वीडियो यापोस्ट किस परिप्रेक्ष्य और कितने तथ्यों के आधार परहै, इसकी गहन जानकारी उपयोगकर्ता को होनी चाहिए। पर यह दुर्भाग्य है कि हमारे देश में स्मार्टफोन भले ही कईं हाथों में आ गया,विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने का सलीका हमने उन्हें नहीं सिखाया। यह बात उम्र, पद और लिंग सभी पर बराबरी से लागू होती है।कई डिग्रीधारी ऊंची, पोस्ट के अधिकारी मिल जाते हैं जो किसी भी पोस्ट की गहन पड़ताल किए बगैर उन्हें दूसरे को शेयर करने को आतुर दिखते हैं। कई शिक्षक, अधिकारी और पेंशनधारी लोग समाज विरोधी और सांप्रदायिक पोस्ट को उत्साह के साथ शेयर करते हैं। विडंबना यह है कि उन्होंने पुस्तकों के अध्ययन और तथ्य को अप्रासंगिक करार दे दिया है।

 

अब ऐसे में विद्यार्थी भला कैसे इसका बेहतरउपयोग कर पाएंगे? यह एक परेशान करने वाला प्रश्न है। आए दिन ऐसी घटनाएं सुनते रहते हैं जिनमें यह जानकारी दी गई होती है कि विद्यार्थी आपत्तिजनक सामग्रियां शेयर करना,पोर्नसाइट देखना और अपने पास उपलब्ध मोबाइल द्वारा आसपास की स्त्रियों के आपत्तिजनक वीडियो बनाना जैसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए अपने स्मार्टफोन का उपयोग कर रहा है। यह स्थिति इसलिए भी आई है कि हमने तकनीक के इस्तेमाल केसाथ-साथ सामाजिकता, संवेदनशीलता की जिम्मेदारी कितनी महत्वपूर्ण होती है, ऐसी समझ हमने नहीं सिखाई। किसी भी आए हुए मैसेज को ठहर कर सोचना और उसके तार्किक पहलू को समझना संदेश की सार्थकता को दर्शाता है। पर मनोरंजन और सूचनाओं के खजाने के भीतर डूबा विद्यार्थी और नागरिक इन सब महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान नहीं दे पा रहा है। उसे तों रोज़ डेढ़ जीबी डाटा को ख़त्म करना हैं।

 

जहां तक मेरीजानकारी है मनोहरगढ़ प्रयोगशाला में स्माइल प्रोग्राम के दौरान किसी भी बालिका के पास मोबाइल नहीं था। छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के पास भी नहीं।स्माइल के आकड़ें विद्यार्थी और व्यवस्था को ‘स्माइल’ कर रहें हैं।स्माइल ग्रुप पर आने वाली सामग्री बहुत कम विद्यार्थी तक पहुंची और जिनके पास पहुंची, उसका उपयोग कर अपना ज्ञान बढ़ाने वाले विद्यार्थी की संख्या मात्र दो-चार फीसदी ही हैं। “मोबाइल देने से लड़कियां बिगड़ जाती है।” इस विचारने भारतीय समाज को बहुत गहराई तक जकड़ रखा है। कुछ मित्र बताते हैं कि उनके विद्यार्थी अक्सर फेसबुकलाइव प्रोग्राम भी स्कूल में करते हैं। मेरे लिए यह संभव नहीं था, क्योंकि एक तो इसके लिए स्टाप साथियों को सहमत करनामुश्किल थाऔर दूसरा मोबाइल का प्रवेश स्कूल में नहीं था। इस पर विडंबना यह रही कि सांस्कृतिक प्रोग्राम के दौरान कोई बच्चा चोरी छुपे मोबाइल से प्रोग्राम को रिकॉर्ड न कर ले, इसकी चौकीदारी भी मुझे ही सौंपी जाती। इसे येदुखीराम मुस्तैदीसे निभाता रहा।

 

इन सब परेशानियों के बीच प्रार्थना में अखबार का पाठ करना,लैपटॉप से समसामयिक वीडियो दिखाना, लोकतांत्रिक दीवार का उपयोग, राही मासूम रजा पुस्तकालय की पत्र-पत्रिकाएं जैसे कुछ जमीनी कार्य कर रूढ़ियों को चुनौती देने का प्रयास करते रहें। मनोहरगढ़ प्रयोगशाला के शिक्षकों को भी यह अक्सर मलाल रहता कि बच्चे मीडिया के मसले पर बहुत पीछे हैं। भौतिक और मानवीय संसाधन की कमी दूरदराज के क्षेत्र के विद्यार्थियों को आज भी देश और दुनिया से काटने में बड़ी भूमिका निभा रही है। 14 टेबलोंपर रखे 14 मॉनिटर बहुत अखरते थे। क्योंकि 72 विद्यार्थियों की 12वीं क्लास साठ जोड़ा फर्नीचर पर बैठती थीं। बाकी 11 कक्षाओं या लगभग छ: सौ विद्यार्थियों को धरती माता का आसन नसीब था। अब जरूर सौफर्नीचर और स्टाफ साथियों ने अपनी जेब ढीली कर तथा विकास के पैसे से मंगवा लिए हैं। पर फिर भी कमरों और शिक्षकों कीकमी भयावह बनी हुई है। ऐसी न जाने कितने विद्यालय की हालत होगी, यह विभाग की साईट से पता किया जा सकता है। समय के साथ साथ बदलाव हो रहे हैं, पर क्या ये बदलाव ऊपर उठाए गए प्रश्नों को ध्यान में रखकर हो रहे हैं?अगर नहीं तो मीडिया की मंडी अध्यापक के लिए गले की घंटी बनी रहेगी

 

डॉ. मोहम्मद हुसैन डायर, व्याख्याता (हिंदी)

रा. उ.मा.वि. आलमास, त. मांडल ज़िला- भीलवाड़ा

dayerkgn@gmail.com, 9887843273


 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) मीडिया-विशेषांक, अंक-40, मार्च  2022 UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक-द्वय : डॉ. नीलम राठी एवं डॉ. राज कुमार व्यास, चित्रांकन : सुमन जोशी ( बाँसवाड़ा )

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