संपादकीय : कुछ मुद्दे, कुछ प्रश्न / नीलम राठी

संपादकीय : कुछ मुद्दे, कुछ प्रश्न


- नीलम राठी


आज मीडिया समाज को बहुत गहराई से प्रभावित कर रहा है। समाज का चिंतन, सोच, रहन–सहन, दैनिक जीवन सबको प्रभावित करने में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। मीडिया अपने सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के त्रिआयामी उद्देश्य को बखूबी पूर्ण कर रहा है। मीडिया का दावा जनपक्षधरता का है। सबके प्रतिनिधित्व का है। मीडिया की विरासत बहुत बड़ी है। उसने पराधीन भारत में जहां अंग्रेजों से स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी है वहीं, स्वाधीन भारत में गरीब, शोषित और वंचित को न्याय दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का स्थान भी उसकी इसी जनतंत्रीय भूमिका के कारण संभव हुआ है। उसने जहां स्वतंत्र भारत के नवनिर्माण में सकारात्मक दृष्टिकोण से जीवन मूल्यों की स्थापना में योग दिया वहीं आपातकाल में बंधनों की जकड़न को भी अनुभूत किया। प्रिन्ट मीडिया से आरंभ हुई मीडिया की यात्रा आज रेडियो, टेलीविजन की मुख्यधारा का पड़ाव पार करते हुए सोशल मीडिया के फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, वाट्स एप, ब्लॉग लेखन से युक्त होकर डिजिटल मीडिया में प्रवेश कर गई है।

 

तकनीकी रूप से रोज नई ऊंचाइयों को छूने की उसकी कोशिश ने जहां नए विकल्प प्रदान किएवहीं, वैचारिक, नैतिक और भाषिक रूप में गिरावट भी आई है। आधुनिकता के मकड़जाल में कहीं न कहीं मीडिया भी अपने को उलझा हुआ पाती है।समकालीन मीडिया परिदृश्य पर बात करें तो वर्तमान समय में कोई भी समाज, सरकार, वर्ग, संस्था या समूह मीडिया की उपेक्षा नहीं कर सकता। मीडिया आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता है।भारत सहित वैश्विक धरातल पर सूचना–संचार, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक चरित्रों में भी पूरी तरह से बड़े परिवर्तन आए हैं। पूर्णत: मुक्त अर्थव्यवस्था, व्यापार, बाजार और वैश्वीकरण के दौर में आर्थिक सुधार प्रक्रिया ने भी जोर पकड़ा है। मीडिया ने जहां अनेक कुरीतियोंबाल विवाह, अशिक्षा-स्त्री शिक्षा, पोलियो को दूर करने में सफलता प्राप्त की वहीं लॉबिंग, पीत-पत्रकारिता, पेड-न्यूज एवं पेड-व्यूज, मीडिया ट्रायलआदि के प्रवेश करने के कारणविकास पत्रकारिता के मुख्य मुद्दों से भटकाव, निष्पक्षता पर चोट, राजनीतिक एवं धार्मिक शक्तियों के दबाव में कुछ विशेष समाचारों की उपेक्षा, हाशिए के लोगों की अनदेखी तो हुई ही है साथ ही ब्रेकिंग न्यूज की खामियों ने भी जोर पकड़ा है।

 

पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में तोप से सीधा मुकाबला करने का सामर्थ्य अखबार में था। आज भी नैरेटिव गढ़ने, खड़ा करने, पक्ष-विपक्ष में वातावरण निर्मित करने, लॉबिंग करने या यूं कहें कि सत्ता के खेल बनाने, बिगाड़ने का पूरा श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह है मीडिया। प्रिन्ट, इलेक्ट्रॉनिक या फिर सोशल मीडिया। मीडिया जनता की सीधे नब्ज पकड़ता है और रोग बता देता है। इतने शक्तिशाली व प्रभावकारी मीडिया को सकारात्मक व सिद्धहस्त होना आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य भी है।

 

भाषा का प्रश्न मीडिया के लिए एक बड़ा प्रश्न है। अखबार में भी आज भाषिक प्रयोग मिश्रित हो गए हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी, लेकिन लंबे समय तकरेडियो अपने कार्यक्रमों में शुद्ध शालीन भाषिक प्रयोग के द्वारा लगभग सभी भाषाओं की जीवंतता बनाए रखने और भाषा संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करता रहा है। भाषिक प्रयोग सांस्कृतिक प्रयोग भी हैं जो भाषा के साथ–साथ संस्कृति को भी जीवित रखते है। रेडियो ने स्वतन्त्रता के पश्चात से आज तक शास्त्रीय गायन और शास्त्रीय नृत्य दोनों के प्रयोगों से उन्हें और उनके कलाकारों को जीवित रखा है अन्यथा आज वे भी संग्रहालय की वस्तु बन गए होते। रेडियो में सांस्कृतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों को आज भी प्रमुखता मिलती है। जल संरक्षण पर आधारित कार्यक्रमपानी की चिट्ठी विद नीलेश मिश्रा, देह दान की दधीचि परंपरा, आँखें हैं अनमोल आदि इसके ज्वलंत प्रणाम हैं। कृषि संस्कृति और राष्ट्र गौरव बोध के विकास में भी रेडियो ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। किसान की बात, जवान की बात, स्त्रियों और बालमन के अनूकूलन के कार्यक्रम आज भी प्रसारित किए जाते है। ऐसी सकारात्मक खबरों ने भी हमारा ध्यानाकर्षित किया। टेलीविजन में प्रसारित धारावाहिकों ने बाल कार्यक्रमों में जिस भाषिक संस्कृति और हिंसा को बढ़ावा दिया वह अवश्य चिंतनीय है। कुछ बाल कार्यक्रम तकनीक एवं वैचारिक रूप से जागरूक करने वाले भी हैं। धारावाहिकों में स्त्री छवि को जिस रूप में चित्रित किया गया है वह चाहे किरदारों में हो या विज्ञापनों में स्त्री छवि में साजिश कर्ता, सैक्स सिंबल का लेबल लगानाऔर उपभोग की वस्तु की तरह परोसना किसी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। मीडिया ने स्त्री विषयक बंधी बंधाई परंपरागत छवि को तोड़करस्त्री की सशक्त, स्वतंत्र सोच और आत्मनिर्भर छवि भी निर्मित की है।

 

मीडिया के केंद्र में राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय मुद्दे भी छाए रहते हैं। रूस–यूक्रेन युद्ध की विभीषिका हो या तालिबानी प्रकरण, इमरान का बाउंसर पर क्लीन बोल्ड होना हो या श्रीलंका का दिवालियापन मीडिया ने सभी का प्रकाशन-प्रसारण कर जनता को सूचना देने में कोई कोर–कसर बाकी नहीं रखी। आज मानव जीवन का प्रत्येक पक्ष मीडिया द्वारा संचालित है। इंटरनेट पर सभी समाचार पत्र, रेडियो और टेलीविजन के सभी चैनल अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराए हुए हैं। आज छोटे-छोटे संगठनों ने भी अपनी वेबसाइट बनाई हुई है। ब्लॉग के माध्यम से आलोचनात्मक बहस अपना सिक्का जमाए हुए हैं। जिन बहसों की अनदेखी मुख्य धारा का मीडिया करता हैं उन तमाम तरह के विचारों की अभिव्यक्ति ब्लॉग लेखन में मिलती हैं। जिससे ब्लॉग लेखन लोकतान्त्रिक विमर्शों को बढ़ावा देते दृष्टिगोचर होते है। हालांकि इनके पाठकों का एक विशेषीकृत दायरा है। वहीं बड़े कॉर्पोरेट घराने और सरकारी एजेंसियां ब्लॉग लेखन प्रारंभ कराकर और पहले से सक्रिय ब्लॉग में अपने हितों के अनुरूप लेखन कराकर लोकतान्त्रिक विमर्शों को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं। मुख्य धारा के केन्द्रीकृत मीडिया से विकेंद्रीकृत सोशल मीडिया तक की यात्रा पर दृष्टिपात और आकलन अतिआवश्यक है जो हमने इस अंक में करने की कोशिश की है।

 

मीडिया के जरिए हमारे सामने संस्कृति का विशुद्ध रूप नहीं आ रहा है। आज हमारे सामने मीडिया में आधुनिकता को परंपरा के साथ मिलाकर प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही है। जिस कारण हमारी मान्यताओं, परंपराओं और संस्कृति पर निरंतर आधुनिकता, बाजार और उपभोक्ता के नाम पर आक्रमण होते जा रहे हैं।बाजार की संस्कृति उपभोक्ता, वैश्वीकरण और उदारीकरण के गठजोड़ पर निर्भर है। उदारीकरण–वैश्वीकरण के इस युग में बाजार ने संस्कृति का भी मूल्य निर्धारित कर दिया है। अब संस्कृति का स्वरूप बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रस्तुत किया जा रहा है। आज सोशल मीडिया मेंयू ट्यूब पर लोक संस्कृति का अक्षय भंडार है। लोक संस्कृति के संरक्षण में यू ट्यूब की भूमिका बेहद प्रभावशाली है। एकेडमिक जगत को भी जगाने, पढ़ाने और शिक्षित करने की सामर्थ्ययू ट्यूब में है। यू ट्यूब पर अनेक विषयों के ज्ञानवर्धक पाठ्यक्रम के अंश उपलब्ध हैं। किन्तु उसी सोशल मीडिया पर अनेक पॉर्न साइट भी उपस्थित हैं जो संस्कृति और समाज को पतन की ओर ले जा रही हैं। नीले जहर का यह कारोबार बच्‍चों, किशोरों और युवाओं के मन पर बहुत बुरा असर डालता है।

 

मीडिया उत्पाद, उपभोक्ता और विज्ञापन उद्योग का एक बाजार विकसित हुआ है जिसमें इन्फोटेन्मेंट नाम का उत्पाद और मोजो नाम का उद्योग आज बड़ी अनुकूल परिस्थितियों में फल-फूल रहा है। इन्फोटेन्मेंट के नाम पर वैचारिक गांभीर्य का पूर्णत: लोप होकर लोकप्रियता के नाम पर विषयवस्तु में स्तरीयता का हलकापन, मनोरंजन के नाम पर राजनीतिक पैंतरेबाजी, हास्य के नाम पर फूहड़पन और क्रॉस मीडिया स्वामित्व के खतरे से संलिप्त अनेक मुद्दे मीडिया के क्षेत्र में आसन्न संकट खड़ा कर रहे हैं। गंभीर राजनीतिक बहसों में भी बुनियादी सवाल और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य नदारद रहते हैं। तमाशा और तू–तू मैं-मैं ही देखने सुनने को मिलता है, क्योंकि दिन-रात चलनेवाले समाचार चैनलों से समाचार की बढ़ती मांग, सबसे पहले समाचार प्रसारण की  होड़ और टीआरपी की अंधी दौड़ नेवर्चस्व की लड़ाई को तो बढ़ाया ही साथ ही मुद्दों से भटकाया भी है।राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे को भी मजा लेने वाले अंदाज में टेलीविजन पर प्रस्तुति से स्थिति बेहद गंभीर हो गई है। मीडिया की इस गैर-जिम्‍मेदाराना भूमिका से चिंतनशील समाज में आज सतहीकरण, विकृतीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास स्‍पष्‍टत: दिखाई देने लगा है जिनका आकलन आवश्यक हो जाता है।

 

खबरों का चयन ही नहीं उनका परिप्रेक्ष्य भी वर्गीय चेतना से तय होने लगा हो तो बात चिंताजनक हो ही जाती है। आंदोलन और धरने पर बैठे लोगों की आपदाएं मीडिया में अपना प्रतिरोध दर्ज नही कर पाती जबकि फिल्मी अभिनेता के इश्क के किस्से को अभिव्यक्ति मिल जाती है। मीडिया निजी पूंजी उद्योग है और समाचार को उत्पाद मान लिया गया है। यही कारण है कि मीडिया घराने संपादक के स्थान पर प्रबंधक की नियुक्ति को प्रश्रय देने लगे हैं। आज भी मीडिया अपनी सकारात्मक भूमिका में भी है किन्तु और अधिक सचेत होकर उसका निर्वहन करे तो किसी भी संस्था, व्यक्ति, समूह, राष्ट्र को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से समृद्ध बनाया जा सकता है।

 

आज हमें मीडिया शिक्षा के द्वारा मीडिया उद्योग, संस्थान और समाज को एक साथ एक सूत्र में पिरोना है। मीडिया संस्थाओं का विकास भी तकनीक और विचार दोनों के ही समन्वय से निर्मित होता है। किसी भी एक पक्ष की अवहेलना इस समन्वय को ध्वस्त कर सकती है। आज मीडिया एजुकेशनसमस्त तकनीक और संचार कौशल को संवारने निखारने में लगीं हैं। ज्ञान की वैतरणी प्रवाहित करनेकी समझ पैदा करने के उद्देश्य ने मीडिया शिक्षा को अपने उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। मीडिया का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जो किसी पाठ्यक्रम का अंश न हो। आज का मीडिया पाठ्यक्रम भारतीय संस्कृति, मूल्य परंपरा के जरिए जहां मीडिया का स्थानीय भारतीय प्रारूप तलाशने की कोशिश का विस्तार है अथवा संस्थानों ने मात्र न्यू तकनीकी ज्ञान देने को ही मीडिया शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नही समझा है? वहीं भारतीय पत्रकारिता का इतिहास पढ़ाते हुए विचार को तलाशने की कोशिश भी जारी है। बहुत ही कम ऐसे संस्थान होंगे जो भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान और वैचारिक समझ विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय विचारको, चिंतकों और दार्शनिकों को पाठ्यक्रम का अंश रखते हो। मीडिया शिक्षा में भाषा ज्ञान एक बड़ा सवाल बनकर उभरा है। भाषा के साथ ही मीडिया शिक्षा के भारतीयकरण हेतु मीडिया शिक्षा में अनुवाद और संचार के भारतीय मॉडल का भी बड़ा महत्व है।इस दिशा में संस्थाओं को प्रयासरत रहना चाहिए। अन्यथा मीडिया शिक्षा के पाठ्यक्रम में भाषा बोध का अभाव भी आज एक बड़ी चुनौती बन गया हैं।

 

ऐसा ही बड़ा प्रश्न भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की समाज में स्थापना का भी है, जिसमें अंतर्निहित कानूनों की समझ, पत्रकारों के लिए आचार संहिता जो अनिवार्य न होते हुए भी अति आवश्यक तो होनी ही चाहिए। मीडिया द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ, कमजोर वर्ग को न्याय दिलाने में प्रतिबद्धता हेतु, संविधान की प्रस्तावना को भारतीय समाज में प्रतिस्थापित करने हेतु, शासन और आतंक के दबाव से मुक्त होकर लेखन के लिए मीडिया अपनी प्रभावशाली भूमिका अदा कर सकती है। ये सच है कि मीडिया को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में विज्ञापनों की अनिवार्य भूमिका है। विज्ञापनों पर मीडिया की इस निर्भरता के कारण ही मीडिया अनेक बार सैद्धांतिक रूप से समझौते करने के लिए भी बाध्य हो जाता है जो नैतिकता की दृष्टि से उचित नहीं होते।

 

पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के प्रति जागरूकता लाने के लिए प्रकृति और पर्यावरण संबंधित खबरों का नियमित प्रकाशन और प्रसारण अत्यंत आवश्यक है। तभी जल , जंगल और जमीन को बचाना संभव होगा। अन्यथा आज मनुष्य ने स्वार्थवश जल, वायु एवं खाद्य सामग्री सभी को दूषित कर लिया है। यह कार्य मीडिया मिशन के रूप में अपनाकर सफलता पूर्वक सम्पन्न कर सकता है।

 

राष्ट्रवादी और मानववादी दृष्टिकोण तो भारत की संस्कृति में सदैव मौजूद रहा है, लेकिन भारतीय मीडिया के चलन को देखकर मीडिया जगत में आज उनकी कमी को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है जैसे मुंबई के ताज होटल पर हमले के दौरान लगातार किया जाने वाला लाइव कार्यक्रम मीडिया में राष्ट्रवादी भावना के अभाव का बड़ा उदाहरण है। आतंकवादी हमलों में आतंकवादियों के चित्रण, पाकिस्तानी पत्रकारों को अपने चैनल पर बुलाकर उनका मत लेने वाला दृष्टिकोण, ये जानते हुए भी कि वे सदैव पाकिस्तानी दृष्टिकोण को ही वरीयता देंगे मीडिया में राष्ट्र और राष्ट्रीयता बोध के घोर दारिद्र्य का सूचक है।

 

इस मीडिया विशेषांक को सातको सात संवर्गों आरोहण, साक्षात्‍कार, नेट-शास्त्र, सरोकार के सवालात, परोक्ष-पाठ, आवाजाही, रेखांकित और कथेतर का कोना में विभाजित किया गया है। ‘आरोहण’ के अंतर्गत के अंतर्गत मीडिया तटस्थता, सामाजिक यथार्थ और मूल्य, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं लोकतंत्र, भारतीय मीडिया और जनपक्षधरता एवं सतत विकास लक्ष्य और प्रभावी मीडिया की भूमिका पर आलेख हैं। साक्षात्कार में मीडिया और मीडिया शिक्षा में निरंतर सक्रिय प्रो. के.जी. सुरेश से समकालीन मीडिया और सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्‍य पर की गई बातचीत शामिल की गई है। ‘नेट–शास्त्र’के अंतर्गत कुल पाँच शोध पत्र वेबमीडिया और हिन्दी, भारत में वैब पत्रकारिता का सिंहावलोकन, सोशल मीडिया के लोकतंत्र में यू-ट्यूब और भारत के यू–ट्यूबर, यू–ट्यूब के नॉलेज वीडिओ का युवाओं पर प्रभाव का अध्ययन, पॉडकास्ट का वर्तमान परिदृश्य: एक अध्ययन सम्मिलित हैं।

 

‘सरोकार के सवालत’ में सोशल मीडिया और स्त्री, समाचार पत्रों में स्त्री विषयक मुद्दे:दशा और दिशा, भूमंडलीकरण, मीडिया एवं स्त्री अस्मिता के प्रश्न, विधि निर्माण को प्रभावित करने में मीडिया की भूमिका 21 वीं सदी में सोशल मीडिया के परिवेश में निजता का संरक्षण: मानवाधिकार के लिए चुनौती, वन्य जीवन पारिस्थितिकी संरक्षण में मीडिया की भूमिका को रखा गया है। परोक्ष-पाठ के अंतर्गत तीन शोध पत्र नवोन्मेषीशिक्षण–अधिगम में मीडिया की भूमिका, शिक्षा में मीडिया की चुनौतियां, भारत में प्रचिलित मीडिया शिक्षण मॉडल और उनके प्रभावों का अध्ययन को सम्मिलित किया गया है। ‘आवाजाही’ के अंतर्गत कुल दस शोध पत्र प्रकाशित किए गए हैं- जिनमें–कविता की खबर : रघुवीर सहाय की कविता और पत्रकारिता, समकालीन कविता और हिन्दी मीडिया, समकालीन हिन्दी गजल और पत्रकारिता, व्यावहारिक आलोचना के विकास में कल्पना पत्रिका का योगदान, सर्वेश्वर दयाल् सक्सेना की पत्रकारिता के विवि‍ध पक्ष, व्यतिरेकी भाषाविज्ञान की उपयोगिता, स्वाधीनता संग्राम में प्रिन्ट मीडिया की भूमिका, मानक अलंकरण की चार–दशकीय यात्रा, 21 वीं सदीं में राजस्थान में हिन्दी लघु पत्रिका आन्दोलन, बच्चों के मनोविज्ञान को प्रभावित करती बाल–पत्रिकाएं प्रमुख हैं। ये आलेख साहित्‍य और पत्रकारिता के मध्‍य एक तारतम्‍य को चिन्‍हि‍त करते हैं।

 

‘रेखांकित’ के अंतर्गत सोशल मीडिया के प्रभाव को असरकारक ढंग से रेखांकित किया गया है। इस संवर्ग में अभिव्यक्ति के जनतंत्र का विस्तार, लोक और सत्ता की वर्चुअल निर्मिति और नैतिकता की कसौटी पर सोशल मीडिया के परिदृश्‍य पर विचार किया गया है। कथेतर का कोना- में तीन रचनाकारों की सक्रियता सहेजी गई है जिनमें मीडिया की मंडी और अध्यापक की घंटी, जिले की चिट्ठी :संचार का सहज स्वर, डियर हिक्की, हिक्की हियरको भी शामिल किया गया है। अपनी माटी के इस विशेषांक में हमने मीडिया एकेडमिक जगत के विभिन्न अध्येताओं के शोध आलेखों द्वारा मीडिया में प्रमुखता से छाए मुद्दे, मीडिया की तरफ उठते सवालों और चुनौतियों को समझने का प्रयास किया है। हमे पूरा विश्वास है कि अपनी समस्त सीमाओं के उपरांत भी यह अंक पाठकों को नई जानकारी देकर उनके ज्ञान को बढ़ाएगा और उन्हें तर्कशील होकर चिंतन मनन करने को भी प्रेरित करेगा।

 नीलम राठी

प्रोफेसर (हिंदी विभाग)

अदिति महाविद्यालयदिल्ली विश्वविद्यालयदिल्ली

 ई मेल : drneelamrathi123@gmail.comसम्पर्क : 9873910379


 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) मीडिया-विशेषांक, अंक-40, मार्च  2022 UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक-द्वय : डॉ. नीलम राठी एवं डॉ. राज कुमार व्यास, चित्रांकन : सुमन जोशी ( बाँसवाड़ा )

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