शोध आलेख :- सम्राट अशोक के कल्याणकारी बौद्ध धम्म का स्वरूप / डॉ. सुरजीत कुमार सिंह

सम्राट अशोक के कल्याणकारी बौद्ध धम्म का स्वरूप
- डॉ. सुरजीत कुमार सिंह

शोध-सार : प्रस्तुत शोध आलेख में सम्राट अशोक के कल्याणकारी बौद्ध धम्म के स्वरूप की चर्चा की जाएगी। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध जीतने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया था और फिर इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए लगा दिया था। जब हम उनके द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप में लगवाए गए, शिलालेखों और अभिलेखों का बहुत गहराई से अध्ययन करते हैं, तो पता चलता है कि सम्राट अशोक के व्यक्तिगत एवं राजकीय जीवन दृष्टि में जितनी अधिक संवेदनशीलता मनुष्यों के प्रति थी, उतनी ही अधिक संवेदनशीलता, दया व करुणा की भावना पशु पक्षियों के प्रति भी थी. अशोक द्वारा लगवाए गए भाब्रू शिलालेख, गिरनार के चट्टान लेख और शहबाजगढ़ी के शिलालेखों के आधार पर इस बात की चर्चा की जाएगी कि उन्होंने कैसे बौद्ध धर्म को समस्त पशु-पक्षियों और प्राणियों के लिए कल्याणकारी स्वरूप प्रदान किया। इन्हीं शिलालेखों में हमें इस बात की भी जानकारी प्राप्त होती है कि अशोक ने मनुष्य और पशु पक्षियों के लिए अलग-अलग चिकित्सालय खुलवाये थे और उन्होंने राजमार्गों पर कुओं को खुदवाया व छायादार वृक्षों को भी लगवाया।

बीज शब्द : सम्राट अशोक, देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी सम्राट, कलिंग युद्ध, बौद्ध धम्म, धर्म विजय, शहाबाजगढी़ शिलालेख, गिरनार शिलालेख, भाब्रू शिलालेख, कल्याणकारी स्वरूप, प्राणी कल्याण, मनुष्यचिकित्सालय, पशु-चिकित्सालय, औषधियॉ।

शोध का उद्देश्य : प्रस्तुत शोध आलेख के लिखने का उद्देश्य सम्राट अशोक के राजकीय व्यक्तित्व को देखना है और साथ ही इस बात की पड़ताल करना है कि क्या वास्तव में अशोक ने एक कल्याणकारी आदर्श राज्य की संकल्पना को पस्तुत किया था? क्या वे बौद्ध धम्म के अनुसार अपने निजी और सामाजिक जीवन में पालन कर रहे थे, क्या उन्होंने एक कल्याणकारी राज्य के स्वरूप को बल प्रदान किया?

शोध प्रविधि: शोध की विश्लेषणात्मक पद्धति।

मूल आलेख: सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धम्म को स्वीकार कर लिया था और फिर सम्राट ने बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार को एक नई गति प्रदान की। इस के अनुसरण में वे बौद्ध धम्म को जनता में लोकप्रिय बनाने के लिए बौद्ध धम्म के सत्य, अहिंसा, दया, करुणा, मैत्री, बंधुत्व और कल्याणकारी स्वरूप को प्रमुखता देते हैं। इसके लिए सम्राट अशोक ने शहाबाजगढी़ के तेरहवॉ शिलालेख लिखवाया है कि कलिंग के विजित होने पर देवताओं के प्रिय की रूचि धर्मपालन धर्म-कर्म और धर्मोपदेश में तीव्र हो गई है। कलिंग विजित कर देवताओं के प्रिय को खेद है। क्योंकि यह विजय कोई विजय नहीं है, इसमें वध, मरण और निष्कासन होता है। युद्ध में आघात, वध और प्रियजनों का निष्कासन होता है[1]  यह सम्राट अशोक की मनोदशा का कारुणिक पीड़ादायक चित्रण है, जिसमें वह पीड़ित प्राणियों की दशा को देखकर आंतरिक तौर पर अशांत हैं। बौद्ध धर्म ही उनको मानसिक शांति और प्राणी कल्याण की भावना से ओतप्रोत जीवन मार्ग दिखाई देता है और वह अपना सम्पूर्ण जीवन प्राणी कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं।

कलिंग युद्ध के मार्मिक दृश्य, सम्राट अशोक को एक क्रूर सम्राट से कल्याणकारी सम्राट के रूप में स्थापित कर देते हैं, जो अपने राज्य की समस्त प्रजा को अपनी संतान की तरह ही मानता है। गिरनार के प्रथम चट्टान शिलालेख में उन्होंने लिखवाया है कि यह धम्म लिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवाई गयी है, कोई भी जीव बलि के लिए नहीं मारा जाएगा[2] गिरनार के ही दूसरे चट्टान शिलालेख में हम देखते हैं कि सम्राट अशोक किस तरह के सामाजिक व कल्याणकारी कार्यों में सलंग्न हैं। इस शिलालेख में उल्लेख है कि देवाताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने सर्वत्र विजय करके मनुष्यचिकित्सा तथा पशु-चिकित्सा और वे औषधियॉ जो मनुष्योपयोगी तथा पशुपयोगी हैं, जहॉं-जहॉं नहीं हैं, सर्वत्र लाई गई और लगाई गईं। जहॉ-जहॉ मूल तथा फल नहीं हैं, सर्वत्र लाए गए तथा लगाए गए। मार्गों में मनुष्यों तथा पशुओं के लिए कूऍ खुदवाए गए तथा वृक्ष लगवाए गए हैं।“[3]

सम्राट अशोक पहले चण्ड अशोक नाम से जाने जाते थे और कहा जाता है कि उन्होंने अपने निन्यानवे भाईयों की हत्या कर राजगद्दी को हथिया लिया था, लेकिन प्रो. राधाकुमुद मुखर्जी इस घटना को तथ्यात्मक नहीं मानते हैं। वे लिखते हैं कि दक्षिण की कथाओं का यह कथन की अशोक ने राज्य के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या की थी, जिसके लिए उसे चंड अशोक कहा गया है, अतिरंजना है। तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ के अनुसार उसने अपने सिर्फ 06 भाइयों का वध किया था।[4]  सच तो यह है कि इन कहानियों में यही दिखलाने का उत्साह है कि बुद्ध की शरण में आने से पूर्व अशोक कितना क्रूर था और उसके बाद उसमें कितना परिवर्तन आ गया।[5]

सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के सबसे बड़े राजाश्रयदाता थे। बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक अपनी युवावस्था में क्रोधपूर्ण स्वभाव के कारण चंड अशोक कहलाते थे। जब वह विदिसा के राज्यपाल नियुक्त हुए, तब उन्होंने वहीं के एक धनी व्यापारी की पुत्री कुमारदेवी से विवाह किया। जब उन्हें पता चला कि उनके पिता महाराज बिंदुसार मृत्यु-शैया पर हैं, तब वह अपने पिता की राजधानी पाटलिपुत्र पहुंचे और अपने भाई को छोड़ उन्होंने सबका वध किया। चार वर्ष तक जनता अशोक से इस तरह नाराज थी कि सम्राट अशोक का राज्याभिषेक जनता के क्रोध की शांति के बाद ही हो सका। सम्राट अशोक के 13 वें शिलालेख से पता चलता है कि उन्होंने कलिंग पर चढ़ाई की और हजारों लोगों को कलिंग युद्ध में मार दिया। इस घटना का उन्हें बहुत अधिक पश्चाताप हुआ और उन्होंने निश्चय किया कि वे अब कोई सैनिक अभियान नहीं करेंगे।

भाब्रू शिलालेख में सात ऐसे अंश मिलते हैं, जो कि पालि साहित्य में भी पाए जाते हैं, सम्राट अशोक चाहते थे कि भगवान बुद्ध के कल्याणकारी उपदेश जनसाधारण तक पहुंचे। अपने राज्यकाल के बीसवें वर्ष वे लुंबिनी वन के उद्यान में पहुंचे, जहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। इस स्थान पर उन्होंने एक विशाल प्रस्तर स्तंभ लगवाया जिस पर एक उत्कीर्ण लेख है कि सम्राट अशोक की इस यात्रा के उपलक्ष्य में वहां रहने वाले लोगों को सम्राट कर देने से मुक्त कर दिया है। इसके बाद वह सारनाथ और बोधगया की धार्मिक यात्रा पर भी गए। सम्राट अशोक का सारनाथ में लगवाया हुआ एक खंडित शिलालेख भी मिला है, जिससे जान पड़ता है कि जो व्यक्ति बौद्ध संघ की एकता को तोड़ने का प्रयास करेगा, उसे बौद्ध संघ से बहिष्कृत करने का आदेश सम्राट अशोक ने दिया था। सम्राट अशोक के राज्य अभिषेक की सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन हम अशोक के शहाबाजगढी़ के तेरहवॉं शिलालेख में देखते हैं कि सिंहासन पर बैठने के आठ वर्ष बाद अर्थात् सन 262 ईसा पूर्व[6] वह अपने राज्ये का विस्तार करने के लिए कालिंग पर आक्रमण कर देते हैं, जिसमें कई लाख प्राणी मारे जाते हैं, असंख्य अपंग हो जाते हैं और असंख्य को बन्दी बना लिया जाता है। यह युद्ध ही चण्ड अशोक को देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी अशोक में बदल देता है।

शहाबाजगढी़ के तेरहवॉ शिलालेख में लिखा है कि सम्राट अशोक के सिंहासन पर बैठने के आठ वर्ष बाद देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा कलिंग जीता गया। डेढ़ लाख प्राणी वहाँ से बन्दी बनाकर बाहर भेजे गये, एक लाख वहॉं मारे गये और उसके कई गुना मर गये। तत्पश्चात् अब कलिंग के विजित होने पर देवताओं के प्रिय की रूचि धर्मपालन, धर्मकर्म और धर्मोपदेश में तीव्र हो गई है”।[7] इसके उपरांत उसके लिए बौद्ध धर्म ही मानसिक शांति और प्राणी कल्याण की भावना से ओत-प्रोत दिखाई देता है और वह अपना सम्पूर्ण जीवन समस्त प्राणी कल्याण के लिए समर्पित कर देता है।

गिरनार के प्रथम चट्टान शिलालेख में अशोक लिखवाता है कि यह धम्म लिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवाई गयी है, जिसमें कोई भी जीव बलि के लिए नहीं मारा जाएगा, न कोई समाज द्वारा ही किया जायगा। बहुत-सा दोष समाज में देवनांप्रिय प्रियदर्शी राजा देखता है। फिर भी निश्चित प्रकार के समाज को ही देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा उचित मानता है। पहले भोजनालय में देवानांप्रिय प्रियदर्शी के प्रत्येक दिन सहस्त्रों प्राणी सूप व्यंजन के लिए मारे जाते थे, पर आज से जब यह धर्मलिपि लिखवाई गई तब से तीन ही प्राणी-दो मोर और एक मृग व्यंजन के लिए मारे जाते हैं, इनमें भी मृग का मारना निश्चित नहीं है। बाद में ये भी तीन प्राणी (मृग का अर्थ यहॉं किसी भी चौपाए पशु से लिया जा सकता है। यह बाध्‍यता नहीं है कि केवल हिरण के लिए इसका प्रयोग किया गया हो। उसी प्रकार मयूर से अभिप्राय पक्षी समुदाय से है, केवल पक्षी विशेष मयूर के लिए ही नहीं है) नहीं मारे जायेंगे”।[8]

गिरनार के दूसरे चट्टान शिलालेख में हम आगे देखते हैं कि सम्राट अशोक अपना राज्य विस्तार करने के बाद किस तरह के सामाजिक व कल्याणकारी कार्यों में सलंग्न हैं देवाताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने सर्वत्र विजय करके-चोल, पाण्‍डय, सत्‍यपुत्र, ताम्रपर्णी, अन्तियोक नामक यवन राजा तथा उस अन्तियोक के निकट जो राजा हैं, सर्वत्र देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने दो चिकित्साओं को स्थापित किया। मनुष्यचिकित्सा तथा पशु-चिकित्सा और वे औषधियॉ जो मनुष्योपयोगी तथा पशुपयोगी हैं जहॉं-जहॉं नहीं हैं, सर्वत्र लाई गई और लगाई गईं। जहॉ-जहॉ मूल तथा फल नहीं हैं, सर्वत्र लाए गए तथा लगाए गए। मार्गों में मनुष्यों तथा पशुओं के लिए कूऍ खुदवाए गए तथा वृक्ष लगवाए गए[9]

इसी चट्टान लेख में लिखा है कि इससे भी अधिक गंभीर देवनांप्रिय के लिए यह है कि जहॉं ब्रहामण, श्रमण या अन्य सम्प्रदाय या ग्रहस्थ रहते हैं, जिनमें अग्रजों की सेवा, माता पिता की सेवा, गुरू सेवा, मित्र, परिचित, सहायक, ज्ञातिजनों तथा दास-भतकों के प्रति सद्व्यवहार और दढ़ भक्ति पाई जाती है। युद्ध में वहॉं आघात, वध और प्रियजनों का निष्कासन होता है। यही सब मनुष्यों की दशा होती है। फिर भी जो सुव्यवस्थित स्नेह वाले होते हैं, उनके मित्र, परिचित और ज्ञातिजन संकट को प्राप्त होते हैं, उनसे उनको आघात होता है। यही सब मनुष्यों की दशा होती है। यह देवताओं के प्रिय के मत में गंभीर है। ऐसा एक भी देश नहीं है, जिसमें रहने वालों का किसी सम्प्रदाय में विश्वास न हो।

सम्राट अशोक कहते हैं कि जितने लोग कलिंग में मारे गये, मरे व बन्दी बनाकर ले जाये गये उनका सौवा या सहस्‍त्रवां भाग भी आज देवताओं के प्रिय के मत में घृणित है। देवताओं के प्रिय के विचार में यदि कोई अपकार करे तो वह क्षम्य है वहॉ तक क्षमा करना संभव है और जो आटविक प्रदेश देवताओं के प्रिय द्वारा विजित उसके राज्य में हैं उन्हें वह अनुनय द्वारा शांत करता है, परिवर्तित करता है तथा अपनी कृपा के अतिरिक्त उन्हें दण्ड देने की अपनी शाक्ति को बताता है। देवताओं का प्रिय उनसे कहता है कि वे अपने पूर्व कर्मों के लिए लज्जित हों नहीं तो नष्टकर दिए जाऍंगे।

देवताओं का प्रिय सभी प्राणियों के अक्षय, संयम, सदाचरण और प्रसन्नता की इच्छा करता है। देवताओं के प्रिय के अनुसार धर्म विजय ही प्रमुख विजय है। यह विजय बार-बार देवताओं के प्रिय द्वारा यहॉं और सभी सीमान्त राज्यों में आठ सौ योजना दूर स्थित अन्तियोक नामक यवन राजा और उस अन्तियोक के अतिरिक्‍त चार राजा-तुलमय (टालमय) अन्तिकेन (अण्‍टीगोनस गोनैटस) मक (मेगास थियास) अलिकसुन्‍दर (इपिरस या कोरिंथ का एलेक्‍जेण्‍डर) और दक्षिण में चोल, पाण्‍डय, ताम्रपर्णी तक की गई है। इसी प्रकार राज्य, प्रदेशों, कम्बोजों, नाभपंक्यिों, भोजों, पिटैनिकों आंध्रों तथा पुलिंदों सर्वत्र देवताओं के प्रिय के धर्मानुशासन का पालन होता है। जिन स्थानों में देवताओं के दूत नहीं पहूँचते, वहॉं भी लोग देवताओं के प्रिय के धर्म का व्यवहार विधान और धर्मानुशासन सुनकर धर्म का आचरण करते हैं और करते रहेंगे। इससे जो विजय प्राप्त होती है वह सर्वत्र पुन: प्रीति देने वाला होता है। धर्म विजय से प्राप्त प्रीति गाढी़ होती है पर यह प्राप्ति छोटी है क्योंकि देवताओं का प्रिय परमार्थ को ही महाफल मानता है। इस निमित्त यह धर्मलिपि अंकित कराई गई कि मेरे पुत्र, पौत्र जो इसको सुने वे नया विजय अभियान (राज्य विस्तार हेतु युद्ध) न करें। अगर उन्हें शस्त्र विजय करना ही पडे़ तो शान्ति और लघुदण्डता का अनुसरण कर उसमें आनन्द लें। वे धर्म विजय को ही विजय माने, वही इहलौकिक और पारलौकिक सुख का कारण है। उद्मम में ही उन्हें आनन्द हो क्योंकि वह इहलौकिक एवं पारलौकिक जीवन के लिए कल्याणकारी होता है”।[10]

इस तरह हम देखते हैं कि सम्राट अशोक कि मानव कल्याणकारी दृष्टि कितनी दूरदर्शी थी, जो आज भी हमको नवीन दिखाई देती है. यह ही नहीं आज भारत की सरकार हो या दुनिया भर के अन्य देशों की सरकारें हों या फिर विश्व वन्य प्राणी संगठन हो जिनकी चिन्ता आज संकटग्रस्त जीवों के प्रति अब जाकर नियमों और कानूनों में बंधकर उनकी सुरक्षा संभव हो पायी है. लेकिन सम्राट अशोक की चिंता इन संकटग्रस्त प्राणियों के प्रति दृष्टि कितनी दूरदर्शी थी, यह हम दिल्ली टोपरा के पाँचवें स्तम्भ लेख में पाते हैं.

जिसमें अशोक लिखवाते हैं कि देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा है कि छब्‍बीस वर्षों से अभिषिक्त  होने पर इन जीवधारियों को मैंने अवध्य घोषित किया है, वे हैं- शुक, सारिका लाल पक्षी, चकवा, हंस, नन्दीमुख (मैना का एक प्रकार), गेलाट, गीदड़, रानी चींटी, कछुई, अस्थिरहित बिना कांटे की मछली, वेद वेयक, गंगा-कुक्‍कुट, संकुजमत्स्य, कछुआ, साही, नपुंसक शश, वारहसिंगा, सॉंड, गोधा, मग, सफेद कबूतर, ग्राम कपोत और सभी प्रकार के चौपाए जो न उपयोग में आते हैं न खाए जाते हैं। गर्भिणी अथवा दूध पिलाती हुई बकरी, भेडे, शकूरी अवध्य बताई गई है इनके बच्चे भी जो एक महीने के होते थे वे भी। कुक्‍कुट की बधिया नहीं करनी चाहिए। सजीव भूसी नहीं जलानी चाहिए। व्यर्थ के लिए या हिंसा के लिए जंगल नहीं जलाना चाहिए”।[11]

सम्राट अशोक लिखवाते हैं कि देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा है कि जीव से जीव का पोषण नहीं करना चाहिए। तीनों चौसामों में तिष्य पूर्णमासी को तीन दिन-चतुर्दशी, पूर्णिमा और प्रतिपदा, निश्चितरूप से उपवास के दिन मछलियॉं नहीं मारनी चाहिए और न बेचनी चाहिए। इन दिनों नागवनी, मछलियों के तालाब में जो भी दूसरे जीव हों उन्हें नहीं मारना चाहिए। प्रत्येक पक्ष की पंचमी, अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, तिष्य, पुनर्वसु, तीन चातुर्मासों के शुक्ल-पक्ष में गौ को दागना नहीं चाहिए। बकरा, भेड़, सूअर अथवा और जो पशु दागे जाते हैं, उनको भी नहीं दागना चाहिए। तिष्य, पुनर्वसु, प्रत्येक चतुर्मास की पूर्णिमा के दिन और प्रत्येक चतुर्मास के शुक्ल पक्ष में अश्व और गौ को दागना नहीं चाहिए। छब्‍बीस वर्ष अभिषित होने पर मैंने इस बीच पच्चीस बार बन्धन-मोक्ष (बन्दियों की मुक्ति) किया है”।[12]

निष्कर्ष: इस तरह हम देखते हैं कि सम्राट अशोक जब बौद्ध धर्म अपनाते हैं और वह इस प्रकार की योजनायें और घोषणाएँ करते हैं कि जो हमको आज भी आश्चर्यचकित कर देती हैं कि वह कितना दूरदर्शी सम्राट था। जो चण्ड अशोक से देवानां प्रियदर्शी हो अपना सम्पूर्ण जीवन समस्त प्राणी कल्याण के लिए समर्पित कर देता है. सम्राट अशोक की कल्याणकारी दृष्टि कितनी दूरदर्शी थी, जो आधुनिक समय में भी हमको नवीन दिखाई देती है। दुनिया भर के देशों की सरकारें जिनकी चिन्ता आज संकटग्रस्त जीवों के प्रति है, लेकिन सम्राट अशोक की चिंता इन संकटग्रस्त प्राणियों के प्रति अब से 2300 वर्ष पहले पाते हैं। जीव से जीव का पोषण नहीं करना चाहिए। उनके अभिलेख में हम एक नवीन बात और पाते हैं कि आज सरकारें निसक्त, बीमार और वृद्ध कैदियों को विशेष अवसरों पर क्षमा दान देती हैं, उनको रिहा करती हैं, लेकिन सम्राट अशोक ने कई बार कैदियों को कारावास से मुक्त किया था। इस तरह हम देखते हैं कि सम्राट अशोक के ऊपर यह बौद्ध धम्म की करूणा का ही प्रभाव था जिसमें वह इस प्रकार की योजनायें अमल में लाते हैं जो कि हमको आज भी नूतन दिखाई देती हैं।

सन्दर्भ:
[1]  राधाकुमुद मुखर्जी, अशोक, दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 2004, पृ.4
[2]  वही, पृ.108
[3]  वही, पृ.5
[4]  वही, पृ.4
[5]  वही, पृ.5
[6]  वही, पृ.15
[7]  डॉ. शिवस्वरूप सहाय, भारतीय पुरालेखों का अध्ययन, दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 2008, पृ.108
[8]  वही, पृ.91
[9]  वही, पृ.92
[10]  वही, पृ.108-109
[11]  वही, पृ.128
[12] वही, पृ. 128-129

डॉ. सुरजीत कुमार सिंह, पूर्व प्रभारी निदेशक व वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर
डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा. महाराष्ट्र - 442001
surjeetdu@gmail.com, 09326055256

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue

सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन : सत्या कुमारी (पटना)

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