शोध आलेख : स्वातंत्र्योत्तर ग्राम्य अंचल में भू-राजनीति और जातीय अस्मिता, विशेष सन्दर्भ : 'परती-परिकथा' / कौशल कुमार पटेल

स्वातंत्र्योत्तर ग्राम्य अंचल में भू-राजनीति और जातीय अस्मिता, विशेष सन्दर्भ : 'परती-परिकथा'
- कौशल कुमार पटेल

शोध सार : स्वातंत्र्योत्तर भारत में,'न्याय और समानता' की कुंजी हासिल होने से बहुजन अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक होते है। स्वातंत्र्योत्तर नवोन्मेष चेतना से बहुजनों को स्वतंत्र अर्थ का आभास होता है।दलितों और पिछड़ो की स्वतंत्र उर्ध्वगामी चेतना को देख और अपनी खोयी भू-सम्पति को हासिल करने के लिए प्रतिरोध और संघर्ष से, सामंती विचार के इस्टेट, भू-स्वामी, बड़े काश्तकार जो मूलतः सवर्ण थे, को अपनी संपदा लुटने का डर सताने लगा। फलस्वरूप इस्टेट और भू-स्वामी अपने काबिज़ सम्पति पर हक़ कायम रखने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर बहुजनों को त्रास देना आरम्भ करते है। ग्रामीण अंचल में सवर्णों और बहुजनों के मध्य भू ( जमीन ) के असमान्य वितरण और फसल कटाई के समय अपने दावे को लेकर संघर्ष आरम्भ होने लगे, इस फसाद को रोकने के लिए सरकार, भू-सुधार कानून लागू करती है जो नाकाफी सिद्ध हुए। ग्राम्य अंचल में जातीय अस्मिता और अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए बुनियादी बाबुओं और नए बाबू- बबुआन के मध्य खूनी संघर्ष हुए। कोशी अंचल के पूर्णिया जिले के परानपुर गांव को अपने उपन्यास का कथानक बना कर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु इसी यथार्थ को, 'परती-परिकथा' के माध्यम से चित्रित करते है। 'परती-परिकथा' का फलक बहुत व्यापक है। कथाकार द्वारा उपन्यास के प्रारम्भ में परती-बंध्या जमीन के भौगोलिक वर्णन से लेकर दन्त कथाओं के उद्धरण द्वारा परती के परिवेश और भूमि के वास्तविक हक़दार का अन्वेषण किया गया है। जिसके केंद्र में ग्राम्य अंचल की भू-राजनीति, संघर्ष और जातीय अस्मिता का यथार्थपूर्ण चित्रण है।
 
बीज शब्द : स्वातंत्र्योत्तर यथार्थ, स्वतंत्र उर्ध्वगामी चेतना, सामंती विचार, ग्राम्य अंचल, परती-ऊसर जमीन, आंचलिक, भू- राजनीति, भू-संघर्ष, भू-स्वामित्व, इस्टेट, जमींदारी उन्मूलन, नम्बरदार, काश्तकार, जातीय अस्मिता, बुनियादी बाबू-बबुआन, भूमिहीन, बहुजन, पसमान्दा, सोलकन्ह, पुश्तैनी सम्पति, खलिहान।
 
मूल आलेख : स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य में भारतीय समाज के विभिन्न पहलूओं का चित्रण हुआ है। विशेषतः भारतीय ग्रामीण समाज के कृषक-मजदूर जीवन एवं आंचलिक कथाओं का चित्रण रूपायित रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात भारतीय समाज में हो रहे बदलाव, गरीब-मजदूर संघर्ष, जाति संघर्ष व् अन्य राजनीतिक घटना चक्र का उद्धरण विभिन्न कथा साहित्यों में वर्णित हुए है।
 
    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में लागू संवैधानिक उपचार से लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना हुई। देश के सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में हुए परिवर्तन से लोगों की चेतना का विकास हुआ तथा क्रांतिकारी बदलाव के फलस्वरूप समाज के मध्यवर्गीय समुदाय पर इसका व्यापक असर पड़ा और मध्यवर्गीय अथवा बुर्जुआ वर्ग ही क्रांति के वास्तविक ध्वजधारक रहे है। क्रांतिकारियों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के अगुआई में स्वातंत्र्योत्तर सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की बयार धीरे-धीरे ग्रामीण अंचल तक पहुंची। स्वतंत्रता उपरांत भी ग्रामीण अंचल में सामंती व्यवस्था विद्यमान थी नियमतः जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ, परन्तु ग्राम्य अंचल में यह अपवाद बनी रही। उच्च वर्ग के कुछ घोर सामंती और रूढ़िवादी प्रवृति के लोगों को यह रास नहीं आ रहा था शिक्षा को अंगीकृत करने, गाँधी-आंबेडकर आदि द्वारा चलाये जाने वाले सत्याग्रह और अन्य अहिंसक संघर्षों में शामिल हो कर बहुजन अपने बुद्धि को परिष्कृत कर रहे थे दलितों, पिछड़ों के, 'स्वतंत्र उर्ध्वगामी चेतना' को देख उनके खिलाफ वैमनस्य भाव से ग्रसित हो सामंती वर्ग ने उनकी चेतना को कुंठित करने का प्रयास किया और उनका शोषण किया। दलितों-पिछड़ों, पसमांदा आदि हाशिये पर जीवन बिताने वाले जनसमुदाय, समाज निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बन रहे थे अथवा समाज की मुख्य धारा से जुड़ रहे थे।
 
    स्वातंत्र्योत्तर भारत में नयी शासन व्यवस्था लागू हुई एवं लोकतंत्र को अंगीकृत किया गया। लोकतंत्र की प्रमुख कुंजी, 'न्याय और समानता' दलितों-पिछड़ों और पसमांदा आदि के लिए सर्वग्राह्य बनी, अधिकारों की सुगबुगाहट एवं नवोन्मेष सामाजिक वातावरण से ग्राम्य अंचल के विभिन्न जाति समुदाय मसलन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पसमांदा समाज अपने राजनीतिक अधिकार के प्रति सजग हुए। 'स्वतंत्र' अर्थ का आभास हुआ। अधिकारों की प्राप्ति से नयी चेतना आयी और समाज में बराबरी का हक़ मिला, हालाँकि ग्रामीण अंचलों में पूर्ववर्ती प्रथा चालू रही और मंदिरों, सामुदायिक कुओं का इस्तेमाल करने पर छुआछूत जैसे सामाजिक कलंक समाज में दृष्टिगोचर होते रहे। आज़ादी बाद गांव के सर्वतोमुखी विकास के लिए तात्कालिक सरकार द्वारा पंचवर्षीय योजनाओं को लागू किया गया, जिससे भू- सुधार के कार्यक्रम एवं कृषि तकनीक में नवीनता आयी। ग्राम्य अंचल के लघु किसानों, भूमिहीनों, मजदूरों के मन में कृषि सुधार संबंधी घोषणाओं को लेकर उत्सुकता थी। केंद्र और राज्य सरकार अपने आश्वासनों के अनुरूप भू-सुधार योजनाओं को लागू करवाने में प्रतिबद्ध दिख रही थी परन्तु इस प्रतिबद्धता में जमीनी हकीकत नगण्य थी सरकारी कार्यालयों में कार्यरत बाबू, लिपिक, पदाधिकारीगण तक़रीबन 80 -90 % उच्च वर्ग के थे। पिछड़ों व् पसमांदा समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले न के बराबर थे ग्राम्य अंचलों में भूमि का वितरण एकसमान न था। ज़मींदारों, नम्बरदारों और बड़े कास्तकारों के पास कृषि योग्य 90 % जमीन थी और उनकी जनसँख्या मात्र 5 -10 % जबकि 90 % जनसँख्या के पास तक़रीबन 10 % जमीन जो ग्रामीण इलाकों में भू-संघर्ष का मूल कारण रही।
 
    ग्राम्य अंचल में हुए इसी भू-संघर्ष, भू-राजनीति को अपने कथा का केंद्र बनाकर साहित्य सृजन का कार्य प्रसिद्ध उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु ने किया। रेणु के कथा साहित्य में जातीय-अस्मिता और भू-राजनीति के यथार्थ चित्रण के अलावा ग्राम्य अंचल की मनोहारी लोक संस्कृति व् लावणिक चित्रण रूपायित है। ग्राम्य जीवन के अप्रतिम कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने हिंदी ग्रामीण अंचल की मनोहारी व् लावणिक तस्वीर का अपने कथा साहित्य में यथार्थवादी चित्रण किया है।
 
    रेणु के कई उपन्यास, मुख्यतः मैला आँचल' 'परती परिकथा' का फलक बहुत व्यापक है। इनमें ग्रामीण अंचल की विभिन्न संस्कृति, रीति-परंपरा, लोकाचार, किस्सा, लोक-संस्कृति , सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य आदि का उल्लेख है। इस कथा साहित्य में गांव की सोंधी मिट्टी की सुगंध, लोकभाषा, लोकगीत, लोकपर्व, लोक संस्कृति व लोकाचार आदि के विविध तत्त्व परिलक्षित होते है। रेणु द्वारा रचित उपन्यास, 'परती परिकथा' ऐसे ही कई आख्यानों, किस्सों, किवंदितयों, ग्राम्य जीवन के सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक रंगों को और लोकाचारों को समेटे हुए है। 'परती परिकथा' अर्थात परती के आवरण अथवा परिवेश की कथा जो बिहार के कोशी अंचल के सम्पूर्ण ताने-बाने को उकेरती है। कथा शिल्पी रेणु ने उपन्यास के माध्यम से कोशी अंचल में घटित मानवीय क्रिया-कलापों, भू-संघर्ष, भू-राजनीति, तात्कालीन सामाजिक-राजनैतिक विचारधारा, रोजमर्रा की जिंदगी, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधि एवं संस्कृति, आर्थिक, जातीय-भेद भाव, तात्कालिक ग्राम्य स्त्रियों का यथार्थ यथा अधिकार, चेतना आदि के साथ ग्राम्य इलाकों में प्रचलित किंवदंतियों अथवा जादुई किस्सों का भी चित्रण किया है। 'परती परिकथा' उपन्यास के प्रारंभ में परती अथवा बंध्या धरती के भौगोलिक स्वरुप का वर्णन आरंभ होता है और फिर मिथकीय आख्यानों के उद्धरण एवं जादू-टोनों, सिद्धों, देव-दानवों के रोचक वृतांत, जो कोशी अंचल की दन्त कथाओं में प्रचलित है। ऐसा प्रतीत होता है, उपन्यासकार स्वयं इन कथाओं के तह में जाकर कोशी अंचल की धरती के बंध्या अर्थात परती, होने के कारणों का अन्वेषण कर रहा हो। उपन्यासकार ने अंचल के ऐसे ही कथानक का चयन किया है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण कोशी अंचल के यथार्थ का चित्र एक बड़े कैनवास पर उकेर सके। ''धरती नहीं, धरती की लाश जिस पर कफ़न की तरह फैली हुई है बालचरों की पंक्तियाँ। उत्तर नेपाल से शुरू होकर, दक्षिण गंगा तट तक, पूर्णिया जिले को असम भागों में विभक्त करता हुआ -फैला-फैला यह विशाल भू-भाग।'' 1
 
    'परती-परिकथा' उपन्यास का कथानक पूर्णिया जिले का सबसे समृद्ध गांव परानपुरहै जो पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। यहाँ 1500 से 1000 बीघे जोत वाले काश्तकार है और 500 बीघे जोत वाले मध्यम श्रेणी के किसान है। कुछ निम्न श्रेणी के भी किसान है जिनके पास जोत की बहुत कम जमीन है। भूमिहीनों और मजदूरों की संख्या बहुत अधिक है। सवर्णों और बहुजनों के मध्य भू-वितरण का दर बेहद असमान है तात्पर्य यह है गांव की अधिकांश जमीन पर सवर्णों का कब्ज़ा है जो इलाके में होने वाले भू-संघर्ष का मूल कारण है। बड़े और छोटे किसानों में काबिज़ जमीन एवं फसल कटाई के समय अनाज और खलिहानों पर दावा ठोकने को ले कर अनेक संघर्ष हुए है। ''भूमिहीनों की विशाल ज़मात! जगती हुई चेतना !... जमींदारी उन्मूलन के बाद भी हर साल फसल कटने के समय एक-डेढ़ सौ लड़ाई-दंगे और चालीस-पचास क़त्ल होते रहे तो फिर से जमीन की बंदोबस्ती की व्यवस्था की गयी।''2
 
    आज़ादी से पूर्व के राजे-रजवाड़े अथवा बड़े जमींदार और इस्टेट (अकूत सम्पदा वाले परिवार) जो आज़ादी के बाद ज़मींदारी प्रथा के उन्मूलन से अपने सम्पति को सरकार की नज़रों से बचाने के लिए और सम्पति पर एकाधिकार काबिज़ रखने के लिए राजनीति के वट वृक्ष के छाँव में शरण लेते है। तात्कालीन राजनैतिक परिदृश्य में कांग्रेस के प्रभुत्व को देखते हुए अधिकांश भू-स्वामित्व, बड़े जोत वाले काश्तकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस से जुड़ते हैं। आज़ादी के पश्चात जमींदारी प्रथा के उन्मूलन से पिछड़ों एवं बहुजनों के मन में स्वराज्य को लेकर एक कोरी कल्पना विकसित होती है और उन्हें लगता है सरकार उनकी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वर्णिम विकास योजनाओं की शुरुआत करेगी, हालाँकि नवगठित सरकार भी आंशिक रूप से इसका प्रयास भी करती है। लेकिन सरकारी योजनाओं का गांव तक पहुंचना एक स्वप्न बन कर रह जाता है क्योंकि कुछ सामंती सोच वाले उच्च वर्ग के अधिकांश जन, सरकार के नुमाइंदे थे जो अप्रत्यक्ष रूप से जमींदारी और सामाजिक विषमता के वाहक थे। फलस्वरूप उच्च वर्ग और पिछड़ों दलितों के बीच असमानता बढ़ जाती है और स्वातंत्र्योत्तर पूर्व स्वराज्य की कल्पना स्वातंत्र्योत्तर यथार्थ से टकरा कर चूर-चूर हो जाती है। इस्टेट और भू स्वामित्वों द्वारा जमीन पर मालिकाना हक़ और वर्चस्व को कायम रखने के लिए अकुलाहट बढ़ती है जो समाज में हो रहे भू-संघर्ष से वर्ग-संघर्ष में परिणत हो उठता है। ग्राम्य अंचल के अप्रतिम कथाकार, 'परती-परिकथा' के केंद्र में इसी भू-राजनीति को विस्तृत फलक पर चित्रित करते है।
 
    कथा के मुख्य पात्र जितेंद्र मिश्र को अपने पुश्तैनी सम्पति और ऊसर परती धरती पर अपने अधिकार जमाए रखने के लिए अपने सगे संबंधियों और गांव के बहुजनों के साथ संघर्ष करना पड़ता है। कथा का अन्य पात्र लुतो स्वातंत्र्योत्तर भारत के मध्यवर्गीय जातियों के बीच उपजी चेतना का प्रतीक है। वह सवर्णों से हर स्तर पर लोहा लेता है, गांव के पिछड़ों को एकजुट करता है तथा भू-स्वामियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ता है। साम, दाम, दंड, भेद की नीति को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाले उच्च जाति पर उनके हथियार का ही इस्तेमाल करता है। ''लुतो आगे बढ़ आया। उत्तेजित हो कर बोला- ''आपने क्या समझ लिया है, गरीबों को कोई माय-बाप नहीं है।'' तुम कौन हो ''..... मैं-मैं कौन हूँ ? वाह रे ! आप इतना भी नहीं जानते। मैं जनता का लीडर हूँ।'' .......... कलमबाग भी हमारा है''... हमारा है, हमारा है'' सम्मिलित आवाज़ें।....  जितन बाबू ने बाग़ के माली को पुकारा, शिवसरन। ''हम यहाँ है। '' भीड़ के बीच शिवसरन ने जवाब दिया। अरे? जितन बाबू ने हँस कर कहा, जनता में तुम भी हो।'' ''अचरज कहे लगता है आपको? हां, हां, है जनता में, सभी गरीब जनता के साथ है।'' लुतो ने कहा, ''और जनता तुम्हरे साथ।''-जितन ने कहा।''3
 
    जमींदारी उन्मूलन से भू-स्वामित्वों और इस्टेट के आय के स्रोत में कमी आयी लेकिन शानो-शौकत में कोई कमी नहीं। एक तरफ अधिकार और आय सीमित होने और दूसरी तरफ बहुजनों को समानता का अधिकार मिलने से उनके मन में बहुजनों के प्रति वैमनस्य की भावना भी प्रस्फुटित हुई। ''यहाँ जमींदारी ख़त्म हो गयी लेकिन जमींदारी शान बढ़ती जा रही है। दो सौ बीघे धान और डेढ़ सौ बीघे पाट की खेती करने वाला हवाई जहाज से सफर करेगा, महीने में पांच सौ रूपए की किताब, तस्वीर और मँगावेगा ! दान करेगा ! बाग लगायेगा !''4
 
    जोत की भूमि का असामान्य वितरण और बहुजनों का अपने अधिकार के प्रति जागरूक होना भू-राजनीति अथवा भू-संघर्ष के प्रमुख कारण थे। कमजोर और छोटे किसान अगर भू पर दावे को लेकर आवाज़ बुलंद करते तो उन्हें इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता। जुल्म और यातना का दौर शुरू हो जाता। सामंती विचार वाले अधिकांश जमींदारों और इस्टेट ने अपने खिलाफ प्रतिरोध का स्वर बुलंद करने वाले किसानों पर जुल्म ढाते, फसलों को रातों-रात चौपट करा देते, उनके मवेशियों की चोरी करवाते या घरों में आग तक लगवा देते। ''संतोखी सिंह की बीस बीघे की खेती, एक ही रात में शेष हो गयी। कैयट टोली से सात बैल और तीन भैंसे चोरी हो गयी। फ़टकन के दोनों बैल छटपटा कर मर गए। जिद्दा, और भी बहुत कुछ करने की धुन में लगे है मुंशी जी।''5 सामंती विचार वाले बड़े काश्तकारों और भू- स्वामियों द्वारा फसलों को तबाह करना, झूठे मुक़दमे में फ़साना, चोरी का इलज़ाम लगाना इत्यादि बातें अंचल में बहुत सामान्य बातें थी। भूमिहीनों और मजदूरों की हालत अत्यंत दयनीय थी दलित स्त्रियों के दैहिक शोषण तक हुए। अपने हक़ के लिए आवाज़ बुलंद करने वालों को नेस्तानाबूत करने के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते थे। यहाँ तक की जैविक हमलों के द्वारा किसी खास जाति अथवा समुदाय को पूर्णतः नष्ट करने के भी हिमायती रहे है। ''बायोलॉजिकल वारफेयर का मतलब समझते है मुंशी जी? ''जी नहीं! फिर कोई नया कानून बना है क्या?'' कीटाणु-युद्ध! रोगों के कीड़े बरसाकर दुश्मनों को बर्बाद किया जाता है, आजकल ! सब कुछ माफ़ है, इस युग में।''6
 
    कोशी अंचल में भू-दखल या दावा करने के लिए कानूनी और गैर कानूनी दोनों दांव-पेंच का इस्तेमाल किया जाता रहा है। भू-राजनीति अपने चरम पर थी। जितेंद्र मिश्र और सुचितलाल, दुलारी दाय के दोनों कुंडों पर कब्ज़ा करने के लिए पूरी जोर आजमाइश करते है। सुचितलाल और मीर समसुद्दीन के दावे अदालत द्वारा निरस्त कर दिए जाते है। अदालतों में काम करने वाले अधिकतर लोग सवर्ण थे अदालती काम-काज में सवर्णों का परोक्ष वर्चस्व बहुजनों और दलितों पर दिखता था। ''हाकिम ने फैसला सुनाया-'' दुलारीदाय जमा के दोनों कुंडों पर तुम्हारा दावा गलत साबित हुआ। डिसमिस।''............. ''दुलारीदाय जमा की नत्थी?'' पेशकार साहेब ने समसुद्दीन की ओर इस तरह देखा मानो किसी पुरानी बात की याद दिलाकर कह रहे है-देखा?'' हां, हुज़ूर!'' दावा गलत साबित हुआ।''7
 
    भू- स्वामित्वों और भूमिहीनों के बीच उपजे भू-संघर्ष से समाज में जो असंतोष फैला, उससे सरकार की जमीन खिसकती नज़र आयी। सरकार एक सेफ्टी वाल्व की तलाश में थी जिससे कुर्सी भी बची रहे और भूमिहीनों, पसमांदा और हाशिये की जिंदगी जीने वालों की सहानुभूति भी मिल जाए। ऐसे ही समय में 'भू-दान' आंदोलन का प्रादुर्भाव हुआ। संत विनोबा इसके प्रणेता थे। उन्होंने एस्टेट और बड़े काश्तकारों से भू-दान की अपील की। भू-आंदोलन के अधिकांश कार्यकर्त्ता भी पुराने कांग्रेसी थे और कुछ समाजवादी। इधर परती-परात, ऊसर जमीन पर भी अपना कब्ज़ा ज़माने के लिए इस्टेट, बड़े काश्तकार, कोर्ट-कचहरी में कानूनी दाँव-पेंच का जुगाड़ लगाए हुए थे। सरकार नए कानून प्रस्ताव पारित कर उनकी जमीन बांटने पर तुली है। भू-दानी लोग भी नम्बरदारों से जमीन की आस लगाए हुए है। भू- स्वामित्वों के मन में डर है कहीं आंदोलन उनके अंचल में शुरू न हो जाए। जमीन का वितरण हो, तो शायद जो आग लगी है, कहीं शांत हो। भू- दान के छींटे से चिंगारी बुझ जाएगी और यश-कीर्ति भी फैलेगी, वैसे भी अधिकांश भू- दानी, पुराने बाबू लोग ठहरे। ''दुखहरन साह की तरह, परानपुर के अधिकांश जमीन वाले बड़े किसानों ने सोचा-सामने सर्वे की कड़ी सरसराती हुई आ रही है। जमीन मांगने वाले कोई नए नए लोग थोड़े ही है। पुराने बाबू लोग। कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के लीडर लोग। विनोबा बाबा को कुछ बीघे जमीन का दान पत्र देकर काम बनाया जा सकता है-सर्वे में।''8
 
    'परती-परिकथा' में उद्धरित कथानक पूर्णिया जिले का परानपुर गांव है। इलाके के सवर्ण आज़ादी के पूर्व से ही बहुजनों का शोषण करते रहे है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में कमोवेश इस स्थिति में बदलाव हुआ है। जो सामंती विचार के सवर्ण बहुजनों को संबोधित करने के लिए सोलकन्ह या अन्य निम्न जातिसूचक जैसे शब्द का प्रयोग करते थे अब उन्हीं बहुजनों द्वारा सत्ता की बागडोर पर अपना दावा किया जाने लगा। स्वतंत्रता पूर्व इलाके के जिन बाबू- बबुआनों के खून तक माफ़ रहते थे अर्थात तात्पर्य यह है सवर्णों द्वारा किये गए किसी अपराध के लिए ( दलितों और पिछड़ों पर किये गए अत्याचार ), सजा का प्रावधान न के बराबर था लेकिन अब यही पिछड़े खुद बाबू-बबुआन होने का दावा करने लगे। कुछ पिछड़े मेहनतकश काश्तकारों ने धन इकट्ठा होने पर अपने कुल को बाबू-बबुआन सिद्ध करने के लिए दूर-दराज के पोथी-पत्रों का हवाला दिया। नए जनेऊधारी इन तथाकथित बाबू- बबुआन तथा बुनियादी बाबू- बबुआनों के बीच संघर्ष भी हुए। बुनियादी बाबू- बबुआनों की हाँज ( भैंसो का झुण्ड ) अथवा गोधन ( गो आदि पशु जो सम्पति का सूचक ) लाठी वाले नए बाबू-बबुआन हाँक कर ले गए, और बुनियादी बाबू मुँह ताकते रह गए। ग्राम्य अंचल में बहुजनों की एकजुटता का परिणाम था यह। ''धन की ऊंचाई जाति के बुर्ज़ से भी ऊंची होती है।पैसा होते ही लोग बाबू कहलाने लगते है। बुनियादी बबुआन टोली को अब कौन पूछताहै?''9 ''बीस साल पहले गांव-समाज के सभी सोलकन्ह जाति को राजपुताई-बीमारी लग गयी थी सब अपने को राजपूत प्रमाणित करने के लिए राजपूताना से नेपाल तक की पोथियों का हवाला देते। दो साल बीतते-बीतते जेनऊधारी नए क्षत्रिय घाट -बाट, अली-गली में कुरुक्षेत्र मचाने को तैयार। मैथिल-ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ आदि बुनियादी बाबुओं ने देखा लाठी वाले भैंस हाँककर ले जा रहे है। वे चुप रहे ले जाने दो।''10
 
    परन्तु सिर्फ बहुजन ही नहीं बाबू-बबुआन बनने के लिए उतावले थे कुछ दूरदर्शी बुनियादी बाबू-बबुआन भी आरक्षण की चासनी में डुबकी लगाने को तैयार थे। उनके हाथ से सत्ता की बागडोर खिसकने लगी थी, कुछ सवर्णों को इसका अंदेशा हो गया था और वे जोर-जबरदस्ती को त्याग कर सदभाव का मुलम्मा ओढ़ कर दूसरे खेमे जा बैठे। ''तीन साल पहले तक जो...................................फसाद करते थे देख-लीजिए उन्हें! उनके लड़के शिड्यूल्ड कास्ट और एबोरिजिनल कम्युनिटी की फेहरिस्त में अपना नाम लिखाने के लिए धक्कम-धुक्की कर रहे है।''11 गांव में होने वाले सामाजिक जलसे, मेले या नौटंकी, नाटक-मंडली आदि लोक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दलितों का अपमान ही होता रहा। बहुजन सिर्फ होने वाले आयोजन के धन उगाही का हिस्सा थे यदा-कदा, नाटकों में दिखावे के लिए द्वारपाल का किरदार दे दिया जाता था। योग्यता होने पर भी अभिनेता बनना उनके नसीब में न था। ''गांव में दलित वर्ग को हर तरह से मर्दित कर रखा गया था अब तक! नाटक-मंडली के लिए प्रत्येक वर्ष खलिहान पर ही चंदे का धन काट लेते थे, बाबू लोग। लेकिन, कभी भी द्वारपाल, सैनिक अथवा दूत का पार्ट छोड़कर अच्छा पार्ट, माने हीरो का पार्ट, नहीं दिया सवर्ण टोली के लोगों ने।''12
 
निष्कर्ष : ग्रामीण अंचल में हुए संघर्ष का मूलकारण बहुजनों और सवर्णों के मध्य भू का असमान्य वितरण था, सरकार द्वारा लागू जमीन बंदोबस्ती और भू-सुधार कानून, भू-संघर्ष को रोकने में असफल साबित हुए। जमींदारी उन्मूलन ! जगती चेतना से, मेहनतकश भूमिहीनों, मजदूरों और छोटे किसानों ने भू पर अपना दावा घोषित किया फलस्वरूप हर साल फसल कटने के समय व्यापक दंगे और नरसंहार हुए। भू पर अपना दावा कायम रखने के लिए इस्टेट, बड़े काश्तकार, नम्बरदार, भू-स्वामी, साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना बहुजनों को त्रास देना आरम्भ करते हैं, लेकिन स्वातंत्र्योत्तर नवोन्मेष चेतना और अधिकार प्राप्त होने से उनके दांव पलट जाते है और बहुजन एकजुटता से अपनी खोयी अस्मिता को हासिल करते है। ग्राम्य अंचल के अप्रतिम कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु अपने उपन्यास 'परती-परिकथा' के माध्यम से कोशी अंचल के पूर्णिया जिले के परानपुर गांव में घटित कथा के माध्यम से इस यथार्थ का सफल चित्रण करते है।

संदर्भ :
1. फणीश्वरनाथ रेणु : परती-परिकथा (रेणु रचनावली-2, सं. भारत यायावर)राजकमल प्रकाशननई दिल्लीपृ. 311
2. वहीपृ. 326
3. वहीपृ. 349–350
4. वहीपृ. 525
5. वहीपृष्ठ 489
6. वहीपृ. 490
7. वहीपृ. 451
8. वहीपृ. 514
9. वहीपृ. 402
10. वहीपृ. 403
11. वहीपृ. 403
12. वहीपृ. 509
                                                                                                                       
कौशल कुमार पटेल
शोधार्थी, जैन अभिमत पात्र विश्वविद्यालय, बेंगलुरु
(Jain Deemed to be University, Bengaluru)
सम्प्रति-प्रवक्ता, माउंट कार्मल महाविद्यालय, स्वायत, बेंगलुरु

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  फणीश्वर नाथ रेणु विशेषांकअंक-42, जून 2022, UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक : मनीष रंजन

सम्पादन सहयोग प्रवीण कुमार जोशी, मोहम्मद हुसैन डायर, मैना शर्मा और अभिनव सरोवा चित्रांकन मीनाक्षी झा बनर्जी(पटना)

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