शोध आलेख : सामाजिक यथार्थ के जीवंत दस्तावेज : रेणु रिपोर्ताज / रुमन कुमारी

सामाजिक यथार्थ के जीवंत दस्तावेज : रेणु रिपोर्ताज
- रुमन कुमारी

शोध सार : हिंदी साहित्य के मंच पर विराजमान फणीश्वर नाथ रेणु जी को आंचलिक कथाकार के रूप में विशेष ख्याति मिली लोक संस्कृति के संवाहक रेणु जी केवल कथा-शिल्पी और उपन्यासकार थे, बल्कि एक श्रेष्ठ रिपोर्ताज लेखक भी थे वास्तविक जीवन की घटनाएं, आपदाएं, वर्गीय शोषण, राजनीतिक हल-चल आदि का रेणु जी ने अपने रिपोर्ताजों में प्रभावशाली चित्रण किया है। परंतु साहित्य की इस महत्वपूर्ण विधा के लेखन पर चर्चा के बराबर होती है। रेणु जी ने अपने रिपोर्ताजों  के माध्यम से कृषक मजदूर वर्ग की पीड़ा, सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार, राजनेताओं की धन लोलुपता को केवल दर्शाया अपितु एक नए और सच्चे अर्थों में स्वतंत्र भारत का सपना भी दिखाया। अतः हमारे लिए आवश्यक हो जाता है कि हम उनके रिपोर्ताजों का अध्ययन कर उनकी विशेषताओं को जाने और समझे। वर्तमान समय में हमें उनके रिपोर्ताजों से प्रेरणा लेनी चाहिए और उनका अनुशीलन करना चाहिए तभी हम हमारे समाज को जागृत कर साहित्य की सच्ची सेवा कर पाएंगे।

बीज शब्द : रिपोर्ताज, आंचलिक, संवेदना, मार्मिकता, जागृति, हृदयग्राही, सत्य, दृश्य, साक्षी, स्वर, अविस्मरणीय, तादात्म्य, तथ्य।

मूल आलेख : साहित्य लेखन भारत यायावर, फणीश्वर नाथ रेणु, समय की शिला पर अनेक विधाओं में से एक महत्वपूर्ण विधा है रिपोर्ताज जो सत्य घटनाओं पर आधारित होने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाएं भी लिए होती है रिपोर्ताज में किसी घटना से जुड़े लोगों की भावनाओं, रचनात्मकता तथा मार्मिकता का समावेश साहित्यिक रूप से होने पर यह पाठक पर अपना कलात्मक प्रभाव छोड़ने लगती हैं लेखक और घटनाक्रम में प्राणियों के भाव का तादात्म्य  होने के कारण लेखक उन क्षणों को स्वयं भी जीता है तथा प्रत्येक रागानुराग की अनुभूति उसे भी होती है रेणु के रिपोर्ताज के संबंध में भारत यायावर का कथन है किवे अन्य रचनाकारों की  तरह स्थितियों के मात्र मूक- दृष्टा नहीं थे, असल मायने में मुक्ति- योद्धा थे सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के साथ-साथ बंदूक थामने के भी हिमायती थे जिन सामाजिक, राजनीतिक हलचलों और आंदोलनों में वे शरीक थे, उन्हें अंकित करने के लिए इनका कलाकार उन्हें उद्वेलित करता रहता था।  इसीलिए उन्होंने रिपोर्ताज लिखना शुरू किया 1

हिंदी का पहला रिपोतार्ज शिवदान सिंह चौहान नेलक्ष्मीपुरानाम से लिखा था इसके बाद हिंदी साहित्य में प्रकाश चंद्र गुप्त,  रांगेय राघव, प्रभाकर माचवे, अमृत राय, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, प्रभाकर द्विवेदी और रेणु जी आदि ने रोचक रिपोर्ताज लिखे परंतु रेणु जी हिंदी भाषा के श्रेष्ठ रिपोर्ताज लेखक के रूप में उभर कर सामने आए क्योंकि रेणु जी की लोक संस्कृति से गहरी संपृक्ति थी इनकी प्रस्तुति इनके रिपोर्ताजों में स्पष्ट दिखाई देती है फणीश्वर नाथ रेणु जी एक प्रगतिशील रचनाकार रहे हैं उन्होंने समाज की वर्ण व्यवस्था तथा जातिवाद को ढकने का प्रयास कभी नहीं किया, बल्कि अपने रिपोर्ताजों के माध्यम से उन्हें उघाड़ कर रख दिया। वे स्वतंत्र भारत को वर्ण व्यवस्था जातिगत भेदभावों, मतभेदों, भ्रष्टाचार और धन लोलुप भ्रष्ट राजनेताओं की कुत्सित इच्छाओं की बेड़ियों से मुक्ति दिलाना चाहते थे2

 बिदापद नाचरेणु का पहला प्रकाशित रिपोर्ताज(1945) है बिदापद नाच को हम सांस्कृतिक रिपोर्ताज की श्रेणी में रख सकते हैं रेणु जी बताते  है कियह नाच निम्न स्तर के लोगों की ही चीज रह गई थी तथाकथित भद्र समाज के लोग इस नाच को देखने में अपनी हेठी समझते हैं लेकिन मुसहर, धांगड़, दुसाध के यहाँ विवाह, मुंडन तथा अन्य अवसरों पर इस की धूम मची रहती है 3 रेणु तथाकथित भद्र समाज पर व्यंग्य करते हैं और कहते हैं किजब से मैं अपने को भद्र और शिक्षित समझने लगा, तब से इस नाच से दूर रहने की चेष्टा करने लगा।  किंतु थोड़े दिनों के बाद ही मुझे अपनी गलती मालूम हुई और मैं इसके पीछेफिदारहने लगा 4  यहाँ रेणु की पीड़ा और छटपटाहट है कि शिक्षित लोग लोक से कटते चले जाते हैं सात-आठ कलाकार , दो वाद्य-यंत्र, मृदंग और मंजीरा, एक विदूषक और दो-तीन सहायक गवैये के साथ-साथ लाल साहू की घांघरी और पीतल-कांसे के गहनों के साथ चलने वाला यह विदापद नाच अपने समय एवं समाज की विद्रूप स्थितियों पर खुलकर कटाक्ष करता है

हे नैक जी(नायक जी

हूँ !

आब हमरो सुनूँ(अब मेरी भी सुनिए)!

बाप रे कौन दुर्गति नहीं भेल

सात साल  हम सूद चुकाओल,

तबहूँ उरिन नहीं भेलौं

......................

बकरी बेच सिपाही के देलियेंह,

फटक  नाथ गिरिधारी5

            रिपोर्ताजहड्डियों का पुलमें उन्होंने जीवन की विसंगतियों को दिखाया है इसमें पूर्णिया में हुए अकाल और उसके प्रभावों का वर्णन है ऐसी आपदा के समय भ्रष्ट राजनेताओं के झूठे और विलास का वर्णन करते हुए वे लिखते हैंहूँ...हल्ला मचा दिया ...अकाल का तांडव-नृत्य, लोग मर रहे हैं झूठे !  देवदूतगण एक-दूसरे का मुँह देखते हैं   आफिसरो की टोली खैर मना रही है जिला कलक्टर अपनी रिपोर्ट में डटे रहने का साहस बटोर रहे हैं ... सत्य का पता लगाकर देवता लौटते हैं नावें वापस रही हैं ... देवता अपना बयान लिखवा रहे हैं ... बेचारा पी.. डर से थर्र-थर्र काँप रहा है सत्य की प्रकाश को बयान से ढकने की कोशिश हो रही है अकाल नहीं है ! मोतैं नहीं हुईं। खबरें झूठी हैं अकाल की बात करने वाले गद्दार हैं ,स्वार्थी हैं। सारे जिले में सिर्फ दो मौतें हुईं- एक बीमार था, दूसरा भिखमंगा... देवता के मोटर बोट पर एक खास किस्म के रेडियो सेट का खास इंतजाम है भला जल-विहार में जब संगीत नहीं तो...फिर क्या मजा ?”6

नए सवेरे की आशामें रेणु एक तरफ यह दिखाते हैं कि गाँव की गलियों में गंदगी फैली हुई है, लोग वस्त्र के अभाव में कड़ाके की सर्दी से लड़ रहे हैं और दीवार पर अधनंगी शकुंतला की तस्वीर टंगी हुई है चारों तरफ सुरुचि टपक रही है महल के बाहर किसान, किसान-मार्च की तैयारी कर रहे हैं और महल के सुविधा संपन्न व्यक्ति उसकी आलोचना प्रत्यालोचना कर रहे हैं ज्ञानचंद को इस सुरुचि संपन्न वातावरण में भी मार्चिंग-गीत सुनने की इच्छा हो रही है -

उधर्वे गगने बाजे बादल,निम्ने उतला घरर्णीतल

अरुण प्रातेर तरुण दल, चल रे चल रे चल

(नजरुल इस्लाम)

रेणु करोड़ों-करोड़ शोषित, पीड़ित, मेहनतकशों की भूखी अंतड़ियो, सूखी हड्डियों, खाली दिमाग और निराश दिल में हरकत पैदा करने की, गति लाने की कोशिश करते हैं किसान मार्च उनके लिए नई उम्मीद है7  रेणु का किसान अपनी समस्याओं और स्थितियों के प्रति जागरूक और संगठित हो रहा है

          “ ‘एकलव्य के नोट्समें रेणु ने गाँवों में प्रचलित जातीय भेदभाव, स्वर्ण जातियों का प्रभुत्व और दलित- पिछड़ी जातियों में जागृत चेतना को रेखांकित किया है गाँव में नाटकों के मंचन और उसमें जातीय भेदभाव के खिलाफ दलित पिछड़े-नौजवानों का असफल विद्रोह इन्हें स्वर्ण जातियों से अलग नाटक करने को मजबूर करता है इन्हें आब नेतृत्व चाहिए, नायक की भूमिकाभगवान भला करेबैकवर्डऔरशेड्यूलकास्ट के नौजवानों का ! नाटक स्टेज करेंगे (अंग्रेजी नाम स्वयंबैकवर्डऔरशेड्यूलकास्ट के नौजवानों ने किया है... तीन साल पहले तकगंगोला जातिकेलीडरलोग अपने क्षत्रीय प्रमाणों में बहुत लंबे-लंबे भाषण देते थे नाम के अंत मेंसिंहजोड़ते थे ...सरकार  बैकवर्डऔरशेड्यूलकास्ट के लड़कों की स्कालरशिप देने लगी है, सरकारी नौकरियों मेंसीटेंरिजर्व रखती है ... मुरली जी स्वर्ण हिंदू हैं सुनते हैं- उनके लड़के ने अपने कोअनुसूचित जातिकी संतान बताकर स्कालरशिप झीट लिया है साठ रुपय प्रति मास )... दलित वर्ग को हर तरह से मर्दित करके रखा गया था अब तक।  नाटक मंडली के लिए प्रत्येक वर्ष खलिहान पर चंदा काट लेते हैं -मालिक लोग लेकिन, कभी भी द्वारपाल, सैनिक अथवा दूत का पार्ट छोड़कर अच्छा पार्ट... मानेहीरोका पार्ट नहीं दिया स्वर्ण टोली के लोगों ने 8

बाढ़ और अकाल पर रेणु जी ने कई रिपोर्ताज लिखे हैं बाढ़ पर लिखे अपने रिपोर्ताजों में बाढ़ से संबंधित स्थितियों और मन: स्थितियों के अनेक पहलुओं का बड़ा जीवंत चित्रण किया है ग्रामीण लोगों के लिए नदी माँ के समान होती है, क्योंकि उसके जल से ही सिंचाई होती है और अन्न उपजाया जा सकता है लेकिन जब इसी नदी में बाढ़ जाती है और यह विकराल रूप ले लेती है पुरानी कहानी-नया पाठनामक अपने रिपोर्ताज में रेणु ने इसी ममतामई नदी को रौद्र रूप लेते, फिर शांत होते हुए, बाढ़ से उजड़ते हुए और पुनः स्थापित होते दिखाया है इस रिपोर्ताज में एक स्थान पर वे लिखते हैं, ‘इसी ताल पर नाचती हुई कोसी मैया आई और देखते-ही-देखते खेत-खलिहान-गांव-घर-पेड़ सभी इसी ताल पर नाचने लगे ता-ता-थैया ता-ता -थैया धिन तक धिन्ना,छम्मक कट-मा ! मुँह बाँए, विशाल मगरमच्छ की पीठ पर सवार दस भुजा कोसी नाचती,किलकती, अट्टहास करती आगे बढ़ रही है9

रेणु का समय जनआंदोलन, संघर्ष और विद्रोह का काल था भारत-पाकिस्तान युद्ध से संबंधित रिपोर्ताजयुद्ध की डायरी’(1965) में युद्ध का वर्णन नहीं, युद्ध के दौरान लोगों की मनोदशा का वर्णन है यहाँ शहरी जीवन के प्रतीक के रूप में स्वयं लेखक तथा लेखक के साथ जुड़ी युद्ध की चिंताएं हैं खबरें हैं, रेडियो है, समाचार पत्र हैं दूसरी तरफ गाँव का वातावरण है।  युद्ध के प्रति जिज्ञासा, दहशत वहाँ भी है,पर साथ ही चिंता है पानी-बन्नी की, पटसन के भाव की10  यहां युद्ध के वातावरण को ग्रामीण जीवन के परिपेक्ष्य में देखने का अनूठा प्रयास है व्यक्तिगत मनोदशा का वर्णन करते हुए रेणु कहते हैंलड़ाई की खबर मामूली लोग नहीं पूछते गांव वाले युद्ध के विषय में पूछते भी हैं तो इस चिंता के साथ की,पटसन के भाव में तेजी क्यों नहीं आई ?”11

 रेणु ग्रंथावलीमें संकलित रिपोर्ताजसरहद के उस पारएक यात्रा-कथा के रूप में है रेणु जी के नेपाल के कोइराला परिवार से मित्रवत संबंध थे यहाँ रेणु जी यात्री के रूप में नेपाल के विराट नगर शहर में जाते हैं तथा वहाँ की आम जनता की स्थिति, मजदूरों की दुर्दशा, पूँजीपतियों की विलासिता, नेताओं की चुप्पी वाली भूमिका आदि पर अपना दृष्टिकोण रखते हैं लेखक ने विराट नगर कोमिलो का नगरकहा है साथ ही वे इस शहर को सिंघानिया, चिमडिया, लायकाओं जैसे पूँजीपतियों काषड्यंत्र क्षेत्रभी कहते हैं यह पूँजीपतिइनकम टैक्सतो देते ही नहीं हैं, कानून की भी बिल्कुल चिंता इन्हें नहीं है इन गिनती भर पूँजीपतियों के शोषण चक्र के नीचे पन्द्रह-बीस हजार मजदूर अपने परिवारों सहित और भोली निरीह जनता निरंतर पिस रही है लेखक को मजदूरों की रिहायशी कालोनी सूअर की खुहारों का समूह प्रतीत होती है इन मजदूरों और इनके बाल-बच्चों की शिक्षा-चिकित्सा की चिंता तो वहाँ की सरकार को है और ही पूँजीपतियों को ऊपर से मजदूरों के जीवन को और ज्यादा नरक बनाने के लिए सुरा-सुंदरी का विशेष प्रबंध इन पूँजीपतियों ने कर दिया है12 विराटनगर एक तरफ मजदूरों का नरक है और दूसरी तरफ पूँजीपतियों का स्वर्ग दिन-रात मेहनत करने के बावजूद जनता की हालत निरंतर जर्जर और दीन-हीन होती जा रही है उनके लिए कोई भी सुधार कार्य नहीं किया जा रहा है यहाँ तक कि शासकों,पूँजीपतियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के कारण राजपथ भी कभी धूल और कभी कीचड़ से सना रहता है13  विराट नगर नेपाल का एक प्रसिद्ध शहर है जो भारत की जोगबनी सीमा के उस पार बसा है 1942 की क्रांति के दौरान यह शहर भारत के समाजवादियों का ठिकाना था इसी कारण नेपाल सरकार की समाजवादियों पर हमेशा कड़ी नजर रहती है सीमा पर कड़ी तलाशी प्रक्रिया पूरी करके जा सकते हैं ठहरिए ! तलाशी दीजिए जी हाँ,वह गंदा सुखाल (नेपाली पाजामा) और गंदी टोपी पहना हुआ व्यक्ति स्वतंत्र राज्य का कर्मचारी है आपके पास से कोई आपत्तिजनक चीज नहीं निकली ? बीड़ी भी नहीं ? तो चलो जल्दी, वरनाट्रकमें जगह नहीं मिलेगी क्या कहा ? आप इस म्युनिसिपलेटी के कूड़ा ढोने वालेट्रकपर नहीं चढ़िएगा ? लेकिन, दूसरा चारा ही क्या है ? और इस पर भी जगह मिल जाए तो सौभाग्य ही समझिए आखिर वही हुआ, जो मैंने कहा था, जगह नहीं मिली ! देखूं,यदि ड्राइवर के बगल में बैठने को मिल जाए, पैसे कुछ ज्यादा देने पड़ेंगे नहीं वहाँ तो लेफटेंट साहब बैठे हैं देखिए, आपका सफेद कुर्ता और पाजामा बहुतों की निगाह में खटक रहा है ।कहीं पूछे जाने पर छाती फुला कर यह मत कह डालिएगा किमैं सोशलिस्ट हूँऔर विराटनगर में मजदूर यूनियन कायम करने आया हूँ अथवा मजदूरों की हालत का अध्ययन करने आया हूँ 14

रेणु जी ने अपने रिपोर्तजों में समय की नब्ज को बिल्कुल सही तरीके  से पकड़ा है एंव किसी भी महत्वपूर्ण घटना के प्रति उदासीन रह कर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया दी है इनकी यह प्रतिक्रियासरहद के उस पार,‘नए सवेरे की आशा,हड्डियों का पुल,‘एकलव्य के नोट्स,‘जीत का स्वाद,‘पुरानी कहानी:नया पाठ,‘युद्ध  की डायरी,‘भूमि दर्शन की भूमिका,‘नेपाली क्रांति कथा,‘पटना-जल प्रलय,आदि रिपोर्तजों के माध्यम से दी है रेणु जी के द्वारा लिखे गए यह रिपोर्ताज उस समय की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे जैसे-‘विश्वामित्र, ‘जनता, ‘जनवाणी, ‘संकेत, ‘योगी, ‘धर्म युग,’उर्वशी,‘अणीमा, ‘दिनमानआदि 15

भारत यायावर नेसमय की शिला परनामक पुस्तक में रेणु जी के सभी उपलब्ध रिपोर्ताजों का संकलन किया है   उन्होंने रेणु के रिपोर्ताजों के संबंध में अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए इस पुस्तक की पीठिका में लिखा हैसमय की शिला पर अंकित ये रिपोर्ताज आज भी उतने ही ताजा और ग्राह्य हैं,जितना छपने के वक्त रहे होंगे रेणु ने अपनी जादुई कलम से इतिहास में घटी इन घटनाओं एवं जीवन-स्थितियों को अपने रिपोर्ताजों के द्वारा सदा -सदा के लिए जीवंत और अविस्मरणीय बना दिया है इनका एक साथ प्रकाशन हिंदी पाठकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है इनके द्वारा रेणु के रचनाकार के क्रमिक विकास या ह्रास की तस्वीर भले ही बन सके, पर इनके द्वारा एक व्यापक जीवन से हमारा साक्षात्कार जीवंत रूप से अवश्य होता है 16

निष्कर्ष : रेणु जी का लेखन लोगों के मनोरंजन का माध्यम होकर एक श्रेष्ठ समाज की स्थापना के लिए प्रयत्नशील लेखन था आज का पाठक पढ़ा- लिखा है और जागरूक है तथा बौद्धिकता में विश्वास रखता है मनोरंजन के अनेकों साधन उसके पास उपस्थित हैं  पर वह तो सत्य घटनाओं की चर्चा और उनकी जाँच परख में विश्वास रखता है रेणु के रिपोर्ताज में मानक रिपोर्ताज की विशेषताएं मौजूद हैं भारत यायावर का कथनरेणु के रिपोर्ताज अपने कलात्मक संयम, साहित्यिक गरिमा की परंपरा में अपना अक्षुण्ण  स्थान रखते हुए कथा- साहित्य की एकरसता और जड़ता को तोड़ने के लिए एक प्रेरक- स्तंभ का काम करते हैं, जिन्हें बार-बार पढ़ने और विवेचन करने की आवश्यकता बनी रहेगी 17 वर्तमान समय में जीवंत लेखन शैली के धनी रेणु जी द्वारा रचित रिपोर्ताजों को महत्व देते हुए साहित्य की इस विधा को और भी अधिक विकसित करना चाहिए आज का लेखक यदि रेणु जी जैसे महान रिपोर्ताज लेखक के इस लेखन का अनुशीलन कर सके तो वह अपने द्वारा रचित साहित्य के माध्यम से समाज को जागृत कर सकेगा तथा रिपोर्ताज साहित्य का भविष्य उज्जवल होगा

संदर्भ :

1. . भारत यायावर, रेणु रचनावली, भाग 4, संपादकीय
2. वंदना भारद्वाज और डॉ.विजय कुमार प्रधान ,समय के जीवंत दस्तावेज : रेणु के रिपोर्ताज , ‘अपनी माटी पत्रिका
3. भारत यायावर ,फणीश्वर नाथ रेणु, समय की शिला पर ,राजकमल प्रकाशन,पृ.15
4 वही ,पृ.15
5.वही,पृ.18,19
6 वही, पृ.61
7. मृत्युंजय पांडेय, रेणु का भारत ,आनन्द प्रकाशन, कोलकता, पृ.171
8.जितेंद्र कुमार यादव, रेणु के रिपोर्ताज में बिहार का सामाजिक यथार्थ , 'सत्राची' पत्रिका ,पृ.102
9. वंदना भारद्वाज और डॉ. विजय कुमार प्रधान, समय के जीवंत दस्तावेज : रेणु के रिपोर्ताज , ‘अपनी माटीपत्रिका
10. रमा कुमारी, रिपोर्ताजों में रेणु, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ अप्लाइड रिसर्च ,पृ. 254
11. वही
12. प्रधान . प्रो. रमेश गोतम, गद्य सुमन, वाणी प्रकाशन, पृ. 109 ,ISBN-81-8143-601-4
13. वही
14. भारत यायावर ,फणीश्वर नाथ रेणु ,समय की शिला पर ,राजकमल प्रकाशन, पृ.22
15. सितारे हिंद, विद्रूप स्थितियों के जीवंत दस्तावेज : रेणु के रिपोर्ताज, ‘अपनी माटीपत्रिका
16. भारत यायावर ,फणीश्वर नाथ रेणु ,समय की शिला पर ,पृ. 12
17.  भारत यायावर, फणीश्वर नाथ रेणु के रिपोर्ताज,(विषय प्रवेश) - प्रकाशन, प्रेरणा पब्लिकेश , पृ. 11   

रुमन कुमारी
शोधर्थी
rumanraj.17@gmail.com, 9968373330

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  फणीश्वर नाथ रेणु विशेषांकअंक-42, जून 2022, UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक : मनीष रंजन

सम्पादन सहयोग प्रवीण कुमार जोशी, मोहम्मद हुसैन डायर, मैना शर्मा और अभिनव सरोवा चित्रांकन मीनाक्षी झा बनर्जी(पटना)

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