शोध आलेख : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बनारस की पत्रकारिता की भूमिका / डॉ. उज्ज्वल चन्द्र दास

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बनारस की पत्रकारिता की भूमिका 

- डॉ. उज्ज्वल चन्द्र दास 

  

शोध सार : भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी दिलाने में पत्र पत्रिकाओं की अहम भूमिका रही है। आजादी के आंदोलन में भाग ले रहा हर आम वो खास कलम की ताकत से वाकिफ था। सूचना के प्रसार के लिए क्रांतिकारियों को एक माध्यम की तलाश थी। जिसके द्वारा वह सूचनाओं का प्रसार कर सके। इस संदर्भ में पत्रकारिता एक उपयुक्त माध्यम थी। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बनारस की पत्रकारिता ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले आला दर्जे के क्रांतिकारी सीधे तौर पर पत्र पत्रकारिता से जुड़े थे और नियमित लेख लिख रहे थे, जिसका असर बनारस के दूर सुदूर गांव में रहने वाले लोगों पर पड़ रहा था। अंग्रेजी सरकार को इस बात का एहसास पहले से ही था, लिहाजा उसने शुरू से ही प्रेस के दमन की नीती अपनाई। प्रस्तुत शोध पत्र भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बनारस की पत्रकारिता की भूमिका के विषय में है। भारत की स्वतंत्रता में समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं की भूमिका को लिखने के लिए विवेचनात्मक पद्धति व द्वितीय आंकड़े का उपयोग किया गया है जिसमें पुस्तकें, समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं शामिल हैं।  

 

बीज शब्द : क्रांतिकारी, स्वतंत्रता आंदोलन, बनारस की पत्रकारिता। 

 

मूल आलेख :  


प्रस्तावना - भारतीय प्रेस का एक गौरवशाली इतिहास रहा है जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष में इसे महत्वपूर्ण भूमिका और इसके महत्व को परिभाषित करता है। पत्रकारिता तब 'मिशन' थी, यानी नि:स्वार्थ समर्पण का क्षेत्र था। अंग्रेज शासन के दो शताब्दी से चले आ रहे दमन-शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए बलिदान को प्रस्तुत संपादकों-पत्रकारों ने स्वाधीनता के शस्त्रहीन संघर्ष में अपनी आहुति दी, खतरे झेले, जेल यातनाएं सहीं पर अपने मिशन - 'सत्व निज भारत गहै' से विचलित नहीं हुए। भाषा, क्षेत्र, जाति आदि के अंतर से अलग हटकर संपूर्ण भारत को एकजुट करने, अंग्रेजों के दमन, बर्बरता का मुकाबला करने के लिए पूरे देश को एक सूत्र में बांधा और फिरंगी शासन से मुक्ति के लिए संपूर्ण देश को प्रेरित-उद्वेलित किया। बिस्मिल इलाहाबादी ने समाचारपत्रों की ताकत को बयां किया- 'जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो', अंग्रेजी विचारकों ने भी कहा- 'पेन इज माइटियर दैन स्वार्ड' यानी 'कलम तलवारों से भी कहीं अधिक ताकतवर है।' उस स्वाधीनता पूर्व काल में समाचार पत्र-पत्रिकाएं ही प्रभावी जनमाध्यम थीं।  


स्वाधीनता संग्राम में भारतीय पत्रकारिता का मूल स्वर त्याग, बलिदान और 'मिशन' के प्रति समर्पण का स्वर था। संपादकों को वेतन न के बराबर था। संपादक की नियुक्ति के लिए एक विज्ञापन   


आवश्यकता है- साप्ताहिक पत्र के लिए संपादक की। 

योग्यता- देशाभिमान और जेल जाने के लिए सन्नद्ध। 

वेतन - दो रोटी-पानी और पत्र के लिए कोई भी अन्य आवश्यक कार्य-मानदेय अपेक्षित नहीं होगा। 

  

शोध पद्धति : 


शोध पत्र, भारत की स्वतंत्रता में समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं की भूमिका को लिखने के लिए विवेचनात्मक पद्धति का उपयोग किया गया है। इस शोध में द्वितीय शोध का उपयोग किया गया है जिसमें पुस्तकें, समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं शामिल हैं।  

 

शोध का उद्देश्य : 

  1. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बनारस के समाचार पत्र, पत्रिकाओं की भूमिका का अध्ययन।  

  1. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बनारस के पत्रकारों एवं लेखकों के योगदान का अध्ययन। 

 

बनारस अखबार 

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान समाज जागरण में समाचार पत्रों की प्रमुख भूमिका रही। बनारस (काशी) पत्रकारिता का गढ़ रहा है, यहॉं के लोगों ने निर्भीक रूप से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कलम चलाई और समाज को पत्रकारिता के जरिये नवजागृत भी किया। इस दौरान सिर्फ गंभीर पत्रकारिता ही नहीं बल्कि उसके सभी आयामों पर कलम चली। जैसे- व्यंग्य, महिलाओं से जुड़ी पत्रिकाएं, बच्चों पर आधारित पत्रिकायें भी लोगों की पहुंच में थी। समाचार पत्रों में दैनिक सूचानाओं के साथ गंभीर लेख, साहित्य से जुड़े लेख, अग्रलेख, संपादकीय छपते थे। 

 

जनवरी 1845 में राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने काशी से पहला समाचार पत्रबनारस अखबारनिकाला था। इसके सम्पादक थे, श्री गोविन्द रघुनाथ थत्ते। यह समाचार पत्र पत्रकारिता के मूल्यों से कुछ अलग हटकर ब्रिटिश हुकूमत के बारे में लिखता था। साथ ही हिन्दी अखबार होते हुए भी इसके लेखों में अरबी तथा फारसी शब्दों का प्रयोग होता था। बनारस अखबार पूरी निर्भीकता के साथ स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभा रहा था, जिसके संपादक और पत्रकारों ने अंग्रेजों के खिलाफ़ बहुत कुछ अपने पत्र के माध्यम से लिखा और लोगों में जनजागरण फैलाया। बनारस अखबार स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका को पूरी कर्तव्यनिष्ठा के साथ निभाता रहा।  

 

भारतेन्दु औपनिवेशिक राजनैतिक परिदृश्य 

भारतीय नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र ने हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का अंकुरण किया। भारतेन्दु के जन्म के वक़्त के राजनैतिक परिदृश्य पर चर्चा करें तो 1848 में लार्ड डलहौजी के भारत पदार्पण के साथ ही एक नए युग की शुरुआत हो चुकी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर अपना कब्जा जमाकर भारत में पूरी तरह से अपने साम्राज्य की स्थापना की प्रक्रिया समाप्त कर ली थी। पौर्वात्यवादी, उपयोगितावादी और धर्मवादी विद्वानों ने मिल जुलकर अपने शासन के औचित्य को साबित करते हुए सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विविधता वाले भारत को अपने प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र की रचना की प्रक्रिया में भारत को पाठाधारित एकहरे हिन्दू धर्म के समुदाय में परिवर्तित करने की प्रक्रिया भी लगभग पूरी कर ली थी। कोलकाता से आगरा तक तार-संचार की व्यवस्था हो चुकी थी। भारत की पहली रेलवे लाइन बिछायी जाने लगी थी और कोलकाता से दिल्ली तक की सड़क भी बना ली गई थी। जल मार्ग से यातायात शुरू हो चुका था। बम्बई, मद्रास तथा कोलकाता में विश्वविद्यालयों स्थापित होने लगे थे। 

 

औपनिवेशिक लैंगिक विचारधारा देसी समुदाय को भारतीय स्त्री की एक ख़ास तरह की छवि गढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी। इसी क्रम में अंग्रेजों ने नारी-कल्याण के मक़सद से हिन्दू विधवा पुनर्विवाह कानून पास कर दिया था। ऐसे ही सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में भारतेन्दु का अवतरण भारत की धरती पर होता है। संभावनाओं से भरपूर ऐतिहासिक परिस्थिति और अपनी प्रतिभा के बल पर भारतेन्दु बनारस और पूरे हिन्दी जगत के केंद्रीय सांस्कृतिक और सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में उभरे। 

  

भारतेन्दु की हिन्दी पत्रकारिता 

सन् 1857 की क्रान्ति के बाद उन्नीसवीं शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में भारतीय जन जीवन पर आंतक की जो काली छाया मंडरा रही थी, उससे मुक्ति दिलाने के लिये स्वतंत्रता का मंत्र फूंकने का कार्य पत्रकारिता के माध्यम से भारतेन्दु जी ने किया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के अभ्युदय के साथ ही काशी की हिन्दी पत्रकारिता तीव्र गति से अग्रसर हुई। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव सम्पूर्ण भारतीय पत्रकारिता पर पड़ा। इस काल की पत्रकारिता राजनीतिक नवजागरण की प्रतीक तथा उन्मेषशील, ऊर्जस्वी, भावाविचारों की अग्रदूत प्रमाणित हुई। पत्र-पत्रिकाओं का सम्बन्ध सीधे जन जागरण से है। किसी प्रकार के अन्याय या पक्षपात का प्रतिकार करने के लिये जनता जब उठ खड़ी होती है तो उसे अपनी आवाज बुलन्द करने के लिये पत्र-पत्रिकाओं का सहारा लेना पड़ता है।  

 

भारतेन्दु और उनकी कविवचनसुधा  

सुधाका उपरोक्त आदर्श वाक्य तत्कालीन जन जीवन के संक्रमण का पर्याय है। उस समय सम्पूर्ण भारत अंग्रेज शासकों की स्वार्थपरता और पदलोलुपता जैसी भावनाओं का शिकार था। ऐसे समय में भारतेन्दु नेसुधा’ के माध्यम से स्वतंत्रता का आवाहन करते हुएनिज भारत के स्वत्वकी ओर संकेत करनर नारि सम होहिंकी आवाज को बुलन्द किया। इसके अतिरिक्तकविवचनसुधासुकवि जन की अमृत बानी सुदूर प्रान्तों में भी व्याप्त करने की सशक्त माध्यम थी। 

 

इस पत्रिका में प्रचलित भाषा जनसाधारण में सम्पर्क का माध्यम बनी। यही कारण है कि इसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गयी। फलतः यह शीघ्र ही मासिक से पाक्षिक तथा बाद में चलकर साप्ताहिक हो गयी। साथ ही इसकी पद्यात्मक विधा जन सामान्य की अभिव्यक्ति को और तीव्र करने की दृष्टि से गद्योन्मुख हुई। भारतेन्दु और उनकीसुधाके बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर कुछ राष्ट्रद्रोहियों ने सरकारी हाकिमों के कान भर दिये। दिल्लगी की बातों को भी वह लोग निन्दासूचक बताने लगे।मरसियानामक एक लेख उक्त पत्र में छपा था। निकट के लोगों ने छोटे लाट सर विलियम म्योर को समझाया कि यह आपकी खबर ली गयी है और उसकी सरकारी सहायता बंद हो गयी। शिक्षा विभाग के डायरेक्टर किम्पसन ने बिगड़कर एक चिट्ठी लिखी। हरिश्चन्द्र जी ने उत्तर देकर बहुत कुछ समझाया बुझाया, पर जो रंग चढ़ा लिया था, वह उतरा नही। यहां तक कि बाबू हरिश्चन्द्र की चलायीहरिश्चन्द्र चन्द्रिकाऔरबालाबोधिनी’ मासिक पत्रिकाओं की सौ-सौ प्रतियां प्रान्तीय गवर्नमेण्ट लेती थी, वह भी बन्द कर दी गयी। अंग्रेजों के विरूद्ध खुलकर प्रहार करने का परिणाम यह हुआ कि शासक वर्ग धीरे-धीरे सुधा से खिन्न हो गया। जब अंग्रेज हाकिमों ने ज्यादा जवाब तलब किया तो भारतेन्दु बाबू ने आनरेरी मजिस्ट्रेट के पद से त्यागपत्र दे दिया। 

(भारतेन्दु और भारतीय नवजागरण, (संपा.) शंभुनाथ, आने वाला कल प्रकाशन, कलकत्ता, 1986, पृ. 63,, मदन गोपाल, पृ. 6 (शर्मा, रामविलास, भारतेन्दु-युग, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा, 1951, पृ. 169 )


इंडियाज लिटरेरी हिस्ट्री-एसेज ऑन नाइन्टींथ सेंचुरी, (संपा.) स्टुअर्ट ब्लैकबर्न, वसुधा डालमिया में संकलित वसुधा डालमिया का लेख, जेनरिक क्वेश्चन्स भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एण्ड वूमेन इसूज, परमानेंट ब्लैक, नई दिल्ली, 2004, पृ. 404. 

 

मुंशी प्रेमचंद - भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन  

कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद न सिर्फ विश्वस्तरीय साहित्यकार थे, बल्कि गांधी और सत्याग्रह से प्रभावित होकर स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उनके इस रूप की बहुत कम चर्चा होती है। उन्होंने न सिर्फ अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ी थी बल्कि कलम के अलावा भौतिक रूप से भी सत्याग्रह तथा स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया गांधी जी के आह्वाहन पर प्रेमचंद स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. सोज--वतननाम से उनका कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ। यह संग्रह उर्दू भाषा में था और इसमें ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह के स्वर थे। इस कारण से सरकार ने इसे जब्त कर लिया। 

 

इस समय उन्होंने अनेक निबंध लिखे। इन निबंधों के केंद्र में मानव समाज की प्रगति में साहित्य के योगदान, लगातार फैल रही साम्प्रदायिकता, जमींदारों के शोषण और स्त्रियों के उन्मूलन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय थे। प्रेमचंद राजनीतिक सुधार से ज्यादा सामाजिक सुधार लाने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि साहित्य का प्रमुख उद्देश्य मानव ह्रदय को धीमे से स्पर्श करके समाज को उत्तरोतर स्वंतंत्र और संवेदनशील बनाना है। अपनी कहानीआहूतिमें वे लिखते हैं, अगर जॉन की जगह गोविन्द को सत्ता प्राप्त हो जाए और पढ़ा-लिखा तबका उतना ही अवसरवादी और लालची बना रहे, जितने की अंग्रेज हैं, तो ऐसा स्वराज कभी न आए। वहीँ अपने फायदे के लिए उस समय हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैला रहे धूर्त नेताओं का असली चेहरा उजागर करते हुए प्रेमचंद अपने एक निबंधसाम्प्रदायिकता और संस्कृतिमें वो लिखते हैं कि हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के नाम पर नेता साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, आज न तो कहीं हिन्दू संस्कृति है और न ही मुस्लिम संस्कृति, आज बस आर्थिक संस्कृति ही बची है और इसलिए ही मासूम जनता को आपस में लड़वाया जा रहा है। प्रेमचंद एक हंसमुख प्रवत्ति के व्यक्ति थे। वे जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों पर हँसते-हँसते विजय प्राप्त करना चाहते थे। उनके दिल में गरीबों और पीड़ितों के लिए स्वानुभूति और करुणा का अथाह सागर था। वे अपनी रचनाओं से पाठकों के दिमाग से ज्यादा दिल को छूते थे। वैसे तो उनकी सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक हैं। लेकिन अगर हम उनकी कुछ चुनिंदा रचनाओं की बात करें तो इनमें कर्मभूमि, सेवासदन, निर्मला, गोदान और गबन का नाम सबसे ऊपर आता है। इन उपन्यासों में उन्होंने समाज के शोषित तबके को अपना नायक बनाया है। उनके इर्द-गिर्द कहानी गढ़कर सामाजिक कुरीतियों और व्यवस्था के खूंरेजी चरित्र को उजागर किया है। अगर हम निर्मला उपन्यास की बात करें तो यह उस समय औरतों के ऊपर हो रहे अन्याय को सम्पूर्णता में दिखाता है। यह दिखाता है कि कैसे उस समय कम उम्र में ही स्त्रियों की शादी उनकी उम्र से कहीं बड़े पुरुष के साथ करवा दी जाती थी और दहेज के नाम पर किस प्रकार उनका शोषण किया जाता था। वहीं गोदान अपने भीतर किसानों की व्यथा को समेटे हुए है। यह दिखाता है कि कैसे पूंजीवादी व्यवस्था किसानों का शोषण कर रही है। इसके अलावा इसमें जातिगत शोषण के दंश को भी दर्शाया गया है। 

 

कर्मभूमि उपन्यास 1930 में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास लगातार बढ़ती जा रही साम्प्रदायिकता के बीच हिन्दुओं और मुसलमानों से अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति करने का आह्वाहन करता है। यह उपन्यास कहता है कि गांधी जी के शांति और अहिंसा जैसे मानवतावादी सिद्धांतों के लिए हमें अब अपना बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए वहीँ गबन में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी को उकेरा गया गया, जो अपनी पत्नी की प्रत्येक इच्छा को पूरा करना चाहता है। इस उपन्यास के द्वारा प्रेमचंद ने उस समय गाँवों में हो रहे शोषण को उकेरा है। इसमें यह भी बताया गया है कि किस तरह एक व्यक्ति भ्रष्ट व्यवस्था का शिकार होकर खुद भ्रष्ट बन जाता है। 

 

सेवासदन में प्रेमचंद ने औरतों के ऊपर हो रहे अत्याचार को रेखांकित किया है। इसमें उस समय की वेश्याओं की दयनीय हालत को बड़ी ही करुणा से पन्नों पर उकेरा गया है। इसके साथ ही दहेज प्रथा और विधवा विवाह पर भी जमकर प्रहार किया गया है। अंत में यही कहा जा सकता है कि मुंशी प्रेमचंद एक आदर्शवादी लेखक थे। उनके जमाने में अधिकतर लोग अनपढ़ थे, लेकिन इस तथ्य से उन्होंने कभी लिखना नहीं छोड़ा। वे कलम के सिपाही थे और उनकी कलम हमेशा पीड़ितों के लिए चलती थी उनकी कलम ही उनकी तलवार थी और वे एक खुद एक सामाजिक योद्धा थे। विकट से विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना सर कभी भी शोषणकारियों के सामने नहीं झुकाया। (प्रोफेसर वसुधा डालमिया, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले यू एस Web Title: Munshi Premchand: The Soldier Of Pen, Hindi Article वसुधा डालमिया, पृ. 403-404. 

  

बाबूराव विष्णु पराड़कर 

बाबूराव विष्णु पराड़कर हिन्दी के जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार एवं हिन्दी सेवी थे। उन्होने हिन्दी दैनिकआजका सम्पादन किया। भारत की आज़ादी के आंदोलन में अख़बार को बाबूराव विष्णु पराड़कर ने दोधारी तलवार की तरह उपयोग किया। उनकी पत्रकारिता ही क्रांतिकारिता थी। उनके युग में पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता था। एक जेब में पिस्तौल और दूसरी में गुप्त पत्ररणभेरीतथा हाथों मेंआज’, ‘संसारएवम् कमलाजैसे समाचार पत्रों को संवारने और जुझारू तेवर देने वाले लेखनी के धनी पराड़कर जी ने जेल जाने से लेकर अख़बार की बंदी, अर्थदंड जैसे दमन की परवाह किये बगैर पत्रकारिता का वरण किया। 

 

काशी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ पराड़कर जी ने भी आजादी के लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, बाबूराव विष्णु पराड़कर अपने सम्पादकीय, टिप्पणियों और लेखों से अंग्रेजों और उनकी नीतियों के खिलाफ आग उगलने वाले तथा देशवासियों में राष्ट्रभक्ति की भावना भरने वाले इन पत्रकारों, लेखकों का योगदान भी देश के लिए स्वतंत्रता संघर्ष में भागीदारी करने वाले क्रांतिकारियों या स्वतंत्रता सेनानियों से कम नहीं है। ऐसे पत्रकारों-लेखकों को भी सजा हुई, वे नजरबंद किए गए और पत्र-पत्रिकाओं को भी अंग्रेजों के दमन का शिकार होना पड़ा। यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि ऐसे कई पत्रकार, साहित्यकार अपने लेखन के माध्यम से देश की आजादी में योगदान करने के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी की भूमिका में भी रहे।  

  

सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर के बारे में कहा जाता है कि उनकी एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में पिस्तौल होती थी। पराड़कर जी ने स्वत: स्वीकार किया है कि 1906 मेंहिंदी बंगवासीके लिए कलकत्ता जाने का मेरा मुख्य उद्देश्य पत्रकारिता न थी प्रत्युत क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होकर देश सेवा का कार्य करना था। पराड़कर जी वहां चन्द्रनगर के क्रांतिकारी दल में शामिल थे। वहां उन्होंनेहितवार्ता’ औरभारतमित्रमें भी संपादन का कार्य किया। कई बार ऐसा भी होता था कि एक ओर वे संपादकीय नीति के कारण क्रांतिकारियों के विरुद्ध भी लिखते दूसरी ओर क्रांतिकारियों को परामर्श और मदद कर रहे होते। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियां बहुत दिनों तक छिपी न रह सकीं। 1916 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें चंद्रनगर के निकट महेश काल टापू, कलकत्ते के अलीपुर केंद्रीय कारागार, मेदनीपुर केंद्रीय कारागार, हजारीबाग केंद्रीय कारागार तथा बांकुड़ा जिले के एक गांव में नजरबंद रखा गया। उन्हें दलंदर हाउस भी ले जाया गया, जिसका नाम सुनकर लोग कांप उठते थे। रिहा होकर वाराणसी आने औरआजअखबार का दायित्व संभालने के बाद भी क्रांतिकारी गतिविधियों में उनकी सक्रियता बनी रही। पराड़कर जी वाराणसी में प्रसिद्ध क्रांतिकारी राजगुरु  के संरक्षक थे। राजगुरु को क्रांतिदल की दीक्षा देने और पिस्तौल चलाना सिखाने वाले पराड़कर जी ही थे, लेकिन पराड़कर जी की क्रांतिकारी प्रवृत्ति तब भी दिखी जब अंग्रेजों ने समाचार पत्रों पर दमन की कारवाई की। समाचार पत्रों का प्रकाशन जब रोक दिया जाता, पराड़कर जी अपने सहयोगियों के साथरणभेरीजैसा क्रांतिकारी पत्र निकालने लगते। विशेषकर 1929-30, 1932-1934 और 1942 में ये पत्र तब निकाले गए जब राष्ट्रीय आंदोलनों के कारण अंग्रेज सरकार ने पत्र-पत्रिकाओं पर रोक लगा दी। पराड़कर जी की जीवनी लिखने वाले लक्ष्मीशंकर व्यासपराड़कर जी और पत्रकारितामें लिखते हैं, ‘पराड़कर जी की लौह लेखनी और हृदय की आगरणभेरीके रूप में देश के असंख्य लोगों के हृदयों में भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व दे देने की मांग करती थी। कितने ही अंक साइक्लोस्टाइल पर उन्हीं की हस्तलिपि में लिखे प्रकाशित हुए थे, जिनके लिए उस समय वर्षो का कठिन कारावास मिल सकता था किन्तु क्रांतिदल के प्रमुख कार्यकर्ता पराड़कर भला पुलिस की पकड़ में कैसे आते?’ 

 

5 सितम्बर, 1920 को आज की सम्पादकीय टिप्पणी में उन्होंने लिखा था- हमारा उद्देश्य अपनी देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्रय उपार्जन है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते है। हमारा लक्ष्य है की हम अपने देश के गौरव को बढ़ावे, अपने देशवासियो में स्वाभिमान-संचार करें। उनको ऐसा बनावे की भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच न हो यह अभिमान स्वतंत्रता देवी की उपासना करने से मिलता है। 

 

यही कारण था की उनकी सम्पादकीय पंक्तिया मंत्रवत सिद्ध हुई। क्रान्तिकारी पराड़कर जी ने भारत की स्वाधीनता हेतु सर्वस्व अर्पित करने का संदेश नवयुवको को दिया। सन 1920 से 1942 तक काशी के क्रन्तिकारी आंदोलन के अग्रणी नेता वे ही थे। काशी में क्रन्तिकारी दल की स्थापना के मूल श्री पराड़कर जी ही थे। आचार्य नरेन्द्रदेव के अनुसार वे प्रखर उग्र राष्ट्रवादी थे- पराड़कर जी उग्र राष्ट्रवादी थे और बंगाल के विप्लववादियों से उनका घनिष्ट सम्बन्ध था। काशी आने पर भी उनका यह पुराना सम्बन्ध नहीं टुटा और समय-समय पर क्रांतिकारी उनसे सलाह लिया करते थे। 

 
भूमिगत पत्रकारितारणभेरी    


काशी ने हिन्दी पत्रकारिता को भूमिगत पत्रकारिता शुरू कर नया आयाम दिया। काशी में सन १९३०-१९४२ के मध्य और आज़ादी के बाद १९७५-७७ में भूमिगत हो कर साइक्लोस्टाईल या हस्तलिखित भूमिगत पत्रों का प्रकाशन आंदोलन को गति प्रदान करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान किया गया। रणभेरी, शंखनाद, खबर आदि नामों से प्रकाशित इन पत्रों में संपादक व प्रकाशक के नाम प्रायः शहर कोतवाल और कलेक्टर मुद्रित रहते थे। ये पत्र विभिन्न स्थानों से और स्थान बदल कर निकाले जाते थे। स्वतंत्रता आंदोलन के समयरणभेरीनामक गुप्त पत्र का प्रकाशन शहर कोतवाली के एक सिपाही के कमरे से साइक्लोस्टाईल मशीन लगा कर किया जा रहा था और रात के अंधेरे में ही ४ बजे भोर में उसे घरों के दरवाजे के नीचे से चुपके-चुपके सरका दिया जाता था, जब कि शहर की पूरी सी.आई.डी. और पुलिस उसे शहरभर ढूंढती रहती थी। इन पत्रों के माध्यम से सरकारी दमन का विरोध खुल कर किया जाता था। इन पत्रों से सम्बंधित मुख्य रूप से आचार्य नरेंद्र देव व विष्णु पराड़कर की गिरफ्तारी कभी नहीं हो पाई। भूमिगत प्रेस ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन की ज्वाला प्रज्वलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  

 

सन् 1930 में प्रेस एक्ट के कारण प्रेस पर प्रतिबंध होते हुए भी बाबूराव विष्णु पराड़कर ने बनारस से भूमिगत अख़बार रणभेरी निकाला था। स्वतंत्रता के आंदोलन में प्रिंट मीडिया और बनारस की उल्लेखनीय भूमिका का चेहरा थी रणभेरी। सन् 1930 से 1947 तक 17 वर्षों में कुल 12 बार इस अखबार को अंग्रेजी सरकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा, फिर भी कभी छुपछुपा कर तो कभी सीनाजोरी से निकलती ही रही ‘रणभेरी। अंग्रेज सरकार के लिए बहुत दुष्कर हो गया था कलम के सिपाहियों से पार पाना। बनारस की अंजान गलियों और बेनाम मुहल्लों से संचालित होती रहीं रणभेरी की गतिविधियां। राष्ट्र रत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त, पंडित मदन मोहन मालवीय, पंडित कमलापति त्रिपाठी, लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णांनन्द जी, रामेश्वर प्रसाद चौरसिया, दुर्गा प्रसाद खत्री, मन्मथनाथ गुप्त और शचीन्द्रनाथ सान्यालएक लम्बी फेहरिस्त है, बनारस के उन नामों की जो राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा भी देते रहे और रणभेरी जैसी प्रतीक संघर्षों का गुरिल्ला संचालन भी करते रहे। रणभेरी की प्रतियां दूध के बाल्टो, सब्जी की टोकरियों और पान की गिलौरियों के बीच तश्तरियों में छिपाकर बांटी जाती थीं। अंग्रेज पुलिस इस बात के लिए हलकान रहती थी की कब और कहां से प्रकट हो जाती है। यह भूमिगत पत्रकारिता 1942 तक चलती रही। 

 

1942 में ये पत्र तब निकाले गए जब राष्ट्रीय आंदोलनों के कारण अंग्रेज सरकार ने पत्र-पत्रिकाओं पर रोक लगा दी। पराड़कर जी की जीवनी लिखने वाले लक्ष्मीशंकर व्यासपराड़कर जी और पत्रकारितामें लिखते हैं, ‘पराड़कर जी की लौह लेखनी और हृदय की आगरणभेरीके रूप में देश के असंख्य लोगों के हृदयों में भारतीयों की आजादी के लिए अपना सर्वस्व दे देने की मांग करती थी। कितने ही अंक साइक्लोस्टाइल पर उन्हीं की हस्तलिपि में लिखे प्रकाशित हुए थे, जिनके लिए उस समय वर्षो का कठिन कारावास मिल सकता था किन्तु क्रांतिदल के प्रमुख कार्यकर्ता पराड़कर भला पुलिस की पकड़ में कैसे आते?’ ‘रणभेरीका आकार फुलस्केप साइज का रहता था। इसके दैनिक अंक दो पृष्ठ के हुआ करते थे और रविवार का साप्ताहिक संस्करण चार पृष्ठों का होता था। संपादक का नाम सीताराम था और प्रकाशक थे पुलिस सुपरिटेंडेंट (कोतवाली) बनारस। व्यास जी लिखते हैं किरणभेरीपत्रिका तथा प्रेस का पता लगाने में पुलिस ने एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया किन्तु उसे सफलता न मिली। इसका संयोजन, संपादन और प्रकाशन गुप्त एवं क्रांतिकारी दलों के कार्यों के समान होता था। 

 

रणभेरीपर मिली जानकारी से पता चलता है कि इस पत्र से बाबूराव विष्णु पराड़कर के अतिरिक्त रामचंद्र वर्मा, दुर्गाप्रसाद खत्री, दिनेशदत्त झा, उमाशंकर जी, कालिका प्रसाद जैसे लोग जुड़े थे और इसमें नियमित लेखन करते थे, लेकिन पराड़कर जी पर लेखन-संपादन के साथ ही इसकी व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियां भी होती थीं। इतना ही नहीं उनकी हस्तलिपि भी सुंदर थी, इसलिए इस पत्र की अधिकतर सामग्री वे ही लिखा करते थे, जिससे लोगों को पढ़ने में आसानी हो।रणभेरीके अतिरिक्त इसी की तरह निकलने वालेशंखनादनामक साप्ताहिक पत्र में भी वे नियमित तौर पर लिखा करते थे।रणभेरीके लिए ऐसे स्थानों का चयन किया जाता जो उपेक्षित रही हो। सतर्कता के तौर पर इसका स्थान बार-बार बदल दिया जाता था। यह सबकुछ क्रांतिकारियों की तरह ही होता है और इसके प्रकाशन के रहस्यमय, साहसपूर्ण और खतरनाक विवरणों को पढ़कर रोमांच होता है। पत्र का लक्ष्य था- रणभेरी बज उठी बीरवर पहनो केसरिया बाना। 

 

16 अगस्त 1930 की रणभेरी में पराड़कर जी ने लिखा- रणभेरी उसके (पुलिस के) सर पर बजेगी और तब तक बजती रहेगी जब तक काले कानून रहेंगें और काशी में देशभक्ति रहेगी। डरा-धमका कर लोगो को देशद्रोही बनाने का जमाना गया।  सन 1943 से 14 अगस्त, 1947 तक पराड़कर जीसंसारके प्रधान सम्पादक थे। संसार के अग्रलेखो ने पाठको में नवीन जागृति पैदा की। स्वतंत्रता, आंदोलन में मर-मिट जाने की भावना भरने मेंसंसारअग्रणी अग्रणी पत्र था। 

 

पंडित कमलापति त्रिपाठी 

पंडित कमलापति त्रिपाठी ने 1921 के असहयोग आंदोलन में भाग लिया जिसके लिए उन्हे जेल की सजा भी काटनी पड़ी। अगस्त 1942 बेहद महत्वपूर्ण दिन है। आज का दिन एक ऐतिहासिक उद्घोष और शंखनाद का है। गाँधीजी ने सूरज का अस्त नहीं देखने वाली दुनिया की सबसे विशाल ब्रिटिश साम्राज्य की शक्तिशाली सत्ता को ललकारते हुए। देश छोड़ने को सोचने पर विवश कर दिया था। इसी दिन राष्ट्रपिता बापू ने करो या मरो का नारा देते हुए अंग्रेजों को ललकारते हुए भारत छोड़ो का संदेश दिया। 1857 की क्रांति के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन ऐतिहासिक उद्घोष आजादी के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। उसी समय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने हिंदी दैनिक ‘आज’ अखबार के संपादक पंडित कमलापति त्रिपाठी को बनारस