आलेख : विनायक दामोदर सावरकर की दृष्टि में 1857 का स्वातंत्र्य समर / श्रुति पाण्डेय

विनायक दामोदर सावरकर की दृष्टि में 1857 का स्वातंत्र्य समर
- श्रुति पाण्डेय

सन् 1857 का  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इतिहासकारों की कई दृष्टियों के कारण एक  पहेली रहा है, मनमानी व्याख्याओं और अनुमानों के कारण इसके किसी एक निष्कर्ष पर पहुँच पाना सामान्यतः मुश्किल लगता है,।सामान्य शब्दों  में इतिहास को अतीत में घटित घटनाओं का लेखा-जोखा मान लिया जाता है। यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो क्या इतिहास मात्र अतीत की घटनाओं का संकलन है? उत्तर है – नहीं। इतिहास प्रतिबिंब है (इतिहासकार की दृष्टि से)-  तदयुगीन  परिस्थितियों का, परिवेश का, समाज का और वृहत्तर स्तर पर राष्ट्र का। इतिहास वह आईना है जिसके माध्यम से वर्तमान पीढ़ी अपने गुजरे अक्स की झलक पाती है, जानकारी प्राप्त करती है; या तो उससे प्रेरित होती है या हतोत्साहित! अतः इतिहास की भूमिका व्यक्ति, समाज, राष्ट्र को समझने, जानने और परखने में महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि तटस्थता के साथ इन घटनाओं को प्रस्तुत किया जाए तो इतिहास न्यायसंगत होगा, किन्तु इससे जरा सी भी छेड़-छाड़ सदियों के लिए कई पीढ़ियों को गुमराह कर सकती है। इतिहास के तथ्यों एवं घटनाओं के साथ कुछ ऐसी ही छेड़-छाड़ भारतीय इतिहास में सन् 1857 के दौर के साथ की गयी है। परिणामतः स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी 1857 की सत्यता को जानने-समझने की कोशिश आज भी जारी है। सन् सत्तावन में देशभर में चमकी तलवारें महज़ बगावत थी, विद्रोह था, क्रान्ति थी या अंग्रेजों के अनुसार सिपाहियों की कुछ टुकड़ियों द्वारा धार्मिक कारणों से असहमति के परिणामस्वरूप छिड़ी लड़ाई।

‘सन् 1857 का स्वातंत्र्य समर’ विनायक दामोदर सावरकर द्वारा लिखी ऐसी पुस्तक है जो पूर्णतः सन् 1857 की पृष्ठभूमि पर केन्द्रित है। विनायक दामोदर सावरकर की लेखनी हर उस कारण की पड़ताल करती है जिसने स्वतंत्रता की अलख जगाई। यह पुस्तक उन तत्वों को, उन किस्से-कहानियों को पाठकों के सम्मुख लेकर आती है, जो अब तक अछूते रहे हैं। अंग्रेजों के शासनकाल में ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ संभवतः पहली पुस्तक है जिसकी पाण्डुलिपि ढूँढने में अंग्रेजों ने दिन-रात एक कर दिया था। इसकी पाण्डुलिपि की तलाश में भारत से लेकर लंदन, जर्मनी, पेरिस तक की गलियों की खाक छान ली गयी किन्तु इस पुस्तक की पाण्डुलिपि अंग्रेजों के हत्थे नहीं चढ़ी। अंततः झुँझलाकर ब्रिटिश सरकार ने पुस्तक के संबंध में कोई भी जानकारी न होने के बावजूद भी उसपर प्रतिबंध लगा दिया। यह प्रतिबंध तब लगाया गया जब अंग्रेज लगभग नौ महीनों तक पुस्तक की ट्रेसिंग में लगे हुए थे। 22 जुलाई 1909 को अंततः समुद्री कस्टम एक्ट, धारा 19 के अंतर्गत इस शीर्षक से आदेश जारी किया गया- “भारतीय विद्रोह के बारे में वी. डी. सावरकर द्वारा मराठी में लिखित पुस्तक या पैंफ्लेट, जिसके जर्मनी में छपने की रिपोर्ट मिली है और उसका अंग्रेजी अनुवाद”। न तो पुस्तक के लेखक का नाम, न पुस्तक का नाम, न प्रकाशक का नाम और न ही पुस्तक की विषय-वस्तु अथवा विषय-सूची के बारे में कोई जानकारी थी, लेकिन इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अंग्रेजों के इन तमाम असफल प्रयासों पर सावरकर ने दैनिक ‘द लंदन टाइम्स’ के संपादक को पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार की चुटकी ली- “ब्रिटिश अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि वे निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते हैं कि वह पुस्तक अभी छपी है कि नहीं। यदि ऐसा है तो सरकार ने यह कैसे जान लिया कि वह पुस्तक भयावह राजद्रोहात्मक है? क्यों वे उसके छपने या प्रकाशन के पूर्व ही उसे प्रतिबंधित करने के लिए दौड़ पड़े?” सावरकर के पत्र को संपादक ने अखबार में प्रकाशित किया।

सावरकर की लेखनी कितनी बड़ी ज्वाला बन सकती है इसका अनुमान उनके द्वारा लिखित चार  पृष्ठ के पैम्फलेट से लगाया जा सकता है जो उन्होंने लंदन में 10 मई 1908 को 1857 की वर्षगांठ पर ‘O Martyrs’ शीर्षक से लिखा था। वे लिखते हैं, “10 मई, 1857 को शुरू हुआ युद्ध 10 मई, 1908 को समाप्त नहीं हुआ है, वह तब तक नहीं रुकेगा जब तक उस लक्ष्य को पूरा करने वाली कोई अगली 10 मई आएगी।” ध्यातव्य है कि इस पैम्फलेट को यूरोप और भारत में अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया गया था। सावरकर के उक्त शब्द उनकी ज्वलंत लेखनी की झलक मात्र हैं। अतः अंग्रेजों का उनकी पुस्तक पर कोप  सहज स्वाभाविक था।

मैजिनी का मानना था कि इतिहास की हर क्रान्ति के पीछे कोई न कोई तत्व अवश्य होता है। वैसे तो छोटी से छोटी घटना भी योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दी जाती है तो यह सोचने वाली बात है कि 1857 की ऐतिहासिक घटना अनियोजित कैसे हो सकती है? मात्र गाय और सुअर की चर्बी वाले कारतूस ही इसका मूल कैसे हो सकते हैं? और स्वतंत्र भारत में अब तक इस पुस्तक का प्रसार क्यों नहीं किया गया? क्या कोई विशेष तंत्र है जो सावरकर की छवि को धूमिल करना चाहता था? और अपने इस ओछे मन्तव्य को पूरा करने की मंशा से असंख्य भारतीयों को सावरकर की वास्तविक छवि से दूर रखने का भरसक प्रयत्न किया। साथ ही 1857  की असल सच्चाई, असल नायकों से भी दूर रखने की कुचेष्टा की गयी। यह पुस्तक 1857 की क्रान्ति की जड़ों की तटस्थ पड़ताल करती है क्योंकि इसके निर्माण में ब्रिटिश पुस्तकालय की हर एक पुस्तक और उनके आलेखों का डेढ़ वर्ष तक गहनता से अध्ययन किया गया है। विवेच्य पुस्तक  के संदर्भ में देवेंद्र स्वरूप बताते हैं कि, “ब्रिटिश दस्तावेजों के आगार इंडिया ऑफिस में प्रवेश लेकर लगभग डेढ़ वर्ष तक वे इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी और ब्रिटिश म्यूज़ियम लाइब्रेरी में सन् 1857 संबंधी दस्तावेजों एवं ब्रिटिश लेखन के महासमुद्र में डुबकियाँ लगाते रहे। जातीय अहंकार और विद्वेष-जनित पूर्वग्रही ब्रिटिश लेखन में छिपे सत्य को उन्होंने खोज निकाला।”

1857 के घटित होने के हेतु का पता लगाने के क्रम में वे अंग्रेजों द्वारा खड़े किए गए प्रोपगेंडा का एक-एक करके तार्किक दृष्टि से खंडन करते चलते हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के संबंध में सबसे प्रचलित मूल कारण तथाकथित इतिहासकारों द्वारा बताया और पढ़ाया जाता रहा है चर्बी वाले कारतूसों के बारे में। इसके खंडन में वे लिखते हैं, “.... यदि सन् 1857 की क्रान्ति मुख्यतः कारतूसों के कारण ही प्रदीप्त हुई तो उसमें नाना साहब, दिल्ली का बादशाह, झाँसी की रानी या रोहिलखंड का खान बहादुर कैसे सम्मिलित हुए?....” इसके अतिरिक्त यह भी प्रश्न उठता है कि अंग्रेजों की टुकड़ियों में नौकरी करने वाले सिपाहियों के अतिरिक्त हजारों-लाखों की संख्या में सामान्य व्यक्ति/जनता, विभिन्न जाति, संप्रदाय और धर्म के लोग एक साथ कैसे आगे आए?

सावरकर द्वारा प्रस्तुत यह तर्क कि एकाएक मात्र कारतूस की अफवाह से इतनी बड़ी क्रान्ति का एक साथ पूरे देश में उठना, कैसे संभव है, बिलकुल सही प्रतीत होता है। तदयुगीन राजाओं को यह आभास हो चुका था कि किस प्रकार गोरों का शासन, एक-एक करके उनसे उनका सर्वस्व छीनने पर आमादा था। अतः सभी छोटे-बड़े राजाओं को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया “स्वधर्म और स्वराज” के भाव ने। अंग्रेज धीरे-धीरे शिक्षा पद्धति बदलने में लगे थे। अंग्रेजी और ईसाइयत के प्रचार-प्रसार में लगे थे। हिन्दू और मुसलमान दोनों के ही धर्म और धरती के अस्तित्व पर अंग्रेजों की अंग्रेज़ियत और ईसाइ मत का ग्रहण लगा था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों की अंतहीन यातनाओं ने, पीड़ाओं ने सामान्य जन तक को भीतर तक झकझोर दिया था। “स्वधर्म और स्वराज” से प्रेरित जनता अंग्रेजों के विरुद्ध एक हो गई थी और दिल्ली के बादशाह द्वारा जारी घोषणापत्र में बहादुर शाह जफ़र लिखते हैं कि, “हिंदवासियों, यदि हम सब मन में ठान लें तो शत्रु को क्षण भर में धूल चटा सकते हैं और अपने प्राणप्रिय धर्म एवं प्राणप्रिय देश को पूरी तरह भयमुक्त कर सकते हैं।” इस घोषणा से यह स्पष्ट हो रहा है कि स्वराज और स्वधर्म दोनों अलग-अलग नहीं है बल्कि दोनों के मध्य अन्योन्याश्रित संबंध है। जिस तेजी से और बेईमानी के साथ अंग्रेज राज्यों के अधिग्रहण को अंजाम दे रहे थे उससे यह तो तय था कि अपने धर्म को, संस्कृति को जीने के लिए अंग्रेजों का भारत से जाना अत्यावश्यक था। यदि समय रहते ऐसा न किया गया होता तो  भारत का आर्थिक ,सामाजिक-धार्मिक  ढाँचा खतरे में था। अंग्रेजों के साथ हिंदुओं और मुसलमानों के सह-अस्तित्व के जीवन का भावबोध संभव नहीं था। इसीलिए 1857 का बीज स्वराज और स्वधर्म था। इस संबंध में विनायक दामोदर सावरकर लिखते हैं, “हमारी स्वधर्म की कल्पना स्वराज्य से भिन्न नहीं है। स्वधर्म के बिना स्वराज्य तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। स्वराज्य नामक ऐहिक सामर्थ्य की तलवार स्वधर्म नामक पारलौकिक साध्य के लिए हमेशा बाहर निकली रहनी चाहिए।”

इन अद्भुत प्रेरणाओं, कारणों से प्रेरित इस संगठित, सुनियोजित संग्राम को अंग्रेजों ने और उनके भाड़े के इतिहासकारों ने मात्र ‘विद्रोह’ बनाकर और उसी रूप में प्रसारित कर दिया, जिसे आज तक विद्यालयों में ‘REVOLT OF 1857 / 1857 का विद्रोह’ के नाम से पढ़ाया जाता है।

सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के इस प्रयास से अंग्रेज तक आतंकित हो गए थे। ‘हिस्ट्री ऑफ अवर ऑन टाइम’, खंड-3 में जस्टिन मैकार्थी और सर जॉन के, ‘इंडियन म्युटिनी’, खंड-1 में चार्ल्स बाल भी इस ओर संकेत करते हैं। आलोच्य पुस्तक में सावरकर ने आद्यांत सन् 1857 की हर कड़ी को परत-दर-परत उजागर किया है। यही कारण है कि इस पुस्तक को उस समय हर क्रांतिकारी पढ़ना चाहता था, प्रेरित होना चाहता था और यह पुस्तक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल भी रही। मैडम कामा, लाला हरदयाल, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, भगत सिंह, समाजवादी नेता राजाराम शास्त्री, सुखदेव, पुरुषोत्तम दास टंडन, रास बिहारी बोस आदि कई क्रांतिकारी इस पुस्तक को पढ़ने के लिए लालायित थे। इन सभी ने इसके दूसरे संस्करण  के प्रकाशन और वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिस स्वतंत्रता समर को अंग्रेजों ने महज़ एक कारतूस और सिपाहियों के विद्रोह की थ्योरी के नीचे दबाने का कार्य किया, उस थ्योरी को अपदस्थ करने का भागीरथी प्रयत्न सावरकर ने किया। उनकी दृष्टि में सन् 1857 सिर्फ एक छोटा-सा विद्रोह नहीं था बल्कि स्वतंत्रता के महायज्ञ की पहली सार्थक आहुति थी, जिससे निकली ज्वाला ने भावी क्रांतिकारियों में इस आत्मविश्वास का संचार किया कि 1857 की कमियों को पूरा करते हुए सतर्कता के साथ लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। सावरकर ने 1857 की असफलता के केवल दो कारण माने हैं – “क्रान्ति का प्रथम भाग अर्थात् विध्वंस का कार्य तो बड़ी सुगमता सहित पूर्ण हो गया; किन्तु जब रचनात्मक और विधायक गतिविधियों का प्रारम्भ होना था तो लोगों में पारस्परिक मतभेद और अविश्वास पुनः उभर आया। .... और स्वदेश बंधुओं द्वारा विश्वासघात।”

उपरोक्त दो कारणों की उपस्थिति में दुनिया की कोई भी क्रान्ति या आंदोलन का अपने अंतिम लक्ष्य तक पहुँच पाना लगभग नामुमकिन भी है। रस्सल्स  ‘My Diary in India’ में लिखते हैं, “Yet it must be admitted that, with all their courage, they (the British) would have been quite exterminated if the natives have been all-together hostile to them…. Our seize of Delhi would have been quite impossible, if the Rajas of Patiala & Jhind had not been friends and if the Sikhs had not been recruited in our battalions and remained quite in the Punjab.” ऐसे अनेकानेक उदाहरण अंग्रेजों ने यत्र-तत्र अपनी विभिन्न पुस्तकों में लिखे हैं। भारतीयों में एकता की इस कमी का ही अंग्रेजों ने भरपूर फायदा उठाया जिसके कारण वे 200 वर्ष भारत में टिक पाए। यदि यह एकता और आपसी विश्वास 1857 के संग्राम के समय होता तो निश्चय ही वह सफल होता। ‘एकता’ एक ऐसी आधारशिला है जिस पर देश की नींव टिकी होती है, एकता से समझौता देश के वर्तमान से, भविष्य से और उसकी सुरक्षा से खिलवाड़ होता है। अतः यह आवश्यक है कि हम अतीत की उन सभी गलतियों से सीख लें ताकि ऐसी विपरीत स्थिति का सामना न करना पड़े। नागरिकों के लिए कर्तव्य पहले और अधिकार बाद में आने चाहिए क्योंकि यदि कर्तव्यों का निर्वहन निष्ठा पूर्वक किया जाये तो ऐसी प्रतिकूलताओं से भी दो-दो हाथ किया जा सकता है । 1857  का समर हमारे लिए वही सीख है.              

श्रुति पाण्डेय 
शोधार्थी, हिंदी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
achievershruti93@gmail.com  

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  प्रतिबंधित हिंदी साहित्य विशेषांक, अंक-44, नवम्बर 2022 UGC Care Listed Issue
अतिथि सम्पादक : गजेन्द्र पाठक
 चित्रांकन : अनुष्का मौर्य ( इलाहाबाद विश्वविद्यालय )
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