शोध आलेख : स्वतंत्रता आंदोलन एवं उर्दू पत्रकारिता / डॉ. मो. ज़फ़रूल्लाह

स्वतंत्रता आंदोलन एवं उर्दू पत्रकारिता 
- डॉ. मो. ज़फ़रूल्लाह

शोध सार : स्वतंत्रता आंदोलन में उर्दू पत्रकारों ने जो भूमिका निभाई उसे भारतीय इतिहास के पन्नो में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। बल्कि ये कहना अधिक उचित होगा कि स्वतंत्रता आंदोलन का पूरा इतिहास उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लिखा गया है। ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने शासन काल में उर्दू भाषा को संरक्षण प्रदान किया था जिनके कारण उर्दू भाषा ने ज़बरदस्त प्रगति की और उर्दू अख़बारों की संख्या में काफ़ी वृद्धि भी हुई। इस तरह से ब्रिटिश शासन-काल में उर्दू समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएं बड़ी संख्या में प्रकाशित हुए और इन समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं की भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका भी रही है। उर्दू पत्रकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीय जनमानस को जागृत कर स्वतंत्रता आंदोलन को गति प्रदान की थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख़ राष्ट्रीय विचारधाराओं से ओत-प्रोत थे जिसने लोगों के हृदय में आज़ादी की मशाल जला दी थी। राष्ट्रीय विचारधारा के उर्दू पत्र-पत्रिकाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक बनाने में ना केवल अपना पूर्ण योगदान दिया बल्कि ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का भी जम के सामना किया और अपना अस्तित्व बनाए रखा। 


बीज शब्द : स्वतंत्रता, आंदोलन, इतिहास, आज़ादी, संघर्ष, उर्दू, भाषा, पत्रकारिता, समाचार-पत्र, संपादक। 

मूल आलेख : अठ्ठारहवीं शताब्दी के मध्य तक उर्दू उत्तरी-भारत एवं हैदराबाद क्षेत्र में काफी संख्या में लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा थी। फिर भी अधिकांश सरकारी कार्य और आधिकारिक विज्ञप्तियां फ़ारसी में लिख़ी जाती थी। जिसके परिणामस्वरुप फ़ारसी भाषा के लेख़कों और कवियों ने अपने रचनात्मक लेखन के लिए फ़ारसी को ही प्राथमिकता दी थी। इस दौरान उर्दू भाषा, जो कि एक जनसंपर्क की भी भाषा थी उसे अपने वर्चस्व के लिए बौद्धिक समूह में प्रचलित फ़ारसी भाषा के ख़िलाफ़ संघर्ष करना पड़ा। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में लेख़कों और कवियों के एक बड़े वर्ग द्वारा उर्दू भाषा के विकास और उसे आकार देने का प्रयास किया गया। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के तत्वाधान में, काफ़ी बड़ी संख्या में उर्दू की क़िताबों का अनुवाद किया गया था। साथ ही कॉलेज के सहयोग से उर्दू शब्दकोश और गद्य पुस्तकों का संयोजन और संकलन भी किया गया था।

    उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक उर्दू गद्य लेख़न में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद भी फ़ारसी भाषा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की अधिकारिक भाषा बनी रही। जिसके फ़लस्वरूप, उर्दू अख़बार लंबे समय तक पाठकों का ध्यान आकर्षित नहीं कर सका। उर्दू भाषा की इस दयनीय स्थिति ने उर्दू भाषा के पहले अख़बार ‘जाम-ए-जहाँनुमा’ के संपादक मुंशी चमनलाल और ईश्वरी प्रसाद को यह टिप्पणी लिखने के लिए प्रेरित किया कि भारत के लोग जिनकी भाषा उर्दू है उन्हें फ़ारसी लेखन की आवश्यकता है।

    अंग्रेज़ अधिकारी फ़ारसी भाषा को मुग़ल संप्रभुता का प्रतीक मानते थे इसलिए उन्होंने फ़ारसी भाषा के स्थान पर उर्दू भाषा को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने का निर्णय लिया। उर्दू पत्रकारिता का अत्यधिक महत्व स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी महवपूर्ण भूमिका के कारण है। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन और उर्दू पत्रकारिता एक दूसरे के पर्यायवाची थे। 

उर्दू पत्रकारिता का इतिहास -

‘उर्दू’ भाषा वो भाषा थी जो पूरे हिन्दुस्तान में बोली जाती थी। उर्दू पत्रकारिता का प्रारंभ हिन्दी पत्रकारिता के पहले तथा फ़ारसी पत्रकारिता के बाद फ़ारसी पत्रकारिता से हुआ। फ़ारसी पत्रकारिता विभिन्न रूपों में भारत में सत्रहवीं शताब्दी से विकसित हो रही थी। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में उर्दू का प्रभाव बढ़ने लगा और फ़ारसी समाचार पत्रों में समाचार प्रवाशित किये जाने लगे। उर्दू का प्रथम पत्र ‘हिन्दुस्तानी’ 1910 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशक इकरामुद्दीन थे। 

    फ़ारसी व उर्दू पत्रकारिता का विकास भारत में छापाखानों व प्रेस के प्रसार के साथ तीव्र गति से हुआ। भारत में लिथो प्रेस का चलन उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में गवर्नर माउंटस्टअर्ट एलीफंस्टन के समय कलकत्ता में हुआ। 1819-20 में गाज़ी अलाउद्दीन हैदर ने लखनऊ में लीथो प्रेस छपार्इ होते देखा था और उसके बाद लीथो प्रेस बनारस 1824, आगरा 1826 तथा कानपुर 1831 में भी स्थापित हो गये। इससे उर्दू व फ़ारसी पत्रकारिता का विकास बहुत तेजी से हुआ। 1835 में संयुक्त प्रांत के लख़नऊ से रज्जबअली द्वारा प्रकाशित ‘सुल्तानुल अख़बार’ फ़ारसी के प्रमुख समाचार पत्रों में से था। संयुक्त प्रांत से उर्दू के प्रारंभिक पत्र-पत्रिकाओं पर इसका व्यापक प्रभाव था। संयुक्त प्रांत में प्रथम मुद्रणालय प्रिंटिंग प्रेस 1845 में इलाहाबाद तथा मिर्जापुर में स्थापित हुआ। 1847 में सिकन्दरा आगरा में ही मुद्रणालय स्थापित हो गया। मुद्रणालय की अपेक्षा लीथो प्रेस में छपार्इ काफी सस्ती होती थी। 

    संयुक्त प्रांत में प्रथम उर्दू अख़बार 1833 में आगरा से प्रकाशित हुआ। इसका नाम ‘मौफ़सिल अख़बार’ था। इसके संपादक पीटर सान्डर नामक इसार्इ मिशनरी थे। लीथो प्रेस से छपने वाला यह पत्र हिन्दुओं व मुसलमानों को आकर्षित करने के लिए मिशनरियों की नीति का एक अंग था। 1836 में सरकारी कामकाज और अदालत की भाषा फ़ारसी नहीं रह गयी थी। जिसका पूर्ण लाभ उर्दू पत्रकारिता को मिला। 1837 के 31वें अधिनियम के अन्तर्गत 20 नवम्बर 1837 को दिये आदेश से कार्यालयों में ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा का प्रयोग होने लगा किन्तु ‘हिन्दुस्तानी’ का अर्थ लोगों ने उर्दू से लगाया। इस परिवर्तन के कारण 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उर्दू पत्रकारिता विकास की चरम सीमा पर पहुँच गयी। उर्दू मिश्रित हिंदी ही बोलचाल की भाषा थी। उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के विकास में हिन्दू तथा मुसलमानों के समान रूप से सहयोग दिया। अनेक उर्दू समाचार पत्र-पत्रिकाओं के संपादक हिन्दू थे इसलिए 1840 के बाद बहुत से उर्दू पत्र-पत्रिकाओं की भाषा हिंदी-उर्दू मिश्रित थी। 

    1837 में ‘ख़ैरख्वाहे हिंद’ नामक उर्दू पत्र का प्रकाशन बनारस से प्रारंभ हुआ। इसके संपादक पादरी सरसान थे। यह पत्र टाइप में छपता था। ‘ख़ैरख्वाहे हिंद’ प्रकाशित तो बनारस से होता था किंतु इसका वितरण कलकत्ता के बापतिस मिशन प्रेस से होता था। 1842 में हसन अली महशार ने लखनऊ से ‘जलाली’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। 1845 में लखनऊ से ‘अहमदी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसमें इस्लाम धर्म का प्रचार करने वाली सामग्री को अधिक महत्व दिया जाता था। 1846 से लखनऊ से ‘ख्याली’ नामक पत्रिका तथा आगरा से ‘सदरूल’ अख़बार नामक पत्र छपना शुरू हुआ। आगरा कॉलेज से प्रकाशित होने वाले ‘सदरूल अख़बार’ के संपादक वाजिद अली खाँ थे। दो सौ लोगों ने इस अख़बार के पाँच-पाँच रुपये से शेयर ले रखे थे। शेयर लेने वालों में आगरा कॉलेज के ही लोग थे। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों में जागृत करना था। कुछ वर्षों बाद इसका नाम बदलकर ‘अख़बार-उल-हकायक’ रख दिया गया और इसके संपादक फैलेन नामक एक अंग्रेज बने।

    1847 में मेरठ से ‘जाम-ए-जमशेद’ नामक पहला उर्दू का अख़बार का प्रकाशन शुरू हुआ। इसमें तत्कालीन राजनीतिक समाचारों को प्रमुखता दी जाती थी। आगरा ‘जाम-ए-जमशेद’ नाम का अख़बार प्रकाशित होने पर मेरठ वाले ‘जाम-ए-जमशेद’ का नाम बदलकर ‘जाम-ए-जहांनुमा’ कर दिया गया।

    इसी वर्ष बरेली में बरेली स्कूल के अधीक्षक ट्रेगियर ने ‘उमदूत अल अख़बार’ का प्रकाशन शुरू किया। मौलवी अब्दुल रहमान इसके प्रथम संपादक थे। बनारस में इसी को ‘बनारस गजट’ नाम से अख़बार का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। बनारस अख़बार प्रेस से प्रकाशित इस पत्र के संपादक बाबू गोविंद रघुनाथ थत्ते थे। 1849 में कुछ नये समाचार पत्र प्रकाशित हुए जिनमें आगरा से ‘बुलबुल’ अख़बार तथा ‘अख़बार-उन-नवाह’, मेरठ से ‘मिताहुल अख़बार’ (समाचार प्रधान) तथा बनारस में ‘बागो बहार’ प्रमुख थे। 1850 में बनारस से ‘सयूरीने हिंद’ नामक पत्र का प्रकाश शुरू हुआ। इस पत्र की मात्र पचहत्तर प्रतियां प्रकाशित होती थीं किन्तु सरकार विरोधी रवैये के कारण यह प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में गिना जाता था। इसी वर्ष बनारस से ही ‘आफ़ताबे हिंद’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। आगरा से प्रकाशित ‘नूरूल अवसार’ इस वर्ष प्रारंभ होने वाला प्रमुख समाचार-पत्र था। 1851 में लखनऊ से ‘तिलस्में लखनऊ’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्र मूल रूप से सरकार विरोधी था। 1857 के विद्रोह में सरकार विरोधी घोषणाओं को प्रकाशित करके यह पत्र जनता में लोकप्रिय हो गया, किंतु विद्रोह की समाप्ति के बाद सरकार ने इसका प्रकाशन बंद करा दिया। 1852 में ‘सिहरे सामरी लखनऊ’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 1857 के विद्रोह के बाद सरकार विरोधी समाचारों को विशेष रूप से विस्तारपूर्वक छापने के कारण विद्रोह के बाद शासन ने इसका प्रकाशन बंद करने के लिए संपादक को विवश कर दिया। 1851 में आगरा में पांच, मेरठ में दो, बनारस में एक तथा कानपुर में एक पत्र लीथो प्रेस पर प्रकाशित हो रहे थे।

    1853 में आगरा से ‘मज़हरूल सरूर’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। हिन्दी व उर्दू मिश्रित भाषा में प्रकाशित होने वाले इस पत्र को भरतपुर के महाराजा का संरक्षण प्राप्त था। इसी वर्ष 1833 से आगरा से वाजिद अली खां के संपादन में हो रहे ‘ज़बदतुल अख़बार’ का प्रकाशन आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण बंद हो गया।
उर्दू के बड़े पत्रकार-लेखक मासूम मुरादाबादी की किताब: ‘1857 की क्रांति और उर्दू पत्रकारिता’ स्वाधीनता के पहले संग्राम और उर्दू पत्रकारिता के इतिहास व भूमिका पर केंद्रित एक महवपूर्ण दस्तावेज़ है। उर्दू पत्रकारिता के विकास का प्रथम चरण 1857 में पूर्ण हो गया। 1857 के विद्रोह के समय अधिकांश उर्दू समाचार पत्रों का रवैया सरकार विरोधी था। इन पत्रों के अधिकांश संपादक मुस्लिम थे। 

    1858 में कानपुर से ‘भोलयेतूर’ नामक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। 1859 में लखनऊ से ‘अवध अख़बार’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके संपादक मुंशी नवल किशोर थे। कुछ वर्ष पश्चात यह दैनिक पत्र हो गया। इसमें प्रकाशित प्रमुख समाचार प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार पत्रों के अनुवाद मात्र होते थे। इन्हीं दिनों लखनऊ से प्रकाशित ‘अवध पंच’ नामक पत्र ने अवध अख़बार की ढिलमुल नीति पर टिप्पणी करते हुए उसे ‘बनिया अख़बार’ की संज्ञा दी थी। ‘अवध पंच’ के संपादक सज्जाद हुसैन थें ‘अवध अख़बार’ का लगाव जनसाधारण से भी नहीं रहा। उसमें सरकार, धनी लोगों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के विरूद्ध कभी-भी कुछ नहीं छपता था। ‘अवध पंच’ का प्रकाशन ‘अवध अख़बार’ के कर्इ वर्ष बाद प्रकाशित होना प्रारंभ हुआ किंतु वह जनसाधारण में अधिक लोकप्रिय था। आजादी, धर्म निरपेक्षता, जनहित तथा जनमत संबंधी विचारों तथा समाचारों को ‘अवध पंच’ में विशेष स्थान दिया जाता था। ‘अवध पंच’ को छोड़कर इन दिनों प्रकाशित होने वाले अधिकांश उर्दू पत्रों ने मुसलमानों में हिन्दुओं से अलगाव की नीति का प्रचार किया। 1861 में इटावा से ‘मुहब्बायेरियाया’ नामक पत्र ‘मसादारूल तालिम प्रेस’ से प्रकाशित हुआ। आगरा से शिवनारायण के संपादन में ‘मुफीदइे खलायिक’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। गणेसी लाल के संपादन में प्रकाशित ‘आफ़ताबे आलमताब’ आगरा का अन्य प्रमुख पत्र था।

    जनवरी 1861 में सिकन्दरा (आगरा) से ‘खैरख्वाहे ख़लाइक’ नामक उर्दू मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इसका उद्देश्य हिन्दुओं व मुसलमानों में इसार्इ धर्म के प्रति विश्वास पैदा करना था। इसी वर्ष 1865 में आगरा से ही ‘आबेहयात-ए-हिन्द’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके संपादक आगरा नार्मल स्कूल के शिक्षक वंशीधर थे। ‘आबेहयात-ए-हिन्द’ पत्र का एक भाग हिंदी में भी प्रकाशित होता था उसका नाम ‘भारत खंड मित्र’ था। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक व धार्मिक सुधार के लिए वातावरण तैयार करना था। इसके संपादक स्वयं वंशीधर थे जो ‘अंजुमने हक’ नामक एक सुधार परिषद् के अध्यक्ष भी थे। 1868 में मेरठ से मिर्जा मुहम्मद बजाइन अली खान के संपादक में ‘अखबारे आलम’ नामक सप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसमें राजनीतिक समाचारों के अतिरिक्त सामाजिक व धार्मिक लेखों को प्रमुखता दी जाती थी। इसी वर्ष इलाहाबाद से ‘मकाजाने मसीही’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके संपादक खेरेन्ड जे0जे0 वालेश थे। ‘मैकाजाने मसीही’ का उद्देश्य इसार्इ धर्म प्रचार करना था। इसमें मिशनरियों के लिए आवश्यक सूचनाएँ भी प्रकाशित होती थीं। 1869 में इलाहाबाद में ‘आइना-ए-इल्म’ तथा मेरठ से ‘म्योर गजट’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।
1871 में लखनऊ से फरहत अली के संपादन में ‘कौकाबे हिंद’ तथा आगरा से ‘आगरा अख़बार’ साप्ताहिक का प्रकशन प्रारम्भ हुआ। ‘आगरा अख़बार’ हिन्दी व उर्दू मिश्रित भाषा में छपता था। पहले यह एजुकेशनल गजट’ नाम से प्रकाशित होता था। इसमें प्रमुख रूप से शिक्षा संबंधी लेख तथा समाचार प्रकाशित होते थे। संयुक्त प्रांत में 1871 में 30 नये पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ जिसमें 20 पत्र-पत्रिकाएं उर्दू की थीं। 1873 में लखनऊ से ताल्लुकेदारों के संगठन की ओर से ‘अख़बार-ए-अंजूमने-हंद’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसमें मुख्य रूप से सरकार समर्थक समाचारों तथा ताल्लुकेदारों के लिए आवश्यक सूचनायें प्रकाशित की जाती थीं। लखनऊ से ही 1874 में मुंशी अनवर हुसैन के संपादन में ‘मुरक्काये तहजीब’ 1857 में मुंशी पूरन चन्द्र के संपादन में ‘अखबारे तमन्नार्इ’ तथा ‘सरिश्ते तालीम’ तथा 1876 में मुहम्मद तेग बहादुर के संपादन में ‘अनवारूल अख़बार’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 1876 में मथुरा से ‘नय्यर अजाम’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 1878 में इलाहाबाद से प्रथम जातिवादी मासिक पत्र ‘कायस्थ समाचार’ का छपना शुरू हुआ। 1879 में लखनऊ से मुशी गुलनाम मुहम्मद ताबिश के संपादन में ‘मुशीरे कैसर’ का प्रकाशन शुरू हुआ। 1879 तक संयुक्त प्रांत में लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, मेरठ, मुराबाद, बरेली, अलीगढ़, रामपुर, आगरा तथा कानपुर उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के प्रमुख प्रकाशन केन्द्र थे। 1879 से ही उर्दू पत्रकारिता का तृतीय चरण प्रारंभ होता है। इस दौरान साइंटफिक सोसायटी मैगजीन तथा 1870 में प्रकाशित सर तैय्यद अहमद खाँ के ‘तहज़ीब उल अख़लाक़’ में विविध प्रकार की सामग्री होती थी। मुस्लिम समाज में इसका विशेष प्रभाव था। यह रूढ़िवाद, धार्मिक अंधविश्वास तथा प्रतिक्रियावादी विचारों का कट्टर विरोधी था। 1883 में लख़नऊ से ‘हिन्दुस्तानी’ नामक पत्र का छपना शुरू हुआ। हिन्दुस्तानी ने उर्दू समाचार-पत्रों को स्थिरता प्रदान की। 1885 में इलाहाबाद के ऐतिहासिक महत्व के कस्बे कड़ा से ‘रिफाटे आम कड़ा’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके प्रकाशन सुप्रसिद्ध रर्इस खान बहादुर मौलवी फरिउद्दीन अहमद तथा संपादक शेख़ निहाल अहमद थे। एक वर्ष पश्चात् इसका नाम ‘हामी हिंद कड़ा’ हो गया। इसी वर्ष गोरखपुर से ‘रियाजुल अख़बार’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। 1888 में इसका प्रकाशन बंद हो गया। 1888 में कड़ा से ही हाफिज़ हकीम मुहम्मद इस्माइल के संपादन में ‘कड़ा पंच’ नामक साप्ताहिक पत्र अपना शुरू हुआ। इसी वर्ष मिर्जापुर से ‘अखबारे चुनार’ का प्रकाशन शुरू हुआ, किन्तु यह पत्र अल्पजीवी सिद्ध हुआ।

    दिल्ली व लखनऊ में अमीरों व नवाबों के यहाँ ‘तरह का मिसरा’ समस्याओं पर ग़ज़ल लिखने की परम्परा थी। कुछ दिनों पश्चात् यह उर्दू पत्रकारिता मासिक पत्रों का अविभाज्य अंग बन गयी। 1885 में कलकत्ता से ‘गुलस्तये नातीजये सुखून’ निकलता था। उसी शैली में आगरा से ‘गुदलस्तये सुखून’ निकला। उसकी लोकप्रियता को देखकर बाद में लोग मासिक पत्रों को ही गुलदस्ता कहने लगे। लखनऊ में हिन्दुस्तानी प्रेस से ‘पयामेयर’ नामक ‘गुलदस्ता’ निकला। इसी परम्परा में और भी ‘गुलदस्ते’ निकले जिनमें ‘तोहफये इश्शाक’ प्रमुख था। 1889 में कन्नौज से मुंशी रहमत अली के संपादन में ‘पयामे आशिक’ तथा गोरखपुर से ‘इत्रेफितना’ का प्रकाशन शुरू हुआ।
सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी सूफ़ी अम्बा प्रसाद ने 1890 में मुरादाबाद में सुदर्शन प्रेस से ‘सितार-ए-हिंद’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। सूफ़ी अम्बा प्रसाद फ़ारसी व उर्दू के प्रकांड विद्वान थे। ‘सितार-ए-हिंद’ सरकार का कट्टर विरोधी था। मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराने के प्रयास, अंग्रेजों द्वारा भारतीयों का आर्थिक शोषण तथा अन्य विषयों पर सूफ़ी अम्बा प्रसाद अपने पत्र में सरकार की तीव्र आलोचना करते थे। वे यह जानते थे कि सरकार उनके पत्रों को बंद कराने का भरसक प्रयास करेगी इसलिए उन्होंने पहले से ही अपने पत्रों का विभिन्न नामों से पंजीकरण करा लिया था। ‘सितारे हिंद’ पर सरकार की कोप दृष्टि होते ही उन्होंने ‘जाम्युल-अलूम’ तथा उसके बाद ‘चारपुंज’ नाम से पत्र निकालना शुरू किया। इन्हीं दिनों फिरोजाबाद से सैय्यद अक़बर अली के संपादन में ‘अदीब’ मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ किंतु धनाभाव में ही इसका छपना बंद हो गया। 1890 में ही लखनऊ से शौकत जाफ़री के संपादन ‘शौकत जाफ़री अख़बार’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।

    1893 में लखनऊ से मौलवी अब्दुल हलीम शरर ने ‘दिल गुदाज़’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। 1898 में लखनऊ से ही ‘खदगेनजर’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इसके संपादक हिन्दू थे और इस पत्र को मुसलमान पाठकों व लेखकों का भी समर्थन प्राप्त हुआ था। 1895 में इलाहाबाद के जगन्नाथ शर्मा के संपादन में ‘आयने तंदुरूस्ती’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह लीथो प्रेस में छपती थी।

    1896 में बनारस में ‘अदसीर आज़म प्रेस’ से वली मुहम्मद के संपादन में ‘अल रफ़ीक’ पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। यह उर्दू के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में भी छपती थी। इसी वर्ष मुरादाबाद से ‘रहबर’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्र मूल रूप से सरकार विरोधी था।

    1903 में मुरादाबाद से मज़हर ‘रिज़वी के संपादर में ‘मुखबिरे आलम’, नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। इसमें राजनीतिक समाचारों से धार्मिक विचारों को अधिक प्रमुखता दी जाती थी। इसी वर्ष बदायूँ में निज़ामी प्रेस सोथा से जगालुद्दीन मुनीस के संपादन में ‘ज़ुल्फकारनेन’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इस पत्र का प्रकाशन भी अभी तक जारी था। 1903 में अलीगढ़ में ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। इसमें राजनीतिक लेख प्रमुख रूप से प्रकाशित होते थे।

    1907 में इलाहाबाद से ‘स्वराज्य’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। भारतीय उर्दू पत्रकारिता तथा स्वतन्त्रता आंदोलन में समाचार पत्रों के योगदान की दृष्टि से इस पत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। शाहगंज कोतवाली क्षेत्र में स्थित ‘देश सेवक’ प्रेस से इसका संपादन होता था। ढाई वर्षों में ‘स्वराज्य’ के कुल 75 अंक निकले। सरकार की दृष्टि में ‘आपत्तिजनक सामग्री’ के प्रकाशन के अपराध में होरी लाल वर्मा, बाबू राम, हरी खत्री, मुंशी राम सेवक, नन्दलाल चोपड़ा, लढ्ढाराम कपूर तथा अमीर चन्द बम्बवाल को एक के बाद एक न्यायालय से दंडित किया गया था। सरकार ने इस पत्र के प्रकाशन को इतना खतरनाक माना कि रौलेट कमीशन के सर रौलेट, सर बालिस स्कोट, सी0बी0 कुमार स्वामी, बर्नेलोवेट तथा पी.सी. मित्तल ने इसका उल्लेख कमीशन की रिपोर्ट में किया और यह लिखकर संतोष व्यक्त किया कि इस पत्र का दमन तभी हो सका जब 1910 में प्रेस अधिनियम अस्तित्व में आया।

    1907 में संयुक्त प्रांत से 153 नये पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिसमें 89 पत्र-पत्रिकाएँ उर्दू की थी। इसी वर्ष कानपुर से मुंशी दया नारायण निगम के संपादन में ‘ज़माना’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 1908 में ‘अवध अख़बार’, ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’, ‘स्वराज्य’ तथा ‘अवध पंच’ में आपत्तिजनक लेखों को प्रकाशन के आरोप में उनके संपादकों को चेतावनी दी गयी। इसी वर्ष आपत्तिजनक लेखों के प्रकाशन के आरोप में ‘स्वराज्य’ के संपादक शांति नारायण भटनागर को साढ़े तीन वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया। 1911 में इलाहाबाद में इंडियन प्रेस से ‘अदीब’ नामक बच्चों की मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। 1912 में मदीना प्रेस बिजनौर से सैय्यद अख्तर के संपादन में ‘मदीना’ अर्द्ध साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष लखनऊ से मौलाना अब्दुल बारी के संपादन में ‘हमदम’ नामक साप्ताहिक पत्र छपना प्रारंभ हुआ था। वहीं 1914 में लखनऊ ‘जीव मैनेजिंग ट्रस्ट’ की ओर से ‘अलवयाज़’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके संपादक सबीउल सहन ज़ैदी थे। यह पत्रिका पूर्णत: धार्मिक थी। इसमें इस्लाम धर्म के विभिन्न पहलुओं पर खोजपूर्ण लेख प्रकाशित होते थे। 1915 में शिबली अकादमी आजमगढ़ के संरक्षण में आरिफ़ प्रेस से ‘मारिफ़’ नामक पत्रिका का छपना शुरू हुआ। यह पत्रिका पूर्णत: सांस्कृतिक थी तथा इसके संपादन मोइनुद्दीन अहमद थे।

    1919 में लखनऊ से ‘हकीकत’ समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। 1922 में मदीना प्रेस बिजनौर से ‘गुन्चा’ नामक मासिक पत्र का प्रकाशन सैय्यद अख्तर के संपादन में प्रारंभ हुआ। इसमें मुख्य रूप से राजनीतिक लेखों के साथ साहित्यिक अभिरूचि के लेख भी प्रकाशित होते थे। सरकार से इसका कोई विरोध नहीं था। 1924 में आगरा के दयालबाग प्रेस से बालकृष्ण सक्सेना के संपादन में ‘प्रेस प्रचारक’ नामक उर्दू साप्ताहिक पत्र छपना शुरू हुआ। 1925 में अखिल भारतीय शिया सम्मेलन में लखनऊ से ‘सरफ़राज’ और ‘जमीयत-उल-उलमाये हिन्द’ ने ‘अल ज़मीयत’ पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। ‘सरफराज़’ नंद महल रोड स्थित सरफ़राज कौमी प्रेस से छपता था। इसके संपादक मुस्तफ़ा हुसैन रिज़वी थे तथा प्रकाशक सैय्यद अंसार हुसैन थे। इसी वर्ष सहारनपुर स्थित लीथो प्रेस से एस. ख्वाजा के संपादन में ‘सदाक़त’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 1926 में अलीगढ़ से ‘सुहेल’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। ‘सुलहकुल’ (गोरखपुर), मशरिक़ (गोरखपुर), ‘निजाब’ (बिजनौर), ‘डेली सहीफ़ा’ (कानपुर), ‘आइना’ (मेरठ), ‘आलमगीर’ (मेरठ), ‘आज़ाद’ (कानपुर) दैनिक समाचार-पत्र इस काल के प्रमुख उर्दू पत्र थे। 1930 में इलाहाबाद से मुंशी कन्हैयालाल के संपादन में ‘चाँद’ नामक उर्दू मासिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। यह पत्रिका बहुत लोकप्रिय हुई किंतु विभिन्न कारणों से एक वर्ष में ही इसका प्रकाशन बंद हो गया। इसी वर्ष इलाहाबाद स्थित ‘हिंदुस्तानी ऐकेडमी’ ने ‘हिन्दुस्तानी’ नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन मौलवी असगर अली के संपादन में प्रारंभ किया। 1931 में कानपुर में कर्नलगंज स्थित इंतजामी प्रेस से ‘गरीब’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके संपादक व प्रकाशक शौकत अली भोपाली थे। यह पत्र प्रारंभ में साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित था। इसी वर्ष लखनऊ के सरफ़राज़ कौमी प्रेस से ‘हरीम’ नामक पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह महिलाओं की पत्रिका थी। इसमें घरेलू कामकाज की सामग्री के अतिरिक्त नारी स्वतंत्रता तथा स्त्री शिक्षा पर उच्च कोटि के लेख प्रकाशित होते थे। इसके संपादक व प्रकाशक एस.एस. नसीम थे। 1932 में सरायनाहा (बदायूँ) के आला प्रेस से ‘मोमिन’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष सहारनपुर के बर्की प्रेस से ‘मोहकीक’ नामक पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन वजीर हसन शमीम के संपादन में प्रारंभ हुआ। ‘मोहकीक’ में चिकित्सा तथा स्वास्थ्य संबंधी लेख प्रकाशित होते थे। यूनानी चिकित्सा पद्धति सम्बंधी लेखों को इसमें प्रमुखता दी जाती थी। 1933 में बिजनौर में सिविल लाइन्स स्थित भूमि प्रेस से ‘ऋषि’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन ईश्वरशरण वेद के संपादन में प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष मुरादाबाद में स्थित प्रिंस रोड स्थित जिद्दत प्रेस से ‘जिद्दत’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन मिर्जा तियाब बेग के संपादन में प्रारंभ हुआ। इसमें राजनीतिक समाचारों के अतिरिक्त साहित्य, धर्म, दर्शन तथा कला पर विविध प्रकार की सामग्री प्रकाशित होती थी। 1933 में ही गोरखपुर स्थित मुराद प्रेस से अब्दुल मजीद के संपादन में ‘मुराद’ नामक सप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। इसका प्रकाशन अभी भी जारी है। 1936 में हरदोई में संडीला स्थित कूषण प्रेस से नानक प्रसाद अस्थाना के संपादन में ‘तजन’ नामक साहित्यिक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ।

    1939 में रामपुर स्थित नसरूल्ला बाज़ार के नाजिम प्रेस से एम. अली. खाँ के संपादन में ‘नाजिम’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष अलीगढ़ रियाज हिंद प्रेस से ‘शबाब’ नामक साहित्यिक पत्र का प्रकाशन जमाल साबरी के संपादन में प्रारंभ हुआ। इसमें राजनीतिक विचारों के लेखों को प्रमुखता नहीं दी जाती थी। 1940 में बरेली के दर्जी चौक स्थित एलाइट प्रेस से ‘रोहिलखंड अख़बार’ का प्रकाशन तेगबहादुर सिन्हा के संपादन में शुरू हुआ। इसमें राजनीतिक दलों सरकार तथा राष्ट्रीय घटनाओं पर निर्भीकतापूर्वक टिप्पणी की जाती थी। अलीगढ़ से 1941 लीधोकोला प्रिन्टर्स से ‘हमारी ज़ुबान’ नामक सप्ताहिक-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके संपादक अल अहमद सरूर तथा प्रकाशक सैय्यद तफ़ज्जुल हुसैन थे। इस पत्र का मुख्य उद्देश्य उर्दू भाषा का प्राचर-प्रसार करना था।

    1945 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लखनऊ के हेराल्ड प्रेस से ‘कौमी आवाज़’ नामक दैनिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके संपादक हयातुल्ला अंसारी थे। इसी वर्ष लखनऊ से चौधरी ख़ालिकुज्जमा ने ‘तनवीर’ नामक पत्र का प्रकाशन शुरू किया। 1945 में ही कानपुर में हुमायूँ बांग स्थित पैगाम प्रेस से ‘पैग़ाम’ नामक दैनिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके संपादक व प्रकाशक वजीउद्दीन थे। 1946 में कानपुर में ही चमनगंज स्थित आवाज़े वतन प्रेस से अशरफ़ हुसैन के संपादन में ‘हमारी आवाज़’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इमसें मज़दूर किसान हरिजन तथा स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए उच्च स्तरीय लेखों का प्रकाशन होता था। 1947 में बदायूँ में परवाना प्रेस से ‘हमारी आवाज़’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ। इसी वर्ष रामपुर में कहाना स्थित जमाल प्रेस से अब्दुलहई के संपादन में ‘अनहसनत’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसमें प्रमुख रूप से धर्म एवं दर्शन संबंधी लेखों का प्रकाशन होता था। 1947 से पहले उर्दू पुस्तकों और साहित्यों से पता चलता है कि स्वंतत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारों ने खोजी रिपोर्टरों के अलावा मुख्य रूप से घटनाक्रमों की ग्राउंड रिपोर्टिंग पर घ्यान केंद्रित किया था। इसलिए कहा जा सकता है कि अविभाजित भारत में ग्राउंड रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता का अग्रदूत रही।।

स्वतन्त्रता-पूर्व उर्दू पत्रकारिता की उन्नति के विभिन्न चरण -

    इस तरह से अगर देखा जाए तो 1837 में फ़ारसी के अदालत व सरकारी काम-काज की भाषा न रहने पर उर्दू को विकास का अवसर मिला, किंतु उर्दू पत्रकारिता इसका पूर्ण लाभ नहीं उठा सकी। 1837-50 के मध्य प्रकाशित होने वाले उर्दू पत्र-पत्रिकाओं का कोर्इ निश्चित स्वरूप नहीं था। पत्रों का स्वरूप बहुत कुछ संपादकों का कोई निश्चित स्वरूप नहीं था। समाचारों की प्रस्तुति घटनापरक या तथ्य-परक न होकर साहित्यिक अधिक होती थी। उन्नीसवीं शताब्दी के पाँचवें दशक तक डाक, रेलवे तथा संचार व्यवस्था न होने से घटनाओं की वास्तविकता जानने में काफ़ी कठिनाई होती थी। 1835-50 तक के उर्दू के पत्र-पत्रिकाएं राजनीतिक घटनाओं पर टीका टिप्पणी या जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व कर सकने की स्थिति में नहीं थे। इस काल में अनेक उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के संपादक हिन्दू थे। इस कारण अनेक पत्रों की भाषा हिंदी-उर्दू मिश्रित थी। उर्दू पत्रकारिता के विकास का दूसरा चरण 1850-1879 का है। इस बीच लखनऊ, मुरादाबाद, अलीगढ़, बरेली, बनारस, कानपुर, आगरा, मेरठ तथा रामपुर उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के प्रमुख प्रकाशन केन्द्र हो गये। यहां से अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। 1857 के विद्रोह में अनेक पत्र-पत्रिकाओं द्वारा विद्रोही नेताओं का पक्ष लेने के कारण विद्रोह समाप्ति पर सरकार ने उन्हें बंद करने के लिए उनके संपादकों को विवश कर दिया था। विद्रोह के पश्चात् प्रकाशित होने वाले अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं ने पहले की स्थिति से नसीहत लेकर राजनीतिक समाचारों व सरकार की आलोचना प्रकाशित करना लगभग छोड़ दिया था। इस बीच प्रकाशित होने वाले पत्रों में ‘अवध अख़बार’ सरकार का कट्टर समर्थक था। 1877 में मुंशी सज्जाद हुसैन के संपादन में प्रकाशित ‘अवध पंच’ जनभावनाओं को महत्व देने तथा सरकार की आलोचना करने के कारण जनता में अधिक लोकप्रिय हुआ।

    उर्दू पत्रकारिता की उन्नति का तीसरा चरण 1879-1900 का है। इस बीच हिन्दी पत्रकारिता प्रारंभ हो जाने से उर्दू पत्रकारिता को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। गंगा प्रसाद वर्मा के संपादन में 1883 में लखनऊ से प्रकाशित ‘हिन्दुस्तानी’ पत्र ने उर्दू पत्रकारिता को नयी दिशा दी। संयुक्त प्रांत में यह संभवत: पहला उर्दू पत्र था जो पत्रकारिता के निर्धारित सिद्धान्त पर चल कर निर्भीक व निष्पक्ष समाचार प्रकाशित करता था। यह सरकार राजनीतिक दलों, धर्म, सम्प्रदाय या किसी व्यक्ति विशेष के प्रति पूर्वाग्रह से प्रेरित नहीं था। इस बीच अलीगढ़ से प्रकाशित सर सैय्यद खाँ के अख़बार ने मुस्लिम समाज में व्याप्त अंधविश्वास रूढ़िवादिता तथा प्रतिक्रियावादी विचारों के विरूद्ध अभियान छेड़ रखा था। इस काल के पत्र-पत्रिकाओं में विविध प्रकार की सामग्री दी जाने लगी तथा भाषा काफी सुधर गयी। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक का अधिकांश उर्दू पत्र धर्म निरपेक्ष नहीं रह गये थे।

    उर्दू पत्रकारिता के विकास का चौथा तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण 1900-1947 का है। इस दौरान कई महत्वपूर्ण दैनिक समाचार पत्रों व पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इकबाल, प्रेमचन्द तथा मुंशी दयाशरण निगम जैसे प्रख्यात शायरों व साहित्यकारों की रचनाओं से पत्र-पत्रिकाओं का सम्मान बढ़ा। इतिहास, धर्म, दर्शन साहित्य आदि से संबंधित उच्चस्तरीय लेखों से उर्दू पत्रकारिता का कायाकल्प हुआ। 1900-1947 के मध्य के पत्र-पत्रिकाओं ने राजनीति तथा समाज-सुधार पर अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया था। कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के कार्य-कलाप मुख्य चर्चा के विषय थे। राष्ट्रीय आंदोलन की चरम सीमा होने के कारण इस काल के वे पत्र भी सरकार के कटु आलोचक हो गये जो पिछले कई दशकों से सरकार का समर्थन कर रहे थे। सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए कई कठोर प्रेस कानून बनाये और उन्हें सख्ती से लागू किया। राजनीति में कांग्रेस व मुस्लिम लीग के प्रश्न पर उर्दू के अधिकांश पत्र साम्प्रदायिकता की सीमा तक बिलगाव की स्थिति में आ गये थे। वे राष्ट्रीय समस्याओं को साम्प्रदायिकता का रंग देने में सिद्धहस्त हो गये थे। इस कारण कुछ उर्दू पत्रों को छोड़कर अधिकतर पत्र-पत्रिकाएं प्रगतिशील राष्ट्रीय विचारधारा के प्रति प्रतिक्रियावादी रवैया अपनाए हुए थे।

निष्कर्ष : उर्दू पत्रकारिता का प्रारंभ हिन्दी पत्रकारिता के पहले तथा फ़ारसी पत्रकारिता के बाद फ़ारसी पत्रकारिता से हुआ। बीसवीं सदी भारत में एक इंकलाब लेकर आयी जिसका प्रभाव भारतीय समाज एवं राजनीति पर भी पड़ा परिणामस्वरुप अंग्रेज़ो के अत्याचार और जागीरदारों व भूमि स्वामियों के विरोध में उर्दू पत्रकारों ने अपने लेख़ों के माध्यम से एक अलख़ जगाई। देश की आज़ादी की लड़ाई में उर्दू के लेखक और कवि अन्य भाषाओं के लेखकों और कवियों से पीछे नहीं रहे। इनमें अक़बर इलाहाबादी, इक़बाल चक वस्त, प्रेमचंद, जोश बाबू, दीनानाथ, हसरत मोहानी, शांति नारायण भटनागर, मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद, अली बंधु और ज़फ़र अली ख़ान इत्यादि की पत्रकारिता को विशेष रूप से महत्व प्राप्त है। जंग-ए-आज़ादी में जनचेतना और मनचेतना का कार्य प्रत्येक स्तर पर हुआ।

    भारत में राष्ट्रीयता के विकास तथा स्वतंत्रता आंदोलन में इन उर्दू पत्रकारों एवं उनकी रचनाओं की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन उर्दू पत्रकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से लोकमत को जाग्रत करके राष्ट्रीयता के विकास को गति प्रदान की थी। उर्दू पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्र गौरव में विश्वास की भावना जाग्रत की। स्वतंत्रता आंदोलन में उर्दू समाचार-पत्र उसके अभिन्न अंग बन गये। राष्ट्रीय विचारधारा के उर्दू पत्र-पत्रिकाओं ने एक ओर स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक बनाने में योगदान दिया और वहीँ दूसरी ओर सरकार की दमन नीति का सामना करते हुए अपना अस्तित्व बनाये रखा। 

अभिस्वीकृति
यह शोध पत्र आईसीएसएसआर, नई दिल्ली, द्वारा प्रदत्त पोस्ट-डॉक्टरल फ़ैलोशिप (Letter No. 3-152/18-19/PDF/GEN) के कार्य पर पूर्णता: आधारित है। 

संदर्भ :
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  2. सैयद अख़लाख़ अहमद, “उर्दू पत्रकारिता के दो सौ साल: अतीत, वर्तमान और भविष्य”, वर्ष-2022, https://hindi.indiatomorrow.net/2022/03/30/two-centuries-of-urdu-journalism-past-present-future/
  3. सैयद ख़लीक़ अहमद, “उर्दू पत्रकारिता के दो सौ साल: अतीत, वर्तमान और भविष्य”, वर्ष-2022, https://hindi.indiatomorrow.net/2022/03/30/two-centuries-of-urdu-journalism-past-present-future/ 
  4. मनजीत सिंह, “स्वतंत्रता आंदोलन और उर्दू साहित्य”, वर्ष-2022 https://sahityapedia.com/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D-168794/ 
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  9. विजयदत्त श्रीधर, “भारतीय पत्रिकारिता कोश”, खंड-1, वाणी प्रकाशन, वर्ष-2008, पृ. 86
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  11. गायत्री सिंह, “स्वतंत्रता आन्दोलन एवं उर्दू पत्रकारिता”, उत्तर प्रदेश में उर्दू पत्रिकारिता का इतिहास, डी. फिल् शोध प्रबंध, वर्ष-2081, पृ.146-166
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डॉ. मो. ज़फ़रूल्लाह
पोस्ट-डॉक्टरल फ़ैलो (आईसीएसएसआर, नई दिल्ली)
उर्दू विभाग, कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
 zafarullah_23@yahoo.com, 9839554595


  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-45, अक्टूबर-दिसम्बर 2022 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव 
चित्रांकन : कमल कुमार मीणा (अलवर)

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