आलेख : प्रतिबंधित उर्दू कविता और हसरत मोहानी / प्रो. शकीला खानम एवं गौरव सिंह

प्रतिबंधित उर्दू कविता और हसरत मोहानी

प्रो. शकीला खानम एवं गौरव सिंह

 

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के संबंध में बात करते हुए कई विद्वान इस आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास करते पाए जाते हैं। चूँकि इस महान आंदोलन की दुःखद परिणति भारत-पाकिस्तान विभाजन के रूप में भी हुई.. इसीलिए समान्यतः इस तथ्य में भी किसी को कोई आपत्ति नहीं दिखाई देती कि हिन्दू और मुस्लिम दोनों कौमे अपने निजी और नितांत भिन्न हितों के लिए साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत थीं। मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान देश की माँग के साथ ही हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों में दूरी बढ़ती चली गयी.. विभाजन के दौर में बड़े स्तर पर हुई सांप्रदायिक हिंसा, हत्या, लूट और बलात्कार इसकी पुष्टि करते हैं। मुस्लिम लीग का निर्माण, लीग के नेताओं के बयान, भारत-पाक विभाजन और अन्य कई ऐतिहासिक घटनाएँ राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के धर्म-निरपेक्ष स्वरूप को प्रश्नांकित करती हैं। यह ठीक बात है कि राष्ट्रीय आंदोलन के समय में हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य के कई प्रमाण भी देखने को मिलते हैं। लेकिन साथ ही हम इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकते कि स्वाधीनता प्राप्ति के पहले संग्राम 1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों ने मिलकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया था। तमाम शक्तिशाली हिंदू रियासतों ने बहादुरशाह का नेतृत्व स्वीकार किया था। इस क्रान्ति का सहज विकास भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में हुआ। परन्तु अंग्रेज सरकार ने अपनी 'फूट डालो, राज करो' की कूटनीतिक मंशा के तहत समय- समय पर ऐसे निर्णय लिए जिन्होंने दोनों समुदायों के बीच खाई को बढ़ाने का काम किया। इसने अंततः साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन में साम्प्रदायिकता का घुन लगा दिया। परन्तु यह बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का मूल चरित्र सांप्रदायिक है। ऐसा कहने से पूर्व हमको उन तमाम मुस्लिम नेताओं का नाम भी याद करना पड़ेगा जिन्होंने जिन्ना और लीग की पाकिस्तान राष्ट्र की माँग का विरोध किया। साथ ही विभाजन के उपरांत भी इस देश में रहने का निर्णय किया। ऐसे राष्ट्रवादी देशभक्त मुस्लिम नेताओं में मौलाना हसरत मोहानी का नाम सबसे अग्रणी है।

 

मौलाना हसरत मोहानी का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहान कस्बे में हुआ। हसरत के पूर्वज सैयद महमूद नैशापुरी अपने वतन नैशापुर से 1214-15 ई. में सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के दौर में हिंदुस्तान आये और मोहान में बस गए। हसरत का पूरा नाम 'सैयद फज़लुल हसन', पिता का 'सैयद अज़हर हसन' और दादा का 'सैयद महरुल हसन' था। हसरत की माँ का नाम शहर बानो था जिन्हें उर्दू और फ़ारसी की अच्छी जानकारी थी। वह अपने बच्चों के साथ मोहान में रहती थीं। उनकी माँ और नानी दोनों की साहित्यिक और काव्यात्मक अभिरुचि ने ही हसरत को शेरो-शायरी की तरफ प्रवृत्त किया। नानी के कहने पर ही हसरत ने नसीम देहलवी के कृतित्व का अध्ययन किया। ये दोनों औरतें पढ़ी-लिखीं थीं। हसरत को इस बात का गर्व था कि उनके घर की स्त्रियाँ शिक्षित हैं। उनके घर का माहौल धार्मिक था। हसरत धार्मिक ऐतबार से हनफ़ी थे और क़ादरी मत को मानते थे। उन्होंने खुद कहा है कि मैं परम्परावादी सुन्नी और सूफ़ी हूँ। उनका पूरा खानदान शाह अब्दुर्रज्जाक फिरंगी महल का अनुयायी था। हसरत भी बचपन ही में शाह साहब के मुरीदों के हलके में दाख़िल हो गए थे। उनके निधन के बाद वह उनके बेटे और उत्तराधिकारी मौलाना अब्दुल वहाब के मुरीद बने।

 

हसरत ने आरंभिक शिक्षा परम्परागत रूप से ग्रहण की। वो पाँच साल की उम्र में मोहान के मियाँ जी सैयद गुलाम अली के मकतब में शिक्षा के लिए बिठाए गए। यह मदरसा ज्ञानार्जन के एक अच्छे केंद्र के रूप में कस्बे में मशहूर था। पहले कुरान शरीफ़ पढ़ा, उसके बाद फ़ारसी और अरबी की शिक्षा हासिल की। उस वक्त मकतब के पाठ्यक्रम में सिकंदरनामा, बहादुर दानिश, अख़लाके मोहसिनी और इन्शा-ए अबुल फ़ज़ल जैसी साहित्यिक और शिक्षाप्रद किताबें शामिल थीं। हसरत ने यह सब किताबें छोटी उम्र में पढ़ डालीं। मकतब से मिडिल तक की शिक्षा मोहान में हासिल की। मिडिल का एक इम्तेहान मोहान से दिया और दूसरा छलोतर से, और दोनों में प्रथम आए। पूरे प्रदेश में अव्वल आने की वजह से वज़ीफा हासिल किया। उस ज़माने में मोहान में सिर्फ मिडिल तक की शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था थी। इसलिए मैट्रिक की शिक्षा के लिए फ़तहपुर, जो वहाँ से बहुत क़रीब था, भेजे गए और वहाँ के गवर्नमेंट हाई स्कूल में प्रवेश लिया। इस स्कूल से 1898 ई. में मैट्रिक का इम्तेहान प्रथम श्रेणी में पास किया और पूरे ज़िले में प्रथम आए। फ़तहपुर में अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त करने के बाद जो समय मिलता उसमें मौलाना सैयद ज़हरुल इस्लाम और मौलाना नियाज़ फतहपुरी के पिता मौलाना मुहम्मद अमीर खाँ से फ़ारसी पढ़ते। उस जमाने में अलीगढ़ शिक्षा का ऐसा केंद्र था जिसकी शोहरत दूर-दूर तक थी। हसरत भी पढ़ने के लिए अलीगढ़ जाने के इच्छुक थे, मगर उनके पिता उन्हें बाहर भेजने के लिए तैयार न थे। इसके लिए पिता को मनाया गया मगर कोई ख़ास असर न हुआ। जब कोई शक्ल नज़र न आई तो उन्होंने अपने उन मौलवी साहब से कोशिश कराई जो उन्हें अरबी-फारसी पढ़ाने घर पर आते थे। उनके आग्रह पर पिता ने इजाज़त दे दी। उन दिनों अलीगढ़ जाना योरप जाने से कम न समझा जाता था। डॉक्टर सर जियाउद्दीन अहमद उन दिनों एम.ए.ओ. कॉलिज में गणित के प्रोफेसर थे। उन्होंने गज़ट में जब पढ़ा कि हसरत मोहानी पूरे सूबे में अव्वल आए हैं तो उन्होंने अलीगढ़ आने की दावत दी। चुनाँचे हसरत अलीगढ़ में उच्च शिक्षा की तैयारी में लग गए। विदा करने का वक़्त आया तो घर में खूब रोना धोना हुआ। अलीगढ़ पहुँचकर वह बोर्डिंग हाउस में दाखिल हुए। उनकी चाल ढाल और लिबास कुछ इस तरह की थी कि अलीगढ़ के छात्र उनको देखकर हैरत में रह गए। यह वो ज़माना था जब अलीगढ़ की शिक्षा-दीक्षा की ख्याति हिंदुस्तान के अलावा विदेशों में भी फैल चुकी थी और मुसलमानों में नई रौशनी की लहर और बौद्धिक विकास के लिए यह कॉलिज दूर-दूर तक मशहूर हो चुका था। सरकारी नौकरियों के लिए इस कॉलिज की डिग्री ज़रूरी हो गई थी। हसरत ने 1903 में अलीगढ़ से बी.ए. किया। यह मोहान के पहले ग्रेजुएट थे। हसरत ने बी.ए. के बाद एल.एल.बी. के पहले साल में प्रवेश लिया। दाखिले के बाद उन्होंने वज़ीफे के लिए अपनी दरख़्वास्त प्रिंसिपल के पास भेजी। उस वक्त कॉलिज के प्रिंसिपल मॉरिसन थे। मॉरिसन चूँकि उनसे पहले से ख़फ़ा थे इसलिए वजीफे की अर्जी रद्द कर दी। हसरत को इससे बड़ी मायूसी हुई और उन्होंने विद्यार्थी जीवन को हमेशा के लिए अलविदा कहा।

 

अलीगढ़ से बी.ए. करने के उपरांत हसरत ने नौकरी करना नहीं चुना बल्कि अपनी आजीविका के लिए पत्रकारिता को जरिया बनाया। उन्होंने शहर के मिस्टन रोड पर एक कमरा किराये पर लिया। वहीं से सन् 1903 में उर्दू-ए मुअल्ला का प्रकाशन शुरू हुआ। मिस्टन रोड का नाम बाद में रसेलगंज रख दिया गया जो आज तक मशहूर है। इस पत्रिका के विमोचन के साथ ही उनका पत्रकार-जीवन शुरू हुआ। हसरत ने अपने राजनीतिक जीवन और पत्रकारिता का आरम्भ अलीगढ़ से किया। हसरत के ज्ञानात्मक और साहित्यिक जीवन का आरम्भ भी पत्रकारिता से हुआ। यह अलग बात है कि उन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए थे। लेकिन उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से जो मानदण्ड स्थापित किये उनको कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने उर्दू पत्रकारिता को एक नई भाषा दी, अनुशासन के आदर्शों से परिचित कराया और साथ ही उसकी साहित्यिक मूल्यवत्ता निर्मित की। उर्दू-ए मुअल्ला के प्रकाशन के बाद उर्दू में अल-नाजिर, दकिन रिव्यू, कश्मीर दरपन, ज़माना, निगार, और उर्दू जैसी स्तरीय साहित्यिक और शोधपरक पत्रिकाएँ निकलने लगीं, लेकिन हसरत के लिए सर सैयद का तहज़ीबुल अख़लाक़, मआरिफ़ (अलीगढ़), मख़ज़न (लाहौर) और दिलगुदाज़(लखनऊ) नमूने के लिए मौजूद थे। इन्हीं रिसालों से प्रभावित होकर हसरत ने अपनी पत्रकारिता का चिराग़ जलाया। उर्दू-ए मुअल्ला एकमात्र पत्रिका थी जिसने युवा पीढ़ी के मस्तिष्क को प्रभावित किया, उसमें राजनीतिक और साहित्यिक चेतना का विकास किया। यह अपनी समकालीन पत्रिकाओं से कई अर्थों में बिल्कुल भिन्न थी। इसने अपने रूप और सामग्री की विशिष्टता के कारण साहित्यिक दुनिया में एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। बेहद रोचक बात यह है कि इस पत्रिका को निकालने में हसरत की पत्नी निशातुन्निसा बेगम उनकी साहित्यिक सहयोगी रहीं थीं। यह पत्रिका किस स्तर पर हसरत के निजी उद्यम से निकलती रही होगी इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हसरत को इसमें पेपरमैन और संगसाज़ी के काम को भी स्वयं करना होता था।

उर्दू-ए मुअल्ला का प्रकाशन हसरत के साहित्यिक और राजनीतिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से है। इस पत्रिका के माध्यम से हसरत ने साहित्यिक दुनिया में हस्तक्षेप तो किया ही। साथ ही राजनीतिक परिदृश्य के कई मुद्दों पर अंग्रेज सरकार का मुखरता से विरोध करना आरम्भ किया। इसका परिणाम उनको भुगतना पड़ा। पाँच साल तक उर्दू-ए-मुअल्ला नियमित रूप से निकलता रहा। उन्होंने 1908 में मिस्त्र के मशहूर लीडर मुस्तफ़ा कामिल की मौत पर एक विशेषांक प्रकाशित किया। जिसमें एक लेख 'मिस्त्र में बर्तानिया की पॉलिसी' पर भी था। लेख में अंग्रेजों की नीति की निंदा की गयी थी। अंग्रेज़ी हुकूमत ने उर्दू-ए-मुअल्ला के सम्पादक हसरत मोहानी को विद्रोही करार दे दिया। इस लेख को लिखने वाले का नाम नहीं दिया गया था। हसरत मोहानी ने सम्पादक होने के नाते सारी जिम्मेदारी खुद पर ले ली। अलीगढ़ में उनका यह पहला अपराध था। कॉलेज की इज़्ज़त को खतरे में पड़ते देखकर उन सभी लोगों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। यहाँ तक कि नवाब वक़ारुल मुल्क भी, जो हजरत के बड़े प्रशंसक थे, इस लेख के प्रकाशन से उनके ख़िलाफ़ हो गए। हसरत के ख़िलाफ़ बहुत लोगों ने गवाहियाँ दीं। इस अपराध के लिए अंग्रेज सरकार ने उन्हें 500 रूपये का जुर्माना और दो साल कैद की सजा दी। यह उनके लिए जेल जाने का पहला अवसर था। उनका पुस्तकालय, प्रेस सभी कुछ पुलिस ने अपने कब्जे में कर लिया। जेल जीवन में उन्हें बहुत कष्ट झेलने पड़े। उनके साथ ही उनकी पत्नी को भी तमाम आर्थिक और मानसिक संघर्ष झेलने पड़े। उनकी पत्नी निशातुन्निसा बेगम बहुत खुद्दार महिला थीं, हसरत की कैद के दौरान उन्होंने किसी भी तरह की आर्थिक सहायता लेने से इंकार कर दिया था।

 

उस समय भारतीय मुसलमानों में राजनीतिक चेतना का सर्वथा अभाव था। हसरत की उर्दू-ए-मुअल्ला एकमात्र पत्रिका थी जिसने मुस्लिमों में राजनीतिक चेतना का प्रसार किया, मुस्लिम समुदाय को राजनीति में भाग लेने को प्रेरित किया, हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया एवं राजनीतिक प्रतिरोध के माध्यम से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। 1909 में जेल से रिहा होने के उपरांत उन्होंने उर्दू-ए-मुअल्ला को पुनः आरम्भ करने की योजना बनायी। इस सिलसिले में वो लगभग सभी प्रेस मालिकों के पास गए। परन्तु कोई भी इस पत्रिका को प्रकाशित करने को तैयार नहीं हुआ। अंततः उन्होंने खुद अपने हाथ का प्रेस लगाया और उनका नाम उर्दू प्रेस रखा। लिखाई, संगसाज़ी से लेकर पेपरमैन तक सभी काम वो स्वयं करते थे और बीवी संपादकीय सहकर्मी के रूप में सहयोग करतीं। इस तरह यह पत्र अलीगढ़ से अप्रैल, 1913 तक निकलता रहा। 12 मई, 1913 को, रात के 9 बजे खुद सुपरिटेंडेंट पुलिस ने हसरत के मकान पर एक नोटिस दिया जिसमें लिखा था कि उक्त पत्रिका में पुलिस ऐक्ट 1910 के अनुसार कुछ शब्द कानून-विरोधी छपे हैं। इसके बदले में एक सप्ताह के अंदर तीन हजार रुपये जिला मजिस्ट्रेट के पास जमा करा जाएँ। चूँकि उर्दू प्रेस की कुल सम्पत्ति ही दो अदद पत्थर और एक लकड़ी का दस्ती प्रेस था। यह जुर्माना उनके लिए बड़ा झटका था। हसरत किसी भी तरह यह जुर्माना देने में सक्षम नहीं थे। अंततः उनको यह प्रेस बंद ही करना पड़ा। उन्होंने उर्दू-ए-मुअल्ला बंद करते हुए लिखा-

 

"उर्दू  प्रेस  का ख़ात्मा

ज़मानत के लिए नोटिस

 

12 मई, 1913 को 9 बजे शब के क़रीब अलीगढ़ सुपरिटेंडेंट पुलिस ने बज़ाते-खुद वारिद (स्वयं प्रकट) होकर राक़िमुल हुरूफ़ ( इन पंक्तियों के लेखक) के सामने हुकूमत की जानिब से एक नोटिस पेश किया जिसका मफ़हूम (आशय) यह था कि उर्दू प्रेस चूँकि अज़ रूए ऐक्ट 1910 चंद अल्फाज़ ख़िलाफ़ छापे हैं इसलिए एक हफ्ते के अंदर तीन हज़ार रुपये की ज़मानत मजिस्ट्रेट जिला के पास जमा करनी चाहिए… वाज़ेह हो (पाठक यह ध्यान रखें) कि उर्दू प्रेस की कुल कायनात एक लकड़ी के प्रेस और दो पत्थरों पर मुश्तमिल है जिसकी मजमूई (कुल मिलाकर) कीमत पचास रुपये से ज़ायद नहीं। ऐसे बे-बिज़ाअत (निर्धन) प्रेस से तीन हज़ार रुपये तलब करना मज़हका खेज़ (हास्यास्पद) होने के अलावा हैरत से गुज़रकर कीना-परवरी (द्वेषपूर्ण कार्य) की हद तक पहुँच गया है, जिसका मतलब इसके सिवा कुछ नहीं हो सकता कि उर्दू प्रेस के जारी रहने का कोई इमकान बाकी न रहे।"

 

हसरत की हिम्मत और दिलेरी का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो इतनी ज़्यादतियों के बावजूद भी अंग्रेज सरकार के सामने नहीं झुके। कैद से रिहा होने के बाद हसरत मोहानी को उनके मित्रों ने राजनीति से दूर रहने की सलाह दी। मगर उन्होंने अपने शुभचिंतकों और दोस्तों की सलाह को स्वीकार नहीं किया बल्कि उनके तेवर पहले से भी अधिक आक्रामक हो गये। अंग्रेज सरकार की ज़्यादतियों के साथ ही उनके इरादे पहले से अधिक दृढ़ होते चले गए। बहुत-से खरीददारों ने इसी आधार पर उर्दू-ए-मुअल्ला को चंदा देना बंद कर दिया। यहाँ तक कि अधिकांश लोग उनसे मिलने-जुलने में भी कतराने लगे, मगर उन्होंने बिना किसी की परवाह किये अपना संघर्ष जारी रखा। उनके साथ बर्तानवी हुकूमत की ज़्यादती से मौलाना अबुल कलम आज़ाद के दिल पर आघात हुआ। आज़ाद ने अंग्रेज सरकार के इस रवैये के ख़िलाफ़ अपने पत्र 'अल-हिलाल' में विस्तार से लिखा।

 

हसरत गाँधी जी के विचारों और आंदोलन के तरीकों का बहुत समर्थन नहीं करते थे। असहयोग आंदोलन के दौर में भी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के बारे में हसरत मोहानी के विचार गाँधी से भिन्न थे। उनका कहना था कि हमारी लड़ाई सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद से है, इसीलिए सिर्फ ब्रिटिश माल का बहिष्कार किया जाये। गाँधी जी ने हसरत की इस माँग को स्वीकार नहीं किया। हसरत मोहानी गाँधी जी की तरह देश के स्वतंत्रता संग्राम को अहिंसा और हिंसा के दो खानों में विभाजित करके नहीं देखते थे। उनके लिए राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए किया जा रहा अहिंसक और हिंसक हर तरह का प्रयास स्वीकार्य था। उन्होंने यह माँग भी की कि आंदोलन के दौरान अहिंसा का अंकुश हटा दिया जाये। इस तरह गाँधी और कांग्रेस से उनका मतभेद निरंतर बना रहा। इतने मतभेदों के बावजूद भी गाँधी जी ने हसरत साहब के लिए जो कहा उसे पढ़कर उनके व्यक्तित्व का अंदाजा लगाया जा सकता है-

 

'मौलाना हसरत मोहानी हम लोगों में बहुत सख़्त मिजाज़ आदमी हैं। पक्के इरादे वाले इनसान हैं। बेबाक तो वह हैं ही, कि उनकी ये खूबी ऐब-सी बन गयी है... मैं जानता हूँ कि हिन्दू मुस्लिम एकता और कौम परस्ती का समर्थक उनसे बढ़कर कोई नहीं।'

 

राजनीति में वे तिलक को अपना आदर्श मानते थे। यही कारण था कि कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरम दल और गरम दल के बीच टकराव के बाद वे लोकमान्य तिलक के साथ हो गए। यह एक तरह से कांग्रेस के साथ उनका अलगाव था। वे कांग्रेस के नरमपंथियों और मुस्लिम लीग दोनों को हुकूमत का वफादार मानते थे और वे दोनों के विरोध में थे। इसीलिए वो इन दोनों का साथ नहीं निभा पाए। तिलक भी पूर्ण स्वराज के पक्षधर थे। शायद यही कारण था कि हसरत निरंतर उग्र से उग्रतर होते गए। वे जब तक लीग में रहे, जिन्ना से बराबर उनका मतभेद बना रहा। शायद लोकमान्य तिलक की विद्वता के प्रभाव में भगवद्गीता और श्री कृष्ण के प्रेमी बन गए। उन्होंने कृष्णविषयक कविताएँ भी लिखीं। वे लोकमान्य तिलक के बहुत बड़े भक्त थे। लोकमान्य के देहांत के उपरांत जब उनकी अस्थियों का कलश त्रिवेणी संगम पर ले जाया जा रहा था, उस समय हसरत ने रुंधे गले से कहा-

 

आलम में मातम क्यों न हो बरपा, दुनिया से सिधारे आज तिलक।

बलवंत तिलक महाराज तिलक, आजादों के सरताज तिलक

जब तक वह रहे दुनिया में रहा, हर एक दिल पर काबू उनका।

अब होके नज़र से पोशीदा, रूहों पे करेंगे राज तिलक

 

 

हरसत मोहानी ने 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव रख दिया जिसे कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया। गाँधी जी ने उनके इस प्रस्ताव को 'गैर-जिम्मेदारी की बात' कहकर रद्द करवा दिया। यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है कि जब कांग्रेस और उसका नेतृत्व प्रतिनिधित्व की मांग करते हुए समझौतावादी तौर-तरीकों पर काम कर रहा था तब हसरत मोहानी 'मुकम्मल आज़ादी' का प्रस्ताव सामने रखते हैं। कहना न होगा उनका यह प्रस्ताव उनकी प्रगतिशील सोच, दूरगामी दृष्टि और जोखिम उठाने के साहस की ओर संकेत करता है। साथ ही यह बात भी विचारणीय है कि उस दौर में कांग्रेस की पूरी कमान गाँधी जी के हाथ में थी, इसके बावजूद भी हसरत मोहानी के पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव को एक-तिहाई वोट मिल गए। हलांकि प्रस्ताव 23 के मुकाबले 36 मतों से गिर गया। अंततः प्रस्ताव आगे भले ही न बढ़ा हो लेकिन उन्होंने ऐसा करके देश के स्वाधीनता संग्राम में अपने लिए जगह बना ली और देश के लिए पूर्ण आज़ादी का मंत्र दे दिया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इस पर कहा-

 

'मौलाना हसरत मोहानी के भाषण का श्रोताओं पर गहरा प्रभाव हुआ और ऐसा लगा कि मौलाना का मुकम्मल आजादी का प्रस्ताव मंजूर कर लिया जाएगा, लेकिन गाँधी के विरोध की वजह से अधिवेशन ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया।''

 

हसरत मोहानी रूस की साम्यवादी क्रान्ति से बहुत प्रभावित हुए थे। 1925 में जब कॉमरेड सत्यभक्त ने कानपुर में पहली कम्युनिस्ट कॉन्फ्रेंस बुलाई तो उसमें सबसे अधिक सहायता करने वाले लोगों में हसरत मोहानी भी थे। कॉमरेड सत्यभक्त बताते हैं कि पहली कम्युनिस्ट कॉन्फ्रेंस कराने के लिए हसरत साहब ने बड़ी मदद की थी। मेरे पास महज हजार-पाँच सौ की जमा पूँजी थी जिसमें इतने बड़े कार्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वे कहते हैं कि मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि जमीन से लेकर उस पांडाल को खड़ा करने में जो सात-आठ सौ रूपये खर्च हुए, वह सब हसरत साहब ने अपने स्वदेशी स्टोर की बैंक से ब्याज के रूप में मिली रकम से किया। कॉन्फ्रेंस में हसरत साहब ने ही कम्युनिस्ट पार्टी को स्वतंत्र रखने का पूर्णतया समर्थन किया। यह बात बहुत लोगों को नागवार गुजरी। जिससे नाराज होकर मुजफ्फर अहमद (कलकत्ता) अपनी पुस्तक में लिख गए हैं कि हसरत मोहानी जैसे पूर्ण स्वतंत्रता समर्थक ने सत्यभक्त के निस्सार विचारों का समर्थन कैसे कर दिया? दरअसल यह आश्चर्य होना बेहद स्वाभाविक है कि इस्लाम में गहरी आस्था रखने वाले एक मौलाना कैसे कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हो सकते हैं? बात यह थी कि हसरत साहब इस्लाम को कम्युनिज्म के अनुकूल मानते थे। उनका कहना था कि जिस प्रकार कम्युनिज्म की मान्यता है कि हर मनुष्य को अपनी व्यक्तिगत जरूरत से अधिक धन संग्रह नहीं करना चाहिए, उसी प्रकार इस्लाम धर्म ने आरम्भ से ही ऐसे नियम बना दिए थे जिससे व्यक्तियों के पास फालतू धन ना जमा हो। हसरत पर कम्युनिज्म का प्रभाव कितना रहा, इसके उदाहरण के लिए उनके कुछ अश'आर देखे जा सकते हैं-

 

ज़माना वह जल्द आने वाला है जिसमें

किसी का ना मेहनत पर दावा रहेगा।

 

सरमायादार खौफ़ से लरज़ा हैं, क्यों ना हों,

मालूम सबको कूवते मज़दूर  हो चुकी।

 

आज जब हम मुस्लिम समुदाय के भीतर की प्रगतिविहीनता और रूढ़िवादिता पर चिंता प्रकट करते हैं हमको इस ओर भी विचार करना चाहिए कि आख़िर वे कौन-से कारण थे कि मुस्लिम समुदाय के उन नायकों को एक-एक करके दरकिनार कर दिया गया जो प्रगतिशील सोच के थे। जिनके विचारों को लेकर मुस्लिम समुदाय के भीतर प्रगतिशील आंदोलनों को बढ़ावा दिया जा सकता था। साथ ही इस तबके की राजनीतिक और सामाजिक चेतना को माँजने की दिशा में भी जरूरी काम किया जा सकता था। खान अब्दुल गफ्फार खाँ, ग़दर पार्टी के मौलाना बरकतउल्ला, यूसुफ मेहर अली, शहीद अशफ़ाक़उल्ला खाँ, कामरेड मुजफ्फर अहमद, शौकत उस्मानी और हसरत मोहानी जैसे कितने ही लोग मुस्लिम समुदाय में हुए.. जिनकी राजनीतिक विरासत को लेकर मुस्लिम समुदाय की राजनीति यदि आगे बढ़ी होती तो आज इस समुदाय की स्थिति ही भिन्न होती।

 

इसको भारतीय राजनीति और साहित्य की विडंबना ही कहा जायेगा कि आज़ादी के उपरांत जितनी चर्चा जिन्ना जैसे मुस्लिम नेताओं की हुई उसका दसवाँ भाग भी हसरत मोहानी जैसे महान सहिष्णु नेता को नहीं दिया गया। जिन्ना को सहिष्णु और महान घोषित करने के लिए 'जिन्ना: एक पुनर्दृष्टि' जैसी भारी-भरकम पुस्तकें लिखी गयीं। वहीं किसी ने हमको यह बताने की ज़हमत नहीं उठायी कि भारतीय राजनीति में हसरत मोहानी नाम का एक मुस्लिम नेता हुआ था जो कृष्ण की भक्ति में गीत लिखता था। ब्रज की गलियों के दीवाना था। तिलक जैसे हिन्दू नेता को अपना राजनीतिक गुरु मानता था। कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करने में जिसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। मजदूरों और गरीबों के हक़ में संघर्ष करता था। तीसरी श्रेणी के डिब्बे में यात्रा करता था। पार्लियामेंट का सदस्य होने के बाद हर तरह की विशिष्टता से दूर एकदम साधारण जीवन जीता रहा। आज़ादी की लड़ाई में तमाम क्रान्तिकारियों की ज़ुबान पर रहने वाला कालजयी नारा 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' दिया था। हसरत मोहानी जैसे महान शायर, क्रान्तिकारी पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी का स्मरण भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन को समझने की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही वर्तमान में फैली सांप्रदायिक असहिष्णुता, असमानता, दिशाहीन राजनीति को उचित मार्ग दिखाने में भी सक्षम हो सकता है।

 

सुधीर विद्यार्थी लिखते हैं- "क्या इस वक्त में भी एक खुद्दार और ईमानदार आदमी की ज़िन्दगी जीना वैसा मुहाल नहीं है जैसा कि हसरत के लिए उन दिनों में था जब मुल्क विदेशी हुकूमत का गुलाम था। हसरत 'मुकम्मल आज़ादी' का सपना उसी ज़रूरतमन्द आदमी के हक में पूरा करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे जिसे आज भी अपनी मेहनत से दो जून की रोटी जुटा पाना कठिन होता जा रहा है। पूँजी के असमान वितरण ने हालात और भी मुश्किल कर दिए हैं। गरीब ज्यादा गरीब तथा रईस और भी रईस होता चला जा रहा है। हसरत मोहानी आज ज़िन्दा होते तो भी शोषण पर आधारित इस व्यवस्था को बदलने के लिए कहीं मर-कट रहे होते। वे तो बने ही थे इस मिट्टी के।"

 

प्रो. शकीला खानम
डीन ,कला संकाय, अध्यक्ष ,हिंदी विभाग
डॉ. बी. आर. आंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
सम्पर्क : profkhanam@gmail.com, 0944188158
 
गौरव सिंह
शोधार्थी, हिंदी विभाग
हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
सम्पर्क ; 21hhph02@uphyd.ac.in, 07557284541 


अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  प्रतिबंधित हिंदी साहित्य विशेषांक, अंक-44, नवम्बर 2022 UGC Care Listed Issue
अतिथि सम्पादक : गजेन्द्र पाठक
 चित्रांकन अनुष्का मौर्य ( इलाहाबाद विश्वविद्यालय )

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