शोध आलेख : नवगीतों में उभरता हाशिये का समाज / शीतल कोटवार

नवगीतों में उभरता हाशिये का समाज
- शीतल कोटवार

शोध सार : नवगीत एक ऐसी विधा के रूप में उत्पन्न हुई जिसमें भारतीय परम्परा, संस्कृति, समाज आदि में मौजूद गूढ़ सच्चाई को कविता का विषय बनाया| नवगीतकार ने भाषा के कसाव को साधते हुए अपने समय के यथार्थ को व्यक्त किया है| नवगीत में समसामयिक विषय-वस्तु को उद्घाटित किया है| नवगीत में विचारों को लयात्मक रूप में व्यक्त किया गया है| आज के सांसारिक जीवन के सूक्ष्म लक्ष्यों को कवियों ने नवगीत के में बखूबी जगह दी है| रुढ़िवादी सामाजिक संबंधों के खिलाफ भी नवगीतकारों ने अपनी काव्य रचनायें की हैं| साथ ही वे समाज में व्याप्तजीवित सच्चाई को समाज के केन्द्र में लाने में सफल भी हुए हैं| एक सार्थक परिभाषा के रूप में हम कह सकते है कि वह गीत नवगीत है जिसमें समय की जरुरत के अनुसार उसके बिम्बों, प्रतीकों, उपमा और उपमानों में बदलाव कर उसे अभिव्यक्त करें|

बीज शब्द : नवगीत, हाशिए का समाज, दलित विमर्श, संघर्ष, शोषण, विद्रोह की भावना, सुरक्षा की समस्या, अशिक्षा, बालश्रम|

मूल आलेख : हिंदी साहित्येतिहास में नवगीत की परम्परा 1930 के दशक में निर्मित होती दिखाई देती है| जिसका विकसित रूप हमें आगे तक नजर आता है| नवगीत को प्रारम्भ में नयी कविता या नयी कहानी के समानांतर ही देखा गया क्योंकि नवगीत नाम की कोई साहित्यिक बोधक शब्दावली प्रारम्भ में नजर नहीं आती| ‘नयी कविताने परंपरागत कविता से अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिएनयीविशेषण का प्रयोग किया उसी प्रकारनवगीत नेनव एवंगीत पदों का सहारा लिया| नवगीत हिंदी साहित्य की एक नवीन विधा है जोनव औरगीत शब्द का समावेश हैं| नवगीत में एक मुखड़ा और दो या तीन अंतरे होते है| जिसमें अंतरे की अंतिम पंक्ति मुखड़े की अंतिम पंक्ति के समान होनी चाहिए जिससे अंतरे के बाद मुखड़े की पंक्ति को दोहराया जा सके| नवगीत एक ऐसी विधा है जो मनुष्य के सुख-दुःख, हर्ष एवं उल्लास को ही व्यक्त नहीं करता बल्कि समाज में होने वाली सामाजिक विसंगतियों के प्रति आक्रोश, दलित समाज का शोषण, आम जनता की समस्याएँ, तकलीफ, संघर्ष, प्रतिरोध की भावना आदि को अभिव्यक्त करता हैं| शम्भुनाथ सिंह ने नवगीत को परिभाषित करते हुए लिखते है कि- “नवगीत एक आपेक्षिक शब्द है| नवगीत की नवीनता युग सापेक्ष्य होती है| किसी भी युग में नवगीत की रचना हो सकती है| गीत रचना की परम्परा पद्धति पर भावबोध को छोड़कर नवीन पद्धति और विचारों के नवीन आयामों तथा नवीन भाव-सरणियों को अभिव्यक्त करने वाले गीत जब भी और जिस भी युग में लिखें जायेगें, नवगीत कहलायेंगे|[1]

सीधे शब्दों में कहा जाए तो नवगीत वह विधा है जिसने भारतीय परंपरा, संस्कृति, समाज आदि में उपस्थित गहन सच्चाई को अपनी कविता का विषय बनाया| वह गीत नवगीत की श्रेणी में आता है जो समय की आवश्यकता के अनुरूप अपने बिम्बों, प्रतीकों, उपमा और उपमानों में परिवर्तन करके स्वयं को अभिव्यक्त करे| नवगीत परंपरा के प्रारम्भ के संदर्भ में नवगीतकार माहेश्वर तिवारी कहते हैं– “नवगीत की पहली आहट निराला के गीतों में ही मिलती है| गीत की नई भाषा और शिल्प की नई बुनावट सबसे पहले महाप्राण निराला में ही मिलती है| यह ध्यान देने की बात है कि गीत ही नहीं, प्रयोगवादी और कालांतर में नई कविता के नाम से अभिहित समकालीन कविता के प्रथम प्रयोक्ता भी निराला ही हैं| कुछ लोग नवगीत का आरम्भ छठे दशक से मानने के आग्रही हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि गंगा को उत्तरकाशी या उससे आगे मानने की अपेक्षा गंगोत्री से ही माना जाना चाहिए क्योंकि गंगोत्री से निकलने के पश्चात् गंगा भागीरथी, अलकनंदा आदि नामों से जगह-जगह जानी जाती है लेकिन उत्स तो गंगोत्री ही है, उसी तरह निराला को नवगीत का प्रथम पुरुष माना जाना चाहिए|”[2]

  नवगीत वह गीत है जो गीत के शिल्प विधान में समयानुसार परिवर्तन करता है और कथ्य को अधिक से अधिक यथार्थपरक बनाता है| “नवगीत कोई जादू नहीं है| यह हिंदी की गीति परम्परा का सहज क्रमिक विकास है| इस प्रकार नवगीत गीत की सीमित होती दुनिया को पुन: प्रतिष्ठित करने की आकांक्षा से आगे आया और एक आन्दोलन बन गया| फलत: नवगीत आधुनिक युग बोध की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन गया| उसने नयी लय, नया संगीत, नए भावबोध तथा सौन्दर्य अभिरुचि के साथ परंपरा को भीं जीवित रखा| वर्तमान में नवगीत ने उत्तर आधुनिक दर्शन और वैश्वीकरण की बढती वणिक् वादी प्रवृति के विरुद्ध तथा परंपरा और लोक संस्कृति की पक्षधर रचना के रूप में अपना एक मुकाम हासिल किया है| गीतात्मकता की नयी प्रविधि, लय और धुनों के संस्कार यहाँ देखने को मिलेगें| दिक्काल की सापेक्षता में गीत जिस नवता की सर्जना करता है, वह नवगीत हो जाता है|”[3]

          दलित कविता हो या दलित नवगीत उसका उद्देश्य होता है मानव जीवन के संघर्ष और परिश्रम को व्याख्यायित करना| दलित नवगीतों में भी कल्पना के सुनहरे जाल नहीं बुने गए है| उसमें हाशिये के समाज के संघर्ष को चित्रित किया गया है| नवगीतकार अपने नवगीत के माध्यम से समाज में व्याप्त विषमताओं और अमानवीय व्यवस्था पर प्रहार करता है| नवगीतकार ने उस समाज की पीड़ा, वेदना और अपमान को पूरी ईमानदारी के साथ अपने नवगीतों में व्यक्त किया है| दलितों के अत्याचार और अन्याय को वाणी देता श्याम निर्मम जी का यह नवगीत-

             “चेहरा एक/ मुखौटे अनगिनत 
              इतने सभ्य हुए,/भीतर-भीतर बड़े घिनौने
              बाहर भव्य हुए !   
              साँप नहीं पर ये साँपों से भी
              हैं ज्यादा ही जहरीले,/ है किसमें इतनी मजाल जो
              इनके डसे हुए को कीले|[4]

 हाशिये का समाज किसे कहा जाता हैं? सीधे शब्दों में कहे तो जिसे केंद्र में से बाहर निकाल दिया गया हो| हाशिए के समाज से तात्पर्य समाज में रहने वाले उस समूह या वर्ग से है जो उपेक्षित हैं या जिसे अपने अधिकारों से वंचित रखा जाता है| इस समाज में दलित, आदिवासी, स्त्री, बुजुर्ग, मजदूर,किसान को सम्मिलित किया जाता है| दलित साहित्य में, अनुमान, कल्पना तथा ईश्वरोपासना नहीं मिलेगी| दलित साहित्य को आत्मकथा, उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना आदि के माध्यम से समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है| जिनमें वर्ण-व्यवस्था केन्द्रित समाज की आलोचना जातीय शोषण एवं दमन के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया गया है| लेखक ने निम्न विधाओं में हाशिये के समाज की बदहाल स्थिति, दमन, शोषण ,संघर्ष तथा पीड़ा का यथार्थ चित्रण किया है|  इसी क्रम में नवगीत का विकास हुआ प्रारंभ में नवगीतकारों ने जो नवगीत लिखे उनको प्रकृति-वर्णन, तीज-त्यौहार, प्रेम-गीत, ऋतुवर्णन आदि से जोड़ा किन्तु जब हाशिये के समाज से सम्बन्ध रखने वाले नवगीतकारों की पीढ़ी नवगीत लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हुई तो नवगीत के स्वर में हाशिये के समाज से जुड़ी हुई जीवन सच्चाइयों का भी विवरण मिलना प्रारम्भ हो गया|

    ‘सर्वप्रथम ऋग्वेद मेंवर्ण शब्द का प्रयोग मिलता है, जो भारतीय समाज में आर्य और दासों के लिए उपयोग में लाया गया था| देखा जाए तो ये मार्क्सवाद के बुर्जुआ और सर्वहारा के समान ही है| समाज के बँटवारे के पीछे अर्थशास्त्र के कार्य-विभाजन का सिध्दांत ही प्रमुख था| इसी आधार पर समाज को चार वर्णों में बाँटा गया| आर्थिक स्तर को आधार मानकर किया गया यह वर्ण-विभाजन उस वर्ण को एक विशेष वर्ण के रूप में लपेटता चला गया| जिसके कारण आगे चलकर उसकी पहचान उसके पेशे से की जाने लगी थी| इस तरह से भारतीय समाज में वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति हुई|इसी वर्ण-व्यवस्था को आधार मान कर एक ऐसी जाति को समाज में लाया गया जो अस्पृश्य मानी जाती थी| जिसे समाज में गाँव के बाहर रखा जाता था, उनके काम को हीनदृष्टि से देखा गया और उनके स्पर्श से सवर्ण समाज को दुबारा स्नान करने की जरुरत महसूस होती थी| सवर्ण समाज का मानना था कि इनके स्पर्श से वह अशुध्द हो जाते हैं| जिसके लिए दुबारा स्नान करना अनिवार्य होता है| इन्हीं कारणों से यह समाज से धीरे-धीरे कटने लग गए| जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज की वर्ण-व्यवस्था से ही इनका अस्तित्व ख़त्म होता चला गया| आगे चलकर स्थिति इतनी ख़राब हुई की इन जातियों को हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया|

चौथीराम यादव एक पत्रिका को दिये गए साक्षात्कार में कहते हैं किहाशिये के समाज से प्राय: तात्पर्य दलित समाज है, पिछड़ा समाज है, आदिवासी समाज है, किसान, मजदूरी यही सब तो है हाशिये का समाज| मुझे लगता है कि जिन्हें हाशिये का समाज कहा जाता है, वे बहुसंख्यक समाज है और आबादी के हिसाब से बहुसंख्यक समाज होने के नाते मुख्यधारा का समाज है| लेकिन तमाम आर्थिक संसाधनों और शिक्षा से वंचित करके उन्हें हाशिये पर ढ़केल दिया गया है और जो हाशिये के लोग है, कम आबादी वाले लोग है, वे वर्चस्व बनाये हुए हैं और वही मुख्यधारा के केंद्र में है| जिसे आज हाशिये का समाज कहा जाता है, उसे हाशिये का समाज नहीं कहा जाना चाहिए| यह मुख्यधारा का समाज है क्योंकि बहुसंख्यक समाज है और उसकी आबादी भी बहुत ज्यादा है, देश की बहुसंख्यक आबादी को हाशिये का समाज नहीं कहा जा सकता| लेकिन स्थिति यह है कि बहुत दिनों से जो शिक्षा है, आर्थिक संसाधन है, उससे वंचित करके उन्हें एक प्रकार से हाशिये पर ढकेल दिया गया है| उस पर पढ़े-लिखे सर्वस्वशाली लोग आधिपत्य जमा चुके हैं, तो हाशिये के समाज की नए ढंग से सोचने की जरुरत है|[5]

          इस बात की गवाही खुद इतिहास देता है, जहाँ समाज का यह हाशिया केंद्र में आने के लिए संघर्ष करता रहा है| योगेन्द्र जी की पंक्तियाँ इसका जीता-जागता उदाहरण प्रस्तुत करती हैं-

                 “कभी गाँव में
                  कभी शहर में
                 भटक रही लाचारी|
                 श्रम के हिस्से
                 रोज पसीना
                 लाल हुई हैं आँखें
                 कटी हमेशा ही नभ में
                 उड़ती चिड़ियों की पाँखें|”[6] 

          नवगीत में लेखकों ने समाज को यही दिखाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार सवर्ण समाज ने हाशिये के समाज को शोषित किया है| इसके साथ हमेशा यही प्रयास रहा कि हाशिए पर स्थित समाज को मुख्यधारा के केन्द्र से अलग रखा जाए| श्याम जी ने गीत और नवगीतों के माध्यम से समाज पर हो रही पीड़ा, अभाव को पूरी ईमानदारी के साथ व्यक्त किया है| जहाँ सवर्ण समाज द्वारा इस समाज के साथ जो नाइंसाफी हुई है उसका बहुत ही मार्मिक वर्णन इस नवगीत में दिखाई देता है-

                    “सुर्खियाँ
                 बनकर छपे
                 मुख पृष्ठ पर खुद तो
                 और छोड़े हाशिये
                 तुमने हमारे नाम|
                 जाल शब्दों के बुने तुमने
                 सहज विश्वास तोड़ा
                 ले गये अंधी गुफाओं में
                 अचानक हाथ छोड़ा|
                 हर नयी
                 तारीख़ की
                 पहली किरन तुमको मिली,
                 और अपने भाग्य की
                 ढ़लती हुई ये शाम|[7]


          गाँवों और शहरों की मुख्यधारा के जीवन से कटे हुए आदिवासी, केवल भौगोलिक निवास की दृष्टि से, बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सबसे अधिक वंचित वर्गों में से एक होने से हाशिए पर स्थित हैं| इसके आलावा देश का ऐसा वर्ग जो समाज के सवर्ण के कथित लोगों की ताकत से, किसी वास्तविक या काल्पनिक ख़तरे से अपने जान-माल को असुरक्षित महसूस करता है| वह भी समाज के हाशिए में ही आता है|

          यदि देखा जाए तो वास्तव में हर वह वर्ग, वे सभी व्यक्ति जो समाज में स्थित किसी भी संस्थागत शोषण और भेदभाव का शिकार होते है| वह इसी श्रेणी के अंतर्गत आते है| भारतीय समाज में हाशिए के लोगों ने भय-मुक्त होने और अपने सम्मान के लिए सदा ही प्रयत्न किया है, परन्तु सभ्य समाज को इनकी उपस्थिति से सदैव परहेज रहा है| हाशिया वर्ग का समाज में पिछड़े होने का सबसे पहला कारण रहा है उनकी अशिक्षा| उनकी अशिक्षा के कारण ही वे समाज में कभी आगे नहीं बढ़ सके| जहाँ सूदखोर या जमीदारों ने इनकी अशिक्षा का खूब लाभ उठाया और इनसे जमीन, जायदादों के कागजातों पर अँगूठा लगवा कर आजीवन कर्ज वसूल किया| रामकिशोर दहिया जी का ये नवगीत इस वर्ग पर अशिक्षा के कारण होने वाले अत्याचार और बेईमानी का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है-

              “खाते-बही, गवाह जमानत
               लेते छाप अंगूठे|
               उधार-बढ़ियाँ
               रहे चुकाते
               कन्हियाँ-धांधर टूटे|
               भूखे-लाँघे रहकर जितना
               देते सही-सही|
               जमा नहीं पूँजी में पाई
               बढ़ती ब्याज रही|[8] 

          हाशिए में जब हम स्त्री पर बात करते है तो हमारे समक्ष एक सत्य उभर कर आता है कि किसी भी दौर में होने वाली कोई भी घटना, युध्द, महामारी या समाज में कोई भी बदलाव हो उसका सीधा असर स्त्री समाज में देखी देता है| अगर हम भारतीय समाज की स्थिति के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध कराना चाहते है तो उस समाज में रहने वाली स्त्रियों की हालत क्या है? यह हमें जानना चाहिए| हाशिए में स्त्री विमर्श एक चिंताजनक विषय बना हुआ है| जहाँ समाज की आधी आबादी हाशिए में शामिल हैं| भारतीय समाज कितना भी शिक्षित क्यों हो जाए लेकिन उसकी मानसिकता आज भी यही है कि उसके घर में कन्या का जन्म नहीं हो| भारतीय हिन्दू धर्मग्रंथों में स्त्री को वस्तु, बाजार, यौन-शोषण, पति या पुरुष की सेवा करने वाली, परिवार का पालन-पोषण करने वाली से अधिक कुछ नहीं दिखाया गया है| स्त्री सदा ही शोषण और अत्याचार का दंश सहन करती आयी है| इसके पीछे का कारण है उसका अशिक्षित होना तथा इसी के चलते स्त्री सदा पुरुष वर्ग पर आश्रित रहती है| समाज में स्त्री और पुरुष को एक गाड़ी के दो पहियों के रूप में देखा जाता है| जहाँ एक की अनुपस्थिति से दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं रहता है| इन सबके बावजूद भी स्त्री को समानता के अधिकारों से वंचित रखा जाता है|

          प्रारंभ में स्त्री पुरुष के लिए सिर्फ यौनिकता का एक माध्यम मात्र थी| स्त्री पुरुष वर्ग पर आश्रित रही हैं और कहीं कहीं आज भी निम्न वर्ग में यह प्रथा चली रही है| उसकी दुनिया सीमित है जिसमें आँगन की साफ़-सफाई से लेकर रसोईघर में खाना पकाना ही उसका काम है| उसकी इस संकुचित दुनिया में भी आज उसे प्रताड़ित किया जाता है| अवध बिहारी श्रीवास्तव के नवगीत की यह पंक्तियाँ स्त्री की वेदना और पीड़ा को व्यक्त करती है| और हमें यह बताती है कि समाज में उसका स्थान कितना और क्या है तथा इसके बाद भी वह सब कुछ सहन करती है और शांत रहती है-

                “कमरे से चौक तक फैला
                 बस इतना आँगन मेरा है
                डगमग पैरों से बूँटों को
                हर रात खोलना मजबूरी
                बोले देह सौंप देना   
                मन से हो कितनी भी दूरी
                हैं जहाँ नही, नीले निशान,
                बस उतना ही है तन मेरा
                खिड़की से जितना दीखता है
                उतना ही सावन मेरा है|[9]  

          भारतीय समाज में स्त्री के विषय में दूसरी चिंता का कारण है उसकी सुरक्षा की समस्या| जहाँ घर से बाहर निकलना, स्कूल, काँलेज जाना उसके लिए दुष्कर होता जा रहा है| जहाँ घर से निकलते ही गली, मोहल्ले के लड़के उनका पीछा करने लगते हैं| बस का चालक हो या स्कूल का चपरासी उसे बुरी नजरों से देखते हैं| जहाँ कदम-कदम पर उसे अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए प्रतिदिन संघर्ष करना पड़ता है| इस सबके बाद भी आप रोज समाचार पत्र में आने वाली ख़बरों पर नजर डालते है तो रोजाना किसी किसी का बलात्कार, अपहरण और हत्या की खबर देखने को मिल जाएगी| चक्रवर्ती जी का यह नवगीत उन स्त्रियों के संघर्ष को व्यक्त करता है जिन्हें रोज इसी प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है-

              “घर से कॉलेज  बस में
               करती
               रोज़ सफ़र लड़की.....
               व्यंग्य, फब्तियाँ,
               छेड़छाड़/ज़हरीली फुफकारें
               भूखी-प्यासी/
               हत्यारी नजरों की
               तलवारें/एक साथ लाखों/ विषधर
              ढोती तन पर लड़की|[10]

          हाशिए के समाज में एक वर्ग बालश्रम का भी है| जिसका कारण गरीबी और अशिक्षा रही है| समाज में बालश्रम को अपराध माना जाता है| इसके पीछे अपराधी किसे माना जाए उस बच्चे के माता-पिता को या हमारी समाज व्यवस्था को| इस समस्या के पीछे उनकी निर्धनता एक प्रमुख कारण रहा है| समाज में अमीर और गरीब के बीच एक रेखा खींच दी है| जिसके चलते अमीर और अमीर हो रहा है तथा गरीब और गरीब| हमारे समाज में ऐसे हजारों बच्चे हैं जो चाय की दुकानों, ढाबों, होटलों, कारखानों, ईट के भट्टों पर काम करते नजर आते हैं| यहीं बच्चे गलत संगत में आकर देश के लिए खतरा बनते हैं| इनके माता-पिता की आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब होती है वह इन्हें स्कूल में भेजने की स्थिति में नहीं है और पुलिस भी इस विषय पर कुछ नहीं करती| रामनारायण जी के नवगीत की यह पंक्तियाँ समाज की इस व्यवस्था के प्रति लोगों को सजग करते नजर आती हैं-

                “होटल वाले लड़के
                 दिनभर/ पुड़िया पान चबाते हैं
                 पांच साल के हुए
                 पिता की आशा/खुली-खुली
                 दो रोटी में/ करें चाकरी
                 प्रतिदिन राम बली
                 मार पड़ी/ रोये चिल्लाये
                 फिर हँसते-मुस्काते हैं/
                 कोरे कागज को/ मिलती है
                 संगति निरे गँवारों की
                 लिख देते हैं/ वहां इबारत
                 पिटे भाग्य के नारों की
                 हम समाज के/ लोग स्वार्थी
                 लड़कों पर गुर्रातें हैं|[11]    

    दलित नवगीतकारों ने स्वयं का दुःखदर्द, पीड़ा, आक्रोश और दलित समाज की सच्चाइयों को नवगीत के माध्यम से व्यक्त किया है| जिसके परिणामस्वरूप दलित नवगीतकारों ने अपने नवगीतों में समाज में परिवर्तन का एक माहौल उपस्थित किया| दलित नवगीतों, दलित समाज की व्यथा-वेदना, खीझ, इच्छा-आकांक्षा का विस्तार से वर्णन किया गया है| दलितों पर हो रहे अत्याचार, सवर्णों की बर्बरता, दलितों के प्रति पंडितों का पुराना रवैया (जो आज भी दलितों से उसी प्रकार सामाजिक भेदभाव और दूरी बनाये रखते हैं) को समाज के सामने नवगीतों के जरिये प्रस्तुत किया है| दलित नवगीतकारों ने जो नवगीत लिखे हैं उनमें केवल  समाज की उपेक्षितउत्पीड़ित अस्मिताओं के दुःख-दर्द और पीड़ा को व्यक्त ही नहीं किया,बल्कि उन नवगीतों में दलित पीड़ा की चीख से पैदा हुआ आक्रोश और प्रतिरोध भी है|                                                      

निष्कर्ष : नवगीत एक ऐसी विधा है जो मनुष्य के सुख-दुःख, हर्ष, उल्लास को ही अभिव्यक्त नहीं करता बल्कि समाज की वर्तमान व्यवस्था, विसंगतियों के प्रति आक्रोश, प्रतिरोध की भावना, करुणा भाव राजनीतिक घोटाले, हाशिये के समाज का स्वर, दलित का शोषण, स्त्रियों की दयनीय स्थिति का वर्णन आदि सब कुछ है आज के नवगीत में| दलित नवगीतकारों ने अपने नवगीत में वही लिखा है जो उसने स्वंय अनुभव किया, जिसे उसने भोगा, समझा| अपनी उन्हीं भावनाओं को नवगीत में व्यक्त किया| नवगीतों में आनुभूतिक संवेदना, जीवनानुभव का वास्तविक चित्रण, मूल्यों की प्रतिष्ठा को मूल केन्द्र में है| जिस प्रकार छायावाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के कवियों ने जीवन की वास्तविक सच्चाईयों को अपनी कविताओं में जगह दी ठीक उसी प्रकार दलित नवगीतकारों ने भी समाज के सबसे निचले पायदान और निम्न कहे जाने वाले समाज को अपने नवगीतों का केन्द्रीय विषय बनाया|

संदर्भ :

1.     मिश्र, डॉ. सभापति, नवगीत सुधा, पृष्ठ सं : 23

2.    हिंदी नवगीत के अद्भुत हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी से नवगीत के संदर्भ मेंयोगेन्द्र वर्मा की एक बातचीत

3.    यदि: रमाकांत, दिसंबर 2004, लेख- प्रो. वीरेन्द्र मोहन, पृष्ठ सं : 11 

4.    निर्मम, श्याम, हाशिये पर हम, प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, गाज़ियाबाद, प्रथम संस्करण- 1998, पृष्ठ सं : 61

5.    अपनी माटी पत्रिका, दलित आदिवासी विशेषांक, अंक-19, सितम्बर-नवम्बर 2015, साक्षात्कार, आलोचक चौथीराम यादव, दिनेश पाल और दीपक कुमार के साथ बातचीत, पृष्ठ सं : 02

6.    मौर्य, योगेन्द्र प्रताप, चुप्पियों को तोड़ते हैं, बोधि प्रकाशन, जयपुर, प्रथम संस्करण- 2019, पृष्ठ सं : 19

7.    निर्मम, श्याम, हाशिये पर हम, प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, गाज़ियाबाद, प्रथम संस्करण- 1998, पृष्ठ सं : 95

8.    दाहिया, रामकिशोर, अल्पना अंगार पर, प्रकाशक- उद्भावना प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2008, पृष्ठ सं : 110

9.    श्रीवास्तव, अवध बिहारी, बस्ती के भीतर, प्रकाशक- उद्भावना प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2017, पृष्ठ सं : 18

10. चक्रवर्ती, जय, थोड़ा लिखा समझना ज्यादा, प्रकाशक- उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ, प्रथम संस्करण- 2015, पृष्ठ सं : 107

11. रमण, रामनारायण, नदी कहना जानती है, प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, गाज़ियाबाद, प्रथम संस्करण- 2017, पृष्ठ सं : 23



शीतल कोटवार
भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067

सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : नैना सोमानी (उदयपुर)
अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-46, जनवरी-मार्च 2023 UGC Care Listed Issue
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