शोध आलेख :बाह्य एवं पर्यावरणीय शिक्षा, बाल मनोविज्ञान और सृजनात्मकता/सूरज कुमार मौर्य



 

बाह्य एवं पर्यावरणीय शिक्षा, बाल मनोविज्ञान और सृजनात्मकता

-सूरज कुमार मौर्य

शोध-सार : सृजनात्मकता बच्चों के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण पक्ष है। यह आलेख शोध-साहित्य के विश्लेषण के आधार पर यह परखता है कि बाह्य एवं पर्यावरणीय शिक्षा बाल मनोविज्ञान के विभिन्न आयामों, जैसे ध्यान, तनाव-नियमन, स्वायत्तता, खेल और प्रकृति-जुड़ाव, के माध्यम से बच्चों की सृजनात्मकता को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि प्रकृति-संपर्क का बच्चों के ध्यान, संज्ञानात्मक कार्यक्षमता और मानसिक कल्याण से सकारात्मक संबंध मिलता है। परंतु बच्चों की सृजनात्मकता पर प्रत्यक्ष और कारणात्मक प्रमाण अभी सीमित हैं, और कुछ प्रमाण वयस्क प्रतिभागियों पर आधारित हैं। आलेख बताता है कि बाह्य शिक्षा तभी सृजनात्मक विकास में सहायक होती है जब बच्चों को स्वायत्तता, खुले अंत वाली गतिविधियाँ, सामाजिक सहभागिता और शिक्षक का सुविचारित मार्गदर्शन मिले। अंत में शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं।

बीज-शब्द : बाह्य शिक्षा, पर्यावरणीय शिक्षा, बाल मनोविज्ञान, सृजनात्मकता, प्रकृति-जुड़ाव, खेल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

1. प्रस्तावना

बचपन वह अवस्था है जिसमें जिज्ञासा, कल्पना और खोज की प्रवृत्ति सबसे प्रबल होती है। सृजनात्मकता को सामान्यतः ऐसे विचार या उत्पाद के निर्माण के रूप में परिभाषित किया जाता है जो मौलिक भी हो और उपयोगी भी [1]। बच्चों के संदर्भ में इसका अर्थ केवल असाधारण उपलब्धि नहीं है। इसमें अपने स्तर पर नए अर्थ गढ़ना और रोज़मर्रा की समस्याओं के नए हल सोचना भी शामिल है [2]। इस दृष्टि से सृजनात्मकता कुछ चुनिंदा बच्चों की विशेषता न होकर सभी बच्चों में पोषित की जा सकने वाली क्षमता है, और यह पोषण बहुत हद तक उस परिवेश पर निर्भर करता है जिसमें बच्चा सीखता और खेलता है।

शहरी जीवन-शैली, पाठ्यक्रम और परीक्षा का दबाव तथा सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण बच्चों को खुले में खेलने और प्रकृति के साथ समय बिताने के अवसर कम मिल रहे हैं। शोधकर्ताओं ने मुक्त खेल के घटते अवसरों और बच्चों में मानसिक समस्याओं की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच संबंध की ओर ध्यान दिलाया है, यद्यपि यह संबंध मुख्यतः सहसंबंधी है और इसे सीधे कारण-प्रभाव संबंध नहीं माना जा सकता [3]। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या बाह्य एवं पर्यावरणीय शिक्षा बच्चों की सृजनात्मकता के विकास में सहायक हो सकती है, और यदि हो सकती है तो किन मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से।

भारतीय नीतिगत परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अनुभवात्मक अधिगम, कला-एकीकरण और रटंत पद्धति से हटकर सीखने पर बल देती है [4]। यह आलेख इसी संदर्भ में तीन प्रश्नों पर विचार करता है। पहला, बाल मनोविज्ञान के कौन-से सिद्धांत प्रकृति-आधारित सीखने और सृजनात्मकता के संबंध को समझने में सहायक हैं। दूसरा, प्रकृति-संपर्क और बाह्य शिक्षा पर उपलब्ध प्रमाण बच्चों के संज्ञान, भावनाओं और सृजनात्मकता के बारे में क्या कहते हैं। तीसरा, इन निष्कर्षों से विद्यालयों और शिक्षकों के लिए क्या व्यावहारिक सीख निकलती है।

शोध-पद्धति : यह आलेख प्रतिनिधि सैद्धांतिक और अनुभवजन्य शोध-साहित्य के विश्लेषण पर आधारित है। इसमें कोई प्राथमिक आँकड़ा एकत्र नहीं किया गया है। चयनित अध्ययन मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय समकक्ष-समीक्षित पत्रिकाओं से हैं, और यह चयन व्यवस्थित समीक्षा के रूप में नहीं किया गया है।

2. बाल मनोविज्ञान और सृजनात्मकता: सैद्धांतिक आधार

बाल मनोविज्ञान में कल्पना और सृजनात्मकता को अनुभव से जोड़कर देखा गया है। वाइगोत्स्की के अनुसार बच्चे की कल्पना शून्य से नहीं उपजती, बल्कि उसके यथार्थ अनुभवों के नए रूप में संयोजन से बनती है, इसलिए अनुभव जितने समृद्ध होंगे, कल्पना के लिए उतनी अधिक सामग्री उपलब्ध होगी [5]। प्रकृति, अपने रंग, ध्वनि, गंध, बनावट और निरंतर बदलते स्वरूप के कारण, ऐसे अनुभवों का एक सहज स्रोत है जिसे कक्षा के सीमित भौतिक परिवेश में दोहराना कठिन है। यह तर्क लेखक की वैचारिक व्याख्या है, जिसका प्रत्यक्ष अनुभवजन्य परीक्षण आगे के शोध का विषय है।

आत्म-निर्धारण सिद्धांत मानता है कि मनुष्य की तीन मूल मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ हैं: स्वायत्तता, सक्षमता और संबद्धता। इनकी पूर्ति होने पर आंतरिक प्रेरणा और कल्याण की भावना सुदृढ़ होती है [6]। सृजनात्मक कार्य मूलतः आंतरिक प्रेरणा पर टिके होते हैं। यदि बाह्य गतिविधियाँ बच्चे को चुनाव की स्वतंत्रता देती हैं, उसे अपनी क्षमता का अनुभव कराती हैं और साथियों के साथ जोड़ती हैं, तो वे इन तीनों आवश्यकताओं की पूर्ति के अवसर बनाती हैं। इसके विपरीत, यदि बाहर की गतिविधि भी उसी कठोर निर्देश-पद्धति से चलाई जाए जो कक्षा में प्रचलित है, तो केवल स्थान बदलने से मनोवैज्ञानिक लाभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

ध्यान-पुनर्स्थापन सिद्धांत बताता है कि निर्देशित ध्यान, अर्थात् इच्छाशक्ति से किसी कार्य पर मन लगाए रखना, थकाने वाली प्रक्रिया है। प्राकृतिक परिवेश में "सहज आकर्षण" होता है, जो बिना प्रयास के ध्यान खींचता है और निर्देशित ध्यान को विश्राम का अवसर देता है [7]। बच्चों से विद्यालय में दिनभर निर्देशित ध्यान की अपेक्षा की जाती है। इस दृष्टि से प्रकृति में बिताया गया समय केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संज्ञानात्मक संसाधनों के पुनर्भरण का अवसर माना जा सकता है, जो आगे चलकर विचार-निर्माण और समस्या-समाधान जैसी सृजनात्मक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक मानसिक ऊर्जा देता है। भावनात्मक पक्ष पर भी विचार आवश्यक है। जिस वातावरण में बच्चा सुरक्षित और स्वीकृत अनुभव करता है, वहाँ वह नए विचारों को आज़माने का जोखिम अधिक सहजता से उठा सकता है। यह भी लेखक का तर्क-आधारित निष्कर्ष है, जिसकी पुष्टि प्रत्यक्ष शोध से अपेक्षित है।

3. प्रकृति-संपर्क, बाल-मन और संज्ञान: उपलब्ध साक्ष्य

बच्चों पर किए गए अध्ययन प्रकृति-संपर्क और संज्ञानात्मक कार्यक्षमता के बीच सकारात्मक संबंध की ओर संकेत करते हैं। एक अध्ययन में कम आय वाले परिवारों के उन बच्चों का अवलोकन किया गया जो अधिक हरियाली वाले आवासों में रहने गए थे। उनमें ध्यान से संबंधित संज्ञानात्मक कार्यक्षमता में सुधार पाया गया, हालाँकि नमूना छोटा था [8]। एक अन्य अध्ययन में ध्यान-अभाव की समस्या वाले बच्चों ने पार्क में लगभग बीस मिनट टहलने के बाद शहरी मार्गों पर टहलने की तुलना में बेहतर एकाग्रता दिखाई [9]। ये अध्ययन अल्पकालिक प्रभावों को दर्शाते हैं।

दीर्घकालिक प्रभाव के संकेत स्पेन के बार्सिलोना शहर में प्राथमिक विद्यालय के बच्चों पर किए गए अनुदैर्ध्य अध्ययन से मिलते हैं। उसमें विद्यालय के आसपास अधिक हरियाली वाले बच्चों में कार्यशील स्मृति और ध्यान का विकास अपेक्षाकृत तेज़ पाया गया [10]। प्रकृति और सीखने पर उपलब्ध प्रमाणों की एक समीक्षा बताती है कि प्रकृति-अनुभव ध्यान, तनाव-कमी, आत्म-अनुशासन और प्रेरणा के माध्यम से सीखने में सहायक हो सकते हैं [11]। बच्चों और किशोरों में प्रकृति-संपर्क के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी लाभों की व्यवस्थित समीक्षा भी भावनात्मक और व्यवहारगत स्वास्थ्य में सकारात्मक संकेत देती है, परंतु अध्ययनों की गुणवत्ता और मापन-विधियों में भिन्नता के कारण निष्कर्षों की व्याख्या सावधानी से करनी होगी [12]। बच्चों के लिए प्रकृति-संपर्क के शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और पर्यावरण-व्यवहार संबंधी लाभों का व्यापक संश्लेषण भी इसी दिशा में है [13]।

इन अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि प्रकृति में समय बिताने से बच्चे स्वतः सृजनात्मक हो जाते हैं। ये प्रमाण मुख्यतः ध्यान, स्मृति और कल्याण से संबंधित हैं, तथा अनेक अध्ययन सहसंबंधी हैं। फिर भी, ये उन मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों की ओर संकेत करते हैं, जैसे एकाग्रता, कम तनाव और अधिक प्रेरणा, जो सृजनात्मक चिंतन के लिए अनुकूल मानी जाती हैं।

4. बाह्य शिक्षा और सृजनात्मकता: साहित्य क्या कहता है

सृजनात्मकता पर प्रत्यक्ष प्रयोगात्मक प्रमाण मुख्यतः वयस्कों पर हुए अध्ययनों से आते हैं। एक अध्ययन में प्रतिभागियों ने कई दिन प्रकृति में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बिना बिताए और उसके बाद उनके रचनात्मक तर्क संबंधी कार्य में उल्लेखनीय सुधार दर्ज हुआ [14]। दूसरे अध्ययन में विद्यार्थियों के टहलने से, चाहे घर के भीतर हो या बाहर, अपसारी चिंतन में वृद्धि पाई गई [15]। ये निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं, किंतु वयस्क प्रतिभागियों पर आधारित होने के कारण उन्हें बच्चों पर सीधे लागू करना उचित नहीं है। इसलिए बच्चों के संदर्भ में यह स्थापित करना शेष है कि प्रकृति-आधारित गतिविधियाँ उनकी सृजनात्मक क्षमता को किस सीमा तक बढ़ाती हैं।

विद्यालयी बाह्य शिक्षा पर की गई व्यवस्थित समीक्षाएँ अपेक्षाकृत उत्साहवर्धक हैं। नियमित बाह्य कक्षाओं पर आधारित एक समीक्षा ने सीखने, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी आयामों पर अधिकांशतः सकारात्मक प्रभाव पाए [16]। प्रकृति-विशिष्ट बाह्य अधिगम पर एक अन्य समीक्षा ने विद्यार्थियों के सीखने और विकास के अनेक आयामों में लाभ के संकेत दिए, परंतु अध्ययन-डिज़ाइन में विविधता की ओर भी ध्यान दिलाया [17]। इन समीक्षाओं में सृजनात्मकता मुख्य परिणाम के रूप में बहुत कम मापी गई है। अतः यह कहना अधिक सटीक होगा कि बाह्य शिक्षा सृजनात्मकता की पूर्व-परिस्थितियों, जैसे ध्यान, प्रेरणा, स्वायत्तता और सामाजिक सहभागिता, के लिए आशाजनक है, जबकि सृजनात्मकता पर उसके प्रत्यक्ष प्रभाव के प्रमाण अभी विकसित हो रहे हैं।

5. खेल, स्वायत्तता और प्रकृति-जुड़ाव

खेल को प्रायः सृजनात्मकता का प्रमुख वाहक माना जाता है। परंतु काल्पनिक खेल के विकासात्मक लाभों पर उपलब्ध साक्ष्य की समीक्षा बताती है कि कारण-प्रभाव के दावे अक्सर आवश्यकता से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर किए गए हैं, और अधिकांश प्रमाण सहसंबंधी हैं [18]। इसका अर्थ यह नहीं कि खेल का महत्व नहीं है। इसका अर्थ यह है कि खेल को सृजनात्मकता की गारंटी मानने के बजाय उसे ऐसे अवसर के रूप में देखा जाए जिसमें बच्चा स्वयं निर्णय लेता, प्रयोग करता और साथियों से संवाद करता है। प्राकृतिक परिवेश में पत्थर, पत्ते, मिट्टी, पानी और टहनियों जैसी "खुली" सामग्री का उपयोग बच्चे अनेक प्रकार से कर सकते हैं, जो तैयार खिलौनों की तुलना में अधिक विविध कल्पनाशील खेल की संभावना देता है। यह भी वैचारिक तर्क है।

प्रकृति-जुड़ाव, अर्थात् व्यक्ति का स्वयं को प्रकृति का हिस्सा अनुभव करना, एक मापनीय मनोवैज्ञानिक अवधारणा के रूप में विकसित हुआ है [19]। बच्चों के लिए प्रकृति के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण को मापने वाला उपकरण भी विकसित किया गया है [20]। बच्चों में प्रकृति-जुड़ाव बढ़ाने वाले हस्तक्षेपों की एक समीक्षा बताती है कि ऐसे हस्तक्षेप उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता और मापन-पद्धतियाँ एकसमान नहीं हैं [21]। प्रकृति-जुड़ाव को बच्चों के पर्यावरण-प्रेम के साथ-साथ उनके जिज्ञासु अवलोकन, प्रश्न पूछने और कल्पना की प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जा सकता है, किंतु सृजनात्मकता में उसकी मध्यस्थ भूमिका का परीक्षण अभी बहुत कम हुआ है। यह आगे के शोध के लिए महत्वपूर्ण अवसर है।

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर एक संभावित वैचारिक मार्ग यह है: स्वायत्तता-समर्थक बाह्य अनुभव, ध्यान-पुनर्स्थापन और भावनात्मक सुरक्षा, फिर प्रकृति-जुड़ाव और आंतरिक प्रेरणा, और अंततः बच्चों में अधिक विचार-निर्माण और अभिव्यक्ति। यह एक परिकल्पना है, स्थापित निष्कर्ष नहीं, और इसका परीक्षण भारतीय संदर्भ में किए जाने वाले अनुभवजन्य अध्ययनों से ही संभव है।

6. आयु-वर्ग और बाह्य गतिविधियाँ: बाल-विकास के संदर्भ में विचार

बाल मनोविज्ञान यह भी याद दिलाता है कि सभी आयु-वर्ग के बच्चे एक जैसी गतिविधियों से एक जैसा लाभ नहीं पाते। पूर्व-प्राथमिक और प्रारंभिक कक्षाओं के बच्चे मुख्यतः संवेदी अनुभव, गति और खेल के माध्यम से सीखते हैं। उनके लिए मिट्टी, पानी, पत्तों और पत्थरों के साथ खुला खेल, पक्षियों और कीड़ों का अवलोकन तथा सामूहिक कहानी-कथन अधिक उपयुक्त हो सकते हैं। मध्य बाल्यावस्था के बच्चों में तर्क, वर्गीकरण और नियमों की समझ विकसित होने लगती है, इसलिए उनके साथ संग्रह-कार्य, स्थानीय पौधों और जीवों का वर्गीकरण, छोटे प्रयोग, मानचित्र-निर्माण और परियोजना-आधारित कार्य उपयोगी हो सकते हैं। किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों को अपनी पहचान, स्वतंत्रता और साथियों की स्वीकृति की अधिक आवश्यकता होती है। इसलिए उन्हें समुदाय-आधारित परियोजनाएँ, पर्यावरण संबंधी वास्तविक समस्याओं पर काम करने और अपने निष्कर्ष दूसरों के सामने रखने के अवसर देना अधिक प्रेरक हो सकता है। आयु-वर्ग के अनुसार गतिविधियों का यह सुझाव लेखक की विकासात्मक दृष्टि पर आधारित है, और इसका परीक्षण आगे के अध्ययनों में किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार, बच्चों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। कुछ बच्चे शोर-भरे और खुले वातावरण में असहज महसूस कर सकते हैं, कुछ को शारीरिक गतिविधियों में कठिनाई हो सकती है, और कुछ बच्चों के लिए सुरक्षा या सुविधा संबंधी सीमाएँ अधिक हो सकती हैं। इसलिए बाह्य शिक्षा की योजना ऐसी होनी चाहिए जिसमें हर बच्चे के लिए सहभागिता के कई रास्ते हों, जैसे अवलोकन, चित्रण, लेखन, निर्माण या नेतृत्व। यदि बाह्य शिक्षा कुछ ही बच्चों के लिए सुलभ और आरामदायक रहे, तो वह समावेशी शिक्षा के उद्देश्य से दूर हो जाएगी। संसाधनों की असमानता भी महत्वपूर्ण है। शहरों की घनी बस्तियों में हरित स्थान सीमित हैं, जबकि अनेक विद्यालयों में खुला मैदान या बगीचा भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में छोटे-छोटे उपाय, जैसे छत पर या आँगन में बगीचा, गमलों में पौधे, मौसम-अवलोकन, पास के पार्क की नियमित यात्रा या स्थानीय बाज़ार और खेतों का भ्रमण, भी बच्चों के लिए प्रकृति-अनुभव के अवसर बना सकते हैं।

7. शैक्षिक निहितार्थ

साहित्य-विश्लेषण से कुछ व्यावहारिक संकेत मिलते हैं, जिन्हें विद्यालय और शिक्षक अपने संदर्भ के अनुसार परख सकते हैं:

1.   बाह्य गतिविधियों को कक्षा-शिक्षण का विस्तार मानने के बजाय स्वतंत्र सीखने के अवसर के रूप में नियोजित किया जाए, जिनमें बच्चों को विषय या सामग्री चुनने की सीमित स्वतंत्रता मिले।

2.   गतिविधियाँ खुले अंत वाली हों, जैसे अवलोकन, संग्रह, निर्माण, चित्रण, कथा-रचना और छोटे समूहों में समस्या-समाधान, ताकि एक ही सही उत्तर पर निर्भरता कम हो।

3.   शिक्षक का मार्गदर्शन आवश्यक है, किंतु अत्यधिक निर्देश नहीं। प्रश्न पूछने और गलती करने की सुरक्षित जगह बनाना बच्चों के सृजनात्मक जोखिम लेने के लिए महत्वपूर्ण है।

4.   स्थानीय परिवेश का उपयोग किया जाए, जैसे विद्यालय का बगीचा, मैदान, पास का पार्क या ग्रामीण परिवेश, ताकि संसाधनों की कमी बाधा न बने।

5.   सुरक्षा के प्रोटोकॉल बनाए जाएँ, परंतु इतने कठोर नहीं कि बाह्य गतिविधियाँ ही सीमित हो जाएँ।

6.   सृजनात्मकता का मूल्यांकन केवल अंकों से नहीं, बल्कि बच्चों की प्रक्रिया, प्रश्नों और उत्पादों के अवलोकन से किया जाए।

नीतिगत स्तर पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का अनुभवात्मक अधिगम पर बल इन सुझावों के अनुरूप है [4]। परंतु नीति के आशय को कक्षा-अभ्यास तक ले जाने के लिए शिक्षक-प्रशिक्षण, परिसर में खुले अधिगम-स्थल और मूल्यांकन-व्यवस्था में बदलाव आवश्यक होंगे। यदि परीक्षा केवल स्मरण पर आधारित रहेगी, तो बाह्य शिक्षा केवल एक औपचारिकता बनकर रह सकती है।

8. सीमाएँ और भावी शोध

इस आलेख की कुछ सीमाएँ हैं। यह व्यवस्थित समीक्षा नहीं है, इसलिए चयन-पूर्वाग्रह संभव है। बच्चों की सृजनात्मकता पर प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, और कई उद्धृत अध्ययन सहसंबंधी या वयस्कों पर आधारित हैं। अधिकांश साक्ष्य भारत से बाहर के संदर्भों से है। प्रस्तावित वैचारिक मार्ग का अनुभवजन्य परीक्षण नहीं हुआ है। भविष्य के शोध में भारतीय विद्यालयों में अर्ध-प्रायोगिक अध्ययन, बच्चों की सृजनात्मकता के बहु-स्रोत मापन, प्रकृति-जुड़ाव की मध्यस्थ भूमिका के विश्लेषण और अनुदैर्ध्य अनुवर्तन की आवश्यकता है। ऐसे अध्ययनों में शहरी और ग्रामीण विद्यालयों, विभिन्न आयु-वर्गों तथा अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों की तुलना उपयोगी होगी। साथ ही, बच्चों के अपने अनुभवों, शिक्षकों के दृष्टिकोण और अभिभावकों की चिंताओं को समझने वाले गुणात्मक अध्ययन भी आवश्यक हैं, क्योंकि केवल संख्यात्मक परीक्षण-अंक सृजनात्मकता के सभी पहलुओं को नहीं पकड़ पाते। जब तक भारतीय संदर्भ से ऐसे प्रमाण उपलब्ध नहीं होते, तब तक विदेशी अध्ययनों के निष्कर्षों को सुझाव के रूप में लेना ही उचित होगा, निर्णायक सत्य के रूप में नहीं।

निष्कर्ष

समग्र रूप से देखें तो बाल मनोविज्ञान और उपलब्ध शोध इस ओर संकेत करते हैं कि प्रकृति-संपर्क और सुनियोजित बाह्य शिक्षा बच्चों के ध्यान, प्रेरणा, भावनात्मक कल्याण और अनुभवों की समृद्धि के लिए लाभदायक हो सकती है, और ये सभी सृजनात्मक विकास की पूर्व-परिस्थितियाँ हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि बच्चों की सृजनात्मकता पर इसके प्रत्यक्ष और कारणात्मक प्रभाव के प्रमाण अभी सीमित हैं, और बाह्य शिक्षा अपने आप में सृजनात्मकता की गारंटी नहीं है। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गतिविधियाँ कितनी खुले अंत वाली हैं, बच्चों को कितनी स्वायत्तता मिलती है, शिक्षक का मार्गदर्शन कितना संतुलित है और परिवेश कितना सुरक्षित तथा प्रोत्साहक है। इसलिए बाह्य एवं पर्यावरणीय शिक्षा को केवल अतिरिक्त गतिविधि न मानकर बाल-विकास की एक सुविचारित रणनीति के रूप में अपनाना और साथ ही भारतीय संदर्भ में उसके प्रभाव का कठोर अनुभवजन्य अध्ययन करना आज की आवश्यकता है।

सन्दर्भ

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AI-सहायता की घोषणा : इस आलेख के प्रारूप-लेखन में AI की सहायता ली गई है।

 

 

सूरज कुमार मौर्य

एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल वॉर्मिंग एंड इकोलॉजिकल स्टडीज, एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा

ईमेल: surajmaurya13@yahoo.com


अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati), 
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका
अंक-47, अप्रैल-जून 2023 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : संजय कुमार मोची (चित्तौड़गढ़)

 

 

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