पहलू@Apni Maati Youtube Series


हमारा नया शो : 'पहलू'
(व्यक्ति और उनका अतीत : दस्तावेज़ीकरण का एक प्रयास)
YouTuber Team@अपनी माटी Apni Maati

अपनी माटी की नयी यूट्यूब सीरीज : भूमिका और अनुभव / अभिषेक चित्तौड़गढ़ 

"क्या करेगा? ऐसे थोड़ी होता है? लोग इतना लंबा सुनेंगे भी? इससे तुझे क्या मिलेगा?" ऐसे तमाम सवालों के बीच शुरू हुआ — "पहलू"। 'पहलू' की कोर टीम में जितने भी सदस्य हैं, उनमें से अधिकांश का या तो अभी-अभी कॉलेज पूरा हुआ है या फिर बस होने ही वाला है। सरकार की भाषा में कहें, तो हम हैं — "बेरोज़गार"। 'पहलू' की शुरुआत अचानक हुई। न कोई महीनों भर की प्लानिंग और न ही रात भर चलने वाला विचार-विमर्श। एक भीनी सी कुंठा थी कि हमारे आस-पास भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें बाकी दुनिया तक पहुँचाना ज़रूरी है। ज़रूरी इसलिए नहीं कि लोक-प्रसिद्धि मिले, बल्कि इसलिए ताकि सुनने और देखने वालों को यह पता चल सके कि हम सब कहीं न कहीं एक जैसे ही 'लूप' में फँसे होते हैं। अगर इस लूप को पहचान लिया, तो बस समझिए आप बाहर आ गए। 

मिलते-जुलते विचारों का यही बादल एक दिन बरस पड़ा। मेरे पास कुछ बचत थी, जिससे मैंने माइक और ट्राइपॉड खरीदा। यह सब इसलिए भी खरीदा ताकि खुद से कह सकूँ कि बेटा, पैसे तो लग ही चुके हैं, अब इससे कुछ आउटपुट भी निकाल ले। शुरुआती कॉन्सेप्ट पर साथी माणिक से बात की। उन्हें बताया कि मन में कुछ ऐसा ही चल रहा है। हमने तय किया कि हमें लोगों को 'डॉक्यूमेंट' करना है, उनका इंटरव्यू नहीं लेना। साथी माणिक ने भी हामी भरी, क्योंकि हम दोनों इस बात पर एकमत थे कि इंटरव्यू से एक औपचारिकता आ जाती है, जिससे व्यक्ति वह नहीं रह पाता जो वह वास्तव में होता है। इस सीरीज़ का नाम रखा — "पहलू"। वह इसलिए, ताकि हम व्यक्ति का वह पक्ष देख पाएँ जिसे आमतौर पर लोग या तो देखना भूल रहे हैं या फिर देखना ही नहीं चाहते। 

"पहला गेस्ट कौन रहेगा?" सर ने पूछा। मैंने कहा, "मैंने तो आपको डॉक्यूमेंट करना शुरू भी कर दिया है और आप अब पूछ रहे हैं कि गेस्ट कौन रहेगा?" बस, इसी तरह हमारे पहले गेस्ट बने माणिक सर। एडिटिंग का ज़िम्मा मैंने लिया, लेकिन सवाल उठा कि पोस्टर, थंबनेल और लोगो कौन बनाएगा? यहाँ प्रवेश होता है मेरी अज़ीज़ दोस्त दिव्या का। दिव्या राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (NIFT), काँगड़ा में द्वितीय वर्ष की छात्रा है। उसने लगभग चार दिन की कड़ी मेहनत के बाद लोगो तैयार किया। जब उसने पहली बार वह लोगो भेजा, तब मुझे एहसास हुआ कि कभी-कभी बेहद खूबसूरत चीज़ें देखकर भी आँखों में आँसू आ जाते हैं। हमारे लोगो में है — 'कीर्ति स्तंभ'। चित्तौड़गढ़ का एक ऐसा 'पहलू' जो आमतौर पर नज़रअंदाज़ रह जाता है। दिव्या को इसके बारे में बताया, तो उसे भी यह विचार बहुत पसंद आया। सभी ने लोगो की सराहना की। हमारे प्रोजेक्ट को उसका 'शीशफूल' मिल चुका था। 

पहले एपिसोड के शूट का दिन आया। मैं यानी अभिषेक, पहली बार मोबाइल कैमरे के सामने बैठकर बात करने वाला था; जितेंद्र उर्फ जीतू और राहुल पहली बार इतने औपचारिक तरीक़े से शूट करने जा रहे थे। पुष्कर भैया भी वहाँ मौजूद थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आगे क्या होने वाला है। बातचीत शुरू हुई और इस कदर आगे बढ़ी कि एक तो मैं और माणिक जी बैठना ही भूल गए, और दूसरा यह भी याद नहीं रहा कि बीच में कोई ब्रेक भी लेना है। न तो मैं कोई सवाल तैयार करके गया था और न ही माणिक जी ने पूछा कि क्या पूछने वाले हो। ऐसा लग रहा था मानो सब कुछ अपने आप घटित हो रहा हो, हमने योजना बनाकर कुछ नहीं किया था। पहले एपिसोड को जब आप देखेंगे, तो पाएँगे कि बीच-बीच में हमारे कैमरे वाले भैया थोड़े चंचल हो उठे हैं। ख़ैर, उसी दिन तय किया कि हर नए एपिसोड को पिछले वाले से बेहतर बनाना है और वे गलतियाँ नहीं दोहरानी हैं जो पहले हो चुकी थीं। सब कुछ बहुत शानदार रहा। पुष्कर भैया ने शुरुआत में भी बहुत मार्गदर्शन किया और आज भी हर एपिसोड में करते हैं। शूट के बाद हमने ढेर सारी बातें की। उसी दिन मैं और मेरे दोस्त किले पर घूमने निकल पड़े। पूरा दिन हम अल्हड़ों की तरह घूमते रहे। यूँ ही टहलते-घूमते जब हम लाखोटिया बारी पहुँचे, रास्ता काफी ऊबड़-खाबड़ था। चलते-चलते मैंने जीतू से पूछा, "जीतू, अगर कभी इतने पैसे आने लगें कि अपना गुज़ारा आराम से चल जाए, और ज़िंदगी भर यही काम करना पड़े जो आज किया, तो तू करेगा?" जीतू ने मेरी तरफ देखा और सहजता से कहा — "हाँ, बिल्कुल किया जा सकता है।", 'पहलू' का भविष्य क्या होगा, इसका जवाब मुझे उसी पल मिल गया था। 

सोशल मीडिया संभालने की ज़िम्मेदारी दीपक भाई ने ली। दीपक भाई काफी समय से 'अपनी माटी' के विभिन्न सोशल मीडिया हैंडल्स संभाल रहे हैं। उनके बनाए पोस्टर्स वाकई कमाल के होते हैं। दूसरे एपिसोड में डॉ. गोपाल सर आए। उन्होंने हमें बहुत कुछ सिखाया। उस दिन दिल से लगा कि हम सब जो काम कर रहे हैं, वह बेहद ज़रूरी है। गोपाल सर के बचपन से शुरू हुई वह बातचीत शिक्षा, समाज और लोक-संस्कृति के गहरे आयामों तक पहुँची। तीसरे एपिसोड में डॉ. मुकेश सर से मिलना हुआ। उन्होंने कला के कई बारीक पहलुओं को बहुत संजीदगी से समझाया। मज़ेदार बात यह है कि मैं इन सभी हस्तियों से पहली बार मिल रहा था, वह भी सीधे कैमरे के सामने। इसलिए जो कुछ भी रिकॉर्ड हुआ, वह पूरी तरह 'अनफिल्टर्ड' और स्वाभाविक है। 'पहलू' का परिवार काफी बड़ा है। यहाँ जो भी व्यक्ति पहले एक मेहमान के रूप में आता है, आगे चलकर वह हमारी कोर टीम का हिस्सा बन जाता है। जगजीत और कमल ने तकनीकी बारीकियों में बहुत कुछ सिखाया। जब भी तकनीक से जुड़ा कोई सवाल उठता, मेरा मन सबसे पहले इन्हीं दोनों के पास जाने को करता। कमल ने एक बार कहा था कि "एडिटिंग कभी खत्म नहीं होती।" इस बात के मर्म को मैंने गहराई से महसूस किया है। हर एपिसोड को शूट करने से पहले मैं अपनी बहनों — रूपल और प्रांजल से बात करता हूँ कि इस बार मुझे क्या-क्या गलतियाँ नहीं दोहरानी हैं। 'पहलू' महज़ एक प्रोजेक्ट नहीं, एक परिवार है। यहाँ हर कोई सीख रहा है। सबके विचार अलग-अलग हैं, जो कि एक स्वस्थ बात है; लेकिन उससे भी अच्छी बात यह है कि सबका दृष्टिकोण और विज़न एक ही है — "समाज और साहित्य का दस्तावेज़ीकरण"। 'पहलू' सीरीज़ के सभी वीडियो आप क्यूआर कोड को स्कैन करके देख सकते हैं। आपने हमेशा अपना भरपूर स्नेह दिया है और उम्मीद है आगे भी यूँ ही बनाए रखेंगे। इतना पढ़ने के लिए आपका हार्दिक आभार। 


यूट्यूब सीरीज

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