शोध आलेख : भोजपुरी लोकगीतों की सामाजिकता / डॉ. जितेंद्र कुमार यादव

भोजपुरी लोकगीतों की सामाजिकता
- डॉ. जितेंद्र कुमार यादव

शोध सार : भोजपुरी लोक साहित् में लोकगीतों की समृद्ध परंपरा है। लोक गीतों के विविध प्रकारों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इनका संबंध श्रम से भी जुडा हुआ है। विभिन् श्रमिक जातियां अपने पारंपरिक कार्य करते हुएइन गीतों और इनके धुनों को आकार दीं होंगी। लोकगीत प्रत्येक समाज की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति हैं। इसके माध्यम से किसी समाज के पारिवारिक और सामजिक संबंधों को जाना जा सकता है। आज मनोरंजन के तमाम साधन हो गए हैं लेकिन ऐतिहासिक रूप में हजारों सालों तक लोकगीतों ने समाज का मनोरंजन किया है। इसलिए लोकगीतों के माध्यम से किसी समाज की सामाजिक संरचना एवं उसके विविध स्थितियों की जानकारी प्राप् की जा सकती है। भोजपुरी समाज की श्रमशील जातियां सांस्कृतिक रूप में काफी समृद्ध रही हैं। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद राग-रंग इनके जीवन का प्रमुख हिस्सा रहा है। हालांकि दूसरे प्रदेशों की तरह भोजपुरी की लोकसंस्कृति मुख् धारा का हिस्सा नहीं बना पाई। भिखारी ठाकुर और उनका लोकनाट्य बिदेसियाभोजपुरी संस्कृति के वाहक के रूप में दिखाई देता है परंतु इसके साथ ही भोजपुरी के अन् नाट्य और लोक नृत्-गीतों को भी समाज के सामने लाने का प्रयास करना चाहिए। भोजपुरी के बहुत ऐसी नृत् और गीत शैलियां हैं जो विलुप् होने के कगार पर हैं। नई पीढी की दिलचस्पी उनमें कम होती जा रही हैं। भोजपुरी समाज को अपने सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने की जरूरत है।

बीज शब् : लोक साहित्, लोकगीत, श्रमिक जातियां, श्रमगीत, लोक संस्कृति, सामाजिक संरचना, सामाजिक संबंध, लोक संस्कृति, बिदेसिया, लोक नाट्य, जातीय गीत, जातीय उत्सव, गाथात्मकता, सामंतवाद, श्रम प्रवसन।

मूल आलेख : भोजपुरी प्रदेश के लोक गीतों के संग्रह की तरफ सबसे पहला ध्यान हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले डॉ. ग्रियर्सन का गया। उन्होंने ‘‘1884 . में सम बिहारी फोक सांग्सनामक लेख प्रकाशित  किया, जो बिहारी भाषा  के विभिन्न लोकगीतों का संग्रह है। इसके दो वर्ष पश्चात 1886 में डॉं ग्रियर्सन का सम भोजपुरी फोक सांग्सनामक वृहद तथा विद्वतापूर्ण लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें भोजपुरी के बिरहा, जतसार, सोहर आदि गीतों का संकलन प्रस्तुत किया गया है।’’[1] इसके अतिरिक्त ग्रियर्सन ने विजयमल, गोपीचन्द, आल्हाज मैरेज, आदि लोक गाथाओं का भी संकलन किया। ऐसे तो लोक साहित्य की सीमाएं अपरिमित हैं तब भी लोक साहित् के विभिन् विद्वानों की मदद से आज भोजपुरी लोक साहित्य का संग्रह बेहतर स्थिति में पहुंच गया है। डॉ. ग्रियर्सन के अलावा ह्यूग फ्रेजर, जे. बीम्स, एस जी शिरेफ, पं. रामनरेष त्रिपाठी, कृष्णदेव उपाध्याय, विद्या निवास मिश्र, देवेन्द्र सत्यार्थी ने भोजपुरी लोकगीतों के संग्रह और सम्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भोजपुरी प्रदेश सांस्कृतिक रूप में काफी समृद्ध रहा है। भोजपुरी समाज की श्रमिक जातियों के अपने-अपने लोक गीत-नृत्य हैं, जिसे वे अपने पारंपरिक कार्य करते वक्त गाती थीं। इन गीतों को इन्होंने श्रम से ऊपजी थकान को मिटाने या विस्मृत करने के लिए इजाद किये गये होंगे। इन गीतों को सामूहिक कार्य, त्यौहारों और उत्सवों पर अवसर पर भी गाया जाता हैं। अहीर, गड़ेरिया, चमार, दुसाध, तेली, धोबी, गोंड़ आदि ऐसी जातियां हैं जिनके जातीय गीत और नृत्य भोजपुरी प्रदेश  में आज भी गाये-बजाये जाते हैं। भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित कुछ प्रमुख श्रम गीतों का परिचय यहां दिया जा रहा हैः

बिरहा : ‘‘1880 के दशक  में ही जी. . ग्रियर्सन ने देखा था कि भोजपुरी क्षेत्र में संगीत की एक विधा बिरहा के रूप में प्रचलित है। अंग्रेज अधिकारियों ने इसे दर्ज किया। बाद के शोधार्थियों ने भी इसका उल्लेख किया है कि बिरहा इस क्षेत्र की निचली जातियों की मनोरंजक परक विधा है।...पहले यह ग्रामीण था और अहीर (अब यादव) जाति की एकल संपत्ति था। लेकिन जब यह सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हुआ तो उसकी विषय वस्तु भी बदली। आधुनिक काल में बिरहा का मौखिक इतिहास यह है कि इसकी रचना बिहारी लाल यादव (1857-1926) ने की थी।’’[2]  पारंपरिक रूप से माना जाता है कि बिरहाका नामकरण उसकी विषय वस्तु विरह के कारण पड़ा होगा। कहा जाता है कि ‘‘श्री कृष् के मथुरा चले जाने पर ग्वाल-वाल सभी जड़-चेतन सभी विरह दशा की अनुभूति कर रहे थे। गायों को चराते जब उन्हें श्री कृष् की याद आती तो उनके विरह वियोग में जो गीत गाते कालांतर में उसी का नाम बिरहा हो गया।’’[3]  पारंपरिक रूप से यह चरवाही के समय गाया जाता है। चरवाहे जब एक कान में अपनी उंगली डाल कर स्वर की लंबी तान लेता है तो जैसे पूरे समाज का दर्द फूट पड़ता है। एक बिरहा में स्त्री अपने विरहावस्था का वर्णन करते हुए कहती हैः

‘‘पिया पिया कहत पियर भइली देहिया, लोगवा कहेला पिंडरोग।
गंउवा के लोगवा मरमियों ना जानेले, भइले गवनवा ना मोर।’’[4]

अर्थात, प्रियतम की याद में मेरा शरीर पीला पड़ गया है। गांव के संगी कह रहे हैं कि मुझे पींड रोग हुआ है परंतु वे मेरे हृदय के मर्म को नहीं जानते। मेरी यह दुर्दशा गवनानहीं होने के कारण हुआ है। एक अन्य बिरहा में एक बूढ़ी औरत नवयुवतियों को उपदेश देते हुए कहती है-

‘‘पिसना के परिकल मुसरिया तुसरिया, दूधवा के परिकल बिलार।
आपन जोबनवा संभरिहे बिटियवा, रहरी में लागल बा हुंड़ार।’’[5]

यानी, जिस प्रकार घर में रखे आटा को चुहा-चुहियों से और बिल्ली से दूध को संभालकर रखा जाता है, उसी प्रकार तुम अपने यौवन को संभालकर रखो क्योंकि लोग भेड़ियां की भांति तुम्हारे यौवन के लिए घात लगाए हैं।

वर्तमान में विभिन्न घटनाओं पर आधारित गाथात्मक बिरहा का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसमें समसामयिक घटना को आधार बना कर बिरहा गाया जाता है। आजमगढ़ के प्रतिद्ध बिरहा गायक इसुरी यादव ने विभिन् सामाजिक आंदोलनों को आधार बनाकर बड़ा ही मार्मिक बिरहा गाया है। बिरहिया पारस द्वारा गाया गया राजीव गांधी हत्याकांड और मछली शहर नामक बिरहा बहुत ही प्रसिद्ध हुआ था। बिरहा के प्रमुख गायक बल्लू यादव, पारस यादव, सूबेदार यादव, चंद्रिका कवि, हीरालाल यादव, विजयलाल यादव, ओमप्रकाश यादव आदि हैं। बिरहा के अंत में गरू की वंदना का प्रचलन हैः   

‘‘गुरू बिहारी, गुरू गणेष, राम लाल मोर बाका
कथन करै चंद्रिका कवि बच्च के विजय पताका’’[6]

ऊंचे सुर का हारमूनियम, ढोलक, और फार’ (लोहे का दो रड आकार का बना वाद्य यंत्र) इसके प्रमुख वाद्य यंत्र हैं। बिरहा के कई अखाड़े (घराने) भी हैं जिनमें पत्तू अखाड़ा, रम्मन अखाड़ा, गणेष अखाड़ा और जद्दू अखाड़ा मशहूर है। गाजीपुर, आजमगढ़ और बनारस बिरहा के केन्द्र हैं।

फरुवाही गीत : इसे फरी नाच भी कहा जाता है। यह भोजुपरी प्रदेश को प्रमुख नृत् गीत है। इसके गवैया गाने के साथ साथ विभिन्न प्रकार के करतबदिखाते रहते हैं। यह करतबअहीर जाति की पहलवानी से जुड़ा हुआ है। यह मुख्यतः वीर और श्रृंगार रस प्रधान गीत हैं। इसमें लगभग 10 लोगों का समूह होता है। मुख् कलाकार धोती और उसके ऊपर कच्छा तथा बदन में गंजी पहनते हैं। वाद्य यंत्र के रूप में नागारा, करतार एवं लोहे से बना फार का उपयोग किया जाता है। बीच के लम्बे घेरे में कई फरुवाह गाना गाते, नृत्य करते हुए बीच-बीच में करतब दिखाते हैं। दांत से साइकिल उठा लेना, हथेली से पत्थर फोड़ देना, डंराड़ी मारना, हाथ को पैर बना कर चारों फेरा लगा आना, आदि उनके करतब हैं जिन्हें भोजपुरी प्रदेश के दर्शक बहुत पसंद करते हैं। पहले शादी आदि शुभ अवसरों पर फरुवाही गीत का प्रचलन था जो धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। एक फरुवाही गीत में शौर्य भाव की अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार हुई है-

‘‘धुरिया लगावे धुरियाहवा कहाले, गिरही मारेले फरुवाह
उलटा दोकछवा मारे अहिरा बलकावा, जिनकर बटुरि नंवेले करिहाव।’’[7]

लोरिकायन: लोरिकायन मूलत: गाथात्मक लोक साहित् है। भोजपुरी के अलावा मैथिली, मगही और अवधी में भी लोरिकायन गीत गाया जाता है। भोजपुरी में इसे लोरिकी और लोरिकायन तथा अवधी में इसे चनैनी कहते हैं।...इस महाकाव्य के गायक प्रायः अहीर या यादव हैं। यह गाथा यादव नायक लोरिक और चनवा के प्रेम प्रसंग पर आधारित है। आल्हा की तरह यह भी मूलत: वीर रस से ओतप्रोत है। लोरिक के युद्ध कौशल की एक झलक-

‘‘नौ सौ फउदिया मुंडवा काटी दिहलस गिराय
जैसे काटे दादा खेती तेगा किसान
तैसे कटत फउदिया लोरिकवा पछिम चलि रे जाय
घुमि घुमि पलटन के दादा काटत रे बाय।’’[8]

युद्ध में लोरिक ने नौ सौ व्यक्तियों का एक साथ वध कर दिया। उसने विरोधी पक्ष के सैनिकों के सर को जमीन पर इस प्रकार गिरा दिया है जैसे किसान अपने फसलों को काटकर जमीन पर गिराता है। वह सैनिकों का सर काटते हुए पश्चिम दिशा की ओर बढ रहा है। वह घूम घूम कर विरोधी सैनिकों पर हमला कर उनका वध कर रहा है।

धोबियऊ गीतः पारंपरिक रूप से कपड़ा साफ करने वाली जाति धोबी जिस गीत को गाती है उसे धोबियऊ गीत कहते हैं। एक गीत में धोबी अपनी पत्नी से कह रहा है कि कल घाट (नदी के किनारे का वह स्थान जहां कपड़ा धोबी धोता है) पर चलना है। अतः खाने के लिए मोटी लिट्टी (रोटी का ही मोटा रूप) बना लेना और साथ में टिकिया, तंबाकू और थोड़ी सी आग लेना मत भूलना।

‘‘मोटि मोटी लिटिया लगैहे धोबिनियां कि बिहिने चले के बा घाट।
तीनहिं चीजें मत भूलिहै धोबिनियां कि टिकिया, तमाकू, थोड़ा आग।’’[9]

धोबी लोग अपने जातीय उत्सवों, लोक देवताओं की पूजा, विवाह आदि अवसरों में समूह के साथ खड़े होकर गाते और नाचते हैं। इसमें मृदंग के प्रकार का ही हुडकानामक  वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है जिससे कुछ लोग इसे हुडकाका नाच भी कहते हैं।

कहरउवा गीत: यह भोजपुरी का एक प्रमुख लोकगीत है। पुराने जमाने में जब मोटर गाडियों का प्रचलन नहीं था, उस समय डोलीका बहुत ही महत् था। खासकर रानी और दुल्हन के लिए डोली का उपयोग किया जाता था। डोली ढोने के समय रास्ते में कहार कुछ गाने भी गुनगुनाते थे। एक गीत में बुढा कहार अपने पौरुष का बखान कर रहा है- बुढ़वा कंहरवा के आई बुढ़इया तौ फेके तलौने में जाल।यानी, बूढ़ा कहार को बुढ़ापा गया है परंतु अभी भी वह पोखरा में मछली पकड़ने के लिए जाल फेकता है। आधुनिक भोजपुरी लोकगीतों में कहरउवा और धोबियउवा गाने की धुन काफी लोकप्रिय है। आजमगढ बनारस के कई कलाकारों ने बिरहा के साथ इन धुनों को मिलाकर काफी लोकप्रिय हासिल की है। दिनेश लाल यादव निरहुआऔर समर सिंह का नाम उल्लेखनीय है।  

तेली जाति पारंपरकि रूप से तेल पेरती थी। पहले बैल से चलने वाले मशीन से तेल निकाला जाता था। तेली बैलों के आंखों पर पट्टी बांधकर आंधी रात से ही कोल्हू शुरू कर देता था। रात में अकेले बैलों के पीछे घूमते हुए वे बहुत ही मर्मभेदी गीत गाते थे। इन गीतों में श्रृंगार रस के साथ-साथ इनके कार्य का भी उल्लेख है। एक गाने में तेलिन के घानीलगाने और तेली के तेल पेरने का उल्लेख हैः

‘‘कौनी की जुनिया तेलिन घनिया अरे लगावे। अरे कौनी जुनिया ना। कोइलरि सबद सुनावै कि कौनी जुनिया ना।
आधी की रतिया तेलिनि घनिया लगावै, कि पिछली रतिया ना। कोइलरि सबद सुनावै कि पिछली रतिया ना।’’[10]

अर्थात ! तेलिन तुम किस समय घानीलगाई और किस समय कोयल शब्द सुनाई। इसका जवाब है कि आधी रात में ही तेलिन ने घानीलगाई है और पिछली रात ही कोयल अपना कूक सुनाई थी। जाहिर है कि इन गीतों में श्रमिक जातियों का प्रकृति के साथ घनिष् साहचर्य दिखाई देता है।

गोंडऊ गीतः गोड़ जाति का पारंपरिक पेशा मुख्यतः पानी भरना, लकड़ी चीरना था। इनकी स्त्रियां भाड़ झोककर अन्न भूजने का कार्य करती थीं। ये लोग विभिन्न अवसरों पर नृत्य भी करते हैं जिन्हें गोड़ऊ नाचकहा जाता है। यह लोक नृत्य का उत्कृष् नमूना है। एक गीत में गोड़िन कहती है कि पिया के रूप धर करके चोर आया और मेरा कंगन चोरी कर के ले गयाः

‘‘खुर खुर खुर खुर टाटी बोले, हम जानि पियवा मोर। पियवा के भेसे अइले, कंगना ले गइले चोर।’’[11]

जंतसार : पहले गेहूं हाथ चक्कीसे ही पीसा जाता था जिसे जांताकहते हैं। जांता पीसते वक्त महिलाएं इन गानों को गाती हैं इसी कारण इन गीतों को जंतसार कहा जाता है। एक जतसार गीतमें जांताचला रही एक महिला कहती हैः

‘‘ राम हरि मोरे गइले बिदेसवा, सकल दुःखवा देइ गइले हो राम।
सासु, ननदिया बिरही बोलेली, केकर कमइया खइबू हो राम।’’[12]

अर्थात्, मेरा पति किसी दूसरे शहर में चला गया है। इसके कारण मेरी सास और ननद कहती है कि मैं किसकी कमाई खाऊंगीं। ध्यातब्य है कि लोक कलाकार भिखारी ठाकुर ने अपने नाटक बिदेसियामें जंतसारके गीतों का व्यापक प्रयोग किया है। भोजपुरी इलाके में साम्राज्यवादी शासन के दौरान व्यापक पैमाने पर श्रम-प्रवसन हुआ। भोजपुरी लोकगीतों में प्रवसन की परिघटना के कारण परिवार और घर में पति की अनुपस्थिति में स्त्री जीवन की स्थितियों का बड़ा ही मार्मिक अभिव्यंजना की गई है।

रोपनी-सोहनी के गीतः यह मुख्यतः खेत-मजदूर वर्गों की स्त्रियों का गीत है। इसे महिलाएं खेत में रोपनी-सोहनी करते समय सामूहिक रूप में गाती हैं। इन गानों में पारिवारिक नोक-झोंक का अच्छा चित्रण हुआ है। अपने प्रिय से बिछुड़ने का दर्द भी आया हैः

‘‘ननदी झगरवा कइली, पिया परदेश गइले। किया हो रामा, भउजी रोवेली छतिया फाटे हो राम।’’[13]

यानी, ननद झगड़ा कर रही है। पति परदेश चला गया है और ऐसी स्थिति में उसकी भौजी रो रही है। नायिका ऐसी प्रतिकूल स्थितियों में बेचैन है। इन गीतों से गुजरते हुए हम देखते हैं कि इनमें श्रम के विभिन्न रूपों के चित्रण के साथ-साथ बहुजन जातियों के प्रकृति से साहचर्य को भी रेखांकित किया गया है। भोजपूरी क्षेत्र से बड़े  पैमाने पर हुए श्रम-प्रवसन की पीड़ा भी इन गीतों, विषेशकर महिलाओं द्वारा गये जाने वाले गीतों में, बड़े मार्मिक ढ़ंग से अभिव्यक्त हुई है। एक अन् गीत में फसल के तैयार हो जाने और उसके कटनी के लिए जाती स्त्री का मार्मिक चित्रण किया गया है-

‘‘पाकि गइलय खेतवा लागल रेतवा,
झनकि बाजे हो धन खेते खेते चुरिआ, झनकि बाजे हो।
झूकि गइले गेहुंआ, लटकि गइले जउआ,
चटकि बाजे हो धन मटर के छिमिआं, चटकि बाजे हो
होत भिनुसार धनि लिहली हंसुअवा, चलि गइली हो
खेत काटे के सरेहिया, चली गइली हो।’’[14]

 इस प्रकार कहा जा सकता है कि भोजपुरी के पास लोक गीतों की समृद्ध परंपरा है। इन गीतों में श्रम के सौंदर्य की अभिव्यक्ति हुई है। भोजुपरी प्रदेश में बडें पैमाने पर श्रम प्रवसन हुआ है जिसकी पीडा भी इन लोक गीतों में सुनाई देती है। भोजपुरी लोकगीतों के वर्तमान संदर्भ में चन्द्रशेखर ने ठीक ही लिखा कि, ‘‘अब तो भोजपुरी क्षेत्र के अनेक श्रमगीतों की धुनें गायब हो रही हैं। उदाहरण के लिए मल्लाह गीत, धोबी गीत तो तकरीबन मर चुके हैं। सोहर (जन्म गीत) और विरह गीतों का पारंपरिक रूप और आकर्षण तेजी से खत्म होता जा रहा है। ऋतुओं से जुड़े गीत मौजूद तो हैं पर उनमें पुरानी परिष्कृति नहीं रह गयी है। बहरहाल, मास कल्चर ने हिन्दी फिल्मों में अथवा फूहड़ भोजपुरी फिल्मों में अधिकांशतः इस विधा को अधिग्रहित करने की कोशिश की है।’’[15] भोजपुरी गीतों पर संकट समय के साथ रोज--रोज बढ़ता जा रहा है। शासक वर्ग की उपेक्षाओं के कारण यह समाज गरीबी जहालत में जीने को अभिशप् है। ऐसे परिस्थितियों को मुकाबला बगैर सांस्कृतिक आंदोलन के नहीं किया जा सकता। नई आर्थिक नीतियां (निजीकरण-उदारीकरण) हमें परंपरा, इतिहास से काट कर स्मृति-विहीन बनने पर मजबूर कर रही हैं। ऐसे समय में हमें अपनी भाषा, साहित् और संस्कृति को सहेज कर रखना होगा।

 सन्दर्भ :

[1] कृष्‍णदेव उपाध्‍याय, लोकसाहित्‍य की भूमिका, साहित्‍य भवन, इलाहाबाद, 1957, पृ. 30
[2] चंद्रशेखर, लोकप्रिय संस्‍कृति का द्वंद्वात्‍मक समाजशास्‍त्र, सांस्‍कृतिक संकुल, इलाहाबाद, 2011, पृ.28
[3] वीरेन्‍द्र प्रताप, आज का समय और बिरहा, समसामयिक सृजन, नई दिल्‍ली, 2014, पृ. 223
[4] कृष्‍णदेव उपाध्‍याय, भोजपुरी ग्राम्‍यगीत, हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन प्रयाग, 2000, पृ. 346
[5] जितेंद्र यादव, भिखारी ठाकुर : प्रतिरोध का लोकस्‍वर, आ‍रोही प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 2014, पृ. 113
[6] वही, पृ. 113
[7] धनंजय सिंह, पुरबियों का लोकवृत बाया देश-परदेश, राजकमल, नई दिल्‍ली, 2020, पृ. 106
[8] वही, पृ. 106
[9] कृष्‍णदेव उपाध्‍याय, भोजपुरी ग्राम्‍यगीत, हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन प्रयाग, 2000, पृ. 20
[10] रामनरेश त्रिमाठी, हमारा ग्राम्‍य साहित्‍य, हिंदी मंदिर प्रयाग,1940, पृ. 24
[11] वही, पृ. 24
[12] कृष्‍णदेव उपाध्‍याय, भोजपुरी ग्राम्‍यगीत, हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन प्रयाग, 2000, पृ. 202
[13] जितेंद्र यादव, भिखारी ठाकुर : प्रतिरोध का लोकस्‍वर, आ‍रोही प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 2014, पृ. 116
[14] धनंजय सिंह, पुरबियों का लोकवृत बाया देश-परदेश, राजकमल, नई दिल्‍ली, 2020, पृ. 126
[15] चंद्रशेखर, लोकप्रिय संस्‍कृति का द्वंद्वात्‍मक समाजशास्‍त्र, सांस्‍कृतिक संकुल, इलाहाबाद, 2011, पृ 30
 

डॉ. जितेंद्र कुमार यादव
सहायक प्रोफेसरमोतीलाल नेहरू महाविद्यालय (डीयू), नई दिल्‍ली
jite.jnu@gmail.com, 99

  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati), चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
अंक-47, अप्रैल-जून 2023 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : संजय कुमार मोची (चित्तौड़गढ़)68124622

 

Post a Comment

और नया पुराने