शोध आलेख : लोकजागरण और नवजागरण / निधिलता तिवारी

लोकजागरण और नवजागर
निधिलता तिवारी


शोध सार : भक्तिकाल के उदय में ‘लोकजागरण’ की महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है जो मूल रूप से सामंत विरोधी है और जिसकी मूल चेतना प्रेम की है। भक्तिकाल में निर्गुण और सगुण जैसी परस्पर विरोधी धाराओं एवं भक्तिकाल से लेकर छायावाद तक साहित्य का जो विस्तृत काल खंड है, उसमें ‘लोकजागरण’ और ‘नवजागरण’ जैसी दृष्टियों का बड़ा योगदान है। लोकजागरण का काव्य है- जनता के हृदय की वाणी। प्राय: भारतेंदु युग से पहले के साहित्य को ‘लोकजागरण’ की दृष्टि से देखा जाता है तो भारतेंदु युग से लेकर निराला तक का साहित्य लोकजागरण का अगला विकास माना जाता है, जिसे नवजागरण के रूप में जाना जाता है। लोकजागरण’ और ‘नवजागरण’ की चेतना से संपन्न होकर हिंदी समाज विकास की दिशा में आगे बढ़ा है और बढ़ेगा, यह आलोचक रामविलास शर्मा की मुख्य चिंता है। लोकजागरण के भीतर मूल रूप से सामंतवाद विरोधी और नवजागरण के भीतर साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी चेतना भरी हुई है। इनके आधार पर शोषणमूलक व्यवस्थाओं को हटाकर समतामूलक समाज निर्मित किया जा सकता है, यह उनकी मूल स्थापना है।

बीज शब्द : भक्तिकाल, लोकजागरण, नवजागरण, भक्ति आंदोलन, लोकभाषा, जातीय भाषा, जातीयता, हिंदी, सामंतवाद, पूँजीवाद, चेतना, सांस्कृतिक, धर्म, साम्राज्यवाद, साहित्य, विकास, मूल, समाज, राजनैतिक, धार्मिक आदि।

शोध आलेख : भक्तिकाल लोकजागरण की नींव है। 15वीं सदी के जनजागरण को लोकजागरण की संज्ञा दी जाती है। सामाजिक भेदभाव और सामाजिक वैषम्य को दूर करने में भक्ति आंदोलन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सिद्ध, बौद्ध, नाथ, जैन से लेकर अमीर खुसरो, विद्यापति से लेकर घनानंद एवं पद्माकर तक के कवियों में लोकजागरण की प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं। भक्ति साहित्य में शूद्रों, स्त्रियों, किसानों, कारीगरों एवं मुसलमानों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। कबीर, नामदेव, नानक, रैदास से लेकर तमिलनाडु की आण्डाल, कर्नाटक की अकमा देवी, काश्मीर की लाल देवी (लल्लश्वेरी) और हिंदी प्रदेश की मीराबाई ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भक्तिकाल के बाहय एवं आंतरिक प्रेरणा स्रोत के रूप में तत्कालीन परिस्थितियों में लोकजागरण को विशेष रूप दिया गया है। तत्कालीन भक्ति साहित्य को लोकजागरण का काल भी कहा जाता है। भक्ति आंदोलन के अंतर्गत कबीर ने लोगों में जागरण का भाव पैदा किया तथा जाति प्रथा एवं वर्ण भेद पर पुरजोर विरोध करके समतामूलक समाज की स्थापना की।

“जाति- पाति पूछै नहीं कोई। हरि को भजै सो हरि को होई।।”

प्राय: भारतीय नवजागरण को लोकजागरण का विकास माना जाता है। यह लोकजागरण नवजागरण से भिन्न है। देखा जाय तो मूलभूत अन्तर इनकी ऐतिहासिक अन्तर्वस्तु में है। 19वीं सदी का नवजागरण जहाँ उपनिवेशवादी दौर का उपज था, वहीं 15वीं सदी का लोकजागरण सामान्य लोक से संबंधित था। नवजागरण, लोकजागरण से इस बात में भी भिन्न था कि इसके विचार शिक्षित मध्यवर्ग से थे, जिन्हें बांग्ला में भद्रलोक कहा जाता है। यह भद्रलोक सामान्य भक्त कवियों की तरह घुलने मिलने वाला नहीं था। डॉ. रामविलास शर्मा ने भक्तिकाल को लोकजागरण कहा है। उन्होंने समाज में चार प्रकार के नवजागरण की चर्चा की है। “ऋग्वेद से पहला नवजागरण, उपनिषदों से दूसरा नवजागरण, भक्ति आंदोलन से तीसरा नवजागरण और 19वीं सदी से सम्बन्धित चौथा नवजागरण।”1 जिस प्रकार यूरोप में आधुनिकता के दो मन्वंतर का जिक्र किया जाता है। जैसे- 15वीं-16वीं सदी के पुनर्जागरण का और उसके बाद 18वीं सदी के एनलाइटमेंट (ज्ञानोदय) काल का। उसी प्रकार डॉ. रामविलास शर्मा भी हिंदी साहित्य के संदर्भ में दो चरणों का जिक्र करते हैं। जैसे- 12वीं सदी के लोकजागरण का और 19वीं सदी के नवजागरण का।

डॉ. प्रदीप सक्सेना का कहना है, “माना जा रहा है कि भारतीय पुनर्जागरण का अत्यंत सशक्त दौर भक्तिकाल है। यह पहला आधुनिक पुनर्जागरण है जिसका स्वाभाविक विकास विदेशी व्यापारी रोक देते हैं इसे लोकजागरण कहना अधिक संगत है, क्योंकि यहाँ भी ‘पुनर’ के तत्व कम हैं। इस दौर की दार्शनिक उपलब्धियाँ कम महान नहीं है, विशेषकर निर्गुणपद की। 15वीं सदी में जहाँ इटली में रिनेसाँ हो रहा था वहीं भारत में लोकजागरण घटित हो रहा था। आधुनिक भारतीय भाषाएँ 10वीं–11वीं शताब्दी से जन्म लेने लगी थी। प्राकृत तो पहले से ही अस्तित्व में थी। कला के क्षेत्र में नया वास्तुशास्त्र और वास्तुशिल्प पैदा होने लगा था। इमारतों में गुम्बद बनाने की परम्परा आरम्भ हुई। कलात्मक रूप से दरवाजों और मंदिरों का निर्माण होने लगा था। मूर्तिकला नए ढंग से विकसित हुई। सूफी संतों द्वारा नया दर्शन ‘इश्क’ आरम्भ हुआ जो श्रृंगार रस से भिन्न था। यह परिवर्तन जिन लोगों ने किया ये राजा या नवाब न होकर निम्न वर्ग के ही लोग थे।”2

हिन्दी की जातीय भाषाओं का विकास (भक्तिकाल) 12वीं सदी में होता है और हिन्दी का विकास 19वीं सदी यानी नवजागरण काल में। जैसे-जैसे साहित्य में जन भाषाओं की दखल बढ़ती जाती है वैसे-वैसे साहित्य में विशिष्टता बढ़ती जाती है। कवि विद्यापति ने लोकभाषा एवं जनभाषा के मधुर होने की बात कही है। वे कहते हैं-

“देसिल बअना सब जन मिट्ठा। तें तैंसन जंपओ अवहट्ठा।”3

     तुलसीदास को संस्कृत, अवधी और ब्रज भाषाएँ आती थी, परन्तु उन्होंने जनभाषा अवधी में अपना साहित्य लिखा। कबीर वाणी जनवाणी में है। अन्य भक्तिकालीन कवियों का साहित्य भी जनवाणी में है। तभी तो इतने वर्षों के बाद भी भक्ति साहित्य आम जन को कंठस्थ है। इसी कारण से डॉ. रामविलास शर्मा ने जनभाषाओं के विकास को लोकजागरण से जोड़ा है। डॉ. शर्मा ने जनजागरण की शुरुआत तब से मानी है- जब बोल-चाल की भाषाओं में साहित्य रचा जाने लगता है तथा दूसरा जब उस क्षेत्र में आधुनिक जातियों का गठन होता है।

    भक्तिकाल के भक्त कवि मूलतः भक्त थे, साधु थे। ये लोग समाज के हाशिए पर थे। इनमें से अधिकतर निम्न जाति थे और अत्यंत गरीब थे। इनमें बदलाव की कामना थी। अत: यह कार्य उन्होंने भक्ति के माध्यम से किया। इस संदर्भ में शंभुनाथ कहते हैं, “अतीत में जन-उभारों तथा आंदोलनों के साथ साधारण जन की संस्कृति में भी उभार आया। रूढ़ियाँ टूटीं। खासकर भक्ति आंदोलन और नवजागरण ने भारतीय लोकसंस्कृति के बुनियादी गुणों को उसके विभिन्न कला रूपों समेत एक बार फिर रोशनी में ला दिया। लोकजागरण विश्वास के तर्क पर और नवजागरण बुद्धि के तर्क पर आधारित था। दोनों ने औजारों की भिन्नता के बावजूद अपनी सीमाओं में सत्ता की संस्कृति को जबरदस्त चुनौती दी।”4

    भक्ति द्रविड़ों की देन है। उत्तर भारत से पहले दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन होता है। तमिल भाषा दक्षिण में सबसे पुरानी (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) है। जिन शूद्रों को निम्न और दलित कहा जाता है उन्होंने दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन चलाया। कबीर से पहले रामानन्द ने बहुत बड़ी क्रान्ति की लौ जगाई थी। भक्ति आंदोलन के दो मुख्य सूत्रधार रहे हैं- किसान और कारीगर, और इसकी विशेषता है कि इसमें कश्मीर से लेकर तमिल तक और गुजरात से लेकर बंगाल तक के किसान और कारीगरों का साहित्य है। यूरोप में जहाँ 18वीं सदी में ज्ञान-विज्ञान का आंदोलन (एनलाइटमेंट) चला, वहीं भारत में अकबर के शासनकाल में ज्ञान का प्रचार हुआ, जो यूरोप से तुलना करने पर एक शताब्दी पूर्व घटित होता है। यूरोप में जो व्यापारिक पूँजीवाद का दौर था वह जातीय निर्माण को दर्शाता है। जिसे भारत में सांस्कृतिक लोकजागरण कहा जाता है। भक्ति आंदोलन के संदर्भ में डॉ. रामविलास शर्मा का कहना है कि- “तमिलनाडु (छठीं सदी ई०) और महाराष्ट्र (12वीं सदी ई०) से होते हुए यह प्रक्रिया मुगलकाल में अपने उत्कर्ष पर दिखाई देती है। यहाँ भक्ति आंदोलन में यूरोप की तरह रिनेंसाँ और रिफॉर्मेशन के बीच अनिवार्य टक्कर के विपरीत ये दोनो धाराएँ आपस में घुली मिली हुई और एक-दूसरे की पूरक नजर आती हैं।”5

भक्ति आंदोलन का मुख्य स्वर सामंत विरोधी और मानवतावादी है। भक्ति काल के प्रतिनिधि कवि तुलसीदास और अन्य उसीप्रकार लोकजागरण का प्रतिनिधि करते हैं जिसप्रकार इटली के ‘दांते’, इसलिए इसे लोकजागरण कहा जाता है। डॉ. मैनेजर पाण्डेय भी इसी बात का समर्थन करते हैं कि- “भक्तिकालीन लोकजागरण जातीय निर्माण को व्यक्त करने वाला सांस्कृतिक आंदोलन है। जिसका मुख्य स्वर सामंतवाद विरोधी तथा मानवतावादी है। जबकि नवजागरण राष्ट्रीय स्वाधीनता का सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलन है। जिसका मुख्य स्वर साम्राज्यवाद विरोधी तथा सामंतविरोधी है।”6

शुक्ल जी ने भी भक्तिकाल को जन आंदोलन और लोकजागरण का काल माना है। इसीलिए हिन्दी के भक्तिकाल की उन्होंने सर्वाधिक प्रशंसा की। साथ ही यह ध्यान दिलाया कि भक्ति का काव्य प्रवाह जनता के बीच से फूटा था, सामन्तों के बीच से नहीं। डॉ. रामविलास शर्मा ने आचार्य शुक्ल की इन्हीं मान्यताओं को केन्द्र में रखकर आचार्य शुक्ल की भक्तिकाल विषयक दृष्टि पर गम्भीर प्रकाश डाला है। वे कहते हैं, “इंग्लैंड में गणतंत्र के ध्वस्त होने और बादशाही के बहाल होने के बाद सामंती सम्बन्ध एक हद तक सुदृढ़ हुए, पुनर्जागरण के बाद वहाँ निओक्लासिक अथवा रीतिवादी युग आया। युरूप में सर्वत्र यह स्थिति न थी पर भारत में उससे मिलती-जुलती स्थिति मुगल साम्राज्य के पतनकाल में थी। शुक्ल जी का उत्तर मध्यकाल उनका रीतिकाल भी है। रीतिकाल में एक और गुरु गोविंदसिंह जैसे भक्त कवि हैं, दूसरी ओर घनानंद जैसे रीतिमुक्त कवि हैं। मध्यकाल के बाद शुक्ल जी का आधुनिक काल है। युरूप के आधुनिक काल से हमारा आधुनिक काल भिन्न है। साम्राज्यवाद के दबाव और उसके विरुद्ध संघर्ष की परिस्थितियों में हमारे साहित्य का विकास होता है। युरूप का रोमांटिक युग औद्योगिक पूँजीवाद का युग है, उसके बाद का आधुनिक युग महाजनी पूँजीवाद का युग है। हमारे यहाँ स्वाधीनता आंदोलन के प्रसार की मंजिलों के अनुरूप शुक्ल जी ने आधुनिक काल के अंतर्गत प्रथम, द्वितीय और तृतीय उत्थान का साहित्य विवेचन किया है।”7

लोकजागरण की चेतना आगे चलकर नवजागरण की चेतना में परिवर्तित होती है और उसकी चिंताधारा अधिक व्यापक होती है। लोकजागरण का संबंध मुख्य रूप से भक्ति साहित्य से है जबकि हिंदी नवजागरण का संबंध भारतेंदु युग और उसके बाद के साहित्य से है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ’ में रामविलास जी ने लिखा है “भारतेंदु युग उत्तर भारत में जन जागरण का पहला या प्रारंभिक दौर नहीं है; वह जन जागरण की पुरानी परंपरा का एक खास दौर है। जन जागरण की शुरुआत तब होती है जब यहाँ बोलचाल की भाषाओं में साहित्य रचा जाने लगता है तथा जब यहाँ के विभिन्न प्रदेशों में आधुनिक जातियों का गठन होता है। यह सांमतविरोधी जन जागरण है।”8

‘लोकजागरण’ और ‘नवजागरण’ की चेतना से संपन्न होकर हिंदी समाज विकास की दिशा में आगे बढ़ा है और बढ़ेगा, यह रामविलास शर्मा की मूलभूत चिंता है। ‘लोकजागरण’ के भीतर मूलत: सामंतवाद विरोधी और ‘नवजागरण’ के भीतर साम्राज्यवाद एवं पूँजीवाद विरोधी चेतना भरी हुई है। इनके आधार पर शोषण मूलक व्यवस्थाओं को हटाकर समतामूलक समाज निर्मित किया जा सके, यह उनकी मूल स्थापना है।

‘लोकजागरण’ को केन्द्र में रखकर डॉ. शर्मा व्यापक लेखन करते हैं और इसके लिए द्विवेदी युग के रचनाकार, आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लेखन को प्रस्थान-बिन्दु मानते हैं। वे ‘लोकजागरण और आधुनिक काल’ शीर्षक निबंध में आचार्य शुक्ल के लोकजागरण वाली मान्यता को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “शुक्ल जी का आदिकाल सामंतकाल के अंतर्गत है। किंतु इसी काल में विद्यापति और खुसरो हुए। लोकजागरण वाले साहित्य की शुरुआत इन दो कवियों से माननी चाहिए। भक्तिकाव्य इस साहित्य का एक अंग है, बहुत महत्त्वपूर्ण अंग है, फिर भी सामंती रूढ़ियों से मुक्त सारा साहित्य उसमें सिमट नहीं आता। लोकजागरण वाले साहित्य की धारा विद्यापति और खुसरो से आरंभ होकर सूर-तुलसी के अलावा सेनापति और रहीम को समेटती हुई रीतिमुक्त घनानंद तक प्रवाहित रहती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से जो नवजागरण शरू होता है वह नयी परिस्थितियों में पुराने लोकजागरण का विकास है।”9

लोकजागरण (जो बंगाल में पुनर्जागरण के रूप में प्रचलित था) का उद्भव एवं विकास सबसे पहले बंगाल में हुआ। राजाराम मोहन राय इसके पहले पुरोधा माने जाते हैं। जिसके तहत लोग सबसे पहले पश्चिमी सभ्यता के सम्पर्क में आए तथा विश्व में चल रही गतिविधियों से परिचित हुए, क्योंकि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपना समूचा व्यापार फैला रखा था। अत: यहाँ से शुरू होता हुआ जागरण सारे भारत में फैला जिसके फलस्वरूप सारा भारत स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में दीर्घकालीन सुदीर्घ निन्द्रा से जागृत हो उठा। ‘भारतीय साहित्य की भूमिका’ (1996) नामक पुस्तक में रामविलास शर्मा ने लोकजागरण की चर्चा की है, “जब देश भाषाओं में साहित्य रचा जाने लगता है तो वह आम जनता तक पहुँचता है।”10 उन्होंने अपने तर्कों के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यह आम लोगों का जागरण था। जो भी सामाजिक एवं लोकहित कार्य हुए वे विशेष लोगों के लिए नहीं हुए थे।

यह स्पष्ट है कि भारतीय नवजागरण, पुनर्जागरण न होकर एक क्रमिक विकास की प्रक्रिया है, जो आर्यों के आगमन से आरम्भ हो जाती है। बुद्ध, महावीर से चलते हुए यह प्रक्रिया भक्ति सागर को पार करते हुए 1857 की क्रान्ति से गुजरते हुए आधुनिक युग में प्रवेश करती है। परन्तु इस सतत् निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया के पीछे कुछ सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक कारण रहे हैं। वीरभारत तलवार का कहना है, “भारतीय नवजागरण की खासियत यूरोपीय सम्पर्क से हासिल आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को आत्मसात करके भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मुआफिक एक आधुनिक समाज बनाने की आत्मनिर्भर कोशिशों में थी।”11 इसी बात को रेखांकित करते हुए आलोचक डॉ. नामवर सिंह का कहना है कि, “यह साधारण लोगों का जागरण इटली के जागरण से ही अधिक महान था। ये धनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा नहीं चलाया गया बल्कि मजदूर वर्ग के लोगों ने यह अनोखा कार्य किया।”12

भारतीय आत्मा की सृजनात्मक अभिव्यक्ति सबसे पहले दर्शन, धर्म व संस्कृति के क्षेत्रों में हुई और राजनीतिक आत्म चेतना का उदय उसके परिहार्य अतीत को पुनर्जीवित करने की प्रवृत्ति अधिक थी। भारतीय पुनर्जागरण के नेतृत्वकर्ताओं ने खुले रूप में इस बात को ध्यान रखा कि हमें अपने प्राचीन धर्मशास्त्र, वेदों, उपनिषदों, गीता, पुराणों आदि के आधार पर अपने वर्तमान जीवन को ढालना चाहिए। लोकजागरण में हमें मुख्य बातें दिखाई देती हैं। राष्ट्रीयधारा, साम्राज्यवाद का विरोध और इसे उठाने में सिर्फ़ भारतेन्दु ही नजर नहीं आते बल्कि मुंशी सदासुखलाल, लल्लूलाल, सदल मिश्र, राजा लक्ष्मण सिंह, पं. प्रताप नारायण मिश्र, उपाध्याय बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, ठाकुर जगमोहन सिंह, बालकृष्ण भट्ट आदि कुछ ऐसे नाम है जिन्होंने लोकजागरण के क्षेत्र को परिमार्जित किया। अतीत को पुनर्जीवित करने की यह भावना आक्रामक तथा अहंकारपूर्ण विदेशी सभ्यता को महान चुनौती के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न हुई थी। पश्चिम की आंतरिक सभ्यता तथा भारत की धार्मिक संस्कृतियों के बीच इस संघर्ष से नए भारत का उदय हुआ।

रामविलास शर्मा नवजागरण की अवधारणा पर विचार करते हुए लिखते हैं कि एक व्यवस्था से दूसरी में संक्रमण ही नवजागरण है।”13 उन्होंने यह भी लिखा कि- “किसी देश या उसके प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन को हम नवजागरण कहते हैं। इसमें सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के प्रयत्न शामिल हैं। शूद्रों और स्त्रियों की स्थिति को बदलने के प्रयत्न नवजागरण के अंग हैं। धार्मिक सुधार, अंधविश्वासों के विरुद्ध प्रचार नवजागरण के अंतर्गत है। शिक्षा प्रसार, साहित्य रचना जैसे कार्य तो उसके अंतर्गत हैं ही। स्वाधीनता आंदोलन विदेशी प्रभुत्व के विरूद्ध चलाया हुआ राजनीतिक आंदोलन है। वह नवजागरण का एक भाग है, उसका पर्याय नहीं। वह नवजागरण को प्रेरित कर सकता है, उसमें घुल मिल सकता है पर उसका स्थान नहीं ले सकता। स्वाधीनता आंदोलन के बिना भी नवजागरण संभव है, पर वह उच्च वर्गों तक सीमित रहेगा। वह समाज को बड़े पैमाने पर प्रभावित नहीं कर सकेगा। इसके विपरीत उच्च वर्गों तक सीमित रहेगा। वह समाज को बड़े पैमाने पर उन उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होगा।”14

देखा जाय तो ‘नवजागरण’ के लिए डॉ. शर्मा ने ‘लोकचेतना’ और ‘जातीय चेतना’ की पहचान को आवश्यक माना है। उनके अनुसार ‘कोई भी नवजागरण हो, उसका जातीय स्वरूप अवश्य होगा। सामंती संबंधों से बाहर निकलते हुए जन समाज जातियों के रूप में गठित होते हैं। जातीय जागरण को ही अक्सर नवजागरण कहा जाता है।”15

निष्कर्ष : अत: भारतीय इतिहास में मध्यकाल राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक सभी दृष्टि से महत्वपूर्ण था। एक ओर जहां इस्लामी संस्कृति भारतीय समाजिक संरचना को प्रभावित कर रही थी तो वहीं इसकी पृष्ठभूमि में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात भी होता है। यह माना जा सकता है कि प्रत्येक युग का साहित्य परिस्थितियों की उपज होता है और मध्यकालीन धार्मिक आंदोलन को तीव्र और गतिशील बनाने में इन परिस्थितियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परन्तु मूलतः यह भारतीयता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। हिन्दी भक्ति को सच्चे परिक्षेत्र में समझाने के लिए यह आवश्यक है कि इसकी पूर्ववर्ती विचारधारा और धार्मिक साहित्य का अध्ययन किया जाए। भाषा विचार दोनों दृष्टि से सम्पूर्ण धार्मिक आंदोलन लोकोन्मुख हो रहा था। संस्कृत का स्थान जन भाषाएं ले रही थी, जिसमें शस्त्र निरपेक्ष उग्र विचारधारा का स्वर सुनाई पड़ रहा था। यह वर्ण व्यवस्था में पिसती ऊंच-नीच की भेद भावना से कराहती तथाकथित अदृश्य समझी जाने वाली जाति का जनान्दोलन है, जो वर्ग वैषम्य के अन्यायपूर्ण जूते को उतार फेंकने के लिए व्याकुल हो रही थी। साहित्येतिहास में इसे स्वर्णिम काल की संज्ञा दी गई है। सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक का समय भारत में न केवल राजनीतिक सत्ता का विघटन का काल है बल्कि धार्मिक मान्यता और आस्था के स्खलन का भी काल है। लोगों को सामाजिक रूढ़ियों, भेदभाव आदि भक्ति आंदोलन व लोकजागरण का विरोध करते हुए जागरण स्थापित कर भक्ति का मार्ग दिखाया गया। धार्मिक तथा सामाजिक जीवन में जागरण तथा भक्ति आंदोलन आवश्यक रहा। लोकजागरण में कबीर, तुलसी, जायसी के भक्ति आंदोलन के द्वारा भक्ति एवं आंदोलन के लिए निद्रा में सोये हुए लोगों को जगाया। उन्होंने वर्ण, भेद, जाति आदि पर विरोध करते हुए एकमत होकर भक्ति की राह पर लाये। हिन्दू–मुस्लिम के जनता में आपस में सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्पर्क से दोनों के मध्य भेदभाव, सद्भाव, सहानुभूति एवं सहयोग की भावना का विकास हुआ इससे लोकजागरण में विकास हुआ।

     इस आंदोलन में हर तबके के लोगों ने भाग लिया और व्यापारिक गतिविधियों में इस पूरे भारत में फैलने में मदद की। इस आंदोलन ने समाज में लोगों को सामंतवादी व्यवस्था से लड़ने में हिम्मत प्रदान की। इसने एक साथ भारत में नवजागरण का काम किया। भक्ति आंदोलन ने समय-समय पर लगभग पूरे देश को प्रभावित किया और उसका धार्मिक सिद्धांतों अनुष्ठानों नैतिक मूल्यों और लोकप्रिय विश्वासों पर ही नहीं बल्कि कलाओं और संस्कृति पर भी निर्णायक प्रभाव पड़ा। परन्तु नवजागरण काल में हिन्दी जातीय भाषा के रूप में विकसित हुई। इस काल के रचनाकार हाशिए के नहीं थे, अपितु वे तो समाज का नेतृत्व करते थे। इनके साथ राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में भी खड़े थे, जिन्हें इन्होंने व्यावहारिक रूप से लागू भी करवाया। यही कारण है कि भक्ति आंदोलन उतना सफल नहीं हो सका, जितना कि नवजागरण।

संदर्भ : 

  1. डॉ. रामविलास शर्मा, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2010, पृo-13
  2. डॉ. प्रदीप सक्सेना, 1857 और भारतीय नवजागरण, आधार प्रकाशन, पंचकूला, 1996, पृo-117
  3. रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण 2013, पृo-2
  4. शंभुनाथ, दूसरे नवजागरण की ओर, ज्ञानभारती प्रकाशन, रूपनगर, दिल्ली, 1993, पृo-188
  5. डॉ. रामविलास शर्मा, भारतीय नवजागरण और यूरोप, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, 1996, पृ.16
  6. मैनेजर पाण्डेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008, पृo-190
  7. संo- डॉ. रामविलास शर्मा, लोकजागरण और हिन्दी साहित्य, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1999, भूमिका से उद्धृत
  8. रामविलास शर्मा, भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, संस्करण 2012, पृष्ठ-13
  9. डॉ. रामविलास शर्मा, हिंदी जाति का साहित्य; पृo-140
  10. (सं.) सीमा ओझा, आजकल, आजकल प्रकाशन विभाग, लोधी रोड, नई दिल्ली, अंक-5 सितंबर, 2012, पृo-29
  11. वीरभारत तलवार, रस्साकशी, सारांश प्रकाशन, दिल्ली, 2012, पृo-30
  12. https://www.hindisamay.com/content/3389/1/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9-%E0%A4%86%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81.cspx नामवर सिंह, हिंदी नवजागरण की समस्याएँ
  13. रामविलास शर्मा, भारतीय नवजागरण और यूरोप, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, नई दिल्ली, संस्करण 1996, पृष्ठ-90
  14. रामविलास शर्मा, स्वाधीनता संग्राम बदलते परिप्रेक्ष्य, पृo-121
  15.  वही  ” ” पृo-121

निधिलता तिवारी
शोधार्थी, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उ. प्र.- 221005

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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