शोध आलेख : भक्तिकाव्य की पूर्व पीठिका- दार्शनिक विचार / प्रो. अन्नपूर्णा सी.

भक्तिकाव्य की पूर्व पीठिका- दार्शनिक विचार
- प्रो. अन्नपूर्णा सी.


शोध सार : भक्ति की पूर्व पीठिका के रूप में दार्शनिक विचारधारा का अध्ययन होता है। इसके अनुसार जब भक्ति को ज्ञान के साथ मिलाकर रखें तो जीव दृढ़संकल्प के साथ कर्म,योग तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए अग्रसर हो सकता है। इस विषय की ही नीचे विस्तार से चर्चा की जा रही है। हिन्दी के भक्ति साहित्य के संदर्भ में इस पूर्व पीठिका को समझना जरूरी हैं।

बीज शब्द : अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैत, परब्रह्म, जीवदर्शन, भक्ति, मोक्ष, कर्मयोग आदि।

भारतीय संस्कृति वेद संस्कृति है। भारतभूमि वेदों के ज्ञान से सिंचित भूमि है। यहाँ धर्म, दर्शन और अध्यात्मवाद कोई नई चीज नहीं है। भारतभूमि सनातन धर्म पर ही खड़ी है। अतः भारतीय समाज में भक्तिधारा और ज्ञानधारा निरंतर चलती रही है। इसका अंत नहीं है। समय के अनुसार रूप बदलता जाता है। भारत में जितनी भाषाएँ  बोली जाती हैं, उतने ही धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ मिलते हैं। इन सब का बुनियादी आधार वेद हैं। यहाँ मैं हिन्दी साहित्य के अंतर्गत भक्ति के दार्शनिक सिद्धांत के बारे में चर्चा करना चाहती हूँ।

            हिन्दी साहित्य में भक्ति काल को ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है। भक्ति के मुख्यतः दो पक्षों- सगुण और निर्गुण भक्ति के बारे में चर्चा होती है। भक्ति, धर्म  और दर्शन का परस्पर संबंध है। साहित्य चाहे किसी भी भाषा का हो, वह किसी न किसी प्रेरक एवं मार्गदर्शक विचार धारा से अनुप्राणित ही रहता है। उसके मूल में दर्शन भी ठोस रूप में रहता है।

            भक्ति के क्षेत्र में परब्रह्म को सृष्टिकर्ता, सृष्टिपालक और संहारक के रूप में स्वीकार किया जाता है, जिसके फलस्वरूप परब्रह्म के तीन रूपों ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में भक्ति की जाती है। इन तीनों रूपों के मूल रूप को (मूर्त्तरूप) ‘परब्रह्म दत्त’ कहते हैं।

अतः कहा जाता है कि “परब्रह्म समारंभाम्, दत्तात्रेय मध्यमां”।

            सृष्टिपालक विष्णु की अनेक रूपों और नामों से उपासना की जाती है। महादेव या शिव की भक्ति भी अनेक रूपों में प्रचलित है। विष्णु की भक्ति करनेवाले को वैष्णव और शिव की आराधना या भक्ति करनेवाले को शैव कहते हैं। इन दोनों का सम्मिल्लित रूप शाक्त है। इसकी आराधना करनेवाले को शाक्तेय कहते हैं। हिन्दी साहित्य में भक्ति की रचनाओं में ज़्यादातर वैष्णव उपासना का रूप दिखाई देता है।

            हिन्दी साहित्य में भक्ति के विविध रूपों को देख सकते हैं। अपभ्रंश साहित्य में मुख्यतः स्वयंभू का ‘पउमचरिउ’, पुष्यदंत का ‘महापुराण’, धर्मपाल का ‘भवसयत्तकहा’ आदि महाकाव्य उल्लेखनीय हैं। इन कवियों ने दार्शनिक विचारधारा को स्थान न देते हुए कथानक को स्थान दिया। भक्तिमार्ग में ईश्वर को निर्गुण और सगुण रूपों में स्वीकार किया गया है।

            ईश्वर को निर्गुण, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान मानने वाले भक्त निर्गुणोपासक कहलाते हैं। निर्गुण धारा के हिन्दी कवियों में कबीर, नानक, रैदास, मूलकदास और दादूदयाल आदि का नाम उल्लेखनीय है। निर्गुण धारा के संत कवियों ने ब्रह्म, जीव, जगत, माया आदि आध्यात्मिक विषयों पर बहुत विस्तार से अपने विचार व्यक्त किये हैं। वेदांत मतानुसार निर्गुण धारा के भक्त कवियों ने माया शब्द का प्रयोग अपने चिंतन के अनुसार अनेक अर्थों में किया है। परंतु अद्वैतवाद प्रतिपादक श्री शंकराचार्य माया और अविद्या में भेद नहीं मानते है।

            कबीर आदि संत अपनी विचारधारा में अद्वैतवाद के समर्थक रहे थे। वे आत्मा और परमात्मा की एकता स्वीकारते हैं। कबीर कहते हैं -

जल में कुंभ- कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी

फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तथ कह्यो ग्यानी

निर्गुणोपासक ऐकेश्वरवादी हैं। सगुणभक्ति में ईश्वर को विष्णु के अवतार राम और  कृष्ण के रूप में पूजा जाता है। इसमें मूर्त्तिपूजा का महत्व है। देवी-देवताओं के अनेक नाम सगुण भक्त कवियों की रचनाओं में पाये जाते हैं। सगुण भक्तिमार्ग में ‘नवधा भक्ति’ को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसमें ईश्वर की नौ प्रकार की भक्ति का विधान है। श्रवण, कीर्तन, अर्चना, पादसेवन, दास्य, स्मरण, वंदन, सख्य और आत्मनिवेदन को नवधा भक्ति में परिगणित किया जाता है। सूरदास आदि सगुण भक्तों ने माधुर्यभाव की भक्ति में ‘मधुरा भक्ति’ को भी जोड़ लिया है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में दार्शनिक पृष्ठभूमि की विविधता और विशिष्टता के आधार पर भक्तिकाल,  स्वर्णयुग कहलाया। शंकराचार्य के अद्वैतवाद ने भारतीय वैदिक धर्म में जो क्रान्ति पैदा की, उसने अन्य कई आचार्यों को इस दिशा में प्रेरित किया। फलस्वरूप शंकर के मायावाद का विरोध और विभिन्न वैष्णवाचार्यों ने अलग-अलग दार्शनिकवादों की स्थापना की।

अद्वैतवाद

            श्री शंकाराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैतवाद का सिद्धांत  ‘समस्त विश्व का एक ब्रह्म की सत्ता में विश्वास करना’ है। उन्होंने ‘ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या’ द्वारा इस सिद्धांत की पुष्टि की।  जीव, ब्रह्म से अलग नहीं माना जाता है, ‘ब्रह्म जीवैव नापरः’ कहकर स्पष्ट किया। जीवात्मा भी ब्रह्म का ही रूप है, लेकिन अविद्या या माया के कारण जीव ख़ुद को ब्रह्म  से पृथक मानता है।

विशिष्टाद्वैतवाद

            रामभक्तिशाखा के प्रमुख उन्नायक के रूप में श्री रामानुजाचार्य का स्थान है। इन्होंने दशरथपुत्र राम को अपना आराध्य देव  मानकर वैष्णवभक्ति का दक्षिण भारत में  प्रचार किया। इनके द्वारा विष्णु के अवतारों में प्रभु रामचंद्र को सर्वोपरि मानकर उनकी उपासना का मार्ग प्रस्तुत किया गया तथा श्री शंकराचार्य के अद्वैतवाद का विरोध करते हुए विशिष्टाद्वैतवाद मत का प्रवर्तन किया। ईश्वर और जीव का शेष-शेषी संबंध है। जीव शेष है, तो ईश्वर शेषी अर्थात् स्वामी है। रामानुज ने अपने दार्शनिक सिद्धांत के प्रतिपादन के लिए ब्रह्म सूत्रों पर ‘श्री भाष्य’ लिखा। इस ‘श्री’ नाम से इनको जाना जाता है। ईश्वर और जीव के संबंध को विशिष्ट रूप में स्वीकार करने से इनका दार्शनिक सिद्धांत ‘विशिष्टाद्वैत’ कहलाता है।

            इनसे प्रभावित होकर काशीवासी रामानंद ने अपनी भक्ति में इस दर्शन को कुछ परिवर्तित रूप के साथ  अपना लिया। इस परिवर्तन को सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर देखा जाता है। उन्होंने अपने संप्रदाय के लिए राम की पूजा-अर्चना की विधि में भी परिवर्तन किया। इनके द्वारा तिलक और वेश-भूषा में भी परिवर्तन लाया गया। रामानंद ने संप्रदाय चलाने के लिए राम की पूजा-विधि में भी परिवर्तन किया और दीक्षा मंत्र भी बताया। साथ ही तिलक और वेश-भूषा में भी नवीनता लायी। हिन्दी के भक्तकवि कबीर निर्गुण धारा के होने पर भी रामानंद के शिष्य थे। गोस्वामी तुलसीदास सगुणोपासक होने पर भी रामानंद के सिद्धांतों में शंकराचार्य और रामानुजाचार्य से साम्य रखते थे। उनकी विचार धारा से तुलसी दास परिचित थे।

            तुलसी दास ने अपनी रचनाओं ‘रामचरितमानस’ और ‘विनय पत्रिका’ में अपने दार्शनिक सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन किया है। वह परब्रह्म का, सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में वर्णन करते हैं। इसलिए यह बताना कठिन है कि तुलसी के आराध्य सगुण हैं अथवा निर्गुण। क्योंकि तुलसी दोनों को अभेद मानते हैं-

“सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा।”

            तुलसी जीव को ईश्वर का अंश मानते हैं। जीव ईश्वर के अधीन है। जीव अनेक हो सकते हैं, किन्तु ईश्वर एक ही है। अतः जीव तथा ईश्वर का तादात्म्य नहीं हो सकता। यह मत शंकराचार्य से भिन्न है। जीव भौतिक बंधनों को दूर कर मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है। यह सैद्धांतिक भक्ति की साधना ही है। भक्ति का यह प्रतिपादन करते हुए उन्होंने ज्ञान के महत्त्व को कम नहीं किया। वे मानस में कहते हैं कि बिना ज्ञान के राम-भक्ति अपूर्ण है। अतः भक्ति और ज्ञान को मोक्ष के लिए आवश्यक माना है।

            सगुणभक्ति संप्रदायों में श्रीकृष्ण की भक्ति को व्यापक रूप प्रदान करने में अष्टछाप के कवियों के साथ-साथ वल्लभाचार्य का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। द्वैताद्वैतवाद में निंबार्काचार्य द्वारा प्रस्तावित निबांर्क संप्रदाय के अंतर्गत भी वैष्णवभक्ति के रूप में कृष्णभक्ति का पुट मिलता है। ब्रह्म की कल्पना सगुण रूप में होती है। ब्रह्म समस्त दोषों से रहित और सर्वशक्ति से परिपूर्ण कल्याण गुणों से युक्त है। जीव अंश और ब्रह्म अंशी है। इस दर्शन के भक्त कवियों ने राधा के विवाहित रूप का भी वर्णन किया। इस सिद्धांत के कवियों ने अधिकांशतः ब्रजभाषा में रचनाए‌ॅं कीं।

द्वैतवाद

            इस दार्शनिक सिद्धांत के प्रवर्तक मध्वाचार्य थे। प्रस्थानत्रयी पर भी उन्होंने भाष्य लिखा। इन्होंने द्वैतमत का समर्थन किया।  द्वैत माने ब्रह्म और जीव में भेद है। समस्त जीव, ईश्वर के अनुचर हैं। जीवों में ऊँच और नीच का भेद है। इनके द्वारा शंकराचार्य के अद्वैत मत का विरोध किया गया। इन्होंने उसके विरोध में ही द्वैतमत की स्थापन की ।

 

पूर्ण द्वैतवाद

            इस सिद्धांत के प्रवर्तक पूज्य श्री श्री श्री दत्तस्वामी हैं। श्री स्वामी द्वारा ‘पूर्ण द्वैतवाद’ को प्रचलन में लाया गया। इन्होंने त्रिमताचार्यों के दार्शनिक सिद्धांतों का समन्वय करते हुए आध्यात्मिक परंपरा में ‘पूर्ण द्वैतवाद’ की स्थापना की। परब्रह्म और जीव दोनों अलग-अलग हैं।

            श्री आदि शंकराचार्य ने अपने अद्वैतवाद के सिद्धांत से संबंधित संदेशों में बुद्धि और ज्ञान को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। सच कहा जाय तो जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष इसके मूल में है तथा ‘ज्ञान साधना’  द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति का उल्लेख मिलता है। क्योंकि नास्तिक को भक्ति और भगवान दोनों में रुचि नहीं रहती है। रामानुजाचार्य ने जीव के मन पर दृष्टि डालते हुए सैद्धांतिक भक्ति का बोध किया। रामानुजाचार्य ने अपने विशिष्टाद्वैतवाद से भक्तों को परम भक्तों के रूप में परिवर्तित किया। परंतु नास्तिक को भगवान की सेवा करना पसंद नहीं है। मध्वाचार्य ने अपने दार्शनिक सिद्धांत के द्वारा (कर्म करना और कर्मफल  त्याग करने के मार्ग को)  समर्पण भावना को सिखाया। आध्यात्मिक मार्ग में कर्म के रूप में दी जाने वाली भौतिक सेवाओं के लिए फल दिया जाता है। अतः ज्ञान और भक्ति भौतिक रूप में सेवा (कर्म) करने से ही जीवात्मा को अंतिम फल प्राप्त करने में सहायक बन सकते हैं।

            उपरोक्त तीनों आचार्यों के शिष्यगण ने केवल अपने गुरुजनों के  दार्शनिक सिद्धांत पर ध्यान दिया। किंतु अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। फलस्वरूप अपने-अपने मतों के प्रचार में एक-दूसरे से आपस में ही झगड़ते रहे तथा  एक-दूसरे का खंडन करते रहे।

            नास्तिक को आस्तिक बनाने के लिए श्री शंकराचार्य ने प्रत्येक जीव को भगवान ही कहा। शंकराचार्य ने शिष्यगण भी और हम भी  शिव दत्त ही हैं (शिवोअहं) कहते हुए शराब पिया। दूसरे दिन पिद्याल हुआ, सीसा को पीकर शंकराचार्य ने शिष्यों को भी पीने के लिए कहा। तब शिष्यगण अपनी गलती समझ कर गुरु के पैरों पर गिर पड़े। उस समय शंकराचार्य को यह बोध हुआ कि (शिवः केवलो अहं) केवल मैं ही शिवदत्त हूँ। शंकराचार्य के स्वयं महेश्वर का अवतार होने के कारण अद्वैतवाद पूरी तरह उनके ऊपर लागू होता है। ऐसे ही रामानुजाचार्य आदि शेष अवतार हैं। इसके कारण उनके द्वारा प्रतिपादित ‘जीवात्मा, परमात्मा का एक भाग है’ यह सिद्धांत श्री रामानुजाचार्य के ऊपर लागू होता है। भगवान के सेवक के रूप में वायुदेव के अवतार श्री मध्वाचार्य ने ‘जीव, परमात्मा के सेवक हैं’ जैसे सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। अतः त्रिमताचार्यों की तीनों दार्शनिक विचारधाराओं से जीव के स्तर की जानकारी मिलती है। किन्तु जीवात्मा अपनी शक्ति-सामर्थ्य से स्तर प्राप्त नहीं कर सकती, जब भगवान की कृपा होगी तभी कुछ विशिष्ट भक्तगण ही प्राप्त कर सकते हैं। इन वादों के आधार पर ही हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के अंतर्गत भक्ति साहित्य का निर्माण हुआ है।

            इसके मार्ग को प्रशस्त करते हुए भारतीय आध्यात्मिक मार्ग में पूर्ण द्वैतवाद का भी प्रतिपादन हो चुका है। इस वाद के प्रतिपाद श्री श्री श्री दत्त स्वामी जी हैं। श्री स्वामी ने त्रिमताचार्यों का समन्वय करके नये मार्ग की स्थापना की। खुद उनके द्वारा ही अनेक रचनाएँ की गयी हैं- दत्त वेदं, दत्त भगवद् गीता, दत्तोपनिषद, आदि। श्री दत्त स्वामी के सिद्धांत के अनुसार मूल परब्रह्म कल्पना से परे है। किसी भी वस्तु के सृजन से पहले उसका कोई अस्तित्व नहीं होता। अतः आकाश की सृष्टि से पहले, आकाश का कोई अस्तित्व नहीं था। एक मात्र परब्रह्म का ही अस्तित्व था, तो आकाश का सृजनकर्त्ता, परिमाण रहित परब्रह्म निस्संदेह हमारी बुद्धि और कल्पना से परे है। अतः परब्रह्म को अकल्पनीय  कहा जाता है।

            यह परब्रह्म जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते, स्वयं मनुष्य आकार ग्रहण करके इस लोक में आते हैं और जीवों को ज्ञान का बोध कराते हैं। ऐसे मनुष्य आकार (निराकार) ग्रहण किये हुए परब्रह्म (अवतार) ही दत्त कहलाते हैं। इस लिए ‘दत्त’ शब्द का सही अर्थ है- श्री कृष्ण जैसे मनुष्य अवतार। मनुष्य अवतार के अंदर रहने वाला जीव, परब्रह्म में विलीन रहता है। इसलिए मनुष्य अवतार के अंदर जीव और परब्रह्म में अद्वैत पाया जाता है। एक अलग दृष्टिकोण से, एक ही मनुष्य शरीर में दो वस्तुएँ (प्रबल रूप से परब्रह्म और अंश रूप में जीव) होने के कारण मनुष्य अवतार में विशिष्ट अद्वैत है। एक तीसरे दृष्टिकोण के अनुसार, वास्तव से अकल्पनीय परब्रह्म और सीमित कल्पनीय जीव, ये दोनों घटक पूरी तरह से भिन्न होने के कारण मनुष्य अवतार में द्वैत हैं।

            अतः तीनों मतों का अद्वैत, विशिष्ट अद्वैत और द्वैत का समन्वय (त्रिमत समन्वय) सिर्फ निराकार के संदर्भ में ही करना संभव है, सामान्य जीव और अकल्पनीय परब्रह्म के संदर्भ में नहीं।

            तर्क से अतीत तथा तर्क से ग्राह्य वस्तु के बीच भेद भी द्वैत ही है। परंतु इसमें परिपूर्ण द्वैत है। इस मत में परमात्मा और जीवात्मा के चैतन्य तत्त्व को स्वीकारने से पूर्ण द्वैत नहीं होता। क्योंकि दोनों में चैतन्यतत्त्व है। फिर भी ये त्रिमत इस प्रकार कह रहे हैं कि पूर्ण अहंकार से रहने वाले बौद्ध मीमांसकों को बताने के लिए अद्वैत से आकर्षित करना, जब अहंकार थोड़ा कम होगा तब पूर्ण तथा उसके अंश का संबंध बताकर कुछ द्वैत का प्रतिपादन करना, अहंकार पूरी तरह कम होता है तो केवल चैतन्य मात्र से ही अद्वैत को रखकर अन्य गुणों के साथ पूर्ण द्वैत के बारे में बताना, इन तीनों स्तरों को क्रमानुसार जीव के अद्वैत के लिए आचार्यों ने बताया। अर्थात् पूर्ण अहंकार से युक्त बौद्धों के लिए अद्वैत मत कहा गया। उसके बाद जब अहंकार अणुमात्र बच गया तब द्वैत मत कहा गया। जब अहंकार पूर्ण रूप से निकल गया तब पूर्णद्वैत (बुद्धि से अतीत परमात्मा और बुद्धि से ग्राह्य चैतन्य रूपी आत्मा पूरी तरह अलग-अलग है ) श्री दत्त स्वामी द्वारा कहा जा रहा है कि चौथा मत पूर्ण द्वैत आ गया है।

उपरोक्त विषय के अनुसार कह सकते हैं कि इन त्रिमतों का समन्वय करते हुए पूर्ण द्वैत को समझ सकते हैं। साथ ही अहंकार रहित जीव अपने ज्ञान के साथ मोक्ष प्राप्ति के लिए अग्रसर हो सकता है। इस समन्वय को समझकर भक्ति के स्वरूप और उसके साहित्य को बेहतर समझा जा सकता है।

संदर्भ :

  1. श्री दत्तात्रेयम् -श्री दत्त स्वामी विरचितम्, प्रकाशन संस्थान- नयी दिल्ली-2.
  2. त्रैलोक्यगीता(6वाँ अध्याय)- श्री दत्त स्वामी विरचितम्,दत्तज्ञान परिषद, विजयवाडा।
  3. हिन्दी साहित्य का इतिहास- सं-नगेन्द्र- मयूर बुक्स, नयी दिल्ली -2.
  4. हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ- डॉ. शिवकुमार शर्मा- अशोक प्रकाशन दिल्ली-6.

प्रो. अन्नपूर्णा सी.
हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद विश्वविद्यालय,हैदराबाद-500046
annapuran.cherla @gmail.com           


चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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