शोध आलेख : तुलसी का मानुष सत्य : हमारा समय और समाज / अधीर कुमार

तुलसी का मानुष सत्य : हमारा समय और समाज
- अधीर कुमार


        पारम्परिक साहित्य के पाठ-पुनर्पाठ में हमारी समझ, आम तौर पर अपने पूर्वाग्रहों को दृढ़तर बनाने की ओर रहती है। परम्परा से हमारे संबंधों की जटिलता, इन रचनाओं के अभिग्रहण को सहज नहीं रहने देती। सामान्यतः भक्ति-साहित्य और विशेषतः तुलसी-साहित्य को जानने-समझने के ताजा प्रयासों में भी एक सांघातिक अगम्भीरता और बौखलाहट दिखाई देती है। हिन्दी-आलोचना में आरंभ से अबतक इस दिशा में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किए गए हैं। भक्त-माल, चौरासी वैष्णवन की वार्ता के ज़माने से अबतक किए जा रहे  इन प्रयत्नों के प्रभाव, आम लोगों तक शायद ही पहुँच पाते हैं। यही कारण है कि समाज में आम तौर पर वही बातें दुहराई जाती रहती हैं जो अक्सर ग़लत धारणाओं और पूर्वाग्रहों की शक्ल में यहाँ-वहाँ सुनाई पड़ती हैं। दःुखद तथ्य यह भी है कि राजनैतिक-सांस्कृतिक नेतृत्व का दम भरने वाले नेता और धर्म के नाम पर आडम्बर का धंधा करने वाले स्वनामधन्य महात्मा भी बिना आगा-पीछा देखे तात्कालिक लाभ-लोभ के लिए इन्हीं ग़लत धारणाओं का प्रचार-प्रसार करते फिरते हैं।

यह जरूरी है कि तुलसी-साहित्य के बारे में किसी भी पूर्वधारित फ़तवेबाज़ी के सर्वसुलभ राजमार्ग पर सरपट दौड़ पड़ने से पहले हम थोड़ा ठहरें, सोचें और विचार करें। तुलसीदास की रचनाओं में व्यक्त मानुष-सत्य का उनके अपने जमाने में भी बहुत विरोध हुआ; आज भी उनका विरोध किया जा रहा है। यह कितना विलक्षण है कि तब और अब के विरोध की वजहें बिल्कुल विपरीत हैं। जाहिर है कि इसमें बहुत कुछ ऐसा था जो उस जमाने की स्थापित धारणाओं और मान्यताओं के विरुद्ध था। कुछ ऐसा जिसने उस युग के स्थापित मठों और मठाधीशों की निश्चिंतता को विचलित किया होगा। और यह भी कि इसमें आज के प्रभुत्वकामियों के लिए भी बहुत कुछ ऐसा है जो उनके विरोध के रास्ते चलकर पाया जा सकता है। यह भी विचारणीय है कि यह सब कबीर जैसे अप्रतिम विद्रोही स्वर की सक्रियता के बहुत बाद घटित हो रहा था। कबीर, सूर और जायसी जैसे अद्वितीय प्रतिभा-पुँजों के आलोक-प्रसार के बावजूद भारतीय ज्ञान-परम्परा के वर्चस्व का वह जाति आधारित ढाँचा अविचल और अविकल था जिसे चुनौती देना बहुत जरूरी था।

हिन्दी-भक्ति साहित्य का महत्त्व किसी व्याख्या या विश्लेषण या तुलना का मुखापेक्षी नहीं है। कबीर से तुलसी और मीरा तक जो भी रचा गया है वह सर्वग्रासी काल को पराजित कर आज भी अमिट है। हिन्दी में आलोचना के आरम्भ से अब तक अनेकानेक अध्येताओं ने पुनर्बार प्रयत्नपूर्वक इनके महत्व की विविध भंगिमाओं की स्पष्ट पहचान की चेष्टा की है। इन चेष्टाओं में भी इस काल खण्ड की अद्वितीय सर्जना के महत्त्व और प्रभाव का समवेत स्वीकार दिखाई देता है। यह सर्वमान्य-सा है कि आज के भारतीय समाज की मानसिक और भौतिक संरचना के सशक्त अवधारणात्मक आधारों का सृजन भक्ति-कालीन साहित्य में प्राप्त होता है। कहना न होगा कि इन आधुनिक आलोचनाओं की चिंता-चर्चा की व्याप्ति अधिकांशतः सुशिक्षित लोगों के बीच रही है; जबकि भक्ति-कविता के सम्वाद और प्रसार का क्षेत्र जाति, धर्म, सम्पन्नता, क्षेत्रीयता, शिक्षा आदि की सीमाओं को निरन्तर अतिक्रमित करता रहा है। आम लोगों तक इसकी सीधी पहुँच देश-काल की बाधाओं को बार-बार बौना साबित करती आयी है। यह याद रखना जरूरी है कि आज भी जब किसी सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, या राजनैतिक समस्या का सामना होता है तो हम बरबस इन रचनाकारों की ओर देखने के लिए विवश होते हैं और इनसे ही प्रेरणा और दिशा-गति प्राप्त करते है; लड़ते और झगड़ते हैं।

सर्जक की सबसे बड़ी भूमिका अपने समय की ऐतिहासिक चुनौतियों की पहचान और उन चुनौतियों का सामना करने के नए तरीकों के संधान में होती है। तुलसी-साहित्य के बारे में कुछ गिनी-चुनी पंक्तियों के आधार पर अयाचित प्रशंसा या अनौचित्यपूर्ण निंदा के यज्ञ में अधीर आहुतियाँ देने से बेहतर होगा कि हम अपने तात्कालिक स्वार्थों से ऊपर उठें और अपने युग की समस्याओं का सामना करने के लिए परम्परा के पुनर्मूल्यांकन का ईमानदार प्रयास करें।

प्रश्न यह है कि क्या तुलसी अपने समय और समाज की ऐतिहासिक आवश्यकताओं की सही पहचान करते हैं? यदि ऐसा है, तो क्या उन समस्याओं के समाधान के संभावित तरीकों को खोजने का प्रयास उनके साहित्य में है। और आखिर में यह देखा जाना जरूरी होगा कि उनके द्वारा चयनित निदान का स्वरूप उनके समय और हमारे समय की दृष्टि से किस हद तक स्वीकरणीय या अस्वीकरणीय है। आज के लोगों के लिए तुलसी-साहित्य की समझ विकसित करने हेतु यह देखना जरूरी है कि वे समस्याएँ क्या अब भी हैं? क्या उसी रूप में हैं? यदि उनमें बदलाव हुआ है तो क्या तुलसी द्वारा सुझायी गयी राह आज भी उसी रूप में हमें अपनी समस्याओं का समाधान दे सकती है? तब से लेकर अबतक क्या हम उनके बताए रास्ते पर चले हैं? क्या हम आज भी उनके बताए रास्ते पर चलने का साहस कर सकते हैं?

तुलसी के सामने समस्या का स्वरूप बहुत भिन्न है। इतना ही नहीं वे समस्याओं को एकांतिक दृष्टि से न देखकर समग्रतामूलक दृष्टिकोण से देखते हैं। उनके अनुसार सारी समस्याओं की जड़ में मोह, अहंकार, काम, लोभ, मत्सर, क्रोध, द्वेष, दंभ, कपट, दर्प और मद जैसे मूल मनोविकार हैं। वे इनकी ओर संकेत करते हुए ‘विनय-पत्रिका’ पद-संख्या 58 में लिखते हैं -

          ‘‘मोह दशमौलि, तद्भ्रात अहँकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी।
      लोभ अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट, क्रोध पापिष्ठ-विबुधांतकारी।। 4।।
           द्वेष दुर्मुख, दंभ खर, अकंपन कपट, दर्प मनुजाद मद-शूलपानी।
      अमितबल परम दुर्जय निशाचर-निकर सहित षडवर्ग गो-यातुधानी।।5।।’’

राम-कथा के विभिन्न प्रसंगों में वे लगातार इन्हीं से लड़ रहे थे। आज इतनी समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा और ज्ञान-विज्ञान के विकास के बावजूद हम अपनी समस्याओं का समाधान क्यों नहीं ढूंढ़ पाते? क्या इन समस्याओं के पीछे भी उन मूल मनोविकारों की भूमिका की पहचान जरूरी नहीं है? तुलसी मानव-जीवन में इन विकारों की भूमिका और इनके प्रभाव की व्यापकता और गहराई को समझते थे। वे यह भी जानते थे कि अन्यान्य अनेक समस्याओं के तात्कालिक निदान ढूंढ़ लेने पर भी उनसे मुक्ति नहीं मिल सकती। यह ज्ञान अकेले तुलसी की उपलब्धि नहीं है। यह ‘युग-युगांतर से अविरलप्रवाही भारतीय चिंता-धारा’ की वह उपलब्धि है, जिसे अनदेखा कर हम खुद को सर्वांग पूर्ण मान लेते हैं और बाक़ी दुनिया को बदलने की सलाह देते फिरते हैं। तुलसी खुद को बदलने का संकल्प पहले करते हैं। विनय पत्रिका के पद (105)

अबलौं नसानी, अब न नसैहौं।
राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं।।1।।
पायेउँ नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं।
स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं।।2।।
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं।
मन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद-कमल बसैहौं।।3।।

तुलसी को श्रेय देना सरल है और उससे भी सरल है उनपर आक्षेप करना। दोनों के अपने अपने लाभालाभ हैं। बैठे-बिठाये किसी वर्ग की प्रसन्न आशंसा पर एक छत्र स्वत्वाधिकार की स्वार्थी मनोवृत्ति ही इस प्रवृत्ति की एक मात्र प्रेरिका शक्ति है। तुलसी कोई जादूगर नहीं थे और न उन्होंने औषधि-केन्द्र ही खोला था। पक्ष हो या विपक्ष, बात स्वीकार की हो या अस्वीकार की हमें अपने आज के लिए भी भक्ति-साहित्य से ही प्रामाण्य ढूँढ़ना है। कभी किसी तथाकथित राजनेता या धर्मगुरु से साकेत, प्रियप्रवास, कामायनी राम की शक्तिपूजा या उर्वशी या अन्धेरे में जैसी कृतियों या कृतिकारों के बारे में आपत्ति-विपत्ति प्रकट नहीं की गयी। लेकिन तुलसीदास और उनका रामचरितमानस सबसे आसान निशाना है। तुलसीदास और उनका रामचरितमानस यदि नहीं होते तो आज के भारत में जातिवाद नहीं होता, सम्प्रदायवाद भी नहीं होता और स्त्री-समाज के बारे में तो कोई समस्या होती ही नहीं। सारे संकट की जड़ यहीं है। यह पक्ष इतने अद्भुत ढंग से क्रान्तिकारी है कि इसे तुलसीदास और उनके जीवन-सत्य में सबकुछ प्रतिगामी ही दिखाई देता है। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने प्रत्येक आधुनिक मर्ज की दवा खोजने ख़ास तौर पर तुलसी के यहाँ क्यों पहुँच जाते हैं?

दूसरा पक्ष तुलसी के बिना इस संसार की कल्पना ही नहीं कर पाता। उसके लिए तुलसी का लिखा ब्रह्म वाक्य है। जो कुछ था, है और होगा वह सब तुलसी ने पहले ही लिख रखा है। सारी समस्याएँ इसलिए हैं कि हमने तुलसी और उनके साहित्य का महत्त्व भूला दिया है। हमें यह भी सोचना चाहिए कि यदि तुलसी ने सब कर ही दिया था तो समस्याएँ ख़त्म क्यों नहीं हो गईं।

कहना ना होगा कि ये दोनों दृष्टियाँ अतिवाद की शिकार हैं और ऐसी मनोभूमि को आलोचना की भूमि नहीं बनाया जा सकता। और यह भी कि तुलसी साहित्य, या कि जीवन के स्वरूप की आलोचना में हम कहीं आधारभूत भ्रम के शिकार हैं। यही भ्रमात्मिका बुद्धि हमें तुलसी जैसे रचनाकार को कहीं सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए प्रेरित करती है तो कहीं उन्हें परले दर्जे का दकियानूस, ब्राह्मणवादी, स्त्री-विरोधी और न जाने क्या-क्या साबित करना चाहती है। हम शायद देख कर भी नहीं देखना चाहते। रामचरितमानस के आरंभ में तुलसी ने स्पष्ट घोषणा की है -

‘‘नाना पुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति।।’’

पहले से जो ‘नाना पुराण निगमागम’ उपलब्ध था, वह सब संस्कृत में था। उन ग्रन्थों में जो भी कहा गया था वहाँ तक पहुँचने के लिए आम लोगों को संस्कृत की दीवार लाँघनी थी। तुलसीदास ने पारम्परिक ज्ञानराशि के उस संचित कोष तक पहुँचाने के लिए एक सेतु तैयार किया। उनके समय में समाज में जो हो रहा था - सही या गलत - उसे समाज के वर्चस्वशाली लोग जिस तरह परिभाषित कर रहे थे; उसका आधार संस्कृत के यही ग्रंथ थे, जिनतक आम आदमी की सीधी पहुँच नहीं थी। जो पीड़ित थे उनकी और जो पीड़क थे उनकी भी। तुलसी ने उस गढ़ के द्वारों पर लगे कपाट खोल दिए; यह उनकी गलती थी?

उनके सामने वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध और जैन तो थे ही इनकी तमाम उपशाखाएँ भी न केवल थीं बल्कि एक दूसरे को मिटा डालने के लिए संघर्षरत थीं। इस्लाम को मानने वाले अपने वर्चस्व के लिए निरंतर आक्रामक थे। ऐसी विषम परिस्थिति में तुलसी उस पुरातन संस्कृति की संरक्षा और परिष्कार में प्रवृत्त हुए। निराला ने उनके व्यक्तित्व की गरिमा और कृतित्व की महिमा को याद करते हुए ‘तुलसीदास’ शीर्षक कविता में यूँ ही नहीं लिखा है -

                ‘‘भारत के नभ के प्रभापूर्य
                 शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य
                 अस्तमित आज रे-तमस्तूर्य दिङ्मण्डल;
                 उर के आसन पर शिरस्त्राण
                 शासन करते हैं मुसलमान;
                 है ऊर्मिल जल, निश्चलत्प्राण पर शतदल’’

तुलसी का अभीप्सित पाठक वर्ग कबीर, जायसी और सूर की तुलना में बहुत अधिक व्यापक था। अपने पाठक वर्ग की चेतना पर उनका प्रभाव भी इन कवियों की अपेक्षा गहरा था। इसका प्रमाण यह है कि आज भी हम कबीर, जायसी और सूर की पंक्तियों को लेकर चिंतित नहीं हैं लेकिन तुलसी से टकराए बिना हमारा निबाह नहीं। उन्होंने पहले इस दिशा में किए गए प्रयत्नों की कमी को पहचाना। ‘पंडित बाद बदन्ते झूठा’ कहने से या ‘तुम कहते कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी’ कहने से समस्याओं का समाधान होने वाला नहीं है। समस्याओं का समाधान तो तब होगा जब समाज के वर्चस्वशाली तबकों की सोच और समझ बदले। परिवर्तन की चाह की आक्रामकता देखने-सुनने में बहुत अच्छी लगती है पर प्रभावकता की कसौटी पर अक्सर निष्फल हो जाती है। हमारी मूर्खताओं पर बाहर से की जाने वाली चोटें अक्सर हमें दुराग्रही बना देती हैं। बदलने की जगह हम अपनी कमजोरियों से और चिपट जाते हैं। समाज को बदलने की प्रेरणा देनी हो तो उसकी सोच में अंदर से बदलाव लाना होगा। जो दलित और पीड़ित हैं उनमें भी और जो शोषक और पीड़क हैं उनमें भी। हम स्वयं अपनी जीवन-विधि और व्यवहार-प्रणाली की आलोचना करें तभी बदलेंगे। रामचरितमानस ही नहीं तुलसी का समग्र रचना-कर्म उस समय के समाज के इसी मानसिक परिष्कार की चेष्टा है। आँख मूंदकर; जो करते आए हैं वही करते रहने से, न हम बदल सकते हैं न हमारा समाज बदल सकता है।

आदिकवि ने रामायण में सीता की अग्नि परीक्षा का वर्णन किया। उनके मर्यादा पुरुषोत्तम युद्ध जीतने के बाद अपने सम्मुख लायी गयी सीता से कहते हैं

‘‘पश्यतस्तां तु रामस्य समीपे हृद्यप्रियाम्।
जनवादभयाद् राज्ञो बभूव हृदयं द्विधा।।11।।
विदितश्चास्तु भद्रं ते योऽयं रणपरिश्रमः।
सुतीर्णः सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थं मया कृतः।।15।।
प्राप्तचारित्र संदेहा मम प्रतमुखे स्थिता।
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासिमे दृढ़ा।।17।।
तद्गच्छ त्वानुजानेऽद्य यथेष्टं जनकात्मजे।
एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया।।18।।’’
                                                 पृष्ठ 620/621 युद्ध काण्ड

‘‘मैंने यह युद्ध तुम्हारे लिए नहीं किया; जैसे आँख के रोगी को दीपक की ज्योति नहीं सुहाती, उसी प्रकार आज तुम मुझे अत्यंत अप्रिय जान पड़ती हो; अतः जहाँ इच्छा हो वहाँ चली जाओ। दसों दिशाएँ तुम्हारे लिए खुली हैं।’’ ये आदिकवि के मर्यादा पुरुषोत्तम के उद्गार हैं उस जानकी के लिए जिन्होंने उनके प्रति समर्पण और प्रेम के चलते वन के सारे दुःखों को अपना बना लिया। आदिकवि से किसी को कोई शिकायत नहीं लेकिन तुलसी ने रामचरित की मर्यादा के विरुद्ध पाकर इस प्रसंग को मानस में नहीं रखा तो तुलसी घोषित स्त्री-विरोधी हैं? आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण में शम्बूक वध का वर्णन किया। उस वर्णन में उन्हें कुछ भी अनुचित नहीं लगा।

‘‘शूद्रयोन्यां प्रजातोस्मि तप उग्रं समास्थितः।
देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशः।।2।।
न मिथ्याहं वदे राम देवलोक जिगीषया।
शूद्रं मां विद्धि काकुत्स्थ शम्बूकं नाम नामतः।।3।।
भाषतस्तस्य शूद्रस्य खड्गं सुरुचिरप्रभम्।
निष्कृष्य कोशाद् विमलं शिरश्चिच्छेद राघवः।।4।।
पृष्ठ 860 उत्तर काण्ड

उनके राम-राज्य की महिमा उस महान दलित तपस्वी (शम्बूक) के वध(हत्या?) से जरा भी धूमिल नहीं हुई। तुलसी ने उस प्रसंग को अस्वीकरणीय मानकर रामचरितमानस में स्थान नहीं दिया। उन्हें अवश्य ही यह सब राम की मर्यादा के विरुद्ध लगा होगा। अनुचित लगा होगा। कवि द्वारा कथा-प्रसंग का यह संशोधन या नवगठन निश्चय ही बदली हुई विचार सरणी का संकेत देता है। लेकिन वाल्मीकि दलितों की चिंता करने वालों के लिए और तथाकथित दलित-समाज के लिए सर्वथा पूज्य हैं और तुलसीदास?

                                याद रखना चाहिए कि यह सोलहवीं सदी का भारत था आज का प्रजातांत्रिक भारत नहीं। राजा कैसा हो? प्रजा कैसी हो?; गुरु कैसे हों? शिष्य कैसे हों? आराध्य कैसा हो? आराधक कैसा हो? ब्राह्मण कैसा हो? शूद्र कैसा हो? भाई कैसा हो? सेवक कैसा हो? मित्र कैसा हो? सबके आदर्शरूप उन्होंने अपने समय और समाज के हिसाब से गढ़ने की कोशिश की; और तबसे लेकर अबतक काफी जद्दोजहद के बाद भी जन-मानस पर उनके द्वारा अंकित उन तस्वीरों को मिटाना सम्भव नहीं हो पा रहा। तब सोचना ही होगा कि आखिर उन तस्वीरों में ऐसा क्या है। क्या उनके द्वारा प्रस्तावित बदलावों को हमारे स्वार्थों ने पराजित कर दिया?

हमारा युग प्रयोजनों और प्रायोजनों का युग है। तुलसी-साहित्य को बिना पढ़े उसपर आक्षेप करना। आज की समस्याओं के लिए तुलसी को जिम्मेदार बताना। तुलसी को एक धर्मात्मा और रामचरितमानस को एक धार्मिक ग्रंथ मात्र मानकर, लाल कपड़े में लपेट देना, धूप चन्दन आरती करना, बार-बार नवाह पारायण या सुन्दरकाण्ड का पाठ करते जाना और अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेना। यह सब इन्हीं तुच्छ प्रयोजनों के प्रायोजन हैं। किसी व्यक्ति चेतना और उसके मंतव्यों की उपेक्षा का सबसे सुसंस्कृत तरीका, उसे पूज्य बना देने में है। जैसे ही वह पूज्य होता है, अनुकरणीय नहीं रह जाता। वे महान थे, वे अवतार थे आदि-आदि कहकर हम यह कह रहे होते हैं कि वे कर सकते थे इसलिए कि वे अतिमानवीय शक्ति सम्पन्न थे। और साथ ही यह भी कह रहे होते हैं कि हम यह सब नहीं कर सकते क्योंकि हम अतिमानवीय शक्ति सम्पन्न या अवतारी पुरूष नहीं हैं।  

इतने छद्मों के बावजूद आज के सामाजिक जीवन की हर बुराई के लिए तुलसीदास और उनके रामचरितमानस को कठघरे में खड़ा करना और रामचरितमानस के संशोधन की अनर्गल प्रकल्पना, हमारे मानसिक दिवालियेपन की सूचना है। संशोधन वर्तमान में होता है अतीत में नहीं। जो कहा जा चुका वह कहा जा चुका। उसमें जो सही लगता हो उसे मानें नहीं तो छोड़ दें। जो कहा गया वह अपने समय के और कवि की समझ के हिसाब से सही है। आज के समाज की जरूरतों के हिसाब से उसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो सर्वथा त्याग देने योग्य है। यह निर्णय हमें स्वयं करना होगा। यह बताने के लिए तुलसीदास नहीं आएँगे।
 
अधीर कुमार
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर
श्री देव सुमन विश्वविद्यालय, ऋषिकेश, देहरादून, उत्तराखण्ड-249202


चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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