शोध आलेख : भक्ति आन्दोलन में संगीत की भूमिका और रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि / विक्रम कुमार

भक्ति आन्दोलन में संगीत की भूमिका और रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि
- विक्रम कुमार

शोध सार : भक्ति आंदोलन का स्वरूप अखिल भारतीय रहा है। भक्ति आंदोलन का मूल्यांकन भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्य में हमेशा से होता रहा है। भक्ति आंदोलन में संगीत की अहम भूमिका रही है, जिस पर साहित्य मीमांसकों की नज़र बहुत ही कम गई है। जबकि भक्ति आंदोलन पर साहित्य का बहुत ही व्यापक प्रभाव रहा है, जिसका मूल्यांकन किया जाना ज़रूरी है। आरंभिक हिंदी के आलोचकों में रामविलास शर्मा ऐसे पहले व्यक्ति हैं, जो भक्ति आंदोलन को संगीत और लोकजागरण की भूमिका के साथ इस भक्तिकालीन जनांदोलन को रेखांकित करते हैं। मध्यकालीनता से अलग कर आधुनिकता के साथ इसका मूल्यांकन करते हैं। साथ ही रामविलास शर्मा उन धारणाओं का भी विपक्ष रचते हैं, जो यह मानते हैं कि आधुनिकता औपनिवेशिक शासन के बाद आई है! लेकिन रामविलास शर्मा ने अनेक तथ्यों के साथ यह साबित किया है कि उपनिवेश के पूर्व भी भारतीय समाज चेतनशील और ज्ञान-विज्ञान में किसी से भी कम नहीं था। भक्तियुगीन साहित्य, कलाएँ, साहित्य, नृत्य, गीत-संगीत सभी पैमानों पर मनुष्यता को पुष्ट करता है। भक्ति आंदोलन का विकास प्रादेशिक भाषाओं में हुआ है, जिसमें संगीत का अहम योगदान है और संगीत ही वह मुख्य वजह था जिससे यह आंदोलन अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण करता है।

बीज शब्द : लोकजागरण, भक्ति आन्दोलन, संगीत, हिंदी आलोचना, मीमांसा, औपनिवेशिक शासन, यूरोकेंद्रीयता, जनांदोलन, दर्शनशास्त्र, इतिहास, संस्कृति, समरसता, मध्यकाल, नवजागरणस्वतंत्रता आंदोलन, लोकभाषा।

मूल आलेख : भक्ति काव्य भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग रहा है। इस सांस्कृतिक आंदोलन में सांगीतिक तत्त्व की अहम भूमिका रही है। जिसपर बहुत ही कम बातचीत हुई है। सांगीतिक तत्त्व का इस आंदोलन में अपना महत्त्व है, जिसे उपेक्षित नज़रों से देखा गया है। किसी भी देश की संस्कृति और सभ्यता को गहराई से देखना हो, तब देश की संस्कृति, कला और साहित्य का प्रथमतः अध्ययन करने की ज़रूरत है। जो हमें उस देश को उसकी सभ्यता को समझने में आइने का काम करती है। भारत विविधताओं का देश है, जहाँ अनेक विविधताएँ मौजूद हैं। इन विविधताओं की जो समरसता है, जीवन के साथ जो एकत्व की भावना है, वह अद्भुत है। भक्ति आन्दोलन भी उसी एकत्व और विविधताओं का जीवंत स्वरूप है, जिसने सिर्फ उस युग को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की भी प्रेरणाभूमि रही है। जिसका प्रभाव सगुण धारा से लेकर निर्गुण धारा तक दिखता है। भक्ति आन्दोलन की कविता लोक की कविता है। लोकभाषा में रचित कविता है। आज भी सहज ही ज़बान पर भक्तिकाव्य की पंक्तियाँ मौजूद रहती हैं। उसकी मुख्य वजह है इन पंक्तियों में मौजूद सांगीतिक तत्त्व, इन पंक्तियों की लयात्मकता, जिसके कण-कण में सांगीतिक तत्त्व का मौजूद होना है। पूर्व से पश्चिम औऱ उत्तर से दक्षिण तक इसकी व्यापकता और विस्तार सभी को आश्चर्यचकित करता रहा है। रामविलास शर्मा के आलोचनात्मक सिद्धांतों को देखें तो एक सिद्धांत जो सामने आता है उसमें है हिंदी प्रदेश की एकता, रामविलास शर्मा ललित कलाओं की महत्ता इस तौर पर भी देखते हैं कि इसने भारतीय समाज को एकजुट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जनपदीयता में एकता लाने का कार्य यह ललित कलाएँ करती है। रामविलास शर्मा ललित कलाओं में व्यापार और आर्थिक महत्त्व को भी रेखांकित करते हैं। जिसपर रामविलास शर्मा लिखते हैं कि "सत्रहवीं सदी में इंग्लैंड की अपेक्षा भारत का विदेशी और घरेलू व्यापार अधिक विकसित था। चाहे राजपूत कला हो, चाहे मुगल कला, उसका विकास शुद्ध सामन्ती व्यवस्था में हुआ था। इस व्यवस्था के अन्तर्गत व्यापारिक सम्बन्धों का विकास हो रहा था। इन सम्बन्धों के प्रसार से एक ओर जनपदों में कलाओं का विकास हुआ, दूसरी ओर इन जनपदों की कलाएँ एक-दूसरे के नज़दीक आई। हिन्दी प्रदेश के जनपदों को एक-दूसरे के पास लाने में और अन्तत: उन्हें परस्पर सम्बद्ध करने में आर्थिक सम्बन्धों के साथ कलाओं की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी।"[1]

एक ऐसा आंदोलन जिसने अपनी मानुषिक मूल्यवत्ता के साथ अपने युग को तो प्रभावित किया ही साथ ही आने वाले समय को भी प्रभावित किया। इस आंदोलन से महात्मा गाँधी से लेकर स्वामी सहजानन्द सरस्वती तक प्रभाव ग्रहण करते रहे हैं। किसी ने इस आंदोलन को बाह्य आक्रमण की उपज कहा तो किसी ने लोक की उपज, यहाँ भक्तिकाव्य को रामविलास शर्मा की दृष्टि से देखना महत्त्वपूर्ण होगा. रामविलास शर्मा का यह मत यूरोकेंद्रित सत्ता से मुठभेड़ करती है, साथ ही भक्तिकाव्य का मध्यकालीनता के पदबंध के बीच मूल्यांकन से इनकार करते हैं रामविलास शर्मा लिखते हैं  कि जो विकास दिखाई देता है, वह अभूतपूर्व है, वैसा विकास पहले हुआ था। इसलिए कहना चाहिए, यह आधुनिक युग की शुरुआत है। मध्यकालीनता एक हद तक बनी हुई है, सामंती अवशेष विद्यमान हैं, लेकिन उनके बीच से आधुनिक युग फूट रहा है और उससे वर्तमान भारत का घनिष्ठ संबंध है।'' [2] रामविलास शर्मा पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने इसे सबसे पहले लोकजागरण के स्वरूप के साथ देखा है। इसे नवजागरण के अर्थ-सन्दर्भों के साथ देखते हैं, जो इसे देखने के कई नए सूत्र देते हैं। जिससे इसे सम्यक रूप से समझने में आसानी होती है। रामविलास शर्मा कहते है  "आश्चर्य की बात है कि जो साहित्य दूर-दूर के जनपदों को एकता के सूत्र में बाँधता आया है, लाखों किसानों को आन्दोलित करता रहा है, उसे लोग मध्यकालीन कहते हैं। आधुनिकता का आरम्भ जातीय निर्माण प्रक्रिया से मानना चाहिए। उसका एक लक्षण है किसी एक जनपद की भाषा का दूसरे जनपदों में व्यवहार जिस भाषा और साहित्य के माध्यम से विभिन्न जनपदों के किसान एकताबद्ध होते हैं, उस भाषा और साहित्य को जातीय निर्माण की प्रक्रिया से सम्बद्ध करके देखना चाहिए। हिन्दी प्रदेश में सूरदास और तुलसीदास जैसे कवियों की भूमिका इसी परिप्रेक्ष्य में समझी जा सकती है।"[3] उनकी लोकजागरण की अवधारणा  भक्तिकाल के संदर्भ में विकसित होती है। उनकी दृष्टि भक्तिकाल को लेकर बहुत ही स्पष्ट थी, वह तत्कालीन यूरोप के साहित्य से किसी कदर घट कर नहीं है। रामविलास शर्मा लिखते हैं "अठारहवीं सदी तक यूरोप भारत से आगे नहीं था, आर्थिक प्रगति में, सांस्कृतिक प्रगति में। किन्तु अठारहवीं सदी में भारत तथा अन्य देशों से टोरी हुई पूँजी के बल पर इंग्लैंड इस योग्य हुआ कि मशीनों से माल तैयार करने में पैसा लगाए। औद्योगिक क्रान्ति से उत्पादन के तरीके में भारी परिवर्तन हुआ। दस्तकारी का पुराना तरीका टूट गया और विलायती माल एशिया के बाज़ारों में बिकने लगा। इसके साथ वैज्ञानिक क्षेत्र में यूरोपवासियों, अंग्रेज़ों और बाद में अमरीकियों ने भारी प्रगति की।"[4] इस आंदोलन  ने उपेक्षित-उत्पीड़ित जनता के लिए मुक्तिकामी प्रभाव छोड़ा है, जिसने पूरे अखिल भारतीय समाज को प्रभावित किया है। इस आंदोलन ने पूरे भारतवर्ष को एक सांस्कृतिक सूत्र में आबद्ध किया है, जिस पर रामविलास शर्मा टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि "भारत का भक्ति आंदोलन बहुराष्ट्रीय आंदोलन का श्रेष्ठ उदाहरण है। संस्कृत और अरबी-फ़ारसी से हटकर भारतीय लोकभाषाओं में विपुल मात्रा में साहित्य रचा गया। साहित्य रचना के इस कार्य में कश्मीर से केरल, गुजरात से असम तक देश की सभी विकासमान जातियों ने भाग लिया। इन जातियों में से केवल उच्च वर्गों ने नहीं, साधारण जनों ने भी भाग लिया। भक्ति आंदोलन में शूद्रों, मुसलमानों और स्त्रियों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। इसलिए उस आंदोलन ने सीमित नवजागरण का नहीं, व्यापक लोकजागरणका रूप लिया। सांप्रदायिक भेदभाव और सामाजिक वैषम्य दूर करने में उसकी भूमिका युगांतकारी थी। यूरोप का रिनेसां कभी लोकजागरण का ऐसा रूप नहीं हो सका उसकी नवजागरण की भूमिका सीमित थी।’’[5] मैं इन सारे विवादों की ओर नहीं जाऊंगा, जिस पर बहुत बातें हो चुकी हैं।  मैं जो बात करना चाहता हूँ, वह है भक्ति आंदोलन में मौजूद सांगीतिक तत्त्व जिसका अद्भुत मूल्यांकन किया है रामविलास शर्मा ने , हिंदी आलोचना में रामविलास शर्मा एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं। रामविलास शर्मा का अध्ययन-लेखन सिर्फ हिंदी आलोचना तक सीमित नहीं है बल्कि इनका लेखन बहुत ही व्यापक रहा है जिसे अपने लेखन के माध्यम से इन्होंने रेखांकित किया है, इन्होंने ऋग्वेद से लेकर अपने समकालीन लेखकों के साहित्यिक मूल्यों पर अपनी कलम चलाई है। रामविलास शर्मा का चिंतन-अध्ययन जितना व्यापक है उसे देखकर बड़ी-बड़ी संस्थाओं को भी ईर्ष्या हो सकती है, जिन्होंने कम सुविधाओं के साथ बिना किसी लोभ-लाभ के बहुत सारे महत्त्वपूर्ण कार्यों को किया। इन्होंने नवजागरण, हिंदी, जाति, भाषा, समाज, राजनीति, संस्कृति, 1857 का स्वतंत्रता संग्राम, भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द, दर्शनशास्त्र आदि विषयों पर बहुत ही विस्तार से विचार किया है। जिसका आज व्यापक अध्ययन-विवेचन करने की ज़रूरत है। भक्ति आन्दोलन के कवित्व और विचार चिंतन पर अक्सर बातें होती रही हैं, जिस पर बात करने का मेरा फ़िलहाल कोई उद्देश्य नहीं है। रामविलास शर्मा के कई सिद्धान्तों पर बातचीत तो होती रही है लेकिन संगीत पर रामविलास शर्मा ने जो भी लिखा है उसपर बहुत ही कम बातचीत हुई है जबकि संगीत पर इन्होंने विस्तार से अपनी लेखनी चलाई है। संगीत इनके आलोचना परिक्षेत्र का बहुत ही महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। भक्तिकाव्य के सन्दर्भ में जिस तरह का मूल्यांकन यह संगीत को लेकर करते हैं वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है रामविलास शर्मा लिखते हैं "भारतीय संतों की काव्य रचना के आगे संगीत में उनका योगदान प्रायः भूला दिया गया है। जिसे शास्त्रीय संगीत कहा जाता है, और जो मूलतः है, उसके वे निर्माता हैं। ध्रुपद गायकी का विकास राजदरबारों में मानसिंह, अकबर, शाहजहाँ आदि को कलावन्तों के संरक्षण का श्रेय उचित ही दिया जाता है। किन्तु उसका जन्म दरबारों में हुआ था आचार्य बृहस्पति ने ध्यान दिलाया है कि अबुल फजल के अनुसार आगरा के आस-पास के क्षेत्र में, अर्थात् ब्रज नाम के जनपद में, ध्रुपद गाया जाता था और ग्वालियर के ब्रजभाषा काव्य की भाषा बनी और संगीत की भाषा भी बनी संगीत और काव्य अलग-अलग नहीं थे। तानसेन गायक रूप में प्रसिद्ध हैं परन्तु वह कवि भी थे।"[6] हम सभी जानते हैं भक्तिकाव्य का मूल्यांकन हमेशा से मध्यकाल की केन्द्रीयता के साथ होती रही है लेकिन रामविलास शर्मा पहले आलोचक हैं, जिन्होंने इसे लोकजागरण की केन्द्रीयता के साथ देखा सिर्फ़ देखा बल्कि संगीत की महती भूमिका को भी इन्होंने रेखांकित किया। भक्तिकाव्य को नवजागरण का हिस्सा मानते हुए भक्तिकाव्य के संदर्भ में मध्यकाल की बनी-बनाई धारणा को तोड़ते हैं और इसे 'नवजागरण' का केंद्र मानते हुए इसका सम्यक मूल्यांकन करते हैं। कहते हैं कला मध्यकालीनता से मुक्त होकर ही विकसित हो सकती थी। इस नवजागरणकालीन  युग की चर्चा करते हुए रामविलास शर्मा तमिल संस्कृति साहित्य, कला का चित्रण करते हुए नवजागरण पर टिप्पणी करते हैं, यहाँ की कलाओं का विकास देखकर रामविलास शर्मा कहते हैं कि सोलहवीं सदी की इटली की याद आती है जिसने कला की दुनिया में अपना मुकाम बनाया था जिसपर रामविलास शर्मा लिखते हैं कि "साहित्य में भक्ति केंद्रीय स्थान पर थी परंतु साहित्य के साथ तमिल संस्कृति का चौमुखी विकास हुआ। मंदिरों के रूप में स्थापत्य के भव्य नमूने प्रस्तुत किए गए। इनका निर्माण राजाओं ने कराया था। मंदिरों के साथ मूर्तिकला का विकास हुआ, जहाँ-तहाँ भित्ति चित्र बनाए गए। गायन-वादन के साथ नृत्य कला का विकास हुआ। तमिलनाडू के इस नवजागरण का वृत्तांत पढ़ते हुए सोलहवीं सदी के इटली की याद आती है।"[7] हालांकि संगीत का यह क्रम बहुत ही पुराना है जो भक्तिकाव्य में  अपनी विकसित अवस्था में हमारे सामने आता है। इसकी परंपरा हमें वैदिक युग से देखने को मिलती है। सामवेद तो संगीतक तत्त्व से ही बुना गया है। रामायण की आधारभूमि भी गेय काव्य ही रही है। जिसकी उद्भावना वाल्मीकि के माध्यम से हुई है। जिसका प्रसार भारत की विभिन्न भाषाओं में देखने को मिलता है। रामकाव्य को सबसे ज़्यादा अगर किसी ने सुलभ रूप दिया तो वह तुलसीदास हैं जो भक्तिकाव्य के एक महत्त्वपूर्ण कवि थे। तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस अगर आज आमजनों का कंठहार बना हुआ है तो इसकी वजह भी इसका सांगीतिक तत्त्व ही है। रामविलास शर्मा इन्हीं कारणों से इसे नवजागरण के अंतर्गत देखने की बात करते हैं, संत साहित्य की मूल्यवत्ता को रेखांकित करते हैं और मानसिंह, अकबर जैसे शासकों की भूमिका को भी रेखांकित करते हैं। रामविलास शर्मा व्यंग के साथ कहते हैं "रास अथवा लीला कीर्तन, संगीत के प्रति नवजागरण, संत संगीतज्ञ, ध्रुपद की शिक्षा- ये बड़े सारगर्भित शब्द हैं। कुछ दृष्टिहीनों के लिए जो अंधकार है, वह दृष्टिवालों के लिए नवजागरण है। यह संगीत के प्रति नवजागरण है-गायन, वादन के साथ नृत्य अनिवार्य है। एक परंपरा संत संगीतज्ञों की भी है। इन संगीतज्ञों से दूर के लोगों ने ध्रुपद की शिक्षा पायी। मानसिंह और अकबर दोनों के दरबारों से बाहर रहते हुए ध्रुपद-गायन की यह परंपरा विकसित होती रही।"[8] रामविलास शर्मा मार्क्सवादी माने जाते हैं ज़ाहिर है इनके सिद्धान्त मार्क्सवाद की कसौटी पर आगे बढ़ते हैं। हालांकि मार्क्सवाद की परिभाषा भी अपने अनुसार यह गढ़ते हैं। रामविलास शर्मा सच्चा मार्क्सवाद उसे ही मानते हैं जो अपनी सांस्कृतिक विरासत को पहचानता है। रामविलास शर्मा के लिए मार्क्सवाद से ज़्यादा अहम सांस्कृतिक विरासत की पहचान है, इसी पहचान को केंद्रित करते हुए रामविलास शर्मा प्राचीन संस्कृति, ऋग्वेद, उपनिषद, रामायण,संगीत आदि का विशेष अध्ययन-चिंतन करते हैं और इसे नए ढंग से मूल्यांकित करते हैं। इस चिंतन के दौरान रामविलास शर्मा को जो भी उपयोगी लगा इन्होंने उसे शिरोधार्य करने का पक्ष रखा अपने आलोचनात्मक टूल निर्मित किये। रामविलास शर्मा भक्तिकाव्य को लोकजागरण से जोड़ते हैं। भक्तिकाव्य में संगीत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जिस तरह भक्ति कविताओं ने समाज में मौजूद पाखंड को खत्म करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है उसी तरह भक्तियुगीन संगीत ने अपनी महती भूमिका निभाई है रामविलास शर्मा टिप्पणी करते हैं “15वीं, 16वीं सदियों के हिंदी कवियों ने जनपदीय भाषाओँ में रचनाएँ की, पर ये रचनाएँ किसी एक जनपद तक सीमित नहीं थीं. काव्य के साथ संगीत जुड़ा हुआ था। ये कवि गाते भी थे। इनके पदों के साथ रागों के नाम अब तक लिखे जाते हैं। सूर, कबीर, मीरा, तुलसीदास के पद समस्त हिंदी प्रदेश में गाए गए, आज भी गाए जाते हैं। इस तरह हिंदी-प्रदेश के सांस्कृतिक एकीकरण और जातीय चेतना के विकास में इन कवियों का बहुत बड़ा योगदान है। साथ ही यह जातीय चेतना राष्ट्रीय चेतना के विकास में भी सहायक सिद्ध हुई। विद्यापति को बंगाल के बुद्धिजीवियों ने अपना कवि माना। कबीर के पद गुरु ग्रंथसाहब में संकलित किए गए और अनेक गुजराती बुद्धिजीवी मीरा को अपने प्रदेश की कवयित्री मानते हैं। इस तरह हिंदी प्रदेश के पूर्वी, उत्तरी और पश्चिमी जनपदों के कवियों ने पड़ोसी प्रदेशों से घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध स्थापित किए।"[9] कविता और संगीत में एक अंतरंग अंतर्संबंध होता है, जिसे रामविलास शर्मा ने रेखांकित किया है। जो कविता को मानवधर्म की ओर ले जाता है इस संबंध को रेखांकित करते हुए रवींद्रनाथ की कविता और संगीत को एक ही श्रेणी का मानते हैं। रवींद्र के संगीत से हम सभी परिचित हैं, रवींद्रनाथ टैगोर ने भी लिखा है।  "गतिशील भाव संगीत के लिए पूरी तौर से अनुसरणीय है, ऐसा नहीं, लेकिन संगीत अभी पूर्णतया उस अवस्था को पहुँचा नहीं है। संगीत और कविता में हम और कुछ प्रभेद नहीं देखते, केवल उन्नति का तारतम्य है। दोनों यमज हैं, एक ही माँ की सन्तान हैं, दोनों की शिक्षा में वैलक्षण्य मात्र हुआ है। यह स्पष्ट हो गया कि संगीत और कविता एक श्रेणी के हैं।"[10] भक्तिकविता में भी संगीत तत्त्व की विशेष भूमिका थी। संगीत के माध्यम से भक्ति आंदोलन का जो विचार था, वह आमजन तक सहज ही बहुत आसानी से पहुँचने में कामयाब हुआ। संगीत तत्त्व के माध्यम से भक्ति कविता लोक तक एक व्यापक जनता के बीच अपनी जगह बनाने में कामयाब हुई। भक्ति काव्य की लयात्मकता सहज ही आमजन के लिए आकर्षण का केंद्र बनी।  कहते हैं मानुषिक भावनाएं जब हृदय में पूर्णतः सिमट नहीं पाती तब वह कला का रूप लेती हैं। जिसका प्रवाह संगीत, गीत, नृत्य, शिल्प, स्थापत्य चित्र आदि कलाओं के माध्यम से हमारे सामने साकार रूप लेती है। गाना, बजाना तथा नृत्य इन तीनों का सम्मिलित रूप  ही संगीत कहलाता है। भक्ति आंदोलन में कलाओं की महती भूमिका है,जो पूरे भक्ति साहित्य में देखने को मिलती है। जिसका पूरा प्रभाव भक्ति आंदोलन पर दिखता है। जिस ओर रामचन्द्र शुक्ल ने भी ध्यानाकर्षित कराया है। भ्रमरगीत सार की भूमिका में रामचन्द्र शुक्ल लिखते है "जयदेव की देववाणी की स्निग्ध पीयूषधारा, जो काल की कठोरता से दब गई थी, अवकाश पाते ही लोकभाषा की सरसता में परिणत होकर मिथिला की अमराइयों में विद्यापति के कोकिल कंठ से प्रकट हुई और आगे चलकर ब्रज के करीलकुंजों के बीच फैल मुरझाए मनों को सींचने लगी। आचार्यों की छाप लगी हुई आठ वीणाएँ श्रीकृष्ण की प्रेमलीला का कीर्तन कर उठीं, जिनमें सबसे ऊँची, सुरीली और मधुर झनकार अंधे कवि सूरदास की वीणा की थी।"[11]

      इससे भी लोकभाषा के महत्त्व  का पता चलता है। भक्तिकाव्य में लोकभाषा का महत्त्वपूर्ण योगदान था। भक्तिकाव्य का प्रसार और विकास लोकभाषा में ही हुआ और लोकभाषा में ही संभव था। संपूर्ण अखिल भारतीय काव्य लोकभाषा में ही विकसित हुआ, भक्तिकाव्य की यह भी एक प्रमुख विशेषता है। लोकभाषा के आधारों के साथ संगीत का महत्त्वपूर्ण विकास हमें देखने को मिलता है। रामविलास शर्मा इस ओर भी ध्यानाकर्षित कराते हैं कि संगीत का महत्त्वपूर्ण विकास मंदिरों में गायन-वादन के साथ हुआ। भक्तिकाव्य के वैष्णव संप्रदाय, अष्टछाप, कृष्ण काव्य तो इसका जीता-जागता उदाहरण हैजिसमें संगीत ने अहम भूमिका निभाई है। उस दौर में कई विभूति कवि के साथ-साथ गायक भी थे, संगीत के विकास में मंदिरों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। मंदिरों में गायन-वादन छहों ऋतुओं में आज भी देखने को मिलता है जिसे रेखांकित करते हुए रामविलास शर्मा लिखते हैं- "संगीत का अन्तरप्रादेशिक विकास हो रहा था। इस विकास में लोकसंगीत की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। स्वयं तमिलनाडू में नर्तकों, वादकों, मंदिरों के गायकों ने जिस परंपरा को सुरक्षित रखा था, उसी को तमिलनाडू की वृहत्त्रयी ने विकसित किया था। उसने तेलुगू और संस्कृत को अपना माध्यम बनाया, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि वे किसी क्षेत्र की सीमाओं से बँधे हुए थे।"[12] मीराबाई का काव्य तो संगीत-नृत्य के माध्यम से ही प्रतिरोध दर्ज कराता है, जिससे उन्हें कुलटा जैसे शब्दों से भी अभिहित किया गया था। कृष्णकाव्य के सूरदास तो मंदिरों के चौखटों पर ही गायन किया करते थे, जिसपर रामविलास शर्मा कहते हैं कि ऐसा लगता है सूरदास लोकसंगीत के रागों और पदों से परिचित थे। यह हाल सिर्फ़ उत्तर भारत का नहीं था बल्कि दक्षिण भारत में तो और भी अत्यधिक व्यापक था, जिसमें पुरंदरदास से लेकर त्यागराज तक मौजूद थे जो मंदिरों के आधारों के साथ संगीत के माध्यम से अपने आपको अभिव्यक्त कर रहे थे, जिससे मंदिर और संगीत की घनिष्ठता देखने को मिलती है। जिसपर रामविलास शर्मा लिखते हैं- "सूरदास समूचे लोकसंगीत से परिचित थे, उसके एक ही अंग से नहीं। उनके पदों के साथ जो रागों के नाम दिए हुए हैं, वे उनके गायक स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। कबीर के पदों के साथ भी रागों के नाम दिए हुए हैं। विद्यापति के पदों और उनसे पहले चर्यापदों के साथ रागों के नाम दिए हुए हैं। भक्त अपने पद गाने के लिए रचते थे और उन्हें स्वयं गाते थे। कथा है कि तानसेन के गुरु हरिदास स्वामी थे और बादशाह अकबर उनका गाना सुनने गया था। यह कथा सच हो या हो, वह इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि दरबारी गायकों ने अपनी कला भक्त गायकों से सीखी थी। दक्षिण भारत में पुरंदरदास से लेकर त्यागराज तक सन्त गायकों की परम्परा सोलहवीं सदी से उन्नीसवीं सदी तक चली आयी है। दक्षिण की तरह उत्तर भारत में भी मंदिरों में संगीत का घनिष्ठ सम्बन्ध था।"[13] भक्ति साहित्य समाज को जोड़ने का कार्य करता है। इसमें भी संगीत की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जिसमें अमीर ख़ुसरो, जायसी, रहीम, रसखान, आलम तमाम ऐसे लोग थे, जिन्होंने हिंदू और मुसलमान होकर रचना नहीं  की बल्कि एकत्व की भावना से साहित्य रचा, जिससे भक्ति साहित्य सिर्फ़ एक जाति की भावभूमि बनकर नहीं रह गई, इसमें लोक से शास्त्र तक सभी के लिए जगह है जो विविधताओं की एकता को पुष्ट करता है। रामविलास शर्मा तो हिंदू और मुसलमान की जो जातीयता है, उसमें संगीत को सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं और दोंनो को एकजुट इसकी जातीय एकता निर्मित करने में संगीत की महत्त्वपूर्ण भूमिका मानते हैं और कहते हैं कि संगीत ही एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ हिन्दू के जो भी धुरंधर गायक रहे हैं उसके गुरु मुसलमान रहे हैं। संगीत ही ऐसा तत्त्व है जो संप्रदायवाद को काट सकता है। संगीत में हिंदू मुसलमान एक थे। यानी संगीत किसी के ख़िलाफ़ नहीं था बल्कि यह हमें जोड़ने का कार्य करता है। भक्तिकाव्य का संगीत तत्त्व हमें नवजागरण की ओर ले जाता है, जहाँ कई जटिल समस्याओं का हल मौजूद है। वही रामविलास शर्मा संगीत को क्षेत्रीयता जैसे संकीर्ण चीज़ों से बचाने के लिए वह 'हिंदुस्तानी संगीत' नाम को उपयुक्त मानते थे। इसे कनार्टक संगीत या कुछ और भी नाम देना इसे संकुचित करने जैसा था। रामविलास शर्मा इस बात की प्रशंसा करते हैं कि संगीत का नाम धर्म या क्षेत्र के नाम पर नहीं बल्कि जो नाम है, वह समाज केंद्रित नाम है हिंदुस्तानी संगीत! भक्तिकाव्य पर भी गाहे-बगाहे क्षेत्रीयता का आरोप लगता रहा है। जिसपर रामविलास शर्मा की यह मानीखेज़ टिप्पणी संगीत को क्षेत्रीयता से मुक्त कर अखिल भारतीय स्वरूप गढ़ती है, जातीय एकता को बढ़ावा देती है, सांप्रदायिकता का विपक्ष रचती है जिसपर रामविलास शर्मा लिखते हैं-"हिन्दू मुसलमानों की जो सबसे बड़ी जातीय एकता दिखाई देती है वह संगीत के क्षेत्र में है। ऐसा कौनसा राग है जिसे हिन्दू गाते हैं और मुसलमान नहीं गाते और ऐसा कौनसा राग है जिसे केवल मुसलमान गाते हैं और हिन्दू नहीं गाते? आज के धुरंधर गायक है, उसमें से ज़्यादातर के गुरु मुसलमान उस्ताद हैं, जिनसे इन्होंने हिन्दुस्तानी संगीत की शिक्षा पाई।  यह हिन्दुस्तानी शब्द बहुत अच्छा है संगीत के लिए कर्नाटक संगीत शब्द उतना ही अच्छा नहीं है, क्योंकि यह उस संगीत को कर्नाटक तक सीमित कर देता है। जबकि वास्तव में उस संगीत को तमिलनाडू की देन बहुत अधिक है और आंध्रप्रदेश की तो उससे भी ज़्यादा त्यागराज तमिलनाडू के रहने वाले थे और वह अपने पद रचते थे तेलुगू में।  इतना जबरदस्त भाईचारा था इनमें कि तमिलनाडू का आदमी तेलुगू में रचता था और उसे कर्नाटक संगीत कहा जाता था। हमारे यहाँ जो संगीत रचा गया उसे हिन्दुस्तानी संगीत कहते हैं। धर्म या जनपद के नाम पर उसका नामकरण नहीं है, जिसे हिन्दुस्तानी संगीत कहते हैं, वह हमारी हिन्दुस्तानी जाति का है जिसे मैं हिन्दी जाति कहता हूँ। तो संगीत में हिन्दू-मुसलमान एक है।"[14] भक्ति आंदोलन को कई संप्रदायों और सगुण-निर्गुण में विभक्त कर देखा जाता रहा है लेकिन इन विविधताओं के बावजूद जो तत्त्व इन्हें आपस मे जोड़ता है, एकरूपता प्रदान करता है, वह है सांगीतिक तत्त्व! रामविलास शर्मा भक्ति काव्य में संगीत तत्त्व का रेखांकन करते हुए इसे दरबार और दरबार की बहार के तौर पर रेखांकित करते हैं और संगीत को दरबारों से निकला हुआ नहीं बल्कि लोक से दरबारों तक पहुँचा मानते हैं, जिसमें अमीर खुसरो और सूफ़ी साहित्य को तो रेखंकित करते ही हैं मौजूदा दौर के शासकों की भूमिका को भी रेखांकित करते हैं, जो इसके विकास-प्रसार में महती भूमिका निभाते हैं और इसपर भी क्षोभ व्यक्त करते हैं कि सन्तों की काव्य रचना में संगीत के योगदान को भुला दिया गया है। रामविलास शर्मा लिखते हैं "यह सारा विकास राजदरबारों के बाहर हुआ। विद्यापति का संबंध अवश्य मिथिला के राजपरिवार से था पर वह जिस संस्कृति के प्रतिनिधि थे, वह उन्हें बंगाल के वैष्णव कवियों से जोड़नेवाली थी। इसलिए तेरहवीं सदी से दरबार के बाहर संगीत का जो विकास हुआ, उसमें उन्हें शामिल करना उचित है। उनकी स्थिति अमीर खुसरो की स्थिति से मिलती जुलती है। दोनों ही दरबारों से जुड़े थे और दोनों ही अपनी अपनी जनपदीय संस्कृतियों के प्रतिनिधि थे। दरबारों में ध्रुपद-गायन जनपदों से पहुँचा था, वहाँ वह अपना उल्लासमय स्वर, शृंगार की उदास अभिव्यंजना बहुत दिनों तक कायम किये रहा। देश में जब तब युद्ध होते थे, दरबार बस्ते और बिगड़ते थे, फिर भी विभिन्न प्रदेशों के संगीतकार एक दूसरे से मिलते रहे, संगीत का विकास होता रहा।"[15] रामविलास शर्मा कहते थे- 'अंग्रेज़ों के समय भारतीय संगीत की काफ़ी दुर्दशा हुई है' औपनिवेशिक शासन के बाद भारतीय ज्ञान,