साक्षात्कार : ‘दुनिया सम्भव ही यात्राओं के साथ हुई’ / मंगलेश डबराल

दुनिया सम्भव ही यात्राओं के साथ हुई’ 
मंगलेश डबराल

(यह साक्षात्कार प्रिय साहित्यकार मंगलेश डबराल की स्मृतियों को सादर समर्पित)

(‘कड़ियाँ’ द्वारा आयोजित कविता पाठ के बाद मंगलेश डबराल के साथ बृजेश कुमार यादव) 

प्रश्न 1. एक कवि के जीवन में यात्रा और यात्रा-साहित्य का क्या महत्त्व है?

मंगलेश डबराल: यात्रा जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती है। यात्राओं से ही सारी चीजें खोजी गई हैं। अगर यात्राएं नहीं होतीं तो जीवन सम्भव नहीं था। यात्राओं से ही विभिन्न देशों की खोज हुई है – चाहे कोलंबस की यात्रा हो, या वास्कोडिगामा की! यात्राएं अनन्त काल से होती आ रही हैं। चीन, उत्तर कोरिया, जापान के यात्रियों ने कितने युगों पहले यात्राएं कीं। कहाँ-से-कहाँ तक पूरा साहित्य गया – चाहे कुमार जीव को लें या फाहियान को लें! और भी जितने यात्री रहे हैं या जिनके बारे में हम लोग जानते हैं। अगर यात्राएं नहीं होतीं तो दुनिया को जानना मुश्किल होता! दुनिया सम्भव ही यात्राओं के साथ हुई। इन यात्रियों के साथ कई चीज़ों ने यात्रा की, जो अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। जैसे – आलू, गन्ने, तम्बाकू, कपास, रेशम की यात्रा संभव हुई। प्याज ने यात्रा की! इन सब यात्राओं के साथ भविष्य की कई महत्त्वपूर्ण चीजों की खोज हुई। आज जो उत्तर भारत में तंदूर की रोटी प्रचलित है, वह अफगानिस्तान और मध्य एशिया से आई। रोटी ने भी यात्रा की! यात्राओं के बिना जीवन संभव नहीं है। यात्राओं का एक रोचक इतिहास है। मैं अपने आप को यात्री नहीं मानता! यात्री तो राहुल जी, अज्ञेय, नागार्जुन आदि लोग थे। निर्मल वर्मा भी बड़े यात्री थे, उनका यात्रा साहित्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस तरह बहुत से लोगों ने यात्रा साहित्य को समृद्ध किया है।

 मेरे ख्याल से एक कवि जो है भीतरी  यात्रा तो करता ही है! जो भीतरी यात्रा करता है, वह भी, उसका यात्रा वृतांत ही होता है। यात्रा के साथ विस्थापन भी जुड़ा है। और प्रवास भी जुड़ा है। इन सब ने मनुष्य के इतिहास में कुछ ना कुछ जोड़ा ही है। बहुत से लोग जब इधर उधर विस्थापित हुए, तो बहुत सी संस्कृतियों को खोजा और बहुत ही नई चीज़ों का अन्वेषण किया। यात्रा-संस्मरण और यात्रा-साहित्य अत्यंत जरूरी है। यह दुःखद है कि हिंदी में यात्रा साहित्य बहुत नहीं लिखा गया है। 

मुझे लगता है गांधीवादियों ने लगभग ‘पहली’ यात्रा की। जैसे कि काका कालेलकर जैसे लोग गांधीवादी थे। इनके जैसे लोगों ने जगह-जगह भारत भ्रमण किया । इसके बाद जो उन्होंने संस्मरण लिखा, वो बहुत उपयोगी है। इसके बाद राहुल जी ने बहुत-सी यात्रायें की, और विपुल यात्रा-साहित्य लिखा। 

प्राचीन काल से ही उत्तर भारतीय लोग यात्रा से बहुत बचते रहते थे – खासकर विदेशी। हिन्दू यात्रियों  की अपेक्षा शायद बौद्ध लोग पहले ऐसे यात्री थे, जिन्होंने बहुत ही लंबी यात्रा की। चाहे महायान के लोग हो या हीनयान के। महायान कहाँ-से-कहाँ पहुंचा,  तिब्बत, लद्दाख़, चीन, जापान, वर्मा, कोरिया – यहाँ तक कि बौद्ध भिक्षुओं ने इंडोनेशिया तक की यात्रा की। बाद में सनातन धर्म के लोगों ने हीनयान से द्वंद्व किया। चीन और जापान में भी हिन्दू पहुंचे। लेकिन बौद्ध के बाद ही वे लोग पहुंचे। शंकराचार्य ने केदारनाथ की यात्रा की। इसके बाद हमें नहीं लगता कि भारतीय उच्च वर्ण के लोगों ने कोई यात्रा की हो! देश में एक भ्रम था कि अगर आप समुंद्र पार यात्रा कर लेते हैं तो आप अपवित्र हो जाएंगे। आपको पूरा संस्कार फिर से करना पड़ेगा। यह सब पंडितों के द्वारा बनाया गया था।

  मुझे ऐसा लगता है कि जो उत्तर भारतीय सवर्ण समाज था वह भौगोलिक रूप से बन्द समाज था। इस मायने में कि भौगोलिक रूप से आपके पास साधन उतना अच्छा नहीं था। समुंद्र नहीं था, नदियाँ थीं– जो समुंद्र था व्यापार के लिए प्रयोग होता था। उत्तर भारतीय सवर्ण समाज शुरू से बहुत बन्द समाज था। मसलन, अगर आप सरयू पार के ब्राह्मण हैं तो आप सरयू के इधर के ब्राह्मणों के हाथ का छुआ नहीं खाते थे। विद्यानिवास मिश्र जी जब विदेश जाते थे तो वे अपनी प्लेट, लोटा इत्यादि अपने साथ लेकर जाते थे! दूसरे बर्तनों में खाना नहीं खाते थे। 

इस तरह के जितने विभाजन रहे हैं हमारे यहां इन विभाजनों के चलते यात्रा सम्भव नहीं थी। यात्राओं के लिए जो समानता का बोध चाहिए वो सम्भव नहीं था! दूसरी बात ये है कि जो माइग्रेशन हुआ वो मध्य एशिया से भारत की ओर हुआ। वे चाहे अरबिया हों, अफगानिस्तान हो, ईरान हो या जो मध्य एशिया आदि से माइग्रेशन हुआ गंगा के मैदानों में। लेकिन, यहां से उधर माइग्रेशन नहीं हुआ। ये दो कारण थे और एक कारण था जाति-व्यवस्था का पेचीदा विभाजन, और विभाजन के भीतर विभाजन, तो इसके कारण यात्राएं संभव नहीं हुई। बाहर के लोग तो यहां आए लेकिन यहां के लोग बाहर बहुत कम गए। शायद, साउथ से लोग गए क्योंकि वहाँ समुंद्र था; क्योंकि वहां पर प्रचीन समय से नावें थीं। जहाजें विशेष रूप से मिलती हैं। अगर हम ये मान के चलें कि सिंधु घाटी सभ्यता किसी बाढ़ या भूकम्प के कारण नहीं नष्ट हुई बल्कि आर्यो ने हमला कर खदेड़ दिया था- ये लोग जो धीरे-धीरे दक्षिण की ओर चले गए और ये आश्चर्य नहीं है कि दक्षिण के लोग अपने आपको द्रविड़ सभ्यता का मानते हैं। लेकिन, मैं ये कह सकता हूं कि यात्राओं के बिना दुनिया सम्भव नहीं है! ये सारे देश और समाज यात्राओं की खोज हैं। 

प्रश्न 2. एक कवि यात्रा-साहित्य की तरफ कैसे मुड़ा?

मंगलेश डबराल: मैं गद्य लिख सकता हूँ। गद्य लिखने का सपना मेरा बहुत बड़ा रहा है। मैं हमेशा सोचता रहता कि मैं गद्य लिखूं। मैंने पहले कहानी भी लिखी है। उसके पहले मेरी एक और किताब आई  थी ‘लेखक की रोटी’। मुझे बेहद प्रिय है। अच्छा गद्य, महान चीज़ है। 

 मैंने दो बार समुंद्र देखा है – एक बार पुरी का और एक बार मुंबई का। मैं समुंद्र पर कुछ लिखना चाह रहा था पर मुझे लगा मैं कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। मैं मुंबई गया तो हम लोग टैक्सी से बहुत घूमे । मेरे साथ मेरी पत्नी और बेटी भी थी।

मेरी पत्नी पहली बार मुंबई गई थी। हम लोगों ने ये तय किया कि जितना ज्यादा घूम सकते हैं, घूम लें। हम लोगों ने  टैक्सी चालक से मुंबई के बारे में बात की, तो वह सब बातें बताने लगा, एक दम गाइड की तरह बातें करने लगते हैं, सब! साथ-साथ राजनीतिक बातें भी, ‘मुंबई तो साहब पहले ऐसा था, वैसा था टाइप। वहां जितने भी ड्राईवर देखे, ज्यादातर उत्तर प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं। उनके मन में होता है कि मराठी पुरुष कोई काम नहीं करता है। औरतें ज्यादा काम करती हैं। मराठी आदमी कम काम करते हैं। एकदम निकम्मा है, जिसके चलते बाहरी आये, जिनके आने से बंबई बरबाद हुई आदि-आदि।’ 

मैंने अपने बेटी से कहा ‘ये बातें याद रखना।’ पर जब हम लोग घर वापस आए तो बेटी से पूछा, ‘सारी बातें याद हैं?’, तो वो बोली, ‘भूल गई।’ ऐसी बहुत-सी बातें हुई जिसे मुझे लिखना था पर लिख नहीं पाए।

 आयोवा में मैं दो माह था। आयोवा में जो लोग आए थे उसमें ज्यादातर एशियाई देशों या अमेरिका के थे। यूरोप के काफी कम लोग थे। हम बीस लोग थे, जिसमें छः अफ्रीकी लेखक थे। इसमें से बहुत लोग बहुत बड़े लेखक थे। आपस में दोस्ती जल्दी हो जाती है। वहां मेरे बहुत अच्छे दोस्त भी बन गए। वहां कविता पाठ और भाषण होने लगे। मैंने अफ्रीकी लेखकों के स्वभाव को बहुत गौर से देखा । मसलन, एक अफ्रीकी लेखक थे जिनके दांत में दर्द हुआ तो उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। मैंने वहां देखा कि उसके साथ अस्पताल के कर्मचारियों ने दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया। समाज अभी श्वेत और अश्वेत के घृणा-भाव से भरा हुआ था! मेरे भीतर घृणा का भाव भी उत्पन्न हो गया। 

एक लेखक और थे जो रात दिन टी.वी. खोले रहते थे। जब वह कमरे में नहीं रहते थे तब भी उनका टीवी चलता रहता था। मैंने सोचा टी.वी. क्यों खुला छोड़ दिया?, जबकि व्यक्ति यहां है भी नहीं!

 इन लेखकों द्वारा लैटिन अमेरिका के बारे में सूचना मिली । मेरे साथ एक लेखक मेक्सिको के भी थे। उन्होंने बताया कि ‘घृणा इतनी बढ़ गई है कि अब दीवार बनाने की बात होने लगी है। आजकल ट्रम्प हर समय मेक्सिको के बारे में बोलता रहता है। मेक्सिको से बहुत माफिया भी हमारे देश में आ रहे हैं।’ 

मैं पेरिस गया। मुझे आश्चर्य हुआ कि यही पेरिस है! पेरिस की पेन और सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री आदि मुझे अच्छी नहीं लगी। मैं सोचने लगा क्या यहीं के सामान होते हैं हमारे यहाँ? जिस समाज को आप देख रहे हैं, उस समाज से आप कुछ ग्रहण करना सीखें। इस यात्रा ने आपको क्या दिया, आप कहाँ से कहाँ गए, किससे आपने नये सम्बन्ध बनाए, जो मनुष्य रास्ते में मिले उनसे क्या रिश्ता बनाया? यात्रा कोई मंजिल नहीं है यात्रा एक उत्साह है।

  एक बहुत प्रसिद्ध ग्रीक कवि हुए हैं। उनकी एक मशहूर कविता है, जिसका नाम ‘यथका’ है। ‘यथका’ जब तेरह साल बाद बहुत बुरी स्थिति में लौटता है। उसके सारे कपड़े फटे हैं। वह बड़ा थका-हारा है। उसे ‘यथाका’ पहुंचना है, जहां का वह सेनापति है। उसका बहुत लोग इंतजार कर रहे हैं। जब तुम चलोगे यथक तो तुम्हें रास्ते में दैव मिलेंगे तो तुम कैसे लड़ोगे? वो दैव कहीं बाहर नहीं होंगे, तुम्हारे अंदर ही होंगे। जब तुम वहाँ पहुंचो, एले, वहाँ बहुत कुछ खरीद सकते हो, ये... आदि-आदि का उसमें वर्णन है। जब तुम यथाका पहुंचोगे तो तुम्हारे लिए देने के लिए कुछ भी नहीं है। यथका भी तुम्हें कुछ नहीं दे सकता, इससे तुम निराश मत होना। रास्ते में तुमने जो कुछ देखा वह यथाका के कारण ही सम्भव हुआ। वह यथका ने ही दिया है, जो कुछ अनुभव हुआ वह एथक की ही देन है और यथका तुम्हें क्या दे रास्ते में, जो मिला वह ज्यादा महत्वपूर्ण है, जहां पहुंचे वह इतना महत्वपूर्ण नहीं है।

प्रश्न 3. हिंदी साहित्य में या अन्य किसी भी भाषा के साहित्य में लिखित यात्रा-वृत्तांतों में से सबसे अधिक किसने आपको प्रभावित किया?

मंगलेश डबराल: हिंदी साहित्य में मुझे जो पहली किताब मिली वो राहुल जी का ‘घुमक्कड़-शास्त्र’ था। इस किताब ने एक नया ट्रेंड शुरू कर दिया। लोग यात्राओं की ओर आकर्षित हुए। इसके पहले भी कुछ यात्रा-वृतांत मिलते हैं, जो ज्यादातर गांधीवादियों के हैं या कुछ जो बाद में सामने आए। जैसे, ‘मेरा प्रवास’! इसके बाद दूसरी किताब मुझे मिली वो थी निर्मल वर्मा की ‘चिडों पर चाँदनी’। यह यात्रा-साहित्य को नया आयाम देती है। उस समय एक ऐसा आयाम था कि कैसे, किस जगह कोई अजनबी नहीं है? फिर भी उन तक जाना बहुत मुश्किल हो मगर वो आपके सवेंदना की यात्रा के पड़ाव में है। भले ही वो विचित्र हो लेकिन वो आपकी संवेदना का एक नया आयाम होती है। निर्मल वर्मा की दृष्टि तो चीज़ों को समानता में देखने की थी। इसीलिए मेरे यात्रा वृत्तांत में निर्मल वर्मा की छाया है।

 बांग्ला की मेरी मित्र, जो अपने जीवन में क्रांतिकारी थी, तीन साल तक जेल भी रही! उस दौर में इतने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ हुईं और ये वही महिला है, जिनके जीवन पर आधारित उपन्यास लिखा महाश्वेता देवी ने ‘हजार चौरासी की मां’! जो मोटे तौर पर ‘जोया मित्र’ के जीवन पर आधारित है। जेल से बाहर आकर वो पर्यावरण आंदोलन से जुड़ गईं। आज भी पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर में रहती हैं। ‘जोया मित्र’ ने मुझे एक पत्र लिखा जिसका आशय ये था कि आपका संस्मरण बहुत अच्छा है फिर भी अधूरा-सा लगता है! अगर आप इसको और बढ़ाएं तो अच्छा रहेगा। तो मुझे लगा कि इसे कुछ बड़ा करना चाहिए तो मैंने इसे बड़ा किया। ये दो चरणों में पूरा हुआ। पूरा होने के बाद भी ये मुझे अधूरा-सा लगता है। इसमें बहुत-सी बातें नहीं आ पाई हैं। मैं थोड़ा उसकी फीलिंग पर ज्यादा निर्भर करना चाहता था। मुझे अभी भी लगता है कि इसमें कुछ और जोड़ा जाना चाहिए। अमेरिका के कई शहरों में मैं रहा, जिनके संस्मरण मैं इसमें नहीं जोड़ पाया, वो भी कुछ काम के हैं, इसमें शायद पचास पेज और जोड़े जा सकते हैं।

प्रश्न 3. ऐसी कोई योजना है कि आप अगले संस्करण में पूरा करेंगे?

मंगलेश डबराल: अगर समय मिलेगा तो! अमेरिका के शहर बहुत अलग तरह के हैं- शिकागो जिस तरह का है न्यूयार्क उस से अलग है! अमेरिका के शहरों का व्यक्तित्व अलग-अलग है।

प्रश्न 4. हिन्दी में यात्रा-साहित्य को अन्य विधाओं के मुक़ाबले कहाँ पाते हैं?

मंगलेश डबराल: जो स्थान उसे हिंदी में मिलना चाहिए था, वह अभी तक नहीं मिला है। हिंदी साहित्य जो है वो कहानी, उपन्यास, आलोचना इन सब से बाहर ही नहीं निकल पाया। आत्मकथा हिंदी में क्यों नहीं है? इसलिए की इसे कोई साहित्य ही नहीं माना गया। इसमें आलोचकों का भी दोष है और हमारे समाज का भी। पर पाश्चात्य लेखकों में ऐसा नहीं है। जहाँ तक पुरस्कारों का सवाल है, पुरस्कार न देना गलत तरीका है। यह बदलना चाहिए। यात्रा-संस्मरण उतना ही रचनात्मक हो सकते हैं जितना कि उपन्यास!

प्रश्न 5. समकालीन यात्रा-साहित्य को आप कैसे देखते हैं?

मंगलेश डबराल: राहुल जी का जो ‘घुमक्कड़-शास्त्र’ है वो क्यों महान है? क्योंकि वे एक पाठक को एक यात्री बना देते हैं। उस किताब को पढ़ते-पढ़ते समाप्त करते-करते, आप एक यात्री बन जाते हैं। यात्री बनने का स्वप्न पालने लगते हैं। राहुल जी को पढ़ने पर आपके अंदर नई जगहों को घूमने का स्वप्न पलने लगते है। बाकी जो यात्रा-संस्मरण हैं निर्मल जी, अज्ञेय जी, रघुवीर सहाय के भी कुछ संस्मरण हैं, श्रीकांत वर्मा के संस्मरण मेरे पढ़ने में नहीं आए हैं। 

 अनिल यादव का एक यात्रा-संस्मरण आंख खोलने वाला है। उनका ‘वह भी कोई देस है महराज’, एक बड़ा यात्रा-संस्मरण है। इसमें वे बहुत ही बारीक ब्यौरे का जिक्र करते हैं। ऐसी टिप्पणी करते हैं, इसमें बहुत ही मार्मिक ढंग से उल्लेख करते हैं। छोटे-छोटे प्रसंग का उल्लेख करते हैं, जो जीवन के बारे में बड़ी बात कह जाते हैं। यह किताब, उत्तर भारत में जो लोग यात्रा-साहित्य को लेकर भ्रम में थे, उसको तोड़ती है। 

असग़र वजाहत ने बहुत अच्छा लिखा है। उन्होंने अमेरिकी समाज के बारे में लिखा, हंगरी के समाज के बारे में लिखा, ईरान वाला संस्मरण उतना अच्छा नहीं लगा। कुछ कारणों से, यह एक निजी संस्मरण ज्यादा है। कृष्णनाथ के यात्रा-संस्मरण भी मैंने बहुत पहले पढ़े थे। वो भी अच्छे यात्रा-संस्मरण हैं। इधर जो संस्मरण आए हैं, एक संस्मरण विनोद तिवारी का आया है, ‘नाजिम हिकमत के देश में’। एक नया यात्रा-संस्मरण ओमा शर्मा का है – मुझे ऐसे संस्मरण ज्यादा अच्छे लगते है जिसमें जानकारी भी हो और संवेदना भी।

प्रश्न 6. क्या यात्रा–वृत्तान्त लिखते समय पाठक-वर्ग भी आपके ध्यान में होता है?

मंगलेश डबराल: हिंदी में कौन है जो पाठक वर्ग को ध्यान में रखता है? किसी को पता ही नहीं उसका पाठक-वर्ग कौन है। मराठी, बांग्ला, असमिया आदि भाषा में पता रहता है कि कोई पढ़ेगा, पर हिंदी में ऐसी आशा कम होती है। हिंदी में पाठक-वर्ग बहुत कम हैं। आधे लोग तक किताब पहुंचती ही नहीं है। मेरा यात्रा-संस्मरण चित्रों के साथ छपता है तो इतना महंगा हो जाता है कि ज्यादातर लोग खरीद नहीं पाते और ज्यादातर पुस्तकालयों में चले जाते हैं। वहीं अंधेरे में पड़ा रहेगा, कोई आयेगा तो पढ़ेगा।

प्रश्न 7. बदलते समय में यात्रा-साहित्य का भविष्य कहाँ देखते हैं?

मंगलेश डबराल : मुझे लगता है यात्रा साहित्य का लेखन बढ़ेगा| इस समय पंद्रह-बीस क़िताबें यात्रा साहित्य पर आई हैं। अभी एक किताब सुरेन्द्र की, और भी बहुत किताबें आई  हैं। कुछ पहाड़ की यात्रा के वर्णन अभी बीच में आए हैं। यात्रा पर बहुत अच्छा काम अजय सोडाणी कर रहे हैं, उनकी दो किताबें – ‘दर्रा-दर्रा हिमालय’ और ‘दरकते हिमालय पर दर-ब-दर’। अगर आप पिछले दस वर्षों में देखें तो बहुत-सी किताबें आईं हैं। जो लेखक नहीं हैं, वे भी यात्रा-वृत्तान्त लिख सकते हैं। इसके लिए पुरस्कार, छात्रवृत्ति होनी चाहिए। विदेशों में बहुत कुछ है, पर हिंदी में कुछ है नहीं! खुद अनिल यादव ने किस तरह यात्रा की, पर कोई आर्थिक सहयोग नहीं था! 

अस्वस्थता के बावजूद आपने अपना बहुमूल्य समय निकालकर मुझे साक्षात्कार दिया, इसके लिए आभार शब्द बहुत छोटा है. फिर भी धन्यवाद, सर.

मंगलेश डबराल: शुभकामनाएं.  

(यात्री मंगलेश डबराल से डॉ. बृजेश कुमार यादव की यह बातचीत (यह साक्षात्कार) डॉ. बृजेश कुमार यादव के यात्रा-साहित्य पर किये गये महत्त्वपूर्ण शोधकार्य का हिस्सा है. यह साक्षात्कार मई, 2020 (कोरोनाकाल) के दौरान फ़ोन पर लिया गया था. साक्षात्कारकर्ता की अनुमति के बिना इसका कहीं अन्यत्र उपयोग (प्रकाशन) वर्जित है.) 


 डॉ. बृजेश कुमार यादव
अपनी माटीके सह-सम्पादक भारतीय भाषा केन्द्र, जेएनयू में पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो
bkyjnu@gmail.com 9968396448, 981190748

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक कुमार

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