शोध आलेख : हिन्दी सिनेमा तथा पटकथा लेखन में मन्नू भंडारी का योगदान / कैलाश चन्द्र खटीक

हिन्दी सिनेमा तथा पटकथा लेखन में मन्नू भंडारी का योगदान
- कैलाश चन्द्र खटीक

साभार गूगल 

शोध आलेख : प्रस्तुत शोध आलेख में हिन्दी सिनेमा तथा पटकथा लेखन में मन्नू भंडारी के विशेष योगदान के बारे में अध्ययन किया गया है। आज भारतीय सिनेमा विश्व में अपना अद्वितीय स्थान रखता है एवं सिनेमा जगत् में अपनी एक अलग ही पहचान स्थापित कर चुका है। हम जानते हैं कि जब कोई देश किसी क्षेत्र में जब आगे बढ़ता है तो उसमें अनेक लोगों का सहयोग अपेक्षित रहता है तब जाकर देश क्षेत्र विशेष में अपना अस्तित्व स्थापित कर पाता हैं। भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय होने में भी विभिन्न अभिनेता, अभिनेत्री एवं फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कवि, संगीतकार एवं लेखकों आदि के साथ-साथ पटकथा लेखकों का भी सहयोग सर्वोपरि माना जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी का हिन्दी सिनेमा तथा पटकथा लेखन में योगदान पर इस शोध आलेख में शोध अध्ययन किया गया है।

बीज शब्द : हिन्दी सिनेमा, साहित्य और सिनेमा, संवाद की भूमिका, सिनेमा की लोकप्रियता, सामाजिक उत्तरदायित्व, हिन्दी सिनेमा के सौ साल, मनोरंजन।

मूल आलेख : हिन्दी सिनेमा का प्रारंभ हुए लगभग एक शताब्दी से ऊपर हो चुका है। फ़िल्मी दुनिया में संख्या की दृष्टि से आज भारतीय हिन्दी सिनेमा विश्व में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। भारतीय सिनेमा ने बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही विश्व के सिनेमा जगत् पर अपना गहरा प्रभाव जमाया है। आज भारतीय फ़िल्मों का अनुसरण पूरे विश्व के विभिन्न स्थानों यथा दक्षिणी एशिया, ग्रेटर मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व सोवियत संघ आदि भागों में प्रचुर मात्रा में अनुसरण किया जा रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में भारतीय प्रवासियों की बढ़ती संख्या को मद्देनज़र रखते हुए अब उक्त देश भारतीय फ़िल्मों के लिए महत्त्वपूर्ण बाजार बनकर उभर रहे हैं।

एक व्यापक परिवर्तन के अनुरूप भारतीय सिनेमा ने देश-विदेश में अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की है। यहाँ अभिनेता, अभिनेत्री एवं फ़िल्म निर्माता, निर्देशक आदि सभी मिलकर प्रत्येक विषय क्षेत्र पर कार्य कर रहे हैं। यहाँ भारत में विदेशी फ़िल्मों की तर्ज पर भी अधिक से अधिक फ़िल्मों का निर्माण हो रहा है। यहाँ प्रतिवर्ष अनेक क्षेत्रों में फ़िल्मों का निर्माण होता है। भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता का हम इसी से अंदाजा लगा सकते है कि यहाँ सभी भाषाओं को मिलाकर प्रति वर्ष लगभग 1600 से अधिक फ़िल्मों का निर्माण होता हैं। जिससे देश विदेश के कई सिनेमा प्रेमी इससे लाभान्वित हो रहे हैं।

वास्तव में हिन्दी सिनेमा के प्रारंभिक दौर में जब बिना आवाज़ की फ़िल्में आया करती थी तब हिलते-दौड़ते, उछल-कूद करते हुए तस्वीरें पर्दे पर नजर आयी थी। 14 मार्च 1931 में इन तस्वीरों में ध्वनि का एक नया प्रयोग शामिल हो गया। 1931 में आलमआरा (विश्व की रौशनी) फ़िल्म बनी जो हिन्दी भाषा में भारत की पहली सवाक (बोलती) फ़िल्म है। इस फ़िल्म के निर्देशक अर्देशिर ईरानी थे।

साहित्य और सिनेमा का संबंध-

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का कथन है किसाहित्य समाज का दर्पण होता हैयह वास्तव में सराहनीय कथन है। जिस समाज और देश में जैसा घटित होता है उसे ही साहित्यकार अपनी लेखनी द्वारा अपने साहित्य में प्रेषित करता है। इसी प्रकार साहित्य जिस तरह से समाज का दर्पण है उसी प्रकार हम कह सकते हैं कि सिनेमा भी समाज का दर्पण है क्योंकि जो कहानी या घटना हम समाज में घटित होते हुए देखते हैं वही सिनेमा में भी हम देखते हैं और यह कहानी या घटना किसी साहित्य के द्वारा ही चित्रित की जाती है। अतः साहित्य और सिनेमा दो अलग-अलग विषय एवं विधाएँ हैं लेकिन हम इन्हें एक ही सिक्के के दो पहलू कह सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। क्योंकि इन दोनों में पारस्परिक संबंध जुड़ा हुआ है।

आज़ादी से पूर्व बहुत से फ़िल्मी कलाकार भारतीय सिनेमा को मनोरंजन के साथ-साथ समाज में बदलाव लाने के उद्देश्य को लेकर भी काम किया करते थे जिससे समाज के लोग उनसे प्रभावित एवं प्रेरित होकर अपने जीवन में उन विचारों को अपनाते थे।

भारत की पहली  फ़िल्मराजा हरिश्चंद्रबनी जो कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटक पर ही आधारित है। जबराजा हरिश्चंद्र फ़िल्म भारत में बनी तब उस फ़िल्म को देखने के लिए हज़ारों लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी। ऐसी बहुत कम फ़िल्में होगी जोराजा हरिश्चंद्र की तरह सुर्खियों में रही हों। आज़ादी से पूर्व बनी फ़िल्में समाज में लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ समाज में एक सुधारात्मक संदेश भी देती थीं। समाज में सिनेमा का बोलबाला था। जैसा अभिनेता और अभिनेत्री अभिनय करते थे उसे समाज अपने जीवन में चरितार्थ करता था। स्वतंत्रता के बाद साठोत्तरी काल तक इस प्रकार की फ़िल्में जिनमें मनोरंजन की प्रधानता है काफी संख्या में बनने लगी। 1944 से 1960 तक के समय को भारतीय फ़िल्म के इतिहासकारों ने इसे भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग की संज्ञा तक दी है। इसके बाद हिन्दी सिनेमा अपने पतन की नींव रखने लगा था। संजय सहाय अपने एक लेखसिनेमा की बात में कहते हैं किसाठ का दशक बीतते-बीतते नई पीढ़ी के निर्देशक हिंदी सिनेमा को बदलने के लिए छटपटा रहे थे। वैभवशाली सिनेमा का युग समाप्त हो चला था और सपनों की राख में भारतीय नव-यथार्थवाद का जन्म हो रहा था।” (1)

स्वतंत्रता के बाद की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की अगर बात करें तो मदर इंडिया, मुगल--आज़म, भारत माता, आवारा, श्री 420, फूल और पत्थर, शोले, मुकद्दर का सिकन्दर, राम तेरी गंगा मैली, हम आपके हैं कौन, कुछ कुछ होता है, गदर आदि ऐसी कई फ़िल्में हैं जो भारतीय सिनेमा में सर्वश्रेष्ठ रही है और इन फ़िल्मों से लाखों करोड़ों रुपयों की कमाई हुई है।

इसके पश्चात् हिन्दी सिनेमा अपने उद्देश्य से भटकता गया। वह बदलाव के लिए छटपटा रहा था। सामाजिक मान मर्यादाएँ क्षीण होने लगी। सिनेमा में वासनाओं की गंध आने लगी। फ़िल्म निर्माता तथा अभिनेता और अभिनेत्री अपने आप को निम्न स्तर पर ले जाकर धनार्जन करने में लगे रहे। ऐसी स्थिति में हिन्दी सिनेमा पूर्ण रूप से सामाजिक उद्देश्य, सामाजिक उत्तरदायित्व से भटक चुका था। संजय सहाय कहते हैं किसिनेमा में रुपयों की बारिश और अपरिपक्व दर्शकों की भीड़ ने गिद्धों को भी दावत दी मुख्यधारा के अधिकतर निर्माता-वितरक धनपशुओं की तरह सिर्फ़ चरने के लिए इस मैदान में आने लगे। जिनका साहित्य, कला-संस्कृति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। समझदारी के अभाव में एक के बाद एक हॉलीवुड की चालू धमाकेदार फ़िल्मों की पैरोडियाँ-सी बनने लगीं, चलने लगीं। नक्कालों के दिन गए थे।”(2)

 मन्नू भंडारी भी भारतीय सिनेमा के गिरते स्तर के बारे टिप्पणी करती है। अपने एक साक्षात्कार में ओमा शर्मा द्वारा पूछे गए प्रश्न आपको फ़िल्में देखना अच्छा लगता है? आपकी प्रिय फ़िल्में कौन सी हैं?”(3) के जवाब में मन्नू कहती हैं किपहले तो फिर भी कभी-कभार देख लेती थी मगर अब तो बंद ही है। आंखों की भी तकलीफ रही है। पहले की फ़िल्में आज भी अच्छी लगती हैं मगर आज तो ज़्यादातर कूड़ा ही रहा है। 'रेनकोट' मुझे बहुत अच्छी लगी थी।”(4) यहाँ मन्नू भंडारी स्वयं स्वीकार करती है कि अब तो ज़्यादातर कूड़ा ही रहा है इसका तात्पर्य है कि हिन्दी सिनेमा का स्तर कुछ गिरा ज़रूर है इनमें वो बात नहीं रही जो पहले की फ़िल्मों में हुआ करती थी।

 हालांकि इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय सिनेमा में अच्छी फ़िल्में बनी ही नहीं। अच्छा कार्य भी बहुत कुछ हुआ है लेकिन भारतीय सिनेमा भी आधुनिकता की चपेट में जाने से सिनेमा पर इसका असर स्पष्ट दिखाई देता है। 70-80 के दशक में कई तरह की विषय-वस्तु एवं कई तरह की शैलियों के प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। जिनमें एक्शन, रहस्यमयी, थ्रिलर, कॉमेडी एवं रोमांटिक शैलियाँ शामिल हैं। इन शैलियों में एक से बढ़कर एक फ़िल्में हमें देखने को मिलती है। जो दर्शकों में काफी लोकप्रिय साबित हुई।

यहाँ एक बात ओर ध्यातव्य है कि जब हंस पत्रिका के फ़रवरी 2013 के विशेषांकहिन्दी सिनेमा के सौ सालमें अतीत की नहीं भविष्य की सोचिए शीर्षक से एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ। प्रसिद्ध फ़िल्मकार गोविंद निहलानी का अनवर जमाल द्वारा साक्षात्कार लिया गया उसमें अनवर जी के प्रश्नगोविन्दजी आप से पहला सवाल यह कि एक सदी बीत गई है और उस संदर्भ में भारतीय सिनेमा आज कहाँ है?” (5) के जवाब में गोविन्द निहलानी कहते हैं किमैं यह समझता हूँ कि उसमें एक ख़ास तरह का विकास हुआ है। जब बात एक सदी की होती है तो लोग यह क्यों सोचते हैं कि सौ साल पहले क्या हुआ था, मैं यह सोचता हूं कि सौ साल बाद क्या होगा और उसमें एक कल्पनाशीलता होनी चाहिए। ‘80 के दशक का सिनेमाया ‘70 के दशक का सिनेमाजैसे विशेषण हमारे अपने एक मापदंड की वजह से हैं। कल सिनेमा जो था वह उस समय की ज़रूरत थी। वो उस समय से निकलकर आया है जिसमें एनएफडीसी और आप जैसे लोग शामिल थे। क्या यह मान लिया जाए कि वह सिनेमा ही सर्वश्रेष्ठ था और वह ख़त्म हो गया है और हम नॉस्टेल्जिया में चले जाएं। (6)

इस प्रकार जब भी कोई साहित्य या सिनेमा पर काम होता है वह उस समय की मांग को दृष्टिगत रखते हुए ही किया जाता है इसलिए हमें उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।

21 सदीं की शुरुआत के बाद तो हिन्दी सिनेमा उत्तरोत्तर विकास की सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। धार्मिक एवं पौराणिक कथाओं से जब भारतीय सिनेमा ने शुरुआत की थी इसके बाद तो भारतीय सिनेमा आधुनिक बाजारवादी सिनेमा तक पहुँचते-पहुँचते कई बदलाव दृष्टिगत होते आए हैं। तमिल, तेलगु, कन्नड़, मराठी एवं मलयालम सिनेमा में भी एक से बढ़कर एक फ़िल्में बनाई जा चुकी है। इस प्रकार भारतीय सिनेमा उत्तरोत्तर विकास की राह पर चलता गया।

साहित्यिक कृतियों पर कई फ़िल्में बनी होगी लेकिन अधिकांश फ़िल्मों का ऐसा हाल हुआ कि मुंबईया फ़िल्मकार हिन्दी साहित्य की कृतियों पर फ़िल्म बनाने से परहेज़ करते रहे। बाद में मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों की धूम मची। इनकी कहानियों और उपन्यासों पर भी फ़िल्में बनना शुरू हुई। गोदान, गबन, सेवासदन, सद्गति, शतरंज के खिलाड़ी, गुल्ली-डंडा आदि कहानियों एवं उपन्यासों पर फ़िल्में बनी हैं। यद्यपि प्रेमचंद की कहानियों पर फ़िल्में बनाना आसान काम नहीं है

प्रेमचंद किसान जीवन से जुड़े हुए थे इसलिए उनके रचना संसार का सामाजिक एवं पारिवारिक स्वरूप अधिकतर गाँवों से संबंधित होता हैअतः इनके कथा-साहित्य में गाँव के वातावरण का चित्रण देखने को मिलता है। प्रेमचंद ने गाँव के लोगों की जो सामाजिक एवं पारिवारिक समस्याएँ होती हैं उनको उठाने का प्रयास ज़रूर किया है लेकिन उनका समाधान बहुत कम रचनाओं में देखने को मिलता है। हंस पत्रिका के फ़रवरी, 2013 के विशेषांक हिन्दी सिनेमा के सौ साल में तत्याना षुर्लेई अपने लेखसमाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया में कहती हैं किराय की फ़िल्म और प्रेमचंद की कहानी में असाधारण अनुकूलता है जो थोड़ी-सी आश्चर्यजनक है। प्रेमचंद भारत के बहुत लोकप्रिय लेखक हैं। उनकी कहानियों के आधार पर फ़िल्म बनाना आसान बात नहीं है क्योंकि वह आमतौर पर सामाजिक दोषों के बारे में लिखते थे, लेकिन समाधान नहीं बताते थे। ऐसी कहानी व्यावसायिक फ़िल्मों के लिए ज़्यादा अच्छा विषय नहीं कहीं जा सकती, क्योंकि उन फ़िल्मों को स्पष्ट समाधान चाहिए। कुछ ऐसा जिसमें नायक द्वारा खलनायक का वध कर दिया जाता हो। (7) इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रेमचंद की कहानियों पर फ़िल्में बनाना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन फिर भी फ़िल्मकारों ने इस दिशा में प्रयास किया है।

अन्य कई साहित्यकारों के साहित्य पर भी फ़िल्में बनाई जा चुकी है जिनमें भीष्म साहनी के उपन्यासतमस पर दीपा मेहता के निर्देशन में 1998 में ‘1947 का अर्थ नाम से, कृष्णा सोबती के उपन्यासजिंदगीनामा परट्रेन टू पाकिस्तान नाम से, धर्मवीर भारती केगुनाहों का देवता एवंसूरज का सातवां घोड़ा उपन्यासों पर क्रमशः कवल शर्मा एवं श्याम बेनेगल के निर्देशन में 1990 एवं 1992 में इन्हीं नामों से फ़िल्म बनी तथा कमलेश्वर केपति पत्नी और वो, ‘एक सड़क सत्तावन गलियाँ एवं डाक बंगलाउपन्यासों पर क्रमश: 1978 में बीआर चोपड़ा के निर्देशन मेंपति पत्नी और वो, 1971 में प्रेम कपूर के निर्देशन में बदनाम बस्तीएवं 1974 में गिरीश रंजन के निर्देशन मेंडाक बंगलाके नाम से फ़िल्में बनी। अभी हाल ही कुछ वर्ष पहले 2018 में काशीनाथ सिंह केकाशी का अस्सीउपन्यास पर चन्द्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन मेंमोहल्ला अस्सी नाम से भी फ़िल्म का प्रकाशन हुआ था। इस प्रकार हिन्दी साहित्य में कई उपन्यासों पर फ़िल्में बनाई गई है।

कहानियों की बात करें तो प्रेमचंद की बात हम पूर्व में कर ही चुके हैं। इनके अलावा भी फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुल्फाम पर 1966 में बासु भट्टाचार्य के निर्देशन मेंतीसरी कसम नाम से, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी कीउसने कहा थाकहानी पर 1960 में मोनी भट्टाचार्य के निर्देशन में इसी नाम से फ़िल्म बनी, मन्नू भंडारी कीयही सच हैकहानी पर 1974 में बासु चटर्जी के निर्देशन में रजनीगंधा नाम से फ़िल्में बनी हैं।

इनके अलावा भी कमलेश्वर, मोहन राकेश, मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा, विजयदान देथा आदि कई साहित्यकारों की कहानियों एवं उपन्यासों पर भी कई फ़िल्में बनी हैं।

मन्नू भंडारी का सिनेमा तथा पटकथा लेखन-

किसी भी फ़िल्म के लिए किसी लेखक द्वारा तैयार किया गया कच्चा चिट्ठा पटकथा कहलाती है। पटकथा मूल रूप से भी लिखी जा सकती है और किसी कहानी, उपन्यास आदि के लिए भी लिखी जा सकती है। पटकथा में संवाद मुख्य कड़ी होते हैं। इसमें किसी घटना एवं दृश्यों को संवाद के माध्यम से क्रमबद्ध तरीके से चित्रित किया जाता है।

सिनेमा पटकथा हो या साहित्य की कोई विधा किसी भी विषय पर लिखना इतना आसान नहीं होता है लिखने से पूर्व उसे पूर्णतः आत्मसात करना पड़ता है एवं प्रत्येक का लिखने का क्षेत्र अलग-अलग होता है। मनोहर श्याम जोशी कहते हैं किकुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि जिसे लिखना आता है वह कुछ भी लिख सकता है लेकिन यह सच नहीं है। हर विधा की, हर माध्यम की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ होती हैं और उनके लिए लिख सकने के लिए अलग-अलग तरह की योग्यताएँ दरकार होती हैं। उदाहरण के लिए, पत्रकार से यह आशा की जाती है कि वह यथार्थ का कम-से-कम शब्दों में ज्यों-का-त्यों वर्णन करेगा और अपनी कल्पना से कोई काम नहीं लेगा। दूसरी ओर कहानीकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी कल्पना के सहारे यथार्थ को एक यादगार रंग देकर साहित्य के स्तर पर पहुँचा देगा।” (8)

मन्नू भंडारी ने साहित्य और सिनेमा को नजदीक लाने के लिए बेहतरीन प्रयास किए हैं। मन्नू को हिन्दी फ़िल्मों पर लिखी गई कहानियों और उपन्यासों के अलावा हिन्दी पटकथाओं के लिए भी विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। डॉ. ज्योतिष जोशी कहते हैं किहिंदी में दृश्य माध्यमों के लिए पटकथा लेखन की परंपरा कोई बहुत पुरानी नहीं है, पर आज यह एक सुपरिचित विधा और तीव्र संप्रेषणीय शिल्प के रूप में स्थापित हो गई है। पटकथा लेखन को हिंदी में प्रतिष्ठित करने और उसे लोकप्रिय कराने वालों में जिन लोगों का सर्वाधिक महत्त्व है, उनमें मन्नू भंडारी का नाम अग्रिम पंक्ति में है।” (9) साहित्य और सिनेमा का सह-संबंध स्थापित कर मन्नू ने मुख्यतः चार पटकथाएँ लिखी है-

 1. रजनी 2. निर्मला 3. स्वामी 4. दर्पण

हम जानते है कि किसी भी नाटक, सिनेमा एवं पटकथा आदि को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाने में उनके संवाद की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। संवाद एक ऐसी कला है जो पाठक वर्ग एवं श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर पूर्णतया बाँधे रखती है। संवाद के माध्यम से ही किसी कथावस्तु को नाटकीय ढंग से अभिनय करते हुए प्रेषित किया जाता है। मन्नू भंडारी ने अपनी पटकथाओं में संवाद को इतनी सरलता से लिखा है कि ये श्रोताओं को आसानी से समझ में जाते हैं।

मन्नू भंडारी कीयही सच है, ‘एखाने आकाश नाईं कहानियों के साथ-साथआपका बंटी उपन्यास पर भी फ़िल्म का निर्माण हुआ है।यही सच है कहानी पर 1974 . में रजनीगंधा, एखाने आकाश नाईंकहानी पर 1979 . मेंजीना यहाँतथाआपका बंटी उपन्यास पर 1986 . में समय की धारा नामक फ़िल्मों का निर्माण हुआ।

रजनीगंधा (1974)

मन्नू जी की कहानीयही सच हैपर 1974 . में बासु चटर्जी द्वारारजनीगंधा नाम से फ़िल्म बनाई गई।यही सच हैकहानी में मुख्यतः मध्यवर्गीय महिला के त्रिकोणीय प्रेम के द्वंद्व को दर्शाया गया है। यह नायिका प्रधान कहानी है जिसकी मुख्य नायिका दीपा है। इस फ़िल्म में विद्या सिन्हा, अमोल पालेकर और दिनेश ठाकुर अभिनय की मुख्य भूमिका में थे। इस फ़िल्म में नायिका दीपा का अभिनय विद्या सिन्हा द्वारा किया जाता है। मध्यवर्गीय महिला के त्रिकोणीय प्रेम पर आधारित इस कहानी में प्रेम के द्वंद्व में संघर्ष करती हुई महिलाओं की स्थिति को पारदर्शी एवं संवेदनात्मक तरीके से उजागर किया गया हैं।

इस फ़िल्म की कहानी में घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रुप से मुक्त दो पुरुषों संजय एवं निशीथ के प्रेम में पूर्णतः डूबी हुई स्त्री दीपा के मन के द्वंद्व, ऊहापोह को अभिव्यक्त करती मन्नू जी की यह कहानी स्त्री मनोविज्ञान को बारीकी से सामने लाने का काम करती है। आज भी यह फ़िल्म या कहानी सामाजिक महिलाओं के प्रेम के द्वंद्व की वास्तविककता का आईना दिखाने का कार्य कर रही है।

कहानी में 21 वीं की सदी की महिला का प्रतिरूप दिखाई देता है जो सभी सामाजिक एवं पारिवारिक बंधनों से मुक्त रहना चाहती है। वह किसी भी तरह से अपने आप को आज़ाद रहने देना चाहती है।यही सच हैकहानी की नायिका दीपा अपने आप से कहती हैं किये मिसेज मेहता भी एक ही हैं। यों तो महीनों शायद मेरी सूरत नहीं देखती; पर बच्ची को जब-तब मेरा सिर खाने को भेज देती हैं। मेहता साहब तो फिर भी कभी-कभी आठ-दस दिन में खैरियत पूछ ही लेते हैं, पर वे तो बेहद अकडू मालूम होती हैं। .... अच्छा ही है, ज़्यादा दिलचस्पी दिखाती तो क्या मैं इतनी आज़ादी से घूम-फिर सकती थी?”(10)

इस फ़िल्म की प्रशंसा में हंस पत्रिका के जनवरी, 2022 के विशेषांक (मन्नू भंडारी की स्मृति विशेष पर) में प्रकाशित दिनेश श्रीनेत के एक लेखबासु चटर्जी के सिनेमा में मन्नू भंडारी की नई स्त्रीमें दिनेश श्रीनेत कहते हैं किरजनीगंधा फ़िल्म की कहानी जिस तरह से एक स्त्री के मनोभावों में उमड़ती-घुमड़ती आगे बढ़ती है, वह हिंदी सिनेमा के लिए दुर्लभ था। इस दौर की बहुत बोल्ड या रेडिकल फेमिनिस्ट फ़िल्मों में भी स्त्री को इतना सहज और स्पष्ट नहीं दिखाया गया है। राजकपूर की संगमजैसी फ़िल्म में दो नायक यह तय करना चाहते हैं कि नायिका किससे प्रेम करें, मगर रजनीगंधामें यह फैसला नायिका पर छोड़ दिया गया है। उसके सामने दोनों ही राहें खुली हुई है।(11)

जीनां यहाँ (1979)

एखाने आकाश नाईमन्नू जी की एक लोकप्रिय कहानी मानी जाती है जिस पर 1979 में बासु चटर्जी के निर्देशन में जीनां यहाँनाम से फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म में शेखर कपूर, शबाना आज़मी, दीना पाठक, अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा सहित कई कलाकारों ने अभिनय किया था।

 इस कहानी में संयुक्त परिवार के बदलते हुए सामाजिक ढ़ांचे का यथार्थबोध विधमान है। मन्नू भंडारी ने इस कहानी एखाने आकाश नाईकी एक पात्रचाची के माध्यम से संयुक्त परिवार की त्रासदी, वेदना को रेखांकित किया गया है। कहानी में मन्नू भंडारी चाची पात्र के माध्यम से कहलवाती है किजब अपना आदमी ही नहीं पूछे, तो दूसरों को क्या दोष दूँ। तुम्हारी तरह पढ़ी-लिखी होती तो मैं कमाकर खा लेती। तुम्हें तो याद होगा, तुम शादी होकर आई थी तब कैसी दिखती थी गौरा अब देख लो कैसी हो गई हो (12)

इस कहानी में ग्रामीण एवं शहरी परिवेश के असंतोष को व्यक्त किया गया है। जब कहानी की नायिकालेखाशहरी-संस्कृति के जीवन से उबकर, परेशान होकर सुकून की तलाश में गाँव आती है तो वहाँ संयुक्त परिवार में व्याप्त विसंगतियों से ऊबकर पुनः शहर की यादों में ही खोने लग जाती है।एखाने आकाश नाई कहानी की एक अन्य पात्र सुषमाभी संयुक्त परिवार की विसंगतियों की शिकार हो जाती हैसुषमा संयुक्त परिवार में पैसा कमाने वाली लड़की है। सुषमा का परिवार केवल इसलिए उसका विवाह नहीं करता है क्योंकि उसके विवाह के बाद ससुराल जाने पर माता-पिता की आमदनी बंद हो जाएगी। कहानी में सुषमा अपनी पसंद से विवाह करना चाहती है लेकिन घरवाले उसका बिलकुल भी साथ नहीं देते हैं। सुषमा के दुःख का एहसास हम इस कथन से लगा सकते हैं जब सुषमा कहती हैंपिछले तीन साल से मैं केवल घरवालों के लिए मर खप रही हूँ।…. पर इन लोगों से इतना भी नहीं होता कि मेरी हँसी-ख़ुशी में भी साथ दें। (13)

 फ़िल्म में बताया गया यह विषय बिलकुल नया एवं पारिवारिक यथार्थबोध का है जिसमें परिवार ख़ुद के स्वार्थ के लिए बेटी का विवाह ही नहीं करवाना चाहता है। फ़िल्म में आज के यन्त्रवत जीवन में व्याप्त अशांति, अकेलेपन, घुटन को समाज के सामने लाने का कार्य किया गया है। इस कहानी की संपूर्ण विषय-वस्तु को फ़िल्म में बहुत ही बेहतरीन तरीक़े से चित्रित किया गया है। किसी भी साहित्यिक कृति पर इस प्रकार फ़िल्म बनना गर्व की बात है। दिनेश श्रीनेत कहते हैं किइस फ़िल्म में हमें ’70 के दशक में रूढ़ियों को तोड़ रहे आत्मनिर्भर युवाओं की कहानी देखने को मिलती है, जिनके लिए अपना कैरियर और अपना जीवन साथी चुनना ही सबसे बड़ा संघर्ष है। (14)

समय की धारा (1986)

हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाला उपन्यासआपका बंटी मन्नू भंडारी का अत्यंत लोकप्रिय एवं चर्चित उपन्यास है। यह उपन्यास हिन्दी साहित्य में उपन्यासों के इतिहास में मील का पत्थर माने जाने वाला उपन्यास है। इसकी लोकप्रियता आज भी इतनी अधिक है कि केवल इस उपन्यास को लेकर कितने ही शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं एवं अभी तक इस पर शोध कार्य एवं आलोचनात्मक कार्य हो रहे हैं। इस उपन्यास पर 1986 . में शिशिर मिश्रा के निर्देशन में समय की धारा नाम से फ़िल्म का निर्माण किया गया। इस फ़िल्म में शबाना आज़मी, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद मेहरा तथा टीना मुनीम जैसे प्रसिद्ध कलाकारों ने अभिनय किया। इस फ़िल्म में तलाकशुदा दंपती की संतान के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को बताया गया है। उपन्यास के प्रमुख पात्र शकुन और अजय में पारस्परिक संबंधों में तनाव के चलते उनकी जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ने से रुक जाती है। बात इतनी बिगड़ जाती है कि दोनों में तलाक हो जाता है। इस तलाक का घातक प्रभाव पुत्र बंटीपर पड़ता है। गोपाल राय कहते हैं किमन्नू भण्डारी का 'आपका बंटी' इस नकली आधुनिकता से दूर आज के महानगरीय जीवन के एक पहलू की तीखी वास्तविकता का सही बोध कराने वाला उपन्यास है, जिसमें एक विशेष परिस्थिति में पले हुए बच्चे की मनःस्थिति का इतने व्यापक फलक पर चित्रण किया गया है।'(15)

साहित्यिक कहानियों को फ़िल्मों के लिए चयन करने पर कहानी को पटकथा में रूपांतरित करने हेतु एवं पटकथा को संवादों में परिवर्तित करने हेतु अलग-अलग व्यक्तियों की ज़रूरत होती है। इस कला में माहिर व्यक्तित्व वाले लोग पात्रों के माध्यम से अपने संवाद प्रेषित करते हैं। और आगे चलकर ये संवाद लोगों के दिलों-दिमाग़ की बात भी करने लगते हैं। इस उपन्यास की विषय-वस्तु को कुछ तोड़-मरोड़कर फ़िल्म में दिखाया गया जिससे मन्नू भंडारी आक्रोशित हो गई और उन्होंने फ़िल्म निर्माताओं के ख़िलाफ़ न्यायालय में शिकायत दर्ज करवाई। मन्नू भंडारी का कहना था कि फ़िल्म निर्माताओं ने मेरी अनुमति के बिना कहानी, शीर्षक, किरदार और उसके अंत को बदल दिया है। वास्तव में यह उपन्यास एक संवेदनशील बच्चे के मानस की खोज था जबकि फ़िल्म निर्माताओं ने इसे तलाक विरोधी कहानी के रूप में बदलकर फ़िल्म के अंत में बंटी की मौत होना बता दिया जाता है जबकि उपन्यास में ऐसा नहीं हैं।

सारांश यह है कि इस साहित्यिक उपन्यास आपका बंटी के द्वारा जो फ़िल्म का निर्माण हुआ है यह सराहनीय है। इसके द्वारा तलाकशुदा दंपती की संतानों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को समाज के सामने दिखाने से समाज इस विषय पर निश्चित रूप से समय-समय पर सोचने के लिए मजबूर होगा।

नाट्य कृति महाभोज (1979)

मन्नू भंडारी ने महाभोज नाटक को सर्वप्रथम उपन्यास रूप में लिखा था बाद में समय की माँग के अनुसार इन्होंने इसे नाटक रूप में पुनः लिखा। हिन्दी सिनेमा में या यूँ कहें कि नाट्य मंचन में यह नाटक हिन्दी की एक महत्त्वपूर्ण घटना कहीं जा सकती है जो राजनीति का एक छद्म रूप प्रस्तुत करती है। वर्षों से चली रही पर्दे की राजनीति का पर्दाफाश करने का काम इस नाटक ने किया है। यह नाटक राजनीति में मौजूद बेईमान एवं भ्रष्ट नेताओं पर एक करारा तंज़ कसता है। नाटक के प्रारंभ में दिखाए गए एक दृश्य जिसमें हरिजन टोले की सामूहिक हत्या कर दी जाती है इस पर मन्नू भंडारी का यह वक्तव्य दर्शकों एवं पाठकों को काफी विचार करने पर मजबूर कर देता है किजहाँ झोपड़ियाँ राख में बदल चुकी थीं और आदमी कबाब में।” (16)

महाभोज नाटक प्रकाशन से लेकर वर्तमान राजनीति तक का जीता-जागता उदाहरण प्रस्तुत करता है। वर्तमान में नेताओं द्वारा किस प्रकार वोटों की राजनीति की जा रही है इसे ये उपन्यास चरित्रार्थ करता है। जातिगत समीकरण किस प्रकार देश की राजनीति में हावी है, किस प्रकार भारतीय स्थानीय राजनीति का अनिवार्य अंग बन गये हैं ये इस नाट्य कृति की केन्द्रीय विषयवस्तु है। नाटक में मुख्यमंत्री का किरदार निभाने वाले पात्र दा साहब के माध्यम से मन्नू भंडारी कहलवाती हैं किदुहाई गरीबों की सब देते हैं, पर उनके हित की बात कोई नहीं सोचता। जनता को बाँटकर रखो कभी जात की दीवारें खींचकर, तो कभी वर्ग की दीवारें खींचकर। जनता का बँटा-बिखरापन ही तो स्वार्थी राजनेताओं की शक्ति का स्रोत है। कुछ ग़लत कह रहा हूँ मैं?” (17) ये कथन वर्तमान राजनीति एवं नेताओं के चरित्र का पर्दाफाश करने के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह उपन्यास शहर से ग्रामीण राजनीति की ओर प्रस्थान का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में गाँव के भोले-भाले लोगों का किस प्रकार से राजनीतिक फ़ायदा उठाकर उनके साथ छल किया जाता है इसे लेखिका ने बख़ूबी चित्रित करने का सफल प्रयास किया है। कई नाट्य मंडली द्वारा इसे बहुत ही अच्छा मंचन किया गया है।

रामविनोद सिंह इस नाट्य कृति की प्रशंसा करते हुए मन्नू भंडारी के बारे में कहते हैं किराष्ट्र के ज्वलन्त प्रश्नों को अनदेखा कर सकने की जागरूकता ने मन्नू भण्डारी सेमहाभोजकी सर्जना करायी है। जहाँ उन्होंने अपने अन्य उपन्यासों में शहरी जीवन की समस्याएँ उठायी हैं, वहीं महाभोजमें गाँव की धरती पर पाँव रखकर वहाँ की नारकीय स्थितियों का व्यापक चित्रण किया है। इसलिए शहर से गाँव की ओर उनके इस पदार्पण कोजोखिम भरा लेखनकी संज्ञा दी गयी है।”(18)

निष्कर्ष : इस प्रकार हिन्दी सिनेमा में मन्नू भंडारी का योगदान अविस्मरणीय है। विडंबना है कि मन्नू भंडारी के सिनेमा एवं पटकथा लेखन में जो योगदान है उन पर बहुत कम साहित्यकारों की दृष्टि गई है। इस विडंबना पर अजय ब्रह्मात्मज अपने विचार रखते हुए कहते हैं किसाहित्य और सिनेमा के विमर्शकार प्रेमचंद से लेकर नई हिंदीके लेखकों तक के रचनाकारों का ज़िक्र तो करते हैं लेकिन इस ज़िक्र में उनके पास मन्नू भंडारी के लिए जगह नहीं हैं। (19) जबकि मन्नू भंडारी साहित्य जगत् की एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं जिसने हिन्दी साहित्य के साथ साथ सिनेमा जगत् में भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। इस प्रकार मन्नू जी के सिनेमा तथा पटकथा लेखन संबंधी योगदान को भुलाया नहीं जा सकता जिसने रजनी, निर्मला, स्वामी और दर्पण जैसी महत्त्वपूर्ण पटकथाएँ लिखी हो एवं जिसकी कई रचनाओं पर फ़िल्मों का भी निर्माण हो चुका हो।


संदर्भ :
1. अतिथि संपादकीय सिनेमा की बात : संजय सहाय, फरवरी 2013, ‘हिन्दी सिनेमा के सौ वर्ष विशेषांक, हंस पत्रिका, अक्सर प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 05
2. वही, पृ. 06
3.  लिख पाने की तकलीफ बहुत सताती है- ओमा शर्मा से बातचीत, मेरे साक्षात्कार मन्नू भंडारी, संपादक सुशील सिद्धार्थ, किताबघर प्रकाशन नई दिल्ली, 2016, पृ. 44
4. वही, पृ. 44
5. अतीत की नहीं भविष्य की सोचिएगोविंद निहलानी से बातचीत, फरवरी 2013 हिन्दी सिनेमा के सौ वर्ष विशेषांक, हंस पत्रिका, अक्सर प्रकाशन नई दिल्ली, पृ.34
6. वही, पृ. 34
7. समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशियातत्याना षुर्लेई, फरवरी 2013, ‘हिन्दी सिनेमा के सौ वर्षविशेषांक, हंस पत्रिका, अक्सर प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 40
8. मनोहर श्याम जोशी - पटकथा लेखन एक परिचय, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली, 2016 पृ. 01
9. सुधा अरोड़ा (संपादक) - मन्नू भंडारी सृजन के शिखर, किताबघर प्रकाशन नई दिल्ली 2012, पृ. 276
10. मन्नू भंडारी, प्रतिनिधि कहानियां (यही सच है से), राजकमल प्रकाशन प्रा लि 2022 पृ. 10
11. बासु चटर्जी के सिनेमा में मन्नू भंडारी कीनई स्त्री’- दिनेश श्रीनेत, जनवरी 2022,स्मृति विशेष मन्नू भंडारीविशेषांक, हंस पत्रिका, अक्सर प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 134
12. मन्नू भंडारी, त्रिशंकु (एखाने आकाश नाईं कहानी से) पृ.185
13. वहीं, पृ.187
14. बासु चटर्जी के सिनेमा में मन्नू भंडारी कीनई स्त्री’- दिनेश श्रीनेत, जनवरी 2022 ‘स्मृति विशेष मन्नू भंडारीविशेषांक, हंस पत्रिका, अक्सर प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 136
15. गोपाल राय, समीक्षा, मई, 1971, पृ. 3
16. मन्नू भंडारी, महाभोज, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली, 1979 पृ. 7
17. वही, पृ. 43
18. रामविनोद सिंह- आठवें दशक के हिन्दी उपन्यास, पृ. 165
19. कथा से पटकथा तक प्रतिरोध का सफर- अजय ब्रह्मात्मज, जनवरी 2022, ‘स्मृति विशेष मन्नू भंडारीविशेषांक, हंस पत्रिका, अक्सर प्रकाशन नई दिल्ली, पृ.139
 
कैलाश चन्द्र खटीक
शोधार्थी (हिन्दीमानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग, ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालयजयपुर


चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-51, जनवरी-मार्च, 2024 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक-जितेन्द्र यादव छायाकार : डॉ. दीपक कुमार

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