सम्पादकीय : बातें बीते दिनों की (अंक-62) / माणिक

सम्पादकीय 
बातें बीते दिनों की (अंक-62) / माणिक      

(1)         पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सबसे ताज़ा स्मृति मुझे अजमेर में चौबीस-पच्चीस जनवरी को सम्पन्न लघु पत्रिका सम्पादक सम्मलेन की उभरती है। राजस्थान साहित्य अकादमी और रज़ा फाउंडेशन का इसमें बड़ा सहयोग रहा ऐसा बताया गया। दो हज़ार छब्बीस की इससे बढ़िया रचनात्मक शुरुआत नहीं हो सकती है। बहुत ही सुरुचिपूर्ण आयोजन। पूरी तरह से वैचारिक और गहन। युवा कवि और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सदैव तल्लीन अनन्त भटनागर भैया का आत्मीय बुलावा मुझे अजमेर लेता गया। एक दूजे के यहाँ बुलावे पर आना जाना ही जीवन और संस्कृति है। उनकी मंडली के आयोजन साथियों के बीच की आपसी रागात्मकता बड़ी प्रेरक अनुभव हुई। सबकुछ सहजता के साथ और सार्थकता लिए हुए। एक से एक बढ़िया सत्र-संचालन और सधी हुई भाषा में लिखे-पढ़े गए अभिनन्दन पत्र। 'अपनी माटी' की तरफ से मैंने दौसा से सम्पादन साथी विष्णु शर्मा को अपने स्तर पर न्यौत दिया। मित्रों में इतनी गुंजाइश हमेशा रहनी ही चाहिए कि हम अपने मन से किसी एक को अनौपचारिक होकर बुला सकें। वक्ताओं की सूची में सभी पहचान के थे तो रूचि और सुनने की भूख जग उठी। सुनने का सुख सबसे बड़ा सुख है। सुनना और कहना बहुत आसान कहाँ रह गया है अब? जानकारों और अनुभव सम्पन्न लोगों से मिल पाना किसी सपने के साक्षात् होने सरीखा है। सुनते समय उन्हीं से अतीत में सुना गया फिर से याद आने लगता है। संपादकों के नाम पर हेतु भारद्वाज जी और क़मर मेवाड़ी जी सहित कुल तीन वरिष्ठों को सम्मानित करना एक पुरानी पीढ़ी के श्रम और उनकी दृष्टि को फिर से रोशनी में देखना है। उनका समय और संघर्ष न्यारे ढंग का रहा होगा। हम तो बहुत सुविधाजीवी समय में सम्पादन करते रहे हैं इसलिए उस दौर का खाली अन्दाज़ाभर ही लगा सकेंगे।


(2)         दो दिन की इस चिंतन-यात्रा में कई सूत्र हाथ लगे जिन्हें मैं आपके बीच साझा करना पसंद करूंगा। ‘कथाक्रम’ के सम्पादक शैलेन्द्र सागर जी ने स्पष्टता से कहा कि “कोई भी पत्रिका अगर नई पीढ़ी के रचनाकार तैयार न कर सके तो यह उसकी बड़ी कमी है। पत्रिकाएँ व्यक्तिगत प्रयासों से चलें इसी में पत्रिका की वैचारिकी बची रहती है। विमर्शों को खड़ा करना भी एक मकसद होता है, वहीं दूजी तरफ लघु पत्रिकाओं की बहुत छोटे शहरों तक पहुँच में आती कठिनाई भी बाधा है।” सभी का कहा यहाँ रखने में असमर्थ हूँ। रखूंगा तो रिपोर्ट जैसा हो जाएगा। यह सब भी क्रम से नहीं है। ‘समयांतर’ के सम्पादक पंकज बिष्ट मंच के मुख्य वक्ता थे। अधिकाँश वक्ता पूरी तैयारी के साथ नोट्स बनाकर आए थे तो यह सब प्रेरणादायक लगा। बिष्ट जी ने कहा कि “साहित्य असल में कमिटमेंट का मसला है। इच्छाओं के बीच नौकरी बाधक रही इसलिए एक वक़्त के बाद नौकरी छोड़कर सम्पादन जैसा रुचिकर काम किया। वर्तमान की मुश्किल यह है कि प्रिंट माध्यम के पाठकों को इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने अधिगृहीत कर लिया है। उन्होंने भाषा के मुद्दे पर सूत्र दिया कि अगर हमें भारतीय भाषाओं की समृद्धि को बचाना है तो सामाजिक रूप से किसी भी विदेशी भाषा के इस्तेमाल से बचना होगा। भारतीय भाषाएँ इतनी समृद्ध हों कि हम किसी भी विदेशी भाषा का मुकाबला कर सकें।” यहाँ कई संदर्भ समझने में आपको कुछ कठिनाई हो सकती है मगर यह बातें एक-एक करके सूत्र रूप में सभी श्रोताओं को उपयोगी लगी। सोचना-विचारना वहाँ बहुत आसान रहा। उदयपुर वाले किशन दाधीच जी ने दो तथ्य रखे जो आँखें खोल गए कि “पत्रिकाएँ निकालने में बीकानेर के हरीश भादानी जी की हवेली बिक गयी तो अजमेर वाले प्रकाश जैन जी की तो जान तक चली गयी।“ लगभग सभी ने प्रकाश जी के साथ उनके निजी वृतांत बहुत संवेदनाओं के साथ सुनाए। असल में यह लघु पत्रिका सम्पादक सम्मलेन अजमेर से प्रकाशित ‘लहर’ पत्रिका के सम्पादक प्रकाश जैन के जन्मशताब्दी वर्ष के निमित्त स्मृतिपरक आयोजन था। 

(3)         उदयपुर से आए सदाशिव जी श्रोत्रिय ने भली बात कही कि “कोई भी सम्पादक असल में एक सुंदर दुनिया का सपना देखता है और वह सम्पादन के ज़रिए उसे साकार करने की यात्रा करता है।” सदाशिव जी से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। स्पिक मैके आन्दोलन में हमने लगभग एक दशक तक उनकी संगत की थी। मंच से हेतु भारद्वाज लगभग उस आयोजन के सबसे उम्रदराज़ व्यक्ति थे। नब्बे पार। उनके वक्तव्य में बेबाकी मुख्य स्वर रहता ही है। कहने लगे “पत्रिका निकालकर आपने कितने लेखक पैदा किए यह बताएं? उनका बताया तथ्य कि एक दौर था जब एक छोटे से गाँव पिपरिया से ही दो पत्रिकाएँ निकलती थीं ; ‘आकंठ’ और ‘तनाव’। यह अपने आप में मिसाल है।” राजाराम भादू जी ने लंबा पर्चा पढ़ा। सबकुछ हिंदी की पत्रिकाओं के इतिहास पर केन्द्रित था। मार्के की बात यह कही कि “वर्तमान दौर में परफोर्मिंग आर्ट का क्षेत्र तो लगभग सत्ता के साथ जा रहा है मगर प्रिंट माध्यम में साहित्य अब भी बहुलतावादी संस्कृति की तरफ ही है। यह सब बचे हुए सुख की मानिंद है।” कांकरोली वाले नरेन्द्र निर्मल जी अब रिटायर हो गए हैं। सीमेंट इंडस्ट्री में बड़े पद पर थे। शुरू से साहित्य अनुरागी रहे मगर अब काफी वक़्त पाकर कॉलेज जाते हैं। युवाओं के बीच संवाद की कोशिश करते हैं। घर की लाइब्रेरी से किताबें कॉलोनी में पढ़वाने की मुहीम में लगे हुए हैं। युवा विद्यार्थियों को अपने जेबखर्ची से कचोरी-समोसा खिलाकर उनके बीच चर्चा करते हैं। यह सब भी एक अनुभव की तरह वहाँ साझा हुआ। ‘धरती’ के सम्पादक शैलेन्द्र चौहान ने अपने लम्बे जीवन-अनुभव से कहा कि “आजकल की पत्रिकाएँ सर्वसमावेशी और पॉपुलर हो गयी हैं। सबकुछ छाप देना पत्रिका का काम नहीं है। संपादकों को लोकप्रियता से बचना चाहिए। ऐसे समय में जब व्यक्तिवाद चरम पर है, आत्मलोचन का अभ्यास ख़त्म हो गया है। आज का दौर अतीतोन्मुखी हो गया है।” अजमेर में हुई बातें मैं यहाँ नोट्सनुमा रख रहा हूँ जिनसे मेरी सहमति है। जितनी बातें मंच से हुई उससे कई गुना ज्यादा चाय की थड़ी और भोजन-अवकाश के दौरान संभव हुई। रातभर कमरों में रतजगे जो हैं, सो अलग ही हैं। ‘हंस’ की प्रबंध सम्पादक रचना यादव जी ने सामान्य से आरम्भ करके सत्र को जिस ऊंचाई तक लेकर छोड़ा बड़ा अच्छा लगा। सभी ने ‘वाह’ की मुद्रा में तालियाँ बजाई। बकौल रचना जी “वक़्त के साथ पत्रिकाएँ भी अपनी वैचारिकी बदलती हैं। सम्पादन का काम इतना मेहनत और समय माँगता है कि इसकी आड़ में सम्पादक का सृजनात्मक लेखन अक्सर ख़त्म हो जाता है। यह सब हमने अपने घर में देखा है। हर दौर में चुनौतियां उपस्थित रहती हैं। सामग्री के चयन की चुनौती हर वक़्त रही है। अभी एक तो महंगे प्रिंट की समस्या बड़ी है, वहीं दूजी तरफ फुल टाइम लेखक अब नहीं मिलते हैं; तो वैसा प्रतिबद्ध लेखन भी लगभग नदारद है। लेकिन साहित्य की ज़रूरत हमेशा रहेगी, इसके बिना समाज एकदम नीरस है। पिताजी ने तो वसीयत में ‘हंस’के उत्तराधिकारी के नाम पर मेरा नाम लिखा मगर मैंने स्पष्ट इनकार कर दिया कि इस काम में मेरी रूचि नहीं है। आप मेरा नाम हटा दीजिएगा। जब पिताजी नहीं रहे तो उन बारह दिनों में जाने क्या हुआ कि मेरा मन एकदम से बदल गया और मैंने तुरंत ‘हंस’ का कार्यालय ज्वाइन कर लिया। अभी भारी व्यस्तता के बीच भी समय निकालना मुझे अच्छा लगता है।” उदयपुर में ‘महावीर समता सन्देश‘ से जुड़े हेमेन्द्र चंडालिया जी का तंज़ की सोने पर तीन फीसदी जीएसटी है मगर कागज़ पर अठारह फीसदी। वैश्विक परिदृश्य पर उन्होंने बहुत विस्तार से बातें रखी मगर मुझे इतना ही याद रहा। वाकई पत्रिका को प्रिंट में निकालना और वितरित करना बड़ा श्रमसाध्य काम है।


(4)         साहित्यिक आयोजन में जाने का अपना चाव होता है। परिचितों से मिलने की उत्कंठा अपनी तरह से उमंग लिए होती है तो अपरिचितों के प्रति भी ख़ास तरह का आकर्षण बना रहता है। अपनी बात कहने के बाद ही श्रोता आपके बारे में एक ठीकठाक राय बना पाते हैं। कोई-कोई आपसे आयोजन में आगे होकर पहले ही मिलता है तो वह आपके पहनावे या फिर भिन्न व्यक्तित्व की झलक देखकर मिलता है। सभा-संगोष्ठी में आप दूजों से कैसे बतियाते हैं और कैसे आगे चलाकर प्रणाम करते हैं उससे भी काफी कुछ पता चलता है। रात्रि विश्राम में आपके साथ अगर किसी ने कमरा शेयर किया है तो आपसे खाली वक़्त में हुई बातचीत भी आपसे बारे में कुछ संकेत छोड़ती है। साथ में सिगरेट पीने या रात्रि में रसरंजन से भी मित्रता गाढ़ी होती है। सत्र समाप्ति के बाद आपका कहा हुआ ही आपकी अंत तक रक्षा करता है। कहने से पहले खूब तैयारी करनी चाहिए क्योंकि कहने के बाद कहे हुए की रक्षा में आपको ज्यादा मेहनत करनी होती है। सम्पादन बाद में संभव नहीं होता। मैंने अपनी बात अंतिम सत्र के लगभग अंत में रखी। कई नए साहित्यप्रेमी आकर मिले। इससे पहले अपनी माटी की स्टॉल से फोरी तौर पर परिचय हुआ था। आनंद तब बढ़ा हुआ महसूसा गया जब हमउम्र आ जुड़े। अपनी माटी मंडली के आठ साथी एक साथ वहीं मिल गए। लम्बे समय से अटकी हुई बैठकी वहीं संभव हुई। गोपाल भाई रेलवे स्टेशन पर लेने आ गया तो महेंद्र नंदकिशोर वापसी में रेलवे स्टेशन तक छोड़ गया। पयोद भैया ने अपने हाथों से ला-लाकर चाय के सकोरे हाथ में थमाए। वह स्नेह की डोर अटूट अनुभव हुई। जितेन्द्र थदानी घर से मिठाई ले आए। कई साथी पहली दफा आपस में मिले। मिलाप वाकई आनंद दे गया। दो दिन तक विशाल विक्रम जी से जो बतकही हुई सम्बन्ध और प्रगाढ़ ही हुआ। मुलाक़ात का कोई दूजा तोड़ नहीं है। कई वरिष्ठ लेखकों से दो साल पहले चित्तौड़गढ़ में सम्पन्न ‘संगमन’ के अवसर की स्मृतियाँ जुड़ी हुई थी तो संवाद में आसानी उतरती चली गयी। डिनर में राजेश चौधरी जी और प्रेमचंद गांधी जी से निर्बाध बातें हुई, वही आबाद कर गया। बातें जब मंच के अलावा जगहों पर निकलती हैं तो बहुत दूर तक नहीं जाती बस सीधे मन में बस जाती है। बतियाने में किसी तरह की सेंसरशिप नहीं रहती है। लाग-लपेट एकदम से गायब। अंदरूनी आंकड़े बाहर आने लगते हैं। किस्से कुलबुलाते हैं। रंग जमने लगता है तो नींद फुर्र हो जाती है। बड़ों की बातों में केवल सुननेभर का भी सुख बड़ा होता है। चाय-नास्ते और भोजन अवकाश के दौरान एक दूजे से सलाम-नमस्ते की अपनी यादें हैं। अपरिचितों से मुस्कराने का अपना रोमांच रहता है। नए और युवतर चेहरों को प्रभावित करने की मनोदशा भी अपनी तरह से गति करती ही है। मैंने देखा कि लगभग बुजुर्ग लेखकों और संपादकों के आसपास बहुत से प्रौढ़ मित्र उनकी सेवा में मगन दिखे। यही तहज़ीब है कि हम इसी बहाने उनसे बोल-बतिया सके। उम्र में बहुत आगे बढ़ चुके वे खुद भी एक दूजे से जिन ठहाकों के साथ कह-सुन रहे थे हमारे भीतर जिजीविषा को जगाने वाला था। बढ़िया समागम हमें हमेशा ही आयोजन के सूत्रधार के प्रति कृतज्ञता से भर देता है। शनिवार और रविवार के इन चालीस घंटों में मैंने देखा कि प्रकाश जैन जी के परिवारजन के मानस पर एक गहरी आश्वस्ती थी। सुकून और प्रसन्नता का अविच्छिन्न प्रवाह। अपने पिता के मुश्किल दौर की असीम स्मृतियों को बड़े जतन से फिर से देख सुनकर उसी में खो जाने का अवसर था उनके पास। प्रकाश जी की अप्रकाशित कविताओं का एक संग्रह भी छपकर आया ही था तो हम विमोचन के गवाह बने।


(5)         जयपुर से आए डॉ. सूरज पालीवाल जी ने अपने कहे में सुझाया कि “लघु पत्रिकाएँ विचार की ताकत है। कई बार रंगीन पत्रिकाएँ आपको मुद्दों से भटकाने में मदद करती हैं। सचेत रहने की ज़रूरत है। उन्होंने आगे जोड़ा कि अगर पत्रिकाएँ राजनीति पर चर्चा न करें तो फिर पत्रिकाएँ संचालित करने का कोई अर्थ नहीं। कुल जमा साहित्य और राजनीति को न्यारा नहीं किया जा सकता है।” इस तरह सभी बिंदु उपस्थितों के मानस में फिर से ताज़ा हुए। अपने किए जा रहे काम को रोशनी मिली। जारी यात्रा की पुनर्व्याख्या संभव हुई। विचारने को कई संकेत मिले। अलवर से आए जीवन सिंह जी के प्रति मेरे मन में अतिरिक्त श्रद्धाभाव था। उनकी सादगी और ज्ञान-समृद्धि के प्रति मेरा झुकाव शुरू से रहा। बड़ी साफगोई से उन्होंने अपनी बात रखी कि “सम्पादक लोग लगातार पत्रिकाएँ निकाल रहे हैं बस; न कि सम्पादन कर रहे हैं।” राजस्थान विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक आचार्य विशाल विक्रम जी ने कहा कि “लघु पत्रिका आन्दोलन  कमिटमेंट की चीज़ है। मुफ्त में पत्रिकाएँ मिल जाए, ऐसे मुफ्तीकरण से हमें बचना चाहिए। पूर्व के संपादकों की वैश्विक दृष्टि हमें आज भी आश्चर्य में डालती हैं जब वे न्यूनतम संसाधनों के दौर में कई भाषाओं में अनुवाद सामग्री तक संकलित कर रहे थे। सम्पादन में हमें भाषाई उपनिवेशवाद से बचना चाहिए इस तरफ भी उन्होंने संकेत किया। यह बड़ा संकेत था।” राजेश चौधरी जी ने अपने अध्यापन काल के वे अनुभव सुनाए जब उन्होंने विभिन्न गंभीर पत्रिकाओं के विशेष अंकों का जिक्र किया कि कैसे उन्होंने वहां से सामग्री लेकर विद्यार्थियों को पढ़ाया और उन्हें पत्रिकाओं से जोड़ा। जोड़ना बड़ी कला है। पाठ्यक्रम से इतर सामग्री संजोकर रखना और उन्हें तय समय पर संभाल के साथ परोसना भी दूरदर्शिता और समर्पण का काम है। पत्रिकाओं के प्रसार में महाविद्यालयी शिक्षा के अध्यापकों की महती भूमिका नज़र आती है।


(6)         आयोजन में मेरे सत्र का विषय था ‘लघु पत्रिकाएँ और नयी पीढ़ी’। कुछ बातें मैंने पंद्रह मिनट बोलकर रखी। स्मृति के आधार पर यहाँ साझा करता हूँ। एक तो सम्पादन मेहनत मांगने वाला काम है। जेल भले न जाएं, गहने भले गिरवी न रखे हो, ज़मीन न बेची हो, डिटेन भले न हुए हो, चर्चा में भले इतने न आ सके मगर वक़्त तो दिया है। परिवार के हिस्से का समय लगाया है। सम्पादन सीख रहे हैं। हाँ, थोड़े सुविधाजीवी सम्पादक हैं। साइकिल चलाकर पत्रिका के अंक वितरित नहीं किए। मुश्किल वक़्त में बेटी के गुल्लक को फोड़कर पत्रिका को बचाने का मौका नहीं मिला। आशा करता हूँ कि अवसरवादी और मौकापरस्ती का इल्जाम न लगे। बड़ों की सटीक टिप्पणियाँ मंथन के लिए पर्याप्त हैं। आगे मैंने कहा कि हमारे सम्पादन में ख़ासियत इसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। चालीस साथियों की मण्डली की सामूहिकता इसकी जान है। हार्ड प्रिंट वाली दिक्कतें हमें कम झेलनी पड़ी। अपनी माटी का ई-फॉर्म में छपना इसकी ताकत है। ‘बसेड़ा’ और ‘सामरी’ की लाइब्रेरी में मेरा अभियान और उसकी गहन अनुभूतियाँ पत्रिका संचालन में मदद करती रहीं। मित्रों का आर्थिक सहयोग बड़ा संबल रहा। अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन से मिलने वाली ‘चकमक’, ‘साइकिल’ और ‘प्लूटो’ से बड़ा सहारा मिला। संस्थाएं अगमचारी होकर किसी अभियान को अपनाती हैं तो काम में तेज़ी आना सहज है। चित्तौड़ शहर में दो बुक स्टॉल थे अब दोनों बंद हैं। अफ़सोस एक रोडवेज स्टेंड पर था तो किराए के बोझ तले चलना एक दिन असंभव हो गया। दूजा रेलवे स्टेशन पर अग्रवाल जी का था जो धीरे-धीरे किराने की दूकान में बदलता हुआ बंद ही हो गया। मेरे घर ‘वागर्थ’ और ‘अकार’ आती हैं। मित्रों के घर भी एकाध पत्रिका आती है। आई हुई में से पढ़ कितना पाते हैं संशय है। अधिकांश समय रील्स और शॉर्ट्स खा जाते हैं। कोई भी इनकी गिरफ्त से बच नहीं पा रहा है। 'अकार' में प्रियंवद जी का संपादकीय पढ़ जाना उपलब्धि लगता है। नयी पीढ़ी भी हर मोर्चे पर न्यारी दिखती है। नेपाल की जेन-जी पीढ़ी का आन्दोलन देखें या विश्व पुस्तक मेले में नई दिल्ली में  किताबें खरीदते प्रसन्नमना युवाओं को। उधर द्वि-अर्थी गीतों पर डीजे बजाते युवा देखें या वेब-सीरीज में लहालोट युवतर मन। सभी युवाओं को एक सरीखी टिप्पणी से विदा या तारीफ़ में नहीं बाँध सकते हैं। व्यक्तिवादी होने के दौर में समाज, समूह और संस्कृति की चिंता करने वाले युवा कहाँ हैं? एक अनुत्तरित प्रश्न है। कइयों को तो वैचारिकता की ज़रूरत भी नहीं है। शब्द विरोधी, विचार विरोधी और विवेक विरोधी वक़्त में नई पीढ़ी से बहुत आशाएं हैं। मझले शहरों में भी गोष्ठियां ख़त्म हो रही हैं। साहित्यिक सभाएं अब केवल सांस्कृतिक संस्थानों तक सिमट गयी हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी पत्रिकाएँ पढ़ने के बजाय उनके नाम, सम्पादक के नाम और प्रकाशन स्थल का नाम रट रहे हैं। लघु पत्रिकाओं को युवाओं की फ्रीक्वेंसी पर जाना होगा। पीडीऍफ़ और रील्स के माध्यम से पहुँच बनानी होगी। इन्स्टा वाली पीढ़ी को छपे हुए शब्दों तक लाना मुश्किल मगर असंभव काम नहीं है। डिजिटल युग में जब नॉटनल जैसी वेबसाईट बढ़िया काम कर रही है तो इस मुहीम को आगे बढ़ाया जा सकता है। स्थापित प्रिंट पत्रिकाओं को अपने डिजिटल संस्करण निकालने होंगे। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग है तो कुछ कदम हमें भी आगे आना होगा। भविष्य बुला रहा है। ससीम को असीम आकाश का बुलावा है। इंटरनेट के समय में गगन चूमना आसान हो गया है। दृष्टिकोण बदलाव मांग रहा है। यही कुछ कहा जिसे बढ़िया से सुना गया यही तसल्ली है।


(7)         यह अंक कई नए रचनाकारों को आपसे परिचित करवाएगा। इस अंक से अब हमारी साथी संतोष विश्नोई ने एक नयी पुस्तक की समीक्षा लेकर हर बार आएंगी ऐसा उनका वादा है। इस बार युवा और ज़रूरी कवि पराग पावन का कविता संग्रह प्रकाश में आया है। वरिष्ठ कवि राज कुमार कुम्भज की कविताएँ अंक में वजन बढ़ा रही हैं। ‘लहर’ के सम्पादक प्रकाश जैन को हेमंत शेष और अनंत भटनागर जन्मशताब्दी के बहाने याद कर रहे हैं जो बहुत ही आत्मीय है। वरिष्ठ कवि और कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को पूनम वासम ने बहुत स्नेह और आदर से याद किया है। ‘चीकू के बीज’ कॉलम लम्बे समय बाद फिर आया है। हाँ, हेमंत भाई के संस्मरण, नीरज भाई की वैज्ञानिक किस्सागोई, विष्णु भाई और डॉ. सत्यनारायण व्यास की डायरी नियमित हैं। सिद्धार्थ शंकर राय और प्रियंवद से साक्षात्कार अंक का मान बढ़ाएंगे ऐसी हमारा मानना है, बाकी आप बताइएगा। युवा शोधार्थी योगेश शर्मा ने हर अंक में एक बातचीत का वादा किया है। शोध आलेखों में विविधता इस बार भी जिंदाबाद रही है। आप विषय और लेखक देखेंगे तो पाएंगे कि लगभग सभी लेखक नए हैं।


(8)         यह अंक हम हमारी साथी शेरिल गुप्ता को समर्पित कर रहे हैं। वह बहुत ही होनहार और मेहनती युवा थीं। बीते दिनों मामूली बुखार के बाद हार्ट अटैक के कारण नहीं रही। जयपुर की वासी थी। हमारा मिलना कभी नहीं हुआ मगर बीते डेढ़ साल से पत्रिका के लिए प्रूफ रीडिंग से लेकर पोर्टल मैनेजमेंट और पोस्टर डिजायन का कलात्मक काम किया। हमारे दृश्यकला विशेषांक को लाने में भी काफी मदद की थी। राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से पीएचडी करने के बाद जल्दी ही वह राजस्थान लोक सेवा आयोग से चयनित होकर उच्च शिक्षा में सहायक आचार्य बनने वाली थी। शेरिल के असमय चले जाने का दुःख सभी को है। इसी बीच जानेमाने सम्पादक ज्ञानरंजन जी, वरिष्ठ लेखक वीरेन्द्र यादव और कवि-प्रोफेसर राजेंद्र कुमार जी के देहावसान पर भी अपनी माटी परिवार गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता है। तीनों जानकार और मिशनरी व्यक्ति थे। उनकी जनपक्षधरता सर्वविदित है। आगामी अंकों में हम उन्हें ठीक से स्मरण करेंगे। अरे हाँ, लोकप्रिय कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को भी हम याद करना चाहते हैं जिन्होंने लम्बी साहित्य साधना और बढ़िया उम्र जी करके इस दुनिया को अलविदा कहा। अब अंक आपके लिए प्रस्तुत है।

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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