मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मध्यवर्गीय महिला
- कैलाश चन्द्र खटीक एवं रामकृष्ण शर्मा
मध्यवर्गीय महिलाओं की स्थिति भारतीय समाज में बहुत ही ह्रदय विदारक रही। सामाजिक मान-मर्यादाओं के नाम पर महिलाओं के साथ अन्याय होता आया है। उनके मानसिक शोषण के साथ-साथ शारीरिक शोषण भी प्रचुर मात्रा में होता रहा है। महिलाएं आजादी के बाद भी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत है। हालांकि आधुनिक युग में इन परिस्थितियों में परिवर्तन भी देखा गया है किन्तु कहीं-न-कहीं आज भी महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए में वो परिवर्तन नहीं हो पाया है जो होना चाहिए था। इसलिए आज भी इस संवेदनशील विषय पर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता महसूस होती है। मध्यवर्गीय महिला को अब सभी स्तरों से स्वतंत्रता दिलाने की जरूरत है।
बीज शब्द : मध्यवर्गीय महिला, सामाजिक संघर्ष, पारिवारिक चुनौतियाँ, नारी मन, समाज एवं समस्याएँ, समकालीन समाज, नारी मुक्ति।
मूल आलेख : मानव जीवन ईश्वर की अमूल्य निधि है। इसकी सार्थकता तभी है जब हम इस अमूल्य जीवन में कुछ ऐसा अविस्मरणीय कार्य कर जाएँ जिसे दुनिया युगों-युगों तक याद करती रहे। चौरासी लाख योनियों में इस मानव जीवन को सर्वोत्तम बताया गया है। अतः हमें जीवन के विभिन्न तथ्यों पर विचार-विमर्श कर आगे कदम बढ़ाते हुए प्रत्येक प्राणी का कल्याण करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। संसार में प्रत्येक व्यक्ति एवं वर्ग की जीवन दृष्टि भिन्न होती है। वह जीवन को अपने ही दृष्टिकोण से देखने एवं समझने के लिए प्रयत्नशील रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में आशानुरूप उन्नति कर सके जिसके वे अधिकारी हैं। तभी देश एवं समाज की उन्नति संभव है।
अतः समकालीन साहित्य एवं समाज का भी यह कर्तव्य है कि प्रत्येक व्यक्ति एवं वर्ग जो समाज की मुख्य धारा से वंचित हो उसे मुख्य धारा में जोड़ने के लिए संपूर्ण जोर लगाकर उनका यथोचित विकास किया जाए, उन्हें मुख्य धारा से जोड़ा जाए। आज मध्यवर्ग के लिए भी ऐसे ही प्रयास की आवश्यकता है जिससे उनके सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में सुधार हो सके।
मध्यवर्ग : स्वरूप तथा परिभाषा :
समाज में अपना दबदबा स्थापित करने के लिए कई बार लोगों द्वारा एक वर्ग की उत्पत्ति कर दी जाती है। वह वर्ग अपने अस्तित्व को कई आयामों पर स्थापित करता है। एक समय के बाद वह वर्ग समाज में अपनी जड़ें जमाकर एक प्रकार की परंपरा को उत्पन्न कर देता है। समाजशास्त्री मैकाइवर का कहना है - “किसी भी वर्ग में उस वर्ग के लोगों का रुतबा या ओहदा बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है बहुधा उसी से लोगों का वर्ग निर्धारित होता है। अतः रुतबा या ओहदा अपने आप नहीं बनता है यह वर्ग के सदस्यों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर निर्धारित होता है।”1
समाज में क्रांति की शुरुआत मध्यवर्ग से ही मानी जाती है। मध्यवर्ग का विस्तार अधिक होने से यह वर्ग उच्च वर्ग एवं निम्न वर्ग दोनों के समीपस्थ दिखाई देता है। डॉ. सरिता राय इस संबंध में कहती हैं कि 'जहाँ तक मध्यवर्ग का प्रश्न है, वह पूँजीपति और मजदूर के बीच की कड़ी माना गया है। लेकिन आर्थिक उत्पादन में न यह उत्पादन-साधनों का स्वामी होता है और न किसी भौतिक मूल्य का उत्पादन करता है। अतः वह दफ्तरी कर्मचारी और बुद्धिजीवी के रूप में शासक वर्ग की आवश्यकता पूरी करता है।'2 हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार यशपाल का मत है कि 'वर्ग विभाजन का एक मात्र आधार है व्यक्ति की आर्थिक स्थिति।'3
इस प्रकार मध्य वर्ग में बहुत कुछ कर गुजरने की क्षमता होने के बावजूद समाज के द्वारा अनदेखी करने के कारण वह समाज की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाता है। मध्य वर्ग के संबंध में मध्यवर्गीय महिलाओं की स्थिति ओर भी दयनीय है। मध्यवर्गीय महिलाओं को कई प्रकार की सामाजिक, पारिवारिक एवं आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मन्नू भंडारी के कथा-साहित्य में अधिकाधिक संख्या में मध्यवर्गीय महिला-वर्ग का चित्रण हुआ है जिसका अध्ययन इस शोध-पत्र में किया जाना है।
मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मध्यवर्गीय महिला :
साहित्य एवं समाज में मध्यवर्गीय महिला के सामाजिक एवं पारिवारिक संघर्षों को नजर अंदाज करते हुए सदैव पुरुष सत्ता को ही महत्त्व मिलता आया है। इसीलिए आज मध्यवर्गीय महिला के संघर्षों एवं चुनौतियों को तथा उसके परिवेशगत वातावरण को समझने के लिए, उसके स्वरूप एवं व्यक्तित्व को प्रकट करने के लिए आज उसी की दृष्टि से देखना आवश्यक हो जाता है। वर्तमान समय में समकालीन साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से स्वयं के द्वारा भोगे हुए यथार्थ को अपनी साहित्यिक कृतियों में अभिव्यक्त करता है। मन्नू भंडारी का कथा-साहित्य भी इसी ओर समाज का ध्यानाकर्षण करता है। अतः उनके साहित्य को ध्यान में रखते हुए मध्यवर्ग एवं मध्यवर्गीय महिलाओं के संघर्षों एवं चुनौतियों का अध्ययन कर वंचित वर्ग के विविध पहलुओं पर आज अध्ययन एवं शोध कार्य की आवश्यकता है।
मन्नू भंडारी स्वयं मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुकात रखती हैं। स्वयं मन्नू संघर्षों की सिरमौर हैं। उन्होंने अपने बाल्यावस्था से लेकर विवाह एवं विवाहोपरांत अनेक चुनौतियों एवं संघर्षों का सामना किया। उन्होंने अपने इन्हीं सामाजिक एवं पारिवारिक संघर्षों और आपबीती को अपने लेखनीय कला कौशल के द्वारा समाज के सामने प्रकट करने का कार्य किया है। सामाजिक एवं पारिवारिक महिलाएँ अपने जीवन में अपेक्षित सुधार करने के लिए मन्नू को अपनी प्रेरणा स्रोत मानती हैं। मन्नू भंडारी की पुत्री रचना यादव स्वयं कहती हैं कि “अपनी लेखन यात्रा के पहले बीस से पच्चीस वर्ष के दौर की अपनी कहानियों द्वारा मन्नू जी ने इतनी महिलाओं को प्रेरित किया, झकझोरा, एक तरह से उन्हें ललकारा, उनके भीतर की आग को सुलगाया, कि वे बहुत स्वाभाविक रूप से आधुनिक हिन्दी साहित्य और समाज की सशक्त नारीवादी लेखिका हो जाती हैं।”4
मन्नू भंडारी ने अपने जीवन में अनेक संघर्ष किए जिनका समकालीन साहित्य में बहुत बड़ा योगदान है। उनके संघर्षों को शब्दों द्वारा प्रकट नहीं किया जा सकता। राजेन्द्र यादव के साथ इनका दांपत्य जीवन सुखमय नहीं रहा। आर्थिक अक्षमता के साथ-साथ मन्नू ने राजेन्द्र के साथ अनेक संघर्षों का सामना किया। अनेक संघर्षों के बाद मन्नू राजेन्द्र से पृथक रहने का निर्णय करती हैं। एक बार जब राजेन्द्र यादव मन्नू को आधुनिक पैटर्न पर जीवन जीने की शिक्षा देते हैं कि दोनों की छत एक होगी किन्तु जीवन दोनों अपने-अपने हिसाब से जीएंगे। मन्नू भंडारी इन शब्दों से बहुत दुःखी होती हैं। वह अपनी आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ में स्वयं कहती हैं कि “मैं तो साथ आई थी सब तरह के अलगाव को दूर करके एक हो जाने के लिए, पूरी तरह घुल-मिल जाने के लिए। यह सब सुनकर तो मुझे लगा कि सिर पर छत का आश्वासन देकर जैसे पैर के नीचे की जमीन ही खींच ली हो।”5 इसी प्रकार के संघर्षों एवं यथार्थ अनुभवों के मिश्रण से ही मन्नू ने साहित्य सृजन किया और मध्यवर्गीय महिलाओं के जीवन सुधार के लिए अपना शत-प्रतिशत योगदान दिया।
मन्नू भंडारी के कथा-साहित्य का प्राण है नारी की मुक्ति। वर्षों से जो महिलाएं केवल पुरुषों के लिए जीवन जीती आई हैं ऐसी महिलाओं के जीवन का मार्गदर्शन करना मन्नू जी के साहित्य का वास्तविक उद्देश्य है। मन्नू भंडारी महिलाओं को विशेषकर मध्यवर्गीय महिलाओं को घुटन भरे माहौल में जीवन जीने से मुक्त करना चाहती है इसलिए वे अपनी रचनाओं में वैसे ही किरदार प्रस्तुत करती हैं जो सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में घुटन भरी जिन्दगी जी रही हों या अपने जीवन में चुनौतियों से संघर्ष कर रही हों। आधुनिकता के बदलते परिवेश में मध्यवर्गीय महिलाओं को समय के साथ सजग रहते हुए अपने अस्तित्व को बनाए रखते हुए नारी की नई-नई चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है।
मन्नू भंडारी की ‘घुटन’ कहानी में ‘मोना’ अपने परिवार के लिए संघर्ष करती है। परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है। वह ‘अरुप’ से प्रेम करती है। किन्तु उसकी विधवा माँ यह नहीं चाहती कि मोना उससे विवाह करें। उसे यह चिंता रहती है कि “मोना ब्याह कर लेगी तो उसके छोटे भाई-बहिनों को कौन पालेगा।”6 मोना की मां अधिकांश समय बीमार भी रहती है। उसकी दवाई आदि की जिम्मेदारी भी मोना पर ही है। वह इन सब जिम्मेदारियों से मन-ही-मन दुखी रहने लगती है। वह अपने में ही घुटती रहती है। एक दिन वह घर छोड़कर भाग जाने का निश्चय करती है और अपनी पड़ोसन से कहती है “मैं कल रात को चली जाऊँगी अम्मा को बहुत दुख होगा, आप जरा समझाना। मैं दूर रहकर भी मदद करूँगी पर अब यहाँ मैं रह नहीं सकूँगी, रही तो शायद घुटकर मर जाऊँगी।”7 किन्तु वह चाहकर भी परिवार की जिम्मेदारियों तले जा नहीं पाती। महादेवी वर्मा ने कहा है कि “पुरुष के समान स्त्री भी कुटुम्ब, समाज, नगर तथा राष्ट्र की विशिष्ट सदस्य है तथा उसकी प्रत्येक क्रिया का प्रतिफल सबके विकास में बाधा भी डाल सकता है और उनके मार्ग को प्रशस्त भी कर सकता है।”8
मन्नू भंडारी विवाह को एक बंधन के रूप में नहीं मानती। बल्कि एक वैयक्तिक संबंध के रूप में मानती है। किसी महिला का विवाह असफल हो जाने पर मन्नू का मानना है कि नारी का अधिकार है कि वह चाहे तो उस विवाह को तोड़ दे। किन्तु भारत में अधिकांश वैवाहिक संबंध सामाजिक मजबूरी में, सामाजिक मान-मर्यादाओं के तले दबकर निभाए जाते हैं। जो कि गलत है। भारतीय महिलाएँ विवाहोपरांत परंपरागत संस्कारों को अपनाए रहती हैं तथा अपने पति का विरोध नहीं कर पातीं। इसे सामाजिक बुराई ही कहेंगे कि सदियों से यह परंपरा रही है कि नारी अपने पति को छोड़ नहीं सकती किन्तु पुरुष जब चाहे तब नारी का परित्याग करता आया है। मन्नू की कहानियों यथा ‘नई नौकरी’, ‘बन्द दराज़ों का साथ’, ‘बाँहों का घेरा’, ‘कील और कसक’, ‘असामयिक मृत्यु’, ‘नशा’, ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’, ‘हार’, ‘शायद’, ‘घुटन’, ‘तीसरा आदमी’, ‘नकली हीरे’, ‘ऊँचाई’ आदि कहानियों में मध्यवर्गीय महिलाओं के वैवाहिक जीवन की समस्याओं, संघर्षों एवं महिलाओं के वैवाहिक जीवन की चुनौतियों को देखा जा सकता है।
आपका बंटी उपन्यास की शकुन तलाक हो जाने के बाद अपने जीवन को हताशा एवं निराशा में नहीं ढकेलती अपितु संघर्ष करती है एवं मजबूती के साथ अपना जीवन जीते हुए नौकरी करती है। वह परिस्थितियों से हार नहीं मानती बल्कि उनसे ऊपर उठकर स्वयं को संभालती है। वह दृढ़ संकल्पी होने के साथ ही अपने जीवन के फैसले वह स्वयं लेती है। प्रत्येक फैसले के पक्ष-विपक्ष पर संपूर्ण विचार-विमर्श के पश्चात् ही फैसला लेती है। किन्तु मध्यवर्गीय महिला सदैव ही जीवन में ठगी जाती है। तलाक के बाद वह कभी-कभी गहराई में खो जाती है। आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद वह जीवन में अकेलेपन का शिकार होती है। उसे एक अजीब सी अनुभूति होती है – “एक अध्याय था, जिसे समाप्त होना था और वह हो गया। दस वर्ष का यह विवाहित जीवन एक अँधेरी सुरंग में चलते चले जाने की अनुभूति से भिन्न न था। आज जैसे एकाएक वह उसके अंतिम छोर पर आ गई है। पर आ पहुँचने का संतोष भी तो नहीं है, ढकेल दिए जाने की विवश कचोट-भर है। पर कैसा है यह छोर? न प्रकाश, न वह खुलापन, न मुक्ति का एहसास। लगता है जैसे इस सुरंग ने उसे एक दूसरी सुरंग के मुहाने पर छोड़ दिया है- फिर एक और यात्रा- वैसा ही अंधकार, वैसा ही अकेलापन।”9 शकुन द्वारा डॉ. जोशी से पुनर्विवाह कर लेने पर भी उसका सामाजिक एवं पारिवारिक संघर्षों से जूझना जारी रहता है। आज की युवा पीढ़ी आर्थिक रूप से भले ही सक्षम हो जाए किन्तु उसमें धैर्य, समर्पण एवं सामंजस्य का पूर्णतया अभाव रहता है। वह प्रत्येक परिस्थिति में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाती है।
मध्यवर्ग पर मन्नू भंडारी की कलम ने इस वर्ग की समस्त परतों को खोलने का कार्य किया है। मन्नू की कहानियों में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की घटनाओं पर आधारित वे आंदोलित कथाएँ नहीं बल्कि सहज, सरल एवं मध्यवर्गीय जीवन की मार्मिकता को अपनाती हुई कहानियाँ देखी जाती हैं। प्रेम के त्रिकोण एवं प्रेमिका के द्वंद्व को जिस प्रकार से मन्नू भंडारी ने अपने साहित्य में चित्रित किया है उसके मुकाबले कोई अन्य साहित्यकार दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता।
मन्नू जी की कहानी ‘बाँहों का घेरा’ में एक अतृप्त महिला की ऐसी कहानी है जो अपने चिर यौवन के आवेग में भी स्वयं को अकेला महसूस करती है। कहानी की मुख्य पात्र कम्मो है। जिसका विवाह हो चुका है और एक संतान भी है किन्तु वह विवाह पूर्व के अपने प्रेमी शैलेन की याद में तड़पती हैं। उसके प्रेमी के बारे में जब उसके परिवार को पता चलता है तो उसका आनन-फानन में अनजान लड़के (मित्तल) से विवाह करवा दिया जाता है। कम्मो का वैवाहिक जीवन अकेलेपन की ओट में ही व्यतीत होता है। कम्मो के ससुराल में सुख-सुविधाओं की कोई कमी न होते हुए भी वह अकेलापन महसूस करती है। उसकी इच्छापूर्ति नहीं हो पाती। उसे जीवन भर दुखों की भट्टी में झोंक दिया जाता है। यह कहानी तत्कालीन समाज पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है। आज भी समाज में मध्यवर्गीय नारी के सपनों को इसी प्रकार कुचल दिया जाता है। आज भी समाज में कम्मो जैसी हजारों महिलाएँ इंसाफ के लिए तड़प रही हैं। अन्याय को सहन कर रही हैं। जिसका जिम्मेदार कौन है? यह समाज एवं समाज की रूढ़िवादी सोच ही इसके लिए जिम्मेदार है। “नारी मन को पुरुष से भावनात्मक मिठास की अपेक्षा होती है। वह अपनी भीतरी आवश्यकता पूर्ति करना चाहती है। केवल बाह्य दैहिक मिलन से उसके मन को परितोष नहीं होता। अतः दैहिक मिलन के बावजूद मन की सूक्ष्म भूख की तृप्ति के लिये वह पुरुष के प्रति आकर्षित होती है।”10
वर्तमान में रिश्तों के प्रति भी लोग स्वार्थी हो गए। अपनों के खिलाफ अपने ही चालाकियाँ करने लगते हैं। अपने काम में व्यक्ति पूर्णतः मसरूफ़ होकर रिश्ते-नाते को दरकिनार कर देता है। क्या हम यही सब करने के लिए ही आधुनिकता की दौड़ में हैं? क्या आधुनिकता के नाम पर समाज, परिवार एवं रिश्तों-नातों को भुलाया जा सकता है? इन सभी सवालों पर आज पुनर्विचार की आवश्यकता है।
मन्नू भंडारी की ‘नई नौकरी’ कहानी में भी कुछ इसी तरह के प्रश्नों को उठाया गया है। नई नौकरी की मुख्य पात्र ‘रमा’ जो एक मध्यवर्गीय महिला है तथा कॉलेज की नौकरी करती है। वह इतिहास विषय में शोध कार्य भी कर रही है। किन्तु उसके पति के नई नौकरी लगने के बाद तथा नए घर की देखभाल में वह इतनी व्यस्त हो जाती है कि उसे कॉलेज भी याद नहीं रहता। पति की नई नौकरी के बाद घर पर अत्यधिक लोगों का आना-जाना लगा रहने से वह अत्यधिक व्यस्त हो जाती है। उसे अपना शोधकार्य पूरा करने का भी समय नहीं मिल पाता। उसका पति कुंदन भी नहीं चाहता कि रमा नौकरी करें। वह बड़ी चालाकी से रमा को नौकरी छोड़ने के लिए उकसाता है। किन्तु वह स्पष्ट रूप से रमा को मना नहीं कर पाता। बिना पूर्व तैयारी के कॉलेज जाकर बच्चों को पढ़ाना उसे अच्छा नहीं लगता। एक दिन इन सब कामों से परेशान होकर रमा खुद कुंदन से कह देती है कि “मैं कॉलेज छोड़ दूँगी। इस तरह काम करने से तो नहीं करना ज्यादा अच्छा है।”11
इस तरह एक मध्यवर्गीय महिला अपने पति के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन, नौकरी तथा अपने शोध कार्य की कुर्बानी देकर अपना जीवन बर्बाद कर देती है। मन्नू भंडारी की ‘नई नौकरी’ कहानी आधुनिकता की चकाचौंध में डूब रहे युवा वर्ग की दास्तां को बयां कर रही है। बड़े आश्चर्य की बात है कि आज इन सबके मध्य अकारण ही वो मध्यवर्गीय महिला पीसी जा रही है जिसका इन सब कार्यों से कोई ताल्लुक नहीं है। सवाल यह है कि एक की नौकरी बचाने के लिए दूसरे का अपनी नौकरी का बलिदान देना कहाँ तक उचित है? क्या पत्नी का अपना कोई अस्तित्व ही नहीं? मन्नू भंडारी की इस कहानी के साथ-साथ ओर भी अनेक कहानियाँ हैं जो ऐसे कई प्रश्न खड़े करती हैं। जिनका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। होता तो शायद मन्नू भंडारी द्वारा ऐसी कहानियाँ लिखी ही नहीं जातीं।
मन्नू की ‘बंद दराज़ों का साथ’ कहानी भी इसी तरह के दर्द को उजागर करती है। इस कहानी की पात्र ‘मंजरी’ भी कॉलेज की अध्यापिका है। सामाजिक एवं पारिवारिक संघर्षों के बाद उसे भी अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है। कहानी में मंजरी के प्रति संवेदना जताते हुए लेखिका कहती हैं कि “ज़िन्दगी के वे सुनहरे दिन, जब उसे अपनी भावनाओं को खर्च करना था, मरे हुए सम्बन्धों की लाश ढोने में ही बीत गए।”12
मध्यवर्गीय महिलाओं का दैहिक शोषण भी अत्यधिक देखा जाता है। सदियों से पुरुषों द्वारा मध्यवर्गीय एवं निम्नवर्गीय महिलाओं का यौन-शोषण किया जाता रहा है। मन्नू भंडारी की कहानी ‘आते जाते यायावर’ में भी इस ओर समाज का ध्यानाकर्षित किया गया है। इसमें पुरुषों की कामुक प्रवृत्ति का स्पष्ट रूप से चित्रांकन किया है। पुरुष पहले तो किसी महिला को अपने प्रेम जाल में फंसाकर तरह-तरह के वादे करते हैं, विवाह के लिए हाँ भरते हैं, शारीरिक संबंध बनाते हैं और अंत में उसे छोड़कर किसी अन्य महिला से विवाह कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में वह महिला पुरुष के प्रेम जाल में ठगी जाती है। यह धोखा केवल अनपढ़ महिला के साथ ही नहीं होता अपितु पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी इसका शिकार हो जाती हैं।
‘आते जाते यायावर’ कहानी में ‘मिताली’ कॉलेज की प्राध्यापिका है एवं अविवाहिता है। जिसके साथ उसका प्रेमी उसे प्रेम में सराबोर कर, अनेक वादे करते हुए उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता है और अंत में उसे छोड़कर किसी अन्य महिला से विवाह कर लेता है। इस घटना से मिताली जीवन भर उबर नहीं पाती तथा किसी भी पुरुष के साथ वह सामंजस्य स्थापित नही कर पाती है। वह प्रत्येक पुरुष से आशंकित रहती है।
निष्कर्ष : मन्नू भंडारी की कहानियाँ एवं उपन्यास केवल आधुनिकता की चकाचौंध और मध्यवर्गीय मानसिकता को ही उजागर नहीं करते अपितु आज के परिवेश को, समय के साथ-साथ होने वाले सामाजिक बदलावों को भी भली-भाँति चित्रित करते हैं। इनकी कहानियाँ सामान्य जीवन स्थितियों से शुरू होती हुईं किसी न किसी विशिष्टता को प्राप्त करती हैं। इनका संपूर्ण कथा-साहित्य अधिकांशतः सामाजिक एवं पारिवारिक संबंधों के इर्द-गिर्द विचरण करता है। इनका प्रत्येक उपन्यास एवं प्रत्येक कहानी एक विशिष्टता को लिए हुए है। मन्नू भंडारी की कहानियों में वर्तमान में व्याप्त हर समस्या का चित्रांकन देखने को मिलता है। विशेषकर मध्यवर्गीय महिलाओं का चित्रण उन्होंने हर प्रकार से करने का प्रयास किया है।
मन्नू भंडारी अपने कथा-साहित्य में महिलाओं को हर परिस्थिति में मुकाबला करने के लिए, उनसे लड़ने के लिए प्रेरित करती हैं। उनकी कहानियों तथा उपन्यासों में हर वर्ग की महिलाएँ देखी जा सकती हैं किन्तु उनके कथानक का उद्देश्य सदैव सामाजिक एवं पारिवारिक ही रहा है। उनके कथा-साहित्य में सदैव समाज एवं परिवार के उत्थान का ही उद्देश्य प्रमुख रहा है इसलिए मन्नू भंडारी साहित्य जगत में अपना अविस्मरणीय स्थान बना पाई है।
मन्नू भंडारी का कथा-साहित्य महिलाओं की विभिन्न समस्याओं की ओर ध्यानाकर्षित करता है। आज के समाज का वास्तविक सत्य उजागर करने में मन्नू भंडारी निश्चित रूप से सफल हुई हैं। मन्नू भंडारी की रचनाएँ मानव-मन की संवेदनाओं को उजागर करते हुए नारी संघर्ष एवं नारी शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाली सफल रचनाएँ साबित हुई हैं। इनकी रचनाएँ वर्तमान समाज से अनेक विषयों पर कई तरह के प्रश्न लिए तैयार खड़ी रहती हैं तथा समस्याओं के समाधान के लिए सदैव प्रेरणा देती रहती हैं। यही मन्नू भंडारी की समाज के लिए सबसे बड़ी उपादेयता है।
संदर्भ :
- मैकाइवर, आर०एम०, पेज, एच० चार्ल्स, सोसाइटी, 1990, लन्दन मैकमिलन, पृष्ठ संख्या - 348
- सरिता राय उपन्यासकार प्रेमचंद की सामाजिक चिंता, वाणी प्रकाशन, 1996, पृष्ठ संख्या – 126
- यशपाल - मार्क्सवाद, विप्लव कार्यालय लखनऊ, 1954, पृष्ठ संख्या 164
- प्रियदर्शन – बेटियाँ मन्नू की, प्रकाशन – राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली, 2024 (पहला संस्करण) पृष्ठ संख्या – 12
- मन्नू भंडारी – एक कहानी यह भी, प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ संख्या – 57
- मन्नू भंडारी – तीन निगाहों की एक तस्वीर (घुटन), प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि. जगतपुरी, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष – चौथा संस्करण 2020, पृष्ठ संख्या – 63
- मन्नू भंडारी – तीन निगाहों की एक तस्वीर (घुटन), प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि. जगतपुरी, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष – चौथा संस्करण 2020, पृष्ठ संख्या – 69
- महादेवी वर्मा - श्रृंखला की कड़ियाँ, प्रकाशक - लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद (प्रथम संस्करण), प्रकाशन वर्ष 2008, पृष्ठ संख्या - 17
- मन्नू भंडारी – आपका बंटी, प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन (बत्तीसवां संस्करण) 2022, पृष्ठ संख्या – 28,29
- श्रीराम महाजन – आधुनिक हिन्दी कहानी साहित्य में काममूलक संवेदना, प्रकाशक – चिन्तन प्रकाशन, कानपुर, प्रकाशन वर्ष – (प्रथम संस्करण) 1986, पृष्ठ संख्या – 171
- मन्नू भंडारी – एक प्लेट सैलाब (नई नौकरी), प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. जगतपुरी दिल्ली, प्रकाशन वर्ष – (पाँचवाँ संस्करण) 2022, पृष्ठ संख्या – 17
- मन्नू भंडारी – एक प्लेट सैलाब (बन्द दराज़ों का साथ), प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. जगतपुरी, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष – पाँचवाँ संस्करण 2022, पृष्ठ संख्या – 29
कैलाश चन्द्र खटीक
शोधार्थी (हिन्दी)
रामकृष्ण शर्मा
(शोध निर्देशक), मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग, ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर
9001774530, kailashdidwaniya@gmail.com
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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