संस्मरण : प्रकाश जैन की याद में ‘लहर’ के बहाने / हेमन्त शेष

प्रकाश जैन  की याद में ‘लहर’ के बहाने
- हेमन्त शेष

हिंदी साहित्य में एक ज़माना ऐसा भी रहा है जब अजमेर, ‘लहर’ और प्रकाश जैन तीनों कोई अलग-अलग तीन शब्द नहीं- पर्यायवाची थे। ‘लहर’ का हिंदी की श्रेष्ठतर और गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं में जो स्थान था उसे कोई साहित्यिक नहीं भूल सकता क्यों कि तब ‘लहर’ में छपने का अर्थ था समकालीन साहित्य में लेखक के तौर पर स्थापित हो जाना।

यह महज एक पत्रिका नहीं मिशन थी- प्रकाश जी के जीवन का मिशन, एक ऐसा कठिन यज्ञ, जिसे वह और उनकी सहयोगी मनमोहिनी जी, हर तरह के संकट और बाधाओं से जूझते हुए हर महीने पूरा किया करते थे। जो लोग राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास से परिचित हैं वे यह याद कर लेंगे कि ‘लहर’ नाम की पत्रिका सबसे पहले मार्च 1948 में जोधपुर से जगदीश ललवानी और लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने निकाली थी। राजस्थान की पत्रकारिता के इतिहास पर महत्वपूर्ण और श्रमसाध्य शोध करने वाले डॉ. महेंद्र मधुप के अनुसार- ‘इस पत्रिका ‘लहर’ ने राजस्थान की बिखरी हुई साहित्यिक गतिविधियों, रचनाकारों एवं विचारकों को एक मंच पर एकत्रित करने का साहसिक प्रयास किया।’ बाद में प्रकाश जैन ने इसी नाम से जुलाई 1957 में अजमेर से ‘लहर’ का संपादन-प्रकाशन शुरू किया। महेंद्र मधुप का कहना ठीक है कि ‘उस जोधपुर ‘लहर’ और अजमेर ‘लहर’ में, सिवा नाम के कोई और बात ‘कॉमन’ न थी।

बहरहाल बात अगर ‘लहर’ की चली है तो महेंद्र मधुप के शब्द ही याद कर लिए जाएं- ‘लहर’ के प्रकाशन से अजमेर भी लखनऊ, वाराणसी, दिल्ली, और कलकत्ता की तरह हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया। शुद्ध श्रमजीवी साहित्यिक पत्रिकाओं एवं 1957 के उपरांत हिन्दी साहित्य के विकास का अध्ययन करना हो तो इसकी कहानी ‘लहर’ की जुबानी भी सुनी जा सकती है...”

अपने प्रकाशन के नवें महीने में प्रकाश जैन ने जिस ‘व्यक्तिगत हस्ताक्षर’ को ‘लहर’ के संपादन से (औपचारिक तौर पर) जोड़ा- वह और कोई नहीं, उनकी दूसरी जीवन संगिनी मनमोहिनी जी ही थीं। मनमोहिनी जी और प्रकाश जी की प्रेमकथा का मेरे लहर-प्रसंग से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु प्रकाश जी अगर लेखकों को लम्बे ख़त लिखवाना चाहते तो इसी अपनी सह-संपादक सहकर्मी की ओर ताकते होंगे, क्यों कि प्रकाश जैन पृथ्वी पर ये क़सम खा कर अवतरित हुए थे कि वह लेखकों को संसार के सबसे छोटे पत्र लिखने का एक सम्पादकीय कीर्तिमान बनाएँगे।

प्रकाश जैन के देहावसान के बाद उनके योगदान पर अकादमी अध्यक्ष प्रकाश ‘आतुर’ ने मनमोहिनी जी के अतिथि संपादन में मधुमती का जो ‘स्मृति अंक’ निकाला था- उसमें अन्यों के साथ इन पंक्तियों के लेखक का पत्र भी छपा था – जिसमें दर्ज था ये तथ्य कि प्रकाश जैन के सम्पादन में हेमंत शेष की पहली कविता ‘लहर’ में ही छपी थी –

‘हेमंत भाई , चुप क्यों ? फ़ौरन कविताएं भेजो। ‘

प्रिय हेमंत, कविता चाहिए। वह भी तुरंत...’

‘भाई! कविता कहाँ है?’

‘प्रिय हेमंत, जो लिखा हो- भेजो।’

‘प्रिय भाई, अब तो रचना भेज ही दो। कवितांक रुका है।’

‘हेमंत... चुप्पी ? आखिर क्यों?’

‘भाई हेमंत, आपकी कविताएं ?????

इसी अंदाज़ में लिखी पचासों नहीं, शताधिक एक-एक, दो-दो लाइनों वाली चिट्ठियां मेरे संकलन में थीं- ज़्यादातर पोस्ट कार्ड्स। सब या तो कविता मांगने, कोई आलेख लिखवाने या ‘लहर’ में सांस्कृतिक गतिविधियों का नया स्तंभ शुरू करने से संबंधित। बाद के सालों में तो वह ‘लहर’ की आर्थिक कठिनाइयों से जूझते किसी भी तरह सरकारी या निजी विज्ञापन जुटाने के लिए भी मुझे अपने एक पारिवारिक सदस्य सा आत्मीय मान कर, बारंबार लिखने लगे। ऐसे पत्रों में वह एक प्रशासनिक अफसर से नहीं, उस परिवारजन को संबोधित कर रहे थे, जो उनकी राय में ‘लहर’ के लिए विज्ञापनों आदि के रूप में कुछ मदद कर सकता था- (जो यथासंभव की भी गयी)। पर दिनों दिन गहराते आर्थिक संकट, उनकी अस्वस्थता और अन्यान्य कारणों के चलते ‘लहर’ आखिर 1984 में बंद हो ही गयी।

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प्रकाश जैन के साफ-सुथरे हस्तलेख से से शायद 1984 की उस नामुराद बारिश की पुराने जन्मों की कोई शत्रुता ही रही होगी। हम तब सी-स्कीम वाले घर में, जो लोग आज तक भी मेरा स्थाई पता मानते हैं, रहते थे। उस दिन की भयानक प्रलयन्कारी बाढ़ ने जयपुर को कुछ ही घंटों में पूरा धो डाला था। जहाँ मेरी किताबें और दूसरे कागज़ात पड़े थे –छत टपकने लगी। मैं जब तक घर लौट कर अपने कमरे के कागज़ आदि समेटता, वे लगभग लुगदी में बदलने को थे। प्रकाश जी की चिट्ठियों का बण्डल ऊपर ही रखा था। उस बाढ़ के दिन वह मिट्टी के लौंदे की तरह गल गया। बाद में हीटर से जितना सुखाया जा सकता था सुखाया भी। पर जयपुर की बाढ़ की मेरी सबसे दुखांत स्मृति में प्रकाश जैन के लिखे वे पोस्टकार्ड ही हैं, जो उस दिन धुल गए। अब सोचता हूँ- क्या हुआ जो प्रकाश जी का हस्तलेख भीग गया- ये पंक्तियाँ लिखते वक़्त वह अपनी समूची साबुत शख्सियत के साथ मेरे ज़हन में फिर वैसे ही उभर आये हैं- जैसे ‘लहर’ के कचहरी रोड वाले दफ्तर की नीली खिड़कियाँ- जहाँ मैं उनसे ऊपर की मंजिल पर पहली बार मिला था। चिठ्ठी-पत्री तो निर्बाध रूप से चलती ही रहती थी, एक दिन प्रकाश जैन साहब से फोन पर बात हुई और तय हुआ- हम अजमेर में मिलेंगे।

‘तुम जहाँ ठहरे हो, वहां सर्किट हाउस से कचहरी रोड- ‘लहर’ का दफ्तर बहुत दूर नहीं। वहीं आ जाओ। अभी तो मैं घर पर हूँ। पर दफ्तर पहुँच रहा हूँ।’ उन्होंने कहा।

जब एक ऑटो पकड़ कर उन से भेंट करने कचहरी रोड पहुंचा- तो दफ्तर के नीचे हिन्दी की सबसे सर्जनात्मक पत्रिकाओं में से एक ‘लहर’ का वह स्नेही संपादक सामान्य से सफ़ेद शर्ट-पेंट में अपने चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान लिए मेरा इंतज़ार कर रहा था- जिसे लोग दम्भी, घमंडी, निष्ठुर, मनमौजी, न जाने क्या क्या कहते, किन-किन अजीबोगरीब संज्ञाओं से विभूषित करते आये थे। अपनी पत्रिका में राजस्थान के लेखकों को छापने से उन्हें सख्त परहेज़ है, ऐसी भी छवि थी उनकी। ‘लहर’ का साइनबोर्ड जिस बिल्डिंग पर लगा था, उसकी खिड़कियाँ नीले रंग की थीं और बाहर महात्मा गाँधी रोड के भीड़ और शोर शराबे से लकदक बाज़ार में खुलतीं थीं- सीढ़ियाँ कुछ ऊंची ऊंची सी थीं, पर अभ्यासजन्य तेज़ी से उन पर चढ़ते वह मुझे अपने दफ्तर में ले आये। ... और तब मैंने देखा- एक हॉलनुमा वह बड़ा सा कमरा लगभग छत तक कागजों और ‘लहर’ के अंकों के अलावा अन्य पत्र-पत्रिकाओं से भी लदा हुआ था। सारे भारत से उनके यहाँ लेखकों के ख़त आते थे और देश के कोने-कोने से रचनाएं।

नीली वाली एक खिड़की खोल कर सर बाहर निकालते आवाज़ दे कर नीचे की किसी दूकान से चाय मंगवाई गई। बातचीत होने लगी-ज्यादातर बातें साहित्य और कविताओं पर केन्द्रित। दुपहर का वक़्त हो चला। ‘तुम्हें आज खाना मेरे साथ ही खाना है- ‘ उन्होंने आदेशात्मक लहजे में अचानक कहा। मैं स्वभाव से संकोची हूँ और जहाँ तक मुमकिन हो, भोजन के अक्सर आमंत्रण टालता हूँ- पर यों उनके मैत्रीपूर्ण निमंत्रण को अस्वीकारने की अशिष्ट हिम्मत न थी तो उनके साथ होने केसिवा कोई चारा न बचा।

चलते-चलाते प्रकाशजी ने मुझे उस विकट ढेर से खोज खोज कर ‘लहर’ के कई विशेषांक भेंट किये- जिनमें ‘युद्ध विशेषांक’ (जनवरी-1966) ‘ दो कविता-विशेषांक-1966-67 ‘ ‘महानगर विशेषांक’, ‘नवलेखन’ विशेषांक सरीखे कई बहुचर्चित और दुर्लभ अंक थे।

बाहर धूप में तेज़ी थी। पर उनका घर ‘लहर’ के दफ्तर से ज्यादा दूर न था। एक ‘शॉर्ट कट’ से रेल की पटरियों को उलान्घते हुए वह मुझे अपने घर पैदल ही ले गए जहाँ मनमोहिनी जी स्वादिष्ट खाना बना कर हमारी बाट जोह रहीं थी। (दफ्तर आते हुए वह उन्हें एक अतिरिक्त भोजन बनाने को कह आये थे) वह भी मुझ से बड़े वात्सल्यपूर्ण आत्मीय भाव से मिलीं। एक नए लेखक और एक प्रतिष्ठित संपादक के बीच उस भेंट के बाद जो संपर्क बना, वह बरसों कायम रहा और प्रगाढ़तर हुआ। प्रकाश जी उम्र और अनुभव के फासलों को उलांघते जिसे भी अपना लेखक और दोस्त मानते और चाहते थे- उसकी पूरी इज्ज़त करते थे। स्नेह और मैत्री की गर्मी उस दृष्टिवान संपादक में इतनी थी कि बस! रचना भेजने के लिए उनके एक एक लाइनों के पोस्टकार्डों की बरसात से मुझ से ज्यादा भला और कौन भीगा होगा ?

उनके परिजनों, मित्रों और प्रशंसकों की घनघोर नाराजगी का जोखिम उठाते भी एक स्वयंभू समीक्षक के बतौर अपनी ये स्पष्टवादिता क्षम्य लग रही है कि मुझे प्रकाश जैन कभी भी एक सशक्त कवि या बिन्दु-संपादक नन्द चतुर्वेदी जैसा प्रीतिकर और बहुत जानदार गद्य लिखने वाले रचनाकार नहीं लगे। उनका काव्य-संकलन ‘कभी-कभी’, वीर सक्सेना के एक प्रशंसात्मक आलेख, ‘मधुमती’ के विशेषांक में छपी उनकी प्रमुख रचनाओं, उन के देहावसान के बाद में उनके इंजीनियर पुत्र संगीत लोढ़ा द्वारा छपवाए एक बेहतरीन ढंग से छपे पहले कविता-संग्रह-‘कहाँ खो है, कविता?’ में संकलित कविताओं तक में। देखा जाय तो हिंदी कविता की मुख्य-धारा के कवि वह कभी भी नहीं रहे- क्यों कि उनकी कविता में (इस अज्ञानी की विनम्र राय में) एक व्यक्तिगत आर्तनाद, बेचैनी, अवसाद, चीज़ों के पकड़ से छूटने आदि का कष्ट, पछतावा आदि आदि भाव तो बेहद स्पष्ट और अक्सर सीधी सपाट अकलात्मक प्रतिक्रिया की शक्ल में दीखते हों, कविता ज़्यादा नहीं है- शिल्प के प्रति सावधानी या फॉर्म की नवीनता तो बिलकुल नहीं। गद्य भी वह आपद्धर्म की तरह लिखते रहे- उतना भर, जितना एक सम्पादक सरसरे तौर पर अपने अंकों की सामग्री की सूचना देते फौरी तौर पर लिखता है; इस के बावजूद अगर भारत भर के लेखक ‘लहर, पोस्ट बौक्स 82, कचहरी रोड , अजमेर ‘ के पते पर अपना श्रेष्ठ लेखन बराबर भेजा करते थे तो यह एक उत्कृष्ट पत्रिका के अत्यंत समझदार विवेकशील सम्पादक पर उनके भरोसे का द्योतक थी।

उन्हें हजारों रचनाओं में से खरे और खोटे की विवेक की अप्रतिम पहचान थी। नए, संभावनाशील बनते या अच्छे लेखक को वह नींद में भी सूंघ सकते थे। दुर्गा प्रसाद अग्रवाल का कहना ठीक है कि “ वह अपनी निगाह रचना पर रखते थे- रचनाकार पर उतनी नहीं।” वह किसी लेखक या लेखिका को महज़ इस कारण अपनी पत्रिका में जगह नहीं देते थे कि वह राजस्थान का निवासी है। “ उनके लिए रचना महत्वपूर्ण थी, न कि निवास प्रमाण पत्र..” अगर उदाहरण देना ज़रूरी हो तो मेरी बाद की पीढ़ी के या आज की नयी पीढ़ी के निर्माणाधीन लोगों को ये बताना मुझे अच्छा लगेगा कि जनवरी-फरवरी 1961 के ‘कवितांक’ में शरीक हिंदी साहित्य की पहली पक्ति में गिने जाने वाले लेखकों को देखिये। इस अंक की (आंशिक) लेखक-सूची ही उन्हें ताज्जुब में डालने को काफी होगी :

‘अज्ञेय , त्रिलोचन, मलयज, लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, दूधनाथ सिंह, विष्णुचन्द्र शर्मा, श्रीराम वर्मा, विजयदेव नारायण साही, कुंवर नारायण, विपिन कुमार अग्रवाल, शिवकुटी लाल वर्मा, शम्भुनाथ सिंह, रामस्वरूप चतुर्वेदी, शमशेर बहादुर सिंह, डॉ.रघुवंश, श्रीकांत वर्मा, रांगेय राघव, राजकमल चौधरी, भुवनेश्वर, अशोक वाजपेयी, गिरिजा कुमार माथुर, जगदीश चतुर्वेदी, प्रेमलता वर्मा वगैरह 2 से लगा कर अनुवादों में-डब्ल्यू.एच.औडेन, रॉबर्ट फ्रॉस्ट, कॉनरेड आइकेन, ई. ई. कमिंग्स, गुसेप उन्गारत्ती, एलिजाबेथ ज़ेनिन्ग्ज़ आदि तक। बेहद आर्थिक कष्ट और अनगिनत सामाजिक- पारिवारिक कठिनाइयां झेलते भी अगर इस जुझारू सम्पादक ने अपना पूरा जीवन, एक पत्रिका ‘लहर’ को खड़ा करने में, उसे साहित्यिक मारकाट के दृश्यों के बीच एक अपराजित योद्धा के ध्वज की तरह ऊंचा उठाए रखने में लगाया तो यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है।

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जब प्रकाश जैन की स्मृतियाँ लिखने बैठा ही हूँ तो इसी प्रसंग में जयपुर की एकाध गोष्ठी की कुछ पुरानी यादें भी बरबस ही ताज़ा हो गईं हैं। भले इसे प्रकाश जैन स्मृति का एक क्षेपक या अवांतर-कथा कह लिया जाय। सन उन्नीस सौ सत्तर का ज़माना था। (सुरेन्द्र भारतीय द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘आयाम’ ( जिसका बस एक अंक ही निकल पाया) में छपे ताराप्रकाश जोशी के एक आलेख और राधेश्याम शर्मा के अखबार ‘क्रोंच’ की साहित्यिक-खबर से सप्रमाण ज्ञात हो रहा है)- किस्सा नवम्बर 1970 का है।

तब वीर सक्सेना, भारतरत्न भार्गव और ताराप्रकाश जोशी सरीखे कई लोग अपेक्षाकृत और जवान और ऊर्जावान हुआ करते थे और साहित्य के अलावा स्थानीय साहित्यिक-राजनीति की हलचलों से खुद को जोड़े रखने के लिए भी उतने ही उत्सुक भी। कॉफ़ी-हाउस, मिर्ज़ा इस्माइल रोड, पर (किसी भी दूसरे शहर की तरह ही) जयपुर के लेखकों, पत्रकारों, चित्रकारों और रंगकर्मियों आदि के बीच बेहद लोकप्रिय जगह थी। शहर के बीच थी, कहीं से भी पहुंचा जा सकता था- कॉफ़ी के बस एक प्याले पर घंटों वक्त गुज़ारने के लिए एक मुफीद जगह। वहां के बैरे तक नियमित आने वाले लेखकों आदि को उनकी रचनाओं समेत पहचानते थे। बेहद दुबले-पतले किन्तु खतरनाक रूप से ‘बोल्ड’ राधेश्याम शर्मा, तब एक साप्ताहिक अखबार ‘क्रोंच’ के संपादक-प्रकाशक थे। पर बहुत से साप्ताहिक पत्रकारों से विपरीत राधेश्याम जी को साहित्य और कलाओं में भी दिलचस्पी थी। नवम्बर के आखिरी सप्ताह में इन्हीं ने अपने अखबार के तत्वावधान में कॉफ़ी हाउस के प्रथम तल पर अवस्थित हौल में उसी एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया, जिसकी चर्चा हम कर रहे हैं। पच्चीस-तीस नए, अज्ञात-कुलशील कवियों और दस-बीस मूर्धन्यों को ले कर सर्दियों की एक शाम वह काव्य-गोष्ठी रखी गयी।

जहाँ तक मेरी याददाश्त का घोड़ा दौड़ता है, उस गोष्ठी का संयोजन भारत रत्न भार्गव ने अपनी ‘पेटेंट शब्दावली’ के साथ किया था – गोष्ठी का मूल विचार वीर सक्सेना का था और हर तरह के कार्यक्रमों में तब, कवि-गीतकार ताराप्रकाश जोशी- (सिटी मजिस्ट्रेट होने के नाते भी) अध्यक्षता आदि कामों के लिए बड़े मुफीद और सर्व-सुलभ साहित्यकार थे। वह सुलभ थे, अफसर थे, गीतकार भी, और स्वभाव से उदार; सो सदा अपने धाराप्रवाह भाषणों के साथ विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत वही किया करते थे। इस गोष्ठी में भी वह प्रमुख अतिथि बनाए गए।

साहित्य उनका एकमात्र व्यसन था। मैंने अपनी आँखों से देखा है- एक दफा राजस्थान विश्वविद्यालय के ऐन सामने, जब छात्रों के दो गुट आपस में सर फोड़ते भिड़ रहे थे- और पुलिस, ‘आगे के निर्देशों की प्राप्ति’ के लिए अपने ‘ऑन ड्यूटी’ सिटी-मजिस्ट्रेट साहब की विकलतापूर्वक खोज कर रही थी, तारा प्रकाश जोशी हम कुछ नौजवानों से घिरे, अपनी सरकारी जीप सड़क किनारे लगवा कर चाय की गुमटी पर सार्त्र के लेखन की श्रेष्ठता पर धुआंधार प्रवचन कर रहे थे।

वह हर बार विश्व के ‘सर्वश्रेष्ठ कवियों’ की अपनी सूची बदलते रहते थे- कभी उनकी निगाह में काज़ी नजरुल इस्लाम विश्व के सर्वश्रेष्ठ कवि हो जाते तो कभी रवींद्रनाथ टैगोर, कभी कोई अज्ञात अफ्रीकी कवयित्री जोशी जी के मूल्यांकन की पहली पायदान पर आ जाती, तो कभी मेरे जैसा कोई बिलकुल ही स्थानीय कवि।

बहरहाल, लब्बोलुआब ये कि उस शाम गोष्ठी हुई और खूब हुई- वह बहुत देर आधी रात के बाद तक चली क्यों कि कवि ज्यादा थे- श्रोता कम। वरिष्ट लेखकों ने अद्वितीय संयम का परिचय देते अपनी रचनाएं कम सुनाईं- नयों को पूरी उत्सुकता से सुना। मुझे याद नहीं उस शाम और किस-किस ने कविता-पाठ किया पर मेरे जैसे मामूली कवि के लिए कहीं भी किया जाने वाला यकीनन वह पहला काव्य-पाठ था। गोविन्द माथुर, राजा राकेश, पुरुषोत्तम सैनी, सुरेन्द्र भारतीय, मंजुल उपाध्याय, वसंत वसु, वसुधाकर गोस्वामी, श्रीकांत ‘मंजुल’, मंजु बाफना, सुबोध मैनी, अशोक माथुर, चंद्रप्रकाश सरना, ओम सैनी, सुमित्रा सहारन आदि आदि कुछ नाम हैं जो अभी तुरंत याद आ रहे हैं। तेजसिंह जोधा की राजस्थानी कविता ‘म्हारा बाप’ और हेमंत शेष की हिंदी कविता को भरपूर सराहा गया। इतनी वाहवाही की मैंने सच कभी उम्मीद न की थी- वह मेरे आरंभिक छात्र जीवन की दो-तीन-चार पेज लम्बी बिलकुल पहली रचना थी- ‘पतझड़ से साक्षात्कार पर’ ! ये वे दिन थे जब गुटबाज़ी, गेंग-निर्माण, और आपसी पूर्वाग्रहों का केन्सर शहर में फैला न था। अच्छी कविता लोग ईमानदारी से सुनते और प्यार से सराहते थे- इस बात पर बिना ध्यान दिए कि वह लिखी किसने है ?

राधेश्याम शर्मा ‘क्रोंच’ की कोशिश कुछ इस तरह असाधारण रूप से सफल हुई जिसका खुद उन्हें इल्हाम न था। शहर के आकाश पर इतने धूमकेतुओं का एक धमाके से अचानक उदय हुआ था। नए कवियों की इस गोष्ठी की खबर बम के धमाके की तरह जयपुर से बाहर –अलवर, अजमेर, बीकानेर, उदयपुर तक भी फैल गयी। इस खबर का अजमेर तक भी जाना था कि प्रकाश जैन के भी कान खड़े हुए (और दो-चार भरोसेमंद दोस्तों से बाकायदा ये इत्मीनान करने के बाद कि पढ़ी गयी रचनाओं में से कुछ सचमुच अच्छी भी थीं) , प्रकाश जैन ने खुद पत्र लिख पर ‘लहर’ के लिए दो कवियों से रचनाएं मांगीं- 18 साल की उम्र में ‘पतझड़ से साक्षात्कार पर’ मेरी पहली कविता को ‘लहर’ के अगस्त 1970 अंक में जगह मिली।

‘लहर’ में छपने से पहले मैं राजस्थानी कवि जोधा को पूरा नहीं जानता था, तेजसिंह जोधा, तब नागौर के रणसीसर गाँव से आ कर जयपुर में हिन्दी एम् . ए . के विद्यार्थी भर थे- नन्द भारद्वाज, प्रेमचंद्र गोस्वामी के साथ पढ़ने वाले। किन्तु मुझे आज भी लगता है जैसी कविता तब तेज सिंह लिख रहे थे- अगर वह अपना लेखन-क्रम बनाये रखते तो आज राजस्थानी साहित्य, खास तौर पर कविता के ‘बेनाम बादशाह’ होते। मदिरातिरेक ने उनकी असामान्य रूप से अच्छी काव्य प्रतिभा, साहित्य-विवेक और लेखन-ऊर्जा को बहुत जल्दी निगल लिया और अंततः वह डीडवाना के सरकारी कॉलेज के एक हिन्दी प्राध्यापक भर हो कर रह गए। ‘लहर’ के सितम्बर 1970 अंक में प्रकाशित कविता ‘कहीं कुछ हो गया है’ और मार्च 1972 के अंक में प्रकाशित मूल राजस्थानी कविता- ‘म्हारा बाप’ (जिन दोनों ही का हिन्दी तर्जुमा भी प्रकाश जैन ने साथ छापा) जैसी कविताएं राजस्थानी की आधुनिक कविताओं के लिए आज भी एक मानक हैं और तेज सिंह जोधा अपनी बस इन्हीं दो कविताओं के दम पर बहुत से राजस्थानी कवियों को काव्य-लेखन की ‘कोचिंग क्लास’ चला कर एडमिशन दे सकते हैं... आगे का हिस्सा थोड़ा और रोचक है। ‘क्रोंच’ को अगर अगले कुछ अंकों के लिए छापने की सामग्री अयाचित रूप से मिल गयी वहीं ‘जोशीजी एन्ड पार्टी’ को लगा- जयपुर से हिंदी कविता को युवा-कविता का एक नया आन्दोलन तक भी दिया जा सकता है।

तब के कवियों की कविता के ‘मिजाज़’ को ध्यान रखते हुए बाकायदा एक नाम सोचा गया- ‘क्रुद्ध कविता’ आंदोलन। इस से पहले भी हिंदी कविता ने पचासों आंदोलन झेले थे और सब मशरूमी-आंदोलनों का हश्र सामने था, पर तारा प्रकाश जी ने बला की फुर्ती प्रदर्शित करते स्थानीय अख़बारों और पत्रिकाओं में ‘जोशीले’ लेख लिख-लिख कर इस नए आंदोलन को स्थापित करने में एड़ी चोटी का जोर लगा डाला।

साहित्य के बुखार का पारा अचानक बेतहाशा चढ़ा। मुद्राराक्षस, प्रकाश जैन और नागार्जुन जैसे साहित्यकार बाद की ऐसी ही युवा-कविता गोष्ठियों में शामिल हुए। आनन-फानन में कुछ अति-उत्साही युवतर दोस्तों ने तो अपनी लघु-पत्रिकाएँ तक निकाल डालीं। स्व. सुरेन्द्र भारतीय ने, जो साधुओं जैसी काली दाढ़ी-मूंछें बढाए सफ़ेद कुरते-पायजामे में बजाज नगर की मुख्य सड़क पर एक ‘मेडिकल स्टोर’ चलाया करते थे, ‘आयाम’ नामक लघु-पत्रिका गोविन्द माथुर और पुरुषोत्तम सैनी को साथ ले कर शुरू की, वहीं, डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के चिरंजीव मंजुल उपाध्याय ने ‘हम’ नामक पत्रिका। मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे नए छात्र-कवि राजा राकेश कैसे पीछे रहते ? लगे हाथों उन्होंने भी ‘नवचिंतन’ नाम की नई पत्रिका शुरू कर डाली। तभी जनसंपर्क विभाग में कार्यरत दढ़ियल कवि श्रीकांत ‘मंजुल’ को भी जोश आया और उन्होंने भी अपने सीमित संसाधनों के बावजूद ‘शरर’ शीर्षक से एक कविता-पत्रिका का बाकायदा संपादन आरम्भ कर दिया।

ताराप्रकाश जोशी जी ने ‘आयाम’ के प्रवेशांक में एक लेख लिखा – ‘क्रुद्ध कविता: एक आक्रामक शुरूआत’ जिसमें इन पंक्तियों के लेखक, राजा राकेश, किशन दाधीच, वसंत वसु, ओम सैनी, पुरुषोत्तम सैनी, वसुधाकर गोस्वामी, अशोक कुमार माथुर, गोविन्द माथुर आदि की कविताओं के अंश उद्धृत करते हुए ये स्थापित करने की कोशिश की गयी कि कैसे क्रुद्ध कविता आम आदमी की, सड़क की कविता है। ‘हम’ के अलावा इन सब के प्रवेशांक में इस लेखक की रचनाओं को भी सप्रेम छापा गया। स्व. तारा प्रकाश जोशी ने अपने आलेख का समापन इन पंक्तियों के साथ किया था – ‘मेरा यह विश्वास है कि अन्य साहित्यिक आंदोलनों से भिन्न भाव-भूमि पर स्थापित होने के कारण क्रुद्ध कविता का आंदोलन चिरंजीवी होगा और जनता को यातना-शिविरों से मुक्ति दिलाने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका दिलवाएगा।’

बस दो-चार महीने ही चल पाया यह तथाकथित कविता आंदोलन दूध के उफान की तरह उभरा और एक कुकुरमुत्ते की तरह मुरझा गया पर जयपुर के साहित्य परिदृश्य में तब 1970 –’71 के सालों में इस कारण जो अभूतपूर्व खलबली मची वैसा बाद के सालों में बहुत कम देखने को आया।

तेजसिंह जोधा जोधपुर से साप्ताहिक ‘शुद्ध’ का और सिर्फ राजस्थानी कविता पर एकाग्र पत्रिका ‘ राजस्थानी’ का अनियमित सा संपादन करते शीत-समाधि में चले गए, उदयपुर में सेवारत किशन दाधीच गीत-सरता में लहरें गिनने लगे और फिर पत्रिकाओं को छोड़ कर कवि-सम्मेलनों के मंच तक रह गए... बस गोविन्द माथुर, और इन पंक्तियों का लेखक कविता-लेखन में अंत तक बचे रहे हैं । हमारे बाद अवतरित कवियों के लेखन की चर्चा फिर कभी! ये कहना सही नहीं कि प्रकाश जी ‘डिक्टेटर’ संपादक थे – मेरी राय में वह बस रचना देखते थे- रचनाकार को नहीं- जैसा पहले भी हम लिख आये हैं।

‘लहर’ और प्रकाश जैन के बहाने माणकजी के आदेश पर मेरे मन में उन दिनों का जैसा चित्र आया- ‘मांड’ दिया है- ये अच्छा है या बुरा, मुझे पता नहीं, न मुझे इस घसीट-लेख पर प्रतिक्रियाओं की परवाह ही है , पर मेरे प्रिय लेखक नन्द चतुर्वेदी मुझ से हर बार एक ही बात कहते थे- ‘हमें अपने समकालीनों पर भी बराबर लिखना ही चाहिए, हेमंत’... और वही मैंने ईमानदारी से इस लेख में भी किया है-... नन्द बाबू- आप इसे ‘वहां’ बैठे पढ़ तो रहे हैं न?

हेमन्त शेष
प्रख्यात कवि और लेखक
501, 'हेवेन्स टैरेस', 6-डी इंजीनियर्स कॉलोनी, स्वर्ण-पथ साउथ, मानसरोवर, जयपुर 302020

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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