शोध आलेख : श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में आज़ाद भारत का यथार्थ / देवेन्द्र सिंह सोलंकी एवं रामकृष्ण शर्मा

श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में आज़ाद भारत का यथार्थ
- देवेन्द्र सिंह सोलंकी एवं रामकृष्ण शर्मा

शोध सार : श्रीलाल शुक्ल का साहित्य भारतीय साहित्येतिहास में ऐसा अप्रतिम सृजन है, जिसे हिन्दी साहित्य की परम्परा में एक विशिष्ट और चमत्कारपूर्ण घटना के रूप में स्वीकार किया जाता है। आज उनका साहित्य वैश्विक साहित्यिक मंच पर व्यापक विमर्श का विषय बना हुआ है। इसी वर्ष पूरे विश्व में श्रीलाल शुक्ल का जन्म शताब्दी वर्ष भी मनाया जा रहा है। यह हर्ष का विषय है कि शुक्ल जी के जन्म के सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी उनके साहित्य की चमक दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। उनका साहित्य हमें उनकी जीवंतता का अनुभव करवाता है। शुक्ल जी ने व्यंग्य को अपने लेखन का आधार स्तंभ बनाया। व्यंग्य के द्वारा भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता को समाज के सामने लाना साहित्य में एक नवीन विधा मानी गई। व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिससे बात को एक रोचक एवं प्रभावी ढंग से कहा जाता है। आजादी के बाद देश में जो विपरीत परिवर्तन एवं विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हुई उनसे दुःखी होकर श्रीलाल शुक्ल ने अपनी कलम देश सेवा के लिए उठाई। चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोल-बाला था। सरकारी तंत्र और राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर अपने पथ से पथभ्रष्ट हो रहे थे। जनता की सुध लेने वालों की संख्या बहुत कम थी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों के मध्य शुक्ल जी का प्रादुर्भाव एक चमत्कारिक घटना मानी जा सकती है। ऐसे महापुरुष की जन्म शताब्दी मनाएं जाना अपने आप में एक गौरव का पल है। इसी बात को मस्तिष्क में रखते हुए ‘श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में स्वतंत्र भारत का यथार्थ चित्रण : एक विवेचन’ विषय पर एक शोध आलेख लिखने की इच्छा जागृत हुई।

बीज शब्द : स्वतंत्र भारत का यथार्थ, सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति, भ्रष्टाचार का बोलबाला, ग्रामीण जीवन की विसंगतियाँ, सत्ता की उदासीनता, भ्रष्ट नौकरशाही व्यवस्था, राजनीति का गढ़ बनती शैक्षणिक संस्थाएं, नैतिक मूल्यों का ह्रास।

मूल आलेख : हिन्दी साहित्य में श्रीलाल शुक्ल का नाम व्यंग्यात्मक दृष्टि से सामाजिक और राजनीतिक विडम्बनाओं को उजागर करने वाले उपन्यासकारों में अग्रगण्य माना जाता है। उनके साहित्य का केन्द्र बिन्दु स्वतंत्रता-प्राप्त भारत का वह चेहरा है, जिसमें आज़ादी के बाद के आदर्श और यथार्थ के बीच गहरी खाई दिखाई देती है। शुक्ल जी ने अपनी पैनी दृष्टि से ग्रामीण समाज, नौकरशाही, राजनीति और शिक्षा जगत की वास्तविकताओं को जिस साहस और निर्भीकता से प्रस्तुत किया, वह हिन्दी उपन्यास परम्परा में एक विशेष स्थान रखता है। शुक्ल जी का साहित्य जगत में प्रसिद्धि प्राप्त करना अपने आप में एक विलक्षण घटना है। जिस प्रकार ‘रघुवंश का प्रादुर्भाव सूर्य से हुआ’, ‘समुद्र का प्रादुर्भाव लहर से हुआ’ उसी प्रकार हम कह सकते है कि शुक्ल जी का प्रादुर्भाव आजाद भारत में उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों से हुआ। जिनके साहित्यिक लेखन से संपूर्ण भारत वर्ष को देश की तात्कालिक स्थितियों को समझने में सहायता मिली।

आजाद भारत की स्थिति एवं श्रीलाल शुक्ल :

स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने लोकतंत्र, समाजवाद और समानता जैसे आदर्शों के सहारे एक नए युग में प्रवेश किया था, किन्तु यह आदर्शवाद जल्द ही व्यावहारिक धरातल पर अति कमजोर पड़ता दिखाई दिया। स्वतंत्रता की इस नवीन प्रक्रिया का जो सबसे कड़वा और तीव्र व्यंग्यात्मक चित्रण साहित्य में देखने को मिलता है, वह शुक्ल जी के साहित्य संसार में विशेष रूप से बहुतायत में उपस्थित दिखाई देता है। उनका सर्वाधिक चर्चित उपन्यास ‘राग दरबारी’ न केवल भारत के ग्राम्य जीवन की सामाजिक विडंबनाओं को दीप्तिमान करता है, बल्कि स्वतंत्रता के बाद की भ्रष्ट राजनीतिक की सड़ांध, बौद्धिक ढोंग तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचार की भी गहनता से जांच-पड़ताल करता है।

“चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोल-बाला था...” — यह पंक्ति शुक्ल जी के साहित्यिक योगदान के यथार्थ का सार है। ‘राग दरबारी’ उपन्यास में शुक्ल जी ने शिवपालगंज नामक एक काल्पनिक ग्राम की पृष्ठभूमि लेकर एक ऐसे तंत्र की रचना की है जहाँ सत्ता के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और पंचायत जैसी सभी संस्थाएँ भ्रष्टाचार की गिरफ्त में जकड़ी हुई है। शिवपालगंज में आदर्शों की बातें सिर्फ इसलिए की जाती हैं, ताकि उनका प्रयोग केवल सत्ता को वैध ठहराने के लिए किया जा सके।

सिर्फ राग दरबारी ही नहीं अपितु श्रीलाल शुक्ल के अन्य उपन्यास यथा ‘बिस्रामपुर का संत’, ‘मकान’, ‘आदमी का जहर’, ‘सीमाएं टूटती है’ ‘सूनी घाटी का सूरज’ और ‘अज्ञातवास’ में भी स्वतंत्र भारत में उत्पन्न हुई उन तमाम स्थितियों का चित्रण किया गया है, जिनसे अभी तक साहित्य अनछुआ रहा है।

श्रीलाल शुक्ल ने व्यंग्य को केवल मनोरंजन तक सीमित न करते हुए इसे यथार्थ को उद्घाटित करने का सशक्त माध्यम बनाया। शुक्ल जी का व्यंग्य करुणा और संवेदना से जुड़कर मानव ह्रदय तक पहुंचता है। समाज की बुनियादी समस्याओं तथा राजनीतिक एवं सरकारी तंत्र की कमजोरियों को उजागर करते हुए उन पर गहरी चोट करता है। इनके व्यंग्य लेखन के संबंध में कैलास नाथ यादव कहते है कि “श्रीलाल शुक्ल जी हिंदी के उन अप्रतिम व्यंग्य शिल्पियों में से एक है, जिनके समूचे लेखन में व्यंग्यात्मकता धड़कन की तरह मौजूद है। उनकी रचनात्मकता अमोघ थी, जैसे प्रकृति प्रदत्त हो, साथ ही उनमें अपने लक्ष्य से विचलित न होते हुए पूरी ईमानदारी से एक सार्थक लेखन करते रहने की अपूर्व क्षमता थी।”1

श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य को एक विधा के रूप में नहीं मानते। किसी साक्षात्कार में उनके व्यंग्य के ऊपर पुछे गए प्रश्न “समकालीन व्यंग्य-लेखन के विषय में आपकी राय ?”2 के प्रत्युत्तर में वे कहते हैं कि “व्यंग्य को लेकर विधा जैसी कोई तथाकथित धारणा हो तो उसे हटाकर मैं अपनी बात कहूँगा। जब शब्द अपना अर्थ खो रहे हैं, तब अभिधा में बात कहने की तुलना में व्यंग्य का प्रयोग ज़्यादा सार्थक व प्रभावी होगा।”3

सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति :

श्रीलाल शुक्ल का व्यंग्य-संग्रहों एवं उनके उपन्यासों में किसी एक व्यक्ति, विचार या घटना पर केंद्रित न होकर, पूरे तंत्र की विफलता और मानसिकता की विकृति, राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक असमानता आदि पर केंद्रित है। शुक्ल जी ने इन सभी पर करारा प्रहार किया है। इनके सामाजिक एवं राजनीतिक यथार्थ पर किए गए व्यंग्यों का अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि - “हमारा समाज इतना सुगठित है कि ईमानदार आदमी टिक ही नहीं सकता।” इस कथन में उस विडंबना की ओर संकेत मिलता है जहाँ नैतिकता को कमज़ोरी और चालाकी को सफलता की कुंजी समझा जाने लगता है।

श्रीलाल शुक्ल के ‘मकान’ उपन्यास का नारायण लम्बी अवधि तक मकान प्राप्त करने के लिए भटकता है। नारायण एक नौकरीपेशा वर्ग में आता है एवं इस वर्ग से संबंध रखने वाले लोगों के लिए मकान की समस्या आम बात होती है। किन्तु नारायण को प्रशासन द्वारा मकान के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर किया जाता है। नारायण न सिर्फ एक क्लर्क है वरन् एक उच्च श्रेणी का कलाकार हैं। नारायण समाज में एक प्रसिद्ध सितारवादक के रूप में अपनी पहचान स्थापित करता है। उसके बावजूद उसका शारीरिक एवं मानसिक शोषण किया जाता है। देश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी घर कर चुकी हैं कि एक ईमानदार आदमी की बात कोई सुनने के लिए तैयार नहीं है। एक मकान की चाह न सिर्फ नारायण को परेशान करते हैं बल्कि उसके संपूर्ण जीवन को ही तहस-नहस कर देती है। नारायण बड़े दयनीय भाव से अफसरों के सामने गिड़गिड़ाता है – “सर, चार-पाँच महीने हो गए हैं। नए-नए लोगों को निगम के मकान एलॉट होते चले जा रहे हैं, पर मुझे अभी तक कोई मकान नहीं मिला है।”4

यह स्थिति आज के भारत की दुर्दशा का प्रतीक है। जहां ईमानदार आदमी को भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है और उसके बाद भी उसे न्याय नहीं मिल पाता। भ्रष्टाचार इस हद तक हावी है कि स्वतंत्र भारत में रहते हुए भी स्थितियां पराधीनता जैसी बनी हुई है। गरीबों और किसानों के नाम पर ईमानदारी की ओट लेकर भ्रष्टाचार किए जाते हैं और गरीब बेचारा इनकी राजनीति को समझ ही नहीं पाता। श्रीलाल शुक्ल ‘मकान’ उपन्यास के माध्यम से प्लॉटों एवं मकानों के वितरण पर होने वाले भ्रष्टाचार को कुछ इस प्रकार से उजागर करते हैं, वे कहते हैं कि “इन शहराती बस्तियों के बनने का भी एक तरीक़ा है। पहले खेतिहरों से उनकी जमीन ली जाती है, नगर के प्रसार का कागभगोड़ा खड़ा कर के उन्हें भगा दिया जाता है। फिर वह जमीन किसी नगर या परिषद या सोसायटी के हत्थे चढ़ती है। तब उसके टुकड़े करके उसे बाँटा जाता है और घूम-फिरकर सभी प्लॉट साहब बीबी-गुलाम के हाथ में आ जाते हैं। फिर बैंकों से या जीवन-बीमा निगम से या इधर-उधर से किसी-न-किसी तरह मकान बनाने के लिए क़र्ज़ लिया जाता है। इस तरह चतुर लोग दूसरे की जमीन पर दूसरे के पैसे से अपना मकान बनवाते हैं।”5

राग दरबारी में वैद्य जी एक ऐसे अवसरवादी नेताओं के प्रतीक हैं जो जनता की सेवा-शुश्रूषा के नाम पर अपनी शक्ति, धन-संपदा और अपना वर्चस्व बढ़ाने में लगे रहते हैं। हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्र निर्माण की प्रमुख आधार-शिला माना जाता है, जिसे वैद्य जी ने शिवपालगंज में केवल दिखावे मात्र की एवं राजनीति की संस्था बनाकर रख दिया है। वहां केवल डिग्रियाँ वितरित की जा रही हैं। ज्ञान और नैतिकता से किसी का कोई वास्ता नहीं। राजनीतिक दल और उनके स्थानीय प्रतिनिधि सभी अपने स्वार्थ सिद्धि में व्यस्त है। चारों तरफ शिष्टाचार का अभाव एवं भ्रष्टाचार का बोल-बाला है।

भारतीय संविधान हमारे लोकतंत्र की आत्मा है। इसमें समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के जो आदर्श निहित हैं, वे एक नये भारत के निर्माण की दिशा तय करते हैं। संविधान ने जनता को यह विश्वास दिलाया कि अब सत्ता का स्रोत वही है और उसके अधिकार किसी भी प्रकार से छीने नहीं जा सकते। यह संविधान केवल शासन की रूपरेखा नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का ऐसा संकल्प है, जो एक शोषण मुक्त और न्यायपूर्ण व्यवस्था का सपना दिखाता है। श्रीलाल शुक्ल संवैधानिक व्यवस्था एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था का सही क्रियान्वयन नहीं हो पाने से उसका भविष्य अंधकारमय बताते हैं। वे कहते हैं कि “भारतवर्ष में अराजकता और अस्तव्यस्तता को शताब्दियों तक झेलने की असाधारण क्षमता रही है। उसी आधार पर आप कह सकते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य वही है जो उसका वर्तमान है।”6

न सिर्फ ‘राग दरबारी’ अपितु ‘बिस्रामपुर का संत’ और ‘मकान’ उपन्यास में भी शुक्ल जी ने बड़े ही व्यंग्यात्मक ढंग से भारतीय लोकतंत्र, ग्राम्य-जीवन, शिक्षा-प्रणाली, राजनीति और नौकरशाही की विडंबनाओं को उजागर किया है। यह उद्धरण उसी उपन्यास की उस गहन दृष्टि का हिस्सा है, जिसमें वे लोकतंत्र के आदर्श और उसकी वास्तविकता के बीच की खाई को रेखांकित करते हैं।

ग्रामीण जीवन और सामाजिक विडम्बनाएँ :

आजाद भारत में विभिन्न उपन्यासकार प्रकाश में आए जिनमें श्रीलाल शुक्ल भी अपना विशेष स्थान रखते हैं। इन्होंने ग्रामीण और शहरी दोनों जगह अपना जीवन जिया है, इसलिए इन्हें दोनों परिवेश का अनुभव है। “एक जागरूक साहित्यकार अपने समाज में व्याप्त विसंगतियों, विडम्बनाओं, परम्पराओं, संस्कृति आदि का साक्षी होता है, और उन्हीं में से अपने रचना कर्म के लिए कथ्य चुनता है।”7 श्रीलाल शुक्ल में इन सभी स्थितियों का स्वानुभव मौजूद था। जिससे वे समाज में व्याप्त विसंगतियों पर तीखा प्रहार कर पाएं हैं। इनके लेखन और जीवन के बारे अखिलेश कहते हैं कि “श्रीलाल शुक्ल लेखन और जीवन दोनों में ही विलक्षण हैं। उनकी विलक्षणता का उत्स क्या है ? शायद 'परस्पर विरुद्धों का खूबसूरत उपयोग'। यह श्रीलाल शुक्ल ही हैं जिनमें एक धुर ग्रामीण और आधुनिक शहरी एक साथ उपस्थित हैं। उनकी ज्यादातर रचनाओं में दोनों जीवन-दृष्टियों का सहमेल दिखाई देता है। इसीलिए उनका लेखन ग्रामीण यथार्थ को लेकर रोमान, करुणा और हाय-हाय से मुक्त है तो शहरी जीवन के अजनबीपन, बोरियत और आत्मदया जैसे नुस्खों से भी सुरक्षित है।”8

शुक्ल जी के उपन्यासों में ग्रामीण समाज एवं ग्रामीण जनता की वास्तविक एवं सरल-सहज तस्वीर उभरकर प्रस्फुटित होती है। वहीं राजनीतिक दलों एवं सत्ताधारी लोगों की चालबाजियां एवं शोषण का दोहरा चरित्र भी दिखाई देता है। चाहे वह राग दरबारी में चित्रित वह शिक्षण संस्थान हो या कॉलेज की मैनेजमेंट कमेटी हो। पंचायत व्यवस्था हो या सामाजिक सम्बन्ध। सभी भ्रष्टाचार एवं अवसरवादिता जैसे समझौते की गिरफ्त में दिखाई देते हैं। आज यह भारतीय ग्रामीण जीवन एवं सामाजिक व्यवस्था की विडंबना ही कही जाएगी कि आजादी के लगभग अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी स्थितियां आज भी जस की तस बनी हुई है इनमें आज भी कोई आमूल-चूल परिवर्तन दिखाई नहीं देता। ‘राग दरबारी’ की तरह आज भी गांवों की सामाजिक स्थितियां बहुत ही विचारणीय योग्य है।

‘सूनी घाटी का सूरज’ उपन्यास का रामदास एक गरीब युवक है। जो अध्ययन में प्रतिभावान होते हुए भी शिक्षण व्यवस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण कुछ कर नहीं पाता। वह समाज के प्रतिष्ठित लोगों एवं शिक्षा के ठेकेदारों के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो जाता है। आज ‘रामदास’ जैसे न जाने कितने ही नौजवान होंगे जो भ्रष्ट व्यवस्था के कारण आगे नहीं बढ़ पाते। सामाजिक विसंगतियों के कारण रामदास के पिता अपनी पुत्रियों के विवाह के लिए कर्ज लेते हैं जिसे पूरा नहीं कर पाते और उस कर्ज का भार रामदास पर पड़ता है। वह जीवन भर मेहनत करने के बावजूद कुछ कर नहीं पाता और अंत में समाज के धोखे, गरीबी एवं शोषण से त्रस्त आकर रामदास अध्यापकीय कार्य करवाने के लिए मजबूर हो जाता है। रामदास का मित्र रामानुज रामदास से कहता है कि “समझ लो, रामदास, इस रोग-शोक जर्जर प्रांत में 135 रु. मासिक पर मास्टरी करने के लिए तुम्हीं जैसों को आना पड़ता है। आरंभ से ही जो व्यवस्था तुम्हारे मार्ग में बाधाओं को खींच खींचकर लाती रही, वही अब तुम्हें इन बाधाओं के देश में खींचे लिए जा रही है। तुम देख नहीं रहे हो, यहाँ आकर, ख्याति और उन्नति की सब आकांक्षाओं का गला घोंटकर अपने को जीवन्मृत बनाने के लिए तुम्हीं क्यों चुने गए हो?”9

इस प्रकार गांव की स्थितियों को बयां करने वाले उपन्यासों में ‘सूनी घाटी का सूरज’ और ‘राग दरबारी’ उपन्यास इसके सशक्त उदाहरण पेश करते हैं। जिनमें स्वतंत्र भारत के ग्रामीण समाज की संरचना का विडम्बनापूर्ण चित्रण मिलता है। जहां इंसानियत का कोई मूल्य नहीं है। साहित्यकार पुष्पपाल सिंह इन दोनों की तुलना करते हुए कहते हैं कि “‘राग दरबारी' स्वातंत्र्योत्तर भारत का ग्रामीण समाज प्रस्तुत करती है, तो यह कृति (सूनी घाटी का सूरज) आजादी से कुछ समय पहले का ग्रामीण परिदृश्य प्रस्तुत करती है।”10

राजनीति और सत्ता संरचना की आलोचना :

श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में राजनीति के साथ-साथ सत्ता संरचना की भी तीखी आलोचना देखी जाती है। वे अपने अनुभवों को व्यंग्य के माध्यम से उजागर करते हैं। स्वतंत्रता के बाद भी जब जनता के हितों को अनदेखा किया जाता है तो शुक्ल जी इससे बहुत अधीर होते हैं। उनका मानना है कि नेता समाज और राष्ट्र के हित की बात तो करते हैं, किन्तु उनकी प्राथमिकता में केवल व्यक्तिगत लाभ एवं दलगत विचार ही सीमित रहते है। वर्तमान राजनीति चुनाव पर आधारित होती है जिनमें वंशवाद, जातिगत समीकरण और संकीर्ण व्यक्तिवादी हितों का बोल-बाला रहता है, जिसके कारण वर्तमान भारतीय लोकतंत्र केवल औपचारिकतापूर्ण या दिखावे में सिमट कर रह गया है।

शुक्ल जी के अनुसार लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण केवल नेताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र, स्थानीय सत्ता संरचनाएँ तथा पंचायत संस्थाएं भी इस मूल्यहीनता का हिस्सा बन चुकी हैं। जिससे देश में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद तथा अवसरवादिता आदि स्थितियों ने जन्म लिया है। जिसने भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को ही कमजोर बना दिया है। यही कारण है कि शुक्ल जी के व्यंग्य साहित्य में राजनीति का चेहरा झूठे वादों, खोखली घोषणाओं, दिशाहीन योजनाओं तथा शोषणकारी प्रवृत्तियों आदि के रूप में बार-बार उभरता है।

वर्तमान में राजनेता भी अपने जीवन में दोहरा चरित्र लेकर घूमते हैं। वह अपने वास्तविक जीवन में बनावटी चोला पहनकर जनता को गुमराह करते हैं। ‘बिस्रामपुर का संत’ उपन्यास में शुक्ल जी कुंवर जयंती प्रसाद सिंह जो कि राज्यपाल के पद पर आसीन हैं, के दोहरे रवैए एवं असलियत को कुछ इस प्रकार से चित्रित करते हैं। “सपने में वे यकीनन अस्सी साल के नहीं थे। उम्र के बारे में कुछ भी तय नहीं था; पर शायद वे पचीस-छब्बीस साल पहले वाले कुँवर जयंती प्रसाद सिंह थे। आज के सपने में वह उनकी बाँहों में नहीं थी; वे खुद उसकी बाँहों में थे। पर तय नहीं था कि वह कौन थी? वह शायद सुंदरी थी; पर जयश्री भी हो सकती थी। जो भी हो, उसकी सुडौल चिकनी देह सिर से पाँव तक उनके अंग-अंग को पिघला रही थी।”11 ये पंक्तियां नेताओं की नग्नता को साबित करती है। सत्ता हाथ में आने के बाद अधिकांश लोग अपने पद का दुरुपयोग करते हैं तथा जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं।

राजनीति का प्रभाव हर क्षेत्र पर पड़ता है। चाहे वह कोई व्यक्ति हो या चाहे कोई संस्थाएं। इनके अलावा मीडिया पर भी राजनीति का पूर्ण प्रभाव देखा जा सकता है। मीडिया में भी उसी की खबरें प्रकाशित होती हैं जो सत्ता में हो। पैसों के दम पर मीडिया को खरीद लिया जाता है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया पर राजनीति का पूर्ण हस्तक्षेप होने लग जाएं तो देश की उन्नति कैसे हो सकेगी? यह एक विचारणीय बिन्दु है।

‘आदमी का जहर’ उपन्यास में अजीत सिंह साप्ताहिक पत्रिका ‘जनक्रांति’ के माध्यम से लोगों से रुपए ऐंठता है। इस पत्रिका की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए श्रीलाल शुक्ल कहते हैं कि “साप्ताहिक जनक्रांति दरअसल राजनीति के सभी नेता, ऊँचे अफसर और व्यापारी पढ़ते थे। इस पर्चे का जनक्रांति से कोई सम्बन्ध नहीं था। इसमें शहर की सिर्फ सनसनी खेज खबरें छपती थी और प्रायः ऐसा होता था कि एक सप्ताह में जिसके खिलाफ कोई अपमानजनक खबर छपती, फिर उसी के बारे में दो-तीन सप्ताह बाद कोई बहुत अच्छी खबर छप जाती थी।"12 आज लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया को भी अपनी भूमिका देश सेवा एवं देश हित में निभाने की जरूरत है तभी राष्ट्र निर्माण हो सकेगा।

नौकरशाही व्यवस्था की विफलता :

शुक्ल जी स्वयं नौकरशाही व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। प्रशासनिक सेवा में नौकरी करते हुए उन्हें यह महसूस हुआ कि नौकरशाही वर्ग में चारों तरफ भ्रष्टाचार का बोल-बोला है। स्वतंत्रता के बाद लोगों ने देश के हालात सुधरने के सपने देखे थे तथा भारतीय नौकरशाही से भी ये आशा थी कि वह विकास की आधारशिला बनेगी, किन्तु श्रीलाल शुक्ल ने नौकरशाही को भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का गढ़ बताया है। शुक्ल जी को यह महसूस हुआ कि सरकार द्वारा बनाई गई सरकारी योजनाएँ आमजन तक पहुँचने से पूर्व ही अधिकारियों एवं नेताओं के स्वार्थ की भेंट चढ़ जाती हैं। अतः उन्होंने अपनी नौकरी के दौरान प्राप्त हुए अनुभवों को अपनी लेखनी द्वारा समाज के सामने लाने का कार्य किया।

वर्तमान समय में राजनीति का जाल इतना बढ़ गया है कि सम्पूर्ण प्रशासनिक तंत्र इसकी जकड़ में आ चुका है। राजनीतिक स्वार्थ तथा पक्ष-विपक्ष के दलगत हितों ने सभी प्रशासनिक संस्थाओं की निष्पक्षता को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप नौकरशाही व्यवस्था, जो कभी शासन तंत्र की रीढ़ मानी जाती थी, वह अब पूर्णतः राजनीतिक दबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप के अधीन जान पड़ती है। सत्ता प्राप्त करने और लगातार सत्ता में बने रहने के लिए राजनेता नौकरशाही को अपनी सुविधा अनुसार ढालने एवं उनका उपयोग करने का प्रयास करते हैं। राग दरबारी में शिवपालगंज के छंगामल कॉलेज के भी यही हाल है। जहां वैद्य जी मैनजमेंट कमेटी में है और उनकी इच्छा के बिना कोई काम नहीं होता है। कॉलेज के प्रिंसिपल और कुछ मास्टर वैद्य जी के इशारे पर ही चलते हैं। कॉलेज के छात्र नेता रूप्पन बाबू राजनीति से तंग आकर रंगनाथ से कहते हैं कि - "तुम इस कॉलेज का हाल नहीं जानते। लुच्चों और शोहदों का अड्डा है। मास्टर पढ़ाना-लिखाना छोड़कर सिर्फ पोलिटिक्स भिड़ाते हैं।”13 इस प्रकार की राजनीतिक गतिविधियां आज भी हमारे देश में सरकारी महकमों में देखी जा सकती है। शुक्ल जी ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली में हो रहे राजनीतिक हस्तक्षेप पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि “वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।”14

वहीं ‘पहला पड़ाव’ उपन्यास की स्थिति का जिक्र करते हुए परमानंद श्रीवास्तव बताते हैं कि “‘पहला पड़ाव’ का पाठक सत्ते के बहाने ही उस अंधेरी दुनिया से परिचित होता है, जो अपराधों की दुनिया है। भ्रष्ट नौकरशाही, निर्माण निगम, इंजीनियर, ठेकेदार सब इसी दुनिया के हिस्से हैं। अपराधों की यह दुनिया भारतीय रेलों में अकड़ से चलने वाले डेली पैसेन्जरों तक फैली है जहां बेरोजगार शिक्षित युवक अपराध तंत्र की दीक्षा ग्रहण करते हैं। विकास प्रगति के व्यक्तिगत सार्वजनिक उपक्रमों तक उसका ही विस्तार है। वहीं बीसवीं शताब्दी का सच है।”15

उपन्यास ‘अज्ञातवास’ में भी उपन्यास का मुख्य पात्र रजनीकांत जो कि सिंचाई विभाग में सुपरिटेंडेंट इंजीनियर हैं और पद प्राप्ति के बाद वह पद का दुरुपयोग करता है। पद के दुरुपयोग के साथ ही जैसे-जैसे धनवान बनता है उसकी चारित्रिक पतनशीलता बढ़ती जाती है। वह कई तरह के दुर्व्यसनों के गिरफ्त में आ जाता है।

उक्त घटनाओं के कारण सरकारी सेवाओं में व्यावसायिक निष्ठा और तटस्थता कमजोर हुई है। सरकारी सेवा के प्रति लोगों का अविश्वास दिखाई देता है। नौकरशाही व्यवस्था के लोग अपने मूलभूत कार्य से भटककर नेताओं के कामकाजों को प्राथमिकता देने लगे है। इस प्रकार प्रशासनिक व्यवस्था का राजनीतिकरण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

आजादी के स्वप्न और टूटन की पीड़ा :

स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय समाज ने जिन आदर्शों और अपेक्षाओं के साथ आज़ादी के स्वप्न देखे थे, वे स्वप्न समानता, न्याय, ईमानदार शासन और जनकल्याण से जुड़े हुए थे। किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का यथार्थ इन उम्मीदों से काफी भिन्न सिद्ध हुए। इसी स्वप्न-भंग की पीड़ा को श्रीलाल शुक्ल ने अपने साहित्य का केन्द्रीय विषय चुना।

श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं, विशेषतः राग दरबारी, सूनी घाटी का सूरज, बिस्रामपुर का संत और मकान उपन्यासों में स्वतंत्रता के बाद के भारत की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक विडंबनाओं के तीखे व्यंग्य उभरकर सामने आते हैं। उन्होंने दिखाया कि आज़ादी के बाद सत्ता जनसेवा का माध्यम बनने की जगह स्वार्थ, भ्रष्टाचार और अवसरवाद का उपकरण बन गई। जिन संस्थाओं से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की अपेक्षा की जा रही थी, वे ही संस्थाएँ आमजन के शोषण का कारण बन गईं। उनके साहित्य में स्वतंत्रता के स्वप्न का टूटना केवल राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक स्तर पर भी दिखाई देता है। गाँव, जो कभी भारतीय संस्कृति और सामूहिक एकता के प्रतीक हुआ करते थे, वहाँ भी जातिवाद, गुटबाजी और सत्ता लोलुपता हावी हो जाती है। शिक्षा, प्रशासन और पंचायत व्यवस्था—सब जगह आदर्शों के स्थान पर समझौते और स्वार्थ दिखाई देते हैं।

इस प्रकार श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में स्वातंत्र्योत्तर भारत की वास्तविकता उस पीड़ा के रूप में सामने आती है, जो टूटे हुए स्वप्नों से जन्म लेती है। उनका लेखन पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या स्वतंत्रता केवल सत्ता-परिवर्तन तक सीमित रह गई है। इसी कारण श्रीलाल शुक्ल स्वतंत्रता के स्वप्न और उसके विखंडन से उपजी पीड़ा के सबसे सशक्त साहित्यिक प्रवक्ता माने जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य की प्रासंगिकता :

वर्तमान संदर्भ में श्रीलाल शुक्ल का साहित्य अत्यंत प्रासंगिक, सार्थक और विचारोत्तेजक प्रतीत होता है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से जिस सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था, प्रशासनिक ढांचे, ग्रामीण जीवन और सत्ता-संरचना की विडंबनाओं को उजागर किया है, वे समस्याएँ आज भी लगभग उसी रूप में विद्यमान हैं।

श्रीलाल शुक्ल का साहित्य विशेष रूप से व्यंग्यात्मक यथार्थवाद पर आधारित है। उनका प्रसिद्ध उपन्यास राग दरबारी आज भी भारतीय लोकतंत्र, पंचायत व्यवस्था, नौकरशाही, शिक्षा-तंत्र और राजनीतिक अवसरवादिता का सजीव दस्तावेज माना जाता है। आज के समय में भी सत्ता का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, सिफारिशी संस्कृति और नैतिक मूल्यों का क्षरण उसी तीव्रता से देखने को मिलते हैं, जैसा शुक्ल ने दशकों पहले चित्रित कर दिया था। उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल आलोचना तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समाज की जड़ों तक पहुँचकर उसके विकृत स्वरूप को सामने रखती हैं। ग्रामीण भारत की जो तस्वीर उन्होंने प्रस्तुत की है, वह आज भी अनेक क्षेत्रों में यथार्थ के बहुत निकट है। शिक्षा, राजनीति और प्रशासन में व्याप्त खोखलापन आज के पाठक को भी आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है।

शुक्ल जी के साहित्यिक लेखन में जनता की निराशा, उदासीनता और सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर भी असमर्थता स्पष्ट रूप से सामने आती है। जनता जिन्हें चुनकर सत्ता में भेजती है, वे ही शोषक बन जाते हैं। जनता के इस शोषण को रोकने की न किसी में कोई इच्छा शेष रह जाती है, न ही कोई साधन। सरकारी तंत्र नियमों की आड़ लेकर अनियमितता को संस्थागत रूप दे देते हैं, तथा ‘फाइल चल रही हैं’ कहकर उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाते हैं। श्रीलाल शुक्ल का समग्र साहित्य इस बात को भली-भांति दर्शाता है कि स्वतंत्रता के बाद भी वास्तविक आजादी उस आम आदमी के स्तर तक नहीं पहुँची, जिसके नाम पर आंदोलन हुए थे। उनके व्यंग्य की धार इसी बात पर टिकी दिखाई देती है कि किस प्रकार आदर्शों की आड़ लेकर अनैतिकता को वैधानिक रूप दे दिया जाता है। किस प्रकार सत्ताधारी राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए योजनाएं बनाते हैं। ये सभी घटनाएं शुक्ल जी के साहित्य में अनेक बार देखने को मिलती है एवं इनके साहित्य की प्रासंगिकता को बनाएं रखने में महत्वपूर्ण साबित होती है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि श्रीलाल शुक्ल का साहित्य समय की सीमाओं को लाँघकर आज के समाज को समझने की दृष्टि प्रदान करता है। उनका लेखन न केवल तत्कालीन व्यवस्था की आलोचना है, बल्कि समकालीन जीवन की सच्चाइयों का आईना भी है। यही कारण है कि वर्तमान संदर्भ में भी श्रीलाल शुक्ल का साहित्य उतना ही प्रासंगिक, जीवंत और आवश्यक प्रतीत होता है जितना अपने समय में था।

निष्कर्ष : स्वतंत्रता-प्राप्त भारत का यथार्थ श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में आदर्श और वास्तविकता के टकराव के रूप में सामने आता है। उनका लेखन बताता है कि आज़ादी के बाद भी भारतीय समाज शोषण, भ्रष्टाचार, अवसरवाद और खोखली राजनीति से मुक्त नहीं हो पाया। आज़ादी के बाद के भारत की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में वे अपेक्षित परिवर्तन साकार नहीं हो सके, जिनकी रूपरेखा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान निर्धारित की गई थी। उनके व्यंग्यात्मक उपन्यास विशेषकर ‘राग दरबारी’ एवं ‘बिस्रामपुर का संत’ स्वतंत्र भारत की विडम्बनाओं का ऐसा आईना है, जिसमें समाज का असली चेहरा स्पष्ट रूप से चित्रित हुआ है। इस प्रकार ‘श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में स्वतंत्र भारत का यथार्थ चित्रण’ बड़ी ही बारीकी से देखा जा सकता है।

संदर्भ :
  1. कैलास नाथ यादव – International Journal of Scientific & Innovative Research Studies, पृष्ठ संख्या – 116
  2. श्रीलाल शुक्ल – मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, 2015, पृष्ठ संख्या – 25
  3. श्रीलाल शुक्ल – मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, 2015, पृष्ठ संख्या – 25
  4. श्रीलाल शुक्ल – मकान, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, जगतपुरी, दिल्ली, 2023 पृष्ठ संख्या – 22
  5. वही, पृष्ठ संख्या - 93
  6. श्रीलाल शुक्ल – राग दरबारी
  7. समय पत्रिका – 31 मई 2019
  8. अखिलेश (सं.) – श्रीलाल शुक्ल की दुनिया, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ संख्या – सम्पादकीय
  9. श्रीलाल शुक्ल – सूनी घाटी का सूरज, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. दरियागंज नई दिल्ली, 2022 (पहला छात्र संस्करण), पृष्ठ संख्या - 132
  10. अखिलेश (सं.) – श्रीलाल शुक्ल की दुनिया (सूनी घाटी का सूरज : प्रतिभा की दारुण अवमानना), राजकमल प्रकाशन, दरियागंज नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ संख्या – 193
  11. श्रीलाल शुक्ल – बिस्रामपुर का संत, राजकमल पेपरबैक्स, दरियागंज नई दिल्ली, 2023, पृष्ठ संख्या – 07
  12. श्रीलाल शुक्ल – आदमी का जहर, राजकमल पेपरबैक्स, दरियागंज नई दिल्ली, 1971 पृष्ठ संख्या – 24
  13. श्रीलाल शुक्ल – राग दरबारी
  14. श्रीलाल शुक्ल – राग दरबारी, पृष्ठ संख्या – 12
  15. अखिलेश (सं.) – श्रीलाल शुक्ल की दुनिया (श्रीलाल शुक्ल की दुनिया : लघुता के महागाथा), राजकमल प्रकाशन, दरियागंज नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ संख्या – 21
देवेन्द्र सिंह सोलंकी
शोधार्थी (हिन्दी) मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग, ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर

रामकृष्ण शर्मा
(शोध निर्देशक) मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग, ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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