शोध आलेख : शिवप्रसाद सिंह की कहानियाँ : महिलाओं की सामाजिक स्थिति / अंजली आनंद एवं शेफालिका शेखर

शिवप्रसाद सिंह की कहानियाँ : महिलाओं की सामाजिक स्थिति
- अंजली आनंद एवं शेफालिका शेखर

शोध सार : महिलाओं की सामाजिक स्थिति भारतीय समाज में असमानता के क्रूरतम रूप को दर्शाती है। वे जातिभेद, लिंगभेद, पितृसत्ता, अशिक्षा और आर्थिक अभाव के कारण बहुस्तरीय भेदभाव का सामना करती हैं। उनकी स्थिति में सुधार के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक समानता, लैंगिक समानता और राजनीतिक भागीदारी में समान अवसर सुनिश्चित कराने हेतु ठोस प्रयासों की आवश्यकता है। शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति काफी दर्दनाक और मर्माहत करने वाला है। वे इस पितृसत्तात्मक और जातिवादी समाज के आगे खुद को बेबस और बेसहारा महसूस करती हैं। अपने अधिकार और सम्मान के प्रति वे जागरूक हैं और लड़ना भी जानती हैं। मगर सदियों से चली आ रही इस सामाजिक व्यवस्था के जकड़न से खुद को अलग करने में असमर्थ हैं। वे इस व्यवस्था को बदलकर एक नया समाज बनाना चाहती हैं। मगर इस रूढ़िवादी व्यवस्था के आगे अंततः उन्हें झुकना पड़ता है। कुछ कहानियों में जहाँ समाज के लोग जागरूक और शिक्षित हैं, वहाँ पर कुंठित मानसिकता के लोगों की हार होती है और महिलाओं के सम्मान और अधिकार की रक्षा होती है। परन्तु महिलाओं के स्वतंत्र जीवन-संघर्ष की कल्पना की हार हमेशा होती है।

बीज शब्द : जातिभेद, लिंगभेद, जीवन-संघर्ष, पितृसत्ता, सामाजिक स्थिति, सामंती समाज, वर्ग-संघर्ष, कृषि-दास, बंधुवा मजदूर, शोषण, उत्पीड़न, कुंठित।

मूल आलेख : सामाजिक स्थिति आधुनिक समाज की एक बुनियादी अवधारणा है। सामाजिक स्थिति के अभाव में सामाजिक संरचना की कल्पना नहीं की जा सकती है। इस सम्बन्ध में जे.पी. सिंह लिखते हैं, “समाज में व्यक्तियों की स्थिति का निर्धारण सामाजिक नियमों के अनुसार होता है। स्थिति सामाजिक नियमों से अलग नहीं है। किसी व्यक्ति को समाज में कैसा आचरण करना है या किसी व्यक्ति का समाज में क्या अधिकार, कर्तव्य या उत्तरदायित्व हैं, इसका निर्धारण उस व्यक्ति की स्थिति से होता है।”1 शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति क्या है इसे जानने और समझने के लिए हम उनके 'अमृता' कहानी संग्रह में संकलित प्रमुख कहानियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे।

‘श्रृंखला’ कहानी में बिरजा और परगास काछी के प्रेम-सम्बन्ध को बिरजा के जाति वाले अपनी इज्जत से जोड़कर देखते हैं। बिरजा का सम्बन्ध राठौर जाति से है इसलिए आसपास के साठ गांवों के राठौर पंचायत करके आपस में निर्णय लेते हैं कि बिरजा और परगास की हत्या कर दी जाए। इस सम्बन्ध में कहानी का यह अंश देखिए, “यह पंचायत, सारा रहस्य जानकर इस नतीजे पर पहुँची है कि बिरजा और परगासी दोनों की हत्या कर दी जाये यह मेरा निर्णय नहीं प्रस्ताव है। इस पर हर आदमी बोल सकता है। पक्ष में भी और विपक्ष में भी। निर्णय राठौरों के यश को सुरक्षित रखने की ऐसी शिक्षा देना है कि रक्त दोष उत्पन्न करने वाले को बख्शा नहीं जाएगा।”2 उपर्युक्त निर्णय के बाद दोनों की हत्या कर दी जाती है। परन्तु राठौरों की जातीय हनक के कारण इस घटना को लेकर कहीं कोई जिक्र नहीं होता। इसी कहानी में आगे वर्णन मिलता है कि लालता सिंह का बेटा कभी संतान पैदा नहीं कर सकता है। फिर भी लालता सिंह की पतोहू रामदेवी उसके साथ रहती है। वह लालता के बेटे को छोड़कर दूसरी शादी नहीं करती है। जबकि यही समस्या अगर रामदेवी में होती तो लालता सिंह अपने बेटे का दूसरा विवाह आसानी से कर देते और हमारा समाज इसकी इजाजत भी दे देता। कोई उस महिला के बारे में नहीं सोचता कि उसके जीवन पर इसका क्या असर होगा। इस सम्बन्ध में कहानी का यह अंश देखिए- “रिपोर्ट में साफ लिखा है कि आपके बेटे में संतान उत्पन्न करने की क्षमता नहीं है। आपका विश्वास हो तो वैद्यों, झोला लेकर घूमने वाले उन धोखेबाजों से च्यवनप्राश आदि अवलेह खरीदिये जो जवानी वापस ले आने वाली दवाइयां बेचते हैं। मैं कुछ नहीं कर सकता।”3 इस तरह हम देखते हैं कि इस कहानी में महिलाओं को पितृसत्ता और जातीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है। बिरजा को अपने से तथाकथित छोटी जाति के पुरुष के साथ प्रेम करने की सजा दी जाती है और रामदेवी पितृसत्तात्मक समाज के भय के कारण लालता सिंह के बेटे के साथ जिन्दगी जीने को बेबस है।

‘काला जादू’ कहानी में विशालाक्षी माथुर से प्रेम करती है। परन्तु विशालाक्षी के घर वाले इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं है। यहाँ पर जातीय भेदभाव के साथ-साथ माथुर की आर्थिक स्थिति भी जिम्मेदार है। इस सम्बन्ध में कहानी का यह अंश देखिए, “माथुर कायस्थ होते हैं। तुम्हें बेटे अपनी जाति छिपाना नहीं चाहिए था। त्रिलोकी शहरी हो गया होगा, पर हम गंवई लोग एक विजातीय के साथ विशालाक्षी को जुआर-बाजरों के खेतों में लुका-छिपी का खेल खेलते देख नहीं सकते। ऐसा करो बेटे कि न तुम्हारा अपमान हो न हमारा, तुम भइया कल बस से बनारस चले जाओ क्योंकि तुम लोग जिसे बेकार का भार कहते हो, वह हमारी पगड़ी होती है। इज्जत की निशानी! हम उसे खुले आम नीलाम होते देख नहीं सकते।”4 खैर, विशालाक्षी माथुर से इतना प्रेम करती है कि वह घर वालों के निर्णय का विरोध करते हुए अपने घर से भागकर गर्ल्स होस्टल आ जाती है। होस्टल आकर अचानक विशालाक्षी को पता चलता है कि उसके होंठ पर कुष्ठ रोग के निशान सफ़ेद दाग उभर आये हैं। इस घटना के बाद माथुर जिस पर उसे खुद से ज्यादा भरोसा और विश्वास था। उससे नफ़रत करने लगता है। उसके परिवार के लोग उससे छुआछूत करने लगते हैं। इस सम्बन्ध में माथुर के ख़त का यह अंश देखिए- “नीच, कुलटा, कोढ़िन, तूने मुझे धोखा दिया। नीले रंग के वस्त्रों में लिपटी तुझ डायन से मेरी सोहबत शायद इसलिए हुई थी कि तू मेरे सारे शरीर को ऐसा बना डालेगी कि मैं सोते, बैठते केवल एक बात सुनूंगा, केवल एक दृश्य देखूंगा, केवल एक स्पर्श झेलूंगा कि मैंने लिपस्टिक में छिपाये गलित कुष्ठ भरे अधरों को चूमा है।”5 इस कहानी में भी विशालाक्षी को जातीय भेद और पितृसत्तात्मक समाज का दंश झेलना पड़ता है।

‘प्रमाण-पत्र’ कहानी उम्मी और सोमू की प्रेम कहानी है। इस कहानी में उम्मी पितृसत्ता और वर्गीय भेदभाव का शिकार हो जाती है। सोमू आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का लड़का है इसलिए उम्मी के परिवार वाले इस प्रेम सम्बन्ध के खिलाफ हैं। उम्मी परिवार से बगावत करके सोमू के पास नहीं आ सकती है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज इसकी इजाज़त नहीं देता है। कहानी के अंत में ब्रेन हैमरेज से उम्मी की मौत हो जाती है। इस संदर्भ में कहानी का यह अंश देखिए- “तुमने यह जानते हुए कि उसे तुम्हारी और तुमसे जुड़े लोगों की सोहबत से नफ़रत थी, तुमने जबर्दस्ती उसे अपने घमंड की रस्सी से बांधा। काल-कोठरी में बंद करके तुमने उसे अनेक बार सताया। उसकी सही ख्वाहिश को हमेशा कुचला। उसे अपनी सोसाइटी के सामने शो रूम की गुड़िया की तरह पेश करते रहे। लो यह है टोटल ब्रेन हैमरेज। सारी आँख खून से भरी है। बस सिर्फ पांच मिनट पहले इस वहशी दुनिया को छोड़ कर वह चली गयी। तुम निहायत बर्बर हो। राक्षस हो, आदमखोर हो। तुमसे बात करना इन्सानियत की तौहीन है!”6

‘अमृता’ कहानी एक वृद्ध और बीमार विधवा महिला की कथा है। इस कहानी में अमृता का बेटा निमाई उसे सुधामयी नामक नौकरानी के भरोसे छोड़कर जहाँ नौकरी करता है वहीं पत्नी के साथ रहता है। ठाकुर अमृता को लेकर काफी चिंतित हैं। वह उसके पति का मित्र और उसका प्रेमी है। वह बीमार और वृद्ध अमृता से मिलने बनारस से कलकत्ता चला जाता है। परन्तु उसका बेटा निमाई उसी शहर में रहकर भी अपनी माँ के लिए समय नहीं निकाल पाता है। कहानी में ठाकुर और निमाई के बीच होने वाले संवाद से महिला की सामाजिक स्थिति का पता चलता है। वे लिखते हैं, “तुम्हारे जैसे कुपुत्र का जन्म ही इसकी सबसे बड़ी निर्लज्जता है। तुम अगर बनारस में होते तो मैं बताता कि तुम्हारे जैसे तीन पोंड के मृतक को इसने कैसे पाला। कैसे-कैसे तुम्हें बड़ा किया। क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े इसे। तुम्हारे बाप तो तभी मर गये जब तुम तीन साल के थे।’ ‘अब अंकल मुझसे सब उगलवाइए मत। मैं भी बनारस में बारह साल रहा हूँ। सुधीन भट्टाचार्य की यह रखैल नहीं हो गयी थी? मेरे बाप को इसने एक-एक बूंद जल के लिए तड़पाया।”7 पति की मौत के बाद अगर कोई महिला किसी पुरुष से कोई मदद ले लेती है तो यह पितृसत्तात्मक समाज उस महिला के चरित्र पर दाग लगाने से नहीं चुकता है। निमाई द्वारा अपने माँ के चरित्र पर संदेह करना पितृसत्तात्मक सोच का परिचायक है।

‘आदमखोर पैंथर’ कहानी में सरस्वती नामक एक बंधुआ मजदूर महिला है जो अपनी बेटी को वहाँ के जमींदार ठाकुर शिवधारी सिंह की रखैल बनने के लिए मजबूर करती है। लेकिन उसकी दोनों बेटियों को माँ का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं होता। वे दोनों माँ के इस निर्णय का विरोध करती हैं। इस सम्बन्ध में कहानी का यह अंश देखिए- “हरामजादी अपनी जनी बेटी के पाप की कमाई खाना तेरी आदत हो गई है। तूने बड़की को ऐसे ही दांव पर लगाया। अब मुझे लगा रही है।’ ले, ‘तड़ाक तड़ाक’ ‘हुंह तू अइसे ना मनबी’ सुरसतिया चुड़ैल की तरह मनसा का गला घोंटने के लिए लंबे-लंबे नाखूनों भरी उंगलियों को नचाती, हाथों की फंसरी को आगे की ओर बढ़ा रही थी।”8

सरस्वती के द्वारा ऐसा करने के पीछे का कारण बड़ा ही खौफनाक है। वह शिवधारी सिंह की कर्जदार है। इस सम्बन्ध में कहानी का यह अंश देखिए- “सुरसतिया पर मेरा दस हजार कर्जा है। यह स्साली मनसा मेरी बंधुआ मजूरिन है। यह जिन्दगी भर जॉगर ठठाती रहेगी, तब भी वह कर्जा नहीं चुक पायेगा। इसे बेटी-बेटे होंगे, वे भी इसी तरह जॉगर तोड़ कमाई करते रहेंगे तब भी कर्जा नहीं चुक पायेगा। इसके बाद उसके बेटे की शादी होगी। शादी तो मुझे ही करानी पड़ेगी न? कहाँ से रुपया लायेगी मनसा। चलो माने लेते हैं। जमाना बदल गया है। किफायत से शादी करेगी, पर किफायत करने के लिए इसके पास क्या है? सिर्फ बदन। बस यही तो है न इसकी पूंजी?”9 यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि सामंती व्यवस्था में मजदूरों की यही दशा बनाकर रखी जाती है ताकि उसका सम्पूर्ण शोषण किया जा सके।

सामंती समाज क्या होता है इसके बारे में जे.पी. सिंह लिखते हैं, “सामन्ती समाज (Feudal society) का आगमन दास एवं मालिक के बीच परस्पर संघर्ष के परिणाम स्वरूप हुआ। इस समाज में भी दो वर्ग थे वे थे- सामन्त(Feudal Lords) और कृषि दास (Serfs) । सामन्त उत्पादन के साधनों के स्वामी थे। कृषि दास सामन्तों के अधीन कार्यों में हाथ बंटाते थे तथा युद्ध की स्थिति में सामन्त के सिपाही के रूप में लड़ते थे। इस समाज में निजी सम्पत्ति की धारणा और ज्यादा मजबूत हुई। सामन्तों एवं कृषि दासों के बीच संघर्ष निरन्तर चलते रहते थे।”10 आदमखोर पैंथर कहानी में वर्णित समाज भी सामंती समाज है। यहाँ सेवापट्टी के गरीब-मजदूर शिवधारी सिंह के खेतों में काम करने से लेकर उसके लिए सिपाही तक का काम करते हैं। साथ ही कॉमरेड सुहेल के नेतृत्व में अपने अधिकार और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष भी करते हैं। उदाहरण के लिए कहानी का यह अंश देखिए- “जब इक्का थानेदार साहब और शकूर मियां को लेकर सेवापट्टी गाँव में ठाकुर की कोठी पर पहुँचा तो बड़ी भीड़ थी। चमारों ने सारी कोठी घेर ली थी। उनके हाथों में तेल डूबी, कपड़े की पगड़ी वाली लुकाठी थी। जिसमें सिर्फ सलाई छुलाने की देर थी। दूसरे लोग लाठी बल्लम लिए चिल्लाय रहे थे- हल्ला बोल, हल्ला बोल/ सुलछना के हत्यारे को/ मार डालो/ सुलछना के हत्यारे को/ मार डालो”11

भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर डी. एस. बघेल लिखते हैं, “ हमारा समाज पितृसत्ता प्रधान है। पहले समाज में पुरुष को जो मान्यता थी, वह स्त्रियों को नहीं थी। लेकिन आज अनेक क्षेत्रों में महिलाएँ पुरुषों से आगे हैं। फिर भी, समाज उन्हें वह सम्मान नहीं दे पा रहा है, जो उन्हें मिलना चाहिए। पहले स्त्रियों में शिक्षा का अभाव था, वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं थीं तथा उनमें जागरुकता नहीं थी, वे पति को परमेश्वर मानने की स्थिति में थीं। किन्तु आज वे शिक्षित हैं, आर्थिक रूप से स्वावलम्बी भी हैं तथा संचार साधनों ने उनमें जागरुकता का भी विकास किया है। ऐसी स्थिति में वे पति परमेश्वर के सारे निर्णयों को मूक दर्शक बनकर स्वीकारने की स्थिति में नहीं हैं। महिलाएँ अब पुरुषों के गलत कार्यों का विरोध करती हैं।”12 ‘आदमखोर पैंथर’ कहानी में महिलाओं की सामाजिक स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शिवधारी सिंह की मजदूरिन सरस्वती की बड़ी बेटी जेठरी सुलछना से प्रेम करती है। दोनों के प्रेम-प्रसंग की जानकारी मिलने पर शिवधारी सिंह सुलछना की हत्या करवा देता है। सुलछना की हत्या के बाद जेठरी भी आत्महत्या कर लेती है। सुलछना की हत्या के बाद वहाँ के दलितों में शिवधारी सिंह के खिलाफ़ गुस्सा देखने को मिलता है। लेकिन जेठरी के मौत से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। जब जेठरी की छोटी बहन मनसा इसको लेकर बोलती है तो उसका परिणाम उसे भुगतना पड़ता है। इस संदर्भ में कहानी का यह अंश देखिए- “क्योंरी रांड़ सुरसतिया। ई क्या बक रही है मनसा। जोगिन्दरा की पिटाई से चिढ़ी है यह बंदरिया? संभाल इसे। वरना खाल खिंचवाकर भूसे भरा दूंगा। पकड़ साली को दुर्जनवा। अरे मिसरी लाल कहां हो। चला दो गोली इस कटही कुतिया पर। इसके चूतड़ में घुसेड़ तो रम्मा।”13 उपर्युक्त बातें सिर्फ मनसा को डराने के लिए नहीं कही गयी हैं। नशे में धुत्त दुर्जन शिवधारी सिंह के हुक्म का पालन करता है। इस संदर्भ में कहानी का यह अंश देखिए-“मैं सुनती थी कि बहुत डरावने लगने वाली बातें सिरफ डरवाने को बोली जाती हैं। पर उस नीच ने नशे में चकनाचूर दुर्जन को हुक्म दिया, डाल दे रम्मा। तब भी मुझे यकीन नहीं आया। इतना गन्दा, इतना घिनौना, इतना नीच कर्म सिधारी करायेगा- मैंने तो सोचा भी नहीं। उसने टांगे नीचे ऊपर करके...ओह मइया, हाय रे भगवान् औरत के करम में इहै रचाया है तूने?”14 कहानी के अंत में सरस्वती को अपने कर्मों पे पछतावा करते दिखाया गया है। वे लिखते हैं, “जाओ बाबा,’ सुरसतिया बोली, हमरी गौरा तो फंसरी लगा के चली गयी और ऊ गयी भी अपनी महतारी के कारन। उसे अपनी खुशी, ऐस, आराम की खातिर, अपने खून दूध से पाला पोसा और खुद ही कोठा वाली डायन बन बैठी उसे रंडी बनाने वास्ते- हे परमेसर- वह धाड़ मारकर रोने लगी।”15

निष्कर्ष : भारतीय समाज में जाति और लिंग असमानता के मूल आधार हैं। महिलाएं इन दोनों से प्रभावित होती हैं। समाज में उसका शोषण और उत्पीड़न महिला होने के साथ-साथ उसकी जाति के कारण भी होता है। उपर्युक्त कहानियों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि महिलाओं की सामाजिक स्थिति बहुत ही दयनीय है। वह पितृसत्ता, जाति, लिंग और आर्थिक आधार पर समाज में भेदभाव का शिकार होती हैं। इन कहानियों में महिलाओं के शोषण और उत्पीड़न का स्तर बड़ा ही दुखदायी और मर्माहत करने वाला है।

संदर्भ :
1. जे. पी. सिंह; समाजशास्त्र: अवधारणाएँ एवं सिद्धान्त; पीएचआई लर्निंग प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली- 92; तृतीय संस्करण: 2022; पृ. सं.- 137
2. शिवप्रसाद सिंह; अमृता (शिवप्रसाद सिंह की संपूर्ण कहानियाँ-3); वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली- 02; द्वितीय संस्करण: 2008; पृ. सं.- 26
3. वही, पृ. सं.- 28
4. वही, पृ. सं.- 42
5. वही, पृ. सं.- 49
6. वही, पृ. सं.- 122
7. वही, पृ. सं.- 146
8. वही, पृ. सं.- 152
9. वही, पृ. सं.- 152
10. जे. पी. सिंह; समाजशास्त्र: अवधारणाएँ एवं सिद्धान्त; पीएचआई लर्निंग प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली- 92; तृतीय संस्करण: 2022; पृ. सं.- 363
11. शिवप्रसाद सिंह; अमृता (शिवप्रसाद सिंह की संपूर्ण कहानियाँ-3); वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली- 02; द्वितीय संस्करण: 2008; पृ. सं.- 156
12. डॉ. डी. एस. बघेल; अपराधशास्त्र(criminology); विवेक प्रकाशन, जवाहर नगर, दिल्ली- 7; पुनः मुद्रण संस्करण: 2022; पृ. सं.- 114
13. शिवप्रसाद सिंह; अमृता (शिवप्रसाद सिंह की संपूर्ण कहानियाँ-3); वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली- 02; द्वितीय संस्करण: 2008; पृ. सं.- 160
14. वही, पृ. सं.- 161/162
15. वही, पृ. सं.- 163

अंजली आनंद
शोधार्थी, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग, बी. एन. एम. यू. मधेपुरा

शेफालिका शेखर
शोधनिदेशक, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
बी. एन. एम. वाणिज्य महाविद्यालय, साहुगढ़ मधेपुरा

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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