शोध आलेख : रामदरश मिश्र के उपन्यास : मानवीय संवेदना का दस्तावेज / बेंद्रे बसवेश्वर नागोराव

रामदरश मिश्र के उपन्यास :मानवीय संवेदना का दस्तावेज
- बेंद्रे बसवेश्वर नागोराव


शोध सार : रामदरश मिश्र हिंदी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने कविता, कहानी, आलोचना और उपन्यास सभी विधाओं में अपनी सशक्त और प्रामाणिक उपस्थिति दर्ज कराई। उनका साहित्य बहुआयामी प्रतिभा का परिचायक है। उनका साहित्य गहरे सामाजिक सरोकारों, मनुष्य-केंद्रित दृष्टि और ग्रामीण जीवन के प्रति आत्मीय अनुराग का दर्पण भी है। विशेष रूप से उनके उपन्यास भारतीय समाज की बदलती संरचना, सामाजिक विघटन, मानवीय संघर्ष, शोषण और परंपरा-आधुनिकता के द्वंद्व का अत्यंत जीवंत और संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करते हैं। उनकी रचनाओं का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि उन्होंने आंचलिकता और आधुनिकता को विरोधी तत्व न मानकर एक-दूसरे के पूरक रूप में देखा। उनके उपन्यासों में महानगरीय जीवन की जटिलताओं के बीच भी गाँव की स्मृतियाँ, रिश्तों की ऊष्मा और मिट्टी की गंध निरंतर सक्रिय रहती हैं। वे अपने पात्रों के माध्यम से ग्रामीण संवेदना और आधुनिकता के बीच के मानसिक अंतराल और संघर्ष को बड़े प्रभावी ढंग से व्याख्यायित करते हैं। उनके उपन्यासों में शोषित और वंचित वर्ग का संघर्ष एक प्रमुख विषय है। उनके पात्र समाज में जागरूकता और प्रतिरोध की अग्नि प्रज्वलित करते हैं। स्त्री-पात्र अपनी गरिमा और अस्तित्व को पहचानने का संघर्ष करती दिखाई देती है। यह दृष्टि रामदरश मिश्र के साहित्य को केवल समाज का चित्रण न रखकर परिवर्तनकारी बनाती है। भाषा और संवाद के स्तर पर मिश्र अत्यंत कुशल रचनाकार जान पड़ते हैं। उनकी भाषा सरल, सहज और लोक-समाज से उपजी हुई है। उनके साहित्य में संवाद स्वाभाविक, जीवंत और चरित्रानुकूल है। उनकी भाषा कथानक को गति और प्रभाव दोनों प्रदान करती है। उनका उपन्यास-साहित्य भारतीय समाज के ग्रामीण और शहरी दोनों परिदृश्यों का समग्र इतिहास है। यह पीड़ा, संघर्ष, आशा, मानवीय संबंध और सामाजिक परिवर्तन की सक्षम गाथा है, जो बताती है कि मनुष्य का वास्तविक जीवन न किसी आदर्श में है और न किसी महानगरीय चकाचौंध में उनका उपन्यास-साहित्य इसी मानवीय साहस और संवेदना का दस्तावेज है।

बीज शब्द : आंचलिकता, आधुनिकता, सामाजिक परिवर्तन, मानवीय संवेदना, यथार्थवादी चित्रण, मूल्य-विघटन।

मूल आलेख : साहित्य की विविध विधाओं में अपनी सशक्त अभिव्यक्ति को रेखांकित करनेवाले रामदरश मिश्र अब हमारे बीच नहीं है। उनकी दीर्घ रचना-यात्रा भारतीय साहित्य के अनेक पड़ावों और परिवर्तनों की साक्षी रही है। यह यात्रा निरंतर परिवर्तित होती रही है। उनका साहित्य सामाजिक और मानवीय सरोकारों तथा मूल्य-चिंतन को सजगता और सहजता से आत्मसात करता है। गाँव की मिट्टी में रचे-बसे उनके लोक-मन ने न तो आधुनिकता की कृत्रिम चमक से स्वयं को प्रभावित होने दिया और न ही किसी बाहरी विचारधारा के दबाव को स्वीकार किया। अपने परिवेश और समाज के प्रति उनकी गहरी आत्मीयता ने उनकी रचनाओं को सदा विश्वसनीयता, प्रामाणिकता और संवेदनशीलता से परिपूर्ण बनाया है। राल्फ फॉक्स ने उपन्यास के सन्दर्भ में लिखा है “उपन्यास का विषय है व्यक्ति। यह समाज के विरुद्ध, प्रकृति के विरुद्ध, व्यक्ति के संघर्षों का महाकाव्य है। और यह केवल उसी समाज में विकसित हो सकता था जिसमें व्यक्ति और समाज के बीच सन्तुलन नष्ट हो चुका हो और जिसमें मानव का अपने सहजीवी साथियों अथवा प्रकृति से युद्ध ठना हो।”1 अतः उपन्यास मानवीय संवेदना को व्यक्ति के संघर्षों के माध्यम से व्यक्त करता है। उपन्यास का केन्द्र व्यक्ति है, जो समाज और प्रकृति दोनों के साथ टकराव की स्थिति में खड़ा दिखाई देता है। जब समाज व्यक्ति की भावनाओं, आवश्यकताओं और गरिमा के प्रति संवेदनहीन हो जाता है, तब व्यक्ति और समाज के बीच का संतुलन टूट जाता है और व्यक्ति अकेले संघर्ष करने को विवश हो जाता है। यही संघर्ष उसे समाज के विरुद्ध खड़ा करता है। साथ ही, प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष यह दर्शाता है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व की भावना समाप्त हो चुकी है। सहजीवी साथियों और प्रकृति से युद्ध की स्थिति मानवीय संवेदना के ह्रास का संकेत है, जहाँ सहयोग, करुणा और सहानुभूति के स्थान पर हिंसा, स्वार्थ और टकराव हावी हो जाते हैं। अर्थात उपन्यास मानवीय संवेदना का यथार्थ दस्तावेज है। रामदरश मिश्र के उपन्यास भी अपवाद नहीं है। समकालीन दौर के उपन्यास पर बात करते हुए वीरेन्द्र यादव लिखते हैं कि “मध्यवर्गीय उभार, साम्प्रदायिकता, उपभोक्तावादी संस्कृति व हाशिए के लोगों की दास्तान समेटे हिन्दी उपन्यास ने जहाँ अपने सरोकारों का विस्तार किया है, वहीं कथ्य व रूप की एकरसता को भी तोड़ा है। कहा जा सकता है कि इस दौर में उपन्यास महज साहित्यिक संरचना न रहकर एक सामाजिक संरचना के रूप में भी अधिक पुष्ट और समृद्ध हुआ है।”2 आज के हिन्दी उपन्यास केवल सीमित विषयों तक नहीं रहा, बल्कि बदलते समाज की जटिलताओं का सजीव दस्तावेज बन गया है। साथ ही, कथ्य और रूप की एकरसता टूटने से उपन्यास में नई शैलियाँ, दृष्टियाँ और संरचनात्मक प्रयोग सामने आए हैं। परिणामस्वरूप, इस दौर का हिन्दी उपन्यास केवल साहित्यिक विधा न रहकर समाज की वास्तविक संरचना को समझने और व्यक्त करने का सशक्त माध्यम बनकर अधिक समृद्ध हुआ है।

रामदरश मिश्र ने अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से जिस प्रकार कवि और कहानीकार के रूप में असाधारण सफलता अर्जित की है, उसी प्रकार उन्होंने उपन्यासकार के रूप में भी अपनी सशक्त पहचान स्थापित की है। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व पर विवेकी राय लिखते हैं कि “रामदरश जी कवि हैं, कहानीकार हैं, उपन्यास लेखक हैं, समीक्षक हैं और निबन्ध-लेखक आदि-आदि हैं, परन्तु सबसे पहले वे उदात्त, उदार और स्नेहशील स्वभाव वाले सहज, सुहृद व्यक्ति हैं। इसके साथ ही समय पड़ने पर उनका स्वाभिमानी, अक्खड़ और जुझारू स्वभाव भी सामने आ जाता है।”3 उनके उपन्यासों में ग्रामीण जीवन की माटी की गंध के साथ-साथ नगरीय जीवन की जटिलताओं का भी सजीव चित्रण मिलता है।

रामदरश मिश्र के उपन्यास भारतीय समाज के ग्रामीण और शहरी दोनों परिदृश्यों, मानवीय संबंधों की जटिलताओं, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ और व्यक्ति के अंतर्मन की गहराइयों को समेटे हुए है।जहाँ एक ओर गाँव की मिट्टी की सोंधी सुगंध है, वहीं दूसरी ओर शहरों की जटिल जीवनशैली का यथार्थ भी उपस्थित है। उनके इसी विशेषता को विश्लेषित करते हुए लिखा गया कि “कवि और समीक्षक के रूप में हिन्दी जगत में अपनी पहचान को बनाते हुए कथाकार के रूप में खासतौर से प्रेमचंद की ग्राम-केन्द्रित कथा परंपरा को गुणात्मक समृद्धि देने वालों और उसे विकसित करने वाले रचनाकारों के बीच मिश्र जी का अवदान पहली पंक्ति के साथ रेखांकित किया जाएगा। विचार के घरातल पर ही नहीं, विचार के कलात्मक रूपान्तरण के धरातल पर भी, ग्राम-जीवन की बुनियादी समझ के स्तर पर ही नहीं, उस समझ को कला के रूप में प्रस्तुत कर पाने की क्षमता के आधार पर भीऔर यही वह बिंदु है जहां वे समकालीन अनेक चर्चित कथाकारों से भी आगे प्रेमचन्द परंपरा के रूप में अलग से अपना परिचय कराते हैं।”4

रामदरश मिश्र का आंचलिक उपन्यास लेखन में विशेष रूप से योगदान रहा है। उन्होंने अपने आंचलिक उपन्यासों में ग्राम्य जीवन की समग्र छवि प्रस्तुत की है।जहाँ स्थानीय बोली-भाषा, खान-पान, रीति-रिवाज और रहन-सहन के विविध रूप जीवन्त हो उठते हैं। उनकी रचनाओं में आंचलिकता केवल भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं, बल्कि वहाँ के लोकजीवन की आत्मा के रूप में उपस्थित होती है।मिश्र जी के अब तक के प्रकाशित उपन्यास निम्नलिखित है,पानी के प्राचीर, जल टूटता हुआ, सूखता हुआ तालाब, अपने लोग, रात का सफर, आकाश की छत, आदिम राग,बिना दरवाजे का मकान, दूसरा घर, थकी हुई सुबह, बीस बरस, परिवार, बचपन भास्कर का, एक बचपन यह भी,एक था कलाकार आदि ।

भारत की लगभग पचहत्तर प्रतिशत जनसंख्या गाँवो में निवास करती है। परिणामतः हमारे देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। अधिकतर किसानों की खेती वर्षा ऋतु के पानी पर निर्भर है। किन्तु आज पर्यावरण में पर्याप्त असंतुलन आ गया है। इसलिए वर्षा ऋतु में कभी वर्षा नहीं होती, तो कभी तेज वर्षा होती, कभी बादल फट पड़तेहैं। इन सभी का नतीजा किसान को ही झेलना पड़ता है। कभी वर्षा न होने से फसल नष्ट होती है, तो कभी वर्षा अत्याधिक होने से फसल को नष्ट करती है। भारत के किसानों की आर्थिक दशा दिन-ब-दिन ख़राब होती जा रही है। यही समस्या उपन्यास के रूप में सामने रामदरश मिश्र के उपन्यासों में आतीहै।रामदरश मित्र जी के उपन्यासों में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के तिवारीपुर और पांडेपुरवा नामक गाँव बाढ़ की समस्याओं से त्रासित है। इस अंचल की राप्ती और गौरा नदी की बाढ़ ने यहाँ के किसानों का जीवन ही ध्वस्त कर दिया है। पांडेपुरवा और तिवारीपुर गाँव में पाठशाला, अस्पताल, रास्ते, यातायात के साधनों का अभाव है। बाढ़ ने किसानों की आर्थिक कमर ही तोड़ दी है। इस गांव के लोग बाढ़ से बचने के लिए आपन के वैर भूलकर, संघटित होकर बांध बांधते है, लेकिन राप्ती और गौरी नदी का तल अधिक उथला होने से बाढ़ का पानी बांध को तोड़कर बहा ले जाता है। ऐसी अनेक वास्तविक घटनाएँ उनके उपन्यासों में आते है।

रामदरश मिश्र की रचनाओं की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे आंचलिकता और आधुनिकता इन दो विपरीत प्रतीत होने वाले तत्वोंको एक साथ जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। इंद्रनाथ मदान लिखते हैं कि “हर उपन्यासकार ने आधुनिकता को निजी परिवेश में स्वीकारा है या नकारा है और निजी स्तर पर इसे अभिव्यक्ति दी है ।”5 आंचलिकता का अर्थ है- किसी विशेष क्षेत्र, गाँव, या अंचल के जीवन, संस्कृति, बोली, परंपराओं और सामाजिक संरचना का चित्रण।जबकि आधुनिकता का तात्पर्य है समकालीन विचारधाराओं, बदलती सामाजिक संवेदनाओं, शहरी चेतना और नए जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति।रामदरश मिश्र इन दोनों को टकराव के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर पूरक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे दिखाते हैं कि ग्रामीण जीवन चाहे जितना पारंपरिक हो, वह आधुनिकता के प्रभावों से अछूता नहीं रह सकता। आधुनिक शहरी जीवन भी अपनी जड़ों ग्रामीण संस्कृति, संवेदना और सामाजिक रिश्तोंसे पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। ‘आकाश की छत’ इसका उत्तम उदाहरण है। यह उपन्यास शहरी जीवन की समस्याओं, संघर्षों और बदलती मनोवृत्ति को दिखाता है, परन्तु साथ ही उसमें गाँव की मानवीय गर्माहट, रिश्तों की आत्मीयता और सरल जीवन मूल्य भी अन्तर्निहित हैं। आधुनिक जीवन की चकाचौंध और जटिलताएँ यहाँ दिखाई देती हैं, लेकिन संवेदनाओं का स्रोत गाँव की मिट्टी से प्राप्त आंचलिक अनुभव ही है। पात्र आधुनिक परिवेश में रहते हैं, पर उनका मानसिक संसार, सोच और भावनात्मक धरातल गाँव की संस्कृति से प्रभावित रहता है। इस प्रकार, रामदरश मिश्र का साहित्य यह स्पष्ट करता है कि आंचलिक जीवन में आधुनिकता की लहरें लगातार प्रवेश कर रही हैं, जिससे ग्रामीण सोच में धीमे-धीमे परिवर्तन हो रहा है।और दूसरी ओर, आधुनिक जीवन भी आंचलिक जड़ों से पोषण पाकर अधिक मानवीय और संवेदनशील बनता है। यही कारण है कि उनके उपन्यास न तो केवल ग्रामीण जीवन तक सीमित हैं, और न ही केवल शहरी जीवन का दस्तावेज बनते हैं। वे दोनों के बीच की गतिशीलता, संघर्ष और मेल को उनकी मौलिक साहित्यिक पहचान के रूप में उभारते हैं।

रामदरश मिश्र के आरंभिक और चर्चित उपन्यास ‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’ और ‘सूखता हुआ तालाब’ आदि पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित हैं। इन कृतियों में बाढ़ से तबाह होते गाँव, प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप, गरीबी की गहरी छाया और शोषण से त्रस्त ग्रामीण समाज का अत्यंत मार्मिक और प्रामाणिक चित्रण मिलता है। विशेष रूप से ‘पानी के प्राचीर’ और ‘जल टूटता हुआ’ में बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों की विवशता, किसानों की टूटी हुई आर्थिक संरचना और जीवन के नितांत संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उभारा गया है। रामदरश मिश्र के उपन्यास आदर्शवादी कल्पनाओं से हटकर कठोर यथार्थ पर आधारित हैं। उनके उपन्यासों में स्वतंत्रता के बाद बदलते सामाजिक मूल्य, मध्यम वर्ग के संकट, मानवीय पीड़ा और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया स्पष्ट दिखाई पड़ती है। उनके यहाँ पात्रों का जीवन किसी रोमांटिक छवि पर नहीं, बल्कि वास्तविक कठिनाइयों और परिस्थितियों की मार पर टिका है।वह उन्हें लगातार संघर्ष करने के लिए विवश भी करता है और मजबूत भी बनाता है। अभावग्रस्त गाँवों का जीवन जहाँ मूलभूत सुविधाओं की कमी, बेरोजगारी, बाढ़ की मार और सामाजिक असमानता स्थायी समस्याएँ हैं। भारतीय ग्राम्य समाज की एक सजीव और प्रभावशाली कथा के रूप में उभरता है। इस प्रकार, उनके उपन्यास न केवल ग्रामीण यथार्थ के सार्थक दस्तावेज हैं, बल्कि उस संघर्षशील जीवन की गाथा भी हैं जो परिवर्तन और प्रतिरोध दोनों को जन्म देती है।

ग्राम-जीवन के सामाजिक मूल्यों की विघटन प्रकिया का स्वरूप आंचलिक उपन्यास 'जल टूटता हुआ' में बड़ी मार्मिकता के साथ प्रस्तुत हुआ है। गाँव का हर व्यक्ति 'समूहभाव' की जगह इकाइ‌यों में विभाजित होकर टूट रहा है। कोई सामाजिक मूल्यों को टूटते देखकर दुःखी है, तो कोई उन्हें तोड़कर सम्मान-प्रतिष्ठा के नाम पर नंगई प्रदर्शन करता है। गांवों में संगठन-सहकार नाम शेष रह गया है। लोग अपने स्वार्थ के लिए तथा ईर्ष्या-द्वेषवश दूसरों की जमीन अपने नाम करवा लेते है। गांव में शत्रुता यहाँ तक बढ़ जाती है कि लोग एक-दूसरे की झोपड़ी में आग तक लगा देते हैं, तो किसी के खेत उजाड़ देते है, किसी के बैल चोरी कर लेते है, तो किसी के घर में सेंघ मार देते हैं। अमलेश तिवारी का कथन है "एक जमाना हमारा था कि लोग गांव की इज्जत अपनी इज्जत मानते थे, अप लड़ते थे, लेकिन गांव की इज्जत के लिए सामू‌हिक ढंग से लड़ते थे। आज दूसरों की इज्जत लूटने के लिए लोग बाहर का सहारा लेते हैं। पहले के लोग नले-बुरे रूप में जो भी थे, साफ थे, मगर आज के लोग क्या है समझ में नहीं आता।शहर का असर धीरे-धीरे गांव को बदजात कर रहा है।"6 इसी उपन्यास में लेखक ने स्वतंत्रता के बाद भी जीवित रही सामंती मानसिकता और उससे उपजे अमानवीय व्यवहार को अत्यंत सशक्त रूप में चित्रित किया है। “एक अदना-सा नौकर उनसे साडा तोडी कर रहा है। अभिजात सरकार कैसे इसे बर्दास्त कर सकता था? वे उबलकर जूता निकाल बैठे।”7 महिप सिंह जैसे जमींदार अपने पुराने प्रभुत्व को बनाए रखना चाहते हैं। लोगों को बिना कारण अपने पास बैठाकर रखना, उनसे बेगार करवाना और बदले में अत्यंत कम तनख्वाह देना उनके शोषणकारी स्वभाव को उजागर करता है। यहाँ मानवीय संवेदना पूरी तरह अनुपस्थित दिखाई देती है। एक मनुष्य को मनुष्य की तरह न देखकर वे उसे मात्र श्रम करने वाली वस्तु समझते हैं। जगपतिया का बीमार होना मानवीय दृष्टि से सहानुभूति और सहयोग का विषय होना चाहिए था, किंतु महिपसिंह उसे झूठा ठहराकर पीटते हैं। मानवीय संवेदना के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो महिप सिंह का चरित्र अमानवीय सत्ता, क्रूरता और संवेदनहीन सामंती सोच का प्रतीक दिखाई देता है।

‘बिना दरवाज़े का मकान’ उपन्यास में जातिगत भेदभाव की स्थिति को चित्रित करते हुए मिश्र जी बताते हैं कि जब एक ऊँची जाति की पुजारिन का छल उजागर हो जाता है, तो वह अपनी गलती छिपाने के लिए दीपा पर ही अनुचित फटकार लगाने लगती है। “इनकी तो कोई इज्जत है नहीं, दूसरों की भी इज्जत पर कीचड़ उछाकती रहती है। झूठ झूठ, फरेब, बेइमानी तो इनके खून में है ।”8 उनके उपन्यास में समाज के गरीब, वंचित और शोषित वर्ग की समस्याओं को अत्यंत यथार्थ रूप में चित्रित किया गया है। आर्थिक असमानता, सामाजिक उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव के कारण यह वर्ग निरंतर संघर्षरत दिखाई देता है। 'अपने लोग' में भी लेखक ने प्रमोद एवं विलास आदि पात्रों के कथनों द्वारा जीवन-मूल्यों के विघटन का यथार्थ चित्रण किया है। विलास ठीक ही कहता है कि "अब गाँव के लोगों में न कृतज्ञता रह गयी है न दया रह गयी है, न न्याय-अन्याय की भावना रह गयी है। वह गाँव जाता है तो लोगों से हाथ जोड़कर ही बात करता है ताकि कोई भी उससे नाराज न हो, लेकिन इन ससुरों को न अब खून चूसने में करुणा होती है, न मक्खी निगलने में घृणा।"9 लेखक ने यह भी दिखाया है कि शोषण के इस दुष्चक्र के बीच कुछ जागरूक व्यक्तित्व जैसे कामरेड समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की रक्षा और अधिकारों के लिए कार्यरत रहते हैं। वे उत्पीड़ित वर्ग को संगठित करते हैं, उन्हें अन्याय के खिलाफ खड़े होने की शक्ति देते हैं और सामाजिक परिवर्तन के वाहक बनते हैं। उनके उपन्यास विशेष रूप से दलित समाज की उस पीड़ा और संघर्ष को उजागर करता है, जो पीढ़ियों से स्थापित सामाजिक व्यवस्था की कठोर जंजीरों में जकड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में रूपमती जैसे साहसी पात्र का उदय उपन्यास को विशेष अर्थ प्रदान करता है। रूपमती न केवल दलित समाज से निकलकर अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष करती है, बल्कि अपनी शर्तों पर जीवन जीने का साहस भी प्रदर्शित करती है। वह सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देती है, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करती है तथा परिवर्तन की चिंगारी को दिशा देती है। उसका जीवन संघर्ष यह साबित करता है कि समाज में परिवर्तन तभी संभव है जब पीड़ित वर्ग स्वयं जागरूक होकर अपने अधिकारों के लिए आगे बढ़े। उनके उपन्यासों में यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि समाज में वास्तविक परिवर्तन केवल सिद्धांतों से नहीं आता, बल्कि लोगों के जीवंत अनुभवों, कठिन संघर्षों और साहस भरे कदमों से आगे बढ़ता है। इसके प्रत्येक पात्र अपनी पीड़ा, संघर्षशीलता और विद्रोह के माध्यम से यह बताता है कि अत्याचार, अन्याय और भेदभाव के खिलाफ खड़ा होना ही एक न्यायपूर्ण और समानतापूर्ण समाज की आधारशिला बन सकता है।

रामदरश मिश्र के उपन्यासों का परिदृश्य देशकाल के अनुरूप है। ग्राम-प्रेम, ग्रामीण मानसिकता, साहूकारों का अत्याचार, श्रमिक वर्ग को संघर्ष के लिए प्रेरणा देना, कर्त्तव्य-प्रेम एवं परोपकार, सामाजिक विषमता, स्पृश्य-अस्पृश्य की भावना, भाई के प्रति कर्त्तव्य, भाई की स्वार्थ-लिप्सा एवं कठोरता, नारी के प्रति आकर्षण, समाज का स्वार्थी व्यवहार, सरकार की दिखावे की नीति आदि ऐसी समस्याएँ हैं, जो वर्तमान परिस्थिति के अनुकूल है। आज भी समाज का परिवेश यही है, यही मानसिकता है। वस्तुतः उपन्यासकार ने देशकाल परिस्थिति के अनुसार ही अपने पात्रों का चयन किया है, उसके अनुसार ही उनका चारित्रिक विकास किया है।भाषा रहन-सहन, वेश भूषा, भावना आदि सभी देशकाल परिस्थिति के अनुकूल दिखाई देता है। पात्र-चरित्र एवं कथानक की स्थिति में वैषम्य कहीं नहीं दिखलाई देता है। इस आधार पर उनके उपन्यास नितान्त सार्थक बन पड़े हैं।

प्रकृति प्रेम भी उनके उपन्यासों में दिखाया गया है, उनका मन प्रकृति-चित्रण में अधिक रमता है।प्रकृति के इन मनोहारी दृश्यों में एक ऐसा आकर्षण है, जो सीधे जनमानस को अपनी ओर खींच लेता है। उनके उपन्यासों में कई पात्र ऐसे भी मिलते हैं, जिनके मन में प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग है। ‘पानी के प्राचीर’ के पात्र नीर जब उदास होता है, तो प्राकृतिक सौंदर्य को निहारता है और अपनी उदासी भूल जाता हैं, जैसे कि, देख सकते हैं "नीरू घर से निकल पड़ा। धीरे-धीरे गाँव के उत्तर टीले पर निकल गया। वहीं पीपल के पेड़ की निष्पत्र डालियों की छाह में पत्थर के चबुतरे पर बैठ गया। उसके आसपास कुछ जंगली झाड़ियाँ थीं.. नीरू का माथा घूम रहा था.. सभी तो माथा घुमाने के लिए एक साथ गाँठ जोड़ लेते हैं। शाम ढल गई। ठंडी हवा का झोंका तैरने लगा। धीरे-धीरे चांदनी निकल आई। गेहूँ-जौ के खेतों पर चाँदनी बिछ गई। नीरू को यह बड़ा मनोहर लगा। उसका सिर हलका होने लगा।”10 अतः प्रकृति इंसान के मन को शांत एवं प्रसन्न करने में मदद करती है, यह सिर्फ ग्रामीण परिवेश में ही संभव है ।

देश की सांस्कृतिक विविधता पर भी वे अपने उपन्यास ‘दूसरा घर’ में लिखते हैं।उपन्यास में गुजरात और उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक भिन्नताओं को स्पष्ट रूप से उकेरा गया है। क्षेत्रीय परिवेश बदलने के साथ वहाँ की पोशाक, जीवन-पद्धति और पारंपरिक मान्यताओं में स्वाभाविक ही अंतर दिखाई देता है। गुजरात में गरबा नृत्य के उत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाए जाते हैं, जहाँ स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर नृत्य करते हुए उत्साह और आनंद का वातावरण रचते हैं। “उसे एक बात बहुत अच्छी लगी कि इस नृत्य में सभी तरह के लोग शामिल होते हैं। स्त्री-पुरूष, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब का भेदभाव नहीं होता। एक तरह से यह गुजरात का जातीय नृत्य है। एकाएक उसका ध्यान अपने प्रदेश पर चला गया। अपने यहाँ ऐसा क्यों नहीं है?”11 अतः सभी लोग बिना भेदभाव के नृत्य में हिस्सा लेते हैं, यह बात उसे बहुत अच्छी लगती है। इसे देखकर वह सोचता है कि उसके अपने प्रदेश में ऐसा समानता वाला माहौल क्यों नहीं मिलता।

उपन्यासकार का उपन्यास-कौशल पात्रों के चरित्र चित्रण तथा पात्र चयन पर ही निर्भर रहता है। लेखक अपने गृहीत उद्देश्य के आधार पर ही पात्रों का चयन करता है। तद्नुकूल ही उनका चरित्र विकास करता है। कथावस्तु के अनुकूल चरित्र विकास में प्राप्त हुई सफलता उपन्यासकार की सच्ची सफलता है। रामदरशमिश्र के उपन्यासों में वर्णित पात्र एवं उनके चरित्र चित्रण को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि पात्रों का चरित्र कथावस्तु के सर्वथा अनुकूल है। वे अपने वर्ग का सच्चा प्रतिनिधित्व करते हैं। अपने चरित्रद्वारा समाज में व्याप्त बुराइयों को यथार्थ रूप में प्रकट करते हैं। अतः वे कथोपकथन अथवा संवाद से उपन्यास में नाटकीयता का विधान करते हैं। इससे उसकी रचना रोचक बन जाती है। संवाद के वाक्य जितने सूक्ष्म के अधिकाधिक भावगर्भित होंगे, उतनी ही रोचकता में वृद्धि होती जायेगी। संवाद के माध्यम से पात्र के चरित्र की प्रकाशित करने में, पात्र की मनोदशा परिवर्तित करने में तथा कथानक मोड़ने में सहायता व सरलता होती है, अतः कथावस्तु के विकास में संवाद की अहं भूमिका होती है संवाद-कथोपकथन अथवा संवाद, उपन्यास में नाटकीयता का विधान करते हैं। इससे उसकी रचना रोचक बन जाती है। संवाद के वाक्य जितने सूक्ष्म के अधिकाधिक भावगर्भित होंगे, उतनी ही रोचकता में वृद्धि होती जायेगी। संवाद के माध्यम से पात्र के चरित्र की प्रकाशित करने में, पात्र की मनोदशा परिवर्तित करने में तथा कथानक मोड़ने में सहायता व सरलता होती है, अतः कथावस्तु कं विकास में संवाद की अहं भूमिका होती है। रामदरश मिश्र के उपन्यासों में संवाद अत्यन्त संक्षिप्त तथा सारगर्भित हैं। वे कथानक को गति देने में सर्वथा सक्षम है, स्वाभाविक हैं जिसे पात्रों के चरित्र की स्वाभाविकता उभर कर सामने आ जाती है।

समकालीन हिंदी उपन्यास और उपन्यासकारों के गंभीर चिंतक वीरेन्द्र यादव लिखते हैं कि “उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के नए उपकरण हैं, जो हमारे साहित्य और संस्कृति को मूर्त सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियों से विच्छिन्न करके विखंडित मूल्यहीनता तक सीमित करते हैं। हिन्दी उपन्यास इस खतरे के प्रति सचेत भी है।”12 उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद जैसी पश्चिमी अवधारणाएँ सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के नए रूप हैं, जो साहित्य को उसकी वास्तविक सामाजिक-सांस्कृतिक जमीन से काटकर केवल विखंडन, सापेक्षता और मूल्यहीनता तक सीमित कर देती हैं। इससे साहित्य जन-जीवन की ठोस समस्याओं, संघर्षों और संवेदनाओं से दूर हो सकता है। किंतु हिन्दी उपन्यास इस खतरे को समझता है और केवल सैद्धांतिक फैशन के पीछे नहीं चलता, बल्कि अपने समाज की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं से जुड़ा रहकर रचना करता है। इस प्रकार समकालीन हिन्दी उपन्यास विचारधारात्मक दबावों के बीच भी अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और मानवीय सरोकारों की रक्षा करता दिखाई देता है। इसके सशक्त हस्ताक्षर के रूप हम रामदरश मिश्र और उनके उपन्यासों को देख सकते हैं ।

निष्कर्ष : उनके उपन्यासों में समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का वास्तविक रूप झलकता हैं। वे अपने उपन्यासों में रूढ़िवादी परंपराओं, जड़ मान्यताओं का विरोध करते है, साथ ही राजनीतिक व्यवस्था की असफलता एवं नेताओं की अवसरवादी सोच को लेखन के माध्यम से उजागर करते है। अतः रामदरश मिश्र के उपन्यासों का आकाश अत्यंत विस्तृत और व्यापक है। इस प्रकार रामदरश मिश्र के उपन्यास मात्र सामाजिक परिस्थितियों का प्रतिबिंब नहीं रहता, बल्कि परिवर्तन की दिशा में प्रेरित करने वाली एक प्रभावशाली साहित्यिक शक्ति के रूप में उभरता है।

सन्दर्भ :
1. डॉ. राजमल बोरा, हिंदी उपन्यास : प्रयोग के चरण, प्र. सं. 1972, अमिता प्रकाशन, औरंगाबाद, पृ. 05
2. स. नामवर सिंह, आधुनिक हिंदी उपन्यास-2, प्र. सं. 2010, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 11
3. सं. जगन सिंह,स्मिता मिश्र, रामदरश मिश्र: व्यक्ति और अभिव्यक्ति,1999, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.25
4. वही, पृ.44
5. इंद्रनाथ मदान, आधुनिकता और हिंदी उपन्यास, प्र. 2000, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 71
6. रामदरश मिश्र, जल टुटता हुआ, द्वि. सं. 2004, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 307
7. वही, पृ. 226
8. रामदरश मिश्र, बिना दरवाजे का मकान, प्र. सं. 1984, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 568
9. रामदरश मिश्र, अपने लोग, द्वि. सं. 2005, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 185
10. रामदरश मिश्र, पानी के प्राचीर, द्वि. सं. 2007, रवाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 15-16
11. रामदरश मिश्र, दूसरा घर, प्र. सं. 1986, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 85
12. स. नामवर सिंह, आधुनिक हिंदी उपन्यास-2, प्र. सं. 2010, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 14

बेंद्रे बसवेश्वर नागोराव
सहायक आचार्य, क्रिस्तु जयंती डीम्ड यूनिवर्सिटी बेंगलुरु

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

Post a Comment

और नया पुराने