शोध आलेख : धर्मवीर भारती द्वारा अनूदित कहानियों में अनुवाद चेतना / शाश्वती खुंटिआ एवं श्रीनिकेत कुमार मिश्र

धर्मवीर भारती द्वारा अनूदित कहानियों में अनुवाद चेतना
- शाश्वती खुंटिआ एवं श्रीनिकेत कुमार मिश्र

शोध सार : हिंदी साहित्य के विशिष्ट रचनाकार अपने लेखन के प्रारंभिक चरण में दूसरी भाषा, मूलतः अंग्रेजी, बंगाली, एवं संस्कृत के अनन्य कृतियों का अनुवाद करके अपने लेखकीय जीवन का श्रीगणेश करते हुए नज़र आते हैं। कतिपय लेखकों के अनूदित कार्यों का व्यापक स्तर पर चर्चा-परिचर्चा की गयी तो कुछ रचनाकारों के अनुवाद कर्म उपेक्षित रह गए। हिंदी साहित्य के अप्रतिम स्रष्टा डॉ. धर्मवीर भारती की अनूदित कृतियाँ इसकी साक्ष्य हैं। उन्होंने लगभग 21 देशों की 161 आधुनिक कविताओं एवं अंग्रेजी साहित्यकार ऑस्कर वाइल्ड की 8 कहानियों का अनुवाद किया है। उत्कृष्ट अनुवाद कार्य के बावजूद उनके अनुवाद कर्म को यथोचित उपलब्धि प्राप्त नहीं हुई। प्रस्तुत शोध पत्र में उनकी अनूदित कहानियों का अनुवादपरक विश्लेषण किया गया है। साहित्यिक तत्व एवं सांस्कृतिक- सामाजिक पक्ष के आधार पर अनूदित कहानियों की विवेचना की गयी है। इन अनूदित कहानियों के माध्यम से डॉ. भारती की अनुवादधर्मिता के प्रति विद्वानों का ध्यानाकर्षित करने का यथा संभव प्रयास किया गया है।

बीज शब्द : अनुवाद, अनुवाद और हिंदी साहित्य, साहित्यानुवाद, अनूदित कहानी, सांस्कृतिक विनिमय, अनुवाद प्रक्रिया, आदि।

मूल आलेख : विश्व के सभी देशों में भाषा, संस्कृति, खान-पान एवं पहनावा आदि एक दूसरे से भिन्न होते हैं। इन्हीं विविधताओं के कारण हम विभिन्न समस्याओं का सामना करते हैं। यह कहना अत्युक्ति न होगी कि आज अनुवाद इन समस्याओं के निराकरण का एक माध्यम बना हुआ है। अनुवाद कार्य के माध्यम से सांस्कृतिक एवं भाषाई आदान-प्रदान की एक अविछिन्न प्रक्रिया हमारे दैनिक जीवन से जुड़ गयी है। आधुनिक अनुवाद विद्या की नींव औपनिवेशक काल में ही रखी गयी, साथ ही इसको एक सुगठित मंच भी मिला। आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रारंभ भी अनुवाद से मानना अनुचित नहीं होगा। हिंदी साहित्य की प्रायः सभी गद्य विधाओं के सूत्रपात का श्रेय अनुवाद को ही दिया जाता है। साहित्य के अंतर्गत विभिन्न विधाओं का अनुवाद ही साहित्यानुवाद के रूप में विदित है। साहित्यिक विधाओं का अनुवाद अपने आप में एक सृजनात्मक प्रक्रिया है, क्योंकि अनुवादक को मूल पाठ के समूचे तात्पर्य एवं संकल्पना को अनूदित पाठ में स्थान देना होता है। हिंदी साहित्य जगत में कुछ ही लेखक हैं जो महान कृतिकार होने के साथ-साथ एक अच्छे अनुवादक के रूप में भी गिने जाते हैं परंतु कुछ लेखक उत्कृष्ट अनुवादक होने के बावजूद इस श्रेणी में उचित स्थान प्राप्त नहीं कर पाए हैं। इस संदर्भ में डॉ. धर्मवीर भारती का स्मरण अनायास ही हो आता है। धर्मवीर भारती ग्रंथावली के संपादक चंद्रकांत बांदिवडेकर के अनुसार भारती जी के अनूदित कर्म संभवतः 1946/1947 ई. में छपा था। 1960 ई. में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा विधिवत रूप से इन अनुवादों को प्रकाशित किया गया था।

अंग्रेजी साहित्यकार ऑस्कर वाइल्ड, ऐसे समय (विक्टोरिया एरा) के रचनाकार थे जब साहित्य केवल मनोरंजनधर्मी हुआ करता था। लेखक समाज के यथार्थ पक्ष को अनदेखा कर काल्पनिक विषयक रचनाओं को अधिक प्रधानता दे रहे थे। वाइल्ड अपने समय की साहित्यिक प्रवृत्तियों को नकार कर साहित्य को यथार्थ के धरातल पर लाने का प्रयास किया।

धर्मवीर भारती के लेखन में रूमानियत की प्रधानता होती है एवं उनकी गाथाएँ भावात्मक माधुर्य को अपना कर कल्पनालोक में विचरण करती है। इसीलिए उनको कैशोर्य भावुकता के कवि भी कहा जाता है। बाद में उनकी लेखन शैली प्रतीकात्मक रूप लेती है। ऑस्कर वाइल्ड एवं धर्मवीर भारती की रचना शैली पर दृष्टि डालते हुए धर्मवीर भारती ग्रंथावली के संपादक चंद्रकांत बांदिवडेकर लिखते हैं-

“ ऑस्कर वाइल्ड की कला विषयक मान्यताओं और भारती की कला संबंधी दृष्टि में बहुत अंतर रहा है। दोनों की साहित्यिक प्रवृत्तियों में भी बहुत अंतर है। भारती के साहित्य में जीवन की धड़कनों और कालविद्धता का गहरा बोध पाठक को रससिक्त करते हुए भी कचोटता रहता है। ऑस्कर वाइल्ड की कल्पनाशक्ति की क्रीड़ा पाठक को चमत्कृत करती हुई जीवन की प्रासंगिकता और यथार्थ का संस्पर्श सीधे कम देती है।”[1]

पाठकों को सरल भाषा में मूल कृति का बोध कराना अनुवादक का लक्ष्य है, इसलिए वह मूल तत्वों को ध्यान में रखते हुए, भाषिक पक्ष के साथ-साथ सामाजिक पक्ष एवं सांस्कृतिक पक्ष के प्रति निरंतर जागरूक रहता है। ऑस्कर वाइल्ड की कहानियों को प्रारंभ करने से पहले अनुवादक डॉ. भारती लिखते हैं-

“ऑस्कर वाइल्ड अंग्रेजी साहित्य के उन थोड़े से लेखकों में से एक है जिसका लेखन जितना विवादास्पद रहा है, उतना ही उसका व्यक्तित्व भी। किंतु अंग्रेजी गद्य के अनुपम शैलीकार के रूप में उसे सभी ने मान्यता दी है ! शिल्पसज्जा, शब्दचयन, चमत्कारपूर्ण अभिव्यक्ति और भाषा-प्रवाह के लिए आज भी उसका लेखन अद्वितीय माना जाता है। उसकी कथाएँ अपने ढंग की अनूठी हैं। आशा है वे हिंदी के पाठकों को रुचिकर प्रतीत होंगी”।[2]

निम्नलिखित उदाहरण के माध्यम से उनके अनुवाद कर्म को समझने में अधिक सहायता प्राप्त होगी।

शीर्षक एवं कथानक का अनुवादपरक विश्लेषण-

शीर्षक का निर्धारण कथानक एवं विषयवस्तु के आधार पर ही किया जाता है। उत्तम शीर्षक वह होता जो संपूर्ण कथानक का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हो। अनुवाद के दौरान लक्ष्य भाषा में शीर्षक का निर्धारण अनुवादक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। अनुवादक कथानक के सभी अवयवों को ध्यान में रखकर लक्ष्य भाषा में शीर्षक निश्चित करता है।

इस संदर्भ में अनूदित कहानियों के शीर्षकों का अनुध्यान करें तो पता चलता है कि भारती ने कुछ शीर्षकों का अनुवाद ज्यों का त्यों किया है। उदाहरण- ‘The star child’ कहानी का कथानक इस प्रकार है- कहानी में एक शिशु का अहंकार में अंधा होकर अपना सर्वस्व हार जाने के पश्चात, पश्चाताप से पुनः सब कुछ प्राप्त करने की कथा है। कहानी में एक तारा टूटने से दो लकड़हारे को एक शिशु प्राप्त होता है। उनमें से एक उसका लालन- पालन करता है परंतु वह बालक सुंदर होने की वजह से अपने माता-पिता का भी अपमान करता था। अपने कुकर्म के फलस्वरूप वह कुरूप हो जाता है एवं अपने भूल को स्वीकारते हुए असली चेहरे के साथ मर्यादित व्यक्ति भी बन जाता है। अनुवादक ने अनूदित कहानी में मूल कहानी के प्राण तत्व को सार्थक ढंग से संचार किया है। साथ ही शीर्षक का अनुवाद ‘तारा शिशु’ के नाम से किया है, जो अनुवाद के शब्दानुवाद की श्रेणी में आता है। अन्य एक कहानी ‘The birthday of the Infanta’ में, हमारे तथाकथित समाज में मनुष्य की बाहरी सुंदरता पर जितना ध्यान दिया जाता है, उतना ही उसके अंतःकरण की भावनाओं की उपेक्षा किए जाने की कथा है। कथानक को अनुवादक मूल पाठ के अनुसार यथावत रखा है। कथानक के आधार पर अनुवादक मूल कहानी के अनुरूप शीर्षक का शब्दानुवाद ‘इंफैटा का ज न्मदिन’ के नाम से किया है। ‘The fisherman and his soul’ कहानी में एक नाविक एवं एक जलपरी की प्रेम की गाथा है, जिसमें जलपरी नाविक से शारीरिक आसक्ति के बिना प्रेम की आशा करती है। इस कहानी में भी अनुवादक ने अधिक जोड़-तोड़ न करके मूल कृति के समान कथा को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस कहानी का शीर्षक का अनुवाद ‘नाविक और उसका अंतःकरण’ के नाम से शब्दानुवाद के रूप में किया गया है।

उपर्युक्त कहानियों के अतिरिक्त अनुवादक कुछ कहानियों के शीर्षकों के अनुवाद करते समय मूल कहानी के कथानक को अधिक प्राधान्य दिया है, जिसके अनुसार ही शीर्षक का नाम चुना है। जैसे ‘The selfish giant’ कहानी का कथानक कुछ इस प्रकार है- कहानी में छोटे बच्चों में किस तरह ईश्वर का स्वरूप विद्यमान है, उसका वर्णन है। एक दैत्य/जादूगर अपने अहं भावनाओं से ग्रसित होकर निश्छल बच्चों को अपने मनोरम बगिया में खेलने से मना कर देता है। उसके उपरांत वहाँ सर्दी और अंधेरा अपने पैर जमाने लगते हैं। इस बात से चिंतित दैत्य/जादूगर अपनी गलती समझ कर बच्चों के लिए बगिया की दीवार तोड़ देता है। वहाँ पुनः हर्षोल्लास का प्रत्यागमन होता है। अंततः जादूगर मृत्यु के पश्चात स्वर्ग में स्थान पाता है। वर्णित कहानी के शीर्षक का अनुवाद ‘शिशु देवता’ नाम से हुआ है, जहाँ अनुवादक भावानुवाद की सहायता ली है। अन्य एक कहानी में ‘The young king’ कहानी शीर्षक का अनुवाद ‘अभिषेक’ नाम से किया है। इस कहानी में एक तरूण युवराज के राज्याभिषेक के अवसर पर उनके राज्य के अबोध तथा निरीह प्रजाओं पर अत्याचार हो रहा था। जिसकी कथा सुनकर युवराज के मन में बदलाव आता है एवं वह अत्यंत साधारण पोशाक में राजदंड ग्रहण करने के लिए गिरजाघर जाता है। परंतु उच्चाधिकारी राजकुमार के साधारण पोशाक के कारण उसको युवराज के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। कहानी में राज्याभिषेक ही मुख्य वर्णित विषय हैं। संभवतः इसी कारण अनुवादक द्वारा कहानी के शीर्षक का नाम ‘अभिषेक’ रखा गया होगा। ‘The devoted friend’ कहानी में एक मित्र का दूसरे मित्र के प्रति निःस्वार्थ भाव से मित्रता निभाने की कथा है। कहानी का कथानक आदर्शवादी है परंतु अंत में मनुष्य के आदर्श का कोई मूल्य न होना दर्शाया गया है। अनुवादक ने शीर्षक का अनुवाद ‘नि: स्वार्थ मित्रता’ नाम से करते हैं जो भावानुवाद के अधिक निकट है। ‘The Nightingale and the rose’ कहानी में एक छोटी चिड़िया द्वारा प्रेम की नैसर्गिकता को समझना एवं एक गुलाब को कीमती लाल गुलाब बनाने के लिए अपने जीवन का बलिदान देना चित्रित किया गया है। उपर्युक्त कहानी के शीर्षक का अनुवाद ‘एक लाल गुलाब की क़ीमत’ के रूप में किया गया है। द्रष्टव्य है कि मूल शीर्षक में ‘Nightingale’ एवं ‘rose’ का नामोल्लेख है परंतु अनुवादक केवल गुलाब के कीमत को ही दर्शाया है। अतः यह भावानुवाद कहा जा सकता है। ‘The happy prince’ कहानी दुनिया के सर्वोत्तम कहानियों में से एक माना जाता है। इस कहानी में एक राजकुमार की मूर्ति अपने ऊपर शोभित अलंकार के माध्यम से असहाय लोगों की मदद करता है। मूर्ति से आभूषण निकलने के बाद वह कैसे एक सामान्य पत्थर बन जाता है, इसका मार्मिक चित्रण वर्णित है। कहानी का प्रारंभ नगर के उत्तर दिशा में स्थापित एक सुखी राजकुमार की स्वर्ण एवं कीमती अलंकार जङित प्रतिमा में से होती है। राजकुमार सुखी होते हुए भी गरीबों की सहायता न करने की वजह से वह दुखी रहता है। सहायता करने के बाद उसका मूल्य नहीं रहता है। अनुवादक मूल कहानी के भाव पक्ष को जोर देते हुए शीर्षक का नाम ‘मूर्ति और मनुष्य’ रखा है।

जब भाषा में कोई मूल शब्द का अर्थ मौजूद होता है तब अनुवादक साधारण अर्थ को प्रयोग में लाने की कोशिश करता है परंतु जब सांस्कृतिक एवं सामाजिक पक्ष मूल भाषा से भिन्न हो तब अनुवादक लक्ष्य भाषा में अपने अनुसार जोड़-तोड़ करता है। साथ ही अनुवादक अपनी समझ के अनुसार अर्थों को ग्रहण एवं प्रयोग कर सार्थक अनुवाद का पैमाना तैयार करता है। धर्मवीर भारती भी यही सिद्धांत अपनाते हैं। यथा- ‘The Nightingale and the rose’ शीर्षक का ‘एक गुलाब की क़ीमत’, ‘The devoted friend’ शीर्षक का ‘निःस्वार्थ मित्रता’, ‘The selfish giant’ शीर्षक का ‘शिशु देवता’, ‘The happy prince’ शीर्षक का अनुवाद ‘मूर्ति और मनुष्य’ और ‘The young king’ शीर्षक का ‘अभिषेक’ नाम से अनुवाद किया है। यह न्यायसंगत हो सकता है कि कहानी को पढ़ने के उपरांत उनको गुलाब, मित्रता एवं बच्चों की पवित्रता, मूर्ति की गरिमा ने अधिक प्रभावित किया हो, इसलिए उन्होंने उपर्युक्त शीर्षकों में शब्दार्थ प्रयोग न करके भावार्थ का प्रयोग करना अनुकूल समझा है। उपर्युक्त विवेचन से यह प्रतीत होता है कि डॉ. भारती ने अनुवाद करते समय भाषा पक्ष और शब्द पक्ष को ध्यान में रखते हुए शब्दानुवाद एवं भावानुवाद की रणनीतियाँ अपनायी है।

पात्रों एवं नामों का अनुवाद-

कहानी का अन्य महत्वपूर्ण तत्व, चरित्र में भी अनुवादक ने मूल कहानी के अनुरूप मौलिकता बरतने की कोशिश की है। चित्रित चरित्रों को हूबहू वैसा ही रखा गया है जैसा मूल कहानी में प्रस्तुत है। कुछ पशु-पक्षिओं के नाम में बदलाव किया गया है जो नगण्य है। उदाहरण- ‘एक गुलाब की कीमत’ कहानी में बुलबुल, एक छात्र, गुलाब आदि। ‘नाविक और उसका अंतकरण’ कहानी में जलपरी, नाविक, और उसका अंतकरण आदि, ‘शिशु देवता’ कहानी में जादूगर, बच्चे आदि। ‘मूर्ति और मनुष्य’ कहानी में एक राजकुमार का पुतला, एवं एक चिड़िया आदि, ‘निस्वार्थ मित्रता’ कहानी में दो बंधु हैंस एवं मिलर आदि, ‘इंफैंटा का जन्मदिन’ में स्पेन की राजकुमारी इंफैंटा एवं बौने का चरित्र, ‘तारा शिशु’ कहानी में तारा- शिशु, बूढ़ी औरत तथा दो लकड़हारे, ‘अभिषेक’ कहानी में राजकुमार आदि पात्रों को यथावत रखा गया है। लिविया, मिस्र(इजिप्ट) जैसे कुछ स्थानों के लिए अनुवादक द्वारा लिप्यंतरण की रणनीति अपनाई गई है।

भाषा शैली व अनुवाद की प्रमुख चुनौतियाँ-

इस अध्ययन में अनूदित कृतियों की भाषा शैली का विश्लेषण आवश्यक है। भाषा शैली से तात्पर्य, भाषिक संरचना, शब्दों तथा वाक्यों का चुनाव एवं लेखक के विचार व दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने की प्रणाली से है। द्रष्टव्य है कि कुछ शब्दों के लिए उन्होंने आक्षरिक अर्थों का ग्रहण किया है। जैसे-

पदों एवं वाक्यों का शब्दानुवाद-

जब शब्द व्याकरणिक नियम में बंधकर समुच्चय वाक्य का अवयव बन जाते हैं तब वह पद कहलाता है। वर्णित मूल कहानियों की भाषा अंग्रेजी है एवं अनूदित कहानियों की भाषा हिंदी है। एक ही भाषा परिवार के होने के बावजूद दोनों भाषाओं की संरचनात्मक भिन्नता देखने को मिलता है। इस परिप्रेक्ष्य में साधारणतः भावानुवाद की ही सहायता ली जाती है। परंतु व्यक्तिवाचक संज्ञा, नाम, स्थान का नाम तथा कुछ निश्चित वाक्य एवं वाक्यांशों का ही शब्दानुवाद संभव होता है साथ ही वह उचित भाव को भी संप्रेषित करता है। उदाहरण-‘एक लाल गुलाब की क़ीमत’(The Nightingale and the rose) कहानी में ‘young student’,‘my roses are white’, ‘Sun in his chariot of gold’[3] आदि पदों तथा पदबंधों का अनुवाद क्रमश: ‘तरूण छात्र’, ‘मेरे गुलाब सफेद हैं’ ‘सोने के रथ पर सूरज’[4] के रूप में किया गया है। ‘मूर्ति और मनुष्य’(The happy prince) कहानी में उद्धृत पद “I am come to bid you good-bye”[5] का शब्दानुवाद “मैं तुमसे विदा माँगने आई हूँ”[6] है।

वाक्यों का भावानुवाद-

जैसा की कहा गया है कि अनुवादक अपने समझ एवं पाठकों के पसंद के अनुसार ही अनुवाद करता है। इसीलिए अनुवाद में मूल शब्द से हटकर अतिरिक्त शब्दों को प्रयोग में लाना दोषरहित माना जा सकता है। उदाहरण-

  • ‘एक लाल गुलाब की कीमत’ कहानी में “But there is no red rose in my garden, so I shall sit lonely and she will pass me by. She will have no need of me, and my heart will break”[7] - “लेकिन अगर मैं गुलाब न ला सका तो वह मेरी ओर देखेगी भी नहीं।”[8] प्रदत्त वाक्य में सटीक अर्थ संप्रेषण के लिए अनुवादक कुछ वाक्यों का हुबहू अनुवाद नहीं करते हैं परंतु मूल कथन के अनुसार ही अनूदित पाठ अर्थ संप्रेषण करता हुआ प्रतीत होता है।
  • ‘निःस्वार्थ मित्रता’ कहानी से उद्धृत वाक्य - “Real friends should have everything in common”[9] मूल वाक्य का शब्दानुवाद ‘सच्चे दोस्तों के बीच सब कुछ सामान्य रहता है’ के रूप में हो सकता था परंतु अनुवादक ने अपने सृजनशीलता को प्रकट करते हुए मूल वाक्य अनुवाद “सच्चे मित्र में कभी स्वार्थ का लेश भी नहीं होना चाहिए”[10] के रूप में किए हैं।
  • कहानी के उद्धृत एक अन्य उदाहरण “Anybody can say charming things and try to please and to flatter”[11] का अनुवाद “लल्लो- चप्पो तो कोई भी कर सकता है।”[12] के मुहावरे के रूप में प्रस्तुत किया है। उपर्युक्त दोनों उदाहरण में अनुवादक द्वारा भावार्थ को अधिक प्रशय दिया गया है।
  • ‘तारा शिशु’ (The star child) कहानी में “Mountain-Torrent she was hanging motionless in air, for the Ice-King had kissed her”[13] वाक्य का अनुवाद “पास की पहाड़ी की निर्झरिणी ठंड से जम गई थी क्योंकि बर्फ़ के राजा ने उसे चूम लिया था”।[14]
  • ‘मूर्ति और मनुष्य’ कहानी में मूल वाक्य “Then the snow came, and after the snow came the frost. The streets looked as if they were made of silver, they were so bright and glistening; long icicles like crystal daggers hung down from the eaves of the houses, everybody went about in furs, and the little boys wore scarlet caps and skated on the ice. ”[15]- “उसके बाद ओले गिरे और फिर पाला पड़ने लगा। सड़कें चमकदार बर्फ से ढककर चाँदी की मालूम होने लगी। छज्जों से बड़े-बड़े बर्फ के टुकड़े लटकने लगे। सभी फ़र के ओवरकोट पहनकर निकलने लगे ।”[16] उद्धृत अनूदित पाठांश में मूल पाठांश के कुछ पदों का अनुवाद नहीं किया गया है जैसे कि ‘skated on the ice’ इत्यादि।

उपर्युक्त उदाहरणों से यह द्रष्टव्य है कि कहानी के आवश्यकता के अनुसार अनुवादक लक्ष्य भाषा में शब्दों का चयन बारीकी से कर सकता है। वाक्य के संदर्भ में देखा जाए तो ‘एक लाल गुलाब की क़ीमत’ कहानी में कुछ वाक्यांशों तथा वाक्यों के समूह को अनुवादक ने संक्षेप में अनुवाद में किया है जो अर्थानुसार सटीक बैठता है। प्रेम को लक्ष्य भाषा में परिभाषित करके अनुवादक अनुवाद करते हैं, ऐसे वाक्य में कुछ शब्दों का मूल अर्थ लिया गया है एवं कुछ शब्दों तथा वाक्यांशों को सुव्यवस्थित किया गया है।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्ष-

अनुवाद कार्य में सामाजिक एवं सांस्कृतिक तत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता। विश्व के लगभग सभी भाषा भाषियों का समाज एवं संस्कृति एक दूसरे से भिन्न है। मूल भाषा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ को समझने के लिए अनुवादक लक्ष्य भाषा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों का ही सहारा लेता है। धर्मवीर भारती ने भी पाठकों की रुचि को ध्यान में रख कर भारतीय संस्कृति को ज्यादा अहमियत दी हैं। उदाहरण स्वरूप हम देख सकते हैं कि ‘एक गुलाब की क़ीमत’(The nightingale and the Rose) कहानी में एक वाक्य “His hair is dark as hyacinth-blossom”[17] का अनुवाद “उसके बाल भँवरों की तरह काले हैं”[18], के रूप में हुआ है। यहाँ द्रष्टव्य है कि ‘hyacinth’ एक विदेशी फूल है जो अपने गूंथे हुए बनावट के लिए परिचित है। साधारणतः यह फूल भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं खिलता और न ही कोई आम भारतीय इस फूल से पूर्व परिचित हो। मूल भाषा में लेखक ने उपर्युक्त फूल की तुलना काले घने बालों से की है। उसी प्रकार से हिंदी साहित्य पाठकों की सहूलियत के लिए अनुवादक ने उपर्युक्त वाक्य में काले बालों को भँवर के कालापन से तुलना की है। वैसे ही “as yellow as the hair of the mermaid who sit upon an amber throne, and yellower than the daffodils that blooms in the meadow before the mower comes with his scythe”[19] -“इतने पीले जितनी दोपहर की धूप, जितने सोने के तार”[20] mermaid अर्थात जलपरी भारतीय लोककथाओं में प्रचलित नहीं है, साथ ही भारतीयों के बालों का रंग भी काला होता है एवं डेफोडिल फूल भी भारत में नहीं पाए जाते हैं। इसीलिए अनुवादक ने पीले रंग को दोपहर की धूप और सोने के तार के भांति बताया है।

कुछ- कुछ वाक्यों में सांस्कृतिक भिन्नता होने के बावजूद, उनमें कोई भी बदलाव नहीं किया गया है। जैसे कि ‘शिशु देवता’(The selfish giant) कहानी में “The Earth is going to be married, and this is her bridal dress,”[21]- “धरती का ब्याह होनेवाला है और लोगों ने उसे शादी की पोशाक पहना दी है”[22]। इस वाक्य में शादी की बात कही गयी है। साधारणतः पश्चिमी देशों में दुल्हन का पोशाक सफेद होता है एवं भारत में दुल्हन का पोशाक लाल होता है। परंतु अनुवादक ने सांस्कृतिक बदलाव न करके वैसे ही बने रहने दिया जैसे मूल पाठ में है। ‘मूर्ति और मनुष्य’ कहानी में मूल कहानीकार ‘Egypt’ देश का वर्णन संदर्भ में किया है परंतु अनुवादक कहीं दक्षिण देश एवं मिस्र देश के रूप में अभिहित किया है।

निष्कर्ष : लेखक की अपनी रचनाधर्मी प्रवृत्ति होती है। जब वह दूसरे लेखको की कृतियों का अनुवाद करता है तब उसको अपने पूर्वाग्रह से मुक्त होकर लेखक के दृष्टिकोण से परिचित होना पड़ता है। तभी वह अनुवाद एवं लक्ष्य भाषा के पाठकों के साथ उचित न्याय कर सकता है। अनुवादक ने पाठक को ध्यान में रखते हुए कथानक के आधार पर शीर्षक का अनुवाद किया है, जो कि पूर्ण रूप से शब्दानुवाद अथवा भावानुवाद नहीं कहा जा सकता है। अनूदित कहानी में पात्रों को मूल कहानी के पात्रों की भांति यथापूर्व रखा गया है। उदाहरण- स्पेन की राजकुमारी, जलपरी आदि इससे यह ज्ञात होता है कि अनुवादक मूल रचना के प्रति भी सचेत व निष्ठावान है। अनुवादक की शब्दसंपन्नता, विचारशक्ति, मनःस्थिति, परिस्थिति तथा सामाजिक वर्ग की समझ ही अनूदित कृति को अनूठा बनाती है। भारती ने अपने अनुवाद कार्य में इस बात का विशेष ध्यान रखा है। जिसके कारण डॉ भारती के अनुवाद विश्वसनीय एवं मूलपाठ के भावों को संप्रेषित करने में सफल रहे हैं। अंत में कहा जा सकता है कि डॉ. भारती, रूचिसंपन्न शब्दों तथा पदों का प्रयोग करके अनुवाद को वैभवशाली बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।

संदर्भ :
  1. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998,पृष्ठ-5
  2. वही, पृष्ठ-15
  3. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ-18,19,21
  4. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998,पृष्ठ- 72,73,74
  5. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ-13
  6. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998,पृष्ठ-47
  7. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ-18
  8. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998,पृष्ठ- 72
  9. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ-32
  10. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998,पृष्ठ- 52
  11. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ
  12. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998,पृष्ठ
  13. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ-128
  14. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998,पृष्ठ-31
  15. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ- 15
  16. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998, पृष्ठ-49
  17. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ-18
  18. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998, पृष्ठ-72
  19. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ-20
  20. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998, पृष्ठ- 73
  21. Wilde, Oscar. (2024). Selected short stories. Noida: Maple press private limited. पृष्ठ
  22. धर्मवीर भारती ग्रंथावली (सं- चंद्रकांत बांदिवडेकर), खंड- 2 (कुल खंड-9), वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1998, पृष्ठ-
अन्य संदर्भ ग्रंथ-
  1. सिंहल,सुरेश.(2010).अनुवाद संवेदना और सरोकार. दिल्ली : संजय प्रकाशन.
  2. Catford, J.C. (1965). A Linguistic Theory of Translation. Oxford: OUP.
  3. Borg, Claudine. (2023).A Literary Translation in the Making. New York: Routledge
  4. पालीवाल, रीतारानी. (2018). अनुवाद प्रक्रिया एवं परिदृश्य. नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन

शाश्वती खुंटिआ
शोधार्थी, अनुवाद अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र, 442001

श्रीनिकेत कुमार मिश्र
सहायक अध्यापक, अनुवाद अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र, 442001

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा




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