हिन्दी सिनेमा में दलित प्रतिरोध
- महेन्द्र प्रजापति
शोध सार : सिनेमा अभिव्यक्ति का सबसे महंगा लेकिन सुलभ माध्यम है। समाज की किसी भी गतिविधि को वैश्विक आधार देने में सिनेमा अन्य कलाओं से सशख्त और प्रभावशाली है। सिनेमा में दलित समाज को पात्र के रूप में प्रस्तुत कर उनकी समस्याओं को उठाने का प्रयास हमेशा किया गया। दलित समाज अपने द्वारा किए गए संघर्ष के माध्यम से अपनी अस्मिता को पहचान पाता है. इस संघर्ष को अनेक फिल्मों में दिखाया जा चुका है। इस शोध पत्र में उन फिल्मों को लिया गया है जिनमें उन्होंने अपना प्रतिरोध दर्ज किया है. प्रतिरोध दलित समाज की वैचारिकी और साहित्य दोनों को सामने लाता है. सिनेमा के माध्यम से वह और मुखर होता है।
बीज शब्द : प्रतिरोध, दलित विमर्श, दलित साहित्य, अस्मिता, संघर्ष, वैचारिकी, पहचान, सिनेमा।
लगभग पाँच सौ वर्षों के साहित्यिक इतिहास में दलित प्रतिरोध अब आया है तो समझना भी जटिल नहीं है कि इन समाजों की अभिव्यक्ति के माध्यम सुलभ नहीं थे। ‘फ़ैड्री’ और ‘सैराट’ जैसे दलित सैद्धान्तिक विषयों पर फिल्में बना चुके नागराज मंजुले स्वयं एक दलित परिवार से आते हैं। उनका कहना है कि अपने साथ हुए भेदभाव के कारण ही मैं सिनेमा में आया। सिनेमा में दलितों की स्थिति पर वह लिखते हैं, “भारत में दलित होना मुश्किल काम है. लेकिन आप एक दलित फ़िल्ममेकर हैं तो कोई बात नहीं क्योंकि फ़िल्म इंडस्ट्री काफ़ी सेक्युलर है और यहां धर्म, जाति, भाषा का भेदभाव जल्दी सामने नहीं आता, लेकिन ज़िंदगी ने मुझे कई बार अनुभव करवाया है कि मैं एक दलित समाज से आता हूँ।”[1] यह एक नज़रिया है। जबकि हिन्दी सिनेमा में दलित समाज का चित्रण तो मिलता है लेकिन उनकी भागीदारी बहुत कम है। आज जो फिल्में बन रही हैं उसमें दलितों की हिस्सेदारी बढ़ी है। अभी तक फिल्मों में दलित समस्या को उठाया जाता रहा है उनके अंदर के प्रतिरोध को सही से अभिव्यक्ति नहीं मिली इसी कारण सिनेमा में दलित समाज बहस का मुद्दा नहीं बन सका। फिल्म उद्योग में दलितों की भागीदारी नहीं होगी तो उन पर बनी फिल्में समस्या केन्द्रित बन कर रह जाएंगी उनका निदान नहीं हो पाएगा, “100 करोड़ से ऊपर की जनसंख्या वाले देश के सिनेमा में बहुजन-जीवन के स्वाभाविक-चित्रण का अभाव चिंताजनक है और इसका एक बड़ा कारण संभवतः यह है कि बहुजनों का बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के उपभोक्ता समुदाय में तब्दील नहीं हुआ है। यह तब तक नहीं बदलेगा जब तक उनकी परिस्थितियों को स्वभाविक तरीके से नहीं दिखाया जाएगा। अगर हम दलित-समस्या पर ही केन्द्रित रहेंगे और सिर्फ़ सुधार के आग्रही के बतौर ही दलितों का चित्रण करेंगे तो वे कभी समाज के स्वाभाविक हिस्से की तरह नहीं दिखेंगे।”[2]
हिन्दी सिनेमा में दलित और हाशिए पर खड़े समाज को केन्द्रित कर फिल्मों का निर्माण होता रहा है। इन फिल्मों में उनकी समस्याओं को तो उठाया जाता है लेकिन उनके अंदर के प्रतिरोध को नहीं। उपेक्षित समाज के लिए फिल्म बनाना बड़ी चुनौती है। क्योंकि जब भी किसी विशेष वर्ग पर फिल्म का निर्माण होता है तो उसकी भाषा-बोली, रहन-सहन, परिवेश आदि का भी ध्यान रखना होता है। बिना उनकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के फिल्म असफल मानी जाएगी। हिन्दी सिनेमा में दलित फ़िल्मकारों का अभाव रहा है। यही कारण है कि फिल्मों में अनुभूति की प्रामाणिकता का अभाव दिखता है, “दलित-आदिवासियों के क्षेत्र-स्थान, भाषा-बोली, प्रथा-परंपरा, रीति-रिवाज आदि की जानकारी इकट्ठी करना और उनके दुःख और वस्तुस्थिति से स्वयं को जोड़ पाना न सिर्फ निर्देशक बल्कि नायक-नायिका के लिए भी एक चुनौती है। इन तथ्यों के बारीकी से अध्ययन की आवश्यकता होगी। तभी दलितों-आदिवासियों की वास्तविक स्थिति को पर्दे पर संजीदे ढंग से फिल्माया जा सकता है। इसके साथ एक और बड़ी समस्या है- दर्शक वर्ग। भारतीय संदर्भ में यदि बात की जाय तो मध्यवर्ग ही सबसे अधिक फिल्में देखता है और उनसे प्रभावित भी होता है। पर मध्यवर्ग के फिल्म देखने का प्रमुख उद्देश्य मनोरंजन होता है, फिल्म से कोई शिक्षा या प्रेरणा मिल जाये तो वो बाई-प्रोडक्ट के रूप में ही देखी जाती है।”[3]
सिनेमा में दलित प्रतिरोध को दर्ज़ करने वाली कुछ महत्वपूर्ण फिल्में भी बनी हैं। ‘मदर इंडिया’ भारतीय ही नहीं विश्व सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्म मानी जाती है। चूंकि यह फिल्म महिला प्रधान है इसलिए इसकी नायिका नर्गिस हुईं लेकिन इनके साथ ही फिल्म में राजेंद्र कुमार और सुनील दत्त भी हैं जो नर्गिस के बेटों की भूमिका में हैं। फिल्म में उनके दूसरे बेटे की भूमिका में सुनील हैं जो कि फिल्म में बिरजू नामक गवार और अनपढ़ देहाती की भूमिका में हैं। बिरजू अपनी माँ के अपमान का गवाह है। चूंकि वह जागरूक है इसलिए उसके अंदर अपने अतीत का प्रतिरोध है। वह जानता है एक मुट्ठी चने के बदले लाला ने उसकी माँ से जिस्म का सौदा करने को कहा था। वह यह भी जानता है कि लाला ने उसकी माँ जैसी कितनों औरतों का शोषण किया है। गाँव की जमीनें, गहने, भूख, नींद सब लाला के पास गिरवी हैं। बिरजू हमेशा लाला से बदला लेना चाहता है। उसकी माँ के कंगन भी लाला के पास हैं जिसे बिरजू छुड़ाना चाहता है। फिल्म में उसकी भूमिका बेशक अनपढ़ की है लेकिन वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। फिल्म की नायिका गंगा उससे प्रेम करती है लेकिन उसके रहन-सहन और व्यवहार के कारण उसके घर वाले बिरजू से दूर रखते हैं। गंगा गाँव के बच्चों को जब पढ़ाती है तब बिरजू उसके आस-पास घूमता रहता है। एक दिन जब गंगा उसे भी पढ़ने को कहती है तो वह अपना हाथ गंगा के सामने फैला देता है और कहता है, “गंगा मुझे बस इतनी गणित पढ़ा दे कि मैं लाला का सारा हिसाब जान जाऊँ।”[4] बाबा साहब ने प्रतिरोध का यही रास्ता बताया था। उनका मानना था शिक्षित होकर अपने समाज के लिए बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है। बिरजू उसी का प्रतिनिधित्व करता है। वह बचपन से ही देख रहा है दादा का लिया पैसा आने वाली कई पीढ़ियाँ नहीं भर पाती। आखिर लाला कौन सा-हिसाब लगाता है। यहाँ मैं कुछ ऐसी फिल्मों की चर्चा कर रहा हूँ जिसमें दलित प्रतिरोध को देखा जा सकता है।
सिनेमा के आरंभिक दौर की बात करें तो तीस के दशक में ‘चंडीदास’, ‘सुजाता’, ‘धर्मात्मा’,’ अछूत कन्या’ जैसी फिल्में दलित समस्या को उठाने लगी थीं लेकिन इनमें प्रतिरोध का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। नब्बे के दशक में पार, दामुल, दीक्षा, समर, आक्रोश, अंकुर जैसी फिल्मों में दलित प्रतिरोध का चेहरा दिखने लगा। इन फिल्मों मे प्रतिरोध का स्वर धीरे ही सही उठने लगा था। फिल्में दलित समस्या तक केन्द्रित न होकर समाधान तक बढ़ने लगीं।
दलित फिल्मों के प्रति उदासीन हिन्दी सिनेमा ने अपनी कुछ फिल्मों में प्रतिरोध के बीज छोड़ने की कोशिश तो की, लेकिन अभी भी सफलता नहीं मिल पायी है। विधु विनोद चोपड़ा हिन्दी सिनेमा के ब्रांड फ़िल्मकार हैं। ‘एकलव्य: द रॉयल गार्ड’ उनके द्वारा निर्देशित एक महत्वपूर्ण फिल्म है जिसका प्रदर्शन 2007 में हुआ। यहाँ एकलव्य प्रतीक रूप में सामने आया है। पौराणिक कथाओं में एकलव्य के साथ गुरु के छल को दिखाया गया है जो दलित समाज में प्रतिरोध की तरह देखा जाता है। यहाँ ‘एकलव्य’ एक विचार की तरह उभरा है। एकलव्य की कहानी शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले मतभेद की एक झलक प्रस्तुत करती है। यहाँ एकलव्य का अर्थ किसी विशेष जाति, धर्म या संप्रदाय के व्यक्ति से अधिक एक विचार है जो अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए वैचारिक संबल बनकर उभरता है, “एकलव्य की कहानी एक जाति विशेष, समूह विशेष को संबोधित नहीं करती है, बल्कि एक बड़े तबके के लोग, जो अपने को व्यक्ति, समूह, संस्था द्वारा उत्पीड़ित महसूस करते हैं, क्योंकि वह समूह, वह व्यक्ति, वह संस्था एक मुख्य प्रभाव, एक प्रभावी विचारधारा के अंतर्गत काम करता है, उन सबको संबोधित करती है। मैं मानती हूँ कि एकलव्य की कहानी में एक मनोवैज्ञानिक आधुनिकता है और जिसकी वजह से यह कहानी दोनों प्रकार के लोगों को छूती है, चाहे वे परम्परावादी हों या फिर आधुनिक जीवन शैली को अपनाते हों।”[5] भारत में अशिक्षा और अज्ञानता दलित समाजों की सबसे बड़ी कमजोरी है। ‘स्वदेश’ फिल्म में यही दिखाने का प्रयास किया गया है। स्वदेश का इंजीनियर नायक वर्षों बाद जब अपने गाँव आता है तो वहाँ की बदहाली और अभावग्रस्त जीवन को देखकर वापस जाने का विचार त्याग देता है। दलित समाज में प्रतिरोध का यह रास्ता सबसे कारगर है कि वह शिक्षित होकर अपने समाज को कुछ दे सके जो बाबा साहब ने किया।
‘शूद्रा द राइजिंग’ दलित प्रतिरोध की वास्तविक व्याख्या करती है। इस फिल्म में प्रतिरोध का स्वर इसलिए मुखर है क्योंकि इससे दलित समाज के प्रति होने वाले अत्याचारों को मजबूती से दिखाया गया है। यह फिल्म हिंदू धर्म द्वारा दलितों पर किए गए अत्याचारों का नग्न रूप सामने लाता है। फिल्म की कहानी एक दलित गाँव से शुरू होती है जिसमें दलित अपनी जीविका के लिए मेहनत-मजदूरी और अपना पारंपरिक कार्य करते हैं। उसी गाँव के पास सवर्ण भी रहते हैं। जो उन पर कई तरह के अत्याचार करते हैं। बिना मजदूरी दिए उन्हें अपने यहाँ काम पर लगाए रहते हैं। यह संभवत: पहली फिल्म है जिसमें दलित समाज का प्रतिरोध इतने बड़े स्तर पर दिखाई देता है। इस फिल्म में बाबा भीमराव आंबेडकर के सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए प्रतिरोध का मार्ग प्रशस्त किया गया है। निर्देशक ने बड़ी हिम्मत के साथ इस फिल्म में दलितों को ब्राहमणवाद से टक्कर लेते हुए दिखाया है। इस फिल्म में पुरातन विचारों, कर्मकांड, नियतिवाद के सामने आंबेडकर का विचार चुनौती बनकर उभरा है। इक्कीसवीं सदी के सिनेमा में दलित प्रतिरोध को इतने मारक ढंग से व्यक्त करने वाली फिल्मों का अभी तक अभाव है।
प्रकाश झा की फिल्में अपनी बुनावट के कारण देखी जाती हैं। इधर के वर्षों में उनकी फिल्मों में विषय को भटकाने का आरोप लगा है। यह सच भी है। आरक्षण, राजनीति जैसी फिल्में विषय को भटकाती हैं। ‘चक्रव्यूह’ भी कुछ ऐसा ही करती है फिर भी उसमें प्रतिरोध की एक हल्की झलक तो देखी ही जा सकती है। ‘नक्सलवाद’ की तस्वीर दिखाती है कि यह फिल्म जल, जंगल जमीन की लड़ाई से राजनीति तक कैसे पहुँचती है। आदिवासी समाज की पहली मांग यही है कि प्राकृतिक संसाधनों को छेड़ने की कोशिश न की जाए। मुख्यमंत्री का यह कहना, “उस जमीन में दबे प्रकृतिक संसाधनों का जब तक हम इस्तेमाल नही करेंगे, तो विकास कैसे हो पायेगा?”[6] कहानी साफ है कि राजनेता अपने फायदे के लिए आदिवासी समाज की मेहनत और खून-पसीने से बनायी गई प्राकृतिक संपदा को मल्टीनेशनल कंपनियों को बेचना चाहते हैं। आदिवासी समाज यह नहीं चाहता। विकास के नाम पर उनकी जीवन शैली को प्रभावित किया जाता है और उन्हें मिलता कुछ भी नहीं है। हालांकि यह फिल्म अंत में राजनीतिज्ञों द्वारा आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ ही खड़ी कर देती है जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं। आदिवासी समाज अपनी एकजुटता के लिए जाने जाते हैं। सामूहिकता उनकी जीवन-शैली का हिस्सा है। इस फिल्म में अपने संसाधनों के लिए शासन-प्रशासन से सीधे टकरा जाने की प्रवृत्ति ही प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है।
प्रकाश झा हिन्दी सिनेमा के एक मात्र ऐसे निर्देशक हैं जिनकी फिल्में अपनी विषय-वस्तु और भाषा के कारण लंबे समय तक दर्शकों से संवाद करती हैं। बिहार में जन्मे प्रकाश की फिल्में बिहार की सामाजिक और राजनीतिक सच्चाई को बहुत करीब से दिखाती हैं। दामुल, गंगाजल, अपहरण, राजनीति, चक्रव्यूह जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्देशन किया है। प्रकाश झा की फिल्में मुद्दे की मार्केटिंग करती हैं लेकिन साथ ही कुछ महत्वपूर्ण विषयों को उठाती भी हैं। ‘आरक्षण’ भी कुछ मुद्दों के साथ कमजोर लेकिन दलित प्रतिरोध को दर्ज़ करने वाली फिल्म है। फिल्म में आरक्षण के हवाले से दलित के अधिकारों की बात की गई है। फिल्म की कहानी डॉ. प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन) के आस-पास घूमती है जो भोपाल के एक कॉलेज में प्रिसिंपल हैं। डॉ. प्रभाकर को उनके आदर्शों और सिद्धांतों के लिए जाना जाता है। उनके लिए उनके सिद्धान्त ही उनके जीवन के आधार हैं। उनका शिष्य दीपक कुमार दलित है। दीपक के कुशल व्यवहार और मेधावी होने के कारण वह उसे विशेष स्नेह देते हैं। दीपक कुमार से डॉ. प्रभाकर आनंद की बेटी पूरबी (दीपिका पादुकोण) प्रेम करती है। डॉ. प्रभाकर के ही कॉलेज में एक अन्य शिक्षक कॉलेज के प्राचार्या पद पर मिथिलेश सिंह (मनोज वाजपेयी) के हाथ में आ जाता है जो शिक्षा को व्यवसाय बनाना चाहता है। फिल्म में शिक्षा के व्यवसायीकारण पर प्रहार करने के लिए आरक्षण को आधार बनाया गया है। वर्तमान शिक्षा पद्धति और दलितों की उच्च शिक्षा में भागीदारी को लेकर बनी इस फिल्म में प्रकाश झा किसी निर्णय तक नहीं पहुँच पाए।
फिल्म ‘आरक्षण’ में आरक्षण को परिभाषित करते हुए उसके विभिन्न पहलुओं पर बात की गई है। एक दृश्य में कॉलेज की दीवार पर लिखे हुए, “आरक्षण हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” को देखकर एक सवर्ण लड़का (प्रतीक बब्बर) उस लिखे हुए को दिखाते हुए कहता है, “आरक्षण के बदले लिख दीजिए खैरात। खैरात हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।”[7] सवर्ण लड़कों को भड़काने वाला मिथिलेश सिंह बीच में यह कहते हुए आग में घी डालता है, “इस साठ साल से एसटी. एससी और अब ओबीसी आरक्षण। हमारे बच्चे दिन रात रगड़-रगड़ कर पढ़ते रहे और जब एडमिशन का मौका आए तो खैरात लूट लीजिए आप लोग। डर लगता है न मेहनत करने से?[8] इस बात पर दलित युवा दीपक प्रतिरोध करते हुए कहता है, “हमें मेहनत का पाठ पढ़ा रहे हैं आप? हमने आज तक और किया क्या है? अगर भूल गए तो पढ़ लीजिए इतिहास। कौन मेहनत करके कमाता आ रहा है और कौन उसे खैरात समझकर लुटता रहा है। सदियों से दक्षिणा ले ले के भर ली अपनी पेटियाँ आपने और हमसे खैरात की बात करते हैं? आपके खेत जोते हमने। आपकी फसलें काटी हमने। आपके मवेशी चराए हमने। आपकी बेटियों और बीबियों की डोलियाँ उठाई हमने। आपके मुर्दे जलाए। आपके जूते सिए, बैल हाँकें, नाव चलाए, आपके घरों के गंदी नालियों की सफाई की यहाँ तक की आपकी टट्टी भी सर पर ढ़ोई हमने। हमें मेहनत सिखाएंगे आप?[9] तो प्रतीक बब्बर फिर कहता है, “ठीक कहा आपने, इसी काबिल हैं आप। उतनी ही औकात है आपकी और यहीं खटिए आप। यहाँ देश के भविष्य को बनाने की बात हो रही है और जो काबिल होगा उसी को मिलेगी जगह। मगर आप लोगों को तो सब कुछ फोकट में चाहिए। सच तो ये है कि कंपटीशन से डरते हैं आप।”[10] दीपक उसका जबाव देते हुए कहता है, “किस कंपटीशन की बात कर रहे हो तुम। वही जो आपने हमें कभी करने नहीं दिया? अरे हमारे लिए तो स्कूल के सभी दरवाजे बंद थे। किसी तरह हम वहाँ पहुँच भी गए तो हमें छांट कर अलग लाइन में बैठा दिया गया। स्कूल तुम्हारे, अस्पताल तुम्हारे, पुलिस स्टेशन तुम्हारे, सब सुख-सुविधा के सारे तंत्र तुम्हारे। पता है तुमने क्यों नहीं दिया मौका हमें कंपटीशन का? क्योंकि तुम डरते हो बराबरी के कंपटीशन से। हम नहीं।”[11] प्रतीक बब्बर इस अपमान पर चिढ़ते हुए कहता है, “इतिहास की आड़ में अपनी कमजोरी मत छुपाओ तुम लोग। हमारी जनरेशन में ऐसा कुछ नहीं होता है। अगर हिम्मत है तो चैलेंज उठाओ और लड़ो। मगर वो आप करेंगे नहीं क्योंकि उसके लिए मेरिट, जो नहीं है तुम्हारे पास।”[12] दीपक फिर हिम्मत से जबाव देता है, “करेंगे मुक़ाबला मेरिट से भी तुम्हारा। रेस कि स्टार्टिंग लाइन एक होनी चाहिए, सबकी। जाओ पहले अपने बाप से कहो अपनी पुश्तैनी हवेली छोड़कर हमारे पास आकर बस्ती में रहे। रोज सुबह वर्दी चढ़ाकर ड्राइवर, दरवान या चपरासी की नौकरी करे। अपनी माँ से कहो कि अपने एअरकंडीशनर आशियाने से निकले और माँ के पास आकर घर-घर झाड़ू बर्तन करे। अपनी बहन से कहो कि रोज सबेरे आँख खुलते ही मुहल्ले के म्यूनिसिपालिटी के एकलौते नलके से एक घड़ा पानी भर कर लाए। आओ हमारे साथ। हमारी ज़िंदगी चखो। फिर बात करो। करेंगे मुक़ाबला मेरिट से भी तुम्हारा। और जब तक नहीं करते अपनी बेहूदी बकवास अपने पास रखो।”[13] फिल्म यह समझाने में असफल रही कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं। दीपक का यह वक्तव्य दलित समाज के लिए आरक्षण की आवश्यकता को सही तरीके से व्यक्त करता है।
‘मोहनदास’ हिन्दी के बहुचर्चित कथाकार उदय प्रकाश की कहानी ‘मोहनदास’ पर बनी फिल्म है। मोहनदास एक ऐसे दलित युवा की कहानी है जो मध्य प्रदेश के अनूपपुर का निवासी है। मुसहर जाति का मोहनदास पढ़ने में तेज है। वह पढ़-लिख कर एक बेहतर नौकरी पाना चाहता है और सम्मानित जीवन बिताना चाहता है। मोहनदास जाति में पहला ग्रेजुएट लड़का है। इतना ही नहीं वह प्रथम श्रेणी में पास है। कॉलेज की परीक्षा में हमेशा टॉप करने वाला मोहनदास यह नहीं समझ पाता कि जीवन की परीक्षा जटिल है। उसे एक प्रतियोगी परीक्षा में सफलता भी मिल जाती है। वह एक कोयले की खदान पर सरकारी नौकरी के लिए चुना जाता है लेकिन बुलाया नहीं जाता। बहुत बाद में पता चलता है कि उसकी डिग्री पर कोई और नौकरी कर रहा है। जब मोहनदास को छान-बीन में यह पता चलता है तो वह विरोध करता है। विरोध के बदले उसे मारा पीटा जाता है। दलित होने के कारण उसकी बात कोई नहीं सुनता। इसी बीच यह खबर दिल्ली के न्यूज चैनल की एक नई रिपोर्टर मेघना सेनगुप्ता को मोहनदास के द्वारा पता चलती है। मोहनदास अपनी पहचान छुपाकर मदद करने का निवेदन करता है। एक तरह से देखें तो यह फिल्म दलित शोषण का सबसे नया चेहरा दिखाती है। दलित जातियों को पढ़ाई-लिखाई से वंचित रखने वाला यह समाज कभी उम्मीद नहीं कर सकता था कि कोई दलित इतना पढ़-लिख कर उनके बराबर खड़ा हो जाएगा और प्रतिरोध करेगा, “दलितों ने आरक्षण भले ही अपने हजारों साल के शोषण और उत्पीडन की क्षतिपूर्ति या क़िस्त दर क़िस्त हक़ अदायगी का माना हो, किन्तु सामान्य वर्ग इस तथ्य को कभी स्वीकार नहीं पाया। उसे यह अपना अधिकार हनन लगता है, जो दलित-आदिवासियों को भीख के रूप में दिया जा रहा है। अपने जातीय दंभ में जीता यह समाज आज भी दलितों की पढाई-लिखाई को पूरी तरह स्वीकार नहीं पाया, फिर भला उसके आधार पर मिली नौकरियां उसे कैसे हजम होती?”[14]
मोहनदास के साथ दो समस्या है। पहली बात तो कि वह ईमानदार है। दूसरी बात कि दलित है। अगर वह दलित नहीं होता तो उसे उसकी ईमानदारी के कितने सम्मान मिल चुके होते। ईमानदार होने का परिणाम यह है कि वह दर-दर की ठोकरें खाता है। मोहनदास के पास एल बच्चा भी है जिसके भविष्य की चिंता भी उसे है। ‘मोहनदास’ भारतीय शिक्षा व्यवस्था की खोखली नींव को सामने लाने का प्रयास करता है।
‘बंवडर’ राजस्थान के कुंभार परिवार से आने वाली स्त्री भंवरी देवी की कहानी है। जिसका सामूहिक बलात्कार किया जाता है। दलित स्त्री के साथ होने वाले अत्याचार और शारीरिक-मानसिक शोषण की कथा कहती इस फिल्म की खूबसूरती यही है कि एक स्त्री को अपने साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ मजबूती से लड़ते हुए दिखाया गया है। भंवरी देवी को झुकाने के लिए कोर्ट में सेक्स से जुड़े व्यक्तिगत सवाल किए जाते हैं तब भी वह उनका जवाब हिम्मत से देती है। कोर्ट में वकील उससे पूछता है, “जब तुम्हारा बलात्कार हुआ तो पानी झड़ा था खून निकला था’[15] तो वह घूरते हुए कहती है, “जब मर्जी से करो तो पानी आवे है नहीं तो खून आवे है। ”[16] यह हिन्दी सिनेमा का पहला ऐसा दृश्य है जिसमें एक महिला अपने साथ हुए अत्याचार का हर तरह से मुक़ाबला करती है। भंवरी देवी एक आंदोलन का नाम है। उसमें प्रतिरोध की आग है जो अपने विरोधियों को अंततः जला कर खाक कर देती है।
केतन मेहता हिन्दी सिनेमा के महत्वपूर्ण निर्देशकों में से एक हैं। उनकी फिल्में किसी खास विजन के लिए बनायी जाती हैं और सफल भी होती हैं। ‘माँझी : द माउंटेन मैन’ बिहार के मुसहर जाति की प्रेम कहानी का जीवंत दस्तावेज़ है। प्रतिरोध की कई विधा होती है। प्रेम भी प्रतिरोध का कारण बन जाता है। दशरथ माँझी के जीवन पर आधारित ‘मांझी’ दलित व्यक्ति जिजीविषा की कहानी तो है ही सम्पूर्ण दलित समाज के लिए एक सीख भी है। भारत का वह हिस्सा जहाँ आज भी न सड़के हैं, न हॉस्पिटल। वहाँ लोग जीवन बचाने के लिए मृत्युतुल्य संघर्ष करते हैं। दशरथ मांझी उसी समाज का एक हिस्सा है। बीमार पत्नी को सड़क के अभाव में सही समय पर हॉस्पिटल नहीं पहुँचा पाता जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है। फिल्म में दिखाया गया है कि वह अपनी पत्नी से अटूट प्रेम करते हैं। युवावस्था में ही पत्नी का साथ छुट जाता है। दशरथ मांझी झुकते नहीं प्रतिरोध का रास्ता अपनाते हैं। पहाड़ का सीना तोड़कर सड़क बना देते हैं। अंगुली उठाने वाले लोग उनके लिए तालियाँ बजाते हैं। यह फिल्म एक दलित व्यक्ति का अपने जीवन के संघर्ष से लड़ते हुए उस पर विजय पाने की अद्भुत कहानी है। ऐसी फिल्में बताती हैं कि दलित समाज में प्रतिरोध की चिंगारी दबी हुई बस उसे सामने लाने का मौका मिलना चाहिए। वह अपनी जिजीविषा से जिस रास्ते को ईजाद करता है वह सिर्फ उसके लिए नहीं है बल्कि पूरे समाज के लिए है। दशरथ मांझी को शासन-प्रशासन और उस समाज के उच्च वर्गीय जातियों द्वारा डराया धमकाया जाता है। उसे खनन में झूठा फंसाया जाता है फिर भी अडिग है क्योंकि उसका कहना है, “भगवाने के भरोसे मत बैठो, क्या पता वह तुम्हारे भरोसे बैठा हो।”[17] मांझी फिल्म दलित समाज के साथ होने वाले दुराभाव और अत्याचार की कहानी तो कहती ही है साथ ही यह भी दिखाती है कि दलित जीवन में प्रेम और अपनेपन को महसूस करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। इस सबके बाद भी मांझी दलित प्रतिरोध की एक सशक्त अभिव्यक्ति है।
सन्दर्भ :
[1] नागराज मंजुले, साक्षात्कार, बीबीसी, मुंबई, 22 जून 2016
[2] षुर्लेई,तत्याना, समाज के हाशिए का सिनेमाई हाशिया, हंस, फरवरी 2013, पृष्ठ-36
[3] ई-पत्रिका अपनी माटी, अपनी माटी विशेष:भारतीय सिनेमा में दलित आदिवासी विमर्श, वर्ष-2, अंक-20, अक्टूबर,2015
[4] फिल्म मदर इंडिया
[6] फिल्म चक्रव्यूह
[7] फिल्म आरक्षण
[8] फिल्म आरक्षण
[9] फिल्म आरक्षण
[10] फिल्म आरक्षण
[11] फिल्म आरक्षण
[12] फिल्म आरक्षण
[13] आरक्षण
[15] फिल्म बवंडर
[16] बवंडर
[17] फिल्म मांझी
महेन्द्र प्रजापति
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग (SOL), डॉ. बी.आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली
9871907081
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा


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