डायरी : दिसम्बर 2024 से जुलाई 2025 / सत्यनारायण व्यास

डायरी : दिसम्बर 2024 से जुलाई 2025
- सत्यनारायण व्यास


सत् चित् (09 दिसंबर, 2024, जयपुर)

मैं देश, काल और दिशाओं के आर-पार देख रहा हूँ। ‘मैं’ वह मैं नहीं जो हर एक के भीतर है, उससे भिन्न और सर्व-व्याप्त मैं। ‘देखना’ भी वह देखना नहीं जो आँखों से होता है, बल्कि यह देखना अन्तश्चेतना के अबाधित नेत्रों से। ऐंद्रिक और मनस् से परे और पार भी देखना होता है, जिसे ईक्षण कहा गया है। उसे देखने की प्रकृति और भाषा अलग और दिव्य है। ध्यान और बुद्धि की दर्शनक्षमता में अनुभूति(Para Feeling) की शक्ति होती है।, जिससे इस भौतिक प्रपंच के आर-पार अन्वेक्षण किया जा सकता है।

जिन परमाणुओं से जगत् और देह निर्मित है, उन्हीं परमाणुओं की सूक्ष्मातिसूक्ष्म परिणति में चेतना का निवास है। जैसे इलेक्ट्रान की परागति में वैद्युत आवेश की। यह चिंतन और विचारों का शक्तिशाली क्षेत्र है जो भूतनि:सृत होकर भी भौतिकेतर और चिन्मय हो जाता है। इसी चिन्मय में हम समाधिस्थ होकर अनुभूति-नेत्रों से वह सब देख सकते हैं, जिन्हें आँख और इन्द्रियाँ नहीं पा सकतीं। भौतिकता से चेतना के बीच तार जुड़े हैं, जिनमें ‘करंट’ प्रवाहित होता है। लोग भौतिकता में गले तक धँसे हुए ‘कुचालक’ बने रहते हैं और उस ‘करंट’ से वंचित रहते हैं। बात यह है कि गहरे उतरना होता है। हम सतह और तलछट में ही आसक्त होकर समाप्त हैं। इस जहाँ से आगे जहाँ और भी हैं पर उन्हें देखने की जिज्ञासा और उत्कंठा भी तो हो। टॉर्च की बॉडी में बैटरी है और उससे निकलता प्रकाश है। टॉर्च और बैटरी अप्रकाशित है पर प्रकाश की जननी है। सृष्टि का भी यही रहस्य है। भूत-प्रसूत चेतना। इससे उलटा भी हो सकता है। चेतना से भौतिक जगत् की उत्पत्ति। लेकिन इन दोनों में है प्रधान चेतना ही। भौतिक निर्मिति नश्वर है, चेतना अनश्वर है। यही चेतना और आत्मा पर्यायवाची शब्द हैं। प्राणियों में भिन्न दृष्ट होकर भी अखंड और अभिन्न होती हुई यही चेतना ‘प्रत्यगात्म’ हो जाती है।

बिजली के तार में हज़ारों-लाखों बल्ब जुड़े हैं- जलते-चमकते। संभव है उनमें से एकाध बल्ब फ्यूज हो जाएँ। जैसे देहधारी प्राणी की मृत्यु होती है। तो क्या? फ्यूज होना, मृत्यु होना नश्वर भौतिकता ठहरी। चैतन्य आत्मा यानी तार में वह करंट यथावत् प्रवाहित है। नए बल्ब लगा दो, नए प्राणी जन्म लें तो उसी करंट से प्रज्वलित और प्रचलित हो जाएँगे।

इसी क्रम में शंकर ने कहा है- “दीपस्य नान्य दीपेच्छा। स्वबोधे नान्य बोधेच्छा।

दीपक को देखने(प्रमाणित करने) हेतु दूसरे किसी दीपक(प्रमाण) की आवश्यकता नहीं। आत्मज्ञान के बाद किसी और ज्ञान की अपेक्षा और आवश्यकता नहीं रह जाती। मूल और वास्तविक सत्ता आत्मा(चेतना) की है। भौतिकता, व्यावहारिक और नाशवान स्वभाव की स्थिति है- उसे ‘सत्ता’ भी नहीं कहना चाहिए क्योंकि सत्ता स्वभाव से नित्य और अनश्वर होती है। सत् जो कभी नष्ट न हो, अनादि-अनंत विद्यमान रहें। यही शर्त चित् के साथ भी है। सत् और चित् भी एक सिक्के के दो पहलू हैं- गुणधर्म भले ही दो हों पर यह है एक ही। एक और अद्वितीय। भिन्नता प्रपंच है। सारे नाम, विशेषण, उपाधियाँ मानवीय सुविधा के लिए। वह जो भी है जैसा भी है, सभी प्रपंचों का जनक होकर भी अपने में सर्वथा “निष्प्रपंच” है।

ये दुनिया (11 दिसंबर, 2024, जयपुर)

रोज़ की तरह कार से बाज़ार निकला, ख़रीददारी करने। कभी ख़रीद, कभी पुस्तकालय, कभी बिना वज़ह पर जाता ज़रूर हूँ। कार से। क्योंकि ये जयपुर शहर है। ट्राफिक, सड़कें, दूरियाँ और बेगानापन। ख़ूब तलाशने पर और किस्मत से कहीं अपनापन मिलता है। वह भी शहरवाला। गाँव-कस्बे का नहीं। कार चलाते-चलाते आदमी, औरतों, बच्चों को देखते चलता हूँ। पराशक्ति का जाग्रत साम्राज्य। सुखी, दु:खी, क्षुब्ध, संतप्त और हँसते-खिलखिलाते चेहरे। शहर के जीवन-संघर्ष की आग में झुलसती औरतों के तपे हुए, सूखे, सड़क पार करने को आतुर चेहरे। मैं कार धीमी करके उन्हें गुज़रने देता हूँ। अपराधबोध के साथ। पचास साल पहले मैं भी ऐसे ही इसी हालत में सड़क पर था। न तो कार थी, न कार का कोई सपना। यही जयपुर था, यही मैं था। यही मैं हूँ। पर ये बदलाव, ये सफलता! क्या ये सफलता है मेरी?

बायीं ओर पेट्रोल-पंप के पास चालीस साला एक औरत सड़क पार करने को खड़ी है। आगे झुकी हुई, ट्राफिक का पिछला सिरा भाँपती हुई। दो सेकंड में उसका क्षुब्ध चेहरा बहुत कुछ कह गया। कार में मैं आगे बढ़ गया। पर वह चेहरा मेरे जेहन में चिपक गया। कामवाली बाई होगी या कमठाणे की मज़दूर होगी। जो भी होगी पर उसका वह चिंता से तना हुआ, अपनी हालत पर ग़ुस्सा किया हुआ, सड़क पार करने का ख़तरा लिया हुआ चेहरा दु:खांत महाकाव्य का शीर्षक था। शीर्षक क्या, इस आसुरी पूँजीवादी समाज पर कड़कती बिजली-सा प्रश्नचिह्न था। मैं बीस लाख की लग्जरी कार में और वह कच्ची बस्ती के किसी टूटे-फूटे घर की मालकिन सड़क पर। धिक्कार है मुझे। धिक्कार इस लाइलाज़ राक्षसी-व्यवस्था को। धिक्कार है ऐसी सरकार को। धिक्कार है मेरे संविधान और कोढ़ी लोकतंत्र को। ये सब धिक्कार मैंने उस औरत के चेहरे पर पढ़े और हृदय में लिख लिए।

ये कौनसी दुनिया है? क्या इसे दुनिया कहें? इतने महापुरुष आए और गए। बुद्ध, मार्क्स, विवेकानंद, आंबेडकर और पूरी बड़ी लिस्ट उनकी। सब खल्लास। एक जलजला आया, कुछ अच्छा हुआ और फिर वही ढाक के तीन पात। कुत्ते की पूँछ टेढ़ी की टेढ़ी। क्या ये दुनिया दुनिया है? क्या इसे सरकार कहें? नरक को स्वर्ग बताया जा रहा है। विनाश को विकास घोषित किया जा रहा है। झूठ को हँसी आ रही है। बेशर्मी की हद है। जनता की जिजीविषा की पराकाष्ठा है। अब कब लगेगी आग? कब होगा गुस्साई जनता का विस्फोट? कब? इन आँखों से देखने की हार्दिक इच्छा है।

संसार की भाषा (18 दिसंबर, 2024, जयपुर) 

संसार क्या कहता है? धीरे से कहता है कान में। अपनी भाषा में। संसार की भाषा शाब्दिक नहीं, वास्तविक है। यानी वस्तुपरक। वस्तुएँ लुभाती हैं। बुलाती हैं। वस्तुओं की अपनी भाषा है- बड़ी आकर्षक। बड़ी महँगी कार। शानदार प्रशस्त बँगला। सेक्स। मिठाइयाँ। समोसे-कचौरी। नकद राशि। सूट-बूट। सोने के गहने। सूची अंतहीन है। ये संसार की भाषा के शब्द-पद और वाक्य हैं। इनमें इतनी ताक़त है कि बड़े-बड़े ज्ञानियों को खींचकर शरणागत कर डालते हैं। यह किसी महान् तपस्वी गुरु से बढ़कर संसार का शक्तिपीठ है। जिसकी लपेट में आकर अच्छा ख़ासा महापुरुष, मेधावी विद्वान चक्करघिन्नी हो जाता है; जैसे- ओशो रजनीश, जेद्दु कृष्णमूर्ति व अन्य।

संसार का दूसरा अस्त्र है- सौंदर्य। यह उन उपर्युक्त वस्तु-सामग्री से ज़्यादा बलशाली है। बरसों की तपस्या भंग कर देता है। सारे त्याग और वैराग्य को धूल में मिला देता है। पराशर, विश्वामित्र, पुरु, ययाति जैसे पौराणिक संदर्भ हैं जो अपनी प्रकृति में सच हैं। पर ग़लत क्या है? अपराधी सौंदर्य है या मुग्ध होनेवाला? यदि सौंदर्य में आकर्षण न होता तो कौन मूर्ख है जो यों मुग्ध हो जाता? सौंदर्य होता किसलिए है? मसला नाजुक है। यहाँ एक भिन्न बात। बगीचे में चारों ओर फूल खिले हैं- रंगीन और सुगंध वाले। वहाँ फूल तोड़ लो, सूंघो और माला बनाओ। अथवा उसके रंग और सुगंध का बिना छुए आनंद लो। ग़लती यहाँ पकड़ में आती है। तोड़ना, सूँघना क्या ज़रूरी था? यह उपभोग वृत्ति ग़लत है। दर्शन और सुरभि का बिना तोड़े आनंद अपराध नहीं है। उपभोग अपराध है। वे तोड़े जाने को नही खिले हैं। अपना रंग, शोभा, सुगंध देकर मुरझाना उनकी नियति है। जिसे भंग करनेवाला दोषी है। केवल वायु, जल, अन्न, वस्त्र और आवास अनिवार्य है। ये भोग-सामग्री नहीं। जीवन, कर्म और तप के आधारभूत साधन हैं। ये ज़रूर होने चाहिए। पर सुखाधिक्य का लालच प्रकृति का दोहन है। ऋतु-चक्र का उल्लंघन है। दो उल्लेख यहाँ भागवत से-

यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ।।

जितने से पेट भर जाए, उतना ही इनसान का हक़ है। जो इससे ज़्यादा चाहता है चोर है वह और दंड का भागी है।

दूसरा कबीर वचन-

उदर समाता अन्न ले, तनहिं समाता चीर। अधिकहिं संग्रह ना करे, ताको दास कबीर।।

सोचने की बात है कबीर बड़ा या अडानी-अंबानी? चर्चा दोनों की है पर कबीर विख्यात है और अडानी-अंबानी कुख्यात। गाँधी विख्यात हुए और गोडसे कुख्यात। वे साधु-सन्त और ये मुज़रिम। संसार की भाषा को समझें। वह ऊपर से लुभावनी, भीतर से विनाशक है। दृष्टि ज़रा पारगामी होनी चाहिए। जो वस्तुओं, भोगायतन और सौंदर्य के आर-पार देख जाए। सामने आकर्षण भरा है, पीछे ऋत और विवेक खड़ा है। गिरना या सावधान होकर चलना तो अपने हाथ में है। जैसी जिसकी मर्ज़ी। फिर वैसा ही परिणाम।

वाक् अवाक् (22 दिसंबर, 2024, जयपुर) 

पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेना क्या बहुत बड़ी उपलब्धि है? ‘उपलब्धि’ शब्द भी तो मनुष्य का गढ़ा हुआ मनुष्य जीवन में समाहित और सीमित है। आदमी ने अपनी तारीफ़ में पोथे-पुराण लिखकर भर दिए। आप मियाँ-मिट्ठू बना। ख़ूब। क्या यही परम सत्य है? इस अनादि-अपार सृष्टि-चक्र के आर-पार देख रहा हूँ। पता नहीं कहाँ से, किस रूप में द्यौस और अंतरिक्ष में घूमते हुए इस छोटे-से स्टेशन- पृथ्वी पर आ उतरे। आँखें खोलीं और इतरा गए। तब यह शरीर नहीं था। पर हमारा अस्तित्व अनाकार में आकार था। वह अदृश्य था पर था। होना था, हम थे, चाहे किसी भी प्रकार के रहे हों।

सो, मनुष्य होना ही होना नहीं है। मनुष्येतर अस्तित्व ज़्यादा विराट, ज़्यादा मुक्त, ज़्यादा अहमियत रखता है। अब रोना ये है कि शरीर नहीं, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, नहीं। इन सबका होना सबसे बड़ी क़ैद हुई। क्योंकि ये नश्वर अंग हैं। भूल-ग़लती यहाँ हुई कि हमने इस मानुष-जीवन को ही सब कुछ मान लिया। दैहिक जीवन से परे बहुत कुछ ही नहीं, सब कुछ है। उसे हम जानने और मानने को तैयार नहीं। यह देहधारण का अभिशाप ठहरा। हाँ, वह जो जीवन-देह से परे है, अव्याख्येय और अपरिभाषेय है। वहाँ मानवी भाषा और बुद्धि काम नहीं देती। लेकिन एक चीज़ इस देह में रहते हुए हमें उस अनंत में ले जाती है और वह है- अनुभूति। अनुभूति हमें देह से विदेहावस्था में ले जाती है, उस पर भरोसा करना चाहिए।

प्रज्ञा जहाँ दम तोड़ दे, अनुभूति वहाँ से शुरू होती है। कबीर ने इसे पकड़ा-

पारब्रह्म के तेज़ का, कैसा है उनमान। कहिबे कूँ शोभा नहीं, देख्यां ही परमान।।

‘पारब्रह्म’ यानी देहेतर सत्ता। ‘कहिबे कूँ’ यानी मानवीय भाषा और बुद्धि। ‘देख्यां’ का मतलब है- अनुभवगम्य चेतना। भाषा केवल जीवन-व्यवहार के लिए है। इससे आगे यह फ़ैल है। तैत्तिरीय उपनिषद् का कथन है-

यतो वाचो निवर्तन्ते, अप्राप्य मनसा सह।
आनंद ब्राह्मणों विद्वान, न बिभेति कदाचन।।

भाव है मन के साथ वाणी जहाँ से लौट आती है, उस परम सत्ता को अनुभव कर व्यक्ति निर्भय और मुक्त हो जाता है। वाणी लाचार है। वह वाक् होते हुए भी अवाक् हो जाती है। कबीर ने इसे पहचाना-

बोलणा का कहिए रे भाई। बोलत-बोलत तत्त नसाई।।

यानी, उसके बारे में क्या बोलना और बोलने से भला होगा भी क्या? बोलते-बोलते, बताते-बताते तत्त्व की बात छूट जाती है, कहने में नहीं आती।

धर्म-अध्यात्म में फँसा जीवन (30 दिसंबर, 2024, चित्तौड़गढ़)

इन मार्क्सवादियों को जाने क्यों अध्यात्म से चिढ़ है? धर्म से चिढ़ हो तो माना कि वे ठीक हैं। पर अध्यात्म से? यह पहले साफ़ हो जाए कि धर्म और अध्यात्म दो भिन्न विषय हैं, भिन्न क्षेत्र हैं। इन्हें भारतीय ब्राह्मण वर्ग ने मिलाकर एक कर दिया। ऋग्वेद और उपनिषद् में कहीं भी धर्म का निरूपण नहीं है। ऋग्वेद में ज़्यादा जीवन के भौतिक पक्ष पर आग्रह है- घी, दूध, गायें, घोड़े, बलवान पुत्र, शत्रु पर विजय, अग्नि, वर्षा आदि से जीवन को स्वस्थ, सबल और सफल बनाने का बारंबार आग्रह है। हाँ, कहीं-कहीं अध्यात्म के गूढ़ सूत्र भी हैं-जो एक स्वस्थ समाज की स्वाभाविक उपज हैं। जहाँ तक उपनिषद् का सवाल है, वहाँ धर्म और उसका कर्मकांड सिरे से ग़ायब है। शुद्ध और अर्थगौरव के साथ अध्यात्म-चिंतन है। सृष्टि, सृष्टिकर्ता और जीवात्मा इन तीन स्तंभों पर सारा चिंतन टिका हुआ है। यज्ञ का विरोध है- ‘प्लवा ह्येते अदृढ़ा यज्ञरूपा।’

बीमारी के फ़ायदे (01 जनवरी, 2025, चित्तौड़गढ़)

बारहों महीनों हमेशा स्वस्थ बने रहना भी एक बेशर्मी है। ये क्या बात हुई? इनसान हो और बीमार न पड़े? बीमारी और मौत अटल सत्य हैं। ये दोनों न होतीं तो आदमी आकाश पर जाकर लात मारता। उपग्रह आदि से वह आसमान में लात मार ही रहा है। शरीर और रोग का चोली-दामन का साथ है। रमण महर्षि और रामकृष्ण देव जो परमहंस थे- कैंसर के रोगी हुए। बात समझ में नहीं आई। आचार्य शंकर को भगंदर हुआ, ब्रह्मज्ञानी थे। इसका मतलब शरीर का धर्म आपकी महानता को नहीं मानता। आपकी तपस्या, आपके ज्ञान, चरित्र और प्रतिभा की परवाह नहीं करता। यानी बीमारी इन सबको लील जानेवाली महाशक्ति है। इसीलिए पराधीन अनपढ़ भारत में बुखार, चेचक, क्षयरोग जैसी बिमारियों को लाचार होकर देवी-स्वरूपा मान लिया गया। शीतला माता, ज्वर देवता पूजनीय हो गए। ये सब आदमी को उसकी औकात बतानेवाले प्रकृति के हथियार हैं कि सीमा में रहो। ज़्यादा कूदो मत। काया गार से काची। ऐसे जरा-जीर्ण रुग्ण शरीर में आत्मा का प्रकाश छिपा रहता है। ताकि मनुष्य को शरीर की क्षणभंगुरता का प्रत्यक्ष ज्ञान बना रहे और वह इससे परे पराशक्ति की ओर उन्मुख हो लेकिन जयपुर में एक संगोष्ठी में दयानंद भार्गव ने ज़ोरदार बात कही कि जब दाढ़ में भी तेज़ दर्द हो जाए तो आपका सारा ब्रह्मज्ञान, विद्वत्ता और दर्शन धरा रह जाता है। बीमारियाँ और पीड़ा सारे अध्यात्म को परास्त कर देती हैं। यह ब्रह्मज्ञान को ध्वस्त कर देनेवाली महाशक्ति क्या मामूली चीज़ है? सोचिए।

इस दुनिया में आकर बीमार होना निहायत ही ज़रूरी है। नवजात शिशु से लेकर शतायु वृद्ध तक रोग और पीड़ा हमें बेहाल किए रहती है। बीमारी ज़िंदगी की अनिवार्य शर्त है। न तो इससे डरने की ज़रूरत है और न इसे हल्के में लेने की। यह स्रष्टा का, आदमी को उसकी असलियत बताने का अचूक अस्त्र है। इसे स्वाभाविक मानकर सम्मान करना चाहिए। अब, बीमारी के पीछे कर्मफल को जोड़ना और मानना सरासर बेवकूफ़ी है। पीड़ा से ध्यान हटाने का झूठा दिलासा है। पिछले जन्म में क्या किया, इसलिए ऐसा हुआ और अगले जन्म में सुखी रहने के लिए सत्कर्म करो- ये सब इनसान के दिमाग़ी फितूर हैं। मिथ्या धारणा है। कईबार एक-दूजे से क्रोध और वैर के वशीभूत होकर लोग शाप भी देते हैं। जा तुझ पर बिजली गिरे, तुझे साँप डस ले, तेरे कीड़े पड़ें, तुझे लकवा हो जाए इत्यादि।

यह सही है कि बीमारी से त्रस्त आदमी आत्मचिंतन, आत्मालोचन की तरफ़ उन्मुख होता है। बिस्तर पर पड़े को फुरसत भी होती है- सो दिमाग़ का बीमारी के कारणों और अपने विगत कर्मों की ओर ध्यान जाता है। उसकी बुद्धि सही रास्ते पर आने लगती है। सोचता है कि मैं वैसा न करता तो ऐसी हालत न होती। ये सब मानसिक समझाइश है अपने को रिलैक्स करने के लिए।

अहंकार सेहतमंद को पकड़ता है। बीमार का अहंकार भाग जाता है। यह बीमारी का फ़ायदा है। अपने भीतर झाँकते, विगत का मूल्यांकन करने का सुयोग, बीमारी से आता है। मोह-माया, लोभ, राग-द्वेष कमतर होने लगते हैं- जो स्वस्थ रहते मुश्किल से हो पाते हैं। परिवार-रिश्तेदारों के स्नेह और अपनत्व की परीक्षा हो जाती है। सेवा-उपचार करनेवालों की भावना से पर्दा उठ जाता है। दीर्घ रोगी, जो न मरता है न स्वस्थ होता है- से परिजन संतप्त हो जाते हैं। रोगी खुद करे न करे, परिजन प्रार्थना करने लगते हैं- हे भगवान, तू क्या देख रहा है? अब इनको उठा ले, अपने पास बुला ले। ताकि ये प्राणी और हम सब सुखी हो जाएँ। इनकी सुधर जाए और हम भी सेवामुक्त हो जाएँ।

इस तरह, रोग आत्मचिंतन की ओर ले जाते हैं। सारी औपचारिकताएँ भाग जाती हैं। असली और निर्मम संसार का स्वरूप उद्घाटित हो जाता है। सो, बीमार पड़ना कोई घाटे का सौदा नहीं है।

रिश्ते और रिश्तों से परे (04 जनवरी, 2025, उदयपुर)

रिश्तों की दुनिया काफ़ी जटिल और दुर्बोध है। प्रेम और पैसा इस तरह घुला-मिला रहता है कि समझना कठिन। खून का रिश्ता, फिर दूर के संबंधियों का रिश्ता। चतुर लोग इन रिश्तों को सफलतापूर्वक निभा लेते हैं। भोला और भावुक व्यक्ति निभाते-निभाते भी फेल हो जाता है। पैसा और समय के त्याग से रिश्तों को सींचकर हरा-भरा रखा जाता है। इन दोनों पर ‘मिलना’ टिका रहता है। मिलने में मिठास और असलियत हमारे त्याग पर निर्भर है। कोरे जज़्बात से रिश्ते दीर्घायु नहीं हो सकते। प्रश्न यह उठता है कि ये दुनिया ‘अर्थ’ पट टिकी है या भावना पर? अर्थ भौतिक जीवन का आधार है और भावना प्रेम पर ठहरी है। अर्थ, स्वार्थ और त्याग की तरफ़ ले जाता है। और भाव आत्मीयता और निस्स्वार्थ की तरफ़।

दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि सारे रिश्ते पैसे पर टिके हैं। माँ और बेटे-बेटी का रिश्ता भाव-मूलक है, अर्थ-मूलक नहीं। हाँ, घोर कंगाली हो तो रोटी, वस्त्र आदि के लिए भाव गौण हो जाएगा और ख़ुद का अस्तित्व बचाना प्राथमिक होगा। यह एक अपवाद है। भीख में मिला भोजन, माँ अकेले नहीं खाएगी, बच्चों को भी देगी। मगर, बच्चे को भीख में कुछ अच्छा मिला है तो वह उसे बाँटना नहीं चाहेगा, दूर हटकर अकेले खा जाना चाहेगा। माँ की प्रकृति अलग, बच्चे की प्रकृति अलग। यह प्राकृतिक विधान है। जननी संरक्षण से जुड़ी है और संतान अपने अस्तित्व से। माँ अपने अस्तित्व को बच्चों के लिए दाँव पर लगा देगी। अतः माँ की सत्ता सर्वोपरि, असंदिग्ध और त्यागमूलक पावनता से ओतप्रोत। अब रहे भाई-बहन, भाई-भाई, पति-पत्नी, बेटे-बहू, पोते-पोती, दोहिते-दोहिती फिर मौसी, बुआ, साले-साली का अनंत विस्तार- नज़दीक में ऊष्मायुक्त और दूरी में बढ़ते आँच घटती जाती है जो हेल्लो, हाय तक जाकर बुझ जाती है।

इस सारे झमेले में माँ के बाद सर्वोत्तम त्याग और वात्सल्य की सत्ता पिता की है, जिस पर कोई शंका नहीं कर सकता। माता-पिता, दो नहीं होते, उनकी संयुक्त स्थिति होती है- दोनों मिलकर संतान को पोषते हैं। माता-पिता और बच्चों का एकीकरण रिश्तों की श्रेणी में नहीं, उससे ऊपर होता है। रिश्ते इसके बाद शुरू होते हैं। सृष्टि का उद्भव माता-पिता और संतान में केन्द्रित है। उसके बाद रिश्ते प्रारंभ होते हैं। खून के रिश्ते, पारिवारिक रिश्ते से सर्वथा भिन्न और अलग स्नेह, अपनत्व और आत्मीयता से उपजा एक महान् संयोग होता है जो तमाम रिश्तों से ऊपर चढ़कर बोलता है- जैसे, कण्व ऋषि के यहाँ पालित बेटी शकुंतला का। जैसे व्यास दंपती से जुड़ी शशिकला का। यहाँ वाणी और भाषा मूक हो जाती है। सारे रिश्तों को निगल जाती है। सिर्फ़ स्नेह का सैलाब नज़र आता है बस।

शरीर और चेतना (27 जनवरी, 2025, चित्तौड़गढ़)

दस दिन से खाँसी है। ज़बरदस्त। हिला देनेवाली। शरीर की औकात को बता देती है कि बस देह की सीमा यहाँ तक। इस खाँसी की विपदा को कौन है जो महसूस कर रहा है? प्रतीत होता है कि भीतर जो चेतना है, वो प्रति रोम, प्रति कोशिका जुड़ी हुई है। आत्म और अनात्म का इतना सघन मिलाप जीवन है। महर्षि रमण कह गए हैं कि शरीर एक पत्तल है, उस पर परोसी गई भोग-सामग्री जीवन है। जीवन को भोग लिया तो पत्तल कूड़ेदान में फेंक दी जाती है। भोक्ता उसे क्या साथ ले जाता है? चेतना से जुड़कर शरीर अमूल्य और अद्भुत हो जाता है। जो भी कमाल कर दिखाएगा, वह चेतना के बल पर। शरीर की अपनी कोई शक्ति नहीं, प्रेरणा नहीं। सो, हमारा ध्यान शरीर के बजाय चेतना पर जाना चाहिए। शरीर को संभालकर रखें पर आस्था इसकी संचालक चेतना पर जमी रहे। शरीर है तो सारी लीलाएँ हैं। सो शरीर कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। चेतना से ऊर्जस्वित शरीर पाने के लिए परमसत्ता भी तरसती होगी। इसीलिए इस मनुष्य जीवन की अपार महिमा शास्त्रों में गाई गई है। शरीर एक पहचान है बस।

क्या अशरीरी होकर चेतना से जुड़े रह सकते हैं? बड़ा अव्यक्त प्रश्न है। सो बुद्ध भी मौन रहे। मेरा मानना है कि गुब्बारा फूटा तो गुब्बारे की हवा, बाहर की हवा में मिल गई- अब यह गुब्बारी हवा है तो सही पर उसे ‘डिटेक्ट’ नहीं किया जा सकता। वही गीता की बात- जो व्यक्त-मध्य था, वह अव्यक्त हो गया। अपने मूल स्वरुप में लौट गया। न अच्छा हुआ न बुरा हुआ। वही हुआ, जो होता आया है। यह नियम है, ऋत है। इस नियम का सम्मान करें। मीरा की प्यारी उक्ति है-“चालां वांही देस।”

दूर से पृथ्वी (14 फरवरी, 2025, जयपुर)

मैं पृथ्वी से कई लाख किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में भ्रमणशील महाकाय ग्रह बृहस्पति पर पाँव लटकाकर बैठा हूँ और अपनी वस्तुगत कल्पदृष्टि से पृथ्वी को देख रहा हूँ। बरसों पहले नील आर्मस्ट्रांग और यूरी गागरिन ने भी चन्द्रमा पर जाकर पृथ्वी को एक नीले गोले के रूप में देखा था। लेकिन चन्द्रमा तो पृथ्वी का बच्चा है और अपनी माँ के सबसे नज़दीक है। मैं तो बृहस्पति की बात कर रहा हूँ। पृथ्वी पर रहकर पृथ्वी को नहीं देखा जा सकता। नज़दीकी और दूरी का अंतर देखने के मायने बदल देता है।

क्या देखता हूँ? कोई एक दृश्य हो तो कहूँ। यह न तो सिंहावलोकन है और न विहगावलोकन, यह तो गगनावलोकन है, सर्वाधिक दूरी वाला। बृहस्पति मुझे लिए घूम रहा है- निस्पृह और खामोश। आँखों में दिव्यता आ गई है। देख रहा हूँ कि पृथ्वी लट्टू की भाँति तेज़ी से घूम रही है, उस पर समुद्र लहरा रहे हैं, पहाड़ मौन खड़े हैं, नदियाँ बह रही हैं, जंगल झूम रहे हैं, रेगिस्तानों में धूलभरी आँधियाँ उठ रही हैं, जीव-जंतु और जानवर भोजन की तलाश में भटक रहे हैं।

ख़ुद को सबसे बुद्धिमान समझने वाली मनुष्य जाति की हलचल का क्या कहना। अस्पतालों के लेबर रूम में माएँ बच्चों को जन्म दे रही हैं, जो जनम गए, उन्हें स्तनपान करवा रही हैं। छोटे बच्चे खेल रहे हैं। बड़े स्कूल जा रहे हैं। उनसे बड़े काम पर, खेतों पर, नौकरियों पर जा रहे हैं। रेलें, बसें, कारें, दुपहिये सरपट भाग रहे हैं। मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों में आरती, नमाज और सजदे हो रहे हैं। पंडालों में कथा- भगवत, प्रवचन चल रहे हैं। औरतें ख़ुद को राधा मानकर कृष्ण प्रेम में मगन हो नाच रही हैं। बाज़ार सजे हैं, आमद-रफ्त ज़ारी है। अस्पतालों में मरीज़ कराह रहे हैं। शमशानों में चिताएं जल रही हैं। पिंड-प्रदान, जलांजलि दी जा रही हैं। कुछ पिकनिक मना रहे हैं। युवा जोड़े रोमांस कर रहे हैं। बूढ़े खाँस रहे हैं, हाँफ रहे हैं। उनके पास कोई बोलनेवाला नहीं है। चारों ओर भ्रष्टाचार है, लूट है।

देखते-देखते मेरी आँखें थकने लगी हैं। मुझे पृथ्वीवासियों पर दया आ रही है। कैसे यंत्रवत जी रहे हैं, फिर रहे हैं बेचारे। न भूत की जानकारी न भविष्य की। क्यों आये थे? क्या करने आये थे? कब तक जियेंगे, कब मर जाएँगे- उन्हें कुछ पता नहीं। बेचारे मनुष्य! मंगल पर यान भेज दिए हैं। पर चारों तरफ़ अमंगल ही अमंगल है। क्या सोचते हैं आदमी? अस्तित्व पिद्दी जितना नहीं और ख़ुद के परम बुद्धिमान शक्तिशाली होने का पहाड़ जैसा अहंकार। ज़िंदगी का एक पल का भरोसा नहीं और योजनाएँ अगले सौ बरसों की। दीर्घायु होने और अमर हो जाने के प्रयोगशालाओं में जी-तोड़ प्रयास। क्या बात है?

मैं बृहस्पति पर आया, इसलिए इतनी बातें सूझीं। भेड़ों की भीड़ में तो भेड़ ही था। पृथ्वी पर होने और जीने के नए-नए अर्थ प्रकट हो रहे हैं। अगर पृथ्वी पर न जन्मा होता तो क्या होता? क्या पृथ्वी-पुत्र होना सर्वज्ञता का मानदंड है? क्या गारंटी है कि ऐसी और पृथ्वियाँ नहीं होंगी? ब्रह्मांड अनंत है। अनंत निहारिकाएँ और आकाशगंगाएँ हैं। उनमे भी असंख्य सौरमंडल हैं। जब हमारे इस सौरमंडल में यह एक प्यारी पृथ्वी है तो दूसरे सौरमंडलों में क्यों नहीं होगी भला? यह तर्क अपनी जगह विज्ञान-सम्मत है। क्यों नहीं होंगी और पृथ्वियाँ? पर क्या ऐसी ही होंगी जैसी ये है? एलियंस क्यों होंगे? हमारे जैसी शक्ल-सूरत के इनसान क्यों नहीं होंगे? पर कौन ढूँढने-देखने जाए? मंगल पर यान भेजना, एक मेंढक-छलाँगभर है।

सपना टूटता है, मैं बृहस्पति से सीधे अपने बिस्तर पर ख़ुद को गिरा हुआ पाता हूँ। और यह चाहता हूँ कि भाग-दौड़, आपाधापी के बजाय हम एक-दूसरे के क़रीब आएँ। एक-दूजे के दुःख-सुख से जुड़ें। पृथ्वी की आन-बान और मर्यादा के अनुसार मुहब्बत में भीगें, सराबोर हों। दुखियों और ग़रीबों, बीमार और बदहालों को गले लगाएँ। उन्हें रोटी-पानी-दवा दें। इसी एक पृथ्वी को इतनी सुदर, सरस, सुखद और स्नेहभरी बना दें कि फिर और पृथ्वियाँ होने का कयास लगाना ही भूल जाएँ। और फिर मुझे बृहस्पति पर जाकर पृथ्वी को आँकने का सपना आने की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी। आमीन!

उसका खेल (04 जून, 2025, चित्तौड़गढ़)

मैं अंतरिक्ष में अपनी संप्रभुता में था- शून्य में सर्वस्व लिए घूमता हुआ। एक बादल ने मुझे छुआ और मैं उसमें समा गया। बादल को भी पता नहीं। फिर वह धरती पर बरस पड़ा। मैं उसकी एक बूँद में खेत में जा गिरा। और गेहूँ की बाली में छिप गया। बालियाँ पकीं, कटी और गेहूँ में रूपित हुईं। मैं गेहूँ में अव्यक्त रहा- सचेत भी अचेत भी।

गेहूँ पिसे। माता-पिता ने खाए और फिर मुझे उनसे यह देह मिली। जन्मा और देहाकार हो गया। अव्यक्त से यूँ व्यक्त हो गया। इस व्यक्ताव्यक्त रहस्यमयी सूक्ष्मतम प्रक्रिया के बीच जो सत्ता है, वह न गेहूँ है न देह है। वह चिन्मात्र है। पदार्थ अपने में कुछ नहीं, वह चेतना का भौतिक रूप है, जिसे ऋग्वेद ने कहा है- आनीदवातं स्वधया तदेकम्। वह परमतत्त्व अपनी ही शक्ति से प्रकट और लुप्त होता है। जो मानवीय भाषा में न कुछ है, उसी में सब कुछ है। ये रूपाकार, ये संसार, ये देहधारियों से भरी हुई धरती और अन्य संभावित प्राणधारक ग्रह-नक्षत्र चेतना का स्वांग है, झांसा है। इस झांसे में सारी दुनिया पागल है, मोहितांध है।

अब बोलो- कहाँ जन्म, कैसा जन्म? कहाँ मृत्यु, कैसी मृत्यु? हम सब फ़ोकट के खेल में शुद्ध बेवकूफ़ हैं। खेलने में ख़ुद को भूल गए। देह के कारावास में जीवात्मा, अपना ‘स्व-रूप’ भूल गया। वह नहीं खेल रहा, उसे खिलाया जा रहा है। वह माया की चपेट में है। माया वह शक्ति है, चिद्सत्ता की- जो नहीं होते हुए भी होना लगती है। माया, संसार और यह खेल उस चिन्मय के छिपे रहने का पर्दा है- चमकीला। माया के इस चमकीले पर्दे को अपनी अंतर्दृष्टि से चीरकर जो आर-पार देख सके, वही ज्ञानी है, वही परमहंस है। वह देह के शीशे में प्रज्वलित दीपक है, जिससे यह सारी कायनात रौशन है।

और क्या?

साहित्य से आगे (21 जून, 2025, चित्तौड़गढ़)

क्या साहित्य मानव जीवन को संपूर्ण रूप से कवर करता है? नहीं। जीवन के अनेक पक्ष होते हैं, उनमें से साहित्य एक। भावजगत् का सरस आलेखन। साहित्य जीवन, समाज और प्रकृति का अनुसृजन है। जो जैसा है, वैसा नहीं, कला की चाशनी में भिगोया हुआ। प्रतिभा को साहित्य से आगे बढ़ना चाहिए,। साहित्य भौतिक विश्व का भावभरा जीवन है। जीवन नहीं, जीवन का प्रति सृजन है। साहित्य त्रिगुणात्मक है। इससे परे वह नहीं जाता। न ही जा पाता। साहित्य का मूल है- भावना। भावना का मूल है- चेतना। भावना चेतना की पुत्री है। चेतना का संबंध अध्यात्म से है। सांसारिक भावमय जीवन से उच्चतर भूमिका। वाल्मीकि रामायण, महाभारत, रामचरितमानस, कामायनी और गोदान साहित्य की सिरमौर कृतियाँ हैं- जो भावजगत् में परिसीमित हैं। हालाँकि कामायनी में काश्मीर प्रत्यभिज्ञा शैव दर्शन का पुट है, जो उसे अध्यात्म की सीमा में लेकर जाता है तथापि वह अपनी रचना, प्रकृति और उद्देश्य में है साहित्यिक कृति।

उपनिषद्, साहित्य से आगे और ऊपर की वस्तु है। वह हमें भाव से उदात्तीकृत कर चेतना-जगत् में ले जाता है। चेतना-लोक भावलोक से महत्तर और बृहत्तर है। ऋग्वेद की ऋचाओं में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों धाराओं का समवेत अस्तित्व है। कहना यह है कि साहित्य, समग्र मानव जीवन को नहीं समेटता। उससे विज्ञान और अध्यात्म छूट गए रहते हैं। अतः प्रतिभा को साहित्य से परे और ऊपर जाना वाँछित है। तुलसीदास ने मानस में समधीत दार्शनिक धाराओं की जहाँ-तहाँ झलक दी है, पर वहाँ मौलिकता कुछ नहीं। उनकी मौलिकता भावलोक की उद्भावना(सूझ) शक्ति में है, जिससे ‘मानस’ महान् कालजयी काव्य बन सका है।

जीवन एक सोने का सिक्का है, जिसके दोनों पक्ष- भौतिक और आध्यात्मक हैं। भौतिक भावमय है, अध्यात्म चेतनामय। दोनों से मिलकर मानव जीवन संपूर्ण होता है। भौतिक में विज्ञान(साइंस) एवं अर्थशास्त्रादि अनेक विधाएँ शामिल हैं। अध्यात्म में जीवन, जगत्, आत्मा और पराशक्ति(जिससे परे कुछ नहीं) का अपार और विराट चिंतन आता है। इधर कविता, कहानी, नाटक, सिनेमा, ललित कला, नृत्य-संगीत तमाम सौंदर्य और भावभीनी कलात्मक सर्जना। जबकि दूसरी ओर ‘मैं कौन हूँ?’ यह ब्रह्मांड और उसका प्रस्तोता कौन है? माया, शरीर, संसार, आत्मा, नित्यानित्य विवेक, अध्यात्म- पक्ष- दोनों मिलकर मानव जीवन को संपूर्ण सफल और सार्थक बनाते हैं।

सत्य क्या है? (29 जून, 2025, जयपुर)

‘सत्य’ मनुष्य का गढ़ा हुआ एक शब्द है। इस शब्द के पीछे ताक़त क्या है? क्या सत्य अटल होता है? सत्य से बढ़कर क्या है? महाभारत का वचन है-

सत्यस्य वचनं श्रेय:
सत्यादपि हितं वदेत्।

सत्य बोलना अच्छा है, लेकिन इससे बढ़कर है ‘हित की बात बोलना।’ फिर सत्य कहाँ रहा? अटलता सत्य का गुण नहीं हो सकता, व्यापक मानवीय हित सत्य से ऊपर है। भीष्म की तरह सिंहासन के प्रति सत्यनिष्ठ होकर अड़े रहना सत्य का पालन नहीं है। सिंहासन की निष्ठा से बढ़कर था, द्रौपदी की लज्जा बचाना, जो भीष्म नहीं कर पाए। सत्य के थोथेपन से कसमसाते रहे पर सक्षम होते हुए भी दुर्योधन को दंडित कर चीरहरण रोक न सके। सत्य पाषाण या लक्कड़ छाप नहीं है। उसमें चिरंतन मानवीय मूल्यों का लचीलापन छिपा है।

गाँधी जी का सत्य क्या था? देश को आजाद कराना। यानी अत्याचार, अन्याय और शोषणयुक्त अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति दिलाना। और वह भी अहिंसा के बल पर। उनका सत्य अहिंसा में छिपा था। सत्य की ताक़त है अन्याय और शोषण का विरोध। यही कार्ल मार्क्स ने कहा। यही विश्व के सभी महापुरुषों का कथन है। सत्य की ताक़त समानता और स्वाधीनता में छिपी है। इन दोनों के पीछे हैं प्रेम और भाईचारा। यानी किसी को कष्ट और दुःख नहीं पहुँचाना। यानी अहिंसा। यानी प्राणिमात्र से प्रेम और सद्व्यवहार। तो सत्य की सत्यता अटल होने में नहीं, प्रेमिल व्यवहार में है। इसलिए सत्य की भीतरी ताक़त है- प्रेम और अहिंसा।

विश्वास और तर्क (18 जुलाई, 2025, जयपुर) 

विश्वास हार्दिक है पर अवैज्ञानिक है। विश्वास सत्य नहीं है, पर वह एक शक्ति है। ईश्वर में विश्वास बल देता है। कर्मफल का सिद्धांत और पुनर्जन्म शक्तिशाली विश्वास है, उलझनों का समाधान है। विश्वास सत्य का स्थान नहीं लेता पर वह हृदय की एक नैसर्गिक शक्ति है- यह सत्य है। विश्वास आसान है, सुविधाजनक है। मान लेना और आस्था की सीमेंट से मज़बूती देना, एक मनोवैज्ञानिक रिलेक्सेशन है। लेकिन विश्वास सीमा लांघने पर अन्धविश्वास की तरफ़ फिसलने लगता है।, यह चिंतनीय है। रूढ़ि और कट्टरता, विश्वास की पराजय है। उसकी विफलता और अपवित्रता है। ये ख़तरे विश्वास को बदनाम करते हैं। यहीं कर्मकांड और पूजा-अर्चन के बेहिसाब प्रपंच शुरू हो जाते हैं, जिनकी परिणति ग़लत दिशा में होती है।

वैष्णव सगुण भक्ति और कृष्ण लीलाएँ रसीले भोगविलास में रूपांतरित हो जाती हैं। और तत्त्व से अनभिज्ञ लोक-मानस भक्ति की आड़ में वासना में डूबकर ग़लतफ़हमी का शिकार हो जाता है और सगुण शृंगारिक भक्ति की उदात्तता और आध्यात्मिक भाव-भूमि से वंचित होकर दोषोंमत्त होने लगता है। वह अपने इष्ट देव पर अपनी कामनाएँ आरोपित कर ईश्वरमय न होकर ईश्वर को मनुष्यत्व लीला पर ले आता है। यह विश्वास और उसकी भक्ति का सबसे बड़ा और क्षतिकारक अंजाम है। यहाँ विश्वास और भक्ति अशिष्ट और विकृतिपरक हो जाते हैं। अतः विश्वास, पाँव मजबूत न हों तो फिसलकर गर्त में जा गिरता है। अब रहा तर्क। शुष्क बौद्धिक मार्ग। जैसे गणित में संख्याएँ हमेशा अंतहीन होती हैं, ठीक वैसे ही तर्क भी अंतहीन होता है। तर्क से ईश्वर सिद्ध नहीं होता, जो विश्वास की अमूल्य पूँजी है। ईश्वर की सत्ता विश्वास में निहित है। ईश्वर हो न हो, पर विश्वास में ईश्वरत्व है। जबकि तर्क, जिससे विज्ञान और दर्शन नि:सृत होते हैं- घनघोर बौद्धिक व्यायाम है।

दोनों की असलियत यह है कि विश्वास और तर्क क्रमशः हृदय और बुद्धि की शक्तियाँ हैं। निर्माता ने मनुष्य को इस द्वंद्व में डालकर विभ्रम-जाल रचा है। वह दिल की बात माने या दिमाग की? ‘कामायनी’ महाकाव्य में यही प्रश्न केंद्र में है। प्रसाद का झुकाव विश्वास की बहन श्रद्धा की ओर रहा है। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो लोकमानस श्रद्धा और विश्वास में शरण पाकर आराम पाता है। बुद्धि और तर्क जाल उसे अपने अनुकूल नहीं लगते। यहाँ बहुमत से तर्क-बुद्धि की हार है। कुछ मुट्ठीभर लोग हैं जो तर्क और विज्ञान का दामन नहीं छोड़ते। न छोड़ें, न सही। जर्मन दार्शनिक एमेनुअल कांट ने भी यही विभाजन किया है- ‘फैथ एंड रीज़न।’ ईश्वर को पाना हो, मनाना हो तो फैथ(विश्वास) की तरफ़ जाओ और यदि तत्त्व का निर्मम, नि:संग और निष्ठुर अनुसंधान करना हो तो तर्क और विज्ञान के सीमाहीन पथिक बनो। मिलेगा कुछ नहीं। इधर, ईश्वर तो मिलता है, भले ही वह कल्पना-प्रसूत हो। विश्वास जितनी निश्चिन्तता, भारहीनता और बेपरवाही के साथ मानसिक शांति देता है, उतनी ही बेचैनी, उद्विग्नता और अतत्त्व लाभ तर्क-मार्ग की देन है। इसमें चयन आपका अपना है। यथा - संस्कार, यथाभिरुचि वह स्वतः अपनी पसंद का रास्ता चुनेगा। विश्वास और तर्क के विरोधाभास में दोस्ती और समझौता करानेवाली एक बहुत विश्वसनीय ताक़त भी मनुष्य के पास है- और उसका नाम है- विवेक। द्वंद्व और उलझन में उचित के ग्रहण की शक्ति। विवेक, विश्वास और तर्क के झगड़े को निपटानेवाला सरपंच है, अगर उसकी मानो तो।

सत्यनारायण व्यास
(राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि) नीलकंठ, छतरी वाली खान के पास, सेंथी (चित्तौड़गढ़) 312001
9461392200

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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