शोध आलेख : समकालीन भारतीय युवाओं की कृतियों में अस्तित्व की गहरी दृष्टि / आदेश खेरीवाल

समकालीन भारतीय युवाओं की कृतियों में अस्तित्व की गहरी दृष्टि
- आदेश खेरीवाल

शोध सार : समकालीन कला में युवा कलाकारों की पहचान करने के लिए उसके अस्तित्व की सादगी के अनुरूप ही दृष्टि रखनी आवश्यक है। इन युवाओं का कला दर्शन अत्यंत साधारण दिखलाई तो पड़ता है किन्तु इसमें एक विषम एवं विषमय अवलोकन भी प्रतीत होता है। समकालीन युवा कलाकारों का मुख्य उद्देश्य अपनी मिट्टी की नैसर्गिक सुंदरता एवं प्रकृति की सुरक्षा के प्रति मानवीय दायित्वों को वैकल्पिक रखने की अपेक्षा मुख्य धारा में लाना है। इसके साथ-ही-साथ इन युवा कलाकारों की कलाकृतियों में अंतर्निहित मानवीय दायित्वों, अस्तित्व के दर्पण, सामग्रियों की प्रकृति एवं अदृश्य अम्बेडकरवादी सुधारक जन-जागृती की छवि को दृश्यमान करना भी है। जिसके अध्ययन से हमें विभिन्न प्रत्ययवादी तार्किकता एवं नव-माध्यमवादी विचारधारा का रूप प्रज्वलित दिखाई पड़ता है। ये सभी युवा कलाकार अपनी व्यक्तिगत शैली के कारण समकालीन कला में बहुत प्रभावशाली छाप छोड़ रहे है। जिनमें मनवीर सिंह गौतम व्यर्थ प्लास्टिक के छोटे-बड़े टुकड़ों को प्रयोग में लाकर पर्यावरण को स्वच्छ तथा अपनी विशिष्ट कार्य शैली से समाज को नई दिशा प्रदान कर रहे है। मधुकर मुचारला अपने अस्तित्व की पहचान के साथ अम्बेडकरवादी सुधारक एवं साम्यवादी विचारधारा को मजबूत बनाने में पूर्ण रूप से प्रयासरत है। इनकी रचनाओं में चमड़े से बनी विभिन्न कलाकृतियाँ मधुकर की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को चिन्हित करती है। गिरजेश कुमार सिंह टूटे मकानों के टुकड़ों में समाज के एक दबे हुए भाग को अपनी कलाकृतियों में उत्कीर्ण करते है। इस शोध पत्र में ऐसे ही अदृश्य युवा चेहरों को समकालीन परिदृश्य की परिपाठी पर लाना मुख्य उद्देश्यों में से एक है।

बीज शब्द : अम्बेडकरवाद, समकालीन कला, पर्यावरण, युवा कलाकार, नव-माध्यमवाद।

मूल आलेख :

पूर्व पीठिका - 

  भारत में सामाजिक न्याय की पहल बहुतेरे कलकारों व कला समालोचकों ने की है। उसमें से डिपार्टमेंट ऑफ आर्ट एंड एस्थेटिक्स’ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ॰ यशदत्त सोमजी अलोने, दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट के पूर्व प्राध्यापक सवीन्द्र सावरकर एवं प्रसिद्ध कलाकार जे. नंदकुमार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रो॰ अलोने वर्तमान में जाने- माने कला समालोचक है जिन्होने दलितों के अधिकारों एवं दलित कलाकारों की कलाकृतियों पर अनेकों लेख लिखे है। इनके द्वारा लिखा गया शोध पत्र ‘कास्ट लाइफ नरेटिव, विज्वल री-प्रेजेंटशन एंड प्रोटेक्टेड इगनोरेंस’ में सवी सावरकर, जे. नंदकुमार, मालविका राज , पवन कुमार, जया दरोंदे, लोकेश खोडके, प्रकाश गाइकवाड़, प्रजापति, सुधाकर ओवले, सरीखे कलाकारों की रचनाओं का विश्लेषण के साथ ही साथ समकलीन कला में दलित कलाकारों का योगदान तथा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के समाज सुधारक विचारों को भी चिन्हित किया है। विशेष रूप से सवी सावरकर को दलितों के अधिकारों की चित्रकारी के लिए जाना जाता है। जो समकालीन युवा कलाकार इन विषयों को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम मानते है उनके लिए सवी प्रत्यक्ष प्रेरणा स्रोत है। संभवत ये पहले ऐसे कलाकार रहे है जिन्होने दलितों पर सदियों से हो रहे अत्यचारों को इतनी सूक्ष्मता से चित्रित किया है। सवी द्वारा बनाई गयी ‘अंटचेबल कपल विथ ओम एंड स्वस्तिक’ नामक कृति में यह पूर्ण रूप से देखा जा सकता है।[i]
 

 भारतीय समकालीन कला का नया दौर अस्तित्व की खोज के साथ माध्यमों की असीमित विविधता का परिचायक है, जिसमें नव-युवा, प्रतिष्ठित युवा कलाकार एवं प्रसिद्धि प्राप्त प्रमुख कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। देश के वरिष्ठ कलाकार के. जी. सुब्रमण्यम, मृणालिनी मुखर्जी, धनराज भगत, वेद नायर, विवान सुंदरम, सतीश गुजराल, सुबोध, गुप्ता जितिश कल्लत एवं हेमा उपाध्याय सरीखें कलकारों ने नवीन माध्यमों की ओर दर्शकों का ध्यान केन्द्रित किया, समयानुसर कलाकारों का रसायनिक व खनिज रंगों से मोह भंग होता दिखाई पड़ता है इन पारम्परिक माध्यमों के स्थान पर नैसर्गिक वस्तुओं में अतीत को पुनर्जीवित करके एक विशिष्ट दृश्य दिखाई पड़ने लगे, जिससे कलाकार के मन मस्तिष्क में वस्तुगत सौन्दर्य की चेतना जागृत हो जाती है। 


उदाहरण के लिए चमड़े में भारतीय समाज के एक दबित वर्ग की नम आँखें तथा उस समाज के लोगों का संघर्ष अवलोकन हेतु युवा कलाकार मधुकर मुचारला चमड़े में अपने अस्तित्व की पहचान को विश्व स्तर तक पहुँचने में सफल रहे है। चमड़े के टुकड़ों को सीलकर बनाई गयी बाबा साहेब डॉ. भीम राव अंबेडकर एवं महानायक ज्योतिबा फुल्ले की मुखाकृतियों में समाजसुधारक महान विभूतियों के प्रति सम्मान दिखाई देता है। इनकी कलाकृतियाँ प्रतिवर्ष राष्ट्रिय कला मेला दिल्ली में दर्शकों को लाभान्वित करती है। इनके अतिरिक्त प्रसिद्ध कलाकारा अमृता शेरगिल की विचारधारा को समकालीन कला में असंख्य युवा कलाकार अपनी रचनात्मक दृष्टि का केंद्र बिन्दु मानते हैं। झारखंड से आने वाले दिल्ली के प्रसिद्ध युवा कलाकार बिरेन्द्र यादव अपनी कलाकृतियों में गरीब श्रमिक वर्ग के प्रति सहानुभूति ओर संवेदना प्रस्तुत करते हैं, जिसमें माध्यम के विविध स्वरूपों को देख सकते हैं। इनकी लकीर के फकीर रचना में समाज के पिछड़े और अति-पिछड़े बहुसंख्यक समाज के लोगों में व्याप्त गरीबी जो पीढ़ी दर पीढी निरंतरता बनाए हुए है, शिक्षा या बहतर शिक्षा के अभाव में समाज का एक हिस्सा सैंकड़ों वर्षों से श्रम या मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा है; बिरेन्द्र यादव इन्ही विषयों को प्रमुखता देते है। प्रस्तुत प्रत्येक युवा कलाकार सामाजिक सुधारवादी नीतियों के मापदण्डों को लेकर कार्य कर रहे हैं। रेवाड़ी(हरियाणा) से आने वाले दिल्ली के मनवीर सिंह गौतम को दिल्ली की जनता ने प्लास्टिकवाला नाम दिया; क्योंकि मनवीर आस-पास के लोगों से प्लास्टिक एकत्रित करके अपनी कलाकृरियों में चस्पा करते है, इस मुहीम से मनवीर ने लगभाग चार-पाँच सौ परिवारों को जोड़ा है। इन परिवारों में पर्यावरण सुरक्षा के नवीन स्रोत व दायित्वों के प्रति जागरूकता आयी है। मनवीर क्षुब्ध पड़ी प्लास्टिक को अपने संस्थापनों में व्यवस्थित करके पर्यावरण को स्वच्छ करने का नया संदेश एवं उपाय सुझा रहे है। श्रावस्ती (उत्तर प्रदेश)से आने वाले बड़ौदा के गिरजेश कुमार सिंह ध्वस्त भवनों के टुकड़ों में श्रमिक वर्ग की मुखाकृतियों को उत्कीर्ण करते है। जिनमें कई मासूम चेहरे एवं उनके मनोभाव को देखा जा सकता है, इनकी कलाकृति लागा चुनरी में दाग बहुचर्चित है। मालविका राज बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के सामाजिक सुधारवादी प्रयासों को मधुबनी चित्रशैली में चित्रित करती है। इनके अत्यंत साधारण रेखांकन में दलितों की वास्तविक छवि देख सकते है। विक्रांत बिशे, सिद्धेश गौतम, श्रुजन श्रीधर, तथा राही पुण्यश्लोका (artedkar)सरीखे समस्त युवा कलाकारों की शैलियो में अस्तित्व की स्मृतियां स्पष्ट कर देती है कि प्रत्येक कलाकार ने किस संघर्ष से ये उपलब्धि प्राप्त की है।

मुख्य विवरण-

इस श्रंखला में अनेकों कलाकारों को रखा जा सकता है किन्तु विशेष महत्व उन कलाकारों को दिया गया है जो अंबेडकरवादी सुधारक दर्शन से प्रभावित है। विभिन्न गणनाओं के आधार पर यह प्रतीत होता है कि समकालीन युवा कलाकार महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ उदारवादी एवं साम्यवादी विचारधारा को प्रमुखता से स्वीकारते है, जिससे कलाकारों के मस्तिष्क में कट्टरता का कोई महत्व नही दिखाई पड़ता है। वस्तुत: अंबेडकरवादी विचारधारा की मूल प्रस्तावना का स्रोत महाराष्ट्र के मुंबई महानगर को आंशिक रूप से माना जा सकता है परंतु इसकी जड़ें सम्पूर्ण भारत में फैली हुई देखी जा सकती है। परिणामस्वरूप दिल्ली, कलकत्ता, बडोदा, रेवाड़ी इत्यादि नगर इस विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यदि सबसे पहले मुंबई के युवा कलाकार ‘विक्रांत बिशे’ की रचनाओं पर प्रकाश डाला जाए तो वर्ष 2024 में निर्मित सुप्रसिद्ध कलाकृति ‘दलित पैंथर’ (Figure 5) में वर्ष 1974 में हुए वर्ली के भयावह दंगों को इंगित किया है, जिसमे दलित नायक भगवत जाधव की एक रैली के दौरान दूसरे संगठनों ने पत्थर मार- मार कर बर्बर हत्या कर दी थी। इस दुर्घटना से पूरा दलित समाज आक्रोशित हो गया, परिणामस्वरूप शिव सेना और हिन्दू संगठनों के साथ दलितों का संघर्ष शुरू हो गया; यह संघर्ष कई महीनों तक जारी रहा जिसमें बहुत से मासूम लोग इस दंगे की आग में अपना जीवन गवा बैठे। विक्रांत की समस्त रचनाओं में रूसी फंतासी कलाकार मार्क शगाल की शैली की झलक नजर आती है। वर्ष 2023 में निर्मित कलाकर्म ‘आइडियल्स ऑफ ह्‌यूमैनटि’ पोर्टरेट्स ऑफ डॉ0 भीमराव अंबेडकर श्रंखला और प्रियंबल नामक रचनाएँ शगाल के प्रभाव से अनछुए नही रहे है। इन सब तथ्यों से यह तर्क सामने आता है कि इन विषयों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है; हमें अमरीका जैसे देशों से सीखना चाहिए कि किस तरह एक गोरे पुलिस कर्मी ने बर्बरता से एक काले व्यक्ति कि हत्या कर दी और उसके विरोध में पूरे अमरीका में आंदोलन हो जाता है जिसमें गोरे लोगों की संख्या अधिक थी, किन्तु हमारे देश में यह समंजस्य बहुत कम देखने को मिलता है इसका एक उदाहरण हाथरस की 19 साल की युवती के साथ चार लोगो द्वारा समूहिक बलात्कार के पश्चात उस घटना के समय पुलिस और प्रसाशन दोनों की विफलता सामने अती है। उस घटना के विरोध में कोई विरोध प्रदर्शन नही हुआ। यहाँ भी दलित कुछ संगठनों ने परिवार का साथ दिया तथा संवैधानिक कार्यवाही हेतु प्रसाशन के कार्यों पर निगरानी रखी लेकिन इसके बाद भी उन बलात्कारियों के परिजनों ने पीड़ित परिजनों का घर से बाहर निकलना मुश्किल कर दिया।[ii] इस बर्बरता के विरुद्ध प्रत्येक सामाजिक संगठनों को एक साथ आना चाहिए था किन्तु इस एकता की कल्पना करना महज़ औपचारिकता सी ही दिखाई दी। कलाकार इन सब घटनाओं से आक्रोशित होकर उपरोक्त विषयों को अपनी व्यक्तिगत शैली में चित्रांकित करते है। ये दायित्व किसी कथित समाज के व्यक्ति का नही अपितु सम्पूर्ण समाज का होना चाहिए। यही कारण है कि आज अमरीका वैचारिक दृष्टिकोण से हमसे पचास वर्ष आगे है। समकालीन युवा कलाकारों को ये विसंगतिया ही इन विषयों की ओर प्रेरित करती है। इसके साक्ष्य हमे विक्रांत बिशे की कलाकृतियों में दिखलाई पड़तें है।

दूसरी ओर ‘गिरजेश कुमार सिंह’ अपनी कलाकृतियों में इसी आख्यान को विशेष दृष्टिकोण से देखते है उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती नगर में जन्मे वर्तमान में बड़ौदा में स्थित; इस कलाकार ने टूटे-फूटे मकानों के अवशेषों से अपनी रचनाओं को सादृश्य रूप प्रदान किया है। गिरजेश ने मोर्टर को नवीन दृष्टि से देखा तथा वस्तु को विषयवस्तु के अनुरूप ढाला। गिरजेश लोगों को इन ईंटों और इमारतों के पीछे की कहानियों को समझाने में अधिक दिलचस्पी रखते है बजाय इसके कि वो कोई राजनीतिक बयान दें। ये हमें स्मरण कराते कि इमारतें और घर लोगों के जीवन और इतिहास से जुड़ें है। इन पुरानी ईंटों को नया जीवन देकर, वे हमें याद दिलाते हैं कि इमारतों का मतलब सिर्फ़ उन लोगों से है जो उनमें रहते थे और उन्होंने क्या अनुभव किया। उनका काम हमें उन लोगों के जीवन के बारे में सोचने पर मजबूर करता है जो इन जगहों पर रहते थे और ये सोचने के लिए विवश करते है कि इन लोगों के साथ क्या हुआ होगा। मूलत: गिरजेश उन टूटी ईंटों से समूह शिल्प बनाते है जिन्हें ये श्रावस्ती या भारत के अन्य जगहों से मकान अकारण खंडित किये हो। इनकी कला के मूल में खंडित मकान के अवशेषों का प्रतीकात्मक रूपान्तरण, इमारतों में निहित भाव, आस्था, प्रेम, श्रम, लगन, मेहनत और कई वर्षों की तपस्या स्पष्ट देखी जा सकती है जिसमें कलाकार और कलाकर्म के मध्य परस्पर विस्मयी अंत:संबंध का आनंद प्राप्त होता है गिरजेश कुमार सिंह नष्ट हो चुके घरों की टूटी हुई ईंटों का उपयोग करके अद्भुत मूर्तिशिल्पों का निर्माण करते है, इनकी कला मुख्यत: संसार में व्याप्त क्षति ओर उदासीनता को दर्शाती है इनकी रचनाए विनाश के विचार को लोगो और इतिहास के समक्ष खड़ा कर देती है। शांत बेजान पड़ी ईंटों को शक्तिशाली छवियों में परिवर्तित कर देती है। जो कठोर सत्य को उजागर करके इन अनदेखी वस्तुओं में निहित वास्तविक सौंदर्य को उन्मोदित कर देती है। ‘लागा चुनरी में दाग’ (Figure 3) नामक रचना इस तथ्य का उदाहरण है। इस कलाकृति के विषय में गिरजेश बताते है, ‘सोलहवीं शताब्दी के एक महान दार्शनिक कबीरदास द्वारा लिखी गयी चैपाई का अंश लागा चुनरी में दाग, जिसका शाब्दिक अर्थ मैला वस्त्र है। कबीर निर्गुण भक्ति शाखा के कवि थे जिन्होने मानव हित को सर्वोपरि समझा तथा धार्मिक कट्टरता एवं आडम्बरों को चुनौती दी। यह कलाकृति गिरजेश ने गुजरात के धार्मिक दंगो से आहत होकर बनायी थी जिसमें धार्मिक तथा जातीय हिंसा में कितने ही लोगों, मजदूरों, गरीबों तथा पीडितों के घर विध्वंस किये गये। यह सब देखकर कबीरदास जी की चैपाई स्मरण होती है। हम अपनी ख़ामियों और गलतियों से नहीं सीखते अपतु इनकी पुर्नावृत्ति किये जा रहे है।[iii] गिरजेश की सम्पूर्ण कला सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और पूंजीवादी असमानता को चिन्हित करती है इनकी विशिष्टता विकास के नाम पर लोगों पर अत्याचार करना सरकारी अधिकारियों के अधिकारों का अनुचित प्रयोग का दर्पण प्रस्तुत करना और मानवीय भावनाओं की क्षति को इंगित करना है।

ऐसे ही नगीना बीजनोर से आने वाले कलाकार ‘सिद्धेश गौतम’ समाज के विशेष पक्ष को संबोधित करते है। यह एक डिजाइनर के रूप में अधिक प्रसिद्ध है। सिद्धेश गौतम बिजनोर के नगीना संसदीय क्षेत्र से आते है वर्तमान में इनका कार्य क्षेत्र दिल्ली है जहां ये एक कलाकार और वकील के रूप में कार्यरत है। ये कई विधाओं में रूचि रखने के साथ– साथ पेंटिंग लेखन और कहानी सुनना व नए विचारों की कल्पना करना भी पसंद करते है साथ ही साथ ये ज्ञान के छिपे हुए खज़ानों की खोज भी करते है। इनकी कला आपको अलग तरह से सोचने हेतु उत्साहित महसूस करने, नयी चीजों की खोज करने और स्वयं को बहतर तरीके से समझने में मदद करती है। सिद्धेश की कलाकृतियों में नीले रंग महत्व स्पष्ट दिखाई देता है। क्योंकि बाबा साहब भीम राव अंबेडकर आकाश के नीले रंग की विशाल आभा को प्रमुख मानते थे। अपनी कलाकृतियों में नीले रंग के अधिक प्रयोग के लिए ये कहते है, ‘मैं नीले रंग के इर्द-गिर्द बहुत काम करता हूँ हालांकि नीला रंग मेरा पसंदीदा रंग नही है, यह बस वैचारिक रूप से मुख्य है। नीला रंग आकाश के समान परम अनंत व शीतल है; वह आकाश जो प्रत्येक सजीव व निर्जीव इकाई के साथ समान व्यवहार रखता है। नीला रंग दलित- बहुजन एवं आदिवासियों प्रतिरोध का भी रंग है, जो समानता की मांग करता है।’[iv] इनकी कलाकृतियों को बी. बी. सी, द वायर और द हिन्दू जैसी बड़ी समाचार संस्थाओं द्वारा भी दिखाया है सिद्धेश ने न्यूयोर्क, लंदन और विएना के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में भाषण भी दिये है।

इस कड़ी में ‘बिरेन्द्र यादव’ समकालीन युवा कलाकारों विशेष स्थान रखते है बिरेन्द्र के पिताजी झारखंड के धनबाद नगर के एक कोयला कारखाने में साधारण कर्मचारी थे। इनकी कार्य शैली में बचपन की स्मृतियों का गहरा प्रभाव दिखाई पड़ता है। क्योंकि बिरेन्द्र बाल्य काल से ही धनबाद की कोयले के कारखाने के मजदूरों के दैनिक जीवन से प्रभावित थे। इन विषयों पर ओर अधिक कार्य करने के लिए मुख्य रूप से ये मजदूर ही मूल स्रोत बने। बिरेन्द्र के आरंभिक कार्यों में धनबाद की कॉल माइन फ़ैक्टरी के आस-पास के जल रंग से चित्रित दृश्य चित्र दिखाई देते है समयनुसार शैली में परिवर्तन करते हुए चारकोल पेंसिल से बड़े आकार की श्याम-श्वेत रंग के चित्रों का चित्रांकन होता है जिसमें अमूर्त आकारों का नृत्य दृष्टव्य होता है। बिरेन्द्र अपने प्रारम्भिक कला प्रशिक्षण के समय बनारस में चारकोल तथा जलरंग से चित्रण करने में अत्यधिक रुचि लेते थे परंतु दिल्ली में स्थानांतरित होते ही इनके विषयों एवं शैली में बदलाव दिखाई देने लगता है। परिवर्तन का पहला उदाहरण ‘सौ सोनार की एक लोहार की’ नामक कलाकृति में काष्ठ की 100 हथोड़ियों के बगल में एक बड़ा हथोड़ा रखकर प्रदर्शित किया गया था। यह कलाकृति 2015 में बनकर तैयार हुई, जिसमें लोहार के लोहे पर वार करने के विषय का संज्ञात्मक दृश्य के अंतर्गत लोहार की मेहनत और सोनार की मेहनत व आमदनी का तुलनात्मक दृश्य प्रस्तुत करना मूल उद्देश्य था। बिरेन्द्र यादव की कलाकृतियों में श्रमिकों की पीड़ा का गहन अवलोकन दिखाई देता है वर्ष 2017 में सृजित कलाकृति ‘लकीर के फकीर’ इनकी रचनाओं में में विशेष स्थान रखती है। इस रचना में देश की जमीनी सच्चाई दिखाई पड़ती है जिसका प्रतिबिंभ मात्र ही भाव-विभोर कर देता है। बिरेन्द्र यादव की रचनाओं में से एक रोजगार की खोज में धनबाद की संकरी बस्तियों से विस्थापित मिर्जापुर के ईंट भट्टे पर काम करने वाले मजदूरों के क्षत-विक्षत हाथों के छाया चित्र विशेष स्थान रखते है। यह उन लोगों को उजागर करता है जिन्होने जीवन भर पीड़ा और पिछड़ेपन में जीवन-यापन किया, इनको सदियों से शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबन्धित सेवाओं तथा अधिकारों से वंचित रखा गया। इन लोंगों को समाज से न्याय नहीं मिला,इस उपेक्षित वर्ग की व्यथा को बिरेन्द्र यादव ने बड़े ही मार्मिक व आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया। ये कहते है, ‘मेरी कला में व्यंग्य करके ये बताया गया है कि कैसे सत्ता में बैठे हुए कुछ लोगों का नियंत्रण है और कैसे मजदूरों तथा कामगारों को अक्सर नजरअंदाज़ किया जाता है। मैं ये दिखाना चाहता कि पूंजीपति औरसरकार कैसे परस्पर सबन्ध रखते है, किन्तु फिर भी इन कामगरों को हाशिये पर रखा जाता है। मैं रोटे फब्रिक जैसी पुरानी फ़ैक्टरी को देखता हूँ। जो गहन श्रम को समायोजित करने के लिए डिजाइन किया गया है ये जगह वहाँ कि कड़ी मेहनत के अनदेखा करने कि कहानी को दर्शाती है, और उनके विषय में खुल के बात नहीं की जाती है। वास्तव में मेरा कार्य इस बात केन्द्रित रहा है कि किस प्रकार मानव पहचान कि जटिलताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है जैसे भारत का आधार डेटाबेश हर किसी नागरिक की वक्तीगत पहचान का सरलीकृत प्रक्रिया है। वैसे ही देश में समता का एकीकृत सूत्र होना चाहिए’[v] बिरेन्द्र ने भारतीय समाज की रूढ़िवादी जाति व्यवस्था पर भी कटाक्ष किया है। बिरेन्द्र यादव ‘बाबा साहब डॉ0 भीमराव अंबेडकर’ के उन मूल्यों को अंकित करते है जिनको समाज के कुछ व्यवस्थित पूंजीपति अस्वीकार करते है। बिरेन्द्र वर्तमान में भी सामान्य नागरिकों के जीवन की कठिनाइयों को संस्थापित कर रहे है। युवा कलाकारों में गरीबों और श्रमिकों के प्रति संवेदना देखी जा सकती है, साथ ही साथ माध्यमों की विभिन्नताओं को भी विशेष महत्व दिया गया है जो विशेष रूप से विषय की परिकल्पना से प्रेरित है। बिरेन्द्र की रचनाओं पर इस शोध पत्र में अत्यधिक बारीकी से अध्ययन किया गया है। ‘डोंकी’ नामक कलाकृति में बहुत से मजदूरों के अँगूठों के चिन्ह मिलेंगे, सम्पूर्ण आकृति इन निशानों से ही रेखांकित की गयी है। यह रचना इनकी लोकप्रिय रचनाओं में से एक है, जो 2015 निर्मित इरेज्ड फेसेज़ परियोजना का अभिन्न अंग रहा था। इसके पश्चात राजनैतिक उठा-पटक इनके कार्य में भी देखने को मिलती है। वर्ष 2014 में सरकार बदलते ही माध्यम में बदलाव देखने को मिलता है, इस माध्यम में काम करने के पीछे राजनैतिक दृष्टिकोण अहम भूमिका निभाता है गन पाउडर में निर्मित दिलजले, राजकमल, दिल के बदले दिल, मट्टेरियल मैटर श्रंखला, स्ट्राइकिंग सरफेस श्रंखला, किसान एवं फिर भी दिल है हिंदुस्तानी नामक कलाकृति राजनैतिक गलियारों का प्रतीकात्मक रूपान्तरण है। वर्ष 2017 से 2020 तक गन पाउडर में कार्य करने के पश्चात बिरेन्द्र भट्टे की जली हुई लाल मिट्टी(रापिस) को माध्यम के रूप में अपनाते है; वो इसलिए कि कला और माध्यम के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित किया जाए जो कि इससे पहले की कलाकृतियों में भी दिखाई पड़ता है। री-प्रसेंटेड फ्रोम ट्रेसेज नामक टैराकोटा(रापिस) मूर्तिशिल्प संस्थापन इंडियन सिरैमिक्स त्रिनले में प्रदर्शित हुआ। इस संस्थापन में भट्टे पर काम करने वाले मजदूर जैसे पथेरे, जलइया, कुम्हार, निकासी इत्यादि कामगार इकाइयों के औजारों को व्यवस्थित रूप से संयोजित करके प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में बिरेन्द्र नए विषय और माध्यम की खोज में कार्यरत है।

  इस शोध पत्र की मूल चेतना कलाकारों की आधारभूत आवश्यकताओं की मनोवैज्ञानिक गणना करना है, विशेष रूप से उन कलाकारों की जो परिस्थितियों से लड़कर उन्हे पराजित करके उन विपत्तियों को शस्त्र बनाकर बिना लड़खड़ाए विराट स्वरूप धारण किए हुये पर्वत के समान अपने अस्तित्व को प्रकाशवान कर रहे है। बिहार से आने वाली ‘मालविका राज’ इस सूची में एक ऐसा नाम है जो अपनी कला में अंबेडकरवादी सोच के साथ स्थानीय लोककला के समन्वय से समकालीन कला में पदार्पण करती है। इनकी कार्यशैली में बिहार की मधुबनी क्षेत्रीय शैली का प्रभाव मुख्यरूप से दिखाई पड़ता है

  हालांकि अभी तक मधुबनी को पुस्तकों में लोक कला शैली में ही पहचान मिली है किन्तु मधुबनी कला के जाने-माने कलाकार अविनाश कर्ण ने इस शैली को लोक कला शैली कहने पर आपत्ति जताई है अत: इस विषय पर अभी टिप्पणी करना शीघ्रता होगी। मालविका ने अपनी पढ़ाई फैशन डिजाइन से पूर्ण की; यही कारण की इनकी कला में धैर्य और कारीगरी की कुशलता स्पष्ट दिखाई देती है। इन्होने मधुबनी शैली में सबसे अधिक कृष्ण से संबन्धित चित्र बनाए, किन्तु कुछ समय तक इन विषयों पर चित्रांकन करने के पश्चात वे बुद्ध के जीवन से संबन्धित चित्रों को मधुबनी शैली में पिरोने लगी। धीरे-धीरे बुद्ध से अंबेडकर और अंबेडकर से नारिवाद जैसे विषयों पर कार्य करना इनको संतोषजनक लगने लगा। वे कहती है, ‘मधुबनी का शाब्दिक अर्थ है शहद का वन! जो एक विशेष क्षेत्र को दर्शाता है। यह कला मधुबनी के आदिवासी समाज के प्रयासों से उपजी किन्तु अनेक कारणों से यहाँ की मुख्य धारा की कला प्रभावित हुई। धीरे-धीरे इस शैली में हिन्दू कथाओं के चित्रण की मात्रा बढ़ने लगी और वर्तमान समय तक इन कथाओं का प्रभाव स्पष्ट दिखाई भी देता है किन्तु मुझे इन विषयों की अपेक्षा अंबेडकरवादी विचारों को इस शैली में पिरोना ज्यादा प्रभावशाली लगता ओर ये ही मेरी पहचान है।’[vi] मालविका की सिद्धार्थ का जन्म, सुजाता, क्वांटम लीप और डॉ अंबेडकर एंड द बुद्धा नामक रचनाओं में अंबेडकर साहब के विचारों और बुद्ध दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इन्ही युवा कलाकारों की सूची में मनवीर सिंह गौतम किसी विशेष समाज पर थोपी गयी व्यवस्था पर कटाक्ष करते है जो इनकी रचनाओं में पूर्ण रूप से देखने को मिलता है। भारतीय समाज की एक रूढ़िवादी व्यवस्था जिसे चतुर्वर्ण्य व्यवस्था कहा जाता है जिसमें ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र में विभाजित किया गया था जिसे मनु ऋषि ने मनुस्मृति नामक पुस्तक में वर्णित किया था; इसमें ब्राह्मण पढ़ने लिखने और मुख्य सलाहकार का कार्य करते थे, क्षत्रिय राज-पाठ और युद्ध से संबन्धित क्रिया करते थे, वैश्य व्यापार करते थे और शूद्र केवल सेवा करने का उद्देश्य पूरा करते थे जिसमें खेती, लोहरी, कुम्हारी, जूता बनाने वाले, धोबी, नाई, मल-कचरा आदि साफ करने वाले सरीखे वर्ग के लोग आते थे। मनवीर भी इसी कुप्रथा से प्रताड़ित कलाकारों में से एक रहे है। इन्होने इस विशेष वर्ग पर थोपी गयी व्यवस्था को अपनी कला का प्रेरणा स्रोत समझा। मनवीर इसी वर्ग के लोगों को प्रोत्साहित करने का कार्य करते है। मनवीर को आज प्लास्टिक वाला नाम से संबोधित किया जाता है। ये खराब प्लास्टिक को कलाकृति में रूपांतरित करते है और इन कलाकृतियों में उन्ही विषयों तथा तत्वों को केन्द्रित करके सृजन किया गया है जो प्रकृति को शुद्ध करने का कार्य करते है जैसे कछवा, गिद्ध, पेड़-पौधे, चिड़िया, पत्तियाँ जंगली व पालतू पशु इत्यादि। मनवीर कछुए को अपना प्रिय जीव मानते है क्योंकि कछुआ पानी को शुद्ध करता है ये पानी की गंदगी को स्वयं खाकर पानी को स्वच्छ बनाते है इसे भारतीय संस्कृति में विष्णु का अवतार तथा माँ यमुना(यमुना नदी) का वाहक माना जाता है। इनकी कलाकृतियों में कछुआ और मनवीर स्वयं एक-दूजे के संपूरक प्रतीत होते है दोनों अपने कार्य अपने-अपने तरीके और सिद्धांतों पर कर रहे है। इसलिए मनवीर ने अपने माध्यम में प्लास्टिक को सर्वाधिक प्रयोग किया। ये कहते है कि ये लैन्डस्केप की सारी प्लास्टिक मेरे लैन्डस्केप में आ जाए तो प्राकृतिक दृश्य सुंदर हो जाएंगे। मनवीर का बचपन हरिद्वार में गंगा के किनारे बीता, गौतम की बचपन से ही गंगा नदी की सफाई में दिलचस्पी दिखाई देती थी और ये जिज्ञासा वर्तमान की रचनाओं में स्पष्ट दिखाई पड़ती है। मनवीर एक सामाजिक जागरूकता का संदेश देने का प्रयास कर रहे है जिसमें किसी समुदाय विशेष पर थोपा गया सफाई का कार्य तथा इसको एक सकारात्मक रूप से प्रस्तुत करके कलानिर्मिति करना मनवीर को विशिष्ट बनाता है। मनवीर दिल्ली के घरों से प्लास्टिक एकत्रित करते है जिसमें चार सौ से ज्यादा परिवार उनसे जुड़े है; जहां से प्लास्टिक एकत्रित करके आवश्यकता अनुसार अलग-अलग करके कलाकृतियों में चस्पा की जाती है। जब उनसे यह प्रश्न पूछा कि आपके कार्यों में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की समाज सुधारक विचारधारा कैसे दिखती है मनवीर कहते है, ‘मेरे जीवन में डॉ भीमराव अंबेडकर और मोहन दास करमचंद गांधी का बड़ा योगदान रहा है क्योंकि दोनों ही अपने-अपने स्तर से सुधारवादी कार्य कर रहे थे, दोनों के परिप्रेक्ष्य अलग अवश्य थे किन्तु लक्ष्य एक ही था। प्राकृतिक दृश्यों में गंदगी बहुत ज्यदा बढ़ गयी है तो मुझे उसका समाधान खोजना था, डॉ अंबेडकर ने हमारे समाज की समस्या का स्थायी समाधान निकाला था। मैं भी नॉन-रीसाईक्लेबल प्लास्टिक को अपने आर्टवर्क में प्रयोग करता हूँ जो कुछ हद तक पर्यावरण को प्लास्टिक से होने वाली क्षति का स्थायी समाधान है।’[vii] इनकी प्रमुख कलाकृतियों में सारे जहां में शोर है धरती अंत की और है, नॉलेज गिव्स यू विंग्स, लग जा गले, ये तेरा घर ये मेरा घर, इको वोरियर, बीरसिटी( Figure 7 ) (कोल्ड ड्रिंक्स ओर बीर की खाली कैन जो नदियों के किनारे से एकत्रित की गयी है) इत्यादि विशेष महत्व रखती है भारत के प्रत्येक कोने में अपने अस्तित्व की खोज की मुहीम दिखाई पड़ती है दिल्ली, मुम्बई, बड़ौदा, धनबाद, पटना इत्यादि के पश्चात आंध्रप्रदेश के मधुकर मुचारला चमड़े को परस्पर सीलकर महान शिक्षक ज्योतिबा फूले की मुखाकृति, डॉ भीमराव अंबेडकर (Figure 6) की मुखाकृति संश्लिष्ट करके दलित समाज के जीवन को सही ढंग से प्रस्तुत किया। मधुकर के परिवार तथा आस-पास के ज़्यादातर लोग चमड़े से संबन्धित श्रम करते थे, यह कार्य सामाजिक असमानता के कारण किसी विशेष जाति या समुदाय के लोगों पर थोपा गया था। इन समुदायों की कई पीढ़ी यही कार्य करती हुई चली गयी, जिसका प्रभाव आज भी देखने को मिलता है। मधुकर इसी पारिवारिक प्रष्ठभूमि से आते है। मधुकर इस विधा को सम्मान दिलाने के उद्देश्य से अपनी कलाकृतियों का मुख्य माध्यम चमड़ा ही स्वीकारते है किन्तु इस बार मधुकर अपने समाज का प्रतिनिधित्व एक कलाकार के रूप में करते है। चमड़े द्वारा बनाए गए डॉ अंबेडकर की मुखाकृति कोची बिनाले में प्रदर्शित हुई। प्रत्येक वर्ष मधुकर की कलाकृतियों भारतीय कला मेला दिल्ली में प्रदर्शित देख सकते है। मधुकर की कला की विशेषता अपने अस्तित्व के साथ खड़े होकर उसमें कलात्मक तत्व की खोज करना है साथ ही साथ एक ऐसे समाज का आदर्श बनना है जहां कला अमीरों के गलियारों तक सिमटी न रहकर उन लोगों को भी सम्मान देना है जो इस कार्य के कारण किसी समुदाय को हीन भावना का सामना कराते है। वे कहते है, ‘मैंने कुछ प्रयोग किए और पाया कि क्यों न मैं लेदर को अपनी कलकृति का माध्यम चुनु। मैं चाहता हूँ कि मेरी आवाज हमेशा दलीतों के हक़ के लिए उठे।’[viii] इस कड़ी में श्रुजन एन. श्रीधर, राही पुण्यशलोका जैसी कलाकार भी रही है जिन्होने अपनी डिजिटल कला के माध्यम से अपने अस्तित्व को पहचानने की कोशिश की। ऐसे असंख्य कलाकार है जो मानवाधिकार एवं समाज सुधारक तत्वों के साथ कलानिर्मिति कर रहे है किन्तु इनको वो प्रसिद्धि नही प्राप्त हो पा रही है जिसके ये हकदार है। वर्तमान की कला में ऐसे कलाकारों की अत्यंत आवश्यकता है जो भूत, वर्तमान और भविष्य की सही समझ रख कर कार्य करता हो जिसका परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक ही होगा।

निष्कर्ष : अस्तित्व का संघर्ष कभी न खतम होने वाला संघर्ष है क्योंकि पिछले दो हजार वर्षों से इन समुदायों का कोई अस्तित्व नही था। विशेष रूप से दलित वर्ग के साथ अधिक भेद-भाव हुआ। आज इन समुदायों की स्थिति आंशिक रूप से तो सही हुई किन्तु वास्तविक रूप में नही, जितने भी कलाकार हुए उन्होने समस्याओं को तो उजागर किया किन्तु समाधान पर कोई विशेष कार्य दिखाई नही दिया, कुछ कलाकारों ने अपनी कलाकृतियों की बिक्री का कुछ भाग उन लोगो के सुधार हेतु व्यय भी किया परंतु परिणाम संतोष जनक नही दिखाई दिये। मनवीर ऐसे कलाकार है जिनकी रचनाओं में समाधान के कई बिन्दुओं पर कार्य किया गया है। ऐसे ही समस्त कलाकारों को वैज्ञानिक प्रक्रिया के द्वारा सभी समस्याओं के निवारण पर कार्य करने की आवश्यकता है। इस गरीबी और बेरोजगारी का जटिल प्रभाव नव-युवा कलाकार भी झेल रहे है क्या इन कलाकारों के विषय में नही सोचना चाहिए? कभी-कभी प्रतीत होता है कि ये बड़े कलाकार केवल राजनेताओं के समान गरीबी के चूल्हे पर अपनी रोटियाँ सेक रहे है; जमीनी क्षेत्र पर इसका प्रभाव नाम मात्र है। आज भी इन युवा कलाकरों को उतना नाम नही मिल रहा है जिसके ये हकदार है। इन कलाकारों का समकालीन कला में बहुत बड़ा योगदान है किन्तु इनका योगदान केवल दलित आर्ट या अंबेडकरवाद कहकर संकुचित कर दिया जाता है। बिरेन्द्र यादव की कलाकृतियों में समस्या के साथ समाधान भी दिखना चाहिए। गिरजेश ने भी कुछ हद तक समाधान कि परिकल्पना पर कार्य किया है किन्तु ये पर्याप्त नही है। आज दो हजार वर्षो के बाद भी समाधान लक्ष्य के दरवाजे तक नही पहुंचा है। इस विषय पर पर्याप्त कार्य करने की अवशयालता है।

सन्दर्भ :
[i] Alone, Y.S. Caste Life Narratives, Visual Representation, and Protected Ignorance. 2017. Biography 40(1), 140-169. https://dx.doi.org/10.1353/bio.2017.0007.
[ii] Dilnawaz pasha. Hathras 'Gangrape': Yogi Adityanath said, the culprits should get the harshest punishment. 2020. BBC India Accessed 7th June 2025. https://www.bbc.com/hindi/india-54337132.amp
[iii] Tata, Huzan. Indian heart in art inyernational, “verve magazine”3 September 2015. Link-https://www.vervemagazine.in/arts-and-culture/art-international-fair-istanbul-india-highlights#26586-art-intl-istanbul/26592
[iv] Nair, Shraddha. Art voices matters: bakeryprasad a.k.a Siddhesh Gautam on dalit movement. Stirworld.com. 17 may 2021. Link - https://www.stirworld.com/see-features-art-voices-matter-bakeryprasad-a-k-a-siddhesh-gautam-on-the-dalit-movement
[v] Birendra kumar Yadav, Artist in residence at the Rote fabric from-03-07-2019 to 28-09-2019. Link- https://rotefabrik.ch/de/akteure/artists-in-residence/air-overview/birender-kumar-yadav/#/
[vi] Alagarsamy, hamshadhwani. In conversation with malvikaraj: Dalit Madhubani Artist, feminismindia.com, 22 jan 2019. Accessed: 10-06-2025 time-2:28 AM. Link- https://feminisminindia.com/2019/01/22/malvika-raj-dalit-madhubani-artist/
[vii] Kheriwal adesh, interview of plastic wala: manveer singh gautam. 19-06-2025 time: 8:30.
[viii] Neerja murthy, Madhukar mucharla and jayeeta chatarjee expanding their definition of art. The Hindu. 23 December 2021. Accessed- 18-06-2025. 10:42. Link-https://www.thehindu.com/entertainment/art/madhukar-mucharla-and-jayeeta-chatterjee-at-banyan-hearts-studios-bhs-expand-definitions-of-art/article37995754.

आदेश खेरीवाल

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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