तकनीक के परिप्रेक्ष्य में स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी रंगमंच
- राणा प्रताप यादव
शोध-सार : ‘तकनीक’ का प्रयोग यूँ तो लगभग हर दौर में होता रहा है, लेकिन विशेष रूप से आजादी के बाद जिसको समकालीन दौर कहते हैं। अर्थात् लगभग 70 के दशक के बाद ‘तकनीक’ शब्द का ज्यादा इस्तेमाल हुआ एवं तकनीक का हर जगह, हर क्षेत्र में प्रयोग भी अधिक हुआ। स्वातंत्र्योत्तर काल में तकनीक के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी रंगमंच पर विस्तृत फलक पर व्यापक बदलाव देखने को मिलते हैं। जिसके चलते नाट्य मंचन के क्षेत्र में वर्षों का संघर्ष ख़त्म हो गया है। एक नवीन प्रकार के कथ्य, शिल्प और संवेदना का विकास हुआ है। इन सभी विषयों के आलोक में यह शोध-आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है। शोध की ऐतिहासिक पद्धति, तुलनात्मक पद्धति तथा विश्लेष्णात्मक पद्धति के आधार पर इस आलेख को पूर्ण किया गया है।
बीज शब्द : रंग-तकनीक, हिन्दी रंगमंच, रंगोपकरण, प्रकाश संयोजन, ध्वनि-संयोजन, गगानिका, साइक्लोरामा, लाइट्स, मंदक, स्वातंत्र्योत्तर।
मूल आलेख : नाटक और रंगमंच का एक दूसरे से गहरा संबंध है। नाटक कलाओं का पूंज है और रंगमंच के बिना अधूरा है। रंगमंच और नाटक का एक पर्याय ‘रंग’ भी है। रंग से तात्पर्य नाट्यकर्म से है और रंग-तकनीक अर्थात् नाटक में, रंगमंच में प्रयुक्त होने वाली तकनीक को रंग-तकनीक कहा जाता है। रंग-तकनीक के विषय में देवेन्द्र राज अंकुर लिखते हैं- ‘‘रंगमंच के आरंभ से ही तकनीक रंगमंच का एक जरूरी हिस्सा रही है। यदि हम रंगमंच के मूल तत्त्वों की बात करें तो उसमें आलेख, अभिनेता, स्पेस, रंग-तकनीक जिसमें मंच सज्जा, रूप सज्जा, वेशभूषा, उपकरण, रंग संगीत और अंततः दर्शक ये रंगमंच का रूप तैयार करते हैं। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण चौथा तत्त्वतकनीक है। वह रंग-तकनीक के रूप में सामने आता है।’’2 कलाओं में नवीनीकरण के लिए तथा दर्शक, श्रोता या पाठक को प्रभावित करने के लिए तकनीक का प्रयोग होता रहा है। नाटक और रंगमंच भी उससे अछूता नहीं है। आज के दौर मे रंग-तकनीक के प्रभाव को व्यक्त करते हुए देवेन्द्र राज अंकुर कहते हैं कि ‘‘यह एक ऐसा दौर है जो बहुत ही आकर्षक और मोहक रंगमंच को पैदा करने में सफल रहा और तकनीक ने रंगमंच की अपनी मोहक प्रस्तुति में अपना ज्यादा-से-ज्यादा योगदान दिया।”3 आगे वे लिखते हैं, “70 से लेकर 90 तक यदि लोकमंच का दौर था तो 90 से लेकर आज तक का जो रंगमंच है उसमें नई रंग-तकनीक की उपस्थिति हम पाते हैं।’’4 स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी रंगमंच के विकास के सन्दर्भ में जयदेव तनेजा के शब्दों में कहें तो “भारतीय रंगकर्म के विकास में छठा दशक कई कारणों से बहुत ही समृद्ध और महत्वपूर्ण कालों में से एक माना जाएगा। सबसे स्पष्ट और सबसे प्रमुख कारण यही है कि इन वर्षों में रंगकला की अनुषंगी शाखाओं- नाट्य लेखन, अभिनय, निर्देशन, मंच-परिकल्पना एवं प्रकाश व्यवस्था में विशिष्ट प्रतिभाओं के जरिए प्रौढ़ता प्राप्त कर ली। यह व्यापक उत्कर्ष आकस्मिक नहीं था, क्योंकि इसके पीछे धीमे लेकिन दृढ़ और समर्पित प्रयत्न के 10-15 वर्ष हैं।”5 समकालीन दौर में रंगमंचीय तकनीक के साथ-साथ नाटक के शिल्प और संवेदना में भी परिवर्तन आए हैं। नए ढंग के रंग-तकनीक ने रंगकर्मियों की सृजनशीलता को सफल बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। इस शोध-आलेख में हिन्दी रंगमंच में प्रयुक्त रंग-युक्तियों के प्रयोग व महत्व का विश्लेषण करेंगे।
रंगमंच पर प्रकाश-संयोजन का विशेष महत्त्व है। स्वतंत्रता के पूर्व नाटक अक्सर रात में ही खेले जाते थे और पूरे रंगमंच पर एक जैसी रोशनी फैली रहती थी। उस समय इतने साधन और प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं थे। धीरे-धीरे रंगमंच पर बिजली के उपकरणों का उपयोग होने लगा इससे नाटकों के प्रदर्शन अधिक प्रभावी ढंग से होने लगे। इस संदर्भ में रीतारानी पालीवाल अपनी पुस्तक ‘रंगमंच: नया परिदृश्य’ में लिखती हैं- “सत्रहवीं-अट्ठारहवीं सदी में मोमबत्ती तथा वैलदीप के प्रचलन का प्रसार हुआ। 1763 में लैम्प का आविष्कार होने पर मिट्टी के तेल तथा कैंफाइन (शुद्ध किया हुआ तारपीन तेल) का प्रयोग किया गया। परंतु पूरे ऑडिटोरियम में समान प्रकाश व्यवस्था थी। अभिनेता तथा प्रेक्षक समान प्रकाश में होते थे। आगे चलकर 19वीं सदी के आरंभ में गैस के प्रकाश की व्यवस्था हुई। जिससे एक ही स्थान से पूरे रंगमंच के प्रकाश का नियंत्रण संभव हो सका।”5 इस विषय को लेकर रीतारानी पालीवाल ने विस्तृत अध्ययन किया और पाया कि “लंदन के ‘लिसियम थिएटर’ तथा अमेरिका के ‘बोस्टन थिएटर’ में यह प्रयोग सर्वप्रथम आरंभ हुए। तत्पश्चात् विद्युत्त प्रकाश के आविष्कार ने तो रंगदीपन के क्षेत्र में क्रांति ही ला दी। अब नवीन प्रकार के अभिनेता-प्रेक्षक-संबंध विकसित हुए, क्योंकि रंगमंच तथा प्रेक्षागृह की प्रकाश-व्यवस्था में अब अंतर आ गया। तीव्र प्रकाशित मंच तथा मंद प्रकाश अथवा पूर्ण अंधेरे प्रेक्षक-स्थल में बैठा प्रेक्षक केवल दर्शक था। अब आरंभिक युग से शेक्सपियर के समय तक चली आने वाली दर्शक अभिनेता के बीच की निकटता समाप्त हो गयी।”6 इस प्रकार रंगमंच पर बिजली के प्रबंधन ने भी प्रकाश-व्यवस्था में नए अवसर पैदा किए हैं। रंगमंच पर प्रकाश-व्यवस्था के लिए विशेष प्रकार की बत्तियों और उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें साइक्लोरामा (गगनिका), फ़्लड लाइट्स, फूट लाइट्स, स्ट्रिप लाइट्स, स्पॉट लाइट्स, मंदक, सेम्वाइलोफ प्रभाव, कंट्रोल बोर्ड आदि उल्लेखनीय है। इन प्रकाश-युक्तियों द्वारा अभिनेता दृश्यबंध, उपकरण, वेशभूषा इत्यादि को सिर्फ दिखाते ही नहीं, बल्कि एक विशेष व प्रभावी तरीके से दिखाते हैं। अब दर्शकों को प्रकाश के रंग, मात्रा और दिशा को नियंत्रित करके अभिनय दिखाए जाते हैं और प्राकृतिक सत्य का भाव प्रदान किया जाता है। दर्शकों को अनुभूति की दृष्टि से अभिनेताओं की कोशिशों के साथ एक विशिष्ट रस निष्पत्ति की ओर ले जाते हैं। रीतारानी पालीवाल के अनुसार- “प्रकाश व्यवस्था के माध्यम से दृश्यात्मक रूप में चाक्षुष संरचना तथा देशकाल एवं घटना-स्थल को व्यंजित करने में सहायता ली जाती है। प्रकाश-व्यवस्था का प्रयोजन दृश्यबंध का सर्जन है। उसके द्वारा घटना स्थल, संरचना एवं मनोभाव (मूड) की सृष्टि के साथ ही नाटकीय शैली तत्त्व का व्यक्तीकरण किया जाता है।”7 ‘अंधा युग’ के परिप्रेक्ष्य में प्रकाश संयोजन के महत्त्व को रेखांकित करते हुए प्रो. कुसुमलता मलिक लिखती हैं- “प्रकाश नियोजन की अति विकसित प्रणाली के कारण मानव के अवचेतन मन में लुके-छिपे, दबे पड़े भावों को मंच पर प्रत्यक्षतः रूपायित कर पाना संभव हो पाया है। ‘अंधा युग’ के संदर्भ में अश्वत्थामा की पाश्विकता, गांधारी का आक्रोश, कृष्ण का विराटत्व, संजय की तटस्थता की पीड़ा आदि को तापस सेन, पीरू गुलाम, जी. एन. दास गुप्ता इत्यादि सुप्रसिद्ध छायांकनकारों ने बहुत ही कौशल के साथ चित्रित किया था। मंच पर किस वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्य पर प्रेक्षक को केन्द्रित करना है तथा उसके कौन-से अर्थ उभारने है, उन अर्थों को किस कोण से प्रेक्षक को संप्रेषित करना है, प्रकाश की रेखाओं के माध्यम से, प्रकाश के रंगों के द्वारा तकनीकी कौशल से अभिव्यक्त करना प्रकाश योजना का अपरिहार्य हिस्सा है।”8
गगनिका या साइक्लोरामा आखिरी दीवार के समान पीछे होता है। यवनिका के पास या प्रेक्षागृह से प्रकाश डाला जाए तो पूरे अभिनय क्षेत्र को पार कर प्रकाश गगनिका पर पड़ता है। वीरेंद्र नारायण के अनुसार- “गगनिका या साइक्लोरामा पर प्रकाश डालने के लिए ऊपर से सैलाबी बत्ती या फ्लड लाइट की कतार लटकाई जाती है ।”9 इसका का रंग प्रायः सफ़ेद होता है। इसमें 1000 वॉट का प्रोजेक्टर काम में लाया जाता है। उसमें जो भी चित्र लगाया जाता है, उसकी बड़ी छाया पीछे की दीवार पर पड़ती हैं। इस मशीन में एक स्लाइड होती है, जहाँ मनचाहे डिजाइन डाले जा सकते हैं। इसमें बादल (स्थिर और चलते हुए), नदी की तरंगे, आग की लपटें, मकान के हिस्से, फुलवारी आदि के कई स्लाइड आवश्यकता अनुसार डाले जा सकते हैं। चलते-फिरते प्रभाव को प्राप्त करने के लिए विशिष्ट प्रोजेक्टर का उपयोग किया जाता है; जिसमें एक मोटर के सहारे एक रील चलती है और बादल आदि पर्दे पर चलते हुए दिखाई देते हैं। सन् 2016 में श्रीराम सेंटर में ‘क्षितिज’ नाट्य दल द्वारा ‘अंधा युग’ के प्रदर्शन में इसका उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया गया। साइक्लोरामा के बारे में मंच अभिकल्पक और प्रकाश संयोजक के तौर पर काम कर चुके निर्देशक शशांक जी ने बताया कि “साइक्लोरामा पर इफैक्ट दिखाने के लिए जनरल लाइट की प्रकाश को कम करना पड़ता है। एक नाटक है ‘हमारे राम’ उसमें एलइडी पैनल का इस्तेमाल किया गया। एलइडी पैनल को कंप्यूटर पर सेट कर दिया जाता है। इस पैनल का विंग में इस्तेमाल किया जाता है और इस पैनल के जरिए 3D इफेक्ट भी डाला जा सकता है। हाल ही में मैंने ‘हमारे राम’ नाटक देखा था उसने आशुतोष राणा ने रावण का किरदार निभाया, उसमें आशुतोष राणा जी आगे मंच पर खड़े हैं और उनके जो दस सिर हैं, वह एलइडी पैनल के जरिये निर्मित किया गया। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कि आशुतोष राणा के ही दस सिर लगे हुए हैं और वह कॉम्पैक्ट होकर वापस जुड़ गए।”10
आजकल मंच पर फॉग छोड़ने के लिए फॉग मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। 6 अक्टूबर 2023 को रमा पांडे के निर्देशन में श्रीराम सेंटर में ‘साईस्ता बेगम’ की प्रस्तुति में नृत्य-गान वाले दृश्य में रंग-बिरंगे रोशनी के मिश्रण के साथ इसका बहुत ही कलात्मक प्रयोग किया गया।
फ़्लड लाइट्स से किसी दृश्य को हृदयगम बनाने में सहायता मिलती है। सैलाबी बत्तियों से जो भी प्रकाश निकलता है वह समग्रता में फैलता है बल्ब के ठीक पीछे उचित आकार और माप का आईना (रिफ्लेक्टर) लगा होता है, जो इसके फैलाव को नियंत्रित करता है। रंगों को नियंत्रित करने के लिए इसके सामने एक खाँचा बना होता है, जिस पर फ्रेम में लगा रंगीन फिल्टर लगा रहता है। फ्लड लाइट्स के तीन भाग हैं- बल्ब, आईना और फिल्टर फ्रेम। वीरेंद्र नारायण लिखते हैं, “इनका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग है गगानिका या साईंक्लोरामा का प्रकाश ।”11
स्ट्रिप लाइट के बारे में प्रकाश संयोजक के तौर पर कार्य कर चुके क्रिएटिव आर्ट ग्रुप के निर्देशक शशांक जी से मेरी एक वार्ता में वे बताते हैं कि “मंच पर किसी भी प्रकार के इफेक्ट देने के लिए स्ट्रिप लाइट का इस्तेमाल करते हैं। मान लीजिए कि मंच पर टेबल है और टेबल को हाईलाइट करना है, तो टेबल के चारों ओर स्ट्रिप लाइट लगाकर टेबल को हाईलाइट किया जा सकता है।”12
फूट लाइट्स अक्सर प्रेक्षागृह में लगाए जाते हैं। यह दर्शकों को अंधेरे में भी मार्ग दिखाने में सहायक होते हैं। इसमें बहुत कम वॉट के बल्बों का उपयोग होता है।
स्पॉट लाइट्स के द्वारा निश्चित क्षेत्र में साधारण प्रकाश फैलाया जाता है। स्पॉट लाइट्स दो प्रकार के होते हैं- छोटी स्पॉट लाइट और बड़ी स्पॉट लाइट। बेबी स्पॉट लाइट को छोटे लेंस की आवश्यकता होती है। इस तरह की स्पॉट लाइट्स झालरों के पीछे लटकाई जाती है और गगनिका के पास या रंगमंच के पीछे पिछले वृत्तों पर यह प्रकाश डालती है। सितंबर 2013 में श्रीराम सेंटर में ‘आधे-अधूरे’ नाटक का मंचन हुआ, जिसका निर्देशन भारती शर्मा ने किया। इसके पहले अंक में स्पॉट लाइट पूरे मंच का चक्कर लगती है और काले शूट वाले व्यक्ति (पात्र) पर आकार थम जाती है तथा एकालाप करने तक स्पॉट लाईट का फोकस उस पर ही बना रहता है।
मंदक भी एक प्रकार का प्रकाश उपकरण है। यह प्रकाश की मात्रा को कम या अधिक करता है। इसके दो प्रकार से उपयोग में लाया जाता है- धीरे-धीरे प्रकाश को कम करना या मंच पर धीरे-धीरे प्रकाश डालना। “मंदक का दूसरा और बड़ा ही प्रमुख उपयोग है- विभिन्न प्रकाश यंत्रों से पड़ने वाले प्रकाश को रंगमंच पर समन्वित करना ।”13
वैज्ञानिक उपलब्धियों तथा विद्युत-यंत्रो की व्यवस्था के साथ ही आज के नाट्य प्रदर्शनों में ध्वनि प्रभावों का विशेष महत्व है। व्यावसायिक रंगशालाओं में इसके लिए बड़े-बड़े उपकरणों की सहायता ली जाती है। ध्वनि संकेत के प्राचीन साधन- कंठ, हाथ-पैर तथा वाद्ययंत्र थे। कुछ प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति अपने कंठ से अनेक ध्वनियाँ प्रस्तुत कर प्रेक्षक को सत्याभास कराते थे। किन्तु आज वैज्ञानिक संसाधनों की सहायता से मूल ध्वनियों को यथातथ्य रूप में सुनाया जाता है। टेप रिकॉर्डर का प्रयोग इस संदर्भ में बहुत उपयोगी है। वांछित प्रभाव को पहले ही टेप पर अंकित कर लिया जाता है, फिर नाट्य मंचन के समय उसका प्रयोग किया जाता है। ट्रांस्क्रिप्शन का प्रयोग भी ध्वनि संयोजन के लिए किया जाता है, जो प्रायः धीमी गति से घूमता है और आवाज उत्पन्न करता है। लंबे ध्वनि संकेत यथा- लगातार वृष्टि, गर्जन आदि प्रस्तुत करने के लिए इसका प्रयोग होता है।
रंगमंच में ध्वनि-संयोजन बहुत महत्त्वपूर्ण है। “जिस तरह अभिनेता की शारीरिक उपस्थिति के लिए दृश्यबंध की आवश्यकता होती है उसी प्रकार उसकी उच्चरित पंक्ति के लिए अथवा उसके मौन के लिए या क्रियाकलाप के लिए ध्वनि-प्रभाव का उपयोग किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि दृश्यबंध और ध्वनि-प्रभाव एक ही कार्य करते हैं, सिर्फ उनके धरातल दो होते हैं। एक का लक्ष्य दर्शकों की आँख होती है तो दूसरे का दर्शकों के कान।”14 रात के अँधेरे में ध्वनि प्रभावों का संयोजन कई प्रकार का हो सकता है। उल्लू की चीख-पुकार, कुत्ते की रोने की आवाज आदि हत्या या षड्यंत्र का चित्रण करता है। अगर दो प्रेमी युगल रात के अँधेरे में मिल रहे हैं, तो पृष्ठभूमि में बच्चे के रोने की आवाज अथवा इस तरह के सुखद ध्वनि की अभिव्यक्ति होगी। ध्वनि प्रभाव की अभिव्यक्ति पर हमारा ध्यान आसानी से जाता है और दृश्यबंध की बारीकियों को साधारण दृष्टि चाहे ना भी समझे ध्वनि प्रभाव की छोटी-सी भूल भी उसे असहज कर सकती है। 2016 ईस्वी में श्रीराम सेंटर में ‘क्षितिज’ नाट्य दल द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘अंधा युग’ को देखा जा सकता है। इसके पहले अंक में युद्ध की भयावह स्थिति को पूरे मंच पर लाल रोशनी, गगनिका पर चमकते आसमान का दृश्य, दोनों प्रहरी के बात करते समय अचानक से नगाड़े की आवाज और पार्श्व में चील-कौओं की आवाज आदि ने युद्ध की भयावहता को और अधिक गहरा कर दिया। त्रिपुरारी शर्मा लिखित और निर्देशित नाटक ‘शायर...शटर डाउन’ का फरवरी 2018 को श्रीराम सेंटर में मंचन हुआ, इस एकल नाटक में उस व्यक्ति का चित्रण है जो दिन भर दफ़्तर में काम करता है और किसी महानगर में अपने एकाकीपन को जीता है। दफ़्तर से आने के बाद घर में अकेले अपने-आप से बातें करता है। कम्प्युटर की की-बोर्ड से आने वाली खट-खट-खट की आवाज और डेस्कटॉप पर दिखाई देने वाले अंक उसके दिमाग में गूँजता रहता है, जिसे निर्देशक ने प्रकाश और ध्वनि-संयोजन के माध्यम से मंच पर दृश्य रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रकार व्यक्ति के मन में भी चल रही चीजों को दृश्यव्य बना दिया गया। वास्तव में, यह एक अद्भुत प्रयोग हैं।
ध्वनि संयोजक शशांक जी के साथ एक संवाद के दौरान मेरे पूछने पर कि ‘ध्वनि-संयोजन के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? क्या ध्वनि प्रभाव तत्काल प्रभाव से ही उत्पन्न किया जाता है या इसे पहले से ही रिकॉर्ड आदि करके रखा जाता है?’ इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि “हमारे पास दोनों ही तरीके उपलब्ध होते हैं। जैसे कि हम फोन से भी किसी प्रकार के इफेक्ट को डाउनलोड कर सकते हैं और नाटक में प्रस्तुत कर सकते हैं। नाटक में जिस ध्वनि प्रभाव की जरूरत है, आजकल उसको स्टूडियो से भी रिकॉर्ड करवा लिया जाता है। आपने लाइव म्यूजिक के बारे में सुना होगा। हम लोग ‘एक था गधा उर्फ़ अलादात खां’ नाटक कर रहे थे, तो उसमें हमने लाइव म्यूजिक का इस्तेमाल किया था। इसका मतलब होता है कि जब हम नाटक कर रहे होते हैं तो उसे नाटक के बीच-बीच में सिचुएशन के अकॉर्डिंग आवाज दी जाती है। मान लीजिए मंच पर कोई व्यक्ति भागता हुआ आया तो तबले पर धम-धम-धम की आवाज दे सकते हैं। ‘हमारे राम’ नाटक में मैंने देखा कि कैसियो की ‘की’ पर हर तरह की आवाज को सेट कर रखा था। किसी बटन पर दहाड़ की आवाज सेट थी, किसी बटन पर बादल की गर्जना की आवाज सेट थी तो किसी बटन पर चील-कौवों की आवाज सेट थी।”15
समग्रतः तकनीक के परिप्रेक्ष्य में स्वतंत्रता-पूर्व हिंदी रंगकर्म अविकसित ही रही। स्वतंत्रता-पूर्व नाटकों के मंचन में यदि किसी गाड़ी, बाघ या अन्य विशाल वस्तु का जिक्र हो, तो मंच पर उसे असल में प्रस्तुत किया जाता था। जिसके कारण कई नाटकों के मंचन कठिन हो जाते थे। परंतु समकालीन रंगमंच पर गगनिका व प्रॉजेक्टर पर इन दृश्यों को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। उगते हुए सूरज, चाँद, तारे, जंगल, पर्वत, नदी, झरने आदि के दृश्यों को मनोरम तरीके से प्रस्तुत करना संभव हो गया है। पहले ध्वनि-संयोजन के लिए कुछ प्राचीन साधनों का उपयोग होता था। जैसे- बिजली कड़कने की आवाज टीन की चादर से, बादलों की गड़गड़ाहट प्लाई की चादर से, घोड़े की टाप की आवाज नारियल के खोल को आपस में टकराकर, हवाई जहाज की आवाज माइक्रोफोन को धीरे-धीरे बिजली के पंखे के निकट ले जाने से, गोली चलने की आवाज बम पटाखे फोड़ कर प्राप्त की जाती थी। लेकिन स्वातंत्र्योत्तर काल के आविष्कारों की वजह से ध्वनि-संयोजन में भी युगांतर बदलाव देखने को मिलता है। अब विभिन्न प्रकार के रिकॉर्डर के जरिए ध्वनि प्रभाव को बड़ी गहनता के साथ प्रस्तुत किया जाने लगा है। प्रकाश-संयोजन हेतु पूर्व में क्रमशः मशाल, दीये, मोमबत्ती, गैस लाइट आदि से रंगमंच पर रोशनी दी जाती थी। कालांतर में बिजली के आगमन से इन प्रकाश स्रोतों का स्थान बल्ब ने ले लिया। इससे प्रकाश नियोजन का कार्य सरल हुआ। स्वातंत्र्योत्तर काल में अनेक प्रकार के रंगोपकरणों का आविष्कार हुआ और वर्षों का संघर्ष ही खत्म हो गया। इन उपकरणों में साइक्लोरामा, फ्लड लाइट, फुट लाइट, स्ट्रीप लाइट, फॉग मशीन, आकाश गुंबद, स्पॉट लाइट, मंदक, कंट्रोल बोर्ड आदि शामिल हैं। इन उपकरणों के माध्यम से दिन हो या चाँदनी रात, उगते हुए सूरज की लालिमा, शाम की बेला, बर्फ से ढके पर्वत, सुख अथवा दुःख के क्षण सभी को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जाने लगा, जोकि दर्शक के भाव को अधिक गहन कर देता है।
संदर्भ :
- देवेन्द्रराज अंकुर : पहला रंग, राजकमल प्रकाशन, संस्करण- 2013, पृष्ठ संख्या- 43
- वही, पृष्ठ संख्या- 96
- वही, पृष्ठ संख्या- 96
- रीतरानी पालीवाल : रंगमंच : नया परिदृश्य, वाणी प्रकाशन, संस्करण- 2018, पृष्ठ संख्या- 64
- डॉ. जयदेव तनेजा : आधुनिक भारतीय रंग परिदृश्य, तक्षशिला प्रकाशन, संस्करण-1992, पृष्ठ सं- 17
- रीतरानी पालीवाल : रंगमंच : नया परिदृश्य, वाणी प्रकाशन, संस्करण- 2018, पृष्ठ संख्या- 64
- वही, पृष्ठ संख्या- 64
- प्रो. कुसुमलता मलिक : स्वातंत्र्योत्तर पारंपरिक रंग-प्रयोग, इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स, संस्करण- 2009, पृष्ठ सं- 236
- वीरेन्द्र नारायण : रंगकर्म, आलेख प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 1979, पृष्ठ संख्या- 92
- शशांक जी से एक संवाद, दिनाँक- 13-08-2024
- वीरेन्द्र नारायण : रंगकर्म, आलेख प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 1979, पृष्ठ संख्या- 96
- शशांक जी से एक संवाद, दिनाँक- 13-08-2024
- वीरेन्द्र नारायण : रंगकर्म, आलेख प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 1979, पृष्ठ संख्या- 108
- वही, पृष्ठ संख्या- 122
- शशांक जी से एक संवाद, दिनाँक- 13-08-2024
चित्रों के स्रोत-
प्रथम चित्र- अभिमंच सभागार, एनएसडी में 15 दिसम्बर 2023 को रॉबिन दास द्वारा निर्देशित नाटक ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’।
द्वितीय चित्र- श्रीराम सेंटर में 6 अक्तूबर 2023 को रमा पांडे द्वारा निर्देशित नाटक ‘शाइस्ता बेगम’ ।
तृतीय चित्र- श्रीराम सेंटर में फरवरी 2018 को त्रिपुरारी शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक ‘शायर...शटर डाउन’।
राणा प्रताप यादव
शोधार्थी, आईसीएसएसआर प्रोजेक्ट, खसरा न. 8\24, गली न.- 21, सी-ब्लॉक, कमाल पुर, बुराड़ी, दिल्ली- 110084
9560212338, ranapratap9222@gmail.com
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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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