हिन्दवी यूट्यूब चैनल और 'संगत' कार्यक्रम
- सुप्रिया दुबे
यह कार्यक्रम हिन्दी के वरिष्ठ और समकालीन रचनाकारों के साथ गहन बातचीत के रूप में निर्मित है। हर एपिसोड में किसी एक साहित्यकार से संवाद किया जाता है, जिसमें वे अपनी लेखन-यात्रा, सामाजिक दृष्टि, जीवन-अनुभव, और साहित्यिक चिंतन पर खुलकर बात करते हैं। यह केवल एक साहित्यिक श्रृंखला नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ है, जो हिन्दी साहित्य की समकालीन परंपरा को दृश्य-श्रव्य रूप में संरक्षित करता है और हिन्दी लेखकों के विचार, अनुभव और रचनात्मकता को नयी पीढ़ी तक पहुँचाने का सेतु बना है।इसके माध्यम से हिन्दी साहित्य को डिजिटल युग में नया पाठक-वर्ग और नई दर्शक-संवेदना मिली है।कार्यक्रम के संचालक अंजुम शर्मा हैं, जिनकी सहज संवाद शैली ने इस श्रृंखला को दर्शकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली बना दिया है। ‘संगत’ के माध्यम से हिंदी साहित्यकारों की वे पुस्तकें जो किसी कारणवश अपने समय में चर्चा में नहीं आ सकीं वे रचनाएँ न केवल दर्शकों तक पहुंची हीं, बल्कि उन्हें विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है।इस प्रकार, ‘संगत’ हिंदी साहित्य-संस्कृति के संरक्षण, प्रचार और शिक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली मंच बन कर सामने आया है। इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य हिंदी साहित्य के विविध और गूढ़ पहलुओं को संवाद के माध्यम से व्यापक जनसम्मुख तक लाना
बीज शब्द : संवाद-श्रृंखला, हिन्दी साहित्य, हिन्दवी यूट्यूब चैनल, अंजुम शर्मा, रचनात्मक यात्रा, सांस्कृतिक दस्तावेज़, डिजिटल युग, साहित्य-संरक्षण, लोकप्रियता, और शिक्षण-पाठ्यक्रम
मूल आलेख : वर्तमान डिजिटल युग में जब साहित्य की पारंपरिक विधाएँ नए माध्यमों में रूपांतरित हो रही हैं, ऐसे समय में हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण, प्रसार और पुनर्परिचय के लिए ‘संगत’ जैसा कार्यक्रम एक ऐतिहासिक और अभिनव पहल के रूप में उभर कर सामने आया है। ‘संगत’, जिसे “हिन्दवी” यूट्यूब चैनल द्वारा दिसंबर 2022 में प्रारंभ किया गया, हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह कार्यक्रम साहित्यिक संवाद की परंपरा को एक नए डिजिटल आयाम में प्रस्तुत करता है, जहाँ साहित्य के साथ-साथ साहित्यकार का व्यक्तित्व भी केंद्र में आता है। कुछ ही वर्षों में यह कार्यक्रम अपने सौ एपिसोडों की एक ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर चुका है। जो हिन्दी साहित्य के दृश्य-श्रव्य संवाद विधा की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुआ है।‘संगत’ में अब तक शामिल साहित्यकारों में आलोकधन्वा, गगन गिल, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अशोक वाजपेयी, मृदुला गर्ग, नरेश सक्सेना, अनामिका, ममता कालिया, लीलाधर जगूड़ी, कमलाकांत त्रिपाठी, अलका सरावगी,गीत चतुर्वेदी, मधु कांकरिया, असग़र वजाहत,अब्दुल बिस्मिल्लाह, राजेश जोशी,सुशीला टाकभौरे, लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप, ज्ञान चतुर्वेदी, मालती जोशी, सुधीश पचौरी, प्रियदर्शन, रामदरश मिश्र, श्यौराज सिंह बेचैन,निर्मला पुतुल, कुमार अम्बुज, काशीनाथ सिंह,व्योमेश शुक्ल और ज्ञानरंजन आदि सहित अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार शामिल हो चुके हैं।इस कार्यक्रम के माध्यम से वरिष्ठ साहित्यकारों के जीवनकालीन अनुभव, रचनात्मक संघर्ष और उनकी वैचारिक दृष्टि दर्ज हो पाई है, जो अन्यथा लुप्त हो सकती थी।यह हिन्दी साहित्य के श्रोताओं के लिए ही नहीं बल्कि शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए भी एक सांस्कृतिक और शैक्षिक स्रोत के रूप में स्थापित हुआ है।
‘संगत’ ऐतिहासिक यात्रा का नवीनतम पड़ाव -
हिन्दी साहित्य का इतिहास केवल रचनाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि वह संवादों, विचार-विमर्शों और वैचारिक टकरावों का भी इतिहास रहा है। साहित्य की परंपरा में संवाद वह विधा है, जिसने न केवल रचना और रचनाकार के बीच सेतु का कार्य किया, बल्कि पाठक और लेखक के बीच समझ का भी आधार तैयार किया। प्रारंभिक दौर में यह संवाद मौखिक परंपराओं, गोष्ठियों और पत्राचार के रूप में सामने आया। स्वतंत्रता के बाद हिन्दी साहित्य में संवाद-विधा को नयी दिशा देने वाले मंचों में ‘हंस’, ‘कल्पना’, ‘सारिका’ और बाद के दौर में ‘कथादेश’ जैसी पत्रिकाएँ प्रमुख रहीं। इन पत्रिकाओं ने रचनाकारों और पाठकों के बीच एक वैचारिक संवाद-संस्कृति का निर्माण किया। विशेष रूप से ‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ आंदोलनों के समय हुए संवादों ने साहित्यिक विमर्श को गहराई दी। इन साक्षात्कारों और चर्चाओं के माध्यम से रचनाकारों की लेखन-दृष्टि, वैचारिक दृष्टिकोण और उनके समय की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों की झलक पाठकों तक पहुँची।किन्तु यह पूरी परंपरा मुख्यतः लिखित शब्दों तक सीमित रही — संवादों को पढ़ा जा सकता था, पर देखा या सुना नहीं जा सकता था। यही वह बिंदु है जहाँ डिजिटल युग में ‘संगत’ कार्यक्रम ने ऐतिहासिक परिवर्तन किया। ‘संगत’ ने इस पारंपरिक संवाद-विधा को दृश्य-श्रव्य (audio-visual) रूप देकर उसे नये जीवन से भर दिया। अब साहित्यकार केवल शब्दों में नहीं, अपनी आवाज़, अभिव्यक्ति, देशभक्ति भाषा और भावनात्मक प्रतिक्रिया के साथ उपस्थित होते हैं। इससे संवाद न केवल अधिक आत्मीय और जीवंत बना, बल्कि उसने दर्शक को साहित्य के भीतर सीधे प्रवेश का अनुभव भी कराया।‘संगत’ की यह नवीनता केवल तकनीकी स्तर पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण है। यह कार्यक्रम उस साहित्यिक संवाद परंपरा का विस्तार और पुनर्निर्माण है, जो सदियों से हिन्दी साहित्य की आत्मा रही है। इसे आकस्मिक घटना नहीं कहा जा सकता; बल्कि यह हिन्दी में संवाद-विधा की उस ऐतिहासिक यात्रा का नवीनतम पड़ाव है, जो मौखिक परंपरा से आरंभ होकर डिजिटल स्क्रीन तक पहुँची है। इस प्रकार, ‘संगत’ ने संवाद-विधा को नये युग की संवेदना और माध्यम दोनों से जोड़ा है यह हिन्दी साहित्य की जीवित परंपरा का आधुनिक रूप है।
कार्यक्रम की अवधारणा और उद्देश्य -
‘संगत’ कार्यक्रम हिंदी साहित्य के उत्कृष्ट और वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच गहराई से संवाद करने की एक अभिनव और प्रभावशाली पहल है। इसकी अवधारणा सिर्फ साहित्यकारों की रचनाओं या कृतित्वों पर चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व, जीवन-अनुभवों, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को भी उद्घाटित करने का माध्यम है। यह कार्यक्रम हिंदी साहित्य की विविधता, उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों और भारत की सांस्कृतिक धरोहर को डिजिटल युग में व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने का प्रयास है।इस श्रृंखला का मुख्य उद्देश्य साहित्यकारों के शब्दों और विचारों को उनकी स्वयं की ज़ुबानी सुनाना है, जिससे संवाद में आत्मीयता, सजीवता और गहराई आती है। ‘संगत’ साहित्य को शोषित, उपेक्षित, या कम प्रसिद्ध पुरानी परंपराओं से जोड़ने का भी काम करता है, जो हिंदी साहित्य की वास्तविक समृद्धि और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत की भूमिका निभाता है।कार्यक्रम में संचालक अंजुम शर्मा की सूझबूझ और जिज्ञासा दीपक की तरह चमकती है, जो लेखक के विचारों और अनुभवों को सहजता से उभार लेती है। इस कार्यक्रम को हिंदी साहित्य के संरक्षण, संवर्धन, प्रचार और शिक्षा का एक दृढ़ स्तम्भ माना जा सकता है, जिसने संवाद-श्रृंखला के क्षेत्र में नए मानक स्थापित किए हैं और हिंदी साहित्यिक जगत में एक नवीन समृद्धि लाई है। यह कार्यक्रम हिंदी साहित्य की गूढ़ता और विविधता को समझने, सीखने, और अनुभव करने का सशक्त जरिया बन गया है, जो आने वाले वर्षों में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेगा इसमें कोई दो राय नहीं है।
प्रस्तुति-शैली और संरचना -
‘संगत’ की प्रस्तुति शैली अत्यंत सहज, आत्मीय और संवादात्मक है। कार्यक्रम के संचालक अंजुम शर्मा की सूझबूझ, संवेदनशीलता और जिज्ञासु स्वभाव की वजह से संवाद उद्भवपूर्ण और गहराई से भरपूर होता है। वे न केवल साहित्यकार के लेखन को समझने का प्रयास करते हैं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, जीवन के अनुभवों, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को भी मुखर करते हैं। इस शैली में उपस्थित गर्मजोशी और पारस्परिक सम्मान की झलक मिलती है, जो दर्शकों को संवाद से जुड़ा महसूस कराती है।नीट और प्रभावी प्रश्न, संवाद की लयबद्धता और सहज प्रवाह इस श्रृंखला की खासियत हैं, जो लेखक और दर्शक दोनों के लिए संवाद को रोचक बनाती हैं। संवाद में साहित्यकारों की आवाज़ को उसके स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे संवाद में वास्तविकता और प्रामाणिकता बनी रहती है।
प्रत्येक एपिसोड का सामान्य प्रारूप — ‘संगत’ का प्रत्येक एपिसोड एक ही साहित्यकार के केन्द्र में आधारित होता है और इसकी रूपरेखा निम्नानुसार व्यवस्थित रहती है। पहले संचालनकर्ता अंजुम शर्मा द्वारा अतिथि साहित्यकार का संक्षिप्त जीवन-परिचय दिया जाता है उनकी जन्मभूमि, शिक्षा, अध्यापन/व्यवसाय, साहित्यिक आरम्भ, प्रमुख कृतियाँ, प्राप्त सम्मान तथा साहित्य में उनका योगदान संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद प्रारम्भिक प्रश्न-उत्तर के दौर में लेखक के व्यक्तिगत अनुभव, लेखन आरम्भ की प्रेरणाएँ, शुरुआती कठिनाइयाँ और लेखन की प्रारंभिक परिस्थितियों पर बात होती है। मुख्य संवाद में रचनात्मक प्रवृत्तियाँ, प्रमुख विषय-वस्तु, लेखन के दृष्टिकोण, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबद्धताएँ, रचना-प्रक्रिया एवं समय-विशेष की व्याख्या पर विस्तृत चर्चा होती है; साथ ही कार्यक्रम में उनसे जुड़े विवादित या चर्चित प्रसंगों, आलोचनाओं अथवा पाठकों-समीक्षकों द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर भी खुलकर जवाब माँगे जाते हैं। अंत में प्रेरणा-संदेश के रूप में लेखक से युवा पीढ़ी के लिए सलाह, जीवनदृष्टि या साहित्य के प्रति उनका योगदान कैसे समझा जाना चाहिए, इस बारे में पूछा जाता है और समापन भावुक व सारगर्भित तरीके से होता है — लेखक की समग्र साहित्यिक और मानवीय छवि को दर्शाते हुए कार्यक्रम समाप्त होता है।
संगत’ के संवाद की शैली : उदाहरण स्वरूप ‘असग़र वजाहत’ एपिसोड -
‘संगत’ कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संचालक अंजुम शर्मा साहित्यकारों की रचनाओं से सीधे संवाद आरंभ करते हैं। वे लेखक के विचार या कथन को उद्धृत करके उसके पीछे के अर्थ और उद्देश्य को समझने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए असग़र वजाहत के एपिसोड में अंजुम शर्मा ने उनकी एक प्रसिद्ध पंक्ति उद्धृत की -
“जिस शहर में जितनी ज़्यादा शराब की दुकानें होंगी, वह शहर उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत होगा।”
यह पंक्ति सुनकर अंजुम शर्मा ने मुस्कराते हुए असगर वजाहत से पूछा —
“असग़र साहब, आपने यह वाक्य लिखा है , क्या वास्तव में आपको लगता है कि शराब और संस्कृति का कोई सम्बन्ध हो सकता है?”
इस पर ‘असग़र वजाहत’ ने बड़ी आत्मीयता से उत्तर दिया —
“देखिए, यह बात सीधे तौर पर शराब की नहीं है। ‘फ़िराक़ गोरखपुरी’ का एक शेर है —
‘आए थे हँसते-खेलते मयख़ाने में फ़िराक़,
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए।’
इस शेर में जो ‘संजीदगी’ है, वही मेरी बात का सार है। शराब यहाँ प्रतीक है और वह खुलापन, संवाद, और आत्ममंथन सिखाती है। जिस जगह लोग खुले दिल से बातचीत कर सकें, जहाँ संवाद की परंपरा जीवित हो — वही सुसंस्कृत समाज होता है।” यह उत्तर न केवल उस कथन के अर्थ को स्पष्ट करता है, बल्कि वजाहत जी की सोच, उनकी साहित्यिक दृष्टि और सामाजिक व्यंग्य-बोध को भी उजागर करता है।
संचालक अंजुम शर्मा की भूमिका -
हिन्दी परिदृश्य में हिन्दवी के लिए ‘संगत’ जैसी सशक्त साक्षात्कार-श्रृंखला को संभव बनाने वाले अंजुम शर्मा ने अपने संतुलित और विचारपूर्ण संचालन से साहित्य में संवाद-विधा को नया आयाम दिया है। इससे पहले, वह बीबीसी हिंदी, आजतक रेडियो, ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन से जुड़े रहे, जहां उन्होंने साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सफलतापूर्वक मेजबानी की। ‘संगत’ के सौ से अधिक एपिसोड्स में अंजुम शर्मा केवल एक प्रस्तोता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील श्रोता और सृजनशील संवादक के रूप में उभरे हैं।उनकी जिज्ञासु दृष्टि, सूझ-बूझ, और आत्मीय संवाद-शैली ने प्रत्येक साहित्यकार के भीतर छिपे अनुभव, विचार और सृजन-संवेदनाओं को जिस तरह उकेरा, वह हिन्दी साक्षात्कार-परंपरा में एक नया इतिहास बन गया।यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ‘संगत’ के माध्यम से अंजुम शर्मा ने हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता, साक्षात्कार और संवाद की विधा को नई ऊर्जा और गरिमा दी है।उन्होंने संवाद को केवल प्रश्नोत्तर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक सृजनात्मक प्रक्रिया में बदल दिया , जहाँ प्रश्न और उत्तर दोनों मिलकर एक विचारात्मक संसार का निर्माण करते हैं।संवाद के सघन क्षणों में उनकी भाषा, मौन और दृष्टि तीनों में एक ऐसी परिपक्वता दिखाई देती है जो न केवल साहित्यकारों के अनुभव को उभारती है, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी संवाद-विधा के नए मानक और संभावनाएँ निर्मित करती है
अंजुम न केवल संचालक हैं, बल्कि वे साहित्यकारों के विचारों, अनुभवों और रचनात्मकता को बेहद सम्मान और समझदारी से सामने लाते हैं। उनकी संवाद शैली में पारस्परिक सम्मान, तर्क संगत प्रश्न, और सहज साझा भावनाएँ झलकती हैं जो दर्शकों को गहराई तक जोड़ती हैं।इसी सृजनशील संवाद-शैली और नेतृत्व के कारण अंजुम शर्मा को 2025 में जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ‘शब्द शिल्पी सम्मान’ से नवाजा गया है। यह सम्मान उन्हें डिजिटल साहित्य के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए दिया गया, जिसमें ‘संगत’ के 100 एपिसोडों की अद्वितीय साहित्यिक यात्रा’ को विशेष रूप से सराहा है ,इस प्रकार अंजुम शर्मा का ‘संगत’ में योगदान हिंदी साहित्य संवाद को एक नई दिशा देने वाला है। उनकी संवाद शैली और नेतृत्व ने हिंदी साहित्य की साक्षात्कार विधा में नयी परंपरा स्थापित की है, जो आने वाले समय में प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
‘संगत’ की प्रमुख उपलब्धियाँ और विशिष्टताएँ -
‘संगत’ हिन्दी साहित्य को समर्पित एकमात्र ऐसी संवाद-श्रृंखला है, जो साहित्यकारों के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व को केंद्र में रखकर गहन संवाद प्रस्तुत करती है। इस कार्यक्रम की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें शामिल अधिकांश साहित्यकारों की आयु 75 वर्ष से अधिक रही है, और उनके साथ इस तरह के गहराईपूर्ण संवाद पहले कभी दर्ज नहीं किए गए थे। ‘संगत’ के दर्शक वर्ग में हर आयु, वर्ग और क्षेत्र के लोग सम्मिलित हैं चाहे वे विद्यार्थी हों, शोधार्थी, साहित्य-प्रेमी या सामान्य दर्शक। इस श्रृंखला की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि पड़ोसी देशों, यूरोप, लंदन और अमेरिका के अप्रवासी भारतीयों तक भी पहुँची, जहाँ इसे व्यापक सराहना प्राप्त हुई।‘संगत’ के प्रभाव का दायरा शैक्षणिक क्षेत्र तक भी पहुँचा है इसके कई एपिसोड प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी (कोलकाता), लखनऊ विश्वविद्यालय, और असम के केंद्रीय विद्यालयों में विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम के साथ दिखाए गए। इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर, पुणे, केरल और अन्य क्षेत्रों के छात्र भी इसके माध्यम से हिंदी लेखकों से परिचित हो रहे हैं। इस कार्यक्रम की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि इसमें शामिल कुछ लेखकों की रचनाएँ विश्वविद्यालय-पाठ्यक्रमों में सम्मिलित की गईं। साथ ही, ‘संगत’ के आठ लेखकों की रील्स ने सोशल मीडिया पर 50 लाख से अधिक दर्शकों तक पहुँचकर अभूतपूर्व डिजिटल प्रभाव उत्पन्न किया।
‘संगत’ के माध्यम से कई भूले-बिसरे या अलक्षित साहित्यकारों को पुनः पाठकों और दर्शकों के सामने लाया गया। इनमें कुछ साहित्यकार 90 वर्ष से भी अधिक आयु के रहे, जैसे कि मालती जोशी जिनका अंतिम साक्षात्कार उनके निधन से कुछ माह पूर्व इसी मंच पर दर्ज हुआ। यह श्रृंखला न केवल साहित्यिक पुनर्स्मरण का माध्यम बनी, बल्कि इसके बाद लेखकों की किताबों की बिक्री और लोकप्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जिसकी पुष्टि स्वयं प्रकाशकों द्वारा की गई। उल्लेखनीय है कि ‘संगत’ की चर्चा केवल साहित्यिक समुदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि सिनेमा, संगीत, रंगमंच और अन्य कलाओं से जुड़े लोगों ने भी इसके एपिसोड खोज-खोजकर देखे। इस प्रकार, ‘संगत’ हिन्दी साहित्य को व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य में स्थापित करने वाला एक जीवंत और ऐतिहासिक उपक्रम सिद्ध हुआ है।
‘संगत’ विचार–विविधता और साहित्यिक विमर्श का मंच -
‘संगत कार्यक्रम’ हिंदी साहित्य का एक चर्चित मंच इसलिए रहा है, क्योंकि यहां विभिन्न साहित्यकार, आलोचक और कवि समाज, साहित्य और विचारधारा से जुड़े संवेदनशील प्रश्नों पर खुलकर संवाद करते हैं। इस कार्यक्रम में कई बार विचारों का टकराव, असहमति और वैचारिक बहसें देखने को मिलती हैं जो वास्तव में हिंदी साहित्यिक परंपरा की बौद्धिक जीवंतता को रेखांकित करती हैं इस कार्यक्रम में हुई बातचीत के कुछ उदाहरणों के माध्यम से हम इन विविधताओं को समझ सकते हैं। जैसे एक एपिसोड में बातचीत के दौरान ‘अब्दुल बिस्मिल्लाह’ ने संचालक अंजुम शर्मा से कहा —
“आप प्रेमचंद को हिंदी साहित्य का ‘कायस्थ कथाकार’ कहेंगे या रामचंद्र शुक्ल को ‘ब्राह्मण आलोचक’ कहेंगे? यदि नहीं, तो फिर अब्दुल बिस्मिल्लाह को ‘मुस्लिम साहित्यकार’ क्यों कहा जाए?”
उनका यह कथन साहित्य में धर्म, जाति या वर्ग आधारित पहचान के विरोध में था। वे मानते हैं कि साहित्य का विभाजन धर्म या जाति के आधार पर नहीं, बल्कि विषय, संवेदना और विचारधारा के आधार पर होना चाहिए।
यह विचार भारतीय समाज में मौजूद पहचान-आधारित राजनीति के बरअक्स एक मानवीय और समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसको उन्होंने स्वयं महसूस किया। इसी तरह एक अन्य एपिसोड में कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने प्रश्न उठाया —
“जो तमाम स्त्रियाँ ‘बंजर’ कहकर निकाल दी जाती हैं, क्या कभी उनके पुरुषों की जाँच हुई? कि वे पिता बनने में सक्षम थे भी या नहीं? या सारा दोष स्त्रियों पर ही डाल दिया गया?”
यह प्रश्न पितृसत्तात्मक समाज की पुरुष केन्द्रित दृष्टि पर प्रहार करता है। जितेन्द्र का यह मत यह दर्शाता है कि स्त्री- पुरुष संबंधों में असमानता केवल सामाजिक नहीं, नैतिक और मानसिक भी है, जहाँ दोष हमेशा स्त्री पर मढ़ दिया जाता है। इसी तरह एक एपिसोड में कवयित्री ‘मैत्रेयी पुष्पा’ से जब अंजुम शर्मा ने पूछा कि क्या उन्हें नहीं लगता कि उनके शब्दों का ‘नियंत्रित प्रयोग’ होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने लिखा है कि “अनियंत्रित स्त्रियों ने साहित्य का बहुत नुकसान किया है।”तो मैत्रेयी ने उत्तर दिया —
“मुझे लगता है कि स्त्रियों को तय करना होगा कि उन्हें बिस्तर चाहिए या किताब। अंत में सारा दोष पुरुषों पर मढ़ देने को मै स्त्रीवादी दृष्टि नहीं मानती।”
यह कथन साहित्यिक जगत में स्त्रीवाद की अंतर्विरोधी प्रवृत्तियों को उजागर करता है। मैत्रेयी यहाँ पर एक स्वयं आलोचनात्मक स्त्रीवादी दृष्टि रखती हैं, जो केवल पुरुष विरोध नहीं, बल्कि स्व संयम और जिम्मेदारी की चेतना पर बल देती है। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने एक एपिसोड में कहा —
“जो आपका विरोध कर रहा है, वह आपका शत्रु नहीं है, आपको यह समझना होगा कि जो विचार में आपका विरोध कर रहा है, हो सकता है वह सही हो, इसलिए जब आप किसी से बहस करें तो डिफीट के लिए तैयार रहें।”
त्रिपाठी जी का यह कथन हिंदी आलोचना की लोकतांत्रिक और संवादपरक परंपरा को स्थापित करता है। उनका दृष्टिकोण यह है कि साहित्य में असहमति भी रचनात्मक हो सकती है, यदि उसमें संवाद की भावना बनी रहे।एक अन्य एपिसोड में वरिष्ठ साहित्यकार ‘स्वर्गीय रामदरश मिश्र’ जी कहते हैं -
“निस्पृहता ने मुझे जिलाए रखा। एक साहित्यकार कभी अकेला नहीं होता, उसके पात्र हमेशा उसके साथ जीते हैं।”और अपनी बात को मिश्र जी एक कविता के ज़रिए समझाते हुए कहते हैं-
“एक लम्बा सफर था मेरे दोस्तों,राह चलती रही मोड़ खाती हुई,
साथ होती हवा आग बन के कभी और कभी प्यार से मेहमहाती हुई,
कंटकों ने किये छेद जब भी वसन,छा गये फूल बनकर वसन देह पर,
थक के बैठा जब ही मौत के पास मैं,ज़िंदगी आ गई गुनगुनाते हुए।”
यह कथन उनकी जीवनदृष्टि और सृजनदृष्टि दोनों को स्पष्ट करती उस जिजीविषा की ओर ध्यान को आकर्षित करती है जिसे उन्होंने स्वयं अनुभव किया।इसी तरह एक एपिसोड में ‘कवयित्री ‘सविता सिंह’कहती हैं —
“मैं स्त्री होने के नाते हर स्त्री के साथ ‘बहनापा’ नहीं रख सकती, क्योंकि जो स्त्रियाँ पुरुषों पर झूठे केस दर्ज कराती हैं, वे उन स्त्रियों के वास्तविक संघर्ष को लांछित करती हैं जिन्होंने वास्तव में उन परिस्थितियों का सामना किया है।”
यह विचार नारीवाद के भीतर के नैतिक और वर्गीय अंतर्विरोधों को सामने लाता है। सविता सिंह यह स्पष्ट करती हैं कि स्त्रीवाद केवल लिंग आधारित एकता नहीं, बल्कि न्याय और सत्य की नैतिकता पर आधारित होना चाहिए। इस प्रकार हम देख पाते हैं कि ‘संगत’ मात्र साहित्यकारों के रचना संसार तक ही सीमित न होकर उनके सामाजिक राजनीतिक और नैतिक विचारों की विविधताओं को भी दर्शकों तक पहुंचाने का एक सशक्त मध्यम बना है।
‘संगत’ का सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव -
‘संगत’ ने हिंदी साहित्य को न केवल एक संवादात्मक मंच प्रदान किया है, बल्कि यह कार्यक्रम हिंदी संस्कृति के संरक्षण और प्रसार का भी एक सशक्त माध्यम बन चुका है। इसके द्वारा साहित्यकारों के साक्षात्कारों को रिकॉर्ड कर, लाइव और डिजिटल माध्यमों पर पहुंचाकर सांस्कृतिक परंपराओं, भाषा की सुंदरता, और साहित्य की विविधताओं को एक व्यापक जनसमूह तक पहुँचाया गया है। ‘संगत’ ने साहित्य के उन पहलुओं को उजागर किया है जो प्रायः पुस्तकीय अध्ययन या सामान्य चर्चाओं में कम विमर्शित होते हैं, जैसे जीवन दर्शन, सामाजिक प्रतिबद्धताएं, और सांस्कृतिक परिवेश। इस प्रकार यह कार्यक्रम हिंदी संस्कृति की जीवंतता और गहराई को विस्तार देने में सहायक सिद्ध हुआ है।इस कार्यक्रम ने हिंदी भाषा और साहित्य को सामाजिक स्तर पर पुनः प्रतिष्ठित किया है। इसके माध्यम से साहित्यकारों के व्यक्तिगत अनुभव, सामाजिक दृष्टिकोण और विचार जनता के समक्ष स्पष्ट और प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत हुए हैं, जिससे समाज में हिंदी साहित्य के प्रति जागरूकता और सम्मान बढ़ा है। युवा पीढ़ी को प्रेरित करने के साथ-साथ यह कार्यक्रम सामाजिक संवाद के लिए एक मंच बना है, जहाँ साहित्य और समाज के बीच गहरा संबंध स्थापित होता है इससे हिंदी साहित्य का प्रचार-प्रसार सिर्फ़ एक शैक्षणिक क्रिया की तरह नहीं बल्कि समाज में एक गतिशील सांस्कृतिक क्रिया बन गया है।इस प्रकार ‘संगत’ हिंदी साहित्य व संस्कृति की संवेदना को सामाजिक चेतना में जोड़ने, सांस्कृतिक विरासत को सहेजने, और हिंदी भाषा की प्रासंगिकता को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी भूमिका निभा रहा है।
डिजिटल युग में ‘संगत’ की प्रासंगिकता -
वर्तमान दौर में जब जीवन का लगभग हर क्षेत्र डिजिटल हो चुका है, ऐसे समय में ‘संगत’ कार्यक्रम हिन्दी साहित्य के लिए अपनी भूमिका और भी सशक्त रूप में निभा रहा है। इस श्रृंखला ने उन साहित्यकारों, लेखकों और कवियों को नयी पीढ़ी के सामने प्रस्तुत किया है, जिनकी रचनाएँ हिन्दी साहित्य की नींव रही हैं। ‘संगत’ के माध्यम से दर्शक केवल उनके जीवन और रचनात्मक यात्रा को ही नहीं जान पाते, बल्कि उनके समकालीन साहित्यिक वातावरण और अन्य रचनाकारों के बारे में भी गहरी समझ प्राप्त करते हैं।इस कार्यक्रम के जरिए उन साहित्यकारों के विषय में जानने का मौका मिल पाया जो,अब इस लोक में नहीं हैं, पर उनकी रचनाएँ और साहित्य आज भी उन्हें जीवित रखे हुए हैं। जैसे—प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद,निराला, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि वे साहित्यकार, जिनसे हमारा परिचय विद्यालयी जीवन में ही आरंभ होता है, उनके व्यक्तिगत जीवन और लेखन से जुड़े प्रसंग जब किसी ऐसे व्यक्ति से सुनने को मिलते हैं जिसने उन्हें देखा, जाना और उनके साथ उस समय को जिया हो, तो वह अनुभव अत्यंत जीवंत और दुर्लभ बन जाता है।ऐसा अवसर किसी अन्य माध्यम से शायद ही संभव हो पाता, पर ‘संगत’ ने इसे साकार कर दिखाया है। इस कार्यक्रम ने न केवल अतीत के साहित्य को वर्तमान से जोड़ा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हिन्दी साहित्य की एक जीवंत स्मृति-संपदा भी निर्मित की है।
कार्यक्रम की स्वीकार्यता और आलोचनाएँ -
‘संगत’ कार्यक्रम ने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हुए व्यापक प्रभाव और स्वीकार्यता प्राप्त की है। यह कार्यक्रम न केवल साहित्यिक वर्गों में सराहा गया, बल्कि आम दर्शकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ। ‘संगत’ ने हिन्दी साहित्य को डिजिटल माध्यम के ज़रिए एक नए पाठक और दर्शक-वर्ग तक पहुँचाया, जिससे साहित्य की पहुँच पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ी। इसके एपिसोड भारत में ही नहीं, बल्कि यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों में बसे अप्रवासी भारतीयों तक भी पहुँचे। कई विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में ‘संगत’ के एपिसोड पाठ्य-सामग्री के पूरक स्रोत के रूप में दिखाए गए, जिससे साहित्यिक अध्ययन को नया आयाम मिला। इस कार्यक्रम में आने के बाद कई लेखकों की रचनाओं की बिक्री और पाठकीय रुचि में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। अंजुम शर्मा की आत्मीय और संवादात्मक शैली ने साहित्यिक वार्ताओं को सहज, जीवंत और प्रेरणादायी बना दिया, जिससे दर्शकों में साहित्य के प्रति अपनापन और जिज्ञासा दोनों बढ़े। इस प्रकार, ‘संगत’ केवल एक कार्यक्रम न रहकर, हिन्दी साहित्य के पुनर्जीवन का प्रतीक बन गया है, जिसने लेखकों और पाठकों के बीच एक सांस्कृतिक सेतु स्थापित किया और संवाद को एक नई गरिमा प्रदान की।
हर सृजनात्मक परियोजना की तरह ‘संगत’ कार्यक्रम की अपनी कुछ सीमाएँ हैं, जो इसके व्यापक प्रभाव के बावजूद आलोचनात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। यद्यपि इस श्रृंखला ने हिन्दी साहित्य को डिजिटल मंच पर नई पहचान दी है, फिर भी इसमें कुछ व्यावहारिक, तकनीकी और संरचनात्मक कमियां दिखाई देती हैं।सबसे पहली कमी यह है कि कार्यक्रम में शामिल अधिकांश साहित्यकार वरिष्ठ पीढ़ी से जुड़े हैं, जिसके कारण समकालीन युवा रचनाकारों की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम दिखती है। इससे हिन्दी साहित्य के नवीन रुझानों और प्रयोगधर्मी लेखन की प्रतिनिधिकता कुछ सीमित हो जाती है। दूसरी ओर, ‘संगत’ के संवाद-रूप में अंजुम शर्मा की उपस्थिति अत्यंत प्रभावशाली होते हुए भी कभी-कभी संवाद को एकतरफा सा बना देती है, जिससे रचनाकार के विचारों की स्वतंत्रता थोड़ी सीमित प्रतीत हो सकती है।तकनीकी दृष्टि से देखें तो, यूट्यूब माध्यम पर आधारित होने के कारण इसकी दर्शक पहुँच इंटरनेट और भाषा-ज्ञान पर निर्भर करती है, जिसके चलते हिन्दी से इतर भाषाभाषी दर्शक या ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी उपलब्धता सीमित रह जाती है। साथ ही, कार्यक्रम की अवधि और संरचना कभी-कभी गंभीर साहित्यिक विमर्श को उबाऊ बना देती है,।इसके अतिरिक्त, यद्यपि कार्यक्रम ने साहित्य के इतिहास और परंपरा को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है, फिर भी इसमें साहित्यिक आलोचना, नारीवादी, दलित और आदिवासी साहित्य के साथ साथ नए साहित्य पर विचार जैसे विमर्शों की गहनता में और विस्तार की आवश्यकता महसूस होती है।
निष्कर्ष : इस प्रकार कहा जा सकताहै कि ‘संगत’ हिन्दी साहित्य के लिए केवल एक यूट्यूब संवाद-श्रृंखला नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में उभरा है, जिसने साहित्य, संवाद और डिजिटल माध्यम तीनों के बीच एक जीवंत और सार्थक सेतु का निर्माण किया है। इस श्रृंखला ने साहित्यकारों के जीवन, विचारों और रचनात्मक अनुभवों को जिस आत्मीयता, गहराई और ईमानदारी से प्रस्तुत किया है, वह हिन्दी साहित्य के दृश्य-श्रव्य इतिहास में एक स्थायी दस्तावेज़ के रूप में दर्ज हो चुका है।‘संगत’ ने हिन्दी साहित्य को अकादमिक सीमाओं से बाहर निकालकर जन-संवाद का हिस्सा बनाया है। इसने वरिष्ठ रचनाकारों के अनुभवों को नई पीढ़ी के साथ जोड़ते हुए एक सांस्कृतिक निरंतरता स्थापित की है। यह कार्यक्रम साहित्य को केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि जीने का अनुभव बना देता है।जहाँ रचनाकार की आवाज़, उसकी स्मृतियाँ, उसके संघर्ष और उसकी दृष्टि सब मिलकर साहित्य के वास्तविक अर्थ को सामने लाते हैं। अंजुम शर्मा की संवेदनशील और गहन संवाद शैली ने इस श्रृंखला को मानवीय ऊँचाई दी है, जिससे यह सिद्ध होता है कि ‘संगत’ ने हिंदी साहित्य को डिजिटल युग में एक नयी प्रासंगिकता और लोकप्रियता प्रदान की है।
संदर्भ :
- हिन्दवी यूट्यूब चैनल। ‘संगत’ कार्यक्रम की श्रृंखला (एपिसोड 1–100)। हिन्दवी मीडिया प्रा. लि., 2022–2025। उपलब्ध:
- https://www.youtube.com/@hindwi
- हिन्दवी वेबसाइट। ‘संगत’ कार्यक्रम से संबंधित आलेख एवं परिचय-पृष्ठ। हिन्दवी.ऑर्ग, 2023।
- शर्मा, अंजुम। ‘संगत’: संवाद की नई परंपरा। हिन्दवी संवाद, 2024।
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- जोशी, राजेश। “हिन्दी साहित्य का नया माध्यम: दृश्य-श्रव्य संवाद।” आलोचना पत्रिका, अंक 18, 2024।
- वर्मा, रोहिणी। डिजिटल युग में साहित्यिक विमर्श की दिशा। लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, 2022।
सुप्रिया दुबे
शोधार्थी , दिल्ली विश्वविद्यालय
supriyadubey121@gmail.com, 8800309401
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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