शोध आलेख : महामति प्राणनाथ : एक समाज-सुधारक व्यक्तित्व / रवीन्द्र कुमार रवि

महामति प्राणनाथ : एक समाज-सुधारक व्यक्तित्व
- रवीन्द्र कुमार रवि

शोध सार : भारतीय इतिहास के मध्ययुग में महामति प्राणनाथ जी धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों के पारस्परिक धार्मिक विद्वेष को शांत करने का प्रयत्न किया। उनकी वाणी एक ओर जहाँ आध्यात्मिक जीवन से सम्बंधित होते हुए मानव को उदारवादी विश्व धर्म, गंभीर दर्शन, उच्च नैतिकता तथा प्रेम लक्षणा भक्ति का अनुभव कराती हैं वहीं दूसरी ओर लौकिक जीवन अर्थात् सामाजिक विषमता से सम्बंधित समस्यायों जैसे- जाति-पांति, ऊँच-नीच, छुआछूत आदि पर आधारित भेदभाव को दूर करके सामाजिक समानता लाने का सन्देश देती हैं। उन्होंने "हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ वेद-उपनिषद्, गीता-भागवत, मुसलमानों के धर्मग्रंथ कुरान, ईसाइयों के इंजील, यहूदियों के जंबूर तथा दाउद, पैगम्बर के अनुयायियों के धर्मग्रन्थ तौरेत में मौलिक एकता खोजने का प्रयत्न किया।”(1) साथ ही एक समतामूलक समाज की नींव डाली। जिसे उन्होंने ‘सुन्दरसाथ’ नाम दिया।

बीज शब्द : समन्वय, वसुधैव कुटुंबकम, विश्वबंधुत्व, एकेश्वरवाद, सुंदरसाथ, सैद्धांतिक एकता, स्वानुभूति, मिथक, संस्कृति, काफ़िर, आदर्शवाद आदि।

मूल आलेख : हिंदी साहित्य के इतिहास में उत्तर मध्यकाल के अंतर्गत आने वाले प्रमुख संतों में महामति प्राणनाथ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम, विश्व बंधुत्व एवं विश्व प्रेम, सर्वजन हिताय जैसे आदर्श को अपनी वाणी के केंद्र में रखते हुए समाज को एक नई दिशा देने का कार्य किया। कबीर, नानक, रविदास, धरणीदास, चरणदास आदि संतों के समान ही इन्होंने एक ऐसे समाज की नींव डालने का प्रयास किया जिसमें प्राणी मात्र के लिए प्रेम, दया, सहयोग, सौहार्द, बंधुत्व आदि का भाव निहित हो, अर्थात् समाज के सभी लोग एकता के सूत्र में बधे हों। वे वर्ण, वर्ग, जाति, धर्म एवं भेदभाव से रहित समाज की स्थापना पर बल देते हैं, और ऐसे समाज को उन्होंने ‘सुंदरसाथ’ नाम दिया। उनके सपनों का भारत तुलसीदास जी के रामराज्य की तरह ही प्रतीत होता है। वे कहते हैं -

“बाघ बकरी एक संग चरें, कोई न करे किसी सों बैर।
पसू पंखी सुखें चरें चुगें, छूट गयो सबको जेहेर॥
सनमुख सब एक रस भए, भाग्यो सो विस्व को ब्रोध।
घर-घर आनंद उछव, कुलो पोहोरो काढ़यो सबको क्रोध।।” (2)

प्राणनाथ जी के वाणियों एवं साहित्य में कहीं भी कथनी और करनी में भेद नहीं मिलता।

कहनी कही सब रात में, अब आया रहनी का दिन। (3)

अर्थात् उन्होंने जो कहा, सो किया और जो किया उसे मना भी। महामति प्राणनाथ का मूल नाम ‘मेहराज ठाकुर’ था। उनके पिता ‘केशव ठाकुर’ जामनगर के दीवान थे तथा माता ‘धनबाई’ एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। लालदास उनके प्रमुख शिष्य थे। जिन्होंने अपने ग्रंथ ‘बीतक’ में महामति प्राणनाथ के जन्म स्थान का उल्लेख करते हुए कहा है-

हालार देश पुरी ने नौतन,उदर बाई घन।
केसो पिताकी काहियत,तहां राज उतपंन। (4)

अर्थात् महामति प्राणनाथ का जन्म सौराष्ट्र (गुजरात) के हालार जनपद के जामनगर में हुआ था। लालदास कृत ‘बीतक’ में प्राणनाथ के जन्मतिथि का भी उल्लेख मिलता है -

संबत सोल सौ पंचोत्तरे, भादोंबसी चौदह नाम।
पोहारे दिन बार रवि, प्रगटे धनी श्रीधाम।। (5)

अर्थात् संवत् १६७५ भाद्रपद कृष्णपक्ष १४ रविवार को महामति प्राणनाथ प्रकट हुए थे। अपने पिता के पश्चात् ये अवस्था में महामति प्राणनाथ ने पहली बार सद्गुरू निजानन्द स्वामी श्री देवचन्द्र जी के दर्शन किए तथा उनको गुरु के रूप में स्वीकार किया था।

बारह बरस दो मास, ता ऊपर भए दस दिन।
तब देवचन्द्रजी सो मिले, तब पहचान मोमिन।। (6)

तथा आगे चलकर महामति प्राणनाथ ने ‘प्रणामी संप्रदाय’ की बागडोर भी संभाली। इनकी प्रमुख रचनाएं - सनंध, किरंतन, प्रकाश, कलस, प्रकटवानी, कयामतनाम, पदावली, परिक्रमा, सम्बन्ध-सागर, ब्रह्वाणी, राज-विनोद, कुलजम-स्वरूप, मारफत-सागर, षटऋतु आदि हैं।

प्राणनाथ जी ने अपने धर्मप्रचार हेतु भारत के अनेक भागों जैसे गुजरात, कच्छ, राजस्थान, उत्तर भारत, मध्य भारत, जामनगर, सूरत, सिद्धपुर, पाटनपुर, दिल्ली, हरिद्वार, आमेर, उदयपुर, औरंगाबाद, मंदसौर, रामनगर आदि स्थानों का भ्रमण किया तथा अंत में बुंदेलखंड के पन्ना में जाकर स्थाई रूप से रहने लगे। ७६ वर्ष की आयु में इन्होंने अपना नश्वर शरीर त्यागकर पन्ना में समाधी ली। महामति प्राणनाथ ने ‘कुलजम’ नामक धर्म ग्रन्थ में अपने जीवन के तीन लक्ष्य प्रतिपादित किए। पहला ‘संसार के समस्त झगड़ों (धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक) को मिटा देना’, दूसरा ‘सारी दुनिया को एक करना’, तथा तीसरा ‘सारे धर्म, मज़हब को एक करना या एकता का सन्देश देना’।

साहेब आए इन जिमी, कारज करने तीन ।
सबका झगड़ा मेट के या दुनिया या दीन ।। (7)

अतः वे एक ऐसे व्यापक विश्वधर्म की स्थापना करना चाहते थे जिसमें संसार की समस्त मानवता को समाहित करने की क्षमता विद्यमान हो। इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उन्होंने अरब देशों की यात्राएं भी की। करीब चार वर्षों तक वहाँ रहकर इस्लामी धर्म संस्कृति को काफी नजदीक से देखा और परखा। उनका अध्ययन किया। इसके परिणामस्वरुप वे इस्लाम के एकेश्वरवाद तथा ईसाई धर्म के मानवसेवा की भावना से काफी प्रभावित हुए। विश्व के लगभग सभी धर्मों के अध्ययन के पश्चात् उन्होंने निष्कर्ष प्रतिपादित किया कि वस्तुतः सभी धर्मों के मूल आदर्श या आधार मानवता, त्याग, प्रेम और करुणा ही है। केवल भाषागत एवं परिवेशगतभिन्नता के कारण ईश्वर की उपासना के विधियों में भिन्नता देखने को मिलती है। जिसे उन्होंने ‘कुजलाम स्वरूप’ एवं ‘खुलासा’ जैसे ग्रंथों में भी राम-कृष्ण, ईसा-मोहम्मद, वेद-किताब, चार आसमानी किताबें जबूत, तौरेत, इंजील, कुरान शरीफ आदि में वर्णित विभिन्न उद्धरणों द्वारा सिद्ध भी किया है।

प्राणनाथ जी विभिन्न धर्मों के प्रमुख पारिभाषिक शब्दों के भाषागत भेद को हटाकर बड़े ही सुंदर ढंग से उनकी एकता का दिग्दर्शन करते हुए लिखते हैं-

नाम सारों जुदे धरे, लई सबों जुदी रसम।
सबमें उमत और दुनियां, सोई खुदा सोई ब्रह्म।।
लोक चौदे कहे वेद ने, साई कतेब चौदे तबक।
वेद कहे ब्रम्ह एक है, कतेब कहे एक हक॥
तीन सृष्टि कही वेद ने, उमत तीन कतेब।।
लेने न देवे मायना, दिल आड़ा दुश्मन फरेब।
दोऊ कहे वजूद एक है, अरवाह सबों की एक।
वेद कतेब एक बतावहीं, पर पावे नहींविवेक।।

जो कहुकह्या कतेब ने, सोई कह्या वेद।
दोऊबंदे एक साहेव के, पर लड़त न पाये भेद।।
बोली सबों जुदी परी, नाम जुदे धरे सबन।
चलन जुदा कर लिया,ताथें समझ न परी किन।
सोई अबलीस सबन के, दिल पर हुआ पातशाह।
एही दुश्मन सबब का जिन मारी सबन की राह ।। (8)

अर्थात् जो वेदों में कहा गया है वही कितेब में भी कहा गया है। सभी एक ही स्वामी के बंदे हैं। भाषागत एवं परिवेश का भिन्नता के कारण ही ईश्वर के नामों एवं उनके उपासना के पद्धतियों में भिन्नता देखने को मिलती है। हम अपने विवेक से काम न लेकर माया, अबलीस, शैतान आदि के गुलाम बनकर आपस में ही झगड़ते रहते हैं। सही मायने में यही हमारे दुश्मन हैं, जिसके कारण हम अपने एकता पर ध्यान ही नहीं दे पाते हैं। डा. चन्द्रकान्त मेहता कहते हैं- "प्रत्येक धर्म की बाह्याचार की दीवारें थीं, जिनके कारण धर्म का अलगाव दिखाई देता था। महामति जी उन दीवारों को गिराकर धर्मों की मूलभूत एकता का दर्शन कराते हुए, हमें संकीर्ण पथ से हटाकर परम तत्त्व प्राप्ति के राजमार्ग पर ले आए।" (9)

महामति प्राणनाथ ने अनेक कथा-कहानियों, परिभाषित शब्दों आदि के माध्यम से अपने ‘खुलासा’ ग्रंथ में सभी धर्मों की गुत्थियों को सुलझा दिया है।

डॉ. नरेश पांडे जी ने कहा है:- “वास्तव में यह कहना उचित होगा कि सर्व-धर्म-समभाव की बातों को साधारण रूप में श्री प्राणनाथ से पूर्व कबीरदास जैसे संत एवं भक्तों ने भी मान्यता दी थी, लेकिन सैद्धांतिक एकता बताकर व्यवहारिक स्वरूप देने का श्रेय भी प्राणनाथ जी को ही मिलता है। महामति प्राणनाथ जी ने ‘खुलासा’ ग्रंथ में शास्त्रों के कथानकों और मिथकों में भी एकता की घोषणा की है। कुरान शरीफ और पुराणों का सारांश बताया है। इसी ग्रंथ में महामति ने हिंदू और मुस्लिम धर्मों की एकता को स्थापित किया है। दोनों ही धर्मों के लोग एक-दूसरे को अपने से कम समझते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों के मिथ्या गर्व और घमंड को दूर किया। आपस में राग-द्वेष को दूर किया और प्रेममय मार्ग दिखलाया। महामति प्राणनाथ जी किसी भी धर्म विशेष को अधिक महत्व देने या छोटा-बड़ा कहने के विरोधी थे।” (10)

महामति प्राणनाथ ने मनुष्य के संकीर्ण भावनाओं का विरोध करते हुए कहा है -

रबद करे औरों को निंदे, आप को आप बढ़ावें।
ग्यान कथे गुन गायें आपके, हो होकार मचावें।। (11)

सभी मनुष्य एक ही परमात्मा की संतान होने के बावजूद भी धर्म ग्रंथों अर्थात् वेद और कितेब के नाम पर खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हुए हैं।

भारतीय संस्कृति में गुरु को विशेष महत्व प्रदान किया गया है, क्योंकि गुरु ही हमारे मन के विकारों को दूर करके हमें सत्-मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। गुरु के बिना परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है। अन्य संतों के समान महामति प्राणनाथ ने भी गुरु को महत्व देते हुए कहा है -

सतगुरु संग करे आप ग्रही, वचने धमावे निसंक ।
रस थई कस पूरे कसौटी, त्यारे आ‌ङो न आवै प्रपंच।। (12)

अर्थात् यदि परब्रह्म की प्राप्ति की इच्छा है तो सद्गुरु के सामने समर्पित हो जाने में ही कल्याण है। क्योंकि गुरु के द्वारा ही ज्ञान की ज्योति हृदय में प्रवेश करायी जाती है और हम धर्म के सच्चे स्वरूप को जान पाते हैं। महामति प्राणनाथ जी ने न केवल मनुष्य के जीवन में गुरु के महत्व को प्रतिपादित किया है बल्कि एक सच्चे सद्गुरू के स्वरूप को भी उद्घाटित करते हैं। उनका मानना है- सद्‌गुरु वही है जो शास्त्रों के प्रमाण देकर सिद्ध करे कि सब एक ही परमात्मा का संदेश देते हैं। सब अवतारी पुरुष एक ही बात को दोहराते हैं -

शास्त्र ले चले सतगुरु सोई, वानी सकल को एक अर्थ होई।
सब सयानो की एक मत पाई, पर अजान देखे रे जुदाई ।। (13)

अतः महामति प्राणनाथ जी ने धर्म के आंतरिक स्वरूप को जानने पर बल दिया है।

फिरके सबों ने यों कह्या, ए तो दुनिया चौदे तबक।
ढूंढ-ढूंढ के सब थके, पर पाया नहीं हक॥
वेद कतेव पढ़-पढ़ थके, केहे केहे थके इलम।
कह्या तिनों मुख अपने, ठौर कायम न पाया हम। (14)

कबीर आदि संतों की तरह ही महामति प्राणनाथ ने भी ईश्वरी प्रेम को प्राप्त करने के लिए तत्कालीन समाज में व्याप्त बाह्य आडंबरों जैसे मूर्ति पूजा, जाति-पाँति भेदभाव आदि का विरोध किया है।

डॉ. राजबाला सिडाना कहते है- “कबीर से प्राणनाथ जी का हिंदू-मुस्लिम एकता और दोनों की पाखंडपूर्ण रीतियों और सामाजिक बुराइयों का विरोध करने में मतैक है। महामति प्राणनाथ जी ने कबीरदास जी की भांति बाह्य आडम्बरों का विरोध किया और ईश्वर को पाने के लिए सहज प्रेम को ही महत्व दिया।” (15)

सात बेर अस्नान करो पेहनो ऊन उतम कामल।
उपजो उत्तम जात में, पर जीवड़ा न छोड़े बल।।
सौ माला वाओ गले में, द्वादस करो दस बेर।
जो लौं प्रेम ने उपजे पीउसों, तोलों मन न छोड़े फेर।। (16)

अर्थात् सात बार स्नान करने एवं धुले हुए कपड़े पहनने, माला धारण करने से कोई लाभ नहीं। जब तक हृदय में प्राणी मात्र के लिए सहज प्रेम का भाव ना हो, तब तक ईश्वर की प्राप्ति संभावना नहीं है। महामति प्राणनाथ तत्कालीन समाज के उन पंडितों एवं कठमुल्लाओं के प्रति चिंता व्यक्त करते हैं, जो न तो शास्त्रों को पढ़ सकते हैं और ना ही समझ सकते हैं। ऐसे लोग अपने अज्ञानता रूपी अहंकार के वश में आकर न तो खुद को पहचानते हैं और ना अपने घर को। वे बेचारे तो अज्ञानता रुपी अंधकार में हाथ-पांव पटकते रह जाते हैं।

दुष्ट भई अवगुण करे, ते जई जम पुरी रोय।
पण साथ भई कुकरम करे, तेनू ठाम न देखूँ कोय।। (17)

अर्थात् दुष्टों और कुकर्मियों का तो ‘नर्क’ में जाना तय है परंतु ऐसे लोगों को तो नर्क में भी स्थान नहीं मिलेगा जो साधु का वेश धारण करके कुकर्म करते हैं।

तीर्थ स्थानों पर जाकर दिखावे के लिए किए गए पूजा उपासना, बाल मुड़वाने आदि बाह्यआडम्बरों का भी महामति प्राणनाथ जी कड़े शब्दों में विरोध करते हैं।

कोड़ बढ़ाओ कोई मुड़ाओं, कोई खेंच काढ़ों केस।
जो लों आत्म न ओखले, कहा होए धरे बहु भेस।। (18)
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बाहरे देखावें बंदगी, माहें करे कुकरम काम
महामत पूछे ब्रहमसृष्टि को, ए बैकुंठ जासी के धाम॥ (19)

अर्थात् जब तक मनुष्य को ‘आत्म’ की पहचान ही नहीं होती तब तक जटाजूट बढ़ाने, केश मुड़वाने, बाल नुचवाने तथा दिखावे के लिए पूजा-उपासना आदि में मस्त रहते दिखने जैसे प्रपंच करने से कोई लाभ प्राप्त नहीं होने वाला है।

इसी तरह महामति प्राणनाथ ने ऐसे कतेब-कुरान पढ़ने वाले मुल्ला-मौलवियों को भी कटघरे में खड़ा किया है, जो खुद को कुरान के जानकारी बातकर दूसरों को नीच और छोटा समझते हैं। अपनी कमियों को नजरअंदाज करके दूसरों को ‘काफिर’ कहते हैं। अर्थात् खुद दुर्गुणों के खान होने के बावजूद भी सच्चा मुसलमान बनने का ढोंग करते हैं।

कुफर न काढ़े आपको, और देखें सब कुफरान।
अपना अवगुण न देख ही, कहें हम मुसलमान।। (20)

जैन और बौद्ध धर्म के अहिंसा तत्व से प्रभावित होने के कारण हमें महामति प्राणनाथ के वानियों में सहज ही पशु एवं मानव बलि के प्रति विरोध देखने को मिल जाता है।

कोट करो नरमेध, अश्व मेध अनंत।
अनेक धरम करा विषे, तीरथ वास अनंत।।
सिद्ध करो साधना, विप्र मुख वेद वदन्त।
सकल क्रिया सूं धरम पालतां, दया करो जी9व जंत।
पर न आवे तोले एकने, मुख श्री कृष्ण कहंत।। (21)

अर्थात् धर्म, कर्म के नाम पर नर एवं पशु बलि देकर ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता। बल्कि ईश्वर तो प्रत्येक प्राणी मात्रा में निवास करते हैं। समस्त जीवों से प्रेम करना ही उनका लक्ष्य है। यदि ईश्वर के सच्चे स्वरूप को प्राप्त करना चाहते हो, तो समस्त जीवों से प्रेम करना होगा।

महामति प्राणनाथ संस्कृत, सिंधी, गुजराती, फारसी, अरबी आदि भाषाओं के ज्ञाता थे। इसके बावजूद उन्होंने अपनी वाणियों में मध्यकाल के अन्य संत कवियों के समान ही पारंपरिक भाषा संस्कृत का विरोध करते हुए जनभाषा के प्रयोग पर ही बल दिया है। प्राणनाथ जी कहते हैं -

बिना हिसाबे बोलियां, मिनेसकल जहान
सबकोंसुगम जानके, कहूँ हिंदुस्तान।
बड़ी भाषा ये ही भली, जो सबमें जाहेर
करना पाक सबन को, अन्तर माहें बाहेर।। (22)

अर्थात् वे अपनी वाणियों एवं रचनाओं के माध्यम से जनसामान्य तक अपनी पहुँच बनाना चाहते थे। ताकि समाज में फैले वैमनस्य, जाति-पाँति, धार्मिक मतभेद, अंधविश्वास, कुरुतियों, ऊँच-नीच आदि के प्रति जनसाधारण को जागृत करते हुए एक समता मूलक समाज का निर्माण किया जा सके।

‘आचार्य परशुराम चतुर्वेदी’ ने मध्यकाल के संत एवं भक्तों के संदर्भ में सटीक ही कहा है कि- “उन्होंने काव्य निर्माण के समय अपना ध्यान कौशल की ओर नहीं दिया था और न उसमें कभी वे पूर्ण रूप से सावधान ही रहे। उन्होंने अपने विचारों की अभिव्यक्ति एवं सिद्धांतों के प्रचारार्थ ही कुछ रचनाएँ प्रचलित शैलियों के अनुसार प्रस्तुत कर दी। ये रचनाएँ मनोरंजन के लिए नहीं की गई थीं और न इसका उद्देश्य कभी किसी प्रकार के यश या धन का उपार्जन ही रहा। इनके रचयिताओं ने अपने सामने ‘कविता कविता के लिए’ का भी आदर्श नहीं रखा और न अपनी उन्मुक्त कल्पना के प्रभाव से विविध भावनाओं की सृष्टि कर, एक अपना मनोराज्य स्थापित करने की कभी चेष्टा की। उनकी व्यक्तिगत ‘स्वानुभूति’ में विश्वजनीन अनुभूति की व्यापकता थी और उनके आदर्शवाद की स्थिति ठेठ व्यवहार से कहीं बाहर न थी। (23)

निष्कर्ष : यह कहा जा सकता है कि महामति प्राणनाथ जी ने सत्रहवीं सदी में जन्म लेकर अपने युग और समय से बहुत आगे का काम किया है। “सन् 1628 में उन्होंने हरिद्वार में आयोजित शास्त्रार्थ में ‘एक सनातन धर्म’, ‘एक विश्व धर्म’ तथा ‘एक ईश्वर’ की बात प्रतिपादित की। इसके लिए उन्हें ‘विजयाभिनंद’, ‘निष्कलंक अवतार’ से अभिषिक्त किया गया।” (24) धर्म समन्वय की ऐसी भावना उनसे पहले किसी संत या फकीर में नहीं दिखाई देती है। भले ही इससे पूर्व कबीरदास जी जैसे संत ने भी इसका प्रयास किया था। जिस कार्य की ओर बीसवीं शताब्दी में गांधी जी ने ध्यान दिलाया, उस कार्य को महामति प्राणनाथ सत्रहवीं शताब्दी में ही कर चुके थे। आपकी धार्मिक भावना संकीर्ण नहीं थी। आपने छुआछूत, ऊँच-नीच की दीवारों को तोड़कर समता, प्रेम और सद्भावना का संदेश दिया। उपासना की रीतियों को समाप्त कर सहज-प्रेम, हृदय की शुद्धता और सदाचार की पवित्रता पर बल दिया। (25) अर्थात् महामति प्राणनाथ जी के विचार आज भी प्रासंगिक एवं अनुकरणीय है। इससे प्रेरणा लेकर हमें अपने समाज को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि तत्कालीन समाज में भी धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक वैमनस्य आसानी से देखने को मिल जाता है। आज भी मनुष्य खुद को अज्ञानता रूपी अंधकार से पूरी तरह मुक्त नहीं कर पाया है। अतः आज महामति प्राणनाथ के मूल्यों एवं आदर्शों को आत्मसात् करने की आवश्यकता है, ताकि एक बेहतर कल का निर्माणहो सके।

संदर्भ :
  1. लेखक का 'प्रणामी साहित्य' नामक निबंध, हिन्दी सम्मेलन पत्रिका, भाग-41 सं.-1 संस्करण-2011, पृ.-3
  2. महामाति प्राणनाथ, किरतन, प्र.- 55/20-21
  3. स्वामीलालदासकृत‘बीतक’
  4. स्वामी लालदास कृत‘बीतक’, प्र.-11, चौ.-36
  5. स्वामी लालदास कृत‘बीतक’, प्र.-7, चौ.-18
  6. स्वामीलालदासकृत‘बीतक’
  7. महामाति प्राणनाथ , खुलासा प्र०-13/86
  8. महामाति प्राणनाथ , खुलासा-दोनामा,प्र.– 12/36 तथा 12/42-44
  9. महामाति प्राणनाथ : जागनी संचयन, पृ.-229
  10. डॉ. राजबाला सिडाना,‘प्राणनाथ और उनका साहित्य’, पृ.-255
  11. महामाति प्राणनाथ , खुलासा, प्र.- 13/81-83
  12. महामाति प्राणनाथ ,किरंतन, प्र.- 70/9
  13. महामाति प्राणनाथ ,किरंतन, प्र.- 4/4
  14. महामाति प्राणनाथ ,खुलासा, प्र.- 16/2-3
  15. डॉ. राजबाला सिडाना –‘प्राणनाथ और उसका साहित्य’, पृ.256
  16. महामाति प्राणनाथ ,किरंतन, प्र.–15/46
  17. महामाति प्राणनाथ , किरंतन, प्र.-128/7
  18. महामाति प्राणनाथ , किरंतन, प्र.-15/2
  19. महामाति प्राणनाथ , किरंतन, प्र.–105/14
  20. महामाति प्राणनाथ, किरंतन
  21. महामाति प्राणनाथ , किरंतन, प्र.– 127/2-3
  22. महामाति प्राणनाथ ,संनध -1/13-14
  23. आ. परशुराम चतुर्वेदी, ‘संतकाव्य’,-पृ.-51
  24. महामाति प्राणनाथ : जागनी संचयन, पृ.-1
  25. डॉ. विजयेन स्वात्त्रक : धर्म समन्वय के प्रणेता महामति प्राणनाथ शीर्षक लेख, जागनी 1975, प्राणनाथ मिशन, नई दिल्ली, पृ.-3
रवीन्द्र कुमार रवि
शोधार्थी हिन्दी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

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