शोध आलेख : औरत का कोई देश नहीं / पूजा यादव

औरत का कोई देश नहीं
- पूजा यादव

 

शोध सार : युद्ध एक ऐसा सैन्य संघर्ष हैं जिसकी एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया होती है। युद्ध की इस प्रक्रिया से सबसे अधिक वे समूह प्रभावित होते हैं जिनकी स्थिति पहले से ही असुरक्षित होती है। जिसमें स्त्रियाँ प्रमुख होती हैं, क्योंकि लैंगिक मान्यताएँ और सामाजिक संरचनाओं के कारण उनको यौन उत्पीड़न, विस्थापन, तस्करी एवं अनेक प्रकार के मानसिक आघातों से जूझना पड़ता है। अब तक युद्ध जनित स्थितियों में स्त्रियों के शारीरिक शोषण के कई राजनीतिक पहलू सामने आये हैं। यह एक खास तरह की राजनीतिक रणनीति भी है, जिसमें स्त्रियों के साथ हुई हिंसा के कुछ पहलुओं पर बहुत कम चर्चाएँ की जाती हैं जिससे उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। इस क्रम में कई सवाल उठते हैं कि कैसे युद्ध में राजनीतिक साजिशों के तहत स्त्रियों की देह पर नियंत्रण किया जाता है? और उनको उन्हीं के देश में मानव तस्करी का शिकार होना पड़ता है। सवाल यह भी उठता है कि तब क्या स्त्रियों के साथ हुई तमाम हिंसाएँ शत्रु राष्ट्र तक सीमित हैं या उनके स्वयं के राष्ट्र की नीतियों में भी उनका शोषण शामिल है? प्रस्तुत शोध आलेख में इन्हीं बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा की गयी है।

बीज शब्द : स्त्रियाँ, युद्ध, यौन दासी, बलात्कार, आघात, पितृसत्ता, राष्ट्र

मूल आलेख : सामान्यतः शक्ति प्रभुत्व देश, पराजित देशों में, उनके जन-समाज के साथ–  हिंसा, लूट और हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। बीसवीं शताब्दी के विश्वयुद्ध, उसके पहले और बाद के भी तमाम युद्ध इस बात के प्रमाण हैं। किन्तु इन हिंसाओं का यदि विस्तृत एवं समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट होगा कि महिलाओं के प्रति यह हिंसा अधिक यातनापूर्ण और नृशंस होती हैं। गृह-युद्ध से लेकर विश्वयुद्ध तक की परिस्थितियों का विस्तार वस्तुतः स्त्री शरीर को ही युद्ध-भूमि बना देता है। जब युद्ध की घटनाओं का स्त्री-दृष्टि से विश्लेषण किया जाता है तब कई ऐसे तथ्य प्रकट होते हैं, जिनसे यह जाहिर होता है कि हिंसा और यातनाओं की कोई सीमा नहीं होती है। स्त्रियाँ चाहे विजेता देश की हो अथवा हारे हुए देश की, युद्ध कि पृष्ठभूमि में हिंसा जैसे उनकी नियति बन गयी हो। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कम्फर्ट वुमन (एक प्रकार की यौन दासी), युद्ध के अंत में रेड आर्मी द्वारा जर्मन स्त्रियों का यौन शोषण, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान बांग्ला महिलाओं का यौन शोषण, म्यांमार में रोहिंग्या महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना तथा हाल ही में भारत के मणिपुर राज्य में दो समुदायों की लड़ाई में महिलाओं के साथ हुई यौन हिंसाएँ इस बात का प्रमाण है। इन घटनाओं में दुश्मन देश अथवा अपने देश की नागरिक महिलाओं का कोई भेद नहीं है। अतः यह कहना बहुत अस्वभाविक नहीं होगा किस्त्रियों का कोई देश नहीं होता।

दरअसल किसी भी समाज अथवा देश के भीतर युद्ध काल में तमाम सामाजिक व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाती हैं। तो कानून का कोई नियम काम करता है और नैतिकता का ही। ऐसे में धन-संपत्ति की लूट की तरह महिलाओं की अस्मत भी लूटी जाती है। इतिहास, हमें ऐसे कई प्रमाण उपलब्ध कराता है जहाँ युद्ध-काल में अथवा युद्ध जैसी स्थिति में प्रभावित भूगोल की स्त्रियों के यौन शोषण की घटनाएं बहुत आम हो गई हैं। दुश्मन देश की नागरिक महिलाओं के साथ सैनिकों का यह दुर्व्यवहार तो जैसे अधिकृत रूप ले लेता है। इस संदर्भ में गेरडा लर्नर का अध्ययन उल्लेखनीय है। वे लिखती हैं – “विजित समूह की महिलाओं के साथ बलात्कार करने की प्रथा दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से लेकर आज तक, युद्ध और विजय का एक लक्षण बना हुआ है। यह एक सामाजिक प्रथा की तरह है जो, कैदियों को यातना की तरह, ‘सामाजिक उन्नतिसे दूर मानवीय सुधारों और परिष्कृत नैतिकता और आचरण की प्रतिरोधी रही है। मेरा सुझाव है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि यह पितृसत्तात्मक संस्थाओं की संरचना में अंतर्निहित अनिवार्य प्रथा है और उनसे अविभाज्य है। यह व्यवस्था की शुरूआत में, वर्ग गठन से पहले, जहाँ हम इसे इसके शुद्धतम रूप में देख सकते हैं।[1]

वस्तुतः युद्ध-काल में किसी देश अथवा राज्य-व्यवस्थाओं की राजनीति युद्ध केन्द्रित हो जाती है जिसकी छाया में अन्य समस्याएं ढक जाती हैं। युद्ध की परिस्थिति से ही निर्मित महिलाओं के शोषण की घटनाएं भी एक तरह से इसी राजनीतिक एजेंडे का शिकार हो जाती हैं। परिणामतः पीड़ित महिलाओं की यातना, नृशंसता और उनके वेदनापूर्ण अनुभव युद्ध केंद्रित राजनीति के शोर-शराबे में दब जाते हैं। जब बलात्कार पीड़िताएं अपनी आप-बीती बयान करती हैं तो उनके द्वारा वर्णित उत्पीड़न में एक दुविधा छिपी होती है। वे निडरता और तटस्थता से अपने दर्द को बयान करने से हिचकती हैं। इस तरह वे अपने साथ हुए यौन शोषण को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर पाती हैं। उनके अंतर्मन में अनेक प्रकार की उथल-पुथल चलती रहती हैं। राजनीति से लेकर समाज और परिवार के नज़रिये से वाकिफ़ यह पीड़ित स्त्रियाँ सिमटती चली जाती हैं। जिससे उनके शरीर और मन पर गहरे ज़ख्मों की असहनीय पीड़ा उन्हें धीरे-धीरे मार डालती हैं। गुंटर ग्रास, जिनकी माँ को भी युद्ध में बलात्कार का शिकार होना पड़ता है उन्होंने अपने संस्मरण पीलिंग अनियन (2006)में अपनी माँ की यथास्थिति का उल्लेख करते हुए लिखते हैं किबार-बार झेली गई हिंसा ने मेरी माँ को चुप करा दिया था।[2] यहाँ हिंसा शब्द का प्रयोग बलात्कार के लिए किया गया है। जाहिर है बलात्कार कहकर गुंटर ग्रास अपनी माँ के साथ किये गये अमानवीय कृत्य जो कि अवर्णीय है, उसे दोहराने से कतराते हैं।

दरअसल युद्ध में औरतें केवल शारीरिक रूप से ही प्रताड़ित नहीं की जाती हैं अपितु यह सब कुछ उन्हें ज़ेहनी तौर पर भी पीड़ित करता है। इसलिए ज्यादातर औरतें ट्रामा में चली जाती हैं। वे अपने साथ हुई अमानवीयता को साझा नहीं कर पाती हैं। कितनी ही औरतें आजीवन इस ट्रामा से बाहर नहीं निकल पाती हैं। हालाँकि कुछ औरतें एक अन्तराल के बाद अपने अनुभव को बताती भी हैं। मसलन, कोरिया कीकम्फर्ट वुमनजिन्हें जापानी सेना द्वारा यौन शोषण झेलना पड़ा। वह लगभग 45-50 साल बाद अपने अनुभव साझा करते हुए अंतर्राष्ट्रीय अदालत में मुकदमा भी दायर करती हैं। 

संपूर्ण मानव इतिहास के लिए युद्ध निस्संदेह एक भयावह घटना है। बीसवीं सदी के दोनों विश्व युद्ध मनुष्यता के इतिहास की क्रूरतम स्मृतियाँ हैं। स्त्रियों के लिए तो ये स्मृतियाँ और अधिक क्रूर रही हैं। दरअसल स्त्री-इतिहास में युद्ध घटनाओं का समुच्चय की तरह दर्ज होता है। उनके अवचेतन में यह सतत हिंसा और उत्पीड़न की शृंखला निर्मित करता है। राष्ट्रों का आपसी वर्चस्व-प्रदर्शन वैसे तो पूरी आवाम के लिए खौफ़नाक होता है, लेकिन स्त्रियों के लिए वह अकल्पनीय तथा बेहद यातनापूर्ण घटना होती है। राष्ट्रों के वर्चस्ववादी रवैये ने स्त्रियों को केवल युद्ध के दौरान अपितु उसके उपरांत भी बलात्कृत किया। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में रूसी सैनिकों (रेड आर्मी) द्वारा लाखों जर्मन महिलाओं का बलात्कार किया गया था – “द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में, रूसी सैनिकों ने सैकड़ों हज़ार जर्मन महिलाओं के साथ बलात्कार किया। कुछ अनुमानों के अनुसार लगभग 20 लाख महिलाएं पीड़ित हुईं, जिनमें बहुत सी स्त्रियों को सैनिकों द्वारा बार-बार बलात्कार का शिकार होना पड़ा।[3] इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि हार की खीझ हो अथवा जीत का अहम् - स्त्रियों के आत्मसम्मान को हमेशा ही रौंदा जाता है। युद्ध की समाप्ति के दौरान बदले की भावना से विजेता देशों द्वारा किये गये इस यौन शोषण में पुनः लाखों महिलाओं को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इस संदर्भ में नारीवादी इतिहासकार सुसान ब्राउनमिलर कहती हैं कि यह यौन उत्पीड़नपराजित दुश्मन की औरतों के शरीरों पर निशाना साधने के लिए था जिससे उनकी जीत का प्रदर्शन किया जा सके।[4] रूसी सेना, जर्मन सेना द्वारा किये गये अपराधों का बदला लेने के लिए विक्षिप्तों की तरह जर्मन महिलाओं के साथ बलात्कार किये जा रही थी। वे अपने युद्धोन्मादी अहं की तुष्टि के लिए अलग-अलग तरीकों का प्रयोग कर रहे थे, जिसमें एक तरीका सामूहिक बलात्कार भी था ज़ाखर अग्रानेन्को बताते हैं किएक समय में एक साथ नौ, दस, बारह लोगों द्वारा उनका सामूहिक बलात्कार किया जाता है।[5] सामूहिक बलात्कार जैसी हिंसक घटनाएँ पराजित देशों को आतंकित और अपमानित करने की कड़ी के साथ ही दंभजनित उत्सव भी था, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकविजेताओं द्वारा किए गए सामूहिक बलात्कारकोक्षेत्रीय अधिग्रहण का एक प्रतीकात्मक उत्सवबताया है।[6]

जब भी हम विभिन्न युद्धों में किये गये यौन उत्पीड़न की बात करते हैं तो हमें यह बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि उस दौरान स्त्रियों पर की गयी हिंसाओं की पीड़ा कई गुना अधिक होती है। कई बार ऐसा होता है कि युद्ध की विभीषिका से हमारा सीधे तौर पर गहरा सम्बन्ध नहीं होता है, इसलिए हम युद्ध में झेली गयी उन स्त्रियों की यातनाओं के मर्म की अनुभूति और अभिव्यक्ति का सही-सही आकलन नहीं कर पाते हैं। हालांकि उन हिंसाओं के प्रत्यक्ष गवाह रहे लोगों ने अपने संस्मरणों में उन यातनाओं को दर्ज किया है। जब आउसवित्ज़ मुक्ति दिवस की साठवीं वर्षगाँठ मनायी जा रही थी, तब कोप को उन सभी भयावह घटनाओं का स्मरण होता है जो उस रोज उन्हें झेलना पड़ा था वह अपनी डायरी (जिसे बाद में ‘Why Was I a Girl? The Trauma of a Flight 1945’ से प्रकाशित किया गया) में उल्लिखित उस घटना को पढ़ती हैं जो इस प्रकार है आउसवित्ज़ मुक्ति दिवस यानी की “27 जनवरी 1945 उनके जीवन का सबसे बुरा दिन था, जिस दिन उनके साथ कई बार बलात्कार किया गया।[7] ऐसे ही एक संस्मरण का वर्णन अलेक्सान्द्र सोल्शेनीत्सिन अपनी पुस्तकप्रशियन नाइट्समें करते हुए लिखते हैं

एक सुबह, दीवारों के साए में आधा डूबा हुआ दृश्य:

माँ घायल है, पर अब भी जीवित।

छोटी बेटी गद्दे पर पड़ी हैमृत।

कितनों ने उसे रौंदा होगा?

एक पलटन? शायद पूरी टुकड़ी?

एक लड़की को औरत बना दिया गया,

और एक औरत को लाश।

सब कुछ सिमट गया है कुछ साधारण वाक्यों में

मत भूलो! क्षमा मत करो! खून के बदले खून!

दाँत के बदले दाँत!

माँ गिड़गिड़ाती है,

मुझे मार दो, सिपाही!” उसकी आँखें धुंधली और रक्तरंजित हैं।

 अंधेरा छा गया है। वह देख नहीं सकती।

क्या मैं उनमें से एक हूँ? या किसकी?”[8]

एक स्त्री जो कि एक माँ है, उसके सामने ही उसकी बेटी को विजेता देश के सैनिकों द्वारा अपनी हवस का शिकार बनाया जाता है। यह जितना निर्मम है उतना ही अमानवीय भी है। उन हिंसाओं में स्त्रियों को जाने कितनी यातनाओं के गर्त से गुजरना पड़ता है। ये आघात क्षणिक मात्र नहीं थे बल्कि सदियों तक स्त्रियों की रूह पर ताजे जख्म की तरह रह जाने वाले थे।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति तक कई ऐसे गाँव और शहर थे जो पुरुषों से लगभग रिक्त हो चुके थे। चूँकि पुरुषों को युद्ध में बतौर सैनिक भेज दिया जाता था। जहाँ वे लड़ते हुए मारे जाते थे। इस तरह उन गाँवों में औरतें, बच्चे और कुछ बूढ़े लोग बचे रहते हैं। कोप्लेव अपने संस्मरण में ऐसे ही गाँव का जिक्र करते हैं, जिसे युद्ध के बाद रूस द्वारा अधिकृत कर लिया जाता है। उन्हें उस गाँव को देखकर अपने देश के एक गाँव का स्मरण होता है, जिसपर जर्मनों द्वारा आक्रमण कर लूट लिया जाता है। वह गाँव भी पूरी तरह पुरुषों से खाली हो गया था, जहाँ स्त्रियाँ जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रही थी और बच्चे दाने-दाने को मोहताज़ थे। इसलिए कोप्लेव प्रशिया के गांवों और वहां की संपत्ति को जलाये जाने के पक्ष में नहीं थे। वे लिखते हैंहालांकि, मेरी मूल प्रतिक्रिया एक गहरी वितृष्णा की ही रही कि इस समस्त संपत्ति को यूँ ही निरर्थक नष्ट किया जाना कितना मूर्खतापूर्ण है। जब मेरे अपने देश में ऐसे गाँव थे, जहाँ युद्ध अग्निकाय स्तंभ की भाँति गुजर चुका था या फिर किसी अदृश्य दैत्य की तरह दूर बैठा ही रोटियाँ और रक्त चूस ले गया था। जहाँ खेतों में अब केवल स्त्रियाँ ही बची थीं, हल में जुती हुई, जैसे कोई नाव खेने वाले मज़दूर जुते हों। जहाँ चीनी का एक टुकड़ा किसी चमत्कार से कम नहीं था, और बच्चे, जिनकी आँखें अस्वाभाविक रूप से बड़ी थीं एवं चेहरे नीले-सफेद, मानो, जीवन का रंग ही उनसे छीन लिया गया हो- किसी अजीब, काले, कड़वे, मिट्टी जैसे स्वाद वाले ब्रेड को चबाते और घुटते थे, जिसे मात्र शैतान ही जानता था कि वह किस चीज़ से बना होता था।[9] 

युद्ध अपने मूल में एक हिंसात्मक अवधारणा है। इसी हिंसा की ताकत से बसे बसाये समाज और देश की यथास्थिति को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाता है। चूँकि यह सब बदले की भावना निर्मित हिंसा से होता है, इसलिए यह अंततः निराशा और हताशा को ही जन्म देता है। स्त्रियों के लिए यह सब उनके जीवन में दुगुनी चुनौती की तरह प्रस्तुत होता है। इसी क्रम में लेव कोपेलेव अपने संस्मरण में लिखते हैं कि कैसे एक दूसरे राष्ट्र से नफ़रत इतनी ज्यादा बढ़ गयी थी कि जब ये लोग जर्मनी के नीडेनबर्ग (द्वितीय विश्व के उपरांत जब रेड आर्मी का इस क्षेत्र पर अधिकार हो गया तो इस जगह का नाम बदलकर निडज़िका कर दिया गया) पहुँचते हैं तो रेड आर्मी द्वारा वहाँ बचे हुए नागरिकों (विशेषकर स्त्रियाँ) के साथ क्रूर और बर्बर व्यवहार किया जाता है, इस सन्दर्भ में वे बताते हैं – “शाम हो रही थी जब हमने नीडेनबर्ग में प्रवेश किया, यह एक छोटा शहर था जिसकी सड़कों पर पेड़ लगे थे। यह जगह जल रही थी। पुनः यह हमारे ही लोगों का काम था। एक बगिया की बाड़ के पास एक बूढ़ी औरत की लाश पड़ी थी। उसकी पोशाक फटी हुई थी; एक टेलीफोन रिसीवर उसकी जंघाओं के बीच रखा था। शायद उन्होंने उसे उसकी योनि में डालने की कोशिश की थी।[10] यह बेहद अमानवीय और रूह को कंपा देने जैसा है। एक मरी हुई स्त्री की योनि में टेलीफोन रिसीवर को डाला जाना कितना भयावह है।

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की 1994 की एक रिपोर्ट में स्त्रियों के साथ हुई इसी प्रकार की हिंसा का उल्लेख देखा जा सकता है – “पीड़ितों के साथ यौन उत्पीड़न में टूटी हुई काँच की बोतलों, बंदूकों और लाठियों जैसे बाह्य वस्तुओं का उपयोग किया गया।[11] दरअसल इन युद्धों में स्त्रियों के साथ हर संभव बर्बरता की गयी और उनकी देह पर इस युद्ध की नृशंसता का परचम लहराया गया। उन्हें मात्र देह समझा गया और उन्हें गिद्धों की तरह नोंचा गया। इस क्रम में एक रूसी लेखक, सैन्य बैरकों में की गयी बर्बरता का उल्लेख करते हुए बैरकीय कामुकता कोसबसे घिनौनी विदेशी पोर्नोग्राफीसे कहीं अधिक आदिम और हिंसक बताते हैं[12]

युद्ध के दौरान और उसके उपरांत सामाजिक और पारिवारिक  संबंधों में अनेक तब्दीलियाँ देखने को मिलती हैं। यौन हिंसा पीड़िताओं को उनका समुदाय बहिष्कृत कर देता है कोप एक ऐसी ही पीड़िता हैं, जो बताती हैं कि वह अपनी माँ से अपने साथ हुए उन तमाम हिंसक क्रूरताओं को साझा करना चाहती हैं लेकिन उनकी माँ उन्हें किसी भी प्रकार का भावनात्मक सहारा नहीं देती। वह अपने परिवार और खासकर अपनी माँ के द्वारा अकेली छोड़ दी जाती हैं। उन्हें अपने घर से निर्वासित कर दिया जाता है। वस्तुतः पीड़िताओं  के प्रति यह रवैया उन्हें आजीवन कष्ट पहुंचाता है। कोप अपनी माँ के द्वारा किये गये इस संवेदनहीन बर्ताव से अपने को अपमानित महसूस करती हैं। वह अपने संस्मरण में लिखती हैं एक मायने में, उसने (माँ ने) मुझे खुली तलवार की धार पर छोड़ दिया।[13] उपन्यासकार वसीली ग्रासमैन रेड आर्मीसे जुड़े युद्ध संवादाता थे। इन्होंने पीड़िताओं से संवाद करते हुए यह पाया कि यौन उत्पीड़न की शिकार केवल जर्मन महिलाएं ही नहीं थी अपितु उनमें पोलिश, रूसी, बेलोरूसीयन और यूक्रेनी महिलाएं भी शामिल थी। जिन्हें युद्ध के दौरान दास (यौन दासी) बनाकर जर्मनी भेजा गया था। इस युद्ध के अंत में जब रूसी सैनिकों द्वारा रूसी लड़कियों को मुक्त किया जाता है तब वे शिकायत करती हैं, जिसका उल्लेख इस प्रकार है – “मुक्त की गई सोवियत लड़कियां अक्सर शिकायत करती हैं कि हमारे सैनिक उनका बलात्कार करते हैं।[14] इस युद्ध में ज्यादातर महिलाओं के साथ एक से अधिक बार तथा सामूहिक बलात्कार किया गया। जाहिर तौर पर यह सभ्यता की उन क्रूर हिंसाओं में शामिल है जिसने मानवता को शर्मसार किया है। एंटनी बीवर 1945 में किये गये हिंसक और क्रूर यौन उत्पीड़न की चर्चा करते हुए अपनी चिंता व्यक्त करते हैं कि 1945 की घटनाएं दर्शाती हैं कि यदि जवाबदेही का भय हो, तो सभ्यता का आवरण कितना पतला हो सकता है [15] 

यक़ीनन इतिहास के पन्नों में वर्णित युद्धों की इन बर्बरताओं से जब भी हम गुजरेंगे तो बेशक उन यातनाओं को महसूस करेंगे। चूँकि इतिहास में दर्ज घटनाएँ हमें बीते समय की घटनाओं से परिचित कराती हैं इसलिए चाहे, अनचाहे इन आघातों से हमारा सामना होता रहेगा। इतिहास और आघात के इसी सह-सम्बन्ध के बारे में कारू लिखती हैं किइतिहास, जैसे कि आघात, कभी केवल किसी एक का नहीं होता, बल्कि इतिहास ही वह माध्यम है जिससे हम एक-दूसरे के आघात में जुड़ जाते हैं।[16] विश्व के लगभग सभी हिस्सों में बलात्कार को लेकर लोगों में ऐसी धारणाएं रही हैं, जिसमें बलात्कार का असल दोषी स्त्री को ही माना जाता है। इसलिए वह अपने साथ हुई इन अमानवीय हिंसाओं को आजीवन समाज और परिवार से  छुपाने का प्रयास करती रहती हैं।  हालांकि यह जाहिर तौर पर कहा जा सकता है कि युद्धों में इस तरह की क्रूरताएँ पुरुषों द्वारा स्त्रियों की देह और आत्मा पर की जाती रही हैं, बावजूद जितनी बार ऐसी हिंसाएँ सामने आती हैं उतनी बार किसी किसी स्त्री को दोषी बनाकर कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यही कारण है कि स्त्रियों को उन पर हुई बर्बरताओं का कोई न्याय नहीं मिल पाता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जिन औरतों के साथ बलात्कार किया गया, जिन्हें अधमरी हालत में छोड़ दिया गया, वे इस पर चुप्पी साध लेती हैं या तो लम्बे अन्तराल के बाद इसपर कार्यवाही करने हेतु सामने आती हैं। इसके परिणामस्वरूप स्त्रियाँ यौन-शोषण की यातनाओं के साथ ख़ुद को इस समाज से छुपाने के प्रयास करने लगती हैं। युद्ध जैसी विशेष परिस्थितियों में स्त्रियों के साथ किये जाने वाले व्यवहार चाहे वह अपने देश में हो या शत्रु देश में, बहुत ही चिंतनीय है।

निष्कर्ष : संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि युद्ध के दौरान बलात्कार जैसी घृणित अमानवीयता से विजेता और पराजित दोनों देशों की स्त्रियों को गुजरना पड़ता है। वह स्त्रियाँचाहे जिस उम्र, स्थिति और देशकाल की हो। जैसा कि पहले कहा गया - युद्धों का समाजशास्त्रीय अध्ययन करने पर स्पष्ट होगा कि वे स्त्रियों के लिए अधिक क्रूर रहे हैं। दरअसल सदियों से युद्ध की परिणति यही रही है कि विजेता को लूट मिलती है और महिलाओं को उस युद्ध की लूट का हिस्सा बना दिया जाता है। इतिहास बताता है, अनगिनत युद्धों में स्त्रियों की देह को ही युद्ध-भूमि बना दिया जाता है और उसपर जीत को ही देश, समाज अथवा समुदाय पर जीत का प्रतीक मा लिया जाता है। 

            इतिहास के तमाम छोटे-बड़े युद्ध के अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि स्त्रियों का बलात्कार कभी किसी राष्ट्र के विजय का उत्सव तो कभी पराजित राष्ट्र की कुंठित मनोवृत्ति बन जाती है। दोनों ही परिस्थितियों में स्त्रियों की यातना और चीखों को अनसुना कर दिया जाता है। उपरोक्त विवरण हमारे सामने जो बड़ा सवाल छोड़ जाते हैं उस पर हमें विचार करने की जरूरत है - क्या वाकई औरतों का कोई देश होता है?

संदर्भ :

[1] लर्नर, गर्डा; क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, 1987, पेज - 80.
[2]क्रिमर, एलिज़ाबेथ, जर्मन वूमेन्स लाइफ राइटिंग एंड होलोकॉस्ट: कॉम्प्लिसिटी एंड जेंडर इन सेकेंड वर्ल्ड वॉर, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, यूनाइटेड किंगडम, 2018, पेज – 126.
[3] क्रिमर, एलिज़ाबेथ, जर्मन वूमेन्स लाइफ राइटिंग एंड होलोकॉस्ट: कॉम्प्लिसिटी एंड जेंडर इन सेकेंड वर्ल्ड वॉर, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, यूनाइटेड किंगडम, 2018, पेज -115.
[4] एंटनी बीवोर, ‘ रशियन सोल्जर्स रेप्ड एवरी जर्मन फीमेल फ्रॉम एट टू 80’ वेड 1 मे 2002. https://www.theguardian.com/books/2002/may/01/news.features11
[5] एंटनी बीवोर, ‘ रशियन सोल्जर्स रेप्ड एवरी जर्मन फीमेल फ्रॉम एट टू 80’ वेड 1 मे 2002. https://www.theguardian.com/books/2002/may/01/news.features11
[6]स्पिवाक, गायत्री चक्रवर्ती; क्रिटीक ऑफ पोस्टकोलोनियल रीजन: टुवर्ड्स हिस्ट्री ऑफ वैनिशिंग प्रेज़ेंट, कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1999, पेज - 300.
[7] क्रिमर, एलिज़ाबेथ, जर्मन वूमेन्स लाइफ राइटिंग एंड होलोकॉस्ट: कॉम्प्लिसिटी एंड जेंडर इन सेकेंड वर्ल्ड वॉर, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, यूनाइटेड किंगडम, 2018, पेज -127.
[8] सोल्झेनित्सिन, अलेक्ज़ेंडर; प्रुशियन नाइट्स, ट्रांसलेटेड बाय रॉबर्ट कॉन्क्वेस्ट, विलियम कॉलिन्स सन्स एंड कंपनी लिमिटेड, ग्रेट ब्रिटेन, 1974, पेज - 41.
[9] कोपेलेव, लेव; टू बी प्रिज़र्व्ड फॉरएवर, लिप्पिनकॉट प्रेस, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका, 1977, पेज38.
[10] कोपेलेव, लेव; टू बी प्रिज़र्व्ड फॉरएवर, लिप्पिनकॉट प्रेस, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका, 1977, पेज – 39.
[11] फाइनल रिपोर्ट ऑफ कमिशन ऑफ एक्सपर्ट्स एस्टैब्लिश्ड पर्सुएंट टू सिक्योरिटी काउंसिल रिज़ोल्यूशन 780 (1992), S/1994/674, 27 मे 1994, चैप्टर IV, F., पेज – 60.
[12]एंटनी बीवोर, ‘ रशियन सोल्जर्स रेप्ड एवरी जर्मन फीमेल फ्रॉम एट टू 80’ वेड 1 मे 2002, https://www.theguardian.com/books/2002/may/01/news.features11
[13]क्रिमर, एलिज़ाबेथ, जर्मन वूमेन्स लाइफ राइटिंग एंड होलोकॉस्ट: कॉम्प्लिसिटी एंड जेंडर इन सेकेंड वर्ल्ड वॉर, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, यूनाइटेड किंगडम, 2018, पेज-128
[14] एंटनी बीवोर, ‘ रशियन सोल्जर्स रेप्ड एवरी जर्मन फीमेल फ्रॉम एट टू 80’ वेड 1 मे 2002, https://www.theguardian.com/books/2002/may/01/news.features11
[15] एंटनी बीवोर, ‘ रशियन सोल्जर्स रेप्ड एवरी जर्मन फीमेल फ्रॉम एट टू 80’ वेड 1 मे 2002, https://www.theguardian.com/books/2002/may/01/news.features11
[16] कारूथ, सी.; अनक्लेम्ड एक्सपीरियंस: ट्रॉमा, नैरेटिव, एंड हिस्ट्री, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1996, पेज – 124.

 

पूजा यादव
पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो, आई. सी. एस. एस. आर., नई दिल्ली, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी
pooja16y@bhu.ac.in, 8400262908
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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