संस्मरण : शिवगंज टू सिरोही वाया पालड़ी एम / कैलाश गहलोत

शिवगंज टू सिरोही वाया पालड़ी एम
- कैलाश गहलोत


(1)

शिवगंज बस स्टैंड पर जोधपुर से आबूरोड मार्ग के लिए जोधपुर डिपो वाली बस आती; ठीक सुबह आठ बजकर पंद्रह मिनिट पर। बड़ी समय पाबंद गाड़ी, वजह थी उसका ड्राइवर मोहर सिंह। ताव दी हुई मूछें, पूरी सफेद लेकिन प्रभावशाली। बोली कड़क, कायदा पसंद आदमी और एक डंडा हमेशा तैयार ड्राइवर सीट के पास में। गाड़ी हमेशा ठीक समय पर आ जाया करती थी, चाहे कोई भी मौसम हो। कायदा प्रियता इस हद तक कि गाड़ी अगर एक बार बस स्टैंड से उठ गई, तो साक्षात भगवान के लिए भी ना रुके। रास्ते में भी वही बात, रुकेगी तो स्टैंड पर ही और कहीं नहीं, ना कोई अनुनय-विनय माना जाएगा, ना कोई मजबूरी देखी जाएगी। ऐसे ही एक दिन मोहर सिंह की गाड़ी तेज गति के साथ बस स्टैंड में घुसी। हमारा वही रोज का काम, बस देखते ही चढ़ने के लिए लपकना लेकिन आज एक चीज घटित नहीं हो रही थी, वह थी कंडक्टर का चिल्लाना ‘टिकट लेकर बैठो’ ‘टिकट लेकर बैठो’ अब ऐसी भीड़ में कौन टिकट लेकर बैठे, टिकट लेने खिड़की पर जाए या सीट पर कब्जा करें। यह पहले से ही तय था कि टिकट लेने वाली बात सिर्फ कहने के लिए कही जा रही है, टिकट अंदर ही दिया जाना है लेकिन उस दिन वह आवाज गायब, आवाज देने वाला भी गायब, यह क्या चमत्कार हुआ ‘क्या आज से बसों में कंडक्टर आना बंद हो गए’ ‘क्या आज टिकट कोई मशीन देगी’ ‘क्या आज की यात्रा फ्री है’ ‘क्या मोहर सिंह स्वयं टिकट देंगे’ बड़ी चर्चा चल पड़ी लोगों में, मजाक में ही किसी ने पूछ लिया ‘मोहर सिंह जी आज आपकी बस का कंडक्टर कहाँ है’ जवाब में बस एक तीखी नजर। बस के चलने का समय हो गया गाड़ी स्टार्ट कर दी गई, चेतावनी के लिए एक लंबा हॉर्न बजा दिया गया, गाड़ी अभी चलने ही वाली थी कि बस का कंडक्टर एक ऑटो रिक्शा में बैठकर भागा भागा आया, भाग कर सीधा बस में चढ़ा, लोगों ने पूछा अरे! भाई क्या हुआ? कहाँ से आ रहे हो? यह सब क्या? अरे! मैं जरा लघु शंका को चला गया था जितने में गाड़ी के चलने का समय हो गया, मैंने मोहर सिंह को कहा था बस एक मिनिट में अभी आ ही रहा हूँ पर कायदा तो कायदा और बस मुझे वहीं छोड़कर निकल पड़ी।

(2)

अरे! भाई साहब नींद मत लीजिए, ड्राइवर ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, उसे यह पता नहीं था; मैंने सारणेश्वर महादेव को प्रणाम करने के लिए आँखें बंद करके सिर झुकाया था। सिरोही के गोयली चौराहे पर अक्सर भीड़ रहा करती थी। यह बस भी बस स्टैंड से खचाखच भरी हुई आई थी, लेकिन मुझे केबिन में बैठने की जगह मिल गई थी। राजस्थान रोडवेज की बस में ड्राइवर के केबिन का अपना महात्म्य है। पहले तो उसके अंदर घुसना ही एक चुनौती है, जैसे-तैसे काँच को आगे-पीछे करते हुए, पैरों की कुशलता का पूर्ण प्रयोग करके आप अंदर प्रवेश ले पाएँगे, अंदर पहुँचते ही हाथ यहाँ मत रखो, यहाँ पैर मत रखो, ये बैग रखने की जगह नहीं है, साइड ग्लास से दूर बैठो, खिड़की का काँच मत खोलो, ये सारे दिशा निर्देश ड्राइवर की तरफ से मिलना शुरू हो जाते हैं। मुझे कभी-कभी लगता बस का यह ड्राइवर-केबिन, राजस्थान की उस सामंती व्यवस्था का प्रतीक है जो लगभग- लगभग जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है, लेकिन मरी नहीं है। हर बस में लाल रंग से लिखा हुआ होता धूम्रपान वर्जित है लेकिन ड्राइवर के केबिन में धूम्रपान, तंबाकू इत्यादि शक्तिवर्धक वस्तुएँ ड्राइवर के द्वारा निस्संकोच उपयोग में लाई जाती है। गाड़ी पालड़ी एम तक पहुँची। यह क्या कि थोड़ी देर बाद खुद ड्राइवर को ही झपकी आने लगी, दो-तीन बार ऐसा हुआ तो मैं समझ गया, यह ड्राइवर जबरदस्ती इस नंबर की गाड़ी पर भेजा गया है। पालड़ी में कुछ सवारियाँ उतरी तो मैं केबिन से बाहर की सीट पर आकर बैठ गया। कंडक्टर से कहा ‘आपके ड्राइवर साहब झपकी ले रहे हैं’ उसने सुना नहीं तो और जोर से कहा ‘आपके ड्राइवर साहब झपकी ले रहे हैं’ ‘हाँ! क्या कहा, क्या हुआ’ ‘अरे! आपके ड्राइवर साहब सो रहे हैं’ ‘अरे! कोई बात नहीं आप भी सो जाइए ये गाड़ी इसी हाल में माउंट आबू के घाट सेक्सन से उतर कर आ रही है।’

(3)

सिरोही बस स्टैंड से एक उलझा हुआ आदमी बस में चढ़ा। लगभग सारी सवारियों से टकराते-टकराते अंत में पिछली सीट पर जाकर लुढ़क गया। बस चली, गोयली चौराहा तक आते-आते खचाखच भर गई। कुछ महिला सवारि सीट की तलाश करते-करते पीछे तक चली गई और कुछ ही देर में हड़कंप मचा। ये दारू पिया हुआ आदमी कौन बस में बैठ गया है, ये बास मार रहा है, ये बड़बड़ कर रहा है, इसे बाहर उतारो, इसके पास बैठना संभव नहीं है। बस में पीछे से शुरू हुई इन बातों को आगे दरवाजे तक पहुँचते-पहुँचते दस-पंद्रह मिनट लग गए, बाकी लोगों ने भी सुर-ताल में साथ देना शुरू कर दिया। अरे! ये बस में कैसे चढ़ गया, इसे बाहर फेंको। किसी ने आगे बढ़कर उसे कॉलर से पकड़ लिया, उसे भीड़ के बीच घसीटा जाना शुरू किया। जब तक वह बस के दरवाजे तक लाया गया तब तक बस पालड़ी एम पहुँच चुकी थी। किसी ने कहा इसे यही उतार दो, किसी ने कहा, नहीं पहले इसे पीटो, किसी ने कहा चलती बस से बाहर फेंक दो, अलग-अलग मानवों ने अलग-अलग सलाह प्रस्तुत की। वह व्यक्ति बस इतना ही बोल पा रहा था कि एक बार मेरी बात सुन लो। अंततः उस व्यक्ति को नीचे उतार दिया गया। यह सिद्ध हो चुका था कि उसने शराब पी रखी थी। बाहर उतरते ही वह सड़क पर गिर पड़ा। गर्मी तेज थी। बस चल पड़ी। किसी ने कहा अरे! उसकी चप्पल बस में रह गई है, बाहर फेंको, किसी ने कहा अरे! यह पानी की बोतल, किसी ने कहा एक थैली भी रह गई है, अरे! क्या है? कुछ नहीं होगा इसमें, जाने दो, आनन फानन में थैली खोल कर देखी गई, अरे! कुछ कागज है, कोई रिपोर्ट है, हॉस्पिटल की चिट्टी, कुछ दवाइयाँ भी मिली है अंदर। किसी ने कहा शायद परेशान था, किसी ने कहा तकलीफ में होगा। शराब पी ली होगी। किसी ने कहा उसे बस से बाहर नहीं फेंकना चाहिए था, पता नहीं उसे कहाँ जाना था। किसी ने कहा अरे! बस रोको उसे फिर से बिठा लेते हैं। किसी ने कुछ नहीं कहा। किसी ने कहा शिवगंज आ गया।

(4)

शिवगंज से एक महाशय सिरोही के लिए बस में चढ़ते, रोज हमारी ही तरह काम खातिर। उनकी बातचीत से यह सिद्ध हो चुका था कि देश की राजनीतिक और आर्थिक दुर्दशा की जितनी चिंता उन्हें है, उतनी इस देश के शासन प्रशासन को भी नहीं है। वे सवेरे-सवेरे की ताजा खबरें घर से देख-पढ़ आते थे फिर रास्ते भर उनका बखान करते रहते। उन खबरों का विश्लेषण इस तरह करते मानो यदि देश की बागडोर उनके हाथों में सौंप दी जाए तो वे शाम तक सब कुछ ठीक कर देंगे। उनके इसी विमर्श और वार्तालाप के बीच जब कंडक्टर टिकट के लिए प्रकट होता तो किराए के चालीस रुपये के स्थान पर तीस रुपये आगे कर देते, रोज की जान-पहचान वाला कंडक्टर रुपये लेकर चुपचाप आगे बढ़ जाता। लेकिन कई बार ऐसा भी होता कि कोई नया कंडक्टर आता और आग्रह करता कि आप पूरे रुपए दीजिए मैं आपको टिकट बना कर दूँगा तो उनका आर्थिक चिंतन उबल पड़ता। झल्लाकर कहते मैं रोज तीस में ही जाता हूँ, तुम अपना टिकट अपने पास रखो, मुझे उसकी जरूरत नहीं है। कंडक्टर निवेदन करता फ्लाइंग कभी भी आ सकती है, मैं आगे से टिकट दे रहा हूँ आप क्यों नहीं लेना चाहते। देश की खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए अपनी बहस पर अड़े रहते और अंततः कंडक्टर पर विजय प्राप्त करके प्रफुल्लता से भर उठते।

(5)

प्रत्येक बस कंडक्टर का सबसे प्रिय वाक्य यदि कोई है तो वह है ‘पीछे सरको’, ‘पीछे सरको’, बस के हर विराम पर वह चिल्ला-चिल्ला कर यही कहता हुआ नजर आता है। बस में सवार प्रत्येक मानवी के मन की यही मंशा होती है कि उसे बैठने के लिए भरी पूरी सीट मिल जाए लेकिन जिनकी यह इच्छा पूर्ण होती है वे सौभाग्यशाली है, बाकी सफर में लटकने भर के लिए बस की छत से सटे हुए डंडों की अच्छी व्यवस्था है।

‘थोड़े से उधर खिसक जाइए, मैं भी बैठ जाऊँगी’ पहली औरत ने दूसरी औरत से कहा।

‘अरे! यहाँ जगह है कहाँ, जो आप बैठ जाओगी, पहले से ही तो तीन लोग बैठे हुए हैं’ दूसरी औरत ने कहा।

पहली - ‘आप बच्चे को थोड़ा-सा खिड़की से सटा लीजिए, तो मेरे बैठने जितनी जगह हो जाएगी।’

दूसरी - ‘नहीं, मैंने इसका पूरा टिकट लिया है, तो ये सीट पर आराम से बैठेगा।’

इस तरह दो औरतों का वार्तालाप संक्षिप्त में समाप्त हो गया। इसी बीच सिरोही से पालड़ी एम आ गया। कुछ सवारियाँ उतरी। पहली औरत को दूसरी औरत के बगल में सीट मिल गई।

दूसरी औरत ने पूछा- ‘कहाँ जा रही हो बहन’

पहली- ‘मुझे आबूरोड जाना है, आप कहाँ जा रही हो?’

दूसरी- ‘मैं सिरोही तक जाऊँगी’

पहली- ‘बच्चों के साथ जा रही हो’

दूसरी- ‘हाँ ये तो है ही, पीछे सीट पर मेरे पति बैठे हैं’

पहली- ‘अच्छा, उन्हें भी यही बिठा लेते अपने पास’

दूसरी- ‘मैंने कहा था मगर वे खुद ही जिद करके पीछे बैठे हैं, क्या बताऊँ बहन बड़ी मुसीबत है, पति कहने में नहीं है, कुछ कमाते-धमाते है नहीं, तिस पर शराब और पीते हैं, मारपीट और करते हैं, बड़ी परेशान हो गई हूँ इस जीवन से’

पहली- ‘सही कह रही हो बहिन, मेरे वाले भी ऐसे ही दिखते है, जितने शांत अभी तुम्हारे पति दिख रहे है, लेकिन विपदा मेरी भी वही है, जो तुम्हारी है।’

कैलाश गहलोत
सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, राजकीय महाविद्यालय, सिरोही, राजस्थान।

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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