शोध आलेख : सूर के काव्य में प्रेमाभिव्यक्ति का स्वरूप / शेषधर यादव

सूर के काव्य में प्रेमाभिव्यक्ति का स्वरूप
- शेषधर यादव

शोध सार : मध्यकालीन हिन्दी कविता का भवन प्रेम की ही आधारशिला पर निर्मित हुआ है। जहाँ प्रेम अनेक रुपों में दिखलाई पड़ता है। मनुष्य और मनुष्य के मध्य, ईश्वर और मनुष्य के बीच, मनुष्य और प्रकृति के बीच आदि। सूर का पूरा साहित्य ही निश्छल प्रेम का मैदान है। जहाँ प्रेम में सघनता इतनी अधिक है कि भगवान को भक्त से मिलने आना ही पड़ता है। कृष्ण और गोपियों के बीच जो प्रेम का भाव है वह भी कुछ इसी तरह का है। भक्ति कविता में भगवान और भक्त के बीच जो अंतराल है वह खत्म हो जाता है। गोपियों का प्रेम पाने के लिए कृष्ण मनुष्य योनि में अवतरित होते हैं। ब्रज की गलियों में घूम-घूम कर माखन चुराते और खाते हैं। गोपियों को रिझाने के लिए वंशी बजाते हैं। चाँदनी रात में यमुना के कछार में जाकर ब्रज की गोपियों के साथ रास रचाते हैं। यहाँ आकर मनुष्यता और ईश्वरत्व मिलकर एक हो जाते हैं।

बीज शब्द : वात्सल्य, ईश्वरीय, लीलागान, आत्मदान, किलकारी, आह्लाद

मूल आलेख : प्रेम मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके बिना मनुष्य का जीवन निरर्थक होता है। इसीलिए साहित्य जगत में प्रेम का निरुपण अधिकांश कवियों और लेखकों ने किया है। सूरदास भी इससे अछूते नहीं है। सूरदास का पूरा काव्य प्रेम पर ही आधारित है। उनके प्रेम का क्षेत्र बहुत व्यापक है। उसे किसी सीमा में आबद्ध नहीं कर सकते हैं। उनके काव्य में प्रेम का प्रसार मानव जीवन से लेकर प्रकृति और ईश्वर तक है। लेकिन उनके काव्य में मानवीय प्रेम की व्यापकता और विविधता है। यही मानवीय प्रेम ईश्वरीय प्रेम या भक्ति रूप में भी व्यक्त हुआ है। यह प्रेम उनकी काव्यानुभूति, जीवनानुभूति और भक्ति का मुख्य तत्व है। सूर ने प्रेमानुभूति का वर्णन स्वकीया भाव से किया है। परकीया भाव का वर्णन इनके काव्य में बहुत कम मिलता है। सूर के 'सूरसागर' में मानवीय प्रेम, वात्सल्य, सख्य और दाम्पत्य के विविध पक्षों की पूर्ण अभिव्यक्ति हुई है। उनके काव्य में मानवीय प्रेम के आलंबन श्री कृष्ण हैं, इसलिए यह प्रेम चिन्मुख और दिव्य है। प्रेम के लौकिक और पारमार्थिक स्वरूप का जैसा सुंदर समन्वय सूरसागर में हुआ है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। सूरसागर में प्रेम के मानवीय पक्ष को अभियक्ति मिली है, किन्तु कहीं भी उसका आध्यात्मिक पक्ष तिरोहित नहीं है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- “लीलागान में सूरदास का प्रिय विषय था प्रेम। माता का प्रेम, पुत्र का प्रेम, गोपियों का प्रेम, प्रिय और प्रिया का प्रेम, पति और पत्नी का प्रेम, इन बातों से ही सूरसागर भरा है।’’[i]

प्रेम में आत्मदान और अपनत्व के सहारे जिस आत्मविभोर की अवस्था प्राप्त होती है, उसकी पराकाष्ठा वात्सल्य में प्रकट होती है। बालक का माता-पिता के प्रति स्नेह और माता-पिता का बालक के प्रति स्नेह दांपत्य जीवन का जीवन रस बन जाता है। वात्सल्य प्रेम की ऐसी अवस्था है जिसमें निःस्वार्थ, कामनारहित स्नेह का प्रकाश होता है। वात्सल्य में सौंदर्यानुभव का तत्व होता है किन्तु उसमें पालन और मनोरंजन की प्रवृत्ति ही प्रमुख होती है। वात्सल्य का क्षेत्र सेवा, त्याग और आत्मविसर्जन का क्षेत्र है। यहाँ प्रेम में प्रतिदिन की चिंता नहीं रहती। वात्सल्य का भाव प्राणी मात्र में होता है। जिसने अपने भाव जगत को इतना विस्तृत कर लिया है कि उसमें सारा विश्व समाहित हो जाए, उसकी विश्व के कण-कण से आत्मीयता स्थापित हो जाती है।

सूर का वात्सल्य प्रेम श्री कृष्ण के जन्म की आनंद बधाई से ही शुरू हो जाता है। बाल्य प्रेम का जितना विस्तृत एवं विशद रूप इन्होंने प्रस्तुत किया है उतना अन्य कवियों ने नहीं किया। शैशव से लगाय यौवनावस्था तक के न जाने कितने चित्र सूर के यहाँ उपलबद्ध हैं। प्रारम्भ में सूर ने बालक कृष्ण के सहज सौन्दर्य का वर्णन किया है, क्योंकि सर्वप्रथम तो माता-पिता के लिए बालक का अस्तित्व ही सुखद है। माता यशोदा और पिता नन्द कृष्ण के नैसर्गिक सौन्दर्य पर मुग्ध हैंl पालने में सोते समय या करवट बदलते समय सदा उनके रूप-रस का पान करते हुए अघाते नहीं हैं। सूरदास बालक कृष्ण के प्रथम सौंदर्य का वर्णन इस प्रकार करते हैं-

“ललन हौ या छबि ऊपर वारी।
गोपाल लागौ इन नैननि रोग बलाइ तुम्हारी।
लट लटकनि मोहन मसि बिंदुका तिलक भाल सुखकारी।
मनौ कमल दल सावक पेखत उड़त मधुप छबि न्यारी।
लोचन ललित कपोलनि काजर छबि उपजति अधिकारी।
सुख में सुख औरे रुचि बाढ़ति हँसत देत किलकारी।
विकसित ज्योति अधर बिच मानौ बिधु में बिज्जु उज्यारी।
सुंदरता को पार न पावति रूप देखि महतारी।।”[ii] (पद सं. 79)

बालक कृष्ण की क्रीड़ा और मनमोहक चेष्टाओं का जो मर्मस्पर्शी चित्रण सूर ने किया है, उससे उनकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति एवं बाल स्वभाव की सच्ची पहचान का प्रमाण मिलता है। बालक के खेलने, शारीरिक चंचलता और उसकी मुद्राओं से बना मोहक रूप माता-पिता के आनंद को और भी बढ़ा देता है। कृष्ण का धीरे-धीरे बड़े होकर आँगन में घुटनों के बल चलना, अपने प्रतिबिंब को देखकर हँसना और किलकारी मारने की भंगिमा उनके

रूप सौंदर्य को द्विगुणित कर रही है-

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नन्द कै आँगन बिम्ब पकरिबै धावत।
कबहुं निरखि हरि आपु छांह कों कर सों पकरन चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियां पुनि पुनि तिहिं अवगाहत।
कनक भूमि पर कर पग छाया यह उपमा इक साजति।”[iii] (पद सं. 98)

सूर के वात्सल्य प्रेम में बालक कृष्ण के वाह्य रूपों और चेष्टाओं का ही विस्तृत और सूक्ष्म वर्णन नहीं है अपितु कवि ने उनकी अन्तःप्रकृति में भी प्रवेश किया है। स्पर्धा-भाव जो बालकों में स्वाभाविक होता है. सूर ने उसका चित्रण बड़े ही सहज ढंग से किया है-

“मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहिं दूध पियत भई यह अजहूं है छोटी।
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वैहै लंबी मोटी।”[iv] (पद सं. 152)

घर का चहेता लड़का साथियों के मध्य अपने विशेष अधिकार की अपेक्षा करता है। इसीलिए बालक कृष्ण खेल में हार जाने पर भी जीतने का हठ करते हैं। दूसरे बालक इससे नाराज हो जाते हैं। हार-जीत के खेल में बालकों के क्षोभ के स्वाभाविक चित्र सूरदास ने खींचे हैं-

“खेलत में को काको गुसैयां।
हरि हारे जीते श्रीदामा बरबस हीं कत करत यां।
जाति पांति हमतें बड़ नाहीं नाहीं बसत तुम्हारी छैयां।
अति अधिकार जनाबत यातें जातें अधिक तुम्हारे गैयाँl”[v] ( पद सं.214)

बाललीला के आगे फिर उस गोचारण का मनोरम दृश्य सामने आता है जो मनुष्य जाति की अत्यंत प्राचीन वृत्ति होने के कारण अनेक देशों में काव्य का प्रिय विषय रहा है। सूरदास ने यमुना के कछरों के बीच गोचारण के बड़े सुंदर दृश्यों का विधान किया है-

“मैया री मोहिं दाऊ टेरत।
मोकों बन फल तोरि देत हैं आपुन गैयन घेरत।।”[vi] (पद सं. 385)

वात्सल्य का स्नेह ही उस सुख का कारण है जो देवताओं और मुनियों को भी दुर्लभ है। सूरदास संयोग वात्सल्य में पुत्रवती जननी के स्नेह स्निग्ध हृदय के समस्त भाव- संसार की अभिव्यक्ति करते हैं। सूरदास वात्सल्य के संयोग पक्ष को दिखाते हुए वियोग पक्ष का भी बड़ा आकर्षक चित्रण करते हैं। वियोग वात्सल्य में करुणामयी, त्यागमयी माता का वात्सल्य-विह्वल हृदय अभिव्यक्त हुआ है। कृष्ण के मथुरा जाने के बाद माता यशोदा के भाव विह्वल हृदय का सौंदर्य दिखाई पड़ता है। कृष्ण के मथुरा जाने की सूचना से यशोदा का चित्त विह्वल हो उठा। कृष्ण यशोदा के एकमात्र धन हैं, उन्हें वह बार-बार देखकर प्रसन्न होती हैं। कृष्ण से एक पल का भी वियोग असह्य है। सम्पूर्ण ब्रज में कोई भी ऐसा हितैषी उन्हें नहीं दिखाई पड़ता जो कृष्ण को मथुरा जाने से रोक ले। यशोदा का दैन्य और दु:ख व्यक्त नहीं किया जा सकता है-

“छाँड़ि सनेह चले मथुरा, कत दौरि न चीर गह्यो।
फाटि न गई ब्रज की छाती, कत यह सूल सह्यो ।।”[vii]

यशोदा कृष्ण वियोग न सह पाने पर नन्द से ब्रज छोड़कर मथुरा जाने को कहती है-

“नन्द ब्रज लीजै ठोंकि बजाय।
देहु विदा मिलि जाडु मधुपुरी जहाँ गोकुल के राय।”[viii]

सूर के वात्सल्य प्रेम में उनकी व्यापक मानवीय संवेदना, मानव-जीवन के मार्मिक रूपों तथा भावों से गहरी सहानुभूति और जीवन के रागात्मक पक्ष से उसके लगाव कि अभिव्यक्ति हुई है।

मानवीय प्रेम के अंतर्गत गोपी कृष्णप्रेम का अपना अलग महत्व है। गोपी- कृष्ण प्रेम के स्वाभाविक विकास क्रम को सूरदास ने अत्यंत सतर्कता से चित्रित किया है। ऐसे प्रेम की एक अन्य विशेषता है, इसका व्यापक प्रसार, जिसमें प्रेम के लौकिक और दिव्य दोनों रूपों का समावेश हो जाता है। कृष्ण की सम्पूर्ण लीला का प्रेरक तत्त्व है उनका अलौकिक सौन्दर्य। कृष्ण का मोहक सौन्दर्य गोपियों के आकर्षण का मूल प्रेरक तत्त्व है और इस आकर्षण से ही कृष्ण में गोपियों की आसक्ति बढ़ती है। सौन्दर्य ही गोपी-कृष्ण प्रेमलीला की मूल शक्ति है। कृष्ण की सुंदरता से प्रभावित एक गोपी अपनी सखी से कहती है-

“हरिमुख निरखत नैन भुलाने।
ये मधुकर रुचि पंकज लोभी ताही ते न उड़ाने।
कुंडल मकर कपोलनि के ढिंग जनु रबि रैनि बिहाने।
भ्रूव सुंदर नैननि गति निरखत खंजन मीन लजाने।
तिलक ललाट कंठ मुकुताबलि भूषन मनिमय साने।
सूर स्याम रसनिधि नागर के क्यों गुन जात बखाने।”[ix] (पद सं. 1229)

ब्रज की सम्पूर्ण गोपी- कृष्ण प्रेमलीला का आधार कृष्ण की रूप-माधुरी और वेणु-माधुरी में स्थित है। इस लीला में वेणु-माधुरी मुरली सक्रिय सहयोग देती है। रूप और नाद के सहारे ही उल्लास और आह्लाद से भरपूर प्रेम संगीत की धारा प्रवाहित हुई है। प्रेम के पथ में बुद्धि बाधक ही है। भावात्मक सम्बन्धों में बुद्धि के प्रवेश से विकृति उत्पन्न हो जाती है। प्रेम में पूर्ण आत्मसमर्पण जरूरी है, आत्मविभोर की अवस्था इच्छित है। गोपियों के मन को इस अवस्था में लाने का कार्य मुरली द्वारा होता है। मुरली के मुखरित होते ही बुद्धि, मर्यादा, चिंता और लोक-लाज आदि प्रेम के बाधक तत्त्व तिरोहित हो जाते हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं- गोकुल में कृष्ण की प्रेमलीला अनेक धाराओं में प्रवाहित हुई दिखती है, किन्तु उसमें मुख्य धारा राधा-कृष्ण प्रेम की है, जिसमें प्रेम की सभी धाराएँ समाहित हो जाती हैं। यदि विद्यापति और सूरदास की तुलना की जाय तो, विद्यापति की राधा विलास-कलामयी है, किशोरी है। यौवन का ईषद उद्‌भेद हुआ है और रूप लावण्य की दीप्ति से दीप्त है। वयःसंधि की अवस्था है, शैशव और यौवन दोनों मिल गए हैं, आँखों ने कान का रास्ता ले लिया है, वचन में चतुरता आ गई है, हंसी की रेखा अधरों पर खेलने लगी है, पृथ्वी पर आसमान का चाँद प्रकाशित हो उठा है'-

“शैशव यौवन दुहुँ मिलि गेल, श्रवनक पथ दुहुँ लोचन लेल।
वचनक चातुरी लहु-लहु हास, धरनीए चाँद करत प्रकाश।

इतना ही नहीं अपितु-

जाहाँ जाहाँ पदयुग धरइ, ताहीं ताहीं सरोरुह भरइ।
जाहाँ जाहाँ झलकट अंग, ताहीं ताहीं बिजुरी तरंग।”[x]

सूरदास की राधा केवल विलासिनी नहीं है। कृष्ण के साथ उनका केवल युवाकाल का संबंध नहीं है, वे परकीया नायिका भी नहीं है। बचपन से ही वे कृष्ण के साथ क्रीड़ा में भाग ले चुकी हैं, घंटों अपने घर न जाकर नंद बाबा के घर में आँख मिचौनी खेलकर समय काट चुकी हैं। पहले ही दिन जब बालक कृष्ण खेलने के लिए ब्रज की गलियों में निकलते हैं. इस अल्पवयस्का सखी को देखकर रीझ जाते हैं, नैन नैनों से मिल जाते हैं, ठगौरी पड़ जाती है- यह स्वर्गीय प्रेम है, वासना से रहित, निर्मल, विशुद्ध-

“खेलन हरि निकसे ब्रज खोरी।
गए श्याम रबि तनया के तट अंग लसति चन्दन की खोरी।
औचक ही देखी तह राधा नैन बिशाल भाल दिए रोरी।।
सूर श्याम देखत ही रीझे नैन नैन मिलि परी ठगोरी।।”[xi] (पद सं. 454)

सामंती परिवेश को देखते हुए प्रेम के मनोविज्ञान में जैसी प्रणय विषयक धारणाएँ बन सकीं उन सब का चित्रण सूर ने अपने काव्य में किया है। मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं- “कृष्ण और गोपियों का प्रेम सौंदयानुभूति, साहचर्य और संयोग में पला और विकसित हुआ है। गोपियाँ प्रतिदिन कृष्ण के लुभावने रूप-रस का पान करती है, उनका मन कृष्ण में अनुरक्त है। गोपियाँ कृष्ण से मिलन की कामना ही नहीं करती, उसके लिए प्रयास भी करती हैं। वे प्रेम-विवश हैं, उनका मन कृष्णमय है, हृदय में हर्ष अंगों में पुलक और उत्फुल्लता है। गोपियों में श्रेष्ठ राधा के मोहक सौन्दर्य की ओर कृष्ण भी आकृष्ट हैं और राधा-कृष्ण दोनों में मिलन की आतुरता है। राधा का मन विशेष व्याकुल है, उनका हृदय भावनाओं के अन्तःसंघर्ष से बेचैन है। एक ओर संयोग की प्रबल आकांक्षा और दूसरी ओर संकोच, लज्जा तथा माता-पिता का भय है।”[xii] राधा की इस मनःस्थिति का चित्रण सूर ने प्रभावशाली ढंग से किया है-

“नागरि मन गई अरुझाइ ।
अति बिरह तनु भई व्याकुल घर न नेंकु सुहाइ।
चित चंचल कुँवरी राधा खान पान भुलाइ ।
कबहुँ बिहंसति कबहुँ बिलपति सकुचि रहति लजाइ।
मातु पितु को त्रास मानति मन बिना भई बाइ।”[xiii] (पद सं. 459)

प्रिय के प्रवास से प्रिया के हृदय में वेदना का उद्भव स्वाभाविक है। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर वियोग उपस्थित हो गया। गोपियों को जब पता चलता है कि कृष्ण हमें छोड़कर मथुरा जा रहे हैं तो वे व्याकुल हो उठती हैं। वेदना विकल मन की दैन्य अवस्था अत्यंत कारुणिक है। गोपियाँ कृष्ण दर्शन की प्राप्ति के लिए आतुर हैं क्योंकि पुनर्मिलन की आशा क्षीण होती जा रही है। जो गोपियाँ कृष्ण के प्रेम प्रेम में गर्वीली और मदमाती थीं, वे अब अत्यंत दीन-हीन दिखाई दे रही हैं। सूरदास ने एक पद में गोपियों की वेदना को चित्रित किया है-

“पिय बिनु नागनि कारी रात।
जौ कहूं जामिनि उवति जुन्हैया उसि उलटी ह्वै जात।
जंत्र न फुरत मंत्र नहिं लागत प्रीति सिरानी जात।
सूर स्याम बिनु बिकल बिरहिनी मुरि मुरि लहरें खात।”[xiv] (पद सं. 2943)

सूरदास के काव्य में मानवीय प्रेम और उसके आध्यात्मिक रूप के अलावा प्रकृति प्रेम के भी दर्शन होते हैं। कृष्ण की सम्पूर्ण लीला प्रकृति की गोद में जमुना के किनारे, कदंब तले, करील के कुंजों में और वृन्दावन के वनों में सम्पन्न हुई है। कृष्ण लीला में प्रकृति सर्वत्र एक सजीव सहयोगी तत्त्व के रूप में कार्य करती हुई दिखाई पड़ती है। इसके अतिरिक्त प्रकृति के कण-कण में उस ईश्वर की छाया विद्यमान है जिसके प्रेम में सूरदास की आत्मा निमग्न है। इसलिए समस्त प्रकृति कृष्णमय होने के कारण प्रेम का आलंबन है। प्रकृति प्रेम में सौन्दर्य की अनुभूति और साहचर्य के कारण प्रेम की प्रतिष्ठा हुई है। 'सूरसागर में वृन्दावन के प्राकृतिक सौन्दर्य के मोहक चित्र है। यहाँ की प्रकृति श्रीकृष्ण का सानिध्य पाकर यह आभास होता है मानो प्रकृति रूपी नायिका अपनी समस्त सुषमा सहित वृन्दावन के चरणों में समर्पित हो गई है। यही कारण है कि ब्रह्मा तक उसके सौन्दर्य को देखकर हतप्रभ हो जाते हैं। यहाँ स्वच्छ जलयुक्त सरोवर जिनमें कमल शोभायमान हैं, शीतल, मंद और सुगंधित हवा के साथ-साथ यमुना बह रही है। पुष्प, लता, द्रुम तथा रमणीय कदंब अपनी छाया से लोगों को शीतलता प्रदान कर रहे हैं। ऐसे वातावरण में ग्वाल-बालों के मध्य कृष्ण के उपस्थित होने से यह शोभा और भी मोहक हो गई है-

“यह मुन ब्रह्मा चले, तुरत वृन्दावन आए।
देखि सरोवर सजल कमल, तिहिं मध्य सुहाए।
परम सुभग जमुना बहै, त्रिविध समीर।
पुहुप लता दुम देखि के, चकित भए मति धीर।
अति रमनीक कदंब छांह रुचि परम सुहाइ।
राजत मोहन मध्य अवलि बालक छवि पाई।”[xv]

बसंत ऋतु में अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने का संदेश पाकर गोपियाँ प्रसन्न हो उठती हैं। ऐसा प्रतीत होता जैसे उनकी प्रसन्नता में योग देने के लिए बसंत ऋतु भी फूल उठी है। पेड़-पौधों में नयी कोपलें और पत्ते निकल आते हैं, मानो प्रकृति अपने पूरे रूप श्रृंगार के साथ उसके स्वागतार्थ स्वयं को प्रस्तुत करती है-

“माधव आवन हार भए।
रितु बसंत फूली बन वेली, उलटे पात नए।
अपनी-अपनी अवधि जानिकै, सबनि सिंगार ठए।
सूरदास प्रभु मिलौ कृपा करि अवधि आस पुजएl”[xvi]

ब्रजक्षेत्र के जिस सुख को सूरदास ने संसार में अनोखा माना है, उसका आधार वहाँ की प्रकृति का कृष्णमय स्वरूप ही है-

“कहाँ सुख ब्रज को सौ संसार।
कहाँ सुखद बंसीतट जमुना, यह मन सदा विचार।
कहाँ वनधाम कहाँ राधा संग, कहाँ संग ब्रज वाम ।
कहाँ लता तरु तरु प्रति बूझनि कुंज नव धाम।
कहाँ विरह सुख बिन गोपिन संग सूर स्याम मन काम।”[xvii]

इसके अलावा सूरदास ने 'सूरसागर' में प्रकृति सुंदरी के अनेक ऐसे चित्र उपस्थित किए हैं जो गोपियों एवं कृष्ण के प्रेम के साक्षी प्रतीत होते हैं। सूर की प्रकृति सुंदरी समस्त सौन्दर्य से परिपूर्ण है। इसलिए सूर का प्रकृति प्रेम अपने आप में अद्वितीय है।

सूर का काव्य प्रेम का काव्य है। उनके प्रेम का क्षेत्र जयदेव और विद्यापति से विस्तृत है। उनके प्रेम के रति भाव में भगवत विषयक रति, वात्सल्य और दाम्पत्य रति ही है। इसलिए उनके प्रेम की उत्पत्ति में रूपलिप्सा और साहचर्य दोनों का योग है। सूर का प्रेम केवल राधा-कृष्ण या गोपिकाओं तक ही सीमित नहीं है अपितु उनका प्रेम माता यशोदा, नन्दबाबा, ग्वाल-बाल, पशु-पक्षियों तथा ब्रज की अदम्य सुंदरी प्रकृति से भी है। उनका प्रेम पावन तथा लोकोत्तर है। इसकी प्रबलता इतनी है कि गोपियाँ समाज की कुल-मर्यादा को त्यागकर अपने प्रियतम से मिलने के लिए निकल पड़ती है।

सन्दर्भ :
[i] हजारी प्रसाद द्विवेदी- हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2014 ई., पृ. 95
[ii] ब्रजेश्वर वर्मा (संपा.) सूरसागर, ज्ञानमंडल लिमिटेड, विक्रम भवन, लंका वाराणसी, संस्करण-1988 ई. पृ. 22
[iii] वहीं, पृ. 26
[iv] वहीं, पृ. 38
[v] वहीं, पृ. 51
[vi] वहीं पृ. 85
[vii] आचार्य रामचंद्र शुक्ल (संपा.) भ्रमरगीत सार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2007. पृ. 34
[viii] वहीं, पृ. 35
[ix] ब्रजेश्वर वर्मा (संपा.) सूरसागर, ज्ञानमंडल लिमिटेड, ब्रिक्रम भवन, लंका वाराणसी, संस्करण-1988 ई. पू. 241
[x] हजारी प्रसाद द्विवेदी- सूर साहित्य, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 75
[xi] ब्रजेश्वर वर्मा (संपा.) सूरसागर, ज्ञानमंडल लिमिटेड, विक्रम भवन, लंका वाराणसी, संस्करण-1988 ई. पृ. 97
[xii] मैनेजर पांडेय- भक्ति आंदोलन और सूर का काव्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1997, पृ. 193
[xiii] ब्रजेश्वर वर्मा (संपा.) सूरसागर, ज्ञानमंडल लिमिटेड, विक्रम भवन, लंका वाराणसी, संस्करण-1988 ई. पू. 98
[xiv] वही, पृ. 582
[xv] सरला शुक्ला, सूर सौन्दर्य, कल्पकार प्रकाशन, लखनऊ, पृ. 106
[xvi] वही, पृ. 102
[xvii] वही, पृ. 106

शेषधर यादव
शोध छात्र, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
9451838066, sgbhu20@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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