शोध आलेख : गंजिफा कला परम्परा में भारतीय पौराणिक कथाओं का सौन्दर्य / कु. अनुज शर्मा एवं सोनिका

गंजिफा कला परम्परा में भारतीय पौराणिक कथाओं का सौन्दर्य
- कु. अनुज शर्मा एवं सोनिका

शोध सार : सृष्टि के प्रारम्भ से ही आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन मानव की अनिवार्य आवश्यकता रही है क्योंकि मानव एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहकर ही वह अपनी भावनाओं की पारस्परिक अभिव्यक्ति करता रहा है। प्रागैतिहासिक समय में मानव मनोरंजनात्मक कार्यों द्वारा अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करता था। समय परिवर्तन के साथ सिन्धु घाटी सभ्यता के समय तथा कालान्तर में विभिन्न स्थानों में बहुतायत में अनेक मनोरंजन से सम्बन्धित वस्तुएँ प्राप्त होती हैं, जिनका उपयोग खेलकूद में किया जाता था। मिट्टी के खिलौने, चौपड़, शतरंज, ताश के खेल आदि। इन्हीं प्रकार के खेलों में गंजिफा भी सम्मिलित है। जिसका आरम्भ 16वीं शताब्दी में भारत में मुगल काल में सूफी संतों द्वारा किया गया। गंजिफा शब्द फारसी भाषा के गंजीफेह शब्द से आया है, जिसका अर्थ ताश खेलना होता है। गंजिफा कार्डों को प्राकृतिक रंगों के द्वारा हाथ से चित्रित किया जाता है, जिनकी कलाकृति सौंदर्यपूर्ण रूप में पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इन कार्डों को आयताकार, गोलाकार रूप में अनेक सेट में बनाया जाता है। यह खेल वर्तमान में आज भी सजीव परम्परा के रूप में मैसूर, सावंतवाड़ी, ओडिशा तथा अन्य स्थानों पर है। शोध पत्र के माध्यम से गंजिफा कार्ड खेल की मौलिकता व विशिष्टता पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जायेगा।

बीज शब्द : गंजिफा कार्ड, पारम्परिक, ताश के खेल, मैसूर, सावंतवाड़ी, ओडिशा, कलाकृति, पौराणिक कथाएँ, खेल, मनोरंजन।

मूल आलेख : 

गंजिफा कला परम्परा में भारतीय पौराणिक कथाओं का सौन्दर्य : कला का मूल आधार सौंदर्य की सृष्टि में परम सत्य की खोज करना है, जो मानव को सतत् आनंद की ओर उन्मुख करती है। प्राचीन भारतीय बुद्धिजीवियों व विचारकों के जीवन का चरम लक्ष्य आनंद की अनुभूति है तथा भारतीय कला का उद्देश्य भी आनंद की प्राप्ति से है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सृष्टि के आरंभ से ही मनुष्य ने जीवन को सुखी व समृद्ध बनाने का प्रयास किया तथा सामाजिक संपर्क, रिश्तों व अन्य अनुभवों को साझा किया है। समाज में रहकर ही वह अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर स्वयं की प्रगति करता है। प्रागैतिहासिक समय में मानव ने गुफाओं में कार्य करना आरंभ कर दिया, जहाँ वह आखेट करना, औजार बनाना, चिंतन-मनन, आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, चित्रण आदि अनेक कार्यों द्वारा अपनी आवश्यकता को पूर्ण करता था। जैसे-जैसे समय में परिवर्तन होने लगा वैसे ही कलाओं में भी बदलाव आने लगा कला चित्रकला, मूर्तिकला एवं वास्तुकला आदि में परिवर्तित हो गई।

चित्र- 1 मिटटी के खिलौने

धीरे-धीरे नगरीय सभ्यता का विकास हुआ और सिंधु घाटी सभ्यता के समय में तथा कालांतर में विभिन्न राजवंशों के समय में चित्रकारी के साथ-साथ मनोरंजन के साधन दृष्टिगत होते हैं- जैसे मिट्टी के खिलौने, चौपड़, शतरंज, ताश के खेल इत्यादि। मानव जीवन में मनोरंजन का अत्यधिक महत्व है, मानव का मस्तिष्क कितना भी विकसित हो जाए परंतु इस थकान भरे जीवन के बाद समय मिलने पर व्यक्ति हास्यपद गतिविधियों के कुछ क्षण अपने जीवन में सम्मिलित करना पसंद करता है। वह अकेले या साथियों के साथ कंकड़, लकड़ी, कौड़ी आदि जैसी प्राकृतिक वस्तुओं के साथ खेलता है। भारत में प्राचीन काल से ही मनोरंजन के साधन के रूप में विभिन्न प्रकार के खेलों को खेला जाता रहा है। विश्व की अनेकों सभ्यताओं के साथ-साथ भारतीय खेलों की समृद्ध परम्परा का इतिहास पुरातन है। प्राचीनतम खेल अतीत को संक्षिप्त दृश्यों के रूप में उजागर करते हैं और खेलने वालों के आनन्द, गतिविधियों, विकास और विश्वासों को साझा करने का प्रयास करते हैं। चौपड़, अष्टपद, पच्चीसी आदि खेल भारतीय हैं और शतरंज, ताश के खेल इत्यादि जैसे कुछ खेलों को भारत में लाया गया है। इन सभी खेलों के संग्रह विभिन्न संग्रहालयों एवं राज महलों में देखने को मिलते हैं। पारंपरिक रूप से खेलों की इस धरोहर को कलाकार संजोकर संरक्षित करने के प्रयास में संलग्न हैं। इसी प्रकार गंजिफा कार्ड खेल भी एक प्रकार का राजघराने में खेला जाने वाला शाही खेल था, जिसे ताश के पत्तों के जैसे खेला जाता था।

चौपड़ – जिसे चौसर भी कहा जाता है। चौपड़ नाम संस्कृत के दो शब्दों चौ और परा से मिलकर बना है, चौ का अर्थ चार और परा का अर्थ कपड़े के तख्ते से है। चौपड़ की उत्पत्ति पच्चीसी के खेल से हुई थी। इस पर अनेक विवाद प्रस्तुत हैं, कुछ विद्वानों का मानना है भारतीय महाकाव्य महाभारत में युधिष्ठिर और दुर्योधन के बीच हुए चौपड़ खेल को पासे वाले खेल का परिवर्तित रूप माना गया है तथा कुछ विद्वानों का अनुमान कहता है कि भारतीय पुराणों में सम्मिलित शिव पुराण के एक अध्याय में शिव और पार्वती पासों का खेल खेलते हुए वर्णित हैं। चौपड़ का खेल न केवल सामान्य व्यक्तियों द्वारा खेला गया वरन् देवताओं के द्वारा भी इस खेल को खेला जाता था। यह खेल रणनीतिक सोच, धैर्य और सामाजिक घनिष्ठता को प्रोत्साहित करता है। 

चित्र- 2 चौपड़ बोर्ड

पारंपरिक रूप से चौपड़ बोर्ड एक कढ़ाईदार कपड़ा होता है जिसकी प्रत्येक भुजा एक बड़े वर्ग (क्रॉस) के आकार के केंद्र पर मिलती है जिसे घर कहा जाता है। यह चार भुजाएं तथा तीन स्तंभ में विभाजित हैं। इसमें चाल निर्धारित करने के लिए आमतौर पर 6 या 7 कौड़ियों या लकड़ी के पासों का उपयोग किया जाता है। यह कुछ रूप में पच्चीसी, परचेसी और लूडो के खेल के समान है।

अष्टपद - अष्टपद खेल का सृजन भारत से ही हुआ था, यह शतरंज खेल का प्राचीन रूप कहलाता है। माना जाता है कि इस खेल की उत्पत्ति सातवीं और आठवीं शताब्दी के मध्य हुई होगी। आठ वर्गों वाले भारतीय खेल को अष्टपद कहा जाता है जिसका संस्कृत में शाब्दिक अर्थ आठ पैरों वाला होता है। यह खेल साधारण रूप से दौड़ के जैसा प्रतीत होता है, परंतु यह ‘आनंद, आराम से खेलने में मिलता है’ की बात बतलाता है। 

चित्र- 3 अष्टपद

भारत में अष्टपद संभवतः लकड़ी के तख्ते पर खेले जाने वाला 8x8 का 64 वर्गों वाला प्रथम खेल था जिसे पासों के द्वारा खेला जाता था। दो, तीन और चार प्रतिभागी वास्तविक कपड़े पर खेले जाने वाले खेल को खेलकर अपने अंतःकरण को प्रफुल्लित कर सकते थे। खेल की गति तय करने के लिए चार कौड़ियों का प्रयोग किया जाता था।

गंजिफा कला की उत्पत्ति -

भारत में गंजिफा कला के प्रारंभिक संस्करण का वर्णन 16वीं शताब्दी के सम्राट हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम द्वारा लिखी पुस्तक हुमायूं नामा में है। इस कला पर लघु चित्रों का कतिपय प्रभाव परिलक्षित होता है, क्योंकि यह कला मुगल काल के समय विकसित होकर भारत में फली-फूली और विभिन्न रूपों में लोगों के समक्ष विकसित हुई।

गंजिफा शब्द फारसी भाषा से, विशेष रूप से गंजीफेह शब्द से आया है, जिसका अर्थ ताश खेलना होता है। जिसे गंजिफा, गंजीफेह तथा गंजपा के नाम से जानते हैं। गंजिफा एक पारंपरिक ट्रिक ट्रैकिंग ताश खेल है, जो कम से कम तीन या छ: खिलाड़ियों के साथ व्यक्तिगत रूप से खेला जाता है। यह कार्ड भारतीय उपमहाद्वीप में ताश खेलने का मुख्य रूप थे। यह खेल मध्यकाल के बाद राजाओं और कुलीनों द्वारा खेला जाने वाला एक लोकप्रिय खेल हुआ करता था। मुगलों के पतन के बाद इन कार्डों को धार्मिकता से जोड़ दिया गया और समय के साथ-साथ गंजिफा कार्ड भारतीय लघु चित्रकला के चित्रकारों के बीच छोटे पैमाने पर एक सामान्य विषय बन गए। गंजिफा कार्ड खेल भारतीय पौराणिक धार्मिक ग्रंथों, महाकाव्यों जैसे रामायण, महाभारत व अन्य प्रसिद्ध कहानियों को समझने के लिए शाही परिवारों में खेला जाता था जिससे यहाँ की सांस्कृतिक व धार्मिक एकता को बल मिल सके। इसमें देवी-देवताओं का अंकन, पशु-पक्षियों का चित्रण व अलंकारिक अंकन दृष्टिगत होता है। 

चित्र- 4 राजस्थानी गंजिफा                                       चित्र- 5 हैदराबाद गंजिफा

यह हिंदू पौराणिक कथाओं व धार्मिक अभिव्यक्ति का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। यह कार्ड हमें गोलाकार, आयताकार व अंडाकार आकार में मिलते हैं। इनमें चित्र प्राकृतिक रंगों जैसे खनिज व वनस्पति से बनाए जाते थे। कार्डों को पारंपरिक रूप से कपड़े, चमड़े, अभ्रक, ताड़ के पत्ते, चंदन, हाथी दांत या कागज से बनाया जाता था। वर्तमान में यह खेल देश के कई राज्यों और क्षेत्र में फैला हुआ है। यह संजीव परंपरा के रूप में मैसूर, सावंतवाड़ी, ओडिशा तथा अन्य स्थानों पर है तथा प्रत्येक क्षेत्र ने अपना-अपना संस्करण व रूप चित्रण परिवर्तित कर इन पर कार्य किया है।

मैसूर गंजिफा -

यह कर्नाटक की प्रसिद्ध लोक कला है। यह खेल मुगल काल के समय प्रस्तुत किया गया और लोकप्रिय हुआ। मैसूर गंजिफा को वोडेयार राजाओं द्वारा संरक्षण प्राप्त हुआ है, जो मैसूर का राजपरिवार हुआ करता था। हिंदू पुराणों के 18 विषयों में यह खेल खेला जाता था, जिसमें रामायण, महाभारत, दशावतार व पवित्र पुस्तकों से संबंधित कहानियों और श्लोकों को सिखाया व सुनाया जाता था। इन विषयों में सबसे प्रमुख व लोकप्रिय दशावतार गंजिफा है, जो भगवान विष्णु के 10 अवतारों पर आधारित एक शृंखला है व शैक्षिक साधन के रूप में प्रस्तुत है। कार्डों के चित्रण के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग तथा अत्यधिक सौंदर्य दर्शाने के लिए गिलहरी के बालों से बने ब्रश का उपयोग किया जाता था। ताश के पत्तों में 120 कार्डों का एक सेट होता है, जो बारह कार्डों के दस सूट में विभाजित होता है। यहाँ पर कार्डों को बेल-बूटे से सजे हुए आयताकार या घनाकार बक्से में संरक्षित करके रखा जाता है, जिसे अन्दर के कार्डों की भांति ही सौन्दर्यपूर्ण ढंग से बनाया जाता है।

चित्र- 6 मैसूर गंजिफा

उड़ीसा गंजिफा -

यहाँ पर गंजिफा को गंजपा के नाम से जानते हैं। उड़ीसा एक वैष्णव राज्य है, इस कारण यहाँ खेले जाने वाले गंजिफा कार्ड के अधिकांश सेट भगवान विष्णु के रूपों से जुड़ी विभिन्न पौराणिक कहानियों पर आधारित होते हैं। इन कार्डों की तैयारी पट्टचित्र के समान ही है। यहाँ पर कार्ड बनाने वाले मूल कलाकार चितारी समुदाय के नाम से विख्यात हैं। उड़ीसा के सोनपुर में खेले जाने वाले पैक में राम और रावण को शासकों के जीवन संघर्ष रूप में सैन्य गतिविधियों से सम्बन्धित विषयों में दर्शाया गया है। इस राज्य में कार्ड बनाने के लिए कपड़ों की चादरों को इमली के बीज के पाउडर से बने पेस्ट से एक साथ चिपका दिया जाता है, फिर इसे तब तक सुखाया जाता है, जब तक की एक सख्त चादर ना बन जाए। सेट की दोनों सतह को एक के बाद एक खुरदरे और पॉलिश किए हुए पत्थर से पॉलिश किया जाता है। रंग प्राकृतिक रूप से प्रयोग किये जाते हैं। इसमें इमली के बीज का पेस्ट मिलाया जाता था जिससे यह लम्बे समय तक फटते नहीं थे। उड़ीसा में पत्तों के पीछे का भाग पीला, हरा, नीला और काला होता है। इन्हें एक अलंकारिक रूप से सजे काले, पीले और भूरे रंग के बने हुए घनाकार बक्से में रखा जाता है।

चित्र- 7 मत्स्य, बलराम, वराह, जगन्नाथ

सावंतवाड़ी गंजिफा -

इस शिल्प के विभिन्न रूप 18वीं व 19वीं शताब्दी के अन्तराल में सावंतवाड़ी में प्रारम्भ हुए। विक्टोरिया एण्ड अल्बर्ट संग्रहालय, लंदन में हिज़ हाईनेस राजे साहेब शिवरामराजे भोंसले की सावंतवाड़ी कार्ड बनाने वाले चितारी से पहचान हुई। राजा और उनकी पत्नी दोनों ने 80 वर्षीय गंजिफा कलाकार पंडुलिक चितारी से यह कला सीखी और उत्साह पूर्वक गंजिफा कला के पुनरुद्धार की यात्रा आरम्भ की। उड़ीसा की भांति ही कार्डों के मूल कलाकारों को यहाँ पर भी चितारी कहा जाता है। यह कला सावंतवाड़ी राजाओं के शाही संरक्षण में और भी सम्पन्न व समृद्ध हुई। इस कला को सजीव रूप में रखने हेतु रानी सत्व शिला देवी जी ने अपना योगदान दिया जिनके कारण यह कला जीवित रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत है। 

चित्र- 8 सावंतवाड़ी गंजिफा

तत्पश्चात् वर्तमान में उनकी पोती श्रद्धा भोंसले उनके इस कार्य को करने में संलग्न हैं। यहाँ पर 120 कार्डों का एक सेट तैयार किया जाता है, जिसे लाल रंग से रंगे, अलंकारिक रूप से सजे हुए घनाकार खिसकने वाले ढक्कन युक्त बक्से में रखा जाता है, जो कार्डों की भाँति ही सुंदर होता है। सावंतवाड़ी गंजिफा में लाल रंग प्रधान रूप में दृष्टिगत होता है।

उद्देश्य -
  • भारतीय पारंपरिक गंजिफा कला की कलाकृतियों के अध्ययन हेतु प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
  • गंजिफा कला की कलाकृतियों के सौंदर्यात्मक पक्ष का विस्तृत अध्ययन करना।
  • भारतीय चित्रकला में गंजिफा कार्ड खेल के योगदान पर प्रकाश डालना।
  • कला रूपों में गंजिफा कला आकृति के उपयोग का संक्षिप्त अध्ययन प्रस्तुत करना।
  • लुप्त हो रही गंजिफा कला संस्कृति और पौराणिक कथाओं को प्रकाश में लाना।
  • पारंपरिक गंजिफा कलाकृतियों के सृजनात्मक पक्ष को ज्ञात करना।

चित्र- 9 गंजिफा कलाकृतियां

कलात्मक विशेषताएँ -

पारम्परिक खेलों का भाग होने के साथ-साथ यह कार्ड अपने आप में कलात्मक वस्तुएं हैं, जिनमें संस्कृति, कला, हिंदू धार्मिक परम्पराओं और प्रतीकों को उजागर किया गया है। ताश के पत्ते निश्चित रूप से किसी एक व्यक्ति का आविष्कार नहीं हैं। यह तो वर्षों (सदियों) से संसार के कई अलग-अलग क्षेत्र में खेले जाने वाले विभिन्न खेलों के समान हैं।

विषय वस्तु – गंजिफा कार्ड की विषय वस्तु रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण एवं अन्य हिंदू पुराणों की कथाओं पर आधारित है। भगवान राम, विष्णु, मां दुर्गा, श्री कृष्ण, बलराम आदि रूपों को दर्शाया गया है। इसमें पशु-पक्षियों का अंकन भी कुशलता से किया गया है जैसे- कच्छप (कछुआ), सिंह, सर्प, वानर, मत्स्य (मछली), मोर, घोड़ा, हाथी आदि को अलंकारिक रूपों में सृजनात्मकता से प्रदर्शित किया गया है। 

चित्र- 10 रंग योजना, आकृति चित्रण

रंग योजना – कार्डों पर रंग चमकीले, वानस्पतिक व प्राकृतिक रूप से लगाए जाते थे। रंग अनेक अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त किए जाते थे। गेरू, रामराज, हीरोंजी आदि अनेक प्रकार के वनस्पति, प्राकृतिक स्रोत और रत्न हैं। कार्डों पर चटकीले रंगों से ब्रश के जटिल स्ट्रोक द्वारा चित्रण किया जाता है, लाल, नीला, पीला, काला, हरा, भूरा और सुनहरा आदि अनेक रंग प्रयुक्त होते हैं। कार्डों के पिछले भाग को सपाट रूप में एक ही रंग से सुसज्जित किया जाता है। रंगों को नारियल के छिलके के आधे हिस्से में संग्रहित करके रखा जाता है।

आकृति चित्रण - कार्डों पर आकृति कोमल रेखाओं के द्वारा आरम्भ से अन्त तक सौंदर्यपूर्ण रूप से हाथ से पूर्ण की जाती है। कार्ड के मध्य में राजा, मंत्री तथा अन्य कार्डों पर एक से दस तक के राजा से संबंधित प्रतीक चिन्ह रेखांकित किए जाते हैं। पुरुष आकृति में राजसी वस्त्र पहने हुए तथा आभूषणों से सजे हुए राजा को और मंत्री को तलवार लिए हुए घोड़े पर सवार दर्शाया जाता है। पशु पक्षियों की आकृति को यथार्थ रूप में नहीं वरन् काल्पनिक रूप में सृजनात्मकता लिए हुए अलंकृत किया गया है।

हस्त निर्मित अलंकारिक चित्रण – वसली पर (कार्ड) चारों तरफ अलंकारिक आकृति को फूल पत्तियों के द्वारा बेल-बूटे बनाकर निर्मित किया जाता हैं तथा कहीं-कहीं वस्त्रों पर भी बूटे व ज्यामितीय रेखांकन प्रदर्शित है। कार्डों पर हाशिये में आकृति को नहीं वरन् बेल-बूटों और ज्यामितीय अंकन को प्रमुख रूप से दर्शाया गया है। हाथी, घोड़े की आकृति में अलंकारिक रूप परिलक्षित होता है।

चित्र- 11 अलंकारिक चित्रण, पट्टचित्र चित्रण

पट्टचित्र चित्रण - गंजिफा कार्डों पर प्रयुक्त कलाकृतियाँ पट्टचित्र चित्रण के समान प्रदर्शित हैं। जिस प्रकार पट्टचित्रों में पौराणिक कथाओं, धार्मिक विषयों और लोक कथाओं को दर्शाया गया है, गंजिफा की विषय वस्तु, रंग योजना, शैली और वसली भी उसी के समान परिलक्षित होती हैं। ताश के पत्तों पर बारीक विवरणों पर अत्यधिक आकर्षक और जटिल सांकेतिक (प्रतीकात्मक) रूप प्रदर्शित है।

ज्यामितीय आकार - कार्ड की बनावट ज्यामितीय आकार जैसे- गोलाकार, आयताकार तथा अंडाकार रूप में बनायी गयी है।

चित्र- 12 विभिन्न आकार के गंजिफा

तकनीक - गंजिफा कार्ड बनाने में कुछ स्थानों पर परिवारों के सभी सदस्य कार्यरत रहते हैं, जिनकी उम्र और क्षमता के आधार पर अपनी-अपनी जिम्मेदारी होती है। इनकी सबसे महत्त्वपूर्ण और आनन्ददायक विशेषता यह है कि ताश के पत्ते वर्तमान में भी हाथ से बनाए जाते हैं और विशेषज्ञ (अनुभवी) शिल्पकारों द्वारा हाथ से पेंट किए जाते हैं, इन्हें लोकप्रिय रूप से चित्रकार कहा जाता है। वर्तमान समय में गंजिफा कार्ड को बनाने के लिए सर्वप्रथम हाथ से गोलाकार या आयताकार रूप को कागज से बनाया जाता है, यह लगभग 68 मिमी व्यास के घेरे में बनाया और कैंची से समान रूप में काटा जाता है। कागज की शीट पर इमली का पेस्ट लगाकर मिट्टी और अरबी गोंद के साथ पकाया जाता है। कागज की कुछ परतों को मिलाकर मोटी परत बनायी जाती हैं, फिर कार्ड को सुखाकर पत्थर से रगड़कर सतह को चिकना किया जाता है तत्पश्चात् उस पर पेंसिल द्वारा आकृति का निर्माण किया जाता है। अब कार्ड की साफ-सुथरी गोलाकार रूपरेखा कम्पास की सहायता से खींची जाती है। आलेखन द्वारा गोलाकार रूप में हाशिये को सुसज्जित किया जाता है। 

  
चित्र- 13 तकनीक                                                         चित्र- 14 सम्पूर्ण रूप

चित्र आकृति को प्राकृतिक रंगों के द्वारा हस्तनिर्मित (गिलहरी के बालों से निर्मित) तूलिका से बारीकी विवरण के साथ आँख, नाक, बालों इत्यादि को रंगा जाता है। चित्रण में गहरे, गाढ़े व चटख रंगों का प्रयोग किया जाता है। रंगों में मुख्यतः लाल, हरा, पीला, काला व सुनहरा आदि रंग परिलक्षित होते हैं और शाही स्पर्श देने के लिए, विशेष रूप से राजसी व्यक्तियों के लिए बनाए गए सेट में अधिकतर सोने और चांदी के पत्तों का प्रयोग किया जाता था। जब कार्ड की रंगाई पूर्ण हो जाती है तब चमकदार रूप देने के लिए वार्निश से कोट किया जाता है। इसमें 96 तथा 120 कार्डों का एक सेट तैयार किया जाता है, जिसे बारह कार्डों के आठ या दस सूट में विभाजित किया जाता है। अन्त में कार्ड को 15-20 मिनट के लिए धूप में सुखाया जाता है और फिर रंगों से चित्रित किए गए लकड़ी के डब्बे में इन सभी कार्डों को सुरक्षित रखा जाता है।

निष्कर्ष : प्राचीन काल से ही खेलों के द्वारा सामाजिक, मानसिक व मानवीयता का विकास होता आ रहा है। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि भारतीय ‘गंजिफा कला’ ललित कला का अनूठा रूप है, जिसमें देवी-देवताओं का अंकन, पशु-पक्षियों का चित्रण व अलंकारिक अंकन दृष्टिगत होता है। गंजिफा एकमात्र गत युग की कलाकृतियां नहीं हैं वरन् यह परम्पराओं से जुड़ी जीवंत कथाएं हैं, जो अपनी कहानियों को उजागर करने के लिए प्रयासरत हैं। यह खेल पारम्परिक रूप से मनोरंजन का साधन बना और लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ। यह कला सजीव परम्परा के रूप में कई राज्यों और क्षेत्रों में जैसे – मैसूर, उड़ीसा, सावंतवाड़ी तथा अन्य स्थानों पर फैली हुई है, जिसका कलात्मक व सौंदर्यात्मक स्वरूप उत्कृष्ट रूप में है। प्रत्येक गंजिफा शैली अपने संबंधित क्षेत्र का सार व्यक्त करके कलात्मकता, संस्कृति और इतिहास को एक मनोरम खेल प्रक्रिया के अनुभव रूप को प्रस्तुत करती है। आज यह खेल बहुत कम खेला जाता है परन्तु वर्तमान में कलाकारों और संस्थानों द्वारा इस उत्कृष्ट शिल्प (गंजिफा कला) को पुनर्जीवित करने व संजोए रखने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं तथा कला की परम्परागत विशेषता को जीवित रखा जा रहा हैं। यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि गंजिफा कला आने वाली पीढ़ियों के लिए फलती-फूलती रहे और पारम्परिक धरोहर को संजोए रखे।

सन्दर्भ :
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  15. Shruti Tiwari, A study of fading art form Ganjifa cards, accent journal of economic ecology and engineering, 2021
चित्र स्रोत :
2. नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली
4 and 5. नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली
12. नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली

अनुज शर्मा
शोधार्थी, (ड्राइंग एंड पेंटिंग विभाग), दयालबाग एजुकेशनल इन्सटीट्यूट, (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) दयालबाग, आगरा

सोनिका
असिस्टेंट प्रोफेसर (ड्राइंग एंड पेंटिंग विभाग), दयालबाग एजुकेशनल इन्सटीट्यूट, (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) दयालबाग, आगरा

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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