संस्मरण : प्रकाश के आलोक में कुछ वर्ष / अनंत भटनागर

प्रकाश के आलोक में कुछ वर्ष
- अनंत भटनागर


“यातना शिविर का कैदी नहीं हूं मैं
कि कोई भी आए
और मेरे घर द्वार को जला जाए
निराश्रित कर दे
मेरे फूल से बच्चों को
दाग दे गोली/ मेरे प्यार भरी दुनिया में
घृणा का नहीं/ प्यार का हरकारा हूँ मैं।”

अपने बच्चों को यातनाओं से बचाने और प्यार भरी दुनिया देने के आकांक्षी कवि प्रकाश जैन से मेरी मुलाकात बचपन-किशोरावस्था के संधि काल में ही हो गई थी। वो अस्सी के दशक की शुरुआत थी। मैं सातवीं-आठवीं कक्षा में पढ़ता था। घर में साहित्य से नाता इतना भर था कि उस समय की लोकप्रिय पत्रिकाएं धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी आदि हमारे घर नियमित आती थीं। पहले कौन पढ़े, इस बात को लेकर हम भाई बहनों में प्रतिस्पर्द्धा रहती थी। इन पत्रिकाओं में साहित्यकारों के संस्मरण, साक्षात्कार, संवाद आदि पढ़कर साहित्यकारों के प्रति एक आकर्षण और उनके बारे में जानने की उत्कंठा रहती थी। इन्हीं दिनों मेरे बड़े भाई का कॉलेज में प्रवेश हुआ और नए मित्रों की साहित्यिक अभिरुचि के कारण वे कवि गोष्ठियों में जाने लगे। उस ज़माने में लंबी कवि गोष्ठियां हुआ करती थीं। प्रायः एक गोष्ठी में पच्चीस-तीस कवियों का होना सामान्य बात थी। बड़े भाई के साथ ही इस उम्र में मुझे एक कवि गोष्ठी में जाने का मौका मिला। प्रेम, शृंगार, हास्य-व्यंग, देशप्रेम, राष्ट्र-भक्ति आदि विविध रंगों से ओतप्रोत इस कवि गोष्ठी के अंतिम पड़ाव में जिस कवि को मंच पर काव्य पाठ हेतु बुलाया गया, उसने मानो पूरी गोष्ठी का रंग ही बदल दिया। शब्दों की लय के साथ उतार-चढ़ाव ग्रहण करती गंभीर वाणी में गूंजती हुई कविता सुनने का यह मेरा पहला अनुभव था। मैंने उस अबोध आयु में कविता का कितना अर्थ ग्रहण किया होगा, यह तो ठीक से कहा नहीं जा सकता लेकिन मन को यह अहसास अवश्य हुआ था कि यह अच्छी कविता है और कविताओं को इस तरह ही पढ़ा जाना चाहिए। मधुर वाणी में गाए जाने वाले गीत व ग़ज़लों या आक्रामक ओज के तेवर से अलग इस तरह की अतुकान्त कविता से परिचय पाने का भी यह पहला अनुभव था। इस कवि गोष्ठी से पहली बार जाना कि कविता पाठ करने वाले ये कवि प्रकाश जैन हैं, जिनकी देश में कवि और अजमेर से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका लहर के संपादक के रूप में ख्याति है।

नवीं कक्षा में मेरा स्कूल बदला गया। नए स्कूल में जो दोस्त बना उसका नाम था संगीत। वह भी उस स्कूल में नया ही था और किसी अन्य स्कूल से आया था। ज़ाहिराना बात थी कि उस स्कूल में जो बच्चे पहले से पढ़ रहे थे उनकी आपसी दोस्तियां गहरी थीं इसलिए उस नए द्वीप में आने वाले हम अजनबियों को एक दूसरे का सहारा मिला। दोस्त बनने की प्राथमिक प्रक्रिया में मैने संगीत से पूछा, उसके पापा क्या करते हैं? उसका जवाब था - कवि हैं। मेरे प्रश्न का यह वैसा जवाब कदापि नहीं था, जो मुझे अपेक्षित था। एक मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा परिवार से होने के कारण मेरी बुद्धि में इस प्रश्न का उत्तर रेलवे, बिजली, बैंक, बीमा कर्मचारी या डॉक्टर- इंजीनियर होने तक ही सीमित था। इस अजनबी उत्तर के बाद अपनी जिज्ञासा को पूर्ण करने के उद्देश्य से मैंने उनका नाम पूछा तो उसके जवाब में प्रकाश जैन सुनकर मेरे मन-मस्तिष्क में विस्मय की असंख्य धाराएं दौड़ पड़ी। एकबारगी तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। उनकी आयु अधिक जानकर मुझे कदाचित यह भी लगा कि या तो संगीत झूठ बोल रहा है, या फिर वे उसके रिश्तेदार लगते होंगे। मैंने फिर से जोर लगाकर पूछा क्या वाकई प्रकाश जैन तुम्हारे पिता हैं? उसकी स्वीकृति मेरे लिए उसी क्षण मेरे लिए आनंद का विषय बन गई और मैंने गर्व से घर पर बतलाया कि कवि प्रकाश जैन का बेटा मेरे साथ पढ़ता है।

हमारी दोस्ती का दायरा धीरे-धीरे बढ़ने लगा और कुछ समय में घर आने-जाने जैसे संबंध बन गए। तोपदड़ा रेलवे फाटक से सटे संगीत के सादे से घर में किताबों का घनत्व क्षेत्रफल की तुलना में कहीं ज्यादा था। अलमारियों और रेक्स में भरी हुई किताबों की गंध पूरे घर में महकती रहती थी। पेड़ों से घिरे इस घर में अतीव शांति थी। निश्चित अंतराल में गुजरती रेल या शनटिंग करते इंजन तंद्रा तोड़ते थे। मेरे मन में एक सवाल उठता था कि इतनी सारी किताबें क्या पढ़ी जा सकती हैं? मैंने संगीत की मम्मी यानी मनमोहिनी आंटी से कभी यह सवाल पूछ भी लिया था कि क्या उन्होंने ये सब किताबें पढ़ रखी हैं? मनमोहिनी आंटी उस घर का प्राण तत्व थीं। संगीत के घर जाने का मेरा उद्देश्य साथ पढ़ाई करने का तो होता ही था एक अतिरिक्त आकर्षण मनमोहिनी आंटी का अपनत्व पाना भी होता था। अपने में सिमटे रहने व मुझ जैसे बेहद कम बोलने वाले को वे बुलवाना जानती थीं। उनके पास बातें भी होती थीं और अनेक सवाल भी। उनका यह आत्मीय व्यवहार संगीत और उसके बड़े भाई हिमांशु के मित्रों और अड़ोसी-पड़ोसी सभी के साथ था। वे सब ही के दुख-सुख, समस्याओं और कठिनाइयों में सहजता से शामिल हो जाती थीं। अब जब साहित्यकारों के साथ पत्र संवाद को पढ़ते हैं तो प्रकाश जी और मनमोहिनी जी के व्यक्तित्व का अंतर सहज समझ आता है। प्रकाश जी के पत्र अत्यंत संक्षिप्त होते थे और मनमोहिनी जी के विस्तृत, साहित्य के साथ साथ पारिवारिक चिंताओं को समेटे हुए। संगीत के घर जाऊं और प्रकाश जी भी वहां हों तो वातावरण कुछ अलग होता था। प्रायः कोई साहित्यकार भी उनके साथ वहां आया हुआ होता था। बरामदे या फिर भीतरी कमरे में साहित्यिक चर्चाएं चल रही होती थीं।वे साहित्य में ही रचे-बसे दिखलाई देते थे। राजकुमार गौतम ने लिखा भी है- "ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिनकी धमनियों में लहू के नाम पर साहित्य दौड़ा करता है।" प्रकाश जी तब तक मुझे पहचानने लगे थे किंतु उनसे सीधे संवाद की सी स्थिति निर्मित नहीं हुई थी। ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ते हुए जिला स्तरीय विज्ञान मेले में भाग लेने के लिए संगीत और मेरा चयन हुआ। मेला जिला मुख्यालय अजमेर में न लगकर इस वर्ष ब्यावर में लग रहा था। स्कूल के दल के साथ किसी अन्य शहर में जाने का यह मेरे लिए पहला अवसर था। मन में डर भी और उत्सुकता भी। संगीत ने बताया कि ब्यावर में उसकी मौसी रहती हैं। हमें जिस सरकारी स्कूल में ठहराया गया, वहां दो चार घंटे रुकने के बाद हमें लगने लगा कि हम क्यों अपना घर छोड़ कर यहां आ गए हैं। बहरहाल, हमने साथ आए अपने शिक्षक से बात की तो हम दोनों को रात में संगीत के घर रहने की अनुमति मिल गई। यह रात कवि प्रकाश जैन के स्थान पर गृहस्थ प्रकाश जैन को जानने के अवसर बनी। हँसता-खिलता चेहरा। उन्मुक्त हंसते बतियाते प्रकाश जैन। मानो सारा घर ही उनके इर्दगिर्द सिमट आया हुआ। खाने के बाद चर्चाएं होने लगीं, कुछ पारिवारिक, कुछ साहित्यिक। इसी बातचीत में एक ऐसा क्षण आया कि अपनी समझ के मुताबिक मैं साहित्यिक वातावरण पर अपनी कुछ राय देने लगा। दो-तीन मिनट लगातार बोलते रहने के बाद मैंने गौर किया कि मैं बोल रहा हूं और प्रकाश जी बड़े ध्यान से एकटक मेरी बात सुन रहे हैं। मैं अचकचा कर अटक गया और संकोच से चुप हो गया। वो मुस्कुराए और मुझे और बोलने के लिए प्रेरित करने लगे उन्हें मेरी बात अच्छी लगी। अब सोचता हूं तो आश्चर्य होता है कि जहां लोग अहंकार के गुब्बारे भरे रहते हैं इतना बड़ा साहित्यकार एक बच्चे की बात को इतनी तन्मयता के साथ कैसे सुन रहा था-

“तुम्हारे पास रह कर
मैने पाया है
कि न मैं बौना हूँ
न तुम
न कोई और।”

कॉलेज में पढ़ते समय साहित्यिक गतिविधियों विशेषकर वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में मेरी सक्रियता थी। मैं द्वितीय वर्ष में था, इंदिरा गांधी की जयंती पर कौमी एकता पर एक कविता पाठ प्रतियोगिता रखी गई। इस प्रतियोगिता में किसी दूसरे व्यक्ति की कविता भी प्रस्तुत की जा सकती थी। आयोजन से जुड़े मेरे मित्र ने दबाव डाला कि मैं भी इसमें भाग लूं। मैंने इस विश्वास के साथ नाम लिखवा दिया कि मनमोहिनी आंटी से कोई कविता ले लूंगा। मैं तब यह नहीं जानता था कि ऐसी विषय केंद्रित कविता उनके पास नहीं मिलेगी। मैं कॉलेज से लौटता हुआ उनके घर पहुंचा तो ताला लगा हुआ मिला। अगले दिन प्रतियोगिता थी। घर पर ढूंढना चाहा तो कुछ ऐसा मिला नहीं। नाम लिखवा कर पीछे हट जाना स्वभाव के अनुकूल नहीं था। मन में निश्चय कर सुबह-सुबह जीवन में पहली बार दो कविताएं लिखीं। प्रतियोगिता में पचास प्रतिभागी थे। प्रारंभिक घबराहट के बाद कविता बोलते समय गले ने वह लय पकड़ ली जो कभी प्रकाश जी को काव्य पाठ करते हुए सुनी थी। प्रतियोगिता का परिणाम आया। मुझे प्रथम स्थान मिला। कॉलेज में मेरी कवि के रूप में ख्याति हो गई। मुझे महाविद्यालय की ओर से काव्य प्रतियोगिताओं में भेजा जाने लगा। अचानक मुझे कविता लेखन की गति मिल गई। अब सोचता हूं कि प्रकाश जी से मिलना जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी तो उस दिन प्रकाश जी-मनमोहिनी आंटी का घर पर नहीं मिलना भी शायद वह घटना थी जिसके परिणाम स्वरूप मैं कविता लिखने लगा। अब शहर की कुछ काव्य गोष्ठियों में मुझे काव्य पाठ का अवसर मिलने लगे, जिनमें कई स्थानों पर प्रकाश जी भी होते थे। उनके पुत्र का मित्र होने के कारण एक सहज स्नेह तो मिलता ही था, पीठ पर थपथपाहट का सहारा मिलने लगा तो कविता लिखने का हौसला बढ़ता गया-

“एक युद्ध है: ज़िन्दगी
एक संघर्ष
आने वाले कल को शक्ल देने की
पुरजोर कोशिश
हर सुबह/भविष्य के नए पृष्ठ की
लिखनी है भूमिका”

"लहर" उन दिनों बंद ही हो चली थी। अचानक प्रकाश जैन की कविताएं राजस्थान पत्रिका में निरंतर प्रकाशित होने लगी। उनकी कविताओं को पढ़कर कम शब्दों में अपनी बात को गहराई से कहने का सलीका समझ आने लगा। अतुकान्त कविता के भीतर की आंतरिक लय क्या होती है, यह जानने का अवसर मिला। प्रकाश जी की कविताओं में आंतरिक लय ऐसा तत्व थी जो काव्यात्मकता की रक्षा करते हुए गद्य और पद्य के भेद को स्पष्ट करती थी। यह बहुत बाद में पता चला कि राजस्थान पत्रिका में उन दिनों उनका निरंतर छपना उनके लिए आर्थिक जरूरत बन गया था।

वर्ष 1986 में प्रकाश जैन का षष्ठीपूर्ति समारोह आयोजित किया गया। यह आयोजन अजमेर के साहित्य, कला व संस्कृति से जुड़े लोगों द्वारा किया गया था और मुझसे अग्रज पीढ़ी के कवि अनिल लोढ़ा, सुरेंद्र चतुर्वेदी, गोपाल गर्ग समारोह के आयोजकों में थे। राजस्थान और देश के अन्य क्षेत्रों के अनेक साहित्यकार इसमें प्रकाश जी के प्रति सम्मान अर्पित करने आए। साहित्यकारों की पारस्परिक आत्मीयता और "लहर" संपादक के अमूल्य योगदान के प्रति इससे बेहतर आभार प्रदर्शन नहीं हो सकता था। अजमेर में किसी साहित्यकार के सम्मान में ऐसा आयोजन फिर कभी नहीं देखा। इस दिन मैने एक तुड़े-मुड़े से कागज पर प्रकाश जी के लिए एक कविता लिखी-

चंदवरदाई के
उत्तराधिकारी हो तुम
लेकिन नहीं
तुम चंदवरदाई नहीं
क्योंकि चंदवरदाई होना
तुम्हारी आदत नहीं

अपने स्वभाव के अनुरूप झिझकते हुए मैंने यह कागज का टुकड़ा उन्हें थमा दिया। पढ़कर वह मुस्कुराए और उन्होंने धीरे से अपनी कलम निकाली। उस कागज पर हल्की सी कांट-छांट कर दो स्थानों से "चंदवरदाई" काट कर उसकी जगह "वह" लिख दिया और बोले अब पढ़ो। अब कविता यूं थी-

चंदवरदाई के
उत्तराधिकारी हो तुम
लेकिन नहीं
तुम वह नहीं
क्योंकि वह होना
तुम्हारी आदत नहीं

प्रकाश जी के भीतर का संपादक शब्दों के प्रयोग के प्रति इतना सजग व सचेत था कि खुद पर लिखी हुई कविता में श्लाघा से प्रसन्न हो जाने के स्थान पर उसमें सुधार करना जरूरी लगा। वे बोले -"कविता लिखने के बाद यह जरूर देखा करो कि किन शब्दों के बिना भी काम चल सकता है। शब्द अपव्यय नहीं किए जाने चाहिए। शब्दों के प्रयोग में मितव्ययता से कविता का ढांचा स्वतः ही सुधर जाता है।" प्रकाश जी की यह सीख मुझे हर बार कविता लिखे समय याद रहती है और हमेशा कारगर प्रतीत होती है। प्रकाश जी के जीवन और जीवट को जानकर उनके प्रति सम्मान और आकर्षण बढ़ते चले गए। एक व्यक्ति अपनी जीवन यात्रा को अपनी शर्तों पर चलाने के लिए कैसे और कितने संघर्ष करने पड़ते हैं, उसका वे साक्षात् उदाहरण थे। एक संपादक के रूप में उनकी कठोरता से प्रताड़ित वरिष्ठ साहित्यकार भी शहर में कई थे। उन्हें पीड़ा यही थी कि इतने नजदीक व आत्मीय होने के बावजूद भी प्रकाश जी ने उन्हें "लहर" में स्थान नहीं दिया। इन साहित्यकारों से भी प्रकाश जी को जूझना पड़ता था। संपादक के निकष पर उन्होंने कोई समझौता नहीं किया। धर्मवीर भारती की कहीं "लहर "के विषय में टिप्पणी पढ़कर मैने उत्साहपूर्वक उनसे कहा-" धर्मवीर भारती आपके दोस्त हैं?" वे बोले- " वो मेरा दुश्मन है। मैंने उसकी कविता नहीं छापी इसलिए नाराज रहता है।"

मैंने कहा लेकिन उन्होंने तो आपके लिए सकारात्मक ही लिखा है। उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि धर्मयुग में उसने मेरी रचना भी छापी और पारिश्रमिक के रूप में ब्लैंक चेक भेजा था। जितनी चाहो उतनी रकम भर लेना। लेकिन मैंने फिर भी उसकी कविता नहीं छापी। प्रकाश जैन के संपादकीय निकष को रेखांकित करते हुए इब्बार रब्बी ने लिखा है- "लहर में उन्होंने फूल गिरने दिए, अक्षत और दीप बहने दिए, पर शौचालयों का कूड़ा नहीं गिरने दिया।"

घिसी-पिटी परंपरा, परिपाटी, बंधन से उन्हें छटपटाहट होती थी। अपने ढंग से उन्होंने अपने जीवन और साहित्य में तोड़ा भी। मनुष्य की स्वतंत्रता उनके जीवन का पर्याय थी। उनकी कविताएं इसका एक प्रमाण देती हैं तो वहीं संपादक के रूप में नए प्रयोग करते रहना भी यही सिद्ध करता है कि वे रुकने ठहरने वाले व्यक्ति नहीं थे। फरवरी मार्च 1988 में बीमारी ने उनके भीतर ठहराव पैदा कर दिया था। यहां भी वे रुके नहीं । 13 मार्च 1988 को उन्होंने जीवन को प्रस्थान कह दिया।

“यह जीवन क्रम
मैंने ही चुना था
जी रहा हूं
मित्रों, आत्मियों, शुभचिंतकों को
अच्छा नहीं लगा
वे गलत नहीं थे
मैं भी गलत नहीं हूँ

क्या कभी सोचा है आपने
लीक पर चलता रहता आदमी
तो आज आप कहां होते?”

(उद्धृत समस्त कवितांश स्व. प्रकाश जैन के हैं)

अनंत भटनागर
66, कैलाशपुरी, क्रिश्चियनगंज, अजमेर
9828052917

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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