यात्रा वृत्तांत : गोमांतक प्रदेश की यात्रा / कमला नरवरिया

गोमांतक प्रदेश की यात्रा
- कमला नरवरिया

कुछ यात्राएँ निपट अकेली होती हैं। हम कितना भी चाहे कोई हमारे साथ चलें, लेकिन कई बार हमें अकेले ही सफर तय करना पड़ता है। विगत दिनों मेरी ऐसी ही एक एकल यात्रा ग्वालियर से गोवा रही। मैं इस यात्रा के अंतिम समय तक अपने गोवा जाने को लेकर निश्चित नही थी। अपनी इसी अनिश्चितता को दूर करने के लिए मैंने जाने से पहले अपने दोनों बच्चों से पूछा। “मैं इतने दिनों के लिए गोवा जा रही हूँ, क्या तुम दोनों मेरे बिना रह लोगे? यदि तुम दोनों मना करोगे तो मैं गोवा बिल्कुल नहीं जाऊँगी। बिटिया ने कहा “हाँ, मम्मी मुझे कोई दिक्कत नहीं है तुम चली जाओ।” फिर मैंने बेटे की ओर देखा तो बेटे ने कहा, “मम्मी तुम हर बार जाती हो तो मुझसे कहती हो कि बेटा मुझे जाने दो लेकिन इस बार कह रही हो बेटा तुम कहो तो मैं रुक जाऊँगी। मम्मी मुझे तुम पर दया आ रही है, तुम चली ही जाओ। मैं हैरान होकर बेटे का मुँह ताकने लगी कि यह इतना समझदार कब से हो गया?”

घर से निकलने के एक घंटे पहले तक अनिश्चिय की यह स्थिति बनी हुई थी। न जाने कैसा होगा गोवा और वहाँ के रहवासी! न जाने उस शैक्षणिक कोर्स के लिए कौन लोग आएँगे! क्या वहाँ कोई महिला प्रोफेसर भी आएगी या नहीं? मैंने कोर्स के लिए बनाया गया व्हाटसएप ग्रुप देखा और जिस नंबर के आगे अभिलाषा लिखा था, उस पर रेंडमली फोन लगाया दूसरी ओर से एक मैडम बोल रही थी जिनका नाम अभिलाषा था। मैंने उन्हें बताया कि मैडम मैं रिफ्रेशर कोर्स करने के लिए गोवा यूनिवर्सिटी आ रही है क्या आप भी आ रही है? उन्होंने कहा हाँ मैं भी आ रही हूँ। मैंने कहा कि मैं अकेले आ रही हूँ इसलिए इतनी नर्वस हो रही हूँ। उन्होंने कहा मैडम मैं भी अकेली आ रही हूँ। आप चिंता मत करिए। आपको वहाँ अच्छा लगेगा। उनका इतना कहना मेरे लिए डूबते का तिनके का सहारा जैसा हो गया।

घर से निकलते समय मेरी आँखों में आँसू आ गए। इस पर पतिदेव ने कहा इतना रो रही हो तो जा ही क्यों रही हो? “मैं क्यों जा रही हूँ गोवा। यही तो नहीं पता। शायद स्वयं को खोजने या दुनिया को जानने या फिर और कोई वजह है, जिसे मैं भी नहीं जानती।”

भिंड से भोपाल तो मेरा कई बार अकेले आना जाना हुआ है; लेकिन यह पहली बार था जब मैं प्रदेश से बाहर अकेली यात्रा कर रही थी। मेरा मन शंकित और उत्साहित दोनों एक साथ था।

इन्हीं सम्मलित भावों के साथ मेरा गोवा यानि गोमांतक प्रदेश की यात्रा का शुभारंभ होता है। एक ऐसा प्रदेश जो आधुनिकता और पुरातनता दोनों को एक साथ सहेजे हुए है।

मैं नहीं जानती हूँ कि यह कोई दैवीय संयोग था या महज कोई इत्तेफाक। मेरे ग्वालियर से गोवा तक के सफर में अनेक अजनबी सहयात्री मेरे सहयोगी बने। जिनमें से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर से गोवा जा रहा एक परिवार मुझे मिला। जिसमें पति-पत्नी और उनके तीन बच्चे थे। परिवार के मुखिया का नाम लालदेव और पत्नी का नाम शीला था। वह दंपति कई वर्षों से गोवा में रह रहे थे। उन्होंने सफर में मेरी खूब मदद की। वास्कोडिगामा रेलवे स्टेशन पर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मैं अपना बड़ा सा ट्रॉली बैग लेकर चढ़ने लगी। इस पर सहज सरल शीला जो खुद अपने दो तीन बैग पकड़े हुए थी। मेरा बैग ऊपर चढ़वाने में मदद करने लगी। मैंने उससे कहा तुम अपने ही बैग व बच्चों को संभालो मैं अपना बैग खुद उठा लूँगी। वास्कोडिगामा बस स्टैंड से पणजी जाने के लिए लालजी भाई मेरा भी बस का टिकट ले आए। पणजी पहुँचने पर मैंने उनसे कहा अब मैं यहाँ से ऑटो से चली जाऊँगी तो वह बोले मैडम ऑटो वाला तो ज्यादा रुपए लेगा, मैं आपके लिए बस देखकर आता हूँ। मेरे मना करने के बावजूद वह मेरे लिए बस पता करके आए और मेरा बड़ा सा बैग लेकर मुझे बस में बिठाकर गए। जाते हुए वह कंडक्टर को पूरी हिदायत देते हुए बोले मैडम को गोवा यूनिवर्सिटी पर उतार देना।

जब मैं बस से यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस पहुँची तो पता चला यह तो इंटरनेशनल गेस्ट हाउस है जबकि मेरे रुकने की व्यवस्था ओल्ड गेस्ट हाउस में की गई है। वहाँ के स्टाफ से पूछने पर पता चला ओल्ड गेस्ट यहाँ से लगभग एक किलोमीटर दूर होगा।

हे! भगवान अब इस बड़े से बैग को लेकर मुझे पैदल ही ओल्ड गेस्ट हाउस जाना पड़ेगा। यह सोचकर मैं जैसे ही मुड़ी वहाँ खड़े गेस्ट हाउस के एक स्टाफ ने मुझसे कहा रुकिए। वह व्यक्ति मुझे अपनी स्कूटी से ओल्ड गेस्ट हाउस छोड़कर चला गया।

अब यूनिवर्सिटी का एम.एम.टी.सी. सेंटर जहाँ मुझे जाना था उसका मुझे पता नहीं चल रहा था मैंने यूनिवर्सिटी के हेल्पलाइन नंबर पर फोन लगाया उधर से उन्होंने कार्यक्रम स्थल का विवरण बताया। यूनिवर्सिटी में काफी भटकने के बाद भी जब मुझे कार्यक्रम स्थल नहीं मिला तो मैंने थक-हारकर फिर यूनिवर्सिटी के हेल्पलाइन नंबर पर फोन लगाया। उधर से एक मैडम की मीठी आवाज आई।

“मैडम आप अभी कहाँ है? अपनी लोकेशन बताइए। आपने किस रंग के कपड़े पहने हैं? हम अपने एक स्टाफ को वहाँ भेज रहे हैं, जो आपको कार्यक्रम स्थल तक लेकर आ जाएँगे।” मैंने अपनी लोकेशन बताई। थोड़ी देर में वहाँ एक व्यक्ति अपनी स्कूटी लेकर आए, जिन्होंने मुझे अपने गंतव्य तक पहुँचाया। उस भले इंसान ने मुझसे पूछा मैडम आपने नाश्ता वगैरह किया। मेरे मना करने पर उन्होंने मुझसे कहा लंच में तो अभी देर है। क्या आप नीबू पानी पीएँगी? उस वक्त मैं सच में भूख प्यास से बेहाल हो चुकी थी, इसलिए वह नींबू पानी मुझे अमृत तुल्य लगा। मैं हैरान थी, ईश्वर ने जैसे इस अनजाने प्रदेश में मेरी सहायता के लिए अनजाने देवदूत भेज दिए हो।

गेस्ट हाउस काफी पुराना था, दूर से देखने पर यह भुतहा सा प्रतीत होता था। अब कुछ दिनों तक यह भुतहा गेस्ट हाउस मेरा नया ठिकाना था। यह भी एक इत्तेफाक था कि इस गेस्ट हाउस का सबसे शानदार रुम मुझे मिला था। सफर में अकेली चली थी सो यहाँ भी रुम में मैं अकेली थी। पता नहीं यह इस जगह की नकारात्मक उर्जा थी या मेरे मन का डर था यहाँ मुझे अकेले रहने में बड़ा सा डर लगता था। इसलिए मैं रात में अपनी एक साथी मैडम के रूम में सोने के लिए चली जाती थी। इसी तरह मेरे कुछ दिन गुजरे।

जिंदगी अगर सीधी लाइन से चलती रहे, तो क्या जिंदगी है फिर एक दिन एक घटनाक्रम घटा। जिसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मैं अपने कमरे में अकेले सोने से कब तक डरती रहूँगी? मैंने खुद को समझाया कि ये जो मेरा डर है दरअसल यह डर इस कमरे, इसकी दीवारों, खिड़कियों और इस कमरे में लगे आइने में नहीं बल्कि मेरे मन में है। मुझे अपने इस डर से लड़ना होगा। मैंने ठान लिया कि अब मैं अकेले ही अपने कमरे में सोऊँगी। उस रात मैं अपने इसी डर से लड़ती रही, मुझे रात दो बजे तक नींद नहीं आई लेकिन अंततः मैं अपने डर से जीत गयी। उस दिन के बाद से मुझे अपने कमरे में अकेले सोने एवं रहने में डर नहीं लगा।

गोवा में रहते हुए यहाँ कई जगह घूमी। जिनमें डोना पाउला, मीरामार बीच, बेम्बोलिम बीच, अंजुना बीच, सिक्वरिम बीच, डोल्फिन पॉइंट, निचला तल, अग्वादा फोर्ट, क्रैंडोलिम बीच, बाघा बीच, दूध सागर वाटरफॉल इत्यादि। हर जगह की अपनी एक कहानी है। ऐसी ही एक कहानी को अपने में समेटे हुए है डोना पाउला व्यू प्वाइंट!

यात्रा के एक शाम जब मैं अपनी मित्रमंडली के साथ डोना पाउला व्यू प्वाइंट देखने पहुँची तब तक अंधेरा घिर आया था। जुआरी और मांडवी नदियों के संगम स्थल पर स्थित यह स्थान बहुत ही आकर्षक और मनमोहक प्रतीत हो रहा था। सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें लहरों पर नर्तन करती बहुत अच्छी लग रही थी। इस स्थान का नाम डोना पाउला कैसे पड़ा इस संबंध में यहाँ एक किवदंती प्रचलित है कि डोना पाउला डे मेनेजेस नाम की एक पुर्तगाली लड़की थी, जो बहुत दयालु और दानशील लड़की थी। वह एक पुर्तगाली वायसराय की बेटी थीं। उसे गोवा के एक मछुआरे से प्रेम हो जाता है। जब पुर्तगाली वायसराय को यह बात पता चलती है तो वह उनके प्यार पर पाबंदी लगा देता है। इससे उस लड़की का दिल टूट जाता है और वह इस जगह से समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर लेती है। बाद में स्थानीय लोगों ने उस दयालु लड़की की याद में इस स्थान का नाम डोना पाउला रख दिया। मैं डोना पाउला के इस दुःखद अंत को जानकर थोड़ा दुःखी हुई। मुझे समझ में नहीं आता है कि जाने क्यों लोग प्रेम में असफल होने पर आत्महंता हो जाते है?

इसी जगह सफेद संगमरमर की दो मूर्तियाँ बनी हुई है, जो भारत माता व युवा भारत की प्रतीकात्मक मूर्तियाँ हैं, जो नये भारत की ओर इशारा करती है।

हर देश हर समाज के अपने अपने विश्वास और अंधविश्वास होते है। कोई भी समाज इनसे अछूता नहीं है। अंजुना बीच पर स्थित दुकान से कपड़े खरीदते समय मैंने उस महिला दुकानदार से पूछा आपने अपनी दुकान में आईना नहीं रखा है। अगर आईना होता तो हम ठीक से देख पाते कि कपड़े का रंग और आकार हमारे ऊपर कैसा दिखाई दे रहा है। इस पर उस महिला दुकानदार ने कहा मैडम हम बंजारे हैं। हम लोग अपनी दुकानों में आईना नहीं रखते हैं, क्योंकि हमारे यहाँ आईने का टूटना अपशकुन माना जाता है। यहाँ जितनी भी दुकानें हैं, सभी हमारे समाज की है और यहाँ आपको किसी भी दुकान में आईना दिखाई नहीं देगा। गोवा में बंजारा समाज की उपस्थिति देखकर मन में एक सुखद आश्चर्य हुआ। एक समय बंजारा समुदाय व्यापार की रीढ़ हुआ करता था और यह समाज व्यापार के सिलसिले में पूरे देश में घूमता रहता था।

गोवा अपने सुंदर तटों, नाइट लाइफ, क्लब, कैसिनो बीयर बारों इत्यादि के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटन की दृष्टि से देखा जाए तो गोवा एक आदर्श जगह है। चूंकि गोवा की अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्त्रोत पर्यटन है, इसलिए वहाँ की सरकार ने पर्यटकों की सुविधा व सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा है।

गोवा में इस समय 56वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव चल रहा था सो मुझे भी इस फिल्म महोत्सव में शिरकत करने का अवसर मिल गया, जो अपने आप में एक रोमांचक अनुभव रहा। जहाँ अभिनेता आमिर खान को सुनना काफी दिलचस्प था।

यात्रा के अंतिम चरण में दूध सागर वाटरफॉल जाने का कार्यक्रम तय हुआ। दूध सागर वाटरफॉल जाते हुए रास्ते में मैंने टैक्सी ड्राइवर सुनील से पूछा अलग-अलग राज्यों के लोगों में अपनी चुनी हुई सरकारों के प्रति मिला-जुला रुख देखने को मिलता है। तुम्हारा अपनी यहाँ की सरकार के बारे में क्या कहना है? इस पर उसने कहा मैडम मुझे मेरी यहाँ की सरकार से कोई परेशानी नहीं है, बल्कि हमारे यहाँ सरकार आम नागरिको के हित में इतना अच्छा कार्य कर रही है कि यदि मुझे अपने घर में रिनोवेशन (मरम्मत)का कार्य भी कराना हो तो सरकार की ओर से हमें दस बारह लाख रूपए बिना ब्याज के मिल जाते हैं। मैडम जी, यदि हमें अपने घर में कील भी ठोकनी हो तो उसके लिए भी सरकारी मदद उपलब्ध है।

फिर तो बढ़िया है यहाँ। मैंने मजाक में उससे कहा, क्या करूँ? मैं भी मध्यप्रदेश छोड़कर गोवा में बस जाऊँ। इस पर सुनील ने बड़े ही भोलेपन से कहा “मैडम ऐसा मत करिए, हम लोगों को बड़ी परेशानी हो जाएगी।” मैंने उससे कहा “मैं तो मजाक में कह रही थी तुम्हें तुम्हारा गोवा मुबारक मुझे कोई लाख प्रलोभन दे तो भी मैं अपना प्रदेश नहीं छोड़ूँगी।”

दूध सागर वाटरफॉल से लौटते हुए ड्राइवर ने बताया कि यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है जिसे देखने के लिए हम सभी वहाँ गए। रागदा नदी के किनारे स्थित यह महादेव मंदिर तांबड़ी सुर्ला के नाम से विख्यात है। तांबडी का अर्थ होता है, लाल मिट्टी और सूर्ला का अर्थ होता है, पहाड़ यानि लाल मिट्टी के पहाड़। शायद यहाँ कभी इस तरह के पहाड़ रहे होंगे। कंदब शैली में बना यह तेरहवीं शताब्दी का एक प्राचीन शिव मंदिर है। अनेक आक्रमणों और युद्ध की विभीषिकाओं को झेलने के बाद भी यह मंदिर अपने पूर्ण वैभव के साथ अपने संघर्षों की दास्ताँ हमें सुना रहा है।

सह्याद्रि पर्वत मालाओं के बीच में स्थित यह मंदिर अपनी अद्भुत स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट नमूना है मंदिर के गर्भ गृह के प्रवेश द्वार के दोनों ओर साँप की कलाकृति बनी हुई थी, एक ओर एक अकेला साँप बना है तथा दूसरी ओर दो साँप आपसे में लिपटे हुए है।

आगे रास्ते में एक और मंदिर मिला जो इस क्षेत्र का एक प्रमुख मंदिर था। इस मंदिर की प्रमुख देवी महालसा नारायणी देवी है। महालसा नारायणी देवी को भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार माना जाता है। देवी का यह स्वरूप अत्यंत मनमोहक है और भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप को सार्थक करता है। मंदिर में सुबह शाम दैनिक पूजा होती है लेकिन प्रत्येक रविवार को देवी महालसा को पालकी में सवार करके नगर भ्रमण के लिए ले जाया जाता है

गोवा के कुछ मंदिरों में मैंने देवताओं की मूर्तियों के ऊपर एक चेहरानुमा आकृति को बना देखा तो मन में एक उत्सुकता जगी कि आखिर यह कौन है। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने एक स्थानीय व्यक्ति से उसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया यह राखनदार है राखनदार के बारे में मैं पहले से ही टैक्सी ड्राइवर सुनील से सुन चुकी थी। गोवा की लोक-संस्कृति में राखनदार एक प्रमुख लोकदेवता है । यहाँ प्रत्येक क्षेत्र का एक राखनदार होता है, जो उस क्षेत्र का प्रमुख रक्षक देवता माना जाता है। जैसे दूध सागर वाटरफॉल से लौटते हुए मुझे केपिम क्षेत्र में जो राखनदार मिले। उनका नाम आजोबा था उनके चबूतरे पर आजोबा प्रसन्न लिखा था। जिसका आशय था कि आजोबा इस क्षेत्र पर प्रसन्न है।

धारबादोड़ा क्षेत्र का राखनदार चंद्रेश्वर है। इसी तरह पूरे गोवा में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग राखनदार मिलते हैं, जिनकी स्थानीय लोगों में बड़ी मान्यता है। पूजारी राखनदार की हर रोज पूजा करते है लेकिन शुक्रवार को उनकी विशेष पूजा की जाती है।

गोवा का पर्यटन पक्ष इतना उभर कर सामने आता है कि उसके आगे उसका सांस्कृतिक पक्ष कही दब सा जाता है। लेकिन सच पूछिए तो गोवा का सांस्कृतिक पक्ष बहुत ही समृद्ध है। एक बात जो मैंने यहाँ भ्रमण करते हुए महसूस की, वह है कि हमारे देश में खान-पान, रहन-सहन भाषा बोली कितनी भी एक दूसरे से अलग हो लेकिन महाभारत और रामायण की कथाएँ सारे देश को एक सूत्र में बाँधती हैं। भगवान कृष्ण के विषय में गोवा के लोगों का मानना है कि कालयवन से युद्ध करते समय भगवान कृष्ण गोवा आए थे और उनको खोजते हुए माता देवकी भी गोवा में आई थी, इसलिए यहाँ कृष्ण और देवकी माता का मंदिर भी मिलता है।

लगभग 450 वर्षों से भी अधिक समय तक गोवा पर पुर्तगालियों का शासन रहा। लेकिन यह गोअन लोगों की जीवटता थी कि इन्होंने इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी गोअन भाषा, कला और संस्कृति को बचाए रखा। हालांकि गोअन भाषा एवं संस्कृति ने पुर्तगीज भाषा और संस्कृति को भी आत्मसात किया है, इसके बावजूद उसने अपना एक अलग अस्तित्व बनाए रखा।

मेरी इस गोवा यात्रा में मुझे अभिलाषा, कविता, भानुप्रिया, मेधा, आस्मां, पायल, रमा व नफीसा मैम, मिलिंद, विपुल, राधेश्याम, जगदीप, विनय, विष्णु, बलदेव, दीपक सर जैसे कुछ अद्भुत साथी मिले और गोवा विश्वविद्यालय का शानदार आतिथ्य जिसकी वजह से मेरी यह गोवा यात्रा यादगार बन गई। इन सभी के लिए शुक्रिया शब्द कम है।

इस यात्रा में मैंने अपने कंफर्ट जोन से बाहर जाकर दुनिया को देखने की कोशिश की। यह यात्रा उस दुनिया को देखने की एक खिड़की बन गई।

कमला नरवरिया
सहायक प्राध्यापक, एम.जे.एस. शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिंड मध्य प्रदेश

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

Post a Comment

और नया पुराने