संस्मरण : नदिया के तीरे-तीरे ,चलत बा जिनगी धीरे-धीरे / पूर्विका अत्री

नदिया के तीरे-तीरे ,चलत बा जिनगी धीरे-धीरे
- पूर्विका अत्री 

मेरी पैदाइश उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के एक गाँव में हुई थी। जौनपुर गोमती नदी के तट पर स्थित है। इस जिले को ‘सिराज-ए-हिन्द’ कहते हैं। वैसे ‘सिराज-ए-हिन्द’ एक ऐसी पदवी है, जिसका प्रयोग उस जिले के लोग बड़े गर्व से करते हैं। जैसे - अपने प्रिय नेता के स्वागत पर, किसी को जन्म दिवस की बधाई देने के लिए या जिले के किसी सैनिक के सरहद पर शहीद होने पर, यहाँ तक कि किसी छात्र नेता की तारीफ में कुछ कहना हो तो वहाँ के लोगों द्वारा ये पदवी तकियाकलाम के रूप में उपस्थित हो जाती है। वे कुछ यूँ कहते हैं- ‘ये सिराज-ए-हिन्द की धरती के लाल हैं।’ उत्सुकतावश ‘सिराज’ का अर्थ खोजा तो पता चला - ‘सिराज या शिराज़ या शीराज़’ वर्तमान ईरान का एक शहर है, जो तत्कालीन फारस(ईरान) का शैक्षणिक, सांस्कृतिक और स्थापत्यकला का केंद्र था। मध्यकाल के शर्की शासनकाल में कुछ ऐसा ही गौरव इस जिले को प्राप्त था। तभी से इसे यह पदवी प्राप्त हो गई, जो आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज़ है। वैसे अब भी यहाँ शर्की स्थापत्य के बेजोड़ अवशेष बचे हैं, ख्याल गायकी का जौनपुर घराना गुनगुना रहा है, तो वहीं पूर्वांचल विश्वविद्यालय, तिलकधारी महाविद्यालय जैसे शैक्षणिक केंद्र जिले भर के नौजवानों को शिक्षित कर रहे हैं।

अकेले जौनपुर जिले में ही पाँच नदियाँ बहती हैं - गोमती, सई, वरुणा/बरना, पीली, बसुही। इस बात की जानकारी पहले-पहल मुझे माँ से मिली थी। यह सुनकर लगा कि पाँचवीं पास मेरी माँ का सामान्य ज्ञान कितना अच्छा रहा होगा। माँ प्रायः कहती हैं कि ‘मैं पढ़ने में बहुत अच्छी थी, अगर आगे पढ़ाई करती तो आज जरूर प्रशासनिक सेवा में होती।’ ऐसा वे हम भाई-बहनों की पढ़ाई में लापरवाही पर कहा करती हैं। एक झल्लाए प्रतियोगी छात्र की तरह हम भी कह देते, चलिए इसी साल आपका फॉर्म भर देते हैं, इस पर भी तंज कस देती कि अब मेरी उम्र हो गई है, तुम्हारी उम्र की होती तो तुम लोगों को कहना नहीं पड़ता। लेकिन बीते कई सालों से उन्होंने यह कहना छोड़ दिया है, क्योंकि अखबारों में प्रतियोगी छात्रों की समस्याओं को पढ़कर वे अपने बच्चों की समस्या समझने लगीं हैं। पेपर लीक होना, पेपर टल जाना, भर्तियाँ नहीं आना, भर्तियों का पूरा नहीं होना… इन बातों की सामान्य जानकारी ने उन्हें अन्य किसी नए तंज गढ़ने से उपेक्षित कर दिया है। अब वे मात्र चिंता भाव से दुःख ही प्रकट करती हैं।

मेरे दादा जी अपना गृह जनपद जौनपुर छोड़कर साल 2001 में तत्कालीन इलाहाबाद आ गए थे, लेकिन अपने गृह जनपद की यादें साथ लाए थे, जिसे इलाहाबाद में जो भी नया मित्र बनता उसे वह जरूर सुनाते। इसी कड़ी में हम भाई-बहनों ने भी सुना और जौनपुर जिले को उनकी नजर से भी जाना, क्योंकि प्रारम्भ में हमें जौनपुर जिले को घूमने और जीने का अवसर कम ही मिला था। दादा जी बताते थे कि ‘वहाँ भारत की सबसे लंबी मूली उगाई जाती है, जिसकी लंबाई कभी-कभी 6 फीट तक पहुँच जाती है, जो प्रायः 4 से 5 फीट होती है।’ मैंने वर्तमान के हालात की छानबीन की तो पता चला कि अब किसान ऐसी मूली उगाना छोड़ दिए हैं क्योंकि इसमें मुनाफा और खपत में कमी हो गई है। बाकी जो रिकॉर्ड बनना था, सो अब नहीं बनाना। दूसरी बात - वहाँ के स्थापत्य कला की। उन्होंने बताया था कि ‘यहाँ बहुत ही पुरानी अटाला मस्जिद, अलाई दरवाजा है। यहाँ गोमती नदी पर बना शाही पुल आज भी अपने सौंदर्य में बेजोड़ है, वैसा पुल भारत में कहीं नहीं है।’ उन्हें ‘नदिया के पार’ फिल्म बेहद पसंद थी, वे अपने जीवन में सिनेमा हॉल से लेकर सी.डी. और टीवी में कितनी ही बार देख चुके थे। विशेष प्रियता के पीछे न केवल फिल्म की कहानी, संवाद, अवधी भाषा का पुट, गीत, लोकगीत, ग्रामीण पृष्ठभूमि का कथानक, पात्रों की अदाकारी, हावभाव, उनकी वेशभूषा आदि… बल्कि वह विशेष कारण था उस फिल्म की शूटिंग हमारे जौनपुर जिले के ‘विजईपुर’ गाँव हुई थी। फिल्म के प्रारंभिक परिचय में ही दिखाई देने वाले खेत-खलिहान, गाय, भैंस, मोर आदि जानवर, गौशाला, नदी, बंसवार(अनेक बांसों का समूह), कच्चे खपड़ैल वाले घर, कुआँ आदि उन्हें अपने गाँव की याद दिलाते थे। वे हमेशा पूरी फिल्म बड़े ही प्रसन्नचित भाव से देखते और हमेशा यह बताना न भूलते कि इस फिल्म की शूटिंग हमारे जिले में हुई है।


शाही पुल (जौनपुर)

वे खाने के बहुत शौकीन थे, विशेष रूप से मीठे खाद्य, इसलिए उन्हें जौनपुर जिले की सभी प्रसिद्ध मिठाइयों का स्वाद पता था। समय के साथ मिठाइयों की गिरती गुणवत्ता पर भी उनकी नजर थी। वे सुजानगंज के एटम बम और भरवा पेड़ा, बेनीप्रसाद देबीप्रसाद की इमरती, लौंगलता, कोल्हूआ का अनरसा आदि के बारे में बहुत चाव से बताते थे। सुजानगंज, जौनपुर से करीब 45 किमी दूर है, यहाँ स्थित पुरानी बाजार में हरिहरनाथ टंडन ने 1950 के दशक में छेना बनाने की दुकान स्थापित की। यह दौर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का था। कहा जाता है कि इन्होंने छेना बनाने में कुछ प्रयोग किए, जैसे - एक छेने का आकार करीब 150 से 200 ग्राम तक किया और उसके अंदर लाल खोया, चिरौंजी, जावित्री इलाइची का मिश्रण भरा। जिससे ये भरवा छेना बन गया और स्वाद में सुगंधित, मुलायम, रसीला बना रहा। आगे चलकर अपने इसी स्वाद और आकार के कारण यह ‘एटम बम’ कहा जाने लगा। आज भी लोग कहते है कि ‘जिसने एक बार में एक छेना पूरा खा लिया और कुछ नहीं खा सकता।’ एक रोचक किस्सा यह भी है कि पूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी जब जौनपुर दौरे पर आई थी, तो उन्होंने ‘एटम बम’ को लेकर मजाकिया अंदाज में पूछा था कि ‘क्या यहाँ के लोग एटम बम तक खा जाते हैं?’ इसी सुजानगंज के बदलापुर मोड़ पर कई पान की दुकाने हैं, जहाँ जिले का प्रख्यात मीठा पान मिलता है, जिसमें गुलकंद, चेरी, नारियल, सौंफ, इलायची के साथ हल्का चूना(वैकल्पिक रूप से) और कत्था मिलाया जाता है, इसका आकार सामान्य पान से बड़ा होता है, जिसके रसीले, मीठे स्वाद का आनंद अधिक देर तक लिया जा सकता है। वर्ष 2022 में मैंने भी इस मीठे पान का साक्षात अनुभव प्राप्त किया। यूँ तो मैं पान आदि के औषधीय रूप में सेवन को ही उचित मानती हूँ, लेकिन भारतीय संस्कृति में यह ऐसा रचा बसा है कि धार्मिक अनुष्ठानों एवं वैवाहिक कार्यक्रमों तक में प्रयोग होता है। वहीं दैनिक जीवन में इसके निशान गली कूचे, मुहल्ले, सड़क, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज ही नहीं बल्कि हर जगह मिल जाते हैं। पान खाकर थूकना कहाँ है? यह आदत अभी तक भारतीय लोगों के संस्कार में सही से आ नहीं पाया है। अब बात करें अन्य मिठाई की, जौनपुर की इमरती भी बहुत प्रसिद्ध मिठाई है। इसके लिए प्रसिद्ध बेनीप्रसाद देबीप्रसाद के दुकान की स्थापना वर्ष 1855 में हुई थी, यह वर्तमान नख़ास ओलंदगंज में है। इस इमरती को उड़द दाल भिगोकर, फिर पीसकर और देसी घी में बनाया जाता है। वर्ष 2024 में जीआई टैग प्राप्त यह इमरती पिछले 170 सालों से अपनी साख बनाए हुए है। दादा जी इसी प्रकार कई अन्य पारंपरिक देशी मिठाइयों के बारे में भी बताते थे। आगे चलकर ये मिठाइयाँ सिर्फ किस्सों में रह गईं थीं, क्योंकि दादा जी अपने जीवन के सत्तरवें दशक में मधुमेह के रोगी हो गए थे। डॉक्टर ने उन्हें चीनी और चावल खाने से पूरी तरह मना कर दिया था। वे रोज मधुमेह की एक गोली दवाई खाते। वे एक वाक्य का प्रायः प्रयोग करते कि ‘डॉक्टर ने परहेज करने को कहा है।’ वे जब भी घर पर जलेबी ले आते तो हमारे सामने खाने से बिल्कुल मना कर देते। आग्रह करने पर उसी वाक्य को फिर से दुहराते कि डॉक्टर ने परहेज को कहा है। लेकिन हम जानते होते कि आज दादाजी जिह्वासुख के वश में पड़कर परहेज त्यागते हुए पहले ही जलेबी खा आए हैं।

  

जौनपुर जिले में ही मेरा ननिहाल भी है, इसलिए वहाँ की कुछ विशेषताएँ मैंने अपनी माँ से भी जाना। वहाँ की अवधी भाषा, ग्रामीण परिवेश, तीज-त्यौहार, खानपान, खेलकूद, शादी, शिक्षा, रोजगार, महिलाओं की स्थिति आदि के बारे जानकारी प्राप्त हुई। रोचक है कि वे सभी बातें अवधी भाषा में ही बताती हैं, जिससे उनके सरल हावभाव, चिंताएँ सभी कुछ आज भी एक खास रूप से मेरी हृदय पर अंकित हैं। माँ प्रायः पुराने दिनों को याद करती हैं कि ‘एक समय था जब उनके नैहर(मायका) में घना, सुंदर, विविध प्रकार से वृक्षों से हरा-भरा वन था। वन के अंदर ही एक तिभिया(तालाब) और इनारा(कुआँ) भी था। अगल-बगल के खेतों की सिंचाई के लिए इसी कुएँ से रहट भी चलती थी। इनरा और तिभिया का पानी इतना साफ था कि लोग इसी से पीते और नहाते थे। आम, कटहल, बेल, नीम, पीपल, महुआ, जामुन आदि के बहुतायत वृक्ष थे। इन वृक्षों से पूरे गाँव की जरूरत पूरी हो जाती थी। उन पेड़ों के पके आम का स्वाद ही अलग होता था, आज के कार्बाइड से पके आमों की तरह नहीं। साल भर के लिए आचार और सिरका भी बन जाता। दातून के लिए नीम और ढीतोर की टहनी हमेशा उपलब्ध रहती। स्वच्छ और ताजी दातून, उससे न केवल दांत अच्छे से साफ होते बल्कि मन भी साफ रहता, आज की तरह नहीं कि रोज एक ही ब्रश घिसे जा रहे, जिससे दांतों में दुनिया भर की दिक्कतें हो रही हैं। लेकिन अब पेड़ बचे नहीं तो दातून कहाँ से करें, जो हैं भी... सो लोगों को टहनी तोड़ने, दातून बनाने की फुर्सत नहीं।’ मैंने पूछा कि कहाँ गया वन? माँ बताती हैं कि ‘जब से गाँव में नहर आई, वह अपने साथ ऐसा पानी लाई कि धीरे-धीरे पेड़ों में फल कम आने लगे, वे सूखने लगे। गेहूँ और चावल उगाने के लिए लोगों ने बहुत पेड़ भी काट दिए। नहर से सिंचाई की सुविधा के बाद रहट बंद हो गई और वन के भीतर का कुआँ उपेक्षा का शिकार होकर खत्म हो गया, अब उसमें कीचड़, कुछ कछुए, मेंढक और साँप रहते हैं। फल और छायादार पेड़ों की जगह सफेदा के पेड़ लगा दिए गए हैं और सफेदा की खासियत है कि यह अपने आस-पास के पेड़ों की ऊर्जा और पोषण भी खींच लेता है, जिससे अन्य पेड़ विकसित नहीं हो पाते। जब डाल वाले पेड़ नहीं बचे तो सावन के झूले और कूड़ी का खेल भी नहीं बचा। तिभिया भी धीरे-धीरे बर्बाद हो गई, उसमें रह गया जलकुंभी और गाढ़ा दलदली कीचड़। नहर के पानी की सिंचाई से सारी फसल बदल गई। ऊख(गन्ना) पतली होने लगी, उसकी जड़ों में देवंका(दीमक) लग जाता है। जिस ऊख से मीठा गुड़ बनता था, धीरे-धीरे उसमें नमकीन स्वाद आने लगा, जून की गर्मी और बरसात में रखा गुड़ अपना सफेद रंग(माँ हल्के भूरे रंग को सफेद ही कहती हैं) छोड़ कर काला पड़ जाता है, भुरभुरा और खराब महकने लगता है। चना, मटर, अरहर, उड़द, सरसों की फसल अब वैसी नहीं होती, पौधे कम घने एवं छोटे होते हैं, उसमें दाने भी छोटे और कम पड़ते हैं। कभी-कभी तो पैदावार इतनी कम होती है कि बीज बोने भर का भी नहीं निकलता। पैदावार बढ़ाने के लिए डाई यूरिया बहुत डालना पड़ता है।’ आगे वे बताती हैं कि ‘अब सुनाई पड़ता है कि डाई यूरिया वाली फसल खाने से कैंसर हो रहा है। तुम्हारे मामा कई ट्रैक्टर गोबर वाली खाद (जैविक खाद) खेतों में डलवाते हैं लेकिन जैसे वो असर ही नहीं करती है।’ माँ बताती हैं कि ‘नहर के अगल-बगल की जमीन रेह(सफेद क्षारीय अनुपजाऊ मिट्टी) में बदल गई। नहर निर्माण से उसके दोनों ओर की जमीन नीचे हो गई जिससे ताल(अपेक्षाकृत निचली भूमि) बन गया, जहाँ अब चावल की पैदावार अच्छी होती है। पहले गेहूँ की पैदावार बहुत कम होती थी, उसके स्थान पर सावा, कोदो, ज्वार, बाजरा, जोनहरी(मक्का) जैसे मोटे अनाज होते थे। जबसे डाई यूरिया आया, ये सब पैदा होने बंद हो गए, उसके स्थान पर गेहूँ की पैदावार बढ़ गई।’ मैं माँ की उन बातों पर सोचती हूँ कि आज फिर से कृषि क्षेत्र में जैविक कृषि, फसल वैविध्य एवं मोटे अनाज खाने की बात हो रही। लेकिन उस दौर को पुनः लाना इतना आसान नहीं जितनी तेजी से हमारी स्मृतियाँ रह-रह कर लौट आती हैं।

माँ खेलकूद, तीज-त्यौहार में हुए बदलावों को भी देखती हैं। सावन का महीना विशेष रूप से उल्लास और सुख का होता है, क्योंकि किसानों के लिए जीवन लाता है, वर्षा की बूंद फटी बिवाई की तरह धरती की सूख चुकी परतों में नरमी लाती है। कच्चे आम, कटहल और जामुन से बने आचार-सिरके की खटास तो वहीं रसीले आम, जामुन, कटहल के पके फल दोनों मिलकर मन को तर करते हैं। माँ बरसात के दिनों में गाँव के मुश्किल हालात के साथ, उस मौसम में आनंद के सभी पलों का वर्णन करती हैं। ‘ननिहाल का कच्चा मकान बरसात शुरू होने से पहले ही तालाब की मिट्टी से लीपपोत कर चमकाया जाता, जगह-जगह बन चुके चूहे और साँपों के बिलों को सावधानी पूर्वक बंद किया जाता। छान(छप्पर) की मरम्मत की जाती, ताकि बरसात और आंधी तूफान से बचा जा सके। उपड़उर(उपले का ढेर) से पर्याप्त उपले घर के अंदर जमाए जाते, जिससे बरसात में सूखे जलावन की दिक्कत न हो। गाँव में सावन के दिनों में गुड़िया का मेला लगता है, जिसमें अनरसा(चावल से बनी मिठाई) और गुड़ की जलेबी विशेष रूप से मिलती थी। जिसकी बरसाती सौंधी खुशबू और देशी मिठास आज भी मुँह में पानी ला देती है। मेला सिर्फ गाँव में नहीं लगता बल्कि इसी समय आता है, तीज और रक्षाबंधन का त्योहार, जिसमें घर में बहनों का मेला लगता, हँसी ठिठोली का एक अनवरत सिलसिला चलता। इसी मौसम में पेड़ों पर झूले डाले जाते, लड़कियाँ झूला झूलती, वहीं लड़के कूड़ी कूदने जाते(लंबी कूद)।’ निस्संदेह आज भी ये परंपरागत त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन इनके स्वरूप और इसके पीछे छिपी भावना में बहुत अंतर आ गया है, जिस पर मुख्यतः औपचारिकता और आधुनिकता हावी हो रही है। माँ भी इस बदलाव को देखती है, पीढ़ियों की बदलती जरूरतें, उनकी सोच, उनकी भावनाओं में अंतर को महसूस करती है, इसलिए जब भी पुरानी स्मृतियों की चर्चा करती है, तो तुलना स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाती है।

पूर्विका अत्री
शोधार्थी (हिन्दी विभाग), दिल्ली विश्वविद्यालय

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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