‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ यात्रा-वृत्तांत में स्त्री-चेतना
- मनीषा गावडे
बीज शब्द : स्त्री-चेतना, आज़ादी, पितृसत्ता, परावलंबन, स्त्री आंदोलन, परिवार, भावनात्मक आज़ादी, लैंगिक असमानता, स्त्री-स्वाधीनता, परवरिश।
मूल आलेख : भारतीय सामाजिक संरचना मूलतः पितृसत्तात्मक है। परिवार से लेकर राज्य को संचालित करने का कार्य लंबे समय से पुरुषों के हाथों में रहा है। काफ़ी समय से पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्री को उनके अधिकारों से वंचित रखकर पुरुष के अधीन रहने के लिए मजबूर किया है। 20वीं सदी में कई स्त्री-आंदोलन हुए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार, संपत्ति रखने और समान वेतन पाने, यौन एवं प्रजनन अधिकारों को पाने हेतु तथा यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, पारंपरिक रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों के खिलाफ़ लड़ना पड़ा है। स्त्री-विमर्श ने स्त्री-स्वतंत्रता को बहुत हद तक संभव बनाया है। जिसका उद्देश्य पुरुष का विरोध नहीं है "वह पुरुष की वर्चस्ववादी प्रवृत्ति और स्वामित्व का विरोधी है। वह स्त्री को जैविक, सामाजिक, मानसिक, आर्थिक, राजनैतिक स्तर पर पुरुषों के समान स्थान प्राप्त करके, अपने अस्तित्व की अलग पहचान कायम करने का पक्षधर है। मनुष्य जाति की जैविक आवश्यकताओं के लिहाज से मर्द-औरत में यौन संबंधी अंतर का होना जरूरी है, किंतु इस आधार पर लिंग आधारित अंतर या भेदभाव न तो किसी ईश्वर ने बनाए हैं और न ही वे प्रकृति-प्रदत्त हैं।...स्त्री-विमर्श एक मानवीय दृष्टि है, जो प्रतिष्ठा के स्तर पर भी समानता की पक्षधर है। स्त्री-विमर्श मानसिकता में परिवर्तन लाता है और समाज को, विशेषकर स्त्री को स्त्री के प्रति एक नयी दृष्टि देता है।"1 नतीजनत आधुनिक समय में कुछ बदलाव तो हुए हैं, किन्तु स्त्री पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं हो पायी है। स्त्री शोषण और उत्पीड़न समाज में गहराई से निहित है, जिसका लगातार पुनरुत्पादन भी होता है।
लैंगिक असमानता का बीजारोपण -
बच्चों के व्यक्तित्व विकास में सबसे अधिक योगदान परिवार, शिक्षा जैसी संस्थाओं का होता है। बच्चा बचपन से अपने माता-पिता, भाई-बहन, बड़े-बुजुर्गों को देखता है, उनसे प्रेरणा ग्रहण करता है। परिवार नामक संस्था में ही पितृसत्ता को पोषण मिलता है। यहीं से स्त्री-पुरुष के बीच असमानता के बीज बोये जाते हैं। ‘लड़के और लड़की की परवरिश के दौरान माता-पिता दोहरे मानदंड और अलग-अलग नियम अपनाते हैं। भोजन, वस्त्र, खेल-खिलौने, घर की जिम्मेदारियों आदि का समान रूप से वितरण नहीं होता। लड़कियों को खाना बनाना, परोसना, सफ़ाई का कार्य सिखाया जाता है। लड़कों को पिस्तौल और लड़कियों को गुड़िया, रसोई का सामान खिलौनों के रूप में दिये जाते हैं। लड़कियों को कम पौष्टिक भोजन दिया जाता है लड़कों को अधिक। इसी तरह व्यवहार में लड़कियों को देना, पीछे हटना, धीमे बात करना, विनम्र या आज्ञाकारी बनना सिखाया जाता है। इस कार्य को बढ़ावा शिक्षा संस्थाओं में भी मिलता है। लड़कियों को सुई-धागे, खाना बनाने तथा लड़कों को बढ़ईगीरी, विभिन्न औजारों के उपयोग के बारे में शिक्षा दी जाती है। ऐसे में लोग यह मानने लगते हैं कि लड़कियाँ स्वभावतः आश्रित, निर्णय लेने में असमर्थ, डरपोक, शर्मीली होती हैं।’2 पितृसत्तात्मक समाज में क्योंकि पुरुष केंद्र में है अतः पुरुषों के लिए कई मायनों में अधिक छूट होती है और स्त्रियों के व्यवहार को नियंत्रित करती हैं। स्त्री को उसके बचपन में ही सिखाया जाता है कि उसे क्या करना है, कैसे रहना है, कैसे बैठना-चलना है आदि।
अनुराधा बेनीवाल यात्रा-वृत्तांत में बताती हैं कि कैसे सबसे पहले उसके परिवारवालों द्वारा बचपन में ही उसकी आज़ादी छीन ली जाती है। स्त्री होने के कारण कई पाबंदियाँ उस पर लगाई जाती है। ‘लड़के बिना वजह घर से बाहर निकल सकते हैं यह कहकर कि 'मैं जरा टहल के आता हूँ।' 'बाहर जाके आता हूँ।' लेकिन लेखिका ने लड़कियों के मुँह से ऐसी बातें गाँव के समाज में कभी नहीं सुनी थी।’3 लड़कियों का बिना किसी ठोस कारण के घर से निकलना उनपर संशय करने या चरित्र पर सवाल उठाने के कारण बनते हैं। लेखिका के शब्दों में-"मेरे समाज की लड़कियाँ यूँ ही बिना काम नहीं टहलती थीं। लड़की का बाहर जाना बिना किसी काम के अकल्पनीय था। क्यों जाएगी लड़की बाहर? क्या करने? ज़रूर किसी से मिलने जाती होगी। या कोई काम करवाने।”4 यहाँ बेवजह, बेफ़िक्र घर से बाहर निकलना ‘अच्छी लड़की’ बने रहने के पैमाने नहीं हैं। उनका सबसे बड़ा सवाल सोसाइटी में इज्जत का था। वे कहती हैं कि “मेरे तो घर का कॉन्ट्रैक्ट भी ‘अच्छी लड़की’ बने रहने से ही रिन्यू होता था। थोड़ी इधर-उधर हुई नहीं कि सर पर छत के ही लाले पड़ जाने वाले थे!’5
शिक्षा और स्त्री -
अनुराधा बेनीवाल आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शारीरिक बदलाव एवं यौन-विकास जैसे विषयों का होना आवश्यक समझती हैं। वे देखती हैं कि अपने शरीर, भावनाओं के प्रति जागरूकता लाने हेतु डच के स्कूलों में पहली क्लास से ही बच्चों को इस विषय की शिक्षा दी जाती है। भारत में कई ऐतिहासिक स्थलों, गुफाओं, मंदिरों पर मनुष्य के यौन-संबंध को लेकर चित्र बने हैं, जिससे भारतीयों के उदार-चित्त का परिचय मिलता है। वे लिखती हैं- “दुनिया को हमने कामसूत्र दिया है और अपने ही समाज में हम इस पर बात करने से आज कतरा रहे हैं। इसको बंद अंधेरे कमरे का रहस्य बनाए रखने पर उतारू हैं जिससे कि समाज निकलना चाह रहा है। सेक्स को दबाने की बजाय अगर उसे क़ायदे से पढ़ाया जाए, बताया और सिखाया जाए तो निश्चित रूप से समाज की मानसिकता बदलेगी। स्वस्थ होगी। जानकर ही किसी चीज़ से ऊपर उठा जा सकता है। यह क्या बात हुई कि हमारे पास कामसूत्र और खजुराहो तो हैं, लेकिन हमारी आँखें बंद हैं और इच्छाएँ दमित! हम ज्ञानी हैं, इसलिए दुनिया हमसे सीखे-इसका मतलब यह तो नहीं कि हम दुनिया से कुछ न सीखें।”6 लेकिन भारतीय समाज में लड़कियों को बचपन से ही सबको भैया बोलने के लिए सिखाया जाता हैं। ताकि वे अपने भावनाओं को दबाये रखें। किशोरावस्था में हॉर्मोनल बदलाव होने लगते हैं जिससे शारीरिक बदलाव एवं यौन विकास होता है। इस दौरान मनुष्य स्वभाव में काफ़ी बदलाव होते हैं, यह मानव शरीर का प्राकृतिक विकास है, यह स्वाभाविक है। लेकिन इसे स्वाभाविक रहने नहीं दिया जाता है। अनुराधा बेनीवाल बताती हैं कि किसी लड़के से आकर्षण हो, उससे ख़ुद को छूआ लेने का मन करें तो एक अपराधबोध-सा उभरता है। लेखिका कहती हैं कि दिमागों की कंडीशनिंग की जाती है। नतिजनत किशोरावस्था में हो रहे शारीरिक बदलावों एवं यौन विकास के कारण जो मानसिक तनाव उपजता है उसका बख़ूबी चित्रण लेखिका ने किया है। “...'अच्छी लड़कियों' ने मुझसे एक दूरी बनानी शुरू कर दी। वो सब मुझे गर्व से बतातीं कि कैसे वे अपनी ब्रा का स्ट्रैप भी सेफ्टी पिन लगाकर छुपाती हैं; और मैं? मैं मन-ही-मन हीन भावना से भरती चली गई। क्यों मैं उन 'अच्छी लड़कियों' जैसी नहीं थी? वे मुझे परिवार में बदनाम लड़कियों के क़िस्से चटकारे लेकर सुनातीं और मैं कहीं दफ़्न हो जाना चाहती। शायद उनको पता चल गया था कि मैं उन जैसी नहीं हूँ। मेरे मन में यक़ीन जैसा एक विचार उभरने लगा कि मेरे साथ कुछ 'ग़लत' हुआ है। इसीलिए मुझे सबसे एक तरह का डर-सा लगने लगा। कोई दो लोग आपस में बातें करते दिखते तो लगता, जैसे मेरे बारे में ही कर रहे होंगे। मुझे सबकी नज़रों में अपने लिए कोई अजीब भाव दिखने लगा। एक तरफ कैशोर्य का रहस्यमयी आगमन, और मैं हैरान-परेशान अपने शरीर में हो रहे हर बदलाव को लेकर हर जिज्ञासा से भरी हुई; दूसरी तरफ़ एक 'गन्दी लड़की' कहलाए जाने का डर! एक तरफ़ उसको फिर से छू लेने की चाह थी, दूसरी तरफ़ सभी नज़रें जैसे मुझे ही घेरे हुए थीं। एक तरफ़ रात-भर, सोते-जागते उसके आलिंगन के सपने देखती तो दूसरी तरफ़ ‘अच्छी लड़की’ का ख़िताब छिन जाने का डर भी रहता...”7 लेखिका सही और ग़लत, अच्छा और बुरा आदि पर पुनः विचार करती हैं। वे समझने की कोशिश करती हैं कि शारीरिक बदलाव एवं यौन विकास के चलते जो वह महसूस कर रही हैं वह सत्य है या समाज में प्रतिष्ठित प्रतीक, आदर्शवादी कहानियाँ सत्य है। वे सोचती हैं कि “ग़लत क्या और सही क्या-यह भी हम अपने अनुभव से कहाँ समझ पाते हैं! चूँकि हमें कहा जाता है कि यह ग़लत है और वह सही है, इसलिए हम मान लेते हैं कि ऐसा ही है। मानना हमारी बाध्यता है, स्वाभाविकता नहीं। जीवन को तर्क के चश्मे से देखने की आज़ादी भी हम लड़कियों के लिए एक दुर्लभ उपलब्धि है। उसको मैं अपने देश भारत में आधा-अधूरा ही पा सकी। जो पाया वह परिवार के स्तर पर, समाज के स्तर पर तो असंभव बात रही।”8 वे बताती हैं कि कैसे स्त्रियों के सामने ‘अच्छी लड़की’ बने रहने के लिए कई आदर्श प्रस्तुत किए जाते हैं। बचपन से ही उसे सती-सावित्री की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। ममता कालिया का मानना है कि ‘स्त्री को इन लोकसम्मत प्रतीकों को अपने जीवन से निकाल देना चाहिए जिसकी प्रतिष्ठा के कारण कई स्त्रियों की जिंदगियाँ बर्बाद हुई।’9 अनुराधा बेनीवाल का यात्रा-वृत्तांत ऐसी संस्थाओं एवं प्रतीकों के तह तक जाकर इसके निहितार्थ को समझने का प्रयास करता है और स्त्रियों के विरुद्ध पितृसत्तात्मक समाज के इन्हीं षडयंत्रों का पर्दाफाश करता है।
सिनेमा और स्त्री -
सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसमें एक नयी संस्कृति का निर्माण करने या किसी मौजूदा संस्कृति को प्रभावित करने की क्षमता होती है। अनुराधा बेनीवाल इस बात पर ध्यान केन्द्रित करती हैं कि स्त्रियों के दिमागों की कंडिशनिंग में हिंदी सिनेमा ने कम योगदान नहीं दिया है। वे बताती हैं कि किस प्रकार बचपन से इन फिल्मों ने उन्हें प्रभावित किया है। उनके जीवन में उनकी आइडियल फिल्मों की वे नायिकाएँ थीं, जो एक आदर्श प्रेमिका, पत्नी, माँ आदि स्त्री की भूमिकाओं के पैमाने उनके लिए निर्धारित करती थीं। इन फिल्मों में दिखाया जाता कि किस प्रकार नायिकाएँ सफ़ेद घोड़े पर सवार राजकुमार का इंतजार करती हैं। लेकिन लेखिका को अपने आपसे चिढ़ होती थीं क्योंकि वह उनके जैसी नहीं बन सकी थीं।10
भावनात्मक आज़ादी -
ममता कालिया एक जगह लिखती हैं कि- "स्त्री की स्वाधीनता को केवल देह स्वाधीनता तक सीमित कर, उनके समर्थक विमर्शकारों ने इस अभियान को एक सँकरी गली में पहुँचा दिया।"11 अनुराधा बेनीवाल स्त्री-मुक्ति के सवाल को देह-मुक्ति से आगे ले जाती हैं। वे मानसिक रूप से मजबूत होने की आवश्यकता पर बल देती हैं। बचपन से हमारे दिमाग की जो कंडीशनिंग की जाती है उसपर पुनः विचार करने की जरूरत है। वे लिखती हैं- “देह की आज़ादी को पाना आसान है। इस लड़ाई से पार पाना अपने वश में है; बशर्ते ‘बिगड़ी हुई’, ‘ज़्यादा-ही-फॉरवर्ड’, ‘बदचलन', 'चरित्रहीन', 'लूज़ कैरेक्टर', 'होर', 'रंडी'- जैसे विशेषणों को हँसकर उड़ाने भर की मानसिक मजबूती हो। आर्थिक आज़ादी ने काफ़ी हद तक देह को आज़ाद कर दिया। लेकिन उसको पूरी आज़ादी अच्छे-बुरे की कंडीशनिंग टूटने से मिली। सिर्फ़ किसी के साथ सो सकने की आज़ादी ही नहीं, किसी के साथ 'नहीं' सो सकने की आज़ादी भी। किसी भी तरह की हिचक और परवाह से आज़ादी !”12 वे कहती हैं कि उनके जीवन में सारी मुश्किलें तब तक थीं जब वे एक साथ दो चीजों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही थी। “एक तरफ़ ख़ुद को ‘संस्कारी’ भी कहलवाना था। देह और मन की भी सुननी थी और समाज की भी। लेकिन जब मैंने निश्चय कर लिया कि मुझे कैसा होना है या कैसे जीना है, यह केवल मैं तय करूँगी- तो जाने किस तरह से आस-पास के परिचित, दोस्त-रिश्तेदार भी मेरे अनुकूल होते चले गए! मेरी बेपरवाही ने मेरा जीना आसान कर दिया।”13 स्त्री की प्रारम्भिक लड़ाई देह की स्वतंत्रता के लिए थी किंतु स्त्रियाँ अपनी क्षमताओं को पहचान कर आत्मनिर्भर बन रही हैं लेकिन इससे यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं होती। पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए उनका मानना है कि समाज के प्रतिघातों को सहने की मानसिक मजबूती और भावनात्मक आज़ादी भी आवश्यक है।
व्यक्ति भावनात्मक स्तर पर एक दूसरे से जुड़ता है। उसके सुखों-दुखों का कारण अधिकतर दूसरा व्यक्ति बनता है। लेखिका इससे मुक्ति चाहती हैं और अन्य स्त्रियों के लिए भी इस बात को समझना आवश्यक समझती हैं। वे लिखती हैं- “मेरे दुख मेरे हों, मेरे आँसू मेरे। मेरा सुख मेरा हो, मेरी हँसी मेरी। मेरे सुख-दुख किसी दूसरे इन्सान से न जुड़े हों- कि वह खुश तो मैं खुश, वह दुखी तो मैं दुखी। मैंने अपने सुख-दुख कई बार एक से, तो कई बार कई लोगों से जोड़ लिए। जितने ज्यादा लोगों से जुड़ती, उतने ही सुख-दुख से और लद जाती। जैसे मैं भावनात्मक रिश्तों का बल नहीं, अपने दिल में सबकी पोटली जमा करती जाती। और ज़ाहिर है, उनका वजन मुझे ही ढोना होता।"14 ये स्थिति भी व्यक्ति को दूसरों पर आश्रित बनाती है। हम अपनी खुशियों की अपेक्षा दूसरों से करते और दुखों के लिए हमेशा दूसरों को दोषी ठहराने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे में आरोप-प्रत्यारोप का खेल चलता रहता है।
लेखिका अपनी यात्रा के दौरान मिली आजाद, बेफिक्र, आत्मनिर्भर, घुमक्कड़ स्त्रियों से मिलकर आज़ादी का सही अर्थ और उसके सही मायने समझती हैं। वे लिखती हैं- ‘पूरी आज़ादी अच्छे-बुरे की कंडीशनिंग टूटने से मिलती है’15 आज़ादी वहाँ है जहाँ ‘किसी भी तरह की हिचक और परवाह से आज़ादी!’,16 जहाँ आत्मविश्वास और आर्थिक स्वतंत्रता है और जहाँ मन करें वहाँ बिना किसी कारण, बेवजह निकल जाने की आज़ादी हैं। बेफ़िक्र, निडर, साहसी होना, “अपनी मर्जी जानना और अपनी मर्जी की इज्जत करना”17 आज़ादी है। “आज़ादी ना 'लेने' की चीज़ है, ना 'देने' की। छीनी भी तो क्या-आज़ादी, यह तो जीने की चीज़ है”18 देह की आज़ादी, भावनात्मक आज़ादी, केवल चल सकने की आज़ादी, जीवन को तर्क के चश्मे से देखने की आज़ादी।
निष्कर्ष : अनुराधा बेनीवाल उन सामाजिक संगठनों पर सवाल उठाती हैं जो स्त्री शोषण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं और स्त्री की एक कमजोर, आश्रित, कोमल, पुरुषों की तुलना में अधिक असक्षम एवं शक्तिहीन मनुष्य के रूप में छवि निर्मित करती है। वे इस बनी-बनाई छवि को तोड़ने की कोशिश करती हैं। भारत में अधिकतर स्त्रियाँ परिवार नामक संस्था के अंतर्गत शोषित हैं। बचपन में ही उनके दिमागों की कंडिशनिंग की जाती है। उनको घर और बाहर शिक्षा जैसी संस्थाओं में जो कार्य सौपे जाते हैं, खिलौने दिये जाते हैं इससे उनकी जो छवि बनती है उसी को आगे ढ़ोया जाता है। उनके सामने ‘अच्छी लड़की’ बने रहने के जो आदर्श प्रस्तुत किए जाते हैं उनका अंधानुगमन किया जाता है। त्याग और समर्पण उनमें महानता के प्रतीक बन जाते हैं। परिवार, शिक्षा संस्थाओं की तरह कई सांस्कृतिक कलाकृतियाँ हैं जो स्त्रियों की मानसिक बनावट में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। सिनेमा इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है। फिल्मों की नायिकाएँ स्त्रियों के लिए आदर्श बनती हैं। ये उनके सामने आदर्श पत्नी, आदर्श बहन, आदर्श माँ के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। ये फिल्में इसी पितृसत्तात्मक समाज में बनती हैं।
पश्चिम में शारीरिक विकास एवं यौन-सम्बन्धों को लेकर जीतने खुले रूप में बातचीत होती है वैसी भारत में नहीं होती। भारत में इन विषयों पर बात करना शर्म की बात मानी जाती है। शारीरिक एवं यौन-विकास को लेकर स्त्रियाँ अपराधबोध महसूस करती हैं। शारीरिक आवश्यकताओं को पश्चिम में उतना ही महत्त्व दिया जाता है जितना की भावनाओं को। अपने इमोशन्स एवं शरीर के प्रति कम्फ़र्टेबल होना उन्होंने सीख लिया है। पश्चिम के स्कूलों में शारीरिक विकास एवं यौन-क्रिया जैसे विषयों पर बचपन से शिक्षा भी दी जाती है। भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत इसकी उपेक्षा हुई है।
अनुराधा बेनीवाल ‘ग़लत और सही’ ‘आज़ादी’ आदि की परिभाषाओं पर पुनः विचार करती हैं। सही और ग़लत मनुष्य ही निर्धारित करता है। वह अपने समय, भौगोलिक स्थिति के मांग के हिसाब से इन नियमों को रचता है और समय आने पर आवश्यकतानुसार उसे बदलता भी है और उनमें ढ़ील भी देता है। अतः किसी एक संस्कृति के लिए जो मान्य है, हो सकता है कि किसी दूसरी संस्कृति के लिए मान्य न हो। अनुराधा बेनीवाल ‘आज़ादी’ को पुनः परिभाषित करती हैं। वे मानती हैं कि स्त्री अच्छे-बुरे की कंडिशनिंग टूटने से ही आज़ाद हो सकती है। उसके लिए देह की स्वतंत्रता जितनी महत्त्वपूर्ण है उतनी ही महत्त्वपूर्ण भावनात्मक आज़ादी है। वे कहती हैं कि आज़ादी जीने की चीज़ है लेने और देने की नहीं। स्त्रियों में समाज के लांछनों को हँसकर उड़ाने की मानसिक मजबूती भी जरूरी है। स्त्रियों में आत्मविश्वास एवं आर्थिक स्वतंत्रता का होना आवश्यक है। अपनी मर्जी को जानना और उसके हिसाब से चलना, बेपरवाह, बेफिक्र चल सकना आज़ादी है। जीवन को तर्क के चश्मे से देख सकना आज़ादी है।
संदर्भ :
- रमणिका गुप्ता, स्त्री-मुक्ति: संघर्ष और इतिहास, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014. पृ. 70.
- R. K. SAPRU, Women and Development. Ashish Publishing House, New Delhi. 1989. Pg.318.
- अनुराधा बेनीवाल, आज़ादी मेरा ब्रांड. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली. 2016. पृ. xiv-xv.
- वहीं, पृ. xiv-xv.
- वहीं, पृ. 1.
- वहीं, पृ. 80.
- वहीं, पृ. 11.
- वहीं, पृ. 14.
- कालिया, ममता. भविष्य का स्त्री विमर्श. वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली. 2015. पृ. 14-15.
- अनुराधा बेनीवाल, आज़ादी मेरा ब्रांड. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली. 2016. पृ. 11-12.
- कालिया, ममता. भविष्य का स्त्री विमर्श. वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली. 2015. पृ. 9.
- अनुराधा बेनीवाल, आज़ादी मेरा ब्रांड. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली. 2016. पृ. 10.
- वहीं, पृ. 10.
- वहीं, पृ. 12-13.
- वहीं, पृ. 10.
- वहीं, पृ. 10.
- वहीं, पृ. 23.
- वहीं, पृ. 24.
मनीषा गावडे
सहायक प्राध्यापक, हिंदी अध्ययनशाखा, गोवा विश्वविद्यालय, तालीगांव, गोवा
manisha@unigoa.ac.in 7030699172
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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