‘कजरा
मोहब्बत
वाला’
हिन्दी
फ़िल्म
‘किस्मत’
(1968) का अत्यंत लोकप्रिय
गीत
है,
जो
अपने
चुलबुले
भाव,
लोक–सुगंध
और
सजीव
स्त्री
सौंदर्य–चित्रण
के
कारण
आज
भी
उतना
ही
मोहक
लगता
है।
यह
गीत
केवल
मनोरंजन
नहीं,
बल्कि
भारतीय
लोक–संवेदना,
नायिका–भाव
और
प्रेम
की
शरारती
अभिव्यक्ति
का
सुंदर
उदाहरण
है।
गीत
में
कजरे
का
प्रयोग
प्रतीकात्मक
है।
कजरा
यहाँ
केवल
आँखों
का
शृंगार
नहीं,
बल्कि
नायिका
की
मोहब्बत,
चंचलता
और
आत्मविश्वास
का
विस्तार
बन
जाता
है।
नायिका
का
यह
कहना
कि
“कजरा
मोहब्बत
वाला, अखियों में
ऐसा
डाला,
कजरे
ने
ले
ली
मेरी
जान,
हाय
रे
मैं
तेरे
कुरबान”
मानो
प्रेम
को
आँखों
के
इशारों
से
बोलने
की
कला
है—जहाँ
शब्द
कम
और
दृष्टि
अधिक
प्रभावी
है।
यह
गीत
भारतीय
लोकगीतों
की
परंपरा
से
जुड़ा
हुआ
प्रतीत
होता
है,
जिसमें
शृंगार,
प्रेम
और
नख–शिख
वर्णन
सहजता
से
घुल-मिल
जाते
हैं।
संगीत
की
दृष्टि
से
इसकी
धुन
में
लोक–रागात्मकता
और
नृत्यात्मक
प्रवाह
है,
जो
श्रोता
को
स्वतः
झूमने
पर
विवश
कर
देता
है।
गायन
में
आशा
भोसले
जी
की
आवाज़
की
चंचलता
और
नज़ाकत
गीत
के
भावों
को
और
भी
सशक्त
बना
देती
है।
उनकी
गायकी
में
शरारत,
मिठास
और
आत्मीयता—तीनों
का
सुंदर
समन्वय
परिलक्षित
होता
है।
इस
गीत
के
रचनाकार
मजरूह
सुल्तानपुरी
हैं।
हिन्दी
फ़िल्म
गीतों
के
इतिहास
में
मजरूह
सुल्तानपुरी
का
नाम
उन
महान
गीतकारों
में
शुमार
है,
जिन्होंने
शायरी
की
ऊँचाई
और
आम
आदमी
की
संवेदना—दोनों
को
एक
साथ
साधा।
‘कजरा
मोहब्बत
वाला’
गीत
में
मजरूह
साहब
की
छाप
स्पष्ट
दिखाई
देती
है।
उन्होंने
लोक–सुगंध,
स्त्री
सौंदर्य
और
प्रेम
की
चंचलता
को
अत्यंत
सहज
और
बोलचाल
की
भाषा
में
व्यक्त
किया
है।
यह
उनकी
सबसे
बड़ी
कला
थी,
कि
वे
सरल
शब्दों
में
गहरी
अनुभूति
रच
देते
थे।
कजरा
जैसे
साधारण
प्रतीक
को
उन्होंने
मोहब्बत
का
सशक्त
रूपक
बना
दिया।
फ़िल्मांकन
में
बबीता
का
नृत्य
और
भाव
भंगिमा
गीत
को
दृश्यात्मक
सौंदर्य
प्रदान
करते
हैं।
उनका
अभिनय
स्त्री–स्वतंत्रता
और
आत्माभिव्यक्ति
का
संकेत
देता
है—जहाँ
नायिका
प्रेम
में
निष्क्रिय
नहीं,
बल्कि
अपने
सौंदर्य
और
भावों
की
स्वामिनी
है।
यह
गीत
उस
दौर
की
फिल्मों
में
उभरती
सशक्त
और
आत्मविश्वासी
नायिका
की
छवि
को
भी
रेखांकित
करता
है।
यह
गीत
भारतीय
सिनेमा
के
उन
अमर
गीतों
में
है,
जो
लोक–संस्कृति,
शृंगार
रस
और
प्रेम
की
चुलबुली
अभिव्यक्ति
को
सहजता
से
एक
साथ
पिरो
देता
है।
इसकी
लोकप्रियता
इस
बात
का
प्रमाण
है,
कि
सादगी,
भावनात्मक
सच्चाई
और
संगीतात्मक
सौंदर्य—जब
एक
साथ
आते
हैं,
तो
गीत
समय
की
सीमाओं
को
पार
कर
अमर
हो
जाते
हैं।
वर्तमान परिदृश्य
की
बात
करें
तो
आज
“कजरा”
केवल
आँखों
का
शृंगार
नहीं
रहा,
वह
एक
उत्पाद
बन
गया
है
और
हो
गया
है
ब्रांड,
पैकेज
और
विज्ञापन
के
हवाले।
उसकी
कालिमा
में
अब
वह
गहराई
नहीं,
जो
कभी
दृष्टि
से
दृष्टि
तक
प्रेम
का
संवाद
रचती
थी।
आज
के
समय
में
कजरा
केवल
शृंगार
का
साधन
नहीं,
बल्कि
कंटेंट
बन
गया
है।
सोशल
मीडिया
की
चमकती
स्क्रीन
पर
वह
रील,
फ़िल्टर
और
लाइक्स
की
दौड़
में
शामिल
है।
नज़रें
अब
किसी
एक
पर
टिकने
के
बजाय
लगातार
स्क्रॉल
करती
रहती
हैं।
प्रेम
भी
‘स्टेटस
अपडेट’
और
‘डिस्प्ले’
का
विषय
हो
गया
है—जहाँ
गहराई
से
अधिक
दृश्यता
महत्त्वपूर्ण
है।
उपभोग
संस्कृति
ने
संबंधों
को
भी
उत्पाद
बना
दिया
है;
यहाँ
आकर्षण
की
अवधि
सीमित
है
और
भावनाओं
की
एक्सपायरी
डेट
तय।
ऐसे
समय
में
मोहब्बत
का
वह
सहज,
धैर्यवान
और
आत्मसमर्पित
रूप
धीरे–धीरे
ओझल
होता
जा
रहा
है।
प्यार-मोहब्बत
के
तौर-तरीके
भी
बदले
हैं—क्षणिक
आकर्षण,
त्वरित
संतोष
और
सतही
प्रदर्शन
तक
सीमित।
बाज़ार
ने
प्रेम
की
चंचलता
तो
अपना
ली,
पर
उसकी
आत्मा
छीन
ली।
भावनाएँ
अब
अनुभूति
नहीं,
अनुभव–पैकेज
हैं;
शृंगार
आत्माभिव्यक्ति
नहीं,
बल्कि
प्रस्तुति
बन
गया
है।
ऐसे
समय
में
‘कजरा
मोहब्बत
वाला’
जैसे
गीत
हमें
स्मरण
कराते
हैं
कि
प्रेम
कभी
दिखावा
नहीं
था—वह
आँखों
की
ख़ामोशी,
नज़रों
की
शरारत
और
मन
की
सच्चाई
में
बसता
था।
शायद
इसी
कारण
ये
गीत
आज
भी
हमें
भीतर
तक
छूते
हैं,
क्योंकि
इनमें
बाज़ार
से
पहले
का
मनुष्य
और
मोहब्बत
से
भरा
हुआ
जीवन
धड़कता
है।
ऐसे
में
‘कजरा
मोहब्बत
वाला’
जैसे
गीत
केवल
अतीत
की
स्मृति
नहीं,
बल्कि
एक
सांस्कृतिक
सेतु
हैं।
वे
लोक–संवेदना
के
माध्यम
से
हमें
उस
प्रेम–परंपरा
से
जोड़ते
हैं,
जहाँ
सौंदर्य
आत्मा
से
उपजता
है
और
प्रेम
उपभोग
नहीं,
साधना
होता
है।
शायद
आज
के
समय
की
सबसे
बड़ी
ज़रूरत
यही
है,
कि
हम
कजरे
की
कालिमा
को
फिर
से
आँखों
में
नहीं,
दिल
में
बसाएँ - ताकि
हमारी
प्रेमिल
दृष्टि
बनी
रहे।
कोटा (राजस्थान)
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