यादों में सिनेमा : कजरा मोहब्बत वाला / नंदकिशोर महावर

यादों में सिनेमा : कजरा मोहब्बत वाला
- नंदकिशोर महावर

 

कजरा मोहब्बत वालाहिन्दी फ़िल्मकिस्मत’ (1968) का अत्यंत लोकप्रिय गीत है, जो अपने चुलबुले भाव, लोकसुगंध और सजीव स्त्री सौंदर्यचित्रण के कारण आज भी उतना ही मोहक लगता है। यह गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंवेदना, नायिकाभाव और प्रेम की शरारती अभिव्यक्ति का सुंदर उदाहरण है। गीत में कजरे का प्रयोग प्रतीकात्मक है। कजरा यहाँ केवल आँखों का शृंगार नहीं, बल्कि नायिका की मोहब्बत, चंचलता और आत्मविश्वास का विस्तार बन जाता है। नायिका का यह कहना किकजरा मोहब्बत वालाअखियों में ऐसा डाला, कजरे ने ले ली मेरी जान, हाय रे मैं तेरे कुरबानमानो प्रेम को आँखों के इशारों से बोलने की कला हैजहाँ शब्द कम और दृष्टि अधिक प्रभावी है। यह गीत भारतीय लोकगीतों की परंपरा से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है, जिसमें शृंगार, प्रेम और नखशिख वर्णन सहजता से घुल-मिल जाते हैं।

संगीत की दृष्टि से इसकी धुन में लोकरागात्मकता और नृत्यात्मक प्रवाह है, जो श्रोता को स्वतः झूमने पर विवश कर देता है। गायन में आशा भोसले जी की आवाज़ की चंचलता और नज़ाकत गीत के भावों को और भी सशक्त बना देती है। उनकी गायकी में शरारत, मिठास और आत्मीयतातीनों का सुंदर समन्वय परिलक्षित होता है। इस गीत के रचनाकार मजरूह सुल्तानपुरी हैं। हिन्दी फ़िल्म गीतों के इतिहास में मजरूह सुल्तानपुरी का नाम उन महान गीतकारों में शुमार है, जिन्होंने शायरी की ऊँचाई और आम आदमी की संवेदनादोनों को एक साथ साधा।कजरा मोहब्बत वालागीत में मजरूह साहब की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने लोकसुगंध, स्त्री सौंदर्य और प्रेम की चंचलता को अत्यंत सहज और बोलचाल की भाषा में व्यक्त किया है। यह उनकी सबसे बड़ी कला थी, कि वे सरल शब्दों में गहरी अनुभूति रच देते थे। कजरा जैसे साधारण प्रतीक को उन्होंने मोहब्बत का सशक्त रूपक बना दिया।

फ़िल्मांकन में बबीता का नृत्य और भाव भंगिमा गीत को दृश्यात्मक सौंदर्य प्रदान करते हैं। उनका अभिनय स्त्रीस्वतंत्रता और आत्माभिव्यक्ति का संकेत देता हैजहाँ नायिका प्रेम में निष्क्रिय नहीं, बल्कि अपने सौंदर्य और भावों की स्वामिनी है। यह गीत उस दौर की फिल्मों में उभरती सशक्त और आत्मविश्वासी नायिका की छवि को भी रेखांकित करता है। यह गीत भारतीय सिनेमा के उन अमर गीतों में है, जो लोकसंस्कृति, शृंगार रस और प्रेम की चुलबुली अभिव्यक्ति को सहजता से एक साथ पिरो देता है। इसकी लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है, कि सादगी, भावनात्मक सच्चाई और संगीतात्मक सौंदर्यजब एक साथ आते हैं, तो गीत समय की सीमाओं को पार कर अमर हो जाते हैं।

वर्तमान परिदृश्य की बात करें तो आजकजराकेवल आँखों का शृंगार नहीं रहा, वह एक उत्पाद बन गया है और हो गया है ब्रांड, पैकेज और विज्ञापन के हवाले। उसकी कालिमा में अब वह गहराई नहीं, जो कभी दृष्टि से दृष्टि तक प्रेम का संवाद रचती थी। आज के समय में कजरा केवल शृंगार का साधन नहीं, बल्कि कंटेंट बन गया है। सोशल मीडिया की चमकती स्क्रीन पर वह रील, फ़िल्टर और लाइक्स की दौड़ में शामिल है। नज़रें अब किसी एक पर टिकने के बजाय लगातार स्क्रॉल करती रहती हैं। प्रेम भीस्टेटस अपडेटऔरडिस्प्लेका विषय हो गया हैजहाँ गहराई से अधिक दृश्यता महत्त्वपूर्ण है। उपभोग संस्कृति ने संबंधों को भी उत्पाद बना दिया है; यहाँ आकर्षण की अवधि सीमित है और भावनाओं की एक्सपायरी डेट तय। ऐसे समय में मोहब्बत का वह सहज, धैर्यवान और आत्मसमर्पित रूप धीरेधीरे ओझल होता जा रहा है। प्यार-मोहब्बत के तौर-तरीके भी बदले हैंक्षणिक आकर्षण, त्वरित संतोष और सतही प्रदर्शन तक सीमित। बाज़ार ने प्रेम की चंचलता तो अपना ली, पर उसकी आत्मा छीन ली। भावनाएँ अब अनुभूति नहीं, अनुभवपैकेज हैं; शृंगार आत्माभिव्यक्ति नहीं, बल्कि प्रस्तुति बन गया है। ऐसे समय मेंकजरा मोहब्बत वालाजैसे गीत हमें स्मरण कराते हैं कि प्रेम कभी दिखावा नहीं थावह आँखों की ख़ामोशी, नज़रों की शरारत और मन की सच्चाई में बसता था। शायद इसी कारण ये गीत आज भी हमें भीतर तक छूते हैं, क्योंकि इनमें बाज़ार से पहले का मनुष्य और मोहब्बत से भरा हुआ जीवन धड़कता है। ऐसे मेंकजरा मोहब्बत वालाजैसे गीत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक सेतु हैं। वे लोकसंवेदना के माध्यम से हमें उस प्रेमपरंपरा से जोड़ते हैं, जहाँ सौंदर्य आत्मा से उपजता है और प्रेम उपभोग नहीं, साधना होता है। शायद आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत यही है, कि हम कजरे की कालिमा को फिर से आँखों में नहीं, दिल में बसाएँ - ताकि हमारी प्रेमिल दृष्टि बनी रहे।

 

नन्द किशोर महावर
कोटा (राजस्थान)
9413651856

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

Post a Comment

और नया पुराने