कौसानी की यात्रा
- सरिता
कविवर पन्त के घर -
दूर पहाड़ी पर स्थित अल्मोड़ा में कौसानी की ये वादियाँ आज न जाने मन में उमड़े किस दुःख को अपने अंदर लेने का प्रयास कर रही हैं। हिमालय की गोद में एक अजीब सी शांति और अपनापन दिखाई दे रहा है। कैमरे की दौड़ से हटकर अगर आप इस सुंदरता को देखना चाहते हैं तो, आपको निश्चय ही अकेले और बिल्कुल शांत होना पड़ेगा। अपने अंदर के शोर को सुनने और उसे समझने के लिए कई बार बहुत शांत होना पड़ता है। मैं आज सोच रही हूँ कि कई बार जीवन में अनचाही यात्रा कर लेनी चाहिए क्योंकि यह आपको इतने नवीन अनुभव देगी कि इसका अंदाजा भी नहीं होगा, इसलिए बाहर निकले और जाने की दुनिया कितनी खूबसूरत है। दूर बैठी पहाड़ियों को देखकर लग रहा है जैसे ये एकदम करीब आ गयी हों। प्रकृति के गोद में बैठना लग रहा जैसे आप खुद पंत के करीब आकर बैठे गए हो और इसका एहसास भी हुआ कि पंत क्यों प्रकृति के कवि कहे गयें होंगे। पंत के घर के सामने दूर बैठी पहाड़ियों ने जैसा आशीर्वाद दे दिया हो और कह रही हो कि आओ और समझो, इस शांत वातावरण को जानो और दुनिया को बताओ की पहाड़ और उसका जीवन कैसा होता है। कविवर पन्त के कमरे की खुली खिड़की जिसमें थोड़ा प्रकाश आ रहा था। क्या पता यही से लिखा हो पंत ने ‘प्रथम रश्मि का आना रंगणि तूने कैसे पहचाना।’ सीढ़ियों के बीच में था पंत जी का घर , नीचे उतरती सीढियाँ मेरे मन को व्याकुलता से भर रही थी। बचपन से जिस कवि को पढ़ा हो, उसे करीब से जानना वाकई रोमांच से भरा हुआ पल तो है ही। वो वादियाँ हमें ऐसा एहसास दे गई कि जिसमें हमें निरंतर ऊर्जावान होने की प्रेरणा दी। यहाँ आने के बाद पता चलेगा कि पंत को प्रकृति का सुंदर कवि
क्यों कहा गया है। इसी के दौरान हमने अनाशक्ति आश्रम की यात्रा तय की। कार्यशाला के लिए हम सभी लोग समूह में कौसानी की यात्रा तय करते हैं और इस आश्रम तक पहुँचते हैं। आश्रम का भौगालिक परिदृश्य अत्यंत मनोहारी है। हिमालय से चारों तरफ से यह आश्रम घिरा हुआ है। सुबह की पहली किरण हिमालय के बीच से होती हुई आप तक पहुँचती हैं और आपको भाव विभोर कर देती है। यहाँ सुकून काफी ज्यादा था। इस सुंदर दृश्य के साथ गांधी को समझना निश्चय ही काफी ज्ञानवर्धक लगा। कार्यशाला की शुरुआत ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ भजन से होती है जो गांधी जी के जीवन को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस कार्यशाला में सुबह की शुरुआत ऐसे होती है जो गांधी के पास और इतिहास में लाकर खड़ा कर देती है। प्रार्थना अर्थात जिसे ईश्वर को याद करने के रूप में जाना गया। रघुपति राघव राजा राम के नाम से प्रार्थना समाप्त हुई। दूर स्थित कौसानी की इन पहाड़ियों पर जाकर बापू से रूबरू होना निश्चय ही रोमांचक था। कड़कती धूप और हिमालय की गोद में बहुत ही धैर्य के साथ बापू को जानने व उनके मार्ग को अपनाने की ललक दिखाई दी। आगे जाकर इसी सफ़र में हम लक्ष्मी आश्रम की यात्रा पर निकलते हैं। लक्ष्मी आश्रम तक पहुँचने की यात्रा काफ़ी रोमाचंक और यादगार रही। यकीन मानिए यह ऐसा था कि जैसे आप नीचे किसी पहाड़ी को देख रहें हों और फिर आपको उसके अंतिम छोर तक पहुँचना हो। अनाशक्ति आश्रम से लक्ष्मी आश्रम तक पहुँचना कुछ ऐसा ही था। छोटी-छोटी सीढियां और घुमावदार रास्तें इतने कठिन थे कि लग रहा था कि अगले ही क्षण कहीं बैठकर आराम कर लिया जाए। जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे हमें नए-नए फूल और प्रकृति की अनुपम सुन्दरता दिखाई दी। शायद इसी सुन्दरता ने हमें आगे चढ़ाई करने की ताकत दी। आश्रम में पहुँचते ही हम वहाँ राधा बहन से मिले जो आश्रम की संचालिका भी थी। उन्होंने हमें कौसानी की प्रसिद्ध काढ़ानुमा चाय दी। इस यात्रा में यह भी पता चला कि दुनिया में आप जैसे भी कई लोग होते हैं बस जरूरत है कि आप दुनिया को जानने के लिए अपने पैर बाहर निकाले। इस आश्रम के आस -पास की चीज़ें भी काफी अच्छी और ज्ञानवर्धक थी। इसके पास ही एक लाइब्रेरी भी थी। आस -पास कई आकर्षक फल भी, जिसका स्वाद हम सभी ने लिया। माल्टा जिसे ज्यादातर लोग संतरे की ही प्रजाति का समझते हैं यहाँ पर इसका आकार और स्वाद एकदम अलग था। लक्ष्मी आश्रम वो जगह थी जहां कैथरीन को सरला बहन के रूप में जाना जाता है। ये आश्रम एक ऐसा आश्रम है जहां एक अलग प्रकार की शांति थी एवं हम यहाँ गांधी के विचार से रूबरू हो पाए। यहाँ छोटी बच्चियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है। इस कार्यक्रम में आश्रम के सदस्य काफ़ी उत्साहित दिखे। गांधी जी ने कहा था विकास का लक्ष्य पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इस यात्रा में यह विचार फलीभूत होता दिखाई दिया। राधा बहन जो इस आश्रम की संचालिका हैं उन्होंने बहुत ही गर्मजोशी से सभी को गांधी के विचार एवं मार्ग को समझाया। इस कार्यक्रम के दौरान आश्रम की बच्चियों ने कुछ गीत गाए जिसका महत्व बहुत अधिक है। एक गीत जिसमें कहा गया क़ि ‘अब मजहब ऐसा बनाए जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।’
क्यों कहा गया है। इसी के दौरान हमने अनाशक्ति आश्रम की यात्रा तय की। कार्यशाला के लिए हम सभी लोग समूह में कौसानी की यात्रा तय करते हैं और इस आश्रम तक पहुँचते हैं। आश्रम का भौगालिक परिदृश्य अत्यंत मनोहारी है। हिमालय से चारों तरफ से यह आश्रम घिरा हुआ है। सुबह की पहली किरण हिमालय के बीच से होती हुई आप तक पहुँचती हैं और आपको भाव विभोर कर देती है। यहाँ सुकून काफी ज्यादा था। इस सुंदर दृश्य के साथ गांधी को समझना निश्चय ही काफी ज्ञानवर्धक लगा। कार्यशाला की शुरुआत ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ भजन से होती है जो गांधी जी के जीवन को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस कार्यशाला में सुबह की शुरुआत ऐसे होती है जो गांधी के पास और इतिहास में लाकर खड़ा कर देती है। प्रार्थना अर्थात जिसे ईश्वर को याद करने के रूप में जाना गया। रघुपति राघव राजा राम के नाम से प्रार्थना समाप्त हुई। दूर स्थित कौसानी की इन पहाड़ियों पर जाकर बापू से रूबरू होना निश्चय ही रोमांचक था। कड़कती धूप और हिमालय की गोद में बहुत ही धैर्य के साथ बापू को जानने व उनके मार्ग को अपनाने की ललक दिखाई दी। आगे जाकर इसी सफ़र में हम लक्ष्मी आश्रम की यात्रा पर निकलते हैं। लक्ष्मी आश्रम तक पहुँचने की यात्रा काफ़ी रोमाचंक और यादगार रही। यकीन मानिए यह ऐसा था कि जैसे आप नीचे किसी पहाड़ी को देख रहें हों और फिर आपको उसके अंतिम छोर तक पहुँचना हो। अनाशक्ति आश्रम से लक्ष्मी आश्रम तक पहुँचना कुछ ऐसा ही था। छोटी-छोटी सीढियां और घुमावदार रास्तें इतने कठिन थे कि लग रहा था कि अगले ही क्षण कहीं बैठकर आराम कर लिया जाए। जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे हमें नए-नए फूल और प्रकृति की अनुपम सुन्दरता दिखाई दी। शायद इसी सुन्दरता ने हमें आगे चढ़ाई करने की ताकत दी। आश्रम में पहुँचते ही हम वहाँ राधा बहन से मिले जो आश्रम की संचालिका भी थी। उन्होंने हमें कौसानी की प्रसिद्ध काढ़ानुमा चाय दी। इस यात्रा में यह भी पता चला कि दुनिया में आप जैसे भी कई लोग होते हैं बस जरूरत है कि आप दुनिया को जानने के लिए अपने पैर बाहर निकाले। इस आश्रम के आस -पास की चीज़ें भी काफी अच्छी और ज्ञानवर्धक थी। इसके पास ही एक लाइब्रेरी भी थी। आस -पास कई आकर्षक फल भी, जिसका स्वाद हम सभी ने लिया। माल्टा जिसे ज्यादातर लोग संतरे की ही प्रजाति का समझते हैं यहाँ पर इसका आकार और स्वाद एकदम अलग था। लक्ष्मी आश्रम वो जगह थी जहां कैथरीन को सरला बहन के रूप में जाना जाता है। ये आश्रम एक ऐसा आश्रम है जहां एक अलग प्रकार की शांति थी एवं हम यहाँ गांधी के विचार से रूबरू हो पाए। यहाँ छोटी बच्चियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है। इस कार्यक्रम में आश्रम के सदस्य काफ़ी उत्साहित दिखे। गांधी जी ने कहा था विकास का लक्ष्य पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इस यात्रा में यह विचार फलीभूत होता दिखाई दिया। राधा बहन जो इस आश्रम की संचालिका हैं उन्होंने बहुत ही गर्मजोशी से सभी को गांधी के विचार एवं मार्ग को समझाया। इस कार्यक्रम के दौरान आश्रम की बच्चियों ने कुछ गीत गाए जिसका महत्व बहुत अधिक है। एक गीत जिसमें कहा गया क़ि ‘अब मजहब ऐसा बनाए जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।’सीमाओं को लाँघना -
बात कुछ ऐसी है कि जब आप एक किलोमीटर भी पैदल चलने की ताकत न रखते हों तो और आपने 4 किलोमीटर की पैदल यात्रा तय कर लें तो यह सीमाओं का लाँघना ही हुआ। कभी - कभी हमें अपने अंदर के बच्चे को जगाना बहुत जरूरी होता है, तभी आप वो सब कर सकते हैं जो करना चाहते हैं। कुछ यूँ कहूँ कि यात्रा कभी- कभी अपने लोगों को छोड़कर अनजाने लोगों के साथ भी करनी चाहिए। तभी आप उन रास्तों तक पहुँच सकते हैं जहाँ जाना जरूरी है। कौसानी की ऊँची पहाड़ियां और चाय बागान की तालाश हमें 4 किलोमीटर के ऐसे सफ़र पर ले गयी जहाँ का अनुभव इतना रोमांचक था कि उसे शब्दों में बयां करना शायद मुश्किल ही है। फ़िर भी उसके कुछ क्षण मैं जरूर याद करना चाहूँगी। तो हम लोग पैदल ही रास्ता ढूँढने निकले। कुल 11 लोगों का समूह और लगभग हिन्दी साहित्य के शोधार्थी और दो बाकी बचे वकालत की पढ़ाई करने वाले। दो लोग आगे मार्गदर्शन करने वाले बाकि सभी को तारों, झाड़ियों से बचाकर रास्ता पार कराने वाले। ऐसी ही शुरू हुआ ये लंबा सफ़र। संकरे रास्तो पर चलते हुए आपको अपने जीवन से प्यार का एहसास होगा। अनजाने लोग भी कब अपने हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। आप कब उन्हें अपना मान कर उनपर विश्वास करने लगते हैं और फिर वो बन जाते हैं राह के साथी। ये राह इतनी आसान न थी। जाते हुए तो फिर भी रास्ते का पता नहीं चला किन्तु वापसी के समय, जो पहाड़ दिन में सुंदर और मनमोहक लग रहे थे वही रात में मानों डरावने लग रहे थे। ऊँची पहाड़ियों पर चढ़ना और रात का धीरे-धीरे बढ़ना। रास्ते का भी कुछ पता नहीं चल रहा था बस हम चार लोग आगे बढ़े जा रहे थे। इसी बीच मुझे एहसास हुआ कि यात्रा से भला आप क्या सीखते हैं तो मन में झट से उत्तर आया शायद विश्वास करना और सीखना कि क्यों यात्रा करनी चाहिए। रास्ते में दूर पहाड़ी जहाँ लग रहा था कि यहाँ कोई कैसे रह सकता है वहाँ भी जीवन था। दूर - दूर पहाड़ी पर एक दो घर स्थित थे। आगे की मंजिल तय करने में इन इन लोगों ने हमारी काफी मदद की। किसी ने आगे का रास्ता बताया तो किसी ने पानी आदि पिलाकर पहाड़ी जीवन की जिंदादिली का परिचय दिया। पहाड़ पर जीवन जितना कठिन है वहाँ रहने वाले लोग उतने ही सरल हैं। ट्रैकिंग से इसका भी पता चला।एक ही तरह का जीवन व्यतीत करके कई बार हम उससे ऊब और उसमें उलझ जाते हैं। सालों-साल ऐसा जीवन जीते -जीते हमें यह पता ही नहीं चलता कि आखिर हम क्या खो दे रहे हैं। ऐसे में अगर हम अपनी उम्र से कम लोगों के साथ घुमक्कड़ी करें तो हमें इस बात का एहसास होगा कि हमने क्या खोया। जीवन को जीने का एक नई उम्मीद और ललक दिखाई देगी।
इसके आगे हम कैंची धाम पहुँचे जो नीम करौली बाबा के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोगों से इस मन्दिर की प्रसिद्धि का कारण पूछने पर पता चला कि नीम करौली बाबा हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त थे और उन्हीं के नाम पर ये मन्दिर है। एक दुकानदार से बातचीत की तो उन्होंने कहा कि जो भटक जाते हैं बाबा उन्हें रास्ता दिखाते हैं। यह सब जान लेने के बाद हम लोग वहाँ थोड़ी देर बैठे किन्तु आगे का रास्ता तय करने में दर्शन करना ही भूल गए। प्रसिद्ध क्रिकेटर विराट कोहली और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा के यहाँ आने के बाद कैंची धाम में अक्सर भीड़ रहने लगी थी। उस दिन भी यही मंजर था। खैर हमें भी रास्ता मिला और वह रास्ता था नैनीताल का। नैनीताल आज मैं पहली बार देखने वाली थी। बचपन से मन में था कि एक दिन नैनीताल और मसूरी जरूर जाऊँगी और आज अचानक वो संभव हुआ। कई बार आप जिस चीज के बारे में ज्यादा सोच लेते हैं तो सामने आने पर उसका भ्रम भी टूट जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ नैनीताल को सामने से देखने और उसका अनुभव करने में। नैनीताल बाजारवाद का केंद्र बन चुका है। हर तरफ बस सामान ही सामान दिख रहे थे। नैनीताल की सुंदर वादियाँ इन सभी से घिर गई हैं। आप अगर अपने चारों तरफ नज़र घुमा कर देखेंगे तो पहाड़ियों के अलावा जो कुछ दिखेगा वो हैं दुकानें। किसी सुंदर प्राकृतिक स्थल पर दुकानों का बढ़ता अतिक्रमण निश्चय ही सोचनीय विषय है।
कौसानी में स्थित वैद्दनाथ मंदिर -
यह मंदिर कौसानी का प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर के बारे में यह प्रसिद्ध है कि यहाँ शिव -पार्वती ने विवाह के बाद पहली रात व्यतीत की। इस मंदिर की कई खास विशेषताएं हैं – यह मंदिर प्राचीन कलाओं से युक्त है। शिव और पार्वती की प्रतिमा की सुन्दरता देखने योग्य है। यहाँ कोई विशेष कर्मकांड नहीं था और एक अलग प्रकार की शांति दिखाई देती है। इस मंदिर के सामने एक नदी है जिसमें कई बड़ी -बड़ी मछलियाँ थी। इस प्रकार का पूरा वातावरण शान्ति और मौन प्रदान करता है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए आपको एक कठिन रास्ता तय करना होगा। इस रास्ते के बीच में एक सुदंर झील एवं पुल था जिसके नीचे एक सुन्दर नदी बह रही थी जो काफी आकर्षक और मनमोहक थी। यह मंदिर एक तरह से प्राचीन भारतीय सभ्यता का प्रतीक है जहाँ भक्ति का पर्याय कर्मकांड नहीं बल्कि ध्यान और योग था।
यह सभी यात्राएं मेरे लिए नवीन अनुभव का केंद्र बनी। अपने दैनिक जीवन में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि वास्तव में जीवन दर्शन क्या है। यात्राएँ आपको अपने से मिलाती हैं और यह सिखाती भी हैं कि जीवन को कैसे जीना है। अगर आप यात्रा नहीं करेंगे तो आप नहीं जान सकते कि दुनिया में कितने तरह के रंग हैं। प्रसिद्ध घुमक्कड़ और साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन भी यही कहा करते थे कि ‘दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु घुमक्कड़ी है’। इसलिए तमाम बंधन को त्याग कर दुनिया को जानने के लिए निकल जाइए। इस यात्रा संस्मरण को लिखने के लिए जिन लेखिकाओं से मुझे प्रेरणा मिली उनका दिल से धन्यवाद रहेगा। सच कहूँ तो एक बात तो जरूर है किताबें आपको वो सब दे सकती हैं जिसे धन से नहीं ख़रीदा जा सकता। यात्रा जीवन को एक उद्देश्य भी प्रदान करती है। नीरस जीवन में एक आनन्द की एक अनुभूति भी है। एक ऐसा आनन्द जो आपको जीवन काटने के लिए नहीं, जीने के लिए प्रेरित करता है।
सरिता
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी -221005



यह बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण है। इसे पढ़ते हुए मुझे सचमुच ऐसा लगा जैसे मैं फिर से कौशानी में हूँ। सरिता दीदी, आपने बहुत ही सुंदर लिखा है! और हाँ, मैं आशीष राय हूँ, वही कानून का छात्र जो सरिता दीदी के साथ गया था।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद आशीष आपका।
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