लै भागली बीड़ी पी!
- हेमंत कुमार
वह किस गाँव थी यह तो मुझे आज भी नहीं मालूम। लेकिन मेरा गाँव पूरा-पूरा न सही पर आधा-पड़दा उसका भी था। मीरण ही क्या घाणा, बाजडोली, सिगडोला, गाड़ोदा, पाटोदा समेत आस-पास की ढ़ाणियों सहित दसियों गाँव-बस्ती उसके आधे-आधे गाँव थे। ये सारे गाँव उसके मन मिलते मायके थे। औरतें तो उसकी अंतरंग सखियाँ थीं ही, मोट्यारों से भी उसकी बेरोक-टोक बोल-बतलावण थी। पोळी-चूँतरे पर बैठे, बड़गट्टे पर चरभर खेलते बडेरों से वह राम-रुमी करती- बाबा राम-राम! जवाब आता - 'रमराम बाई रमराम!', जवानों को भाया कहकर बतलाती- और भाया कियाँ? जवाब मिलता-ठीक है। 'कियाँ' मतलब 'हाउ आर यू' तो 'ठीक है' मतलब 'ऑल इज वेल! टाबरों से हँसी-ठिठोली करती वह आती तो जैसे गाँव में नई रौनक का पगफेरा होता। पंद्रह-बीस दिनों का आंतरा देकर वह गाँव का एक गेड़ा (चक्कर) कर जाती। यदि ज्यादा दिन गुजर जाते तो पूरी बस्ती को जैसे उसकी उँसेर (याद/मिलने-देखने की चाह) आने लगती। नीम-खेजड़ी, बड़- पीपल को जैसे चीड़ी-कागलों की उडीक होती है वैसे ओढ़नों, घूमटों और घाघरों में लिपटा आधा गाँव उसे उडीकता।
माथे पर मार्केट धरे उस ओपरी (पराई/अजनबी) औरत का नख-शिख वर्णन कर सके ऐसा कवि आज तब बेमाता बना ही नहीं पायी। मैं तो क्या ही वर्णन करूँ! क्योंकि न मैं कवि , न प्रेमी। बिना प्रेम व कविता के देह का हाड़- माँस और चमड़ी दिख सकती है रूप नहीं। गर कोशिश भी करूँ तो उस कल्डी (कठोर) काया और कँवळे (कोमल) काळजे की धिराणी को समझ सकूँ इसके लिए मैं उन दिनों था ही कोडेक (कितना-सा)! ' समुझ परी नहीं बालपन तब अति रहेउ अचेत।'
इस ढाणी से उस ढाणी को नापते आँटणदार पैरों में बाकी औरतों की तरह खुली एड़ीवाली जड़ाऊ जूतियों की बजाय चलते बखत चल्डचूँ- चल्डचूँ करके सूनी राहों का एकांत तोड़ती मर्दाना मेल की चमड़े की काली जूतियाँ। साँवली पिंडलियों तले टखणों पर टणमण करते मोटे-मोटे चाँदी के कडूले। घेरदार घाघरा, कमर की तागड़ी से बँधी दो-तीन कूँचियाँ (चाबियाँ) जो उसके गृहस्वामिने होने की घोषणा करतीं। भरे-भरे हाथों में दो-दो पीतल की चूड़ियाँ। चूड़ियों के नीचे साँवली चमड़ी में गहरे हरे रंग से लिखा अभिलेख जो बरसों तक गाँव की अनपढ़ औरतों के लिए सिंधुघाटी की लिपि की तरह अबूझ रहा। पर बरसों बाद जब गाँव में हम जैसे परिश्रमी, मातृ-पल्लू चिपकू लिपि विशेषज्ञ पैदा हुए जिन्होंने बारहखड़ी के बाद किताब बाँचना शुरू ही किया था और हर लिखी चीज को पढ़ना जिनका अनिवार्य नियम था। हम चूने और पीली मिट्टी से पुते पंचायत भवन पर लिखा पढ़ते 'पचायत भवन'। दुकान के आगे लकड़ी के पाटिए पर पड़े अखबार का नाम बाँचते - र.. रा..राजस..था..न … प..त..रिका -राजसथान पतरिका। उन दिनों हमारा राष्ट्रीय इंडोर गेम होता था घर के किसी कोने में धरी किसी भी चीज पर लिखा कुछ भी नाम पूछना। मसलन चारपाई के नीचे तिल भरकर रखे डिब्बे पर लिखा डालडा वनस्पती घी, चाकी के पास सूखे कैर- काचरी भर कर रखे डिब्बे पर लिखा 'इंडाना शुद्ध गाय का घी'। बुहारा निकालकर इकट्ठे किए कूड़े में पड़े खाली पत्ती के पैकिट पर लिखा टोपाज स्टेलनेस ब्लेड , ब्याह-सावे के बखत दीवार पर लिखा सीरी गणेसाय नमह, सुभ-विवाह आदि तो पिसाई के पीपे पर लिखा परस राम जी वगैरह। इसी खेल के दौरान हम भाई बहनों में से न जाने किसने एक दिन खुले , गोबर लिपे आँगन में पूछा, ' बताओ 'भागी' कहाँ लिखा है? हमने इधर-उधर नजर दौड़ाई । डोळी-डाँकला, डब्बे-सब्बे, कागज का किरच्या सब ढूँढ़ा। अलबत तो कुछ दिखा ही नहीं, जो दिखा, उसमें 'भागी' कहीं नज़र नहीं आया। जब हमने सवाल आउट ऑफ सिलेबस होने का आरोप लगाया तो प्रश्नकर्ता ने जीभ पर बाप की सोगन (सौगंध) रखकर सच बोलने का प्रमाण दिया - 'बाप की जे'। तब हमने हार मानी और प्रश्नकर्ता से 'आंसर की' जारी करने का अनुरोध किया तो जवाब मिला - सामने हाथ पर देखो।' सबके हाथों के अवलोकन के बाद जब नजर उस हाथ पर गई जिसकी हथेली पर बाजरे के खाटे (कढ़ी) में चूरी हुई रोटी से भरा कटोरा रखा था। तब साँवले हाथ के श्यामपट्ट पर नीली नसों के जाल को बचाते हुए गोदने के हरे रंग से उकेरा नाम दिखाई दिया - भागी! पीठ पीछे इस अभिलेख की व्याख्या की गई। एक अनपढ़ पर आयु में सबसे बड़े पशुपालक (ग्वाले) विद्वान ने अनुमान भिड़ाया 'भागी' मतलब यह किसी के साथ भाग गई थी। बिरादरी के लोग पकड़ लाए और हाथ पर इतिहास लिख दिया 'भागी'। अर्थात् वह लड़की जो परिवार का नाक कटाकर भाग गई थी। दूसरे विद्वानों को यह मत मान्य न हुआ-' गर भागी हुई होती तो इससे ब्याह कौन करता'! दूसरे विद्वान ने कहा कि भागी इसके मोट्यार (आदमी) का नाम है। जैसे आटा चक्की पर रखे पीसणे की पहचान के लिए पीपे पर घर के मालिक का नाम मांड दिया जैसे गुलाब जी! इसका मतलब बाजरे और आटे समेत पीपे के मालिक गुलाब जी हैं। वैसे ही ओढणी-घाघरे समेत इस लुगाई के मालिक कोई भागुराम या भागीरथ नाम के सज्जन हैं। दूसरे विद्वानों ने उसके खास वेश, लोचदार आवाज़, चल्डचूँ करती मर्दानी जूतियों के रहते पीसणे की तरह इसके दूसरी औरतों में रळमिल कर जाने की संभावना को खारिज़ कर दिया। तीसरा मत एक ऐसे विद्वान का था जो छठी क्लास में पहली बार फैल, दूसरी बार सप्लीमेंट्री फैल और तीसरी बार कप्लीमेंट्री से पास हुआ था और जिसे तीसरी बार के रिजल्ट वाले दिन एक नई चीज यह पता चली थी कि ब्रह्माण्ड में नौ ग्रहों के अलावा 'सानुग्रह' नाम का दसवाँ ग्रह भी खोज लिया गया है। यदि उसने नोबेल पुरस्कार का नाम सुना होता या उससे कोई पूछता तो इस नए ग्रह के खोजकर्ता के नाम की सिफारिश करता। इसी दसवें ग्रह ने आखिरी वक्त में उसकी कुंडली में बैठकर उसे छठी से सातवीं कक्षा में दखेल दिया था। इतनी डिग्रियों के बाद भी जो दुर्भाग्यवश पशुचारक पद पर परमानेंट पोस्टिंग से इस आधार पर वंचित पर दिया गया था कि बारा'क महीना (साल भर) और देखो। तो उस विद्वान ने अपना मत दिया- भागी मतलब भाग्यशाली! जिस समाज में लड़कियों के नाम 'धापली', 'आचुकी', 'औरमता', 'अणची' रखे जाते हों वहाँ कोई अपनी लड़की का नाम 'भागी' क्यों रखेगा। ऐसा वामपंथी तर्क उस जमाने और उम्र के हिसाब से हम जैसे विद्वानों के मोटे पर छोटे माथे में नहीं आया। इसके विपरीत भागोती, भागीरथी, भागली नामधारी कई जीते-जागते दक्षिण पंथी प्रमाण मौजूद थे।
भागी गिंवारनी थी। जो शहर से सामान खरीद कर गाँव-गाँव बेचती थी। जब बस से उतरती तो कंडक्टर बाँस की छबड़ी में सफेद पछेवड़े में लिपटा वह मिनी मार्केट उसके सिर पर रखी इंडुणी पर रख देता। जिस घर यह बाँस का चोल्या उतरता उस घर में बहार आ जाती। बुजुर्ग औरतें उससे टिग्गस (केश सज्जा) का सामान खरीदतीं, काँच -कांगस्या और डोरी। जुएँ निकालने की बारीक कंघी भी। ओढने और काँचळी में डालने का गोटा, कुर्ती-काँचळी और लहँगे में काढ़ने की बारीक मंगजी,पीळे-पोमचे व चूनड़ी में जड़ने की बूटियाँ , सिलाई करनेवालियों के लिए बुकरम, महीं (महीन)- मोटी सुई, धागा लिपटा भूण्या, गुदड़ी सीने के डोरे, तगड़ी-ताबीज बाँधने की काळी डोरी, गले में पातड़ी पिरोने की सुनहली चमकीली डोरी, दूधपीते बच्चों के निजरिये में पिरोने की काली-धोळी चीड़ आदि न जाने कितना अटरम-शटरम सामान उसकी पोटली में भरा रहता। उस पोटली का खुलना किसी जादुई पिटारी का खुलना था। आस-पड़ौस की बडेरण औरतें, बहुएँ, बेटियाँ, लड़ने उस जादू से खिंचे चले आते। वह एक-एक चीज बड़े सलीके से दिखाती। बूढ़ी माँजियों, काकी-ताइयों, देवराणी- जिठानियों की जरूरतों को पहचान कर उन्हें सामान बेचती। किसी के गले में काली से भूरी पड़ चुकी डोरी को देखकर रेशमी काली डोरी निकालती। किसी की घिसे पोत और उधड़े गोटेवाली लूगड़ी देखकर लाल गत्ते पर लिपटा गोटा निकालती। काँचळी के बाजुओं के लिए चोड़ा चाँदी सा चमकता गोटा निकालती। गाँव भर की महिलाओं की भोर से साँझ तक की सदियों से इकसार चली आती जिंदगी में पसरी एकरसता को तोड़ने में उसका खासा योगदान था। घर में कपड़े-लत्ते, राशन-पाँणी जैसे कमोबेश सारी खरीद जिसका वास्ता शहर से होता उसकी खरीद पुरुष करते थे। इसलिए गाँव में जब लूण (नमक), लालमिर्च या माँटी के बर्तन बेचने वाली गाड़ी आती तो महिलाओं में मन में त्योहार आने की सी उत्सुकता भरी खुशी भर उठती। खुद स्त्री होने से गिंवारनी गाँव की तीज-गणगौर थी। भागी मार्केटिंग के दोनों पक्षों खरीदने और बेचने में समान रूप से कुशल थी। बनिये से माल खरीदते वक्त गाँव की ग्राहकी का हवाला देकर उधार माल खरीद लाती। जब उसके पास पैसों की बापरत होती तो चुका आती। उधारी माल मिलना इस बात का भी सबूत था कि भागी ने पैसा ही नहीं शाख भी कमाई थी। ज्यादातर माल उसका नकद ही बिकता। कमर पर बँधी कूँची से पेटी का ताला खोलकर नए बेश-बागों (पोशाकों) के बीच छुपाकर रखा कोई नया अटाण नोट या चाय-चीनी के डिब्बे में रखा पुराना नोट या पगाँलागती (पैरी छूती) बहू को 'बूढ सुहागण-भागण' का आशीर्वाद देकर अर्जित और लूगड़ी के पल्लू से बँधकर टूक्की के अंदर दुबका तुड़ा-मुड़ा सास के झुर्रियों भरे चेहरे की ही तरह सलवटों भरा रुपिये-दो रुपिये के अकूत खजाने से भागी को भुगतान किया जाता। कुछ भी व्यवस्था न होने पर और चीज-बस्त की ज्यादा जरूरत होने पर भागी उधार में सामान दे जाती और महीने-बीस दिन बाद जब आती तो रुपया ले लेती। यह सारा हिसाब-किताब दिमाग की बही में अजीब अनाण-सनाण (पहचान चिह्नों) के साथ दर्ज होता। मसलन जिस दिन घर में पापड़ बनाए जा रहे थे या मझली लड़की जब मायके आई हुई थी और जो लाल लहँगा और हरा कब्जा (ब्लाउज) पहन कर दहलीज पर खड़ी थी, उस दिन तुमने दो मीटर काली डोरी उधार ली थी। यह सब खरीददार के इनकार करने की वजह से नहीं बल्कि यादाश्त को पुख्ता करने के मकसद से बताया जाता था।
भागी सिर्फ सौदागर भर न थी। वह गाँव में आधुनिकता और फैशन की अग्रदूत भी थी। गाँव में नई चाल की चीजें भागी के चोल्या चढ़कर ही गाँव की जवान बहु-बेटियों के सिर चढ़ती थीं। खेत खड़े हरियल बाजरे के कूँ-कूँ लिपटे लचकते सीटे की तरह लाज से लुळती नव किशोर युवतियाँ जिनकी या तो सगाई-पताई हो चुकी होती या होनेवाली होती। जो किसी अपने 'होनेवाले' के खयाल में मन ही मन बया का घोंसला बुन रही होती या जिनका ब्याह मांड दिया जाता या जो ब्यावली बीनणी होतीं वे इस आधुनिकता की बयार के संग-संग डोलतीं। करीम- पोडर, होठाँलाली, नू-रचणी (नैल पोलिश), रंग-बिरंगे फित्ते, चोटी में गूँथने का झब्बा, गिलट की पाजेब, मच्छी (बिछुए)- मूनड़ी (अंगूठी) आदि की खरीदार ऐसी ही युवतियाँ होतीं। वृद्धाओं को यह फैशन बिल्कुल न भाता, प्रौढाएँ नानुकर के साथ स्वीकारतीं, युवतियाँ हाथोंहाथ लेतीं। लाख की चूड़ियों की जगह काँच की रंगबिरंगी चूड़ियाँ का आगमन भी भागी की मार्फत ही हुआ था, जिसे पहले कुमारियों ने अपनाया फिर ब्याहताएँ भी अपनाने लगी।
गाँव की लुगाइयों ने भागी का यह तर्क सौ फीसदी सही मान लिया गया था कि मोट्यार मोल-भाव करना क्या जाने? कपड़े-लत्ते के मामले में तो वे तो 'ठगीज' कर ही आते हैं। तिस पर वे समय के चलन से भी अनजाने होते हैं। सो भागी ने धीरे-धीरे कुछेक कपड़े बेचने भी शुरू कर दिए। कामचलाऊ लेनदेन के कपड़े तो औरतें प्रायः उसी से लेने लगी थी। 'वायल' और 'उल्ली' की साड़ियाँ, पोलिस्टर के पेटीकोट, पोपलीन के ब्लाउज, घुंडी की जगह हुक और चटबटण वाले ब्लाउज, एलास्टिक वाले अंतःवस्त्र गाँव में इन सबकी पुरस्कर्ता भागी ही थी।
भागी भागी-भागी आती और भागी-भागी ही चली जाती। कहीं इत्मिनान से टाँग टेकने का ओसाण उसे न था। हाँ, रोटी-पाणी और कलेवा की उसे कमी न थी। आळस भगाने के लिए वह टूकी में बीड़ी का बंडल दाबे रखती। जब तलब उठती और वह झट बीड़ी काढ़कर सिलगा लेती। गाँव में औरतें नशा न करती थीं। चिलम-बीड़ी, तमाखू, जर्दा सब मर्दों के सगल थे। औरतें को तो घर के खटराग से फुर्सत न थी। उन्हें नशा था तो थोड़ाभौत बोल-बतलावण का, हथाई का ,चुगली-चाळे का। वे अपनी थकन इसी से दूर करतीं। पर 'भागी' चूँकि अपने घर का इकलौता मर्द थी तो उसे बीड़ी का नशा करना सोहता था। हर दिन कोसों चलने के बाद जब उसके पाँव तल्डाने। थकान जिस्म के रोम-रोम में तारी होने लगती और घर जाकर रोटी सेकना उसकी अनिवार्य मजबूरी होती। ऐसे में उसने शुरू-शुरू में चोरी-छिपे अपने मर्द के कुर्ते की जेब से बीड़ी निकाल कर पी। एक दिन जब वह बुखार में तपती अपना जी लिए (जान संभाले) आँखें बंद किए पड़ी थी, हाड़-गोड़े टूट रहे थे। उठने की हिम्मत न थी। तब उसके मर्द ने जुड़वाँ बीड़ी सिलगा कर कहा था - "लै भागली बीड़ी पी!" तब से वह बीड़ी पी रही है। आज जब मोट्यार मरे बरसों बीत गए। काचर-पीचर (बाल-बच्चे) होशियार हो गई है। लेकिन यह बीड़ी न छूटी।
भागली कितने बरस जिंदा रही। कब तक गाँव में आती रही, इसका इतिहास तो इतिहास को भी नहीं मालूम। उसके माथे चढ़ा मार्केट इतना फैल गया, इतना फैल गया कि दुनिया के अव्वल दर्जे के देश गिंवारनी बने तीसरी दुनिया के देशों में घूम रहे हैं। वह मार्केट सिमट कर पास इतना आ गया कि हर एक की जेब में रखे उपकरण के एक क्लिक पर घर के दरवाजे पर हाजिर है। पर कहीं इसने बड़े जतन से संभाल कर कमर से बाँधी गई उस कुँजी को तो नहीं हथिया लिया है, जिसके ताले की अढकण में हमारी दादी-नानियों ने जीवन की जमा-पूँजी, जीवन का समूचा राग किसी पुराने बक्से में नए बेस तले दबा रखा था।
हेमंत कुमार
सहायक आचार्य (हिंदी), श्री कल्याण राजकीय कन्या महाविद्यालय, सीकर
9414483959, hemantk058@gmail.com
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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