शोध आलेख : मोहन राकेश : मंच से मन तक की यात्रा / रवि गर्ग

मोहन राकेश : मंच से मन तक की यात्रा
- रवि गर्ग

शोध सार : मोहन राकेश का जन्मशताब्दी वर्ष उनके नाट्य-साहित्य को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने अपने नाटकों में व्यक्ति के भीतर चलने वाले संघर्षों, संबंधों की जटिलताओं और जीवन के अर्थ की खोज को गहराई से प्रस्तुत किया। उनके नाटकों में संवाद और मौन, दोनों ही समान रूप से प्रभावशाली हैं। ये तत्व मनुष्य के भीतर की पीड़ा और आत्मसंघर्ष को प्रकट करते हैं। “आषाढ़ का एक दिन”, “लहरों के राजहंस” और “आधे अधूरे” — जैसे नाटकों में प्रेम, कर्तव्य और अस्तित्वगत द्वंद्व के सजीव अनुभव अभिव्यक्त हुए हैं। राकेश ने समाज और व्यक्ति के बीच की दूरी को कम करने का संवेदनशील प्रयास किया। उनके लेखन ने हिंदी नाटक को विचार और अनुभव की नई दिशा दी। इस कारण उनका नाट्य-साहित्य मंच की सीमाओं से आगे बढ़कर मनुष्य के अंतर्मन की अभिव्यक्ति बन गया। इसीलिए उनकी रचनाएँ आज भी समान प्रासंगिकता और प्रभाव के साथ जीवित हैं।

बीज शब्द : मोहन राकेश, जन्मशताब्दी, हिंदी नाटक, समकालीन संदर्भ, संवाद, संवेदना, आधुनिक चेतना, नाट्य दृष्टि, हिंदी रंगमंच, नाटकीय यथार्थ, वैचारिक प्रासंगिकता।

मूल आलेख : हिंदी साहित्य का आधुनिक काल अनेक रचनात्मक प्रयोगों, वैचारिक संघर्षों और नवाचारों का युग रहा है। इस काल में साहित्य ने केवल सामाजिक यथार्थ का ही प्रतिबिंब नहीं दिया, साथ में मानवीय चेतना के नए आयामों की खोज भी की।1 नाटक ने इस दौर में जीवन की जटिलताओं और व्यक्ति की आंतरिक स्थितियों को गहराई से अभिव्यक्त किया। हिंदी नाट्य-साहित्य के विकास में यह वह चरण था जब नाटक मनोरंजन की सीमाओं से बाहर निकलकर विचार, संवेदना और यथार्थ का सशक्त माध्यम बना। इस प्रवृत्ति ने रंगमंच को समाज और व्यक्ति के बीच संवाद का रूप प्रदान किया। नाटक अब जीवन के विविध अनुभवों का साक्षी बन गया। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर हिंदी नाट्य-साहित्य को आधुनिक चेतना और सामाजिक प्रासंगिकता की नई दिशा दी।

इसी परिवर्तित साहित्यिक परिदृश्य में एक नई चेतना का उदय हुआ, जिसने नाटक को युग की मनोवृत्ति से जोड़ दिया। इस चेतना के केंद्र में मनुष्य था — उसका संघर्ष, उसकी आकांक्षाएँ और उसका अस्तित्व। हिंदी नाटक का यह स्वरूप केवल सामाजिक प्रश्नों का प्रतिबिंब नहीं रहा। क्योंकि यह आत्म-अवलोकन का साधन बन गया। इस प्रवृत्ति ने नाटक को जीवन की गहराइयों और मानवीय अनुभवों से जोड़ा। आधुनिक हिंदी नाटक की यही पहचान बनी, जिसने व्यक्ति, समाज और जीवन के संबंधों को नए दृष्टिकोण से समझने का मार्ग खोला।2 प्रस्तुत शोध आलेख इसी संदर्भ में मोहन राकेश के नाट्य साहित्य को केंद्र में रखकर उनके रचनात्मक अवदान और उसकी समकालीन प्रासंगिकता का विश्लेषण करने का प्रयास करता है।

मोहन राकेश का जीवन और साहित्यिक परिचय -

मोहन राकेश हिंदी साहित्य के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपने जीवनानुभवों को लेखन की संवेदना में रूपांतरित किया। उनका जन्म 8 जनवरी 1925 को ‘लाहौर' में हुआ, जहाँ से उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। वे मूलतः एक ‘सिंधी परिवार’ से संबंधित थे, किंतु उनका जीवन भारतीय समाज की विविध सांस्कृतिक परतों से गहराई से जुड़ा रहा। पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी और अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने अध्यापन और संपादन को अपनी आजीविका बनाया। कुछ समय तक वे प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सारिका’ के संपादक रहे, जहाँ से उन्होंने ‘नई कहानी आंदोलन’ को सशक्त दिशा प्रदान की।3 उनकी कहानियाँ मानवीय संबंधों की जटिलताओं और जीवन के सूक्ष्म यथार्थ को अत्यंत सरल, किंतु गहन भाषा में अभिव्यक्त करती हैं।

इसी जीवन-यात्रा की निरंतरता में मोहन राकेश का रचनात्मक विकास नाटक के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों तक पहुँचा। कहानी से नाटक की ओर उनका रुझान मात्र विधा-परिवर्तन नहीं था। क्योंकि उन्हें जीवन के गहन अनुभवों को मंच पर साकार करने की आकांक्षा थी। उन्होंने ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ और ‘आधे अधूरे’ — जैसे नाटकों के माध्यम से व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष, भावनात्मक विखंडन और सामाजिक द्वंद्व को सजीव रूप दिया। उनके नाटकों में संवाद के साथ मौन भी उतना ही प्रभावशाली है, जो पात्रों की मानसिक उलझनों को उजागर करता है। यह उनकी साहित्यिक परिपक्वता, संवेदनशील दृष्टि और नाट्य-दृष्टिकोण की गहराई का परिचायक है। इसी संवेदनशील दृष्टि ने उनके आगे के नाट्य चिंतन की सुदृढ़ नींव रखी, जो आगे “राकेश की नाट्य दृष्टि और आधुनिक चेतना” में विस्तार पाती है।

राकेश की नाट्य दृष्टि और आधुनिक चेतना -

मोहन राकेश की नाट्य दृष्टि उस युग के व्यक्ति की गहन बेचैनी और आत्मसंघर्ष को अभिव्यक्त करती है। यह वह समय था जब जीवन के मूल्य और अर्थ निरंतर परिवर्तित हो रहे थे। राकेश ने नाटक को केवल समाज के दर्पण के रूप में न देखकर उसे मानव-मन की भीतरी जटिलताओं को समझने का माध्यम बनाया। उनके नाटकों में मनुष्य की संवेदना, द्वंद्व और निर्णय की पीड़ा स्पष्ट रूप से उभरती है।4 उदाहरण के लिए, “आषाढ़ का एक दिन” नामक नाटक में कालिदास का कथन —'मैंने जिसे पाया, वह मुझे बाँध गया और जिसे छोड़ आया, वह मुझे बुला रहा है'5 इस आंतरिक संघर्ष का प्रतीक बनता है। मल्लिका और कालिदास का संवाद नाटक को भावनात्मक गहराई प्रदान करता है। यहाँ प्रेम और कर्तव्य के मध्य की दूरी आधुनिक चेतना का रूप लेती है। राकेश का दृष्टिकोण व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी, स्वतंत्र चयन और अस्तित्व के अर्थ से परिचित कराता है।

इसी जीवन-दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए मोहन राकेश ने अपने नाटकों में विचार और शिल्प, दोनों में नवीनता का समावेश किया। उनकी आधुनिक चेतना जीवन की घटनाओं की प्रस्तुति के साथ-साथ उन्हें समझने की दृष्टि में भी परिलक्षित होती है। “लहरों के राजहंस” में नंद का यह प्रश्न — 'शांति अगर त्याग में है, तो वह मनुष्य के भीतर क्यों नहीं ठहरती?'6 उनके नाट्य चिंतन की मूल संवेदना को अभिव्यक्त करता है। इस नाटक में सांसारिक आकर्षण और आत्मिक मुक्ति के बीच का द्वंद्व गहराई से उभरता है। आधुनिक व्यक्ति की अंतःस्थिति इसी संघर्ष से निर्मित होती है। कालिदास की भाँति नंद भी अपने भीतर के प्रश्नों से लगातार जूझता है। राकेश के लिए आधुनिकता केवल परिवर्तन नहीं है। क्योंकि वह प्रश्न करने का नैतिक साहस है। उनके पात्र इसी साहस के प्रतीक हैं, जो अपने निर्णयों की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करते हैं।

इन्हीं विचारों की निरंतरता में मोहन राकेश ने अपने नाटक “आधे अधूरे” में आधुनिक मनुष्य की असंतुष्टि को घरेलू परिवेश के माध्यम से अभिव्यक्त किया। सावित्री का यह कहना कि —

“घर में हर आदमी अधूरा है,
कोई किसी को पूरा नहीं कर सकता।"7

आधुनिक जीवन की भावनात्मक रिक्तता का सार प्रस्तुत करता है। यह संवाद केवल एक स्त्री की व्यथा होने की बजाय उस समय के हर व्यक्ति की अधूरी आकांक्षाओं की प्रतिध्वनि है। राकेश यहाँ मानवीय संबंधों की जटिलता और उनके विघटन को सूक्ष्म संवेदना के साथ चित्रित करते हैं। उनके पात्र भीतर की टूटन को शब्दों की बजाय मौन से व्यक्त करते हैं।8 दर्शक उस मौन में छिपी पीड़ा को गहराई से अनुभव करता है। यही दृष्टि आगे चलकर राकेश के नाटकों के मनोवैज्ञानिक यथार्थ और पात्रों की संवेदनात्मक गहराई को समझने की आधारभूमि बनती है।

मनोवैज्ञानिक यथार्थ और पात्रों की संवेदना - 

मोहन राकेश के नाटकों में मनोवैज्ञानिक यथार्थ व्यक्ति के भीतर चलने वाले संघर्षों से निर्मित होता है। उन्होंने अपने पात्रों को बाहरी परिस्थितियों की बजाय उनके आंतरिक द्वंद्वों से समझने का प्रयास किया। “आधे अधूरे” में सावित्री का कहना कि —

“घर में कोई भी अपनी जिम्मेदारियों को महसूस नहीं करता हैं।
अशोक अखबार की कतरनों में उलझा रहता है
और बिन्नी को कोई होश नहीं ... मत कहिए मुझे महेंद्रनाथ की पत्नी।”9

आधुनिक व्यक्ति की आत्मिक शून्यता का सटीक चित्र प्रस्तुत करता है। यह नाटक केवल एक परिवार की कथा होने के साथ-साथ मानव-मन में बसे असंतोष और अधूरेपन की व्याख्या है। राकेश की यही दृष्टि उनकी कहानी “आदमी और दीवार” में भी दृष्टिगोचर होती है। यहाँ नायक अपने चारों उलझने की बजाय अपने भीतर खड़ी दीवारों से टकराता है। इस प्रकार राकेश आधुनिक मनुष्य के मानसिक यथार्थ को उसके अनुभवों, संघर्षों और आत्ममंथन के माध्यम से उद्घाटित करते हैं।10

इसी मनोवैज्ञानिक गहराई को मोहन राकेश ने अपने नाटक “पैर तले की ज़मीन” में और विस्तार दिया। अय्यूब और सलमा के संबंधों में आधुनिक वैवाहिक जीवन की जड़ता और पारस्परिक अविश्वास स्पष्ट रूप से उभरता है।11 अय्यूब का कथन —

“मेरी बीवी की ज़िंदगी में और कोई नहीं है,
पर मेरे लिए वह एक कब्रिस्तान बन गई है।”12

आत्मिक थकान और भावनात्मक एकांत का गहन प्रतीक है। राकेश यहाँ मनुष्य के भीतर के भय, शंका और असुरक्षा को अत्यंत सूक्ष्मता से उद्घाटित करते हैं। यही मनोभाव उनकी कहानी “उसकी रोटी” में भी प्रतिध्वनित होता है, जहाँ प्रतीक्षा करती स्त्री का मौन पूरे जीवन की प्रतीक्षा में बदल जाता है। राकेश का मनोवैज्ञानिक यथार्थ शब्दों के साथ-साथ में मौन की गूंज में भी अभिव्यक्त होता है।13 उनके पात्र अपने भीतर के खालीपन से संवाद करते हैं और इसी संवाद में उनकी अस्तित्वगत पीड़ा उजागर होती है। यह मनोवैज्ञानिक गहराई ही राकेश को आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य का संवेदनशील और अंतर्मुखी रचनाकार बनाती है।

इन्हीं मनोवैज्ञानिक गहराइयों की निरंतरता में मोहन राकेश की रचनाएँ अपने पात्रों को गहन मानवीय संवेदना से जोड़ती हैं। 'आधे अधूरे' की सावित्री, “पैर तले की ज़मीन” की सलमा और “एक और ज़िंदगी” की नायिका — तीनों ही उस मनोवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो अपूर्ण जीवन में भी अर्थ की खोज करती है। ये स्त्रियाँ टूटने की बजाय अपने भीतर से संघर्ष कर अस्तित्व को नए अर्थ देती हैं। राकेश के पात्र समाज के साथ-साथ अपनी आत्मा से संवाद करते हैं। उनके भीतर की पीड़ा ही उनकी पहचान बन जाती है। इस संवेदना के माध्यम से राकेश ने व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक यथार्थ को गहराई से उद्घाटित किया। यही दृष्टि उनके नाटकों और कहानियों को एक साझा धरातल पर लाती है और समकालीन समय में उनकी प्रासंगिकता को विशिष्ट अर्थ प्रदान करती है।

हिंदी नाटक में मोहन राकेश का योगदान -

मोहन राकेश ने हिंदी नाटक को उस मोड़ पर पहुँचाया, जहाँ जीवन की सच्चाइयाँ मंच पर जीवंत हो उठीं। उन्होंने संवादों को कथन का माध्यम बनाने की बजाय संवेदना की अभिव्यक्ति बनाया। उनके पात्रों के मनोभाव सामाजिक यथार्थ से गहराई से जुड़े हैं। 'आषाढ़ का एक दिन', 'लहरों के राजहंस', 'पैर तले की ज़मीन' और 'आधे अधूरे' — जैसे नाटकों के माध्यम से उन्होंने पारंपरिक नाट्य संरचना को तोड़कर व्यक्ति की चेतना को केंद्र में रखा। राकेश का यह प्रयास हिंदी नाटक को आधुनिक जीवन से जोड़ने वाला सेतु बन गया। उनके दृष्टिकोण ने नाटक को बाहरी घटनाओं से निकालकर आंतरिक अनुभवों की ओर मोड़ा। डॉ. आभा ठाकुर के शब्दों में कहे तो —

“राकेश ने नाटक को व्यक्ति की आत्मा की भाषा में रूपांतरित किया,जहाँ हर संवाद एक अनुभूति बन जाता है।”14

राकेश की यही चेतना उनके उपन्यासों और कहानियों में भी विस्तृत रूप में प्रकट होती है, जो नाटक और कथा के बीच एक सशक्त सेतु निर्मित करती है। 'अंधेरे बंद कमरे', 'अंतराल' और 'ना आने वाला कल' — जैसे उपन्यास आत्मसंघर्ष और अकेलेपन की तीव्र अनुभूति को व्यक्त करते हैं। वहीं 'फौलाद का आकाश', 'एक और ज़िंदगी', 'पाँचवीं मंज़िल का फ्लैट' और 'आदमी और दीवार' — जैसी कहानियाँ उनकी नाट्य-संवेदना की निरंतरता को बनाए रखती हैं। इन रचनाओं में भाषा और मौन, दोनों समान रूप से संवाद करते हैं। राकेश का साहित्य यहाँ केवल एक विधा का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। क्योंकि एक गहन जीवन-दृष्टि का रूप ग्रहण करता है। इसी कारण उनका नाट्य लेखन हिंदी रंगमंच के लिए स्थायी प्रेरणा का स्रोत बन गया है।15

इन समग्र रचनात्मक प्रयोगों के माध्यम से मोहन राकेश ने हिंदी नाटक को अंतरराष्ट्रीय नाट्य चेतना से जोड़ा। उन्होंने रंगकर्म को आधुनिक प्रयोगशीलता और वैचारिक गहराई प्रदान की। 'पैर तले की ज़मीन' और 'छतरियाँ' — जैसे नाटकों में सामाजिक विघटन के साथ व्यक्ति की आत्म-खोज का स्वर उभरता है। यही विशेषता उनके साहित्य को आज भी प्रासंगिक बनाती है। राकेश के लेखन में यथार्थ और संवेदना का संतुलित संयोजन दिखाई देता है, जिसने हिंदी नाटक को नई प्रतिष्ठा और गंभीरता दी। इसी योगदान के लिए उन्हें सन् 1968 में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' और 'नेहरू फैलोशिप' जैसी मान्यताएँ प्राप्त हुईं।16 उनके नाटक आज भी मंच से मन तक की यात्रा के सजीव प्रतीक बने हुए हैं। इसी कारण मोहन राकेश हर युग के संवेदनशील मनुष्य के अंतर्द्वंद्व और आत्मसंघर्ष के प्रतीक बनकर उभरते हैं।

निष्कर्ष : मोहन राकेश का संपूर्ण रचनात्मक संसार आधुनिक हिंदी नाट्य चेतना का सजीव दस्तावेज़ प्रस्तुत करता है। उनके नाटकों में व्यक्ति की अंतः यात्रा और सामाजिक यथार्थ का सूक्ष्म संगम दिखाई देता है। पात्र अपने समय, संबंधों और परिस्थितियों से जूझते हुए आत्म-पहचान की खोज में प्रवृत्त रहते हैं। यह संघर्ष केवल मंच तक सीमित नहीं रहता। क्योंकि दर्शक के भीतर भी एक मानसिक हलचल उत्पन्न करता है। राकेश ने संवाद, मौन और प्रतीक के माध्यम से मानव मनोविज्ञान की गहराइयों को सजीव रूप दिया है। उनके नाटक दर्शक के भीतर आत्म संवाद की प्रक्रिया को सक्रिय करते हैं। इसीलिए उनकी रचनाएँ समय की सीमाओं से परे जाकर भी जीवन की मूल जिज्ञासाओं को स्पर्श करती हैं। इस दृष्टि से वे आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं।

इसीलिए भविष्य के शोधकार्यों में मोहन राकेश के नाटकों का अध्ययन केवल साहित्यिक या रंगमंचीय दृष्टि तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इन्हें मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय और स्त्रीवादी विमर्शों के साथ भी जोड़ा जा सकता है। उनके पात्रों की आंतरिक संवेदनाएँ और संबंधों की जटिलताएँ बदलते सामाजिक संदर्भों में नए अर्थ ग्रहण करती हैं। समकालीन रंगकर्म में उनके नाटकों के पुनर्मंचन और रूपांतरण यह स्पष्ट करते हैं कि राकेश की दृष्टि कितनी व्यापक और दूरदर्शी थी। साथ ही, उनके अप्रकाशित पत्र, डायरी और आत्म कथ्य सामग्री पर केंद्रित अध्ययन उनके सृजन-स्रोत को नए आयाम प्रदान कर सकता है। ऐसे अनुसंधान उनके वैचारिक परिप्रेक्ष्य को और गहराई से उजागर करने में सहायक होंगे।

इस प्रकार, उनका जन्मशताब्दी वर्ष उनके साहित्य, विचारों और रचनात्मक दृष्टि के पुनर्पाठ का अवसर बनकर नये युग की संवेदनाओं से संवाद स्थापित कर सकता है। और इसीलिए जब भी मैं उनके सृजन-संसार से गुज़रता हूँ, तो यह अनुभव होता है कि —

“वह नाटक नहीं, युग की संवेदना गढ़ गए,
मोहन राकेश विचारों के मंच पर अमर संवाद बन गए।”

संदर्भ :
(1) दशरथ ओझा : हिन्दी नाटक: उद्भव और विकास, राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, 2022, पृ. 75
(2) वहीं, पृ. 96
(3) जयदेव तनेजा (सं.) : नाट्य-विमर्श: मोहन राकेश, द्वितीय संस्करण, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृ. 89
(4) जगदेव कुमार शर्मा : आधुनिक हिन्दी नाटक के पुरोधा: मोहन राकेश, लोक संस्कृति प्रकाशन, दिल्ली, 2017, पृ. 54
(5) मोहन राकेश : मोहन राकेश के संपूर्ण नाटक (सं. नेमिचन्द्र जैन), राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, 2025, पृ. 156
(6) वहीं, पृ. 206
(7) वहीं, पृ. 376
(8) अशोक कुमार मंगलेश : मोहन राकेश का नाट्य-साहित्य: तात्त्विक विमर्श, उत्कर्ष प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 78
(9) मोहन राकेश : मोहन राकेश के संपूर्ण नाटक (सं. नेमिचन्द्र जैन), राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, 2025, पृ. 378
(10) सुनील कुमार दुबे : मोहन राकेश: मूल्य और चिन्तन, आयुष्मान पब्लिकेशन हाउस, नई दिल्ली, 2014, पृ. 165
(11) अशोक कुमार मंगलेश : मोहन राकेश का नाट्य-साहित्य: तात्त्विक विमर्श, उत्कर्ष प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. 98
(12) मोहन राकेश : मोहन राकेश के संपूर्ण नाटक (सं. नेमिचन्द्र जैन), राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, 2025, पृ. 408
(13) गिरीश रस्तोगी : मोहन राकेश और उनके नाटक, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2015, पृ. 87
(14) आभा गुप्ता : समय के निकष पर मोहन राकेश का रंगकर्म, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2008, पृ. 178
(15) वहीं, पृ. 195
(16) मनोज कुमार कैन : साहित्यकार मोहन राकेश, श्री नटराज प्रकाशन, दिल्ली, 2011, पृ. 379

रवि गर्ग
एम.ए. (प्रथम श्रेणी), श्यामलाल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नांगलोई, पश्चिम दिल्ली
rvigrg24@gmail.com, +91 9268807993

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

Post a Comment

और नया पुराने