शोध आलेख : रंग एवं हार्मोन्स के सम्बन्धों का कलात्मक परिप्रेक्ष्य / मुक्ता शर्मा एवं शाहिद परवेज़

रंग एवं हार्मोन्स के सम्बन्धों का कलात्मक परिप्रेक्ष्य
- मुक्ता शर्मा एवं शाहिद परवेज़

 

शोध सार : ‘कल्पना और भाव’ ये मनुष्य में विद्यमान दो ऐसी उत्तेजक शक्तियाँ हैं जो उसे अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करती हैं। किसी रचनाकार की अभिव्यक्ति मात्र उसकी भावाभिव्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहती, वह एक माध्यम बन जाती है, भावनात्मक सम्प्रेषण का विभिन्न अभिव्यक्ति के साधनों में से रचनाकार द्वारा प्रयुक्त ‘रंग’ भी एक है जिसका चयन रचनाकार सहज रूप से करता है, जो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कैनवास पर परिलक्षित होता है। यह शोध पत्र इस मुख्य बिंदु को उल्लेखित करता है कि किस प्रकार कलाकार की मनोदशा रंगों के चयन को प्रभावित करती है। यह शोध इस तथ्य को भी सिद्ध करता है कि रंग सौन्दर्यात्मक अनुभूति से परे मनुष्य के भीतर हो रही रासायनिक प्रतिक्रियाओं, संवेदनाओं और मनोशारीरिक अवस्थाओं को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है और रंगों को प्रतीकात्मक स्वरूप प्रदान करता है। भावाभिव्यक्ति के दौरान कलाकार के हार्मोन्स उसकी मनोदशा के अनुरूप स्रावित होते हैं जो उसकी आंतरिक संचार प्रक्रिया को सक्रिय करते हैं। इस शोध पत्र में उद्धृत रंग और हार्मोन्स का पारस्परिक संबंध दृश्य कला को मानव के आंतरिक जगत और मनोशारीरिक प्रक्रियाओं के मध्य स्थापित सेतु से अवगत करवाता है।

बीज शब्द : कलात्मक संवेदन, रचना प्रक्रिया, अभिव्यंजना, मनोदशा, रंग मनोविज्ञान, आर्बिट्ररी रंग, भावनात्मक विमोचन, रंग-प्रतीकात्मकता, हार्मोन्स, रिवॉर्ड सिस्टम, कलात्मक दृष्टिकोण।

मूल आलेख : मानव मस्तिष्क में बन रहे विचार मस्तिष्क के विभिन्न भागों से जन्म लेते हैं। जब ये सभी माध्यम संयोगात्मक रूप से अभिव्यक्त होते हैं तो रचनात्मकता को बढ़ावा देते हैं। ऐसे में कला का माध्यम मनुष्य के लिए स्वाभाविक सृजन प्रक्रिया बन जाता है। एक रचनाकार अपनी भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए विभिन्न माध्यमों का चयन करता है जिनमें से एक माध्यम रंग भी है। कला में रंग एक ‘तत्व’ है, परन्तु वैज्ञानिक आधार पर रंग मूलतः ‘प्रकाश’ है। ये वास्तव में सूर्य के प्रकाश से उत्पन्न होने वाली तरंगदैर्ध्य (वेवलेंथ) हैं जो हमारे नेत्रों तक पहुंचकर उन्हें विभिन्न तरंगदैर्ध्य के अनुसार प्रकाशित करती है जिन्हें हम रंगों के रूप में देखते हैं। यही रंग जब भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं तो मनोवैज्ञानिक आयामों के अंतर्गत चिह्नित होते हैं। रंग, जो हमारे चारों ओर विद्यमान हैं, मस्तिष्क को प्रत्यक्ष रूप से संज्ञात्मक प्रक्रिया और अप्रत्यक्ष रूप से भावनात्मक और हार्मोनल संतुलन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। एक शोध के अनुसार हम लगभग २०% सचेत अवस्था में रंगों का चयन करते हैं या उनसे जुड़े निर्णयों को लेते हैं जबकि यह प्रक्रिया हमारे अवचेतन मन में निरंतर सक्रिय रहती है।(1) विज्ञान में जहाँ रंग को प्रकाश माना है, वहीं मनोविज्ञान में रंग ‘अनुभव’ द्वारा चिह्नित हुआ है। मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ डॉ माहंके के अनुसार रंग एक प्रकार की ऊर्जा है जो हमें न केवल शारीरिक वरन मानसिक रूप से भी प्रभावित करती हैl

1. रंगों और भावनाओं का सम्मिश्रण –

न्यूटन ने जहाँ रंगों को वस्तुओं से परिवर्तित प्रकाश का एक गुण बताकर लौकिक अर्थ दिया है वहीं मनोवैज्ञानिक गोएथे, कार्ल जंग एवं हिप्पोक्रेट ने रंगों को भावनात्मक दृष्टिकोण प्रदान करते हुए यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कारकों के अनुरूप रंगों को देखता है और उसी प्रकार की अन्तःप्रेरणा, मनस्थिति और व्यवहार को प्रतिबिंबित करता है।(2) लेखिका हेलर अपनी पुस्तक ‘द लिटिल बुक ऑफ़ कलर’ में रंग के आंतरिक सम्बन्ध को समझाते हुए लिखती हैं ‘जब हम रंगों से जुड़ते हैं तब हम केवल रंगों से ही नहीं बल्कि उस मूल भाव से भी जुड़ जाते हैं जो हम रंगों के प्रति महसूस करते हैं, और जब हम रंगों के भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं तो वास्तव में हम स्वयं से जुड़ते हैं। रंग हमारे नेत्रों के मार्ग द्वारा होकर हृदय तक पहुँचते हैं तत्पश्चात हमारी भावनाओं में इस प्रकार रच-बस जाते हैं कि हमारे सोचने और व्यवहार करने के तरीके को प्रभावित करते हैं। हमारे जीवन से यदि रंगों को मिटा दिया जाए तो यह हमारे मनोभावों को मिटाने के सामान ही होगा। ऐसा होने पर हम अपनी आत्म अभिव्यक्ति के मूल तत्व को खो देंगे।’(3) स्टीनर के अनुसार रंग स्थिर या सीमित नहीं होते, वे एक-दूसरे से प्रभावित होकर समुद्र में उठती-गिरती लहरों के सामान सदैव गतिशील रहते हैं। हर बदलता नया रंग एक नए भाव को जन्म देता है। स्टीनर की दृष्टि में रंग इस वातावरण में फैली उर्जा और भावनाओं का अंग हैं।(4) विभिन्न कलाकारों द्वरा रंगों को अनुभूति के अनुरूप परिभाषित किया गया है -

“रंग प्रकाश को व्यक्त करता है, उस प्रकाश को जो कलाकार के मस्तिष्क के भीतर है न कि उसे जो केवल भौतिक है।” - हेनरी मतिस

“रंग एक की-बोर्ड है, नेत्र उसके सुर, और पियानो के स्ट्रिंग्स उसकी आत्मा। कलाकार हाथ है जो कीज़ को स्पर्श कर अपने आत्म में स्पंदन उत्पन्न करता है”- वैसली किंडेंस्की


रंग मनोविज्ञान के अनुसार हर रंग विशेष प्रकार की भावनाओं को उत्तेजित करता है। रंग और मनोभावों की सम्बद्धता सम्बन्धित वेल्दाज़ एवं मेहराबियन (1994) के शोध के अनुसार रंगों द्वारा उत्तेजित भाव सकारात्मक या नकारात्मक होता है जो उसके ह्यू, चमकीलेपन, फ्रीक्वेंसी, वेवलेंथ एवं सेच्यूरेशन पर निर्भर करता है। न्यूटन द्वारा रंगचक्र के उद्भव के पश्चात वेक्सनर (1954) ने मनुष्य के ग्यारह भावों को रंगों के साथ संबोधित किया।(5) प्रतीकात्मक अध्ययन के आधार पर रंग सम्बन्धित भाव उल्लेखित किये गए हैं -

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विभिन्न संस्कृतियाँ अलग प्रकार से रंगों के भाव को परिलक्षित करती हैं जिनमें से कुछ मूल भाव सर्वव्यापी हैं। यद्यपि कई सरोकारों पर आधारित शोध द्वारा रंगों के भावनात्मक स्वरूप को दिए गए चित्र में उद्धृत किया गया है परन्तु कलाकार जब इन्ही रंगों का भावनात्मक रूप से चयन करता है तो संभवतः बदले परिप्रेक्ष्य के कारण रंगों के अर्थ भी बदल जाते हैं।(6)

1.1 आर्बिट्ररी रंग - ‘आर्बिट्ररी’ यह शब्द किसी ऐसे कार्य के लिए प्रयुक्त होता है जो अनायास ही संयोगवश घटित होता हो। कलाकार जब अपने चित्रों को वास्तविक रंगों से हटकर विषयानुकूल भावनात्मक रंगों द्वारा चित्रित करता है उसे कला की दृष्टि में ‘आर्बिट्ररी रंग’ कहते हैं। ये रंग विषय सम्बद्ध अनुभव को दर्शाते हैं। कलाकार जब अन्तःप्रेरणा पर आधारित रंगों का चित्रण करता है तो वह अपने भीतर की भावनाओं और जीवन के अनुभवों से प्रभावित होकर, स्वयं को वैसे ही चित्रित करता है जैसे वह महसूस करता है। सन् 1988 का वान गोग का आलेख इस ओर इंगित करता है वे लिखते हैं कि “मेरे समक्ष किसी वस्तु को हुबहू चित्रित करने के बजाए स्वयं को अधिक प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करने के लिए मनोभाविक रंगों का प्रयोग करता हूँ।”(7)

कलाकार आर्बिट्ररी रंगों का प्रयोग तभी कर सकता है जब वह रंगों को केवल बाह्य दृष्टि से नहीं बल्कि अंतरिक दृष्टि से भी महसूस करे। इस विषय पर स्टीनर का मत है कि हम रंगों के आंतरिक जीवन का अनुभव तभी कर सकते हैं जब हम रंगों की जीवन्तता को चेतनात्मक दृष्टि से देखें। यदि हम रंगों को अपनी अंतर्दृष्टि से देखना चाहते हैं तो हमें सर्वप्रथम ‘रंग में क्या है?’ इसे महसूस करना होगा।(8) डी लिओ (1970) का मनना है कि बच्चों के लिए रंग उनके भीतर के भाव और विचारों को प्रकट करने का स्वभाविन माध्यम बन जाता है क्यूंकि बच्चे बजाए वास्तविकता के, वह चित्रित करते हैं जिसे वे महसूस करते हैं।(9) कलाकारों की रचनाओं पर रंग सम्बन्धित हुए शोध द्वारा यह स्पष्ट होता है कि कलाकार अपनी भावनाओं की निष्पत्ति हेतु पारंपरिक अथवा सामान्य रंगों की जगह आर्बिट्ररी रंगों का प्रयोग अधिक करते हैं।(10) रंगों का यही भावनात्मक प्रयोग कई रचनाकार द्वारा उनकी रचनाओं में देखा गया है। केवल कलाकार पर ही नहीं वरन कलाकृति देख रहे उन दर्शकों पर भी रंगों का उचित प्रभाव होता है, हाँ दर्शक सम्बन्धित कारकों के अनुसार उनका दृष्टिकोण कलाकार से भिन्न अवश्य हो सकता है चाहे चित्र एक हो। इसका एक कारण हमारे शारीर के भीतर हो रहे हार्मोन्स का स्राव भी माना जाता है जो रंगों के प्रति हमारी उत्तेजक प्रक्रिया का कारण बनते हैं। हमारे नेत्रों पर प्रकाश पड़ते ही रासायनिक ट्रांसमीटर्स सक्रिय हो जाते हैं जो विद्युत् सन्देश को हमारे मस्तिष्क में विद्यमान हाईपोथैलेमस तक पहुंचाते हैं। तत्पश्चात पिट्यूटरी ग्रंथि (जो शारीरिक तापमान, मेटाबोलिज्म, ऊर्जा एवं निद्रा चक्र के लिए उत्तरदायी है) उन रंगों द्वारा उत्तेजित होकर उनके अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया देती है।(11)

2. हार्मोन्स -

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हार्मोंन्स एक रासायनिक पदार्थ हैं जो रक्त प्रवाह में स्रावित होकर एक या एक से अधिक लक्षित अंगों पर विशिष्ट रूप से कार्य करते हैं ताकि उनकी क्रिया प्रणाली को नियंत्रित कर सकें। लगभग सभी हार्मोन्स भावनाओं में सम्मिलित होते हैं, बिना हार्मोन के भावनात्मक प्रक्रिया का होना असंभव है क्यूँकि भावनात्मक अनुभवों और मनोदशा पर ही इनका स्राविकरण आधारित है जिसके आधार पर ये संचालित होते हैं। मानव शरीर में ये संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं जो रक्त प्रवाह द्वारा संचालित होकर शारीरिक, मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तनों को प्रभावित करते हैं।

मनुष्य में विचारों द्वारा उत्तेजित हर भाव हार्मोनल स्राव को प्रेरित करता है। लिम्बिक प्रणाली द्वारा भावनात्मक रूप से प्रसंस्कृत हुआ यह भाव सर्वप्रथम रासायनिक रूप से डिकोड चित्र संख्या 1 होता है तत्पश्चात प्रिय-अप्रिय के रूप में चिह्नित होता है। इन भावनाओं की स्वीकृति हाइपोथैलेमस द्वारा होती है जो भावनात्मक आधार पर पिट्यूटरी ग्रंथि को हार्मोन्स के स्राव के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। जहाँ शरीर के सभी हिस्सों की सामंजस्यपूर्ण गतिविधियों और उनके बाह्य पर्यावरण से संबंध को नर्वस सिस्टम सुनिश्चित करता है वहीं भावनात्मक आधार पर हुआ आंतरिक (शरीर के भीतर) हार्मोनल संचार इन गतिविधियों को प्रभावित करने में सहायता करता है। सभी हार्मोन्स पृथकता से स्वभूमिका का निर्वहन करते हैं जिसमें से कुछ नींद के नियम, वृद्धि और विकास के संबंध में स्रावित होते हैं और कुछ ख़ुशी, आनंद, चिंताएँ, उदासी, तनाव आदि स्राव के उत्तरदायी होते हैं।(12)

2.1. रचनात्मक प्रक्रिया में हार्मोन्स एवं रंगों का प्रभाव :

कलाकार द्वारा हुई रचनात्मक प्रक्रिया उसकी भावनाओं को दृश्य रूप देने का एक माध्यम मात्र है। इसमें रंगों का चयन कलाकार के भावनात्मक और शारीरिक स्थिति का स्वभाविक प्रतिबिम्ब होता है। रंगों को हम किस प्रकार देखते या अनुभव करते हैं यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो तंत्रिका तंत्र प्रणाली से प्रभावित होती है जिनमें व्यक्तित्व, पिछले अनुभव, पालन-पोषण, पर्यावरण और संस्कृति जैसे कई मुख्य कारक शामिल हैं। मस्तिष्क इन रंगों को किस प्रकार लेता है यह ऐसे अनेकों कारकों पर निर्भर करता है।(13) कलाकार जब सृजन में रंगों का चयन सहजता से करता है तब हार्मोन्स उनकी भावनाओं, प्रवृत्तियों और धारणाओं को परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। डोपामिन, सेरोटोनिन कलाकार के रिवॉर्ड सिस्टम को प्रभावित करते हैं जिससे उन्हे निरंतर कार्य में लगे रहने के लिए प्रोत्साहन मिलता है साथ ही कोर्टिसोल, ऑक्सीटोसिन और एड्रेनालिन मनोदशा (मूड) और ऊर्जा के स्तर को नियंत्रित करते हैं। जब डोपामिन उच्च मात्रा में होता है तो कलाकार जीवंत और चमकीले रंगों जैसे लाल, पीले और नारंगी की ओर आकर्षित हो सकता है।(14)

19वीं सदी में क्रोमो थेरेपी (शरीर को रंगों के प्रभाव द्वारा संतुलित करना) को प्रायोगिक चिकित्सा के रूप में प्रयुक्त किया जाता था, ताकि मनुष्य के लक्षित हार्मोन्स प्रभावित हों और भावनात्मक तथा शारीरिक संतुलन बन सके।(15) यद्यपि हार्मोन्स का स्वयं कोई रंग नहीं होता परन्तु उनसे जुड़ी भावनाओं को प्रतीकात्मक रूप से रंगों के साथ ज़रूर जोड़ा जाता है। ये रंग उन भावनाओं को दर्शाते हैं जो हार्मोंन्स द्वारा प्रभावित होते हैं, कलात्मक प्रक्रिया के दौरान प्रयुक्त रंग इस बात को उजागर करते हैं कि शरीर की रासायनिक प्रक्रियाएँ हमारी मानसिक, भावनात्मक स्थितियों और व्यवहार को कैसे प्रभावित कर उन्हें आकार देती हैं। कर्ट गोल्डस्टीन (1942) यह व्यक्त करते हैं कि जब किसी जीव को उद्दीपन का आभास होता है तो उसका सम्पूर्ण शरीर एक विशेष रूप से प्रतिक्रिया करता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रत्येक विशेष उत्तेजना के साथ एक विशिष्ट सम्पूर्ण प्रतिक्रिया जुड़ी होती है। गोल्डस्टीन के साथ बिर्रेन (1969) का भी यही मत है कि शारीरिक और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं एक ही तंत्रिका तंत्र से उत्पन्न होती हैं इस कारण शरीर के किसी भी भाग में यदि प्रतिक्रिया होती है तो उससे अन्य हिस्से भी स्वतः प्रभावित हो जाते हैं अतः रंग केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं है।(16)

इसी प्रकार जेनिफ़र मारी द्वारा किये गए प्रायोगिक शोध ‘अस्सेसिंग कलर इमोशंस पेयरिंग’ में उन्होंने दो हिस्सों में अध्ययन किया और उनमें भाग लेने वाले प्रतिभागियों को उनकी भावनाओं के अनुरूप रंग चुनने को कहा। दोनों अध्ययन के परिणामों से यह सिद्ध हुआ कि कुछ रंग मनोभावों को सामान्य रूप से ही प्रकट करते हैं और कुछ थोड़ी भिन्नता से, जिसे दिए गये चित्र में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है।(17) 

 
चित्र संख्या 2                                                                                     चित्र संख्या 3
चित्र संख्या 4

इसी तरह से एक शोध क्रिस्टीन मोह्र और डोमिसिली जोनौस्काईट ने अंतर्राष्ट्रीय रंग-भावना संघ सर्वेक्षण की सहायता से रंगों का चार विभिन्न कारकों के आधार पर वर्गीकरण कर सर्वेक्षण किया जिनमें पहला देश, दूसरा संस्कृति, तीसरा सर्वव्यापक आधार और चौथा भाषा। इन चारों वर्गों को मिलाकर ग्यारह रंग दिए गए जिसमें एक ओर सकारात्मक और दूसरी ओर नकारात्मक रंग थे। 4500 प्रतिभागियों के अध्ययन द्वारा प्राप्त परिणामों को एक प्रतिशत के अनुरूप दिया गया, चित्र 4 में परिणाम स्पष्ट हैं।(18)

निष्कर्ष : रंग और हार्मोंन्स एक दूसरे से अन्तर्निहित रूप से जुड़े हुए हैं, जो कलाकार को उत्तेजित कर प्रतिक्रिया करते हैं। एक कलाकार जब सकारात्मक और प्रेरणादायक वातावरण में रहता है तो उसके डोपामिन और ऑक्सीटोसिन का स्तर बढ़ सकता है जो रचनात्मकता को प्रोत्साहित करता है। इसके विपरीत, चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में कोर्टिसोल और एड्रेनालिन सक्रिय हो सकते हैं जिससे एक अलग प्रकार की रचनात्मक अभिव्यक्ति की प्रेरणा संभव है। कलाकार की रचनात्मक प्रक्रिया में हार्मोन्स परोक्ष में रहकर मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं। ये कलाकार को संवेदना, विषय चयन तथा रंगों के चयन में सहायता करते हैं। अंत में कलाकार अप्रत्यक्ष रूप से हार्मोन्स तथा रंगों द्वारा अपनी अवधारणाओं को अभिव्यक्त करता है। रंगों के मानसिक एवं भावनात्मक प्रभाव पर हुए कई प्रकार के शोध से यह विदित होता है कि हर रंग हर व्यक्ति को सामान रूप से प्रभावित नहीं करता, न ही कोई पूरी तरह से सही या गलत रंगों की व्याख्या देता है, इसीलिए यह पूर्णतः व्यक्ति विशेष के अनुभवों पर ही निर्भर करता है। अतः कला केवल बाह्य नहीं वरन रचनाकार की आंतरिक अवधारणाओं का भी स्वरूप बनकर कैनवास पर उतरती है।

सन्दर्भ :
1. Karen Haller, The Little Book of Colour, Penguin Publication, UK, 29 Aug 2019 pg.17
2. Karen Haller, The Little Book of Colour, Penguin Publication, UK, 29 Aug 2019, pg.24
3. वही, पृष्ठ.12
4. Sari Kuuva “My soul must live with the colour” The Transformative Potential of Colours by Rudolf Steiner, Approaching Religion Vol.14, No.1, February 2024, pg.43
5. Navit Gohar Kadar, Thesis on Diagnostic colours of emotion, Department of Psychology, The University of Sydney, 2007, pg.54
6. Amy Pierson, Colour : The influence on visual communication, Bemidji State University, Honors Thesis, 2008, pg.5-6 https://www.bemidjistate.edu/academics/honors/wpcontent/uploads/sites/73/2022/11/Color-The-Influence-on-Visual-Communication-Pierson-Amy
7. Saara Kankare, Understanding Colour-Emotion Associations :The opportunities and limitations of colours in conveying emotions through self-portraiture, Thesis, May 2024, Degree Programme in Media and Arts, Tampere University of Applied Sciences pg. 4-5,19
8. Sari Kuuva “My soul must live with the colour” The Transformative Potential of Colours by Rudolf Steiner, Approaching Religion Vol.14, No.1, February 2024 pg.43
9.Navit Gohar Kadar, Thesis on Diagnostic colours of emotion, Department of Psychology, The University of Sydney, 2007, pg.150-151
10. Domicele Jonauskaite, Speaking of Psychology: Red with anger or feeling blue? The link between color and emotion, Podcast Episode 250, American Psychological Association. 
11. Dr.Leena B.Cheriyan, The Psychological and Physiological Relevance of Bharathamuni’s Theory of Rasa: A Study on the Basis of Colorgenics, Mar Thoma College, Thiruvalla Kerala, 2017, pg. 21-23
12. Monica Butnariu and Ioan Sarac, Biochemistry of hormones, Volume 1, Issue 1, Article 1001, Banat’s University of Agricultural Sciences and Veterinary Medicine, Timisoara, Romania, Remedy Publications LLC. 15 Jul 2019.
13. Saara Kankare, Understanding Colour-Emotion Associations :The opportunities and limitations of colours in conveying emotions through self-portraiture, Thesis, May 2024, Degree Programme in Media and Arts, Tampere University of Applied Sciences pg.6
14. Monica Butnariu and Ioan Sarac, Biochemistry of hormones, Volume 1, Issue 1, Article 1001, Banat’s University of Agricultural Sciences and Veterinary Medicine, Timisoara, Romania, Remedy Publications LLC. 15 Jul 2019.
16. Saara Kankare, Understanding Colour-Emotion Associations :The opportunities and limitations of colours in conveying emotions through self-portraiture, Thesis, May 2024, Degree Programme in Media and Arts, Tampere University of Applied Sciences pg.8
17. Fugate JMB and Franco CL, What Color Is Your Anger? Assessing Color-Emotion Pairings in English Speakers. (2019) Front. Psychol. 10:206.doi: 10.3389/fpsyg.2019.00206
18. Christine Mohr and Domicele Jonauskaite, Why Links Between Colors and Emotions May Be Universal, February 8, 2022

चित्र सन्दर्भ :

मुक्ता शर्मा
शोधार्थी, दृश्यकला विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)

शाहिद परवेज़
सहायक आचार्य, दृश्यकला विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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